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उत्तर बिहार में रेलवे करेगी बड़ा बदलाव, 2 नई लाइनों पर बनेंगे 14 नए स्टेशन: समस्तीपुर से लेकर दरभंगा तक, मोदी सरकार खर्च कर रही ₹4000+ करोड़

बिहार में लोगों के लिए अच्छी खबर है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोमवार (7 जुलाई 2025) को समस्तीपुर में जाकर कई बड़ी रेल परियोजनाओं की घोषणा की। उन्होंने बताया कि बिहार में दो नई रेल लाइनें बनेंगी, जिससे यात्रा आसान हो जाएगी और इलाके का विकास होगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहली लाइन लहेरियासराय से सहरसा तक 110 किलोमीटर की होगी, जिस पर करीब 2376 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इस लाइन पर कोशी नदी पर एक बड़ा पुल बनेगा, साथ ही 14 बड़े पुल, 41 छोटे पुल और 72 अंडरपास भी तैयार किए जाएँगे। इससे ट्रेनें तेज चल सकेंगी और हैवी ट्रैफिक की समस्या कम होगी। दूसरी लाइन लहेरियासराय से मुजफ्फरपुर तक 67 किलोमीटर की होगी, जिसकी लागत 1213 करोड़ रुपए है। इस पर 4 नए स्टेशन और 3 हॉल्ट बनेंगे।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दरभंगा एम्स के पास एक नया स्टेशन बनाने की भी बात कही। ये स्टेशन एम्स आने-जाने वाले मरीजों और यात्रियों के लिए बहुत फायदेमंद होगा। कुल मिलाकर इन दोनों लाइनों पर 14 नए स्टेशन बनेंगे, जिसमें से 10 स्टेशन लहेरियासराय-सहरसा लाइन पर होंगे। दरभंगा संसदीय क्षेत्र में 70 किलोमीटर का हिस्सा आएगा, जो स्थानीय लोगों को रोजगार और बेहतर कनेक्टिविटी देगा।

इसके अलावा कर्पूरीग्राम स्टेशन को विश्वस्तरीय बनाने के लिए 18.33 करोड़ रुपए की योजनाओं का शिलान्यास किया गया। अब ये स्टेशन आधुनिक सुविधाओं से लैस होगा, जैसे बेहतर प्लेटफॉर्म, वेटिंग रूम और पार्किंग।

बैठक के बाद रेल मंत्री ने दो नई अमृत भारत ट्रेनें चलाने की घोषणा की। एक ट्रेन दरभंगा से लखनऊ जाएगी और दूसरी अमृतसर से सहरसा होकर चलेगी। ये ट्रेनें आरामदायक होंगी और कम किराए में सफर कराएँगी। साथ ही, 6.16 करोड़ रुपए से बने लहेरियासराय लो-कॉस्ट ओवरब्रिज को चालू कर दिया गया। ये ओवरब्रिज लहेरियासराय से बेनीपुर और कुशेश्वरस्थान जाने वालों के लिए बड़ा राहत है। इससे दरभंगा-मुजफ्फरपुर की दूरी 24 किलोमीटर कम हो जाएगी और यात्रा का समय दो घंटे से घटकर सिर्फ डेढ़ घंटा रह जाएगा।

समस्तीपुर रेलवे मंडल को विश्वस्तरीय बनाने की योजना पर भी चर्चा हुई। रेल मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि काम तेजी से पूरा करें और गुणवत्ता पर ध्यान दें। उन्होंने वर्तमान परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की और जरूरी निर्देश दिए। ये सब योजनाएँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमृत भारत स्टेशन योजना का हिस्सा हैं, जिससे रेलवे को आधुनिक बनाया जा रहा है। बिहार के लोग खुश हैं क्योंकि इससे न सिर्फ यात्रा सुगम होगी, बल्कि अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। रोजगार बढ़ेंगे और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। रेल मंत्री ने कहा कि बिहार रेलवे के विकास में आगे रहेगा।

‘ऑपरेशन सिंदूर में भारत को नहीं हुआ कोई नुकसान, एक भी तस्वीर दिखा दो तो मानें’: NSA अजीत डोभाल ने ललकारा, कहा – पाकिस्तान की तबाही तो पूरी दुनिया ने देखी

भारतीय सेना ने आतंक के आकाओं को करारा जवाब देते हुए 7 मई 2025 की रात पाकिस्तान और POK में स्थित 9 आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर डाला था। इस पूरे अभियान को मात्र 23 मिनट में अंजाम दिया गया था और भारत को जरा सा भी नुकसान नहीं हुआ था।

यह था ‘ऑपरेशन सिंदूर’, जिसने आतंक के खिलाफ भारत की निर्णायक शक्ति और सटीक मारक क्षमता को पूरी दुनिया के सामने लाकर रख दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने इस पूरे अभियान की जानकारी IIT मद्रास के 62वें दीक्षांत समारोह में दी।

अजीत डोभाल ने गर्व के साथ कहा कि इस ऑपरेशन में पूरी तरह स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया और भारत ने सीमापार जाकर सिर्फ आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया।

डोभाल ने ललकारते हुए कहा, “एक भी फोटो दिखा दो जिसमें भारत को नुकसान हुआ हो, यहाँ तक कि एक गिलास भी टूटा हो तो बताओ!” डोभाल ने यह भी कहा कि भारत ने पहले ही तय कर लिया था कि किन-किन ठिकानों पर हमला करना है और सभी पर सटीक निशाना साधा गया।

उन्होंने बताया कि यह हमला सीमा पार आतंकी शिविरों पर किया गया, न कि सीमावर्ती इलाकों में। यह साफ दर्शाता है कि भारत अब सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि आतंकवाद को जड़ से खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

विदेशी मीडिया और पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए डोभाल ने कहा, “वे लोग झूठ फैला रहे हैं। कहते हैं कि पाकिस्तान ने ये कर दिया, वो कर दिया… अगर ऐसा कुछ हुआ होता तो कोई एक सबूत दिखाते। हमने सैटेलाइट तस्वीरें देखीं, 10 मई से पहले और बाद की, पाकिस्तान के सारे 13 एयरबेस तबाह हुए हैं।”

उन्होंने पाकिस्तान के नाम लेते हुए सरगोधा, रहीम यार खान, चकलाला जैसे एयरबेस के बारे में बताया और साफ किया कि भारत की कार्रवाई सटीक, सीमित और पूरी तरह सफल से सफल रही है।

बता दें कि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद यह कार्रवाई की गई थी। पाकिस्तान ने भारत की कार्रवाई से घबराकर जवाबी हमला करने की कोशिश की, लेकिन भारतीय डिफेंस सिस्टम ने उनकी हर चाल को नाकाम कर दिया।

जैसलमेर में इस्लामी कट्टरपंथियों ने औरतों-बच्चों को आगे कर कराया पथराव, कॉन्स्टेबल समेत कई घायल: राजस्थान पुलिस ने 15 महिलाओं समेत 22 को दबोचा, राजपूत योद्धाओं के स्मारकों की मरम्मत में रोड़ा डाल रहे मुस्लिम

राजस्थान के जैसलमेर जिले के बासनपीर गाँव में ऐतिहासिक छतरियों (स्मारक) के निर्माण को लेकर तनाव बना हुआ है। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को इस्लामी कट्टरपंथी गुट ने निर्माण कार्य का विरोध करते हुए महिलाओं और बच्चों को आगे करके पत्थराव करवाया। शुक्रवार (11 जुलाई 2025) को भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।

विवाद पर बीजेपी विधायक छोटू सिंह भाटी ने कहा है कि जैसलमेर के गौरव का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।

इस मामले का एक वीडियो भी वायरल हुआ। वीडियों में देखा जा सकता है कि पुलिसबल निर्माण कार्य के पास मौजूद है और कुछ कट्टरपंथी लोग पत्थराव कर रहे हैं। पत्थराव करने वालों में सबसे ज्यादा महिलाएँ शामिल है। इनके हाथों में पत्थर देखें जा सकते हैं। ये महिलाएँ पुलिस को कुछ कहती है और उन पर पत्थर फेंकना शुरू कर देती हैं।

क्या है छतरियों का इतिहास?

जानकारी के मुताबिक, जैसलमेर में बनी छतरियाँ दो बहादुर लोगों की याद में हैं: झुंझार रामचंद्र सिंह सोढ़ा और झुंझार पालीवाल जी।

झुंझार रामचंद्र सिंह सोढ़ा एक बहादुर योद्धा थे। वे 1828 में जैसलमेर और बीकानेर के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनकी बहादुरी की याद में यह छतरी (स्मारक) बनाई गई थी।

हदूद जी पालीवाल ने गाँव में एक तालाब बनवाया था। लोगों को पानी मिल सके, इसलिए उन्होंने यह अच्छा काम किया। उनकी याद में दूसरी छतरी बनाई गई थी।

इन छतरियों को 1835 में महारावल गज सिंह ने बनवाया था। ये छतरियाँ गौरव का प्रतीक मानी जाती हैं।

छतरियों से जुड़ा विवाद- यह विवाद नया नहीं है, बल्कि 2019 से चला आ रहा है। 2019 में एक शिक्षक से सफाई के दौरान एक छतरी टूट गई थी। इसके बाद झुंझार धरोहर बचाओ संघर्ष समिति और हिंदू संगठनों ने इसका विरोध किया।

जब प्रशासन ने इन छतरियों को दोबारा बनाने की मंजूरी दी, तो मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया। 2021 में प्रशासन की कोशिश से काम शुरू हुआ, लेकिन दो दिन बाद तनाव के कारण इसे फिर रोकना पड़ा था।

क्या हुआ था?

राजस्थान के जैसलमेर जिले के बासनपीर गाँव में दो ऐतिहासिक छतरियों को लेकर विवाद चल रहा है। यह विवाद इन छतरियों के दोबारा बनने को लेकर है। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को निर्माण कार्य शुरू हुआ।

दूसरे समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया और पत्थरबाजी की। कुछ कट्टरपंथियों ने महिलाओं और बच्चों को आगे करके लोगों पर और पुलिसबल पर पथराव करवाया। इसमें पुलिसकर्मी समेत चार लोग घायल हो गए।

भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। पुलिस ने इस मामले में 22 लोगों को हिरासत में लिया है, जिनमें 15 से ज्यादा महिलाएँ शामिल हैं।

राणा अय्यूब ने कोरोना में किया जो करोड़ों का घपला, अब पाई-पाई का टैक्स चुकाना होगा: ITAT का आदेश; गरीबों के नाम पर हड़पे थे सारे रुपए, परिवार को दिया फायदा; ₹50 लाख की सिर्फ FD करवाई

कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश संकट से जूझ रहा था, उस समय पत्रकार राणा अय्यूब ने राहत कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये का फंड जुटाया। लेकिन इस पैसे का उपयोग राहत कार्यों से ज्यादा उन्होंने निजी कामों के लिए किया। इसके खुलासा मुंबई स्थित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने किया है।

ITAT का कहना है कि इस फंड का कुछ हिस्सा निजी उपयोग में लाने के साथ साथ विदेशी फंडिंग के नियमों का भी उल्लंघन किया गया है। ITAT ने राणा अय्यूब को पूरे फंड पर टैक्स जमा करने का आदेश दिया है।

राणा अय्यूब ने कोरोना महामारी के समय ‘केट्टो’ प्लेटफॉर्म पर तीन क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए कुल ₹2.69 करोड़ जुटाए थे। इस रकम में से ₹80.49 लाख की फंडिंग विदेश से मिली था, जो FCRA, 2010 का उल्लंघन था।

COVID-19 महामारी के दौरान राणा अय्यूब द्वारा जुटाई गई धनराशि का स्क्रीनग्रैब

राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत कार्यों के लिए जुटाई गई रकम में से ₹1.60 करोड़ अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख और ₹37.15 लाख अपनी बहन इफ़्फ़त शेख के बैंक खातों में जमा किए। उन्होंने आयकर विभाग को बताया कि उनका पैन कार्ड नहीं मिल रहा था, इसलिए केट्टो से फंड निकालने के लिए उन्होंने अपने पिता और बहन के पैन कार्ड का इस्तेमाल किया।

बाद में राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से ₹84.40 लाख और बहन के खाते से ₹36.40 लाख अपने निजी खाते में ट्रांसफर कर लिए। इस तरह उनके खाते में कुल ₹1.20 करोड़ से ज्यादा की राशि ट्रान्सफर।

अप्रैल 2022 में उन्होंने इस बड़ी रकम के गबन को सिर्फ 20,000 डॉलर की छोटी राशि’ बताकर गंभीरता को कम करने की कोशिश की, जबकि असल में मामला ₹2.69 करोड़ (करीब 3.14 लाख डॉलर) का था।

राणा अय्यूब द्वारा अपने पिता और बहन के खाते से अपने निजी बैंक खाते में स्थानांतरित किया गया धन

ITAT ने कहा कि एक साल बाद भी क्राउडफंडिंग से जुटाए गए लगभग ₹2.4 करोड़ का उपयोग राहत कार्यों के लिए नहीं हुआ। पैसा राणा अय्यूब और उनके परिवार के व्यक्तिगत बचत खातों में जमा किया गया था। राहत कार्य करने के बजाय, राणा अय्यूब ने अपने नाम पर चालू खाता खोला, FD में निवेश किया और उसी खाते से निजी खर्च भी किए।

राणा अय्यूब द्वारा धन के दुरुपयोग का मामला उजागर

ITAT ने पत्रकार राणा अय्यूब के खिलाफ यह टिप्पणी की है कि उन्होंने COVID-19 राहत कार्यों और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए क्राउडफंडिंग से जुटाई गई राशि के लिए अलग-अलग बैंक खाते नहीं खोले।

ITAT के अनुसार, ये पैसा उनके पिता और उनकी बहन के व्यक्तिगत खातों में भेजा गया पहले और दूसरे क्राउडफंडिंग अभियान के दौरान उनके परिवार के सदस्यों के खातों में और तीसरे अभियान के दौरान सीधे उनके अपने खाते में।

राणा अय्यूब ने दावा किया कि वह इन पैसों का इस्तेमाल खुद के लिए नहीं किया हैं, लेकिन ITAT ने कहा कि यह साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होंने धन को निजी खातों में मिलाकर रखा और कोई अलग खाता नहीं बनाया।

उन्होंने यह भी कहा कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर लाभार्थी की पहचान स्पष्ट थी, लेकिन चूंकि पैसा सीधे उनके और उनके परिवार के खातों में गया, यह दलील भी स्वीकार नहीं की गई। ITAT ने यह भी बताया कि जब आयकर विभाग ने इस पर सवाल उठाए, तो राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से प्राप्त पूरी राशि को ‘अन्य स्रोतों से आय’ के रूप में घोषित कर दिया।

उन्होंने यह स्वीकार किया कि 2.69 करोड़ रुपये में से केवल 28 लाख रुपये ही राहत कार्यों जैसे कि प्रवासी मजदूरों की मदद, राशन, अस्पताल में भर्ती, परिवहन और पश्चिम बंगाल में बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किए गए।

ITAT की जाँच में यह भी सामने आया कि राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से मिले पैसों में से 19 लाख रुपए का इस्तेमाल अपने निजी खर्चों के लिए किया है। इसके अलावा, 50 लाख रुपए की राशि को अपने नाम से व्यक्तिगत फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में डाल दिया।

ITAT ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर उनकी मंशा वास्तव में राहत कार्यों की थी, तो उन्होंने अपने नाम से इतनी बड़ी FD क्यों करवाई? ITAT ने यह भी बताया कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर पहले क्राउडफंडिंग अभियान से राणा अय्यूब को 1.23 करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन उसमें से सिर्फ 18 लाख ही राहत कार्यों में खर्च किए गए।

उन्होंने यह तर्क दिया कि बची हुई रकम अस्पताल निर्माण के लिए रखी गई थी, जबकि फंडरेज़िंग के दौरान इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई थी। इसके अलावा, जब उन्हें टैक्स संबंधी कार्रवाई का डर हुआ, तब उन्होंने विदेशी स्रोतों से मिले कुछ धन को वापस लौटा दिया।

लेकिन पहले क्राउडफंडिंग अभियान के एक साल बाद तक वे केवल 18 लाख रुपए के खर्च का ही सबूत दे पाईं। ITAT ने इस आधार पर उनके दावों पर संदेह जताया और कई वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया।

FCRA नियमों का उल्लंघन

ITAT ने यह भी कहा कि राणा अय्यूब ने FCRA, 2010 का उल्लंघन किया है। ITAT के अनुसार, अय्यूब ने खुद को वाशिंगटन पोस्ट के लिए पत्रकार बताया था और FCRA की धारा 3(1)(H) के तहत पत्रकारों को विदेशी दान सीधे अपने खाते में प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि पत्रकार होने के नाते राणा अय्यूब को विदेशी फंड सीधे प्राप्त नहीं करने चाहिए थे, इसलिए यह कानून का उल्लंघन माना गया।

धर्मार्थ गतिविधियों के लिए एकत्रित धनराशि अप्रमाणित: आईटीएटी

ITAT  ने बताया कि राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों की मदद के नाम पर धन इकट्ठा किया था, लेकिन यह पूरा दान उनके और उनके परिवार के सदस्यों के निजी बैंक खातों में जमा किया गया।

उन्होंने कोई अलग खाता नहीं खोला और इस धन का इस्तेमाल निजी खर्चों और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश के लिए किया गया। बड़ी राशि लंबे समय तक बिना उपयोग के पड़ी रही। ITAT के अनुसार राणा अय्यूब का यह दावा कि यह धन धर्मार्थ कार्यों के लिए इस्तेमाल किया गया, साबित नहीं हो सका है।

जिस तरह से फंड एकत्र किया गया और उसे उनके रिश्तेदारों के खातों में जमा किया गया, इस बात का भी कोई ठोस सबूत नहीं है। ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि यह क्राउडफंडिंग की गई राशि ‘कर छूट’ (tax free) के योग्य नहीं है और इसे उनकी आय माना गया है, जिस पर आकलन वर्ष 2021-22 और 2022-23 में कर लगाया गया है।

उदयपुर फाइल्स पर रोक लगवाने में सफल हुआ जमीयत, ‘ईशनिंदा’ का बनाया बहाना: दावा – मुस्लिमों को बनाया जा सकता है निशाना, आतंकियों का भी बचाव करता है ये इस्लामी संगठन

राजस्थान के उदयपुर में दर्जी कन्हैयालाल की हत्या पर आधारित फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स: कन्हैयालाल टेलर मर्डर’ फिल्म की रिलीज पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। ये फिल्म शुक्रवार (11 जुलाई 2025) को रिलीज होनी थी।

इस फिल्म पर रोक लगाने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुखिया अरशद मदनी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच में चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस अनीश दयाल ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद को केंद्र सरकार के पास जाकर फिल्म के सीन और उसके सर्टिफिकेशन में बदलाव करने की बात कही है।

केंद्र के पास सिनेमेटोग्राफी एक्ट के सेक्शन-6 के तहत फिल्म में बदलाव करने का अधिकार होता है। कोर्ट ने उलेमा-ए-हिंद को जरूरी बदलाव करने के लिए 10 जुलाई 2025 तक का समय दिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद के बदलाव किए जाने वाली याचिका पर जब तक निर्णय नहीं ले लिया जाता तब तक फिल्म को रिलीज नहीं की जाएगी।

कोर्ट ने कहा, “क्योंकि हम याचिकाकर्ता को बदलाव करने के लिए कह रहे हैं तो ऐसे में जब तक सरकार उस पर निर्णय नहीं देती, तब तक फिल्म के रिलीज पर रोक बनी रहेगी। अदालत में आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि इस कोर्ट में असाधारण अधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता, लेकिन इस मामले के तथ्यों और अधिनियम को ध्यान में रखते हुए हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता को धारा-6 के तहत केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट जाएँगे फिल्म के निर्माता

उदयपुर फाइल्स के निर्माता अमित जानी ने कहा है कि वह इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे।

अपनी घोषणा ने अमित ने कहा, “हमने इस फिल्म की स्क्रीनिंग उनके वकील कपिल सिब्बल के लिए की थी लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस फिल्म का विरोध किया क्योंकि उन्हें इसके लिए ही फीस मिली है। हाई कोर्ट ने भी इस फिल्म पर आज रोक लगा दी है। इसे चुनौती देने के लिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। जमीयत उलेमा-ए-हिंद को केंद्र सरकार के पास जाने को कहा गया है और सरकार 7 दिनों के अंदर यह फैसला लेगी की फिल्म सही है या गलत।”

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका

जमीयत उलेमा-ए-हिंद का इतिहास आतंकियों को इसी तरह से बचाने और पनाह देने का रहा है। 28 जून 2022 को हुए कन्हैयालाल के मर्डर पर बनी उदयपुर फाइल्स फिल्म की भी रिलीज पर इसी संगठन ने आपत्ति जताई है। यह हत्या इस्लामी आतंकियों मुहम्मद रियाज अत्तारी और मुहम्मद गौस ने की थी।

संगठन ने दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र के हाई कोर्ट में याचिकाएँ दायर कर फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की माँग की है। याचिका में कहा गया कि 2022 में कन्हैया लाल की हत्या की कहानी बताने का दावा करने वाली ये फिल्म यह फिल्म असल में कोर्ट की कार्यवाही, एक पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री के दिए बयान और बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के विवादास्पद बयान को लेकर बनी है। इससे सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी और इसके कारण कन्हैया लाल की निर्मम हत्या हुई।

याचिका में कहा गया कि 2022 में कन्हैया लाल की हत्या की कहानी बताने का दावा करने वाली ये फिल्म यह फिल्म असल में कोर्ट की कार्यवाही, एक पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री के दिए बयान और बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के विवादास्पद बयान को लेकर बनी है। इससे सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी और इसके कारण कन्हैया लाल की निर्मम हत्या हुई।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अर्शद मदनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बारे में लिखा। उन्होंने फिल्म निर्माताओं के खिलाफ बयान देते हुए इसे पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा की बात तक कह दी। उन्होंने दावा किया कि फिल्म में पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गई हैं।

मदनी ने यह भी कहा कि अगर फिल्म रिलीज होती है तो देशभर में मुस्लिमों पर हिंसा और कानून-व्यवस्था पर संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म मुस्लिम समुदाय को बदनाम करती है और घृणा फैलाने का काम करेगी। अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि फिल्म में विवादित ज्ञानवापी मस्जिद का उल्लेख भी किया गया है। बता दें कि ये मस्जिद विश्वेश्वर मंदिर पर अवैध रूप से बनाई गई है।

फिल्म पर रोक लगी तो अरशद मदनी ने किया फैसले का स्वागत

10 जुलाई 2025 मदनी ने ट्वीट साझा कर दिल्ली हाई कोर्ट के फिल्म पर रोक लगाने के फैसले का स्वागत किया। अपनी पोस्ट में उन्होंने दावा किया, “फिल्म की स्क्रीनिंग पर रोक ने संविधान की सर्वोच्चता को मजबूत किया है। यह एक स्पष्ट संदेश देता है कि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई भी व्यक्ति संवैधानिक और नैतिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता।”

उन्होंने आगे लिखा, “हाल के वर्षों में कुछ और आपत्तिजनक फिल्में भी बनी हैं, लेकिन वे इतनी घिनौनी नहीं थीं। इस फिल्म में एक हत्या की घटना की आड़ में एक पूरे समुदाय को इस तरह कठघरे में खड़ा किया गया है मानो वे अपराधी हों। इसीलिए हमने इस मामले को अदालत में ले जाने का फ़ैसला किया। हमें खुशी है कि हमारी कोशिशें कामयाब रहीं, और हमें पूरा विश्वास है कि इंशाल्लाह अंतिम फ़ैसला भी हमारे पक्ष में ही होगा।”

मदनी इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने उसके आगे लिखा,”यह फैसला सिर्फ़ फ़िल्म पर रोक नहीं है, बल्कि सांप्रदायिक तत्वों के इरादों और एजेंडे पर एक रोक है।”

क्या है ‘उदयपुर फाइल्स: कन्हैया लाल टेलर मर्डर’ की कहानी

फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स: कन्हैया लाल टेलर मर्डर’ 11 जुलाई 2025 को बड़े पर्दे पर रिलीज होने वाली थी। फिल्म में अभिनेता विजय राज मुख्य भूमिका में नजर आएँगे। इसके अलावा रजनीश दुग्गल, प्रीति झंगियानी, कमलेश सावंत, काँची सिंह और मुश्ताक खान जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं।

इस फिल्म का निर्देशन और लेखन भारत एस. श्रीनेत ने किया है, जबकि फिल्म के निर्माता अमित जानी हैं। वहीं फिल्म का वितरण रिलायंस एंटरटेनमेंट द्वारा किया जा रहा है।

जमीयत उलमा-ए-हिंद और आतंकवादियों का बचाने का उसका इतिहास

जमीयत उलमा-ए-हिंद का आतंकियों को इसी तरह से बचाने और पनाह देने का इतिहास रहा है। इसी के तहत जमीयत उलमा-ए-हिंद (JUH) ने 2007 में अपने नेता अरशद मदनी के नेतृत्व में एक लीगल सेल (कानूनी प्रकोष्ठ) शुरू किया था, इसका मकसद आतंकवाद में गिरफ्तार हुए मुस्लिम लड़कों को कानूनी मदद देना।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अब तक 700 आरोपितों के बचाव किया है। दुखद पहलू ये है कि 2007 से अब तक 192 आरोपियों को बरी कराया जा चुका है।

उन्होंने जिनको बचाया, वह इसलिए छूटे क्योंकि उनके खिलाफ सबूत नहीं थे। जमीयत ने 7/11 का मुंबई ट्रेन विस्फोट2006 मालेगांव विस्फोट मामले में आरोपितों को सहायता दी है। इसी तरह जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 26/11 मुंबई आतंकी हमला मामले, 2011 मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट केसमुलुंड ब्लास्ट केस, गेटवे ऑफ इंडिया ब्लास्ट केस के आरोपितों का भी बचाव किया था।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर उन आरोपित मुस्लिमों के लिए कानूनी लड़ाई को लेकर सूची भी प्रकाशित है जिन पर आतंकवाद से जुड़े मामले चल रहे हैं।

वर्ष 2013 में संगठन ने भारतीय मुजाहिदीन के आतंकवादी मिर्जा हिमायत बेग को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान की थी। हिमायत बेग पर जर्मन बेकरी बम विस्फोट मामले में आरोप लगाए गए थे। इस विस्फोट में कई निर्दोष लोगों की जान गई थी। 18 अप्रैल 2013 को पुणे की एक अदालत ने मिर्जा हिमायत बेग
और उसके सह-आरोपित यासीन भटकल को दोषी ठहराया गया था और को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।

कुछ अन्य मामले जिनमें संगठन ने आरोपितों की मदद की-

  • लश्कर कनेक्शन मामला (अब्दुल रहमान बनाम राज्य विशेष अनुमति याचिका)
  • ISIS षड्यंत्र मामला, कोच्चि (केरल राज्य बनाम अर्शी कुरैशी और अन्य)
  • ISIS षड्यंत्र मामला मुंबई (अर्शी कुरैशी और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य)
  • ISIS षड्यंत्र मामला (राजस्थान राज्य बनाम सिराजुद्दीन)
  • 26/11 मुंबई हमला मामला (सैयद जबीउद्दीन बनाम महाराष्ट्र राज्य)
  • चिन्नास्वामी स्टेडियम बम विस्फोट मामला (राज्य बनाम कातिल सिद्दीकी और अन्य)
  • जंगली महाराज रोड पुणे बम विस्फोट मामला (ATS बनाम असद खान और अन्य)
  • इंडियन मुजाहिदीन मामला (महाराष्ट्र बनाम अफजल उस्मानी और अन्य)
  • जावेरी बाजार सीरियल ब्लास्ट (राज्य बनाम एज़ाज शेख और अन्य)
  • सिमी षड्यंत्र मामला (मध्य प्रदेश राज्य बनाम इरफान मुचाले और अन्य)
  • जामा मस्जिद विस्फोट मामला (दिल्ली राज्य बनाम कातिल सिद्दीकी अन्य)
  • इंडियन मुजाहिदीन षड्यंत्र मामला (राज्य बनाम यासीन भटकल व अन्य)
  • अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामला 2008 (राज्य बनाम जाहिद व अन्य)

आतंकवाद के आरोपितों का समर्थन करने के अलावा जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने लखनऊ में हिंदू नेता कमलेश तिवारी की उनके कार्यालय में बेरहमी से हत्या करने वाले आरोपितों कानूनी और वित्तीय सहायता देने के लिए भी विवादों में आया था।

देवबंद स्थित जमीयत उलेमा-ए-हिंद संगठन ने जून 2021 में उत्तर प्रदेश में कथित अल-कायदा आतंकवादियों के बचाव में अपने वकील लगाए थे। संगठन ने यह घोषणा भी की थी कि वह आतंकवाद के दोनों संदिग्धों को कानूनी सहायता देगा।

इसके बाद फरवरी 2022 में जमीयत ने उन 49 आतंकवादियों की मदद की जिन्हें अहमदाबाद में 21 बम धमाकों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने के आरोप में दोषी ठहराया गया था। इन धमाकों में लगभग 56 निर्दोष लोगों की जान गई थी।

भले ही जमीयत उलेमा-ए-हिंद को यह अधिकार मिला हो कि वह उन दोषियों और आरोपियों की कानूनी रक्षा करे जिन्हें वह झूठे आरोपों में फँसा हुआ मानता हो, लेकिन जब आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ ठोस और पुख्ता सबूत होने के बाद भी संगठन उन मामलों में भी हस्तक्षेप करता है तब ये लोगों को ये बताने की कोशिश कर रहा होता है कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, संगठन उनकी हिमायत में खड़ा रहेगा।

न्यूजलॉन्ड्री चाहता है मोदी सरकार बदले नीति, बढ़ाए पाकिस्तान की ओर दोस्ती का ‘हाथ’: ‘अमन की नई आशा’ जगाने में जुटा प्रोपेगेंडा ग्रुप

भारत जब भी पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठाता है, भारत के वाम-उदारवादी लोग खुद ‘अमन की आशा’ करते हुए तरह- तरह के तर्क देने लगते हैं। ये वर्ग इस बात को भी नजरअंदाज कर देता है कि पाकिस्तानी फौज और सरकार समर्थित इस्मालिक जिहादी मानसिकता भारत को दशकों से लहुलुहान कर रही है। ये लोग भारत के विभाजन और ‘टू नेशन थ्योरी’ को भी नकारने की कोशिश करते हैं, जिसकी वजह से इस्लामिक देश के रूप में पाकिस्तान का जन्म हुआ।

प्रोपेगेंडा वर्ग अब सांस्कृतिक आदान-प्रदान, बॉलीवुड, पाकिस्तानी फिल्में, साझा उपमहाद्वीपीय पहचान जैसे तमाम पहलुओं की बात करने लग जाते हैं ताकि भारत और पाकिस्तान को एक साथ लाया जा सके।

वामपंथी प्रोपेगेंडा वाले न्यूज़लॉन्ड्री ने भी अब ऐसा ही सुझाव दिया है। न्यूजलॉन्ड्री चाहता है कि भारत पाकिस्तान को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव करे। लेखिका अल्पना किशोर ने “भारत की पाक रणनीति को 2025 में सुधार की आवश्यकता ” शीर्षक वाले लेख में इसका जिक्र किया है। इसमें मोदी सरकार के पाकिस्तान के प्रति नजरिए की आलोचना की गई है। इसमें कहा गया है कि भारत ने पाकिस्तान में आ रहे सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव को नकारते हुए सिर्फ सैन्य प्रभुत्व और सरकार पर उसके नियंत्रण पर ध्यान दे रहा है।

न्यूजक्लिक की तस्वीर

लेख के मुताबिक पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को युद्ध की कार्रवाई के रूप में देखना, पहलगाम में जिहादी हमले के बाद सिंधु जल संधि को रद्द करना और बॉलीवुड समेत भारत के तमाम मनोरंजन उद्योग में पाकिस्तानी कलाकारों को मौका नहीं देना गलत है।

न्यूज़लॉन्ड्री के लेख में लिखा है, “एक राज्य के रूप में दुश्मन – इसका मतलब है कि उसके लोग दुश्मन हैं। यह 1980 से एक अलग दुनिया है। आज के युद्धों के लिए ऐसे जवाबों की आवश्यकता है जो 2025 में कारगर हों।”

इसमें आगे कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में हालात में काफी बदलाव आया है। जिया उल हक का जमाना चला गया जब बहुत से लोग जिया के इस्लामिक सोच से इत्तेफाक रखते थे। टू नेशन थ्योरी से लोग सहमत थे और कश्मीर इनके लिए अहम मुद्दा था।

सबसे पहले दो नेशन थ्योरी की बात करते हैं, ये सिद्धांत नस्ल से ज्यादा धर्म से जुड़ा मुद्दा है। सर सैयद अहमद खान की दी हुई द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में मूलतः यह कहा गया था कि मुसलमान हिंदुओं के साथ मिलकर नहीं रह सकता इसलिए उनका एक अलग राष्ट्र होना चाहिए।

सैयद अहमद खान ने 1876 में कहा था, “मुझे अब पूरा यकीन हो गया है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक साथ एक राष्ट्र के रूप में नहीं रह सकते क्योंकि उनका धर्म और जीवन-शैली एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।”

बाद में भी उन्होंने कहा, “दोस्तों, भारत में दो प्रमुख राष्ट्र रहते हैं जो हिंदू और मुसलमान के नाम से जाने जाते हैं… हिंदू या मुसलमान होना आंतरिक आस्था का विषय है जिसका आपसी रिश्तों और बाहरी परिस्थितियों से कोई लेना-देना नहीं है।”

बारह साल बाद उन्होंने कहा, “अब मान लीजिए कि अंग्रेजी समुदाय और सेना अपनी सारी तोपें, शानदार हथियार और बाकी सब कुछ लेकर भारत छोड़ दें, तो फिर भारत का शासक कौन होगा?… क्या यह संभव है कि इन परिस्थितियों में दो राष्ट्र – मुसलमान और हिंदू – एक ही सिंहासन पर बैठें और समान शक्तिवान रहें? कतई नहीं। ये बहुत आवश्यक है कि उनमें से एक दूसरे पर विजय प्राप्त करे। यह आशा करना कि दोनों समान रह सकें, असंभव और अकल्पनीय है। लेकिन जब तक एक राष्ट्र दूसरे पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता और उसे अपने मुताबिक नहीं बना लेता, तब तक देश में शांति स्थापित नहीं हो सकती।”

लेख में आगे पाकिस्तानी अमीरों और नए पीढ़ी को एक तरह का ‘गेमचेंजर’ बताया गया है। अल्पना किशोर जोर देकर कहती हैं कि पाकिस्तानी नई पीढ़ी सोशल मीडिया का इस्तेमाल “अपने पूर्वजों की पसंद और वैचारिक मान्यताओं पर सवाल उठाने, आधिकारिक बयानों का खंडन करने और वैश्विक स्तर पर संवाद करने के लिए कर रहा है। ये लोग जिहादियों की निंदा करने, दूसरों के साथ जुड़ने और आधुनिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में कामयाब रहे हैं।”

यह सच है कि पाकिस्तानी युवाओं का एक बड़ा वर्ग, खासकर जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थक और पीटीआई के नेता पाकिस्तानी सेना के भ्रष्ट तौर-तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन बड़ी आबादी अभी भी टू नेशन थ्योरी को बहुत महत्व देती है। वे अभी भी ये मानते हैं कि मुसलमान हिंदुओं के साथ शांतिपूर्वक मिलजुल कर नहीं रह सकते क्योंकि इस्लामी विश्वास के अनुसार हिन्दू काफिर हैं।

यह भी तर्क दिया जाता है कि विदेशों में साथ-साथ पढ़ाई और काम करने से पाकिस्तानी और भारतीय एक-दूसरे के करीब आए हैं। उनमें दोस्ती और लगाव बढ़ा है। हालाँकि ये कहना गलत नहीं होगा कि विदेशों में प्रवासी संबंधों का पाकिस्तान के रवैये पर असर नहीं पड़ता है। यहाँ तक कि विदेशों में रहने वाले कई पाकिस्तानी ‘शर्मिंदगी’ से बचने के लिए खुद को भारतीय होने का झूठा दावा करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वे खुद को भारतीय मानते हैं या भारत समर्थक हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री का ‘अमन की आशा’ लेख पाकिस्तान में एक साझा उपमहाद्वीपीय पहचान को लेकर ज्यादा पॉजिटिव रुख रखता है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की सैन्य और खुफिया तंत्र के असर को कम करके आँकता है। दरअसल ये दोनों ही भारत विरोधी पाकिस्तान की जड़ में है।

लेख बताता है कि पाकिस्तानी युवाओं का वैश्विक दृष्टिकोण ऐसा है कि ये लोग भारतीय सांस्कृतिक विरासत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। चाहे वह बॉलीवुड, ओटीटी, सोशल मीडिया से हो। न्यूज़लॉन्ड्री आगे लिखता है कि भारत में ‘अंधराष्ट्रवादी’ फ़िल्मों के उभरने के बावजूद ये विरासत पाकिस्तानी नई पीढ़ी को जोड़ रहा है। यहाँ अंधराष्ट्रवाद कहने का मतलब भारत-पाक विषयों पर आधारित फ़िल्मों से है।

लेकिन पूर्व पाकिस्तानी सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ़ भी बॉलीवुड फ़िल्मों और संगीत के बड़े प्रशंसक थे, इससे ये हकीकत तो नहीं बदल जाती कि 1999 के कारगिल युद्ध के लिए वे जिम्मेदार थे। उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके भारतीय समकक्ष अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुए लाहौर समझौते के साथ विश्वासघात किया। वर्षों बाद बॉलीवुड प्रेमी पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुशर्रफ ने कारगिल के विश्वासघात को एक ‘सफल’ अभियान बताया और नवाज शरीफ की कारगिल से पाकिस्तानी सैनिकों की वापसी के आदेश की भी निंदा की।

युवा पाकिस्तानी पीढ़ी फिल्मों, ओटीटी प्लेटफॉर्म या सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीय संस्कृति से जुड़ सकती है, लेकिन यह सांस्कृतिक आत्मीयता भारत के खिलाफ पाकिस्तानी षड़यंत्र को रोक देगा इसकी गारंटी कौन देगा? पाकिस्तान के समर्थन से भारत में हुई बड़ी घटनाओं, चाहे वह मुंबई में हुआ सीरियल ब्लास्ट हो, 26/11 हो, संसद हमला हो या उरी- पहलगाम हमला हो आज तक पाकिस्तान ने आतंकवादियों के शामिल होने की बात स्वीकार नहीं की है।

पहलगाम हमले के दौरान लश्कर-ए-तैयबा की शाखा, द रेजिस्टेंस फ्रंट से जुड़े एक पूर्व पाकिस्तानी सेना अधिकारी सहित दूसरे आतंकवादियों ने निर्दोष पर्यटकों को मारा। लेकिन गैर-मुस्लिम होने की पहचान साबित होने के बाद पर्यटकों को गोली मारी। पीड़ितों से कलमा पढ़ने के लिए कहा गया था और ऐसा न करने पर गोली मार दी गई थी। कई पाकिस्तानी हस्तियों और यहाँ तक कि आम लोगों ने भी हमले की निंदा की। हालाँकि, हमले की निंदा में एक आम बात यह दिखी कि उन्होंने इस्लाम को जिहादी मानसिकता और आतंकवादियों की प्रेरणा से अलग कर दिया। “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता”, “इस्लाम नफरत नहीं सिखाता” और इसी तरह के कई संदेश आए।

जिहादी हमले की निंदा करने से ज़्यादा पाकिस्तानी इस बात पर ध्यान देते हैं कि इसे इस्लामी आतंकवाद न कहा जाए। ये हिन्दुओं के प्रति नफरत नहीं बल्कि आतंकी कार्रवाई है जिसकी जद में हिन्दू-मुस्लिम सभी हैं- ये साबित करने की कोशिश की जाती है।

अगर हमें जिहादी आतंकवाद के खतरे से सही मायने में निपटना है, तो एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि टू नेशन थ्योरी भारत के विभाजन का आधार था। पाकिस्तान का निर्माण हिन्दू घृणा की वजह से हुआ है, न कि विकास या दूसरी वजहों से

मुख्तार अंसारी से भी जुड़ा इस्लामी धर्मांतरण गैंग के सरगना ‘छांगुर पीर’ का कनेक्शन, अवैध कामों में लेता था माफिया की मदद-ATS के सामने अहमद ने उगला राज: FIR में शहाबुद्दीन, रमजान, महबूब, सबरोज के भी नाम

उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध धर्मांतरण रैकेट के साजिशकर्ता जलालुद्दीन उर्फ छांगुर का कनेक्शन माफिया मुख्तार अंसारी गैंग से सामने आया है। इस खुलासे के बाद, अब मुख्तार अंसारी के गैंग की अन्य अवैध संपत्तियों पर भी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।

जलालुद्दीन उर्फ छांगुर और उसकी सहयोगी नीतू उर्फ नसरीन को लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया गया है। न्यायिक हिरासत में भेजने के बाद, गुरुवार (10 जुलाई 2025) को यूपी ATS ने उसे 7 दिनों की रिमांड पर लिया है और पूछताछ जारी है।

माफिया मुख्तार अंसारी से कनेक्शन

धर्मांतरण रैकेट में छांगुर के साथ मोहम्मद अहमद खान का भी नाम सामने आया। पुणे में मोहम्मद अहमद खान ने मीडिया को बताया कि छांगुर गैंग का कनेक्शन माफिया मुख्तार अंसारी से भी था। छांगुर मुख्तार की मदद से धर्मांतरण और अवैध जमीन का काम करता।

अहमद खान छांगुर को महाराष्ट्र में जमीन खरीदवाने की डील में शामिल था। हालाँकि, अहमद खान का कहना है कि उसका छांगुर के गलत कामों से कोई लेना-देना नहीं है।

गिरोह के अन्य सदस्य और पूछताछ

FIR में छांगुर के बेटे महबूब, भतीजा सबरोज, साले का बेटा शहाबुद्दीन, गोंडा के रिश्तेदार रमजान और बलरामपुर के रसीद को भी नामजद किया गया है। इन सभी की संपत्तियों की भी जाँच की जा रही है।

ATS की टीम छांगुर और नीतू से उनकी दुबई यात्राओं और विदेशी फंडिंग में उनकी भूमिका को लेकर गहनता से पूछताछ कर रही है। नीतू के अब्बू दुबई में कबाड़ के बड़े कारोबारी हैं।

विदेशी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग

जाँच में सामने आया है कि छांगुर गिरोह के 40 खातों में खाड़ी देशों और अन्य जगहों से अब तक ₹106 करोड़ भेजे गए हैं।

ED ने भी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत जाँच शुरू कर दी है। ED ने बलरामपुर के एसपी और डीएम से बैंक खातों व अन्य तथ्यों की विस्तृत जानकारी माँगी है।

धर्मांतरण का तरीका

छांगुर पिछले 15 सालों से सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण का रैकेट चला रहा था। छांगुर हिंदू लोगों का ब्रेनवॉश करता था और विरोध करने वालों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करवाकर उन्हें डराता था।

फिर मुकदमा हटवाने के नाम पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाता था। बलरामपुर के उतरौला में उसने एक सिंधी परिवार का धर्मांतरण कराकर उन्हीं के नाम पर एक शानदार कोठी भी बनवाई थी।

वकीलों और प्रापर्टी डीलरों की भूमिका की जाँच

विदेशी फंडिंग का उपयोग धर्मांतरण में कराने के पुख्ता सबूत मिलने के बाद पुलिस ने उन प्रापर्टी डीलरों और वकीलों की भी तलाश शुरू कर दी है, जिन्होंने धर्मांतरण गैंग को सहयोग किया है।

जमीन की खरीद-फरोख्त में कई वकीलों की भूमिका की भी जाँच एजेंसी कर रही है।

100-200 नहीं, 2442 से भी ज्यादा बार… बांग्लादेश में 11 महीने में हिंदुओं पर हुआ अत्याचार: रेप से लेकर हत्या तक की घटनाओं ने बार-बार झकझोरा, लेकिन नहीं टूटी यूनुस सरकार की चुप्पी

बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है। पहले भी खबरें आती रही हैं कि दुर्गा पूजा के समय मंदिरों पर हमला हुआ, घरों में आग लगाई गई और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। लेकिन, अब बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा बहुत तेजी से बढ़ गई है।

बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद नाम के एक संगठन ने गुरुवार (10 जुलाई, 2025) को बताया कि 4 अगस्त 2024 से लेकर पिछले 330 दिनों में कुल 2,442 हिंसक घटनाएँ हुई हैं। यह वो समय था जब बांग्लादेश में बहुत राजनीतिक उथल-पुथल चल रही थी और प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार बदल गई थी।

हिंसा का स्वरूप और आँकड़े

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में परिषद ने बताया कि ज्यादातर हिंसा पिछले साल 4 अगस्त से 20 अगस्त के बीच हुई। इन हमलों में लोगों की हत्याएँ हुईं। सामूहिक बलात्कार सहित कई यौन हमले हुए। पूजा स्थलों पर हमला किया गया। लोगों के घर और व्यापार छीन लिए गए। हिंदू धर्म के अपमान के आरोप में गिरफ्तारियाँ भी हुईं।

अल्पसंख्यकों को संगठनों से जबरदस्ती हटाया गया। इन हमलों के शिकार बनने वाले अल्पसंख्यक समुदायों में पुरुष, महिलाएँ और किशोर सभी शामिल थे।

रिपोर्ट पर युनुस सरकार की चुप्पी

परिषद ने बताया कि 4 अगस्त 2024 से 31 दिसंबर 2024 के बीच 2184 हिंसक घटनाएँ हुईं। वहीं, 2025 के पहले छह महीनों में 258 और घटनाएँ दर्ज की गईं। इसका मतलब है कि 4 अगस्त 2024 से अब तक कुल 2442 हिंसक घटनाएँ हो चुकी हैं।

2025 की घटनाओं में 20 बलात्कार के मामले थे। हिंदू पूजा स्थलों पर 59 बार हमले हुए। जनजातीय समुदायों पर भी 12 बार हमला किया गया।

परिषद का आरोप है कि सरकार ने कुछ नहीं किया। परिषद ने कहा कि सरकार ने इन घटनाओं को ‘झूठ’ कहकर पलड़ा झाड़ा था। इससे हमलावरों को और हिम्मत मिली। अल्पसंख्यक समुदायों में डर का माहौल बढ़ा।

हिंसा के 88 मामलों में अब तक 70 लोगों को पकड़ा गया है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार यानि मोहम्मद यूनुस ने अभी तक परिषद की इस नई रिपोर्ट पर कोई जवाब नहीं दिया है।

बांग्लादेश में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय

2022 की जनगणना के मुताबिक, बांग्लादेश में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं। वे कुल आबादी का 7.95% हैं। उनके बाद बौद्ध (0.61%) और ईसाई (0.30%) आते हैं।

बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद अल्पसंख्यकों का सबसे पुराना संगठन है। यह 1960 के दशक में शुरू हुआ था। तब सांप्रदायिक घटनाएँ बढ़ रही थीं। यह संगठन हमेशा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवाज उठाता रहा है।

ट्रंप ने अब कनाडा पर किया वार, टैरिफ 25% से 35% तक बढ़ाया: पहले ब्राजील को दिया था 50% का झटका, कुल 8 देशों पर गिरी थी गाज

अमेरिका ने कनाडा से आने वाली वस्तुओं पर 35 फीसदी टैरिफ लगाने का एलान किया है। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को खत लिख कर राष्ट्रपति ट्रंप ने नए टैरिफ दरों की जानकारी दी। नया टैरिफ 1 अगस्त 2025 से लागू होगा।

अमेरिका का ये कदम दोनों देशों के रिश्ते को और तनावपूर्ण कर सकता है।

ट्रंप का खत

ट्रंप ने लिखा है, ” मैं आपको खत लिख रहा हूँ ये मेरे लिए सम्मान की बात है। ये हमारे व्यापारिक संबंधों की मजबूती और प्रतिबद्धता को दिखाता है। अमेरिका इस बात पर राजी है कि वह कनाडा के साथ काम करता रहेगा, भले ही कनाडा ने अमेरिका से आर्थिक दुश्मनी निकाली हो। जैसा कि आपको पता है अमेरिका ने फेंटेनाइल संकट से उभरने के लिए 25 फीसदी टैरिफ आप पर लगाया था। लेकिन अमेरिका के साथ सहयोग करने के बजाए कनाडा ने टैरिफ लगाकर जवाब दिया।”

उन्होंने कहा, “अब अमेरिका 1 अगस्त से 35 फीसदी टैरिफ कनाडा पर लगाएगा, जो सेक्टोरल टैरिफ से अलग होगा। ये अमेरिका भेजे जाने वाले उत्पादों पर लागू होगा। अगर इससे बचने के लिए किसी दूसरे देश के माध्यम से उत्पाद अमेरिका में भेजने की कोशिश की गई तो उस पर भी यही नियम लागू होगा। अगर कोई कंपनी अमेरिका में ही उत्पाद बनाती है तो उस पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा।”

वाइट हाउस ने जारी किया खत, फोटो साभार-cnn

अमेरिका से साफ किया है कि अगर कनाडा ने नए टैरिफ दरों पर प्रतिक्रिया दी और अमेरिकी सामानों पर टैरिफ बढ़ाया तो अमेरिका और टैरिफ बढ़ाएगा। अमेरिका के मुताबिक कनाडा जितना फीसदी टैरिफ बढ़ाएगा, अमेरिका उतना फीसदी टैरिफ बढ़ा देगा। ये 35 फीसदी टैरिफ से अलग होगा। कनाडा की डेयरी नीति पर भड़कते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि कनाडा अमेरिका के डेयरी किसानों पर 400 फीसदी टैरिफ लगाता है जिससे इनलोगों को लगातार काफी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

इससे पहले ब्राजील समेत 8 देशों पर अमेरिका का टैरिफ बम फूटा। राष्ट्रपति ट्रंप ने सबसे अधिक 50 फीसदी टैरिफ ब्राजील पर लगाया है। इस पर ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा ने कहा है कि ब्राजील पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया गया तो ब्राजील भी उतना ही यानी 50 फीसदी टैक्स अमेरिका से आने वाले सामानों पर लगाएगा। ब्राजील ने इस मुद्दे को विश्व व्यापार संगठन के सामने भी रखने का फैसला किया है।

भारत के खिलाफ फिलहाल अमेरिका ने नए टैरिफ दरों का ऐलान नहीं किया है। हालाँकि भारत अभी से अमेरिका के तर्ज पर जवाब देने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका ने स्टील पर 25 फीसदी और एल्यूमिनियम पर 10 फीसदी टैक्स लगाया था और इसे मार्च 2025 में लागू भी कर दिया। भारत इसका लगातार विरोध कर रहा है।

9 जुलाई को भारत ने विश्व व्यापार संगठन में जवाबी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया है। दरअसल अमेरिका ने स्टील और एल्यूमिनियम जैसे कुछ उत्पादों पर नया टैक्स लगा दिया है। ये कदम ऐसे समय उठाया गया है जब भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ दरों को लेकर बातचीत चल रही है।

आबादी 100 की लेकिन आधार कार्ड 120+… बिहार के किशनगंज से कटिहार में चल रहा घुसपैठियों का खेल, 1 लाख से अधिक फर्जी पहचान पत्र बरामद: जानें बंगाल से सटे इलाकों में कैसे बढ़ रही मुस्लिम जनसंख्या

बिहार में होने वालों चुनावों से पूर्व हाल ही में जारी किए गए आधार कार्ड सैचुरेशन के आँकड़ों ने एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ राज्य का औसत आधार सैचुरेशन 94% है, वहीं किशनगंज (126%), कटिहार (123%), अररिया (123%), और पूर्णिया (121%) जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में यह आँकड़ा 100% से भी ज्यादा है।

यानी हर 100 लोगों पर 120 से ज्यादा आधार कार्ड। ये आँकड़े डुप्लीकेट आधार कार्ड या गैर-नागरिकों को आधार जारी किए जाने के सवाल खड़े करते हैं। खासकर पश्चिम बंगाल और नेपाल की सीमा से सटे सीमांचल क्षेत्र में जहाँ अवैध घुसपैठ सबसे ज्यादा होते है।

वहीं, किशनगंज जिले के जियापोखर से मुस्लिम व्यक्ति अशराफुल को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि वो बांग्लादेशी और नेपाली घुसपैठियों के लिए फर्जी आधार कार्ड बनाता था।

आधार सैचुरेशन और जनसंख्या

बिहार के सीमांचल क्षेत्र में किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जैसे जिले आते हैं। इन जिलों में मुस्लिम आबादी 38% से 68% तक है। यहाँ आधार कार्ड की संख्या आबादी से ज्यादा है।

आमतौर पर, एक व्यक्ति का एक ही आधार कार्ड होता है। लेकिन यहाँ के आँकड़े बताते हैं कि या तो नकली आधार कार्ड बने हैं या फिर ऐसे लोगों को भी आधार कार्ड मिले हैं जो भारत के नागरिक नहीं हैं।

संवेदनशील सीमांचल क्षेत्र

सीमांचल क्षेत्र पश्चिम बंगाल और नेपाल से सटा हुआ है। बांग्लादेश भी यहाँ से दूर नहीं है। इस इलाके में लंबे समय से अवैध घुसपैठियों के रहने की बात कही जाती रही है। कुछ लोग मानते हैं कि ज्यादा आधार कार्ड बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए बनाए गए हैं।

उनका दावा है कि स्थानीय नेताओं और कट्टरपंथी समूहों ने इसमें मदद की है। हालाँकि, इन दावों के लिए अभी पुख्ता सबूत नहीं हैं। फिर भी, यह एक चिंता का विषय है।

चुनाव और आधार कार्ड

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की जाँच चल रही है। विपक्षी दल सवाल उठा रहा है कि वोटर लिस्ट में नाम के लिए आधार कार्ड और आवासीय प्रमाण पत्र को क्यों नहीं माना जा रहा है।

लेकिन सच्चाई यह भी है कि सीमांचल के चार जिलों में आधार कार्ड की संख्या आबादी से ज्यादा है। यहाँ तक कि नागरिकता का सबूत न होने के बावजूद आधार कार्ड के आधार पर निवास प्रमाण पत्र भी जारी किए गए हैं।

जानकारी के अनुसार, किशनगंज में आधार कार्ड की संख्या आबादी का 105.16%, अररिया में 102.23%, कटिहार में 101.92% और पूर्णिया में 101% है।

जनसांख्यिकी में बदलाव

पिछले दो दशकों में, इस क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ी है। इससे यहाँ की आबादी में तेजी से बदलाव आया है। 1951 से 2011 तक, इन जिलों में मुस्लिम आबादी में 16% की बढ़ोतरी हुई।

हाल ही में हुई जातिगत जनगणना से पता चला है कि किशनगंज में मुस्लिम आबादी 68%, अररिया में 50%, कटिहार में 45% और पूर्णिया में 39% हो गई है।

कुल मिलाकर, इन चार जिलों में मुस्लिम आबादी 47% हो गई है। केंद्र सरकार सीमांचल में हो रहे इन बदलावों को लेकर चिंतित है। चुनाव आयोग की मतदाता सूची की विशेष जाँच भी इसी वजह से की जा रही है।

मतदाता सूची की जाँच का सबसे ज्यादा विरोध राज्य के मुस्लिम इलाकों में हो रहा है। मुस्लिम समुदाय लंबे समय से विपक्षी महागठबंधन का समर्थन करता रहा है। महागठबंधन इस विरोध के बहाने इस समुदाय को एकजुट करना चाहता है।

आने वाले चुनाव

बिहार में अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में विपक्ष सवाल उठा रहा है कि केवल तीन से चार महीनों में यह जाँच अभियान कैसे पूरा किया जा सकता है।