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ग्लास फेंका, मोबाइल मारा और BJP की महिला नेता से की बद्तमीजी: गुजरात में AAP विधायक चैतर वसावा गिरफ्तार

गुजरात के डेडियापाड़ा में आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक चैतर वसावा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। शनिवार (5 जुलाई 2025) को एक सरकारी बैठक में AAP विधायक की बीजेपी नेता संजय वसावा से बहस हुई, जो मारपीट में बदल गई।

जानकारी के मुताबिक, भाजपा नेता ने चैतर वसावा पर मारपीट और एक महिला पंचायत अध्यक्ष के साथ अभद्र व्यवहार की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई।

बैठक में विवाद की जड़

यह घटना डेडियापाड़ा तालुका पंचायत कार्यालय में हुई। यहाँ एक समन्वय बैठक चल रही थी, जिसमें कई अधिकारी और जनप्रतिनिधि मौजूद थे। चैतर वसावा ने एक विकास समिति में कुछ लोगों के शामिल होने पर आपत्ति उठाई।

AAP विधायक ने कहा कि विधायक से बिना पूछे समिति बनाई गई थी और इसे तुरंत रद्द किया जाना चाहिए। वसावा का तर्क था कि समिति में किसी व्यापारी को शामिल नहीं करना चाहिए।

मुझ पर पानी का गिलास फेंका- BJP नेता

यह समिति कथित तौर पर बीजेपी नेता संजय वसावा के निर्देश पर बनी थी। इसी बात पर चैतर वसावा और संजय वसावा के बीच कहासुनी इतनी बढ़ गई कि हाथापाई शुरू हो गई। मौजूद अधिकारियों ने बीच-बचाव कर मामला शांत करवाया और पुलिस को बुलाया गया।

संजय वसावा ने चैतर वसावा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। संजय वसावा ने बताया कि AAP विधायक ने महिला नेता चंपाबेन वसावा के साथ बदतमीजी की, जिसका मैंने विरोध किया था। लेकिन विधायक ने गुस्से में उन पर मोबाइल और पानी का गिलास फेंक दिया।

संजय वसावा ने कहा कि बैठक में विधायक और चंपाबेन वसावा के बहस हो गई थी। इस पर चैतर वसावा को भाषा पर संयम रखने के लिए कहा गया था। लेकिन चैतर वसावा ने गुस्से में आकर हमला कर दिया।

गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई

घटना के बाद चैतर वसावा अपने समर्थकों के साथ थाने पहुँचे, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी की खबर फैलते ही थाने के बाहर समर्थकों की भीड़ जमा हो गई।

स्थिति को देखते हुए पुलिस ने सुरक्षा बढ़ा दी और विधायक को राजपीपला ले गई। वहाँ भी उनके समर्थक इकट्ठा हो गए, जिन्हें पुलिस को हटाना पड़ा।

पुलिस ने चैतर वसावा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में मामला दर्ज किया है। इनमें हत्या की कोशिश, महिला का अपमान, जानबूझकर चोट पहुँचाना, हथियार से चोट पहुँचाना, आपराधिक धमकी और शांति भंग करने की नीयत से अपमान जैसी गंभीर धाराएँ शामिल हैं।

कहीं चले लाठी-डंडे तो कहीं गाड़ियों में तोड़फोड़… BJP नेता को भी मारा: मुहर्रम में जुलूस के नाम पर कुंभलगढ़ से लेकर कोलकाता तक हिंसा

देशभर में मुहर्रम के जुलूस निकाले जा रहे हैं। इन जुलूसों को लेकर अब विवाद सामने आ रहे हैं। कई जगहों पर मारपीट की घटनाएँ हुई हैं। कुछ जगहों पर मनमानी अनुमति माँगने और गाली-गलौच की शिकायतें मिली हैं। इसे देखते हुए स्थानीय प्रशासन अलर्ट पर है और भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया है।

राजस्थान के राजसमंद जिले में कुंभलगढ़ किले में मुहर्रम के जुलूस की अनुमति को लेकर पाँच दिनों से विवाद चल रहा है। मुस्लिम संगठन मुहर्रम का जुलूस निकालने पर अड़े हैं, वहीं हिंदू संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।

हिंदू संगठनों का कहना है कि अगर हनुमान जयंती और महाराणा प्रताप जयंती पर किले में जाने की अनुमति नहीं मिलती तो मुहर्रम पर भी ताजियों को अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।

05 जुलाई 2025 को हिंदू संगठनों और व्यापारियों ने बाजार बंद कर विरोध प्रदर्शन किया। मौके पर भारी सुरक्षा बल तैनात है।

यूपी के रायबरेली में हिंसा

यूपी के रायबरेली के कुढ़ा गाँव में शुक्रवार (04 जुलाई 2025) रात बिना अनुमति से निकाले गए मुहर्रम के जुलूस के दौरान जमकर विवाद हुआ था। घरों के बाहर से जुलूस निकाला जा रहा था। इसमें शामिल लोगों ने आपत्तिजनक नारेबाजी भी की। लोगों ने विरोध किया तो मुस्लिम लोग उग्र हो गए और हिंसा शुरू कर दी।

उन्होंने लाठी-डंडों और हथियारों से हमला किया। उपद्रवियों ने 4 बाइक, एक ऑटो और एक ट्रैक्टर तोड़ डाले। पुलिस ने पूरे फाजिल गाँव निवासी साजिद अली, सोनू, फूलबाबू, अट्टू, अमरोज, शब्बीर समेत 150 लोगों के खिलाफ मारपीट, तोड़फोड़ करने समेत अन्य धाराओं में केस दर्ज किया है।

कुंडा में राजा भैया के पिता नजरबंद

मुहर्रम से पहले शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए यूपी के कुंडा में पूर्व कैबिनेट मंत्री राजा भैया के पिता राजा उदय प्रताप सिंह समते 13 लोगों को नजरबंद किया गया।

उन्हें शनिवार (05 जुलाई 2025) सुबह 5 बजे से लेकर रविवार (06 जुलाई 2025) रात 9 बजे तक हाउस अरेस्ट किया गया है। कुंडा प्रशासन साल 2016 से यह कार्रवाई कर रहा है।

रेलवे स्टेशनों पर सुरक्षा जाँच

मुहर्रम के मद्देनजर RPF, GRP और LIU की टीमों ने रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की जाँच की। आनंदनगर रेलवे स्टेशन पर डेमू ट्रेन नंबर 75117 में यात्रियों के सामान और संदिग्ध वस्तुओं की तलाशी ली गई।

सुरक्षाबलों ने संदिग्ध लोगों से पूछताछ भी की और यात्रियों से किसी भी संदिग्ध वस्तु की सूचना तुरंत देने की अपील की है।

महाराजगंज में बीजेपी नेता से मारपीट

यूपी के महाराजगंज में मुहर्रम के जुलूस के दौरान बीजेपी नेता शिवभूषण चौबे से मारपीट की गई। घर लौटते समय जुलूस की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और गाली-गलौज कर हाथापाई की।

सूचना पर पहुँची पुलिस ने बीजेपी नेता को सुरक्षित निकाला और तीन लोगों को हिरासत में लिया है।

फिलीस्तीन की टीशर्ट पहने दिखे इस्लामी कट्टरपंथी

इसके अलावा पहले श्रीनगर से मामला सामने आया था कि मोहर्रम जुलूस के नाम पर फिलीस्तीन के झंडे लेकर घूमते लोग देखे गए हैं लेकिन अब खबर है कि देवरिया में भी जुलूस के नाम पर एक कट्टरपंथी जुलूस में फिलीस्तीन की टीशर्ट पहने नजर आया, जिसके बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया है।

आजमगढ़ में जुलूस में आपस में भिड़े मुस्लिम

आजमगढ़ के भुजी गाँव में मुहर्रम जुलूस के दौरान मुस्लिम युवक आपस में भिड़ गए। एक तरफ शहाबुद्दीन और दूसरी तरफ साहिल, समीर उर्फ सद्दाम, महबूब, साजिद, सोनू उर्फ शेर अली, अफजल और अज्ञात लोगों के बीच लाठी-डंडे चले और धारदार हथियारों से वार किया गया। इसमें 7 लोग घायल हुए हैं।

पुलिस का कहना है कि एक दूसरे के खिलाफ नारेबाजी के बाद विवाद शुरू हुआ। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर विवाद शांत कराया। शहाबुद्दीन की शिकायत के बाद मामले में दोनों पक्षों के 6 लोगों को हिंसा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

कोलकाता में सियालदह रेलवे स्टेशन पर खूनी संघर्ष

कोलकाता के सियालदह रेलवे स्टेशन पर कई मुस्लिम युवक तलवारों से लैस होकर लोकल ट्रेन में चढ़ गए। उन्होंने हथियार लहराते हुए एक व्यक्ति को गंभीर रूप से घायल कर दिया। घटना के वीडियो में व्यक्ति को खून से लथपथ देखा जा सकता है। वहीं, रेलवे स्टेशन पर भी जगह-जगह खून पड़ा दिखा।

यह घटना मुहर्रम से पहले हुई, जिसमें शिया मुसलमान कर्बला की लड़ाई की याद में तलवारें और अन्य घातक हथियार लहराते हैं।

यह पहली बार नहीं है जब ऐसी स्थिति देखी गई हो। मुहर्रम में हर साल खून-खराबा और पथराव की खबरें सामने आती हैं। हिंदू त्योहार को भी मुस्लिमों की उग्र भीड़ निशाना बनाती है।

तिरंगा लहराए, मोदी-मोदी चिल्लाए, लगाते रहे ‘भारत माता की जय’ के नारे: प्रधानमंत्री के ब्राजील पहुँचते ही खुशी से झूमे भारतीय प्रवासी, ऑपरेशन सिंदूर को याद करके दिया सम्मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश यात्रा के चौथे चरण में रविवार (6 जुलाई 2025) को ब्राजील पहुँच गए हैं। गैलेओ इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पीएम मोदी का राष्ट्रीय सम्मान के साथ स्वागत हुआ।

रियो डी जनेरियो में भारतीयों प्रवासी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की थीम पर नृत्य किय। ये थीम भारत के आतंकवाद-रोधी प्रयासों को दर्शाता है। इस दौरान कलाकारों ने ‘ये देश नहीं मिटने दूँगा’ गाने पर शानदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शन देखकर प्रधानमंत्री मोदी भावुक हो गए।

प्रधानमंत्री मोदी के होटल पहुँचते ही माहौल बदल गया। वहाँ सैकड़ों भारतीय समुदाय के लोग थे। उन्होंने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। सबने तिरंगे लहराए और पीएम का जोरदार स्वागत किया।

BRICS सम्मेलन में भागीदारी

पीएम मोदी 17वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए ब्राजील गए हैं। यह सम्मेलन राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा के निमंत्रण पर हो रहा है। BRICS में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई भी शामिल हो गए हैं।

प्रधानमंत्री 6 और 7 जुलाई 2025 को इस सम्मेलन में भाग लेंगे। उम्मीद जताई जा रही है कि वह इन देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत भी करेंगे। पीएम मोदी शांति, सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और फाइनेंस जैसे बड़े मुद्दे उठा सकते हैं।

ब्रासीलिया और नामीबिया का दौरा

ब्राजील में चार दिन रुकने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ब्रासीलिया की राजकीय यात्रा पर जाएँगे। यह छह दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली ब्रासीलिया यात्रा होगी। अपनी यात्रा के आखिरी चरण में पीएम मोदी 9 जुलाई 2025 को नामीबिया जाएँगे।

वहाँ पीएम मोदी नामीबिया की संसद को भी संबोधित करेंगे। इससे पहले, पीएम मोदी घाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो और अर्जेंटीना का दौरा कर चुके हैं।

कोलकाता लॉ कॉलेज की छात्रा को नोचने के बाद मोनोजीत ने जमकर पी थी शराब, ढाबे पर दोस्तों संग खाना भी खाया: अगले दिन खबरें देख उड़े होश, जान बचाने पूरा शहर घूमा

कोलकाता लॉ कॉलेज गैंगरेप मामले में मुख्य आरोपित मोनोजित मिश्रा ने वारदात के बाद अपने साथियों के साथ घंटों शराब पी थी। जब यह खबर फैलने लगी तो वह डर गया और मदद माँगने भटकता रहा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गैंगरेप के बाद मोनोजित मिश्रा, जैब अहमद और प्रमित मुखर्जी ने गार्ड रूम में खूब शराब पी। फिर उन्होंने ढाबे पर खाना खाया और अपने-अपने घर चले गए। अगले दिन गैंगरेप की खबर सामने आने पर मोनोजित घबरा गया।

मोनोजित ने कई प्रभावशाली लोगों से मदद माँगी, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। सबने उसे सरेंडर करने की सलाह दी।

दर-दर भटका मोनोजित

मोनोजित ने शहर के अलग-अलग इलाकों में घूमकर मदद की भीख माँगी। मोनोजित देशप्रिय पार्क, रासबिहारी एवेन्यू, गरियाहाट और बल्लीगंज स्टेशन रोड भी गया। पुलिस ने उसके मोबाइल की लोकेशन से यह जानकारी निकाली।

कॉलेज के सिक्योरिटी गार्ड पिनाकी बनर्जी को भी गिरफ्तार किया गया है। गार्ड ने बताया कि मोनोजित ने उससे कमरे में पानी और साफ चादर रखने को कहा था। मोनोजित ने उसे धमकी भी दी गई थी कि मेन गेट बंद करके चाबियाँ दे दे और कहीं और ड्यूटी करे।

गार्ड ने बताया कि गार्ड रूम में अक्सर शराब पार्टियाँ होती थीं, इसलिए उसे शक नहीं हुआ कि इतनी बड़ी घटना होगी।

क्राइम सीन रीक्रिएट

पुलिस ने शुक्रवार (04 जुलाई 2025) को घटनास्थल पर जाकर क्राइम सीन को रीक्रिएट किया। इस दौरान सभी आरोपित और पीड़िता मौजूद थे। पूरे घटनाक्रम की वीडियोग्राफी और 3डी मैपिंग की गई।

क्या था मामला?

25 जून 2025 को कोलकाता लॉ कॉलेज में एक छात्रा से गैंगरेप हुआ था। आरोपितों ने तीन घंटे तक रेप किया और उसका वीडियो भी बनाया। पुलिस ने मोनोजित मिश्रा, जैब अहमद, प्रमित मुखर्जी और सिक्योरिटी गार्ड पिनाकी बनर्जी को गिरफ्तार किया है।

CCTV फुटेज में छात्रा को घसीटते हुए दिखाया गया है। पीड़िता के मेडिकल टेस्ट में भी रेप की पुष्टि हुई है। पुलिस को आरोपितों से घटना का वीडियो भी मिल गया है।

ब्राह्मण-क्षत्रिय लड़कियों को फँसाने पर मिलेंगे ₹15-16 लाख, दलित बच्चियों का रेट ₹10-12 लाख: UP-ATS ने धर्मांतरण रैकेट चलाने वाले ‘छांगुर पीर’ को किया गिरफ्तार, विदेश से पा चुका ₹100 करोड़ तक की फंडिग

उत्तर प्रदेश में एक बड़े अवैध धर्मांतरण नेटवर्क का खुलासा हुआ है। यूपी ATS ने इस मामले में जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर को बलरामपुर के उटरौला कस्बे से गिरफ्तार किया है। जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर पर हिंदू लड़कियों को बहला-फुसलाकर जबरन धर्मांतरण कराने का आरोप है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले में नीतू रोहरा उर्फ नसरीन को भी गिरफ्तार किया गया है। यह गिरोह बलरामपुर के उटरौला में लंबे समय से सक्रिय था। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, इस नेटवर्क को विदेशों से ₹100+ करोड़ की फंडिंग मिली है।

छांगुर पीर और उसका नेटवर्क

जलालुद्दीन खुद को हाजी पीर जलालुद्दीन बताता था। वह अपने एजेंटों के जरिए हिंदू लड़कियों को धर्मांतरण के लिए उकसाता था। जानकारी के अनुसार, इस काम के लिए लड़कियों की जाति के हिसाब से फीस तय थी।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, सरदार लड़कियों के लिए 15-16 लाख रुपए, पिछड़ी जाति की लड़कियों के लिए 10-12 लाख रुपए और अन्य जातियों के लिए 8-10 लाख रुपए मिलते थे।

विदेशी फंडिंग और संपत्तियाँ

ADGP (लॉ एंड ऑर्डर) ने बताया कि छांगुर पीर ने 40 से 50 बार इस्लामिक देशों की यात्रा की है। जाँच में पता चला है कि बलरामपुर में उसने कई संपत्तियाँ खरीदी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फंडिंग से जलालुद्दीन पीर ने लग्जरी गाड़ियाँ, बंगले और शोरूम की खरीदारी की है।

गिरोह के पास 40+ बैंक खाते हैं। इनमें ₹100 करोड़ से अधिक का लेन-देन हुआ है। यह पैसा कथित तौर पर धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। खासकर खाड़ी देशों से फंडिंग आने की बात सामने आई है।

ब्रेनवॉश कर करवाया इस्लाम कबूल

जलालुद्दीन पीर का नेटवर्क गरीब और असहाय लोगों को निशाना बनाता था। उन्हें पैसों और विदेश में नौकरी का लालच दिया जाता था। अगर कोई बात नहीं मानता तो उसे मुकदमे में फँसाने की धमकी दी जाती थी।

इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने और ब्रेनवॉश करने के लिए जलालुद्दीन पीर ने ‘शिजर-ए-तैय्यबा‘ नाम से किताब भी छपवाई थी। वह खुद को पीर या हजरत पीर नाम से बुलवाना पसंद करता था।

मुंबई के एक सिंधी परिवार का ब्रेनवाश कर इस्लाम कबूल करवाया गया था। परिवार में नवीन घनश्याम रोहरा, उनकी पत्नी नीतू और बेटी का नाम बदलकर जलालुद्दीन, नसरीन और सबीहा रख दिए गया था।

लखनऊ की एक गुंजा गुप्ता हिंदू लड़की को एक मुस्लिम लड़के ने ‘अमित’ बनकर प्रेमजाल में फँसाया। फिर छांगुर पीर की दरगाह ले जाकर उसका ब्रेनवॉश किया और उसे अलीना अंसारी बना दिया गया था।

नेटवर्क के दो लोग गिरफ्तार

फिलहाल दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। ATS का कहना है कि यह नेटवर्क पूरे भारत में फैला हुआ है। पुलिस इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द से जोड़कर देख रही है।

जाँच एजेंसियाँ इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी हैं। ADGP ने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में और भी गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

कट्टरपंथी मुस्लिम छात्रों ने रोका हिंदू प्रोफेसर का प्रमोशन, VC ऑफिस में प्रदर्शन कर दिखाई ताकत: विरोध में उतरे सनातनी, बांग्लादेश के चटगाँव यूनिवर्सिटी का मामला

बांग्लादेश में कई सरकारी अधिकारियों को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने के बाद अब यूनिवर्सिटीज में ये आग पहुँच गई है। यहाँ एक प्रोफेसर का न सिर्फ प्रमोशन रोका गया, बल्कि उनपर इस्तीफे का भी दबाव डाला। दरअसल, चटगाँव यूनिवर्सिटी में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को संस्कृत के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कुशल बरन चक्रवर्ती के साथ कुछ मुस्लिम छात्रों ने अभद्रता की। डॉ. चक्रवर्ती को एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर प्रमोशन के लिए इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था।

लेकिन उसी दौरान, यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर ऑफिस के बाहर कट्टरपंथी संगठन ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ से जुड़े मुस्लिम छात्रों ने हंगामा शुरू कर दिया। इस हंगामे की वजह से इंटरव्यू प्रक्रिया रुक गई और प्रोफेसर का प्रमोशन भी रोक दिया गया।

मुस्लिम छात्रों ने न सिर्फ डॉ. कुशल बरन चक्रवर्ती का प्रमोशन रोकने की माँग की, बल्कि उन्हें यूनिवर्सिटी से निकालने की भी माँग उठाई। दबाव बनाने के लिए छात्रों ने यूनिवर्सिटी की बिल्डिंग को घेर कर ताला लगा दिया।

यही नहीं, इस्लामी छात्र शिबिर का नेता हबीबुल्लाह खालिद वाइस-चांसलर के ऑफिस के अंदर पहुँच गया और डॉ. चक्रवर्ती के साथ ऊँची आवाज में बदसलूकी करने लगा। डॉ. चक्रवर्ती ‘सनातनी जागरण जोट’ और ‘सनातन विद्यार्थी संसद’ से जुड़े हुए हैं और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ खुलकर बोलते हैं।

इसी वजह से उन्हें बदनाम करने की कोशिश हो रही है। उन पर झूठे आरोप लगाए गए कि वे हत्या से जुड़े हैं और सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं। यह घटना न सिर्फ एक प्रोफेसर के साथ अन्याय है, बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों की आवाज दबाने की कोशिशें लगातार जारी हैं।

मुस्लिम छात्रों ने हिंदू प्रोफेसर की पदोन्नति रद्द करवाने में सफलता पाई

मीडिया से बात करते हुए डॉ कुशल बरन चक्रवर्ती ने कहा, “छात्रों द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह से झूठे और बेबुनियाद हैं। मेरा किसी भी आपराधिक मामले से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा लगता है कि कोई छात्रों को उकसा रहा है।” करीब 3 घंटे तक डॉ चक्रवर्ती को वाइस-चांसलर के ऑफिस में रोका गया और परेशान किया गया।

बाद में शाम को उन्हें यूनिवर्सिटी की गाड़ी से उनके घर पहुँचाया गया। छात्रों के दबाव के चलते यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रमोशन बोर्ड को रद्द कर दिया। डॉ चक्रवर्ती ने बताया कि एसोसिएट वाइस-चांसलर मोहम्मद कमाल उद्दीन ने उन्हें धमकी भी दी।

यूनिवर्सिटी के कार्यवाहक रजिस्ट्रार मोहम्मद सैफुल इस्लाम ने भी छात्रों की हरकत को सही ठहराया और इसे प्रोफेसर के ‘बीते कामों का नतीजा’ बताया। प्रशासन के एक और सदस्य डॉ शमीम उद्दीन ने कहा, “जब छात्रों ने आरोप लगाए कि वह हत्या की कोशिश के केस में नामजद हैं, तब हमने प्रमोशन बोर्ड की बैठक रद्द करने का फैसला लिया।” यह घटनाक्रम दर्शाता है कि कैसे एक शांतिप्रिय प्रोफेसर को धार्मिक आधार पर निशाना बनाकर उनके करियर को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की गई।

हिंदुओं ने किया विरोध प्रदर्शन

ढाका यूनिवर्सिटी में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को ‘सनातनी जागरण जोट’ से जुड़े हिंदुओं ने डॉ कुशल बरन चक्रवर्ती के साथ हुए अन्याय के खिलाफ प्रदर्शन किया। उन्होंने प्रोफेसर की सुरक्षा की माँग भी की।

हिंदुओं ने विरोध प्रदर्शन किया, छवि प्रोथोम एलो के माध्यम से

कार्यकर्ता सुमन कुमार रॉय ने कहा, “आज देश में तानाशाही का माहौल है। यहाँ कानून का राज नहीं बचा है। ऐसा लगता है जैसे देश में लोकतांत्रिक सरकार ही नहीं रही।” 5 अगस्त 2024 को जब हिंसक छात्र आंदोलनों के जरिए शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाया गया, तब से कई हिंदू शिक्षकों को जबरन इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदू प्रोफेसरों को घेरकर डराया-धमकाया जाता है और अगर वे इस्तीफा नहीं देते, तो उन्हें हिंसा की धमकी दी जाती है। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद कट्टर इस्लामी ताकतों को बढ़ावा मिला।

उन्होंने सबसे पहले प्रतिबंधित संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ से बैन हटा दिया और ‘अंसरुल्लाह बांग्ला टीम’ के नेता मोहम्मद जसीमुद्दीन रहमानी को रिहा कर दिया। साथ ही, उन्होंने हिंदुओं पर हो रहे हमलों को नज़रअंदाज़ करते हुए यह तक कह दिया कि इन घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है। यह स्थिति बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की बढ़ती असुरक्षा और प्रशासनिक अनदेखी की गम्भीर तस्वीर पेश करती है।

‘भारत माता’ कैसे हो सकती हैं धार्मिक प्रतीक? : फोटो देख यूनिवर्सिटी प्रोग्राम को कैंसिल करने वाले रजिस्ट्रार से केरल HC ने पूछा सवाल, निलंबित होने पर आदेश के खिलाफ पहुँचा था कोर्ट

केरल में भारत माता की तस्वीर को धार्मिक प्रतीक बताकर यूनिवर्सिटी का कार्यक्रम कैंसिल करने वाले निलंबित रजिस्ट्रार से हाईकोर्ट ने सवाल किया है। कोर्ट ने 4 जुलाई 2025 को उनसे पूछा ‘भारत माता’ को धार्मिक प्रतीक कैसे माना जा सकता है। कोर्ट ने केरल विश्वविद्यालय के निलंबित रजिस्ट्रार केएस अनिल कुमार से पूछा कि फोटो लगाना कानून-व्यवस्था की समस्या कैसे हो सकती है।

केरल हाईकोर्ट के जस्टिस एन नागरेश ने यह सवाल रजिस्ट्रार की ओर से दायर उस याचिका की सुनवाई के दौरान उठाया, जिसमें उन्होंने अपने निलंबित किए जाने की प्रक्रिया को चुनौती दी है। दरअसल, अनिल कुमार को बुधवार (2 जुलाई 2025) को केरल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मोहनन कुन्नुम्मल ने निलंबित कर दिया था।

रजिस्ट्रार अनिल कुमार पर आरोप है कि उन्होंने एक निजी कार्यक्रम को रद्द करने का नोटिस जारी किया था, जिसमें केरल के राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर भी उपस्थित थे। इस कार्यक्रम का आयोजन यूनिवर्सिटी के सीनेट हॉल में किया गया था। कार्यक्रम में ‘भारत माता’ की एक फोटो लगी थी, जिसमें उनके हाथ में भगवा रंग का ध्वज भी था।

निलंबित रजिस्ट्रार ने कोर्ट को बताया कि फोटो को लेकर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और भाजपा की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के बीच विवाद हुआ था। एक सुरक्षा अधिकारी ने उन्हें इसकी सूचना दी थी कि कार्यक्रम में धार्मिक प्रतीक लगाया गया है, जिसे लेकर विवाद हो रहा है। उनका कहना है कि अधिकारियों ने ऐसी स्थिती में कार्यक्रम को रद्द करने की भी सलाह दी थी।

उन्होंने आगे कोर्ट से कहा कि कुलपति ने उन्हें निलंबित कर दिया जबकि कुलपति केवल आपातकालीन स्थितियों में ही रजिस्ट्रार को निलंबित कर सकते हैं। मामले में कोर्ट ने अनिल कुमार की अंतरिम याचिका को खारिज करते हुए पूछा है कि भारत माता धार्मिक प्रतीक कैसे हो सकती हैं? यह उत्तेजक तस्वीर कौन सी थी? और इसे लगाने से केरल में कानून-व्यवस्था की कौन-सी समस्या पैदा हो सकती थी?

कोर्ट का कहना है कि कुलपति उस स्थिति में आदेश जारी कर सकते हैं, जब यूनिवर्सिटी सिंडिकेट का सत्र न चल रहा हो। कोर्ट के फैसले के अनुसार निलंबन के फैसले को सीनेट से स्वीकृति मिलनी चाहिए। कोर्ट ने सवाल किया है कि जब राज्यपाल जैसे विशिष्ट अतिथि को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया हो, तो क्या उस कार्यक्रम को इस तरह से रद्द करना उचित है?

कोर्ट की तरफ से रजिस्ट्रार से विस्तार से जवाब दाखिल करने को कहा है। केरल हाई कोर्ट के अनुसार वास्तविक समस्या क्या है, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है। मामले की अगली सुनवाई को 7 जुलाई को होनी है।

PM मोदी के पहुँचते ही अर्जेंटीना में गूँजा ‘जय श्रीराम’: जानें व्यापारिक साझेदारी के लिहाज से क्यों है प्रधानमंत्री का ये दौरा खास, ऊर्जा क्षेत्र को पहुँचाएगा लाभ

पाँच देशों की यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने तीसरे चरण में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम में अर्जेंटीना पहुँचे। इससे पहले उन्होंने त्रिनिडाड और टोबैगो का दौरा किया, जहाँ दोनों देशों के बीच छह समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

यहाँ पीएम मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘द ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिडाड एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया। पीएम मोदी यह सम्मान पाने वाले पहले विदेशी नेता बने। उनकी इस यात्रा की शुरुआत घाना से शुरु हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स पहुँचे, जहाँ ईजाइजा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उन्हें औपचारिक स्वागत मिला। यह उनकी दूसरी अर्जेंटीना यात्रा है। पहली बार वह 2018 में G20 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए गए थे। पिछले 57 वर्षों में यह पहली द्विपक्षीय यात्रा है जिसमें कोई भारतीय प्रधानमंत्री अर्जेंटीना पहुँचा है। पीएम मोदी के होटल पहुँचने पर भारतीय समुदाय के लोगों ने ‘जय श्री राम’ के नारे से उनका भव्य स्वागत किया।

विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अर्जेंटीना यात्रा के दौरान राष्ट्रपति जेवियर मिलेई से मुलाकात करेंगे। इस दौरान दोनों नेता रक्षा, कृषि, खनन, तेल और गैस, नवीकरणीय ऊर्जा, व्यापार और निवेश जैसे कई अहम मुद्दों पर बातचीत करेंगे, जिससे दोनों देशों के बीच साझेदारी को और मजबूत किया जा सके।

अर्जेंटीना के समृद्ध खनिज भंडार

अर्जेंटीना में लिथियम, कॉपर और शेल गैस जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं, जो उसे भारत के लिए एक संभावित ऊर्जा भागीदार बनाते हैं। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शेल गैस और चौथा सबसे बड़ा शेल ऑयल भंडार वाला देश है।

साथ ही पारंपरिक तेल और गैस के भी अच्छे भंडार यहाँ मौजूद हैं। अर्जेंटीना, बोलिविया और चिली के साथ ‘लिथियम ट्रायएंगल’ का हिस्सा है, जो एंडीज पर्वत क्षेत्र में स्थित है और लिथियम के समृद्ध भंडार के लिए जाना जाता है।

लिथियम का इस्तेमाल मोबाइल, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और ऊर्जा भंडारण के लिए बनने वाली बैटरियों में होता है, इसलिए यह भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के लिए बहुत जरूरी माना जा रहा है।

भारत की सरकारी कंपनी खानिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) ने अर्जेंटीना के कातामार्का प्रांत में लिथियम खोज के अधिकार पहले से ही हासिल कर लिए हैं। इसके अलावा, अर्जेंटीना ‘वाका मुएर्ता’ क्षेत्र में बड़े पैमाने पर एलएनजी (LNG) परियोजना पर काम कर रहा है।

जिसका लक्ष्य 2030 तक सालाना 30 मिलियन टन (3 करोड़ टन) एलएनजी निर्यात करना है। अर्जेंटीना इस परियोजना में विदेशी निवेश चाहता है, जिसके कारण भारत को भी इसमें भागीदारी का मौका मिलने की उम्मीद है।

भारत और अर्जेंटीना के बीच द्विपक्षीय व्यापार

पिछले एक साल में भारत और अर्जेंटीना के बीच द्विपक्षीय व्यापार 5.2 अरब डॉलर (4.31 लाख करोड़ रुपए) से ऊपर पहुँच गया है। भारत अब अर्जेंटीना के छह बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है।

पहले दोनों देशों के बीच व्यापार मुख्य रूप से खाद्य तेलों तक सीमित था, लेकिन अब रक्षा, ऊर्जा, खनन और निवेश जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ाने की कोशिश हो रही है। अर्जेंटीना भारत से दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण और आईटी सेवाएँ आयात करने में रुचि दिखा रहा है, जबकि भारत अर्जेंटीना के कृषि बाजार तक पहुँच बनाना चाहता है।

अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई, जो दिसंबर 2023 में सत्ता में आए, वो पश्चिमी देशों के बाहर भी आर्थिक साझेदारी बढ़ाने के पक्ष में हैं। वहीं भारत दक्षिण अमेरिकी व्यापार समूह मर्कोसुर के साथ अपने व्यापारिक संबंध फिर से मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसके संस्थापक सदस्य अर्जेंटीना ने भी इस संगठन में सुधार की इच्छा जताई है।

भारत-अर्जेंटीना रक्षा सहयोग

भारत और अर्जेंटीना के बीच रक्षा सहयोग, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और टेलीमेडिसिन पर भी बातचीत होने की उम्मीद है। अर्जेंटीना ने भारत के तेजस लड़ाकू विमान में रुचि दिखाई है।

वह भारत के बड़े स्तर पर चलने वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं से भी प्रभावित है। दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियाँ पहले भी साथ काम कर चुकी हैं और अब सस्ते सैटेलाइट लॉन्च के लिए भविष्य में नई साझेदारी की भी उम्मीद है।

आतंकवाद के मुद्दे पर भी दोनों देशों की सोच एक जैसी है। 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले की अर्जेंटीना ने सबसे पहले निंदा की थी। 1992 और 1994 में खुद आतंकवादी हमले झेल चुके अर्जेंटीना को इस खतरे की गंभीरता का भी अच्छा-खासा अनुभव है।

प्रधानमंत्री मोदी की अर्जेंटीना यात्रा का महत्व

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को देखते हुए भारत अब अपनी ऊर्जा आपूर्ति को वहाँ से कम करने और नए विकल्प तलाशने की दिशा में काम कर रहा है। अर्जेंटीना समेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाँच देशों की मौजूदा यात्रा भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

पिछले कुछ वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध और हाल ही में इजराइल-ईरान संघर्ष जैसे बड़े घटनाक्रमों से भारत ने यह सीखा है कि ऊर्जा आपूर्ति के लिए कई विकल्प होना जरूरी है। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने का भारत का फैसला भी इसी नीति के तहत लिया गया था, जिससे देश की आर्थिक स्थिरता बनी रहे।

सरकार अब उन देशों के साथ व्यापार संबंध मजबूत करने पर काम कर रही है जो भारत के संभावित ऊर्जा साझेदार बन सकते हैं। अर्जेंटीना दौरे के बाद प्रधानमंत्री मोदी ब्राजील जाएँगे, जहाँ वह 17वें ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और उसके बाद राजकीय यात्रा करेंगे। इस यात्रा के अंतिम चरण में वह नामीबिया जाएँगे। इससे पहले वह घाना, त्रिनिडाड और टोबैगो का दौरा कर चुके हैं।

OpIndia Exclusive- बुर्काधारी औरतों ने नोचे महिला पत्रकार के बाल, मुस्लिम भीड़ ने पत्थर-बेल्ट से मारा: दिल्ली के सीमापुरी में मीडियाकर्मियों पर हमला, जान बचाने जिस DTC में चढ़े उसमें भी तोड़फोड़

दिल्ली के सीमापुरी इलाके की बंगाली बस्ती में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम एक ऐसी घटना घटी, जिसने पत्रकारिता की स्वतंत्रता, सामाजिक सौहार्द और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। ऑल इंडिया न्यूज़ की पत्रकार सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम पर इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने जानलेवा हमला किया। यह हमला सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण और झुग्गी-झोपड़ी के मुद्दे पर रिपोर्टिंग के दौरान हुआ, जब दोनों पत्रकार बंगाली मार्केट के पास एक मस्जिद के सामने कैमरा लेकर खड़े थे।

पीड़ितों के मुताबिक, बुर्कानशीं महिलाओं और नाबालिग किशोरों की भीड़ने न केवल पत्रकारों को बेरहमी से पीटा, बल्कि उनके उपकरण, नकदी और निजी सामान भी लूट लिए। इस घटना ने दिल्ली पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया है, क्योंकि अभी तक न तो कोई गिरफ्तारी हुई है और न ही पीड़ितों को एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई गई है।

दिल्ली की सड़क पर दिखा इस्लामी हिंसा का भयावह मंजर

जानकारी के मुताबिक, शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम करीब 6 बजे सुप्रिया पाठक और श्याम सीमापुरी के बंगाली बस्ती क्षेत्र में 200 फुटा रोड के पास पहुँचे। उनका मकसद सरकारी जमीन पर हो रहे अवैध अतिक्रमण की सच्चाई को उजागर करना था, जो स्थानीय निवासियों और प्रशासन के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। इस इलाके में अवैध झुग्गियाँ, निर्माण कार्य और कथित तौर पर बांग्लादेशी और रोहिंग्या प्रवासियों की मौजूदगी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

सुप्रिया और श्याम ने जैसे ही मस्जिद के सामने अपनी रिपोर्टिंग शुरू करने के लिए कैमरा सेट किया, कुछ स्थानीय लोगों ने आपत्ति जताई। शुरुआत में यह आपत्ति मौखिक थी, लेकिन जल्द ही यह हिंसक रूप ले लिया। भीड़ में शामिल बुर्का पहनी मुस्लिम महिलाओं और नाबालिग किशोरों ने पत्रकारों को घेर लिया। शुरुआत में 20-30 लोगों की भीड़ कुछ ही मिनटों में 200 से अधिक लोगों की उग्र भीड़ में बदल गई।

भीड़ ने सुप्रिया और श्याम पर लाठियों, मुक्कों और लातों से हमला शुरू कर दिया। सुप्रिया को सड़क पर घसीटकर पीटा गया, जिससे उनके पैर में गंभीर चोट आई और हड्डी टूट गई। उनके शरीर पर कई जगह घाव और चोट के निशान हैं। श्याम के चेहरे और शरीर पर भी गहरे घाव आए और उनके सिर पर मुक्कों की बौछार की गई। हमलावरों ने सुप्रिया का मोबाइल, कैमरा, माइक, बैटरी और जेब में मौजूद नकदी लूट ली, जबकि श्याम की घड़ी और पर्स भी छीन लिया गया।

पत्रकारों ने बचने की कोशिश में एक डीटीसी बस में शरण ली, लेकिन भीड़ ने बस को चारों ओर से घेर लिया। हमलावरों ने बस के शीशे तोड़ दिए और दोनों को जबरन बाहर खींच लिया। इस दौरान बस चालक ने कोई मदद नहीं की और उल्टा उन्हें बस से उतार दिया। भीड़ ने बस को भी नुकसान पहुँचाया, जिससे सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँची। इस घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आया है।

पीड़ित ने ऑपइंडिया से साझा की आपबीती

पीड़ित के मुताबिक, उन्हें अलग भीड़ ने मारा और उनकी साथी पत्रकार सुप्रिया को अलग से पीटा गया। बाद में कुछ बाइक वाले आए, उन्होंने मदद करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी बाइक समेत गिरा दिया गया। फिर पुलिसकर्मी आए और उन्होंने बाइक पर उन्हें आगे छोड़ने का प्रयास किया। हालाँकि इस दौरान भी भीड़ बाइक के पीछे रही, किसी ने पत्थर फेंके तो किसी ने बेल्ट मारी।

बचाव की नाकाम कोशिशें और प्रशासन की निष्क्रियता

घटना के दौरान सड़क पर जाम होने के बावजूद कोई भी स्थानीय व्यक्ति पत्रकारों की मदद के लिए आगे नहीं आया। कुछ राहगीरों ने कोशिश की, लेकिन भीड़ के आक्रामक रवैये और कथित कट्टरपंथी नारों के सामने उन्हें पीछे हटना पड़ा। एक राहगीर ने सुप्रिया को अपनी बाइक पर बिठाकर सुरक्षित स्थान तक ले जाने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उसे भी खींचकर मारपीट की। आखिरकार एक पुलिसकर्मी ने हस्तक्षेप किया और दोनों को मौके से कुछ दूरी पर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया।

पत्रकारों को इसके बाद सीमापुरी थाने ले जाया गया, जहाँ से उन्हें मेडिकल जाँच के लिए जीटीबी अस्पताल भेजा गया। रात 9 बजे अस्पताल पहुँचने के बावजूद, इलाज और मेडिकल प्रक्रिया में इतनी देरी हुई कि सुबह 4 बजे तक उन्हें वहाँ से निकलने का मौका मिला। सुप्रिया के पैर में प्लास्टर चढ़ा है और वह चलने में असमर्थ हैं, जबकि श्याम को भी गंभीर चोटें आई हैं।

कट्टरपंथी इरादों के साथ किया गया हमला

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने X लिखा कि यह हमला योजनाबद्ध था, क्योंकि पत्रकारों की रिपोर्टिंग से कई अवैध गतिविधियों का भेद खुलने का खतरा था।

इस घटना में मुस्लिम महिलाओं और नाबालिग किशोरों की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से चिंताजनक है। बुर्का पहनी महिलाओं ने न केवल पत्रकारों पर शारीरिक हमला किया, बल्कि उन्हें अपशब्द कहे और धार्मिक आधार पर टिप्पणियाँ कीं। नाबालिग किशोरों ने भी हिंसा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया जो यह दर्शाता है कि कट्टरपंथी विचारधारा युवा पीढ़ी में भी गहरे तक पैठ बना चुकी है।

लोगों का दावा है कि हमलावरों ने पत्रकारों को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वे हिंदू थे और हमलावरों को इस बात का भरोसा था कि उनकी मजहबी पहचान के चलते पुलिस कोई सख्त कार्रवाई नहीं करेगी। यह भी आरोप लगाया गया कि ऐसे मामलों में मुस्लिम समुदाय की भीड़ थाने को घेर लेती है, जिससे प्रशासन दबाव में आ जाता है और कार्रवाई करने में असमर्थ रहता है। इस तरह की धारणा हमलावरों को और अधिक बेखौफ बनाती है, जिससे वे कानून को अपने हाथ में लेने से नहीं हिचकते।

लोगों का कहना है कि दिल्ली में अवैध कब्जाधारियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई करने से हिचकता है। यह भी दावा किया गया कि कुछ राजनीतिक दलों ने वोट बैंक की खातिर अवैध प्रवासियों को बसने की अनुमति दी, जिससे इस तरह की हिंसक घटनाएँ बढ़ रही हैं।

हालाँकि इस मामले में हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर हमले के बावजूद दिल्ली पुलिस ने अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। पीड़ितों को न तो एफआईआर की कॉपी दी गई है और न ही किसी हमलावर की गिरफ्तारी हुई है। लोगों का दावा है कि पुलिस पीड़ित पत्रकारों को ही परेशान कर रही है, जबकि हमलावर खुले में घूम रहे हैं।

हिंदी से दिक्कत, लेकिन ‘नॉर्थ इंडियन’ उर्दू से मोहब्बत: वोटबैंक की लालच में हकीकत कब तक नजरअंदाज करेंगे कॉन्ग्रेस से जुड़े द्रविड़-कन्नड़-मराठा नेता, कब तक चलेगी ये राजनीति?

भाषाई कट्टरता और हिंसक प्रवृत्ति एक बार फिर भारतीय सामाजिक और राजनीतिक दृश्य को तब कलंकित करती दिखी जब 29 जून 2025 को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के कार्यकर्ताओं ने मुंबई के मीरा रोड उपनगर में एक मिठाई की दुकान के 48 वर्षीय मालिक बाबूलाल खिमजी चौधरी पर केवल इसलिए हमला कर दिया कि उन्होंने मराठी में बातचीत करने से इनकार कर दिया था।

बाबूलाल खिमजी चौधरी की ‘जोधपुर स्वीट्स और नमकीन’ नाम की दुकान है। उन पर तब हमला हुआ जब मनसे के कार्यकर्ता करण कंडांगीरे (मनसे उप शहर प्रमुख), पामोद नीलेकट (वाहतुक सेना जिला आयोजक), अक्षय दलवी, सचिन सालुंखे और अमोल पाटिल समेत 7 लोग दुकान में आकर मराठी में लेनदेन की माँग करने लगे।

बातचीत जल्द ही बहस में तब्दील हो गई। ये टकराव तब और उग्र हो गया जब पीड़ित ने उनके उस झूठे दावे पर आपत्ति जताई कि महाराष्ट्र विधानसभा ने व्यवसायों में मराठी भाषा के प्रयोग और मराठी भाषी कर्मचारियों की नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया है।

यह घटना न केवल भाषा के नाम पर की जा रही गुंडागर्दी को दिखाता है, बल्कि उन क्षेत्रीय दलों की रणनीति पर भी सवाल उठाता है, जो राजनीतिक गलियारों में चर्चा में बने रहने के लिए इस तरह से गुंडागर्दी का सहारा ले रहे हैं। इस तरह की घटनाएँ न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को चोट पहुँचाती हैं, साथ ही यह पूरे राज्य में गुस्सा और समाज में आपसी झगड़े को भी बढ़ावा देती हैं।

भाषा की लड़ाई से राजनीति हुई फिर जिंदा

महाराष्ट्र में हाल ही में भाषा के नाम पर गैर-मराठी बोलने वालों को परेशान किया गया। एमएनएस के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर जल्दी ही जमानत पर छोड़ दिया गया।

एमएनएस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) जैसे दल लंबे समय से मराठी अस्मिता की बात करते आ रहे हैं, लेकिन यह ज्यादातर दूसरों को डराने और परेशान करने तक ही सीमित रहा है।

कुछ ही दिनों पहले, जब राज्य सरकार ने स्कूलों में हिंदी शुरू करने का फैसला वापस लिया, तो उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने ‘मराठी मानुष’ की एकता की बात की। इसके विरोध में उद्धव ठाकरे और संजय राउत ने सरकारी आदेश की प्रतियाँ जला दीं थी।

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहाँ कई भाषाएँ बोलने वाले लोग रहते हैं। यहाँ बॉलीवुड जैसी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भी है। आम मराठी लोग गैर-मराठी बोलने वालों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन MNS जैसी कुछ क्षेत्रीय पार्टियाँ भाषा के नाम पर झगड़े और डर का माहौल बना रही हैं।

राज्य की बीजेपी सरकार ने इसे लेकर साफ और सख्त रुख अपनाया है। शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि मराठी भाषा पर गर्व करना गलत नहीं है, लेकिन भाषा के नाम पर गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो लोग भाषा के आधार पर मारपीट करेंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि हमें सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी को लेकर विवाद करना और अंग्रेजी को अपनाना समझ से बाहर है। कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। एक अहम बात यह भी है कि जहाँ हिंदी, गुजराती और दूसरी भाषाएँ बोलने वालों को निशाना बनाया जाता है, वहीं उर्दू भाषा को इस गुस्से से अछूता रखा गया है।

हिंदी और मराठी एक जैसी लिपि और जड़ों से जुड़ी हैं, फिर भी हिंदी को ‘उत्तर भारतीय’ कह कर नफरत का प्रतीक बनाया जाता है, जबकि उर्दू पर कोई सवाल नहीं उठता।

देश के कई राज्यों में भाषा को लेकर भेदभाव और राजनीतिक विवाद बढ़ती जा रही है। तमिलनाडु में DMK सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का यह कहकर विरोध किया कि यह तमिल भाषियों पर हिंदी थोपने का प्रयास है।

हालाँकि नीति में हिंदी अनिवार्य नहीं थी और छात्र इसके विकल्प के तौर पर अपनी पसंद की कोई भी भाषा चुन सकते थे। मार्च 2024 में महाराष्ट्र के पुणे के भूषण मंडलिक को तमिलनाडु में सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वह तमिल नहीं बोल पाते थे।

इसी तरह कर्नाटक में एक ओड़िया रेस्टोरेंट को स्थानीय भाषा कन्नड़ के नाम पर अपनी ओड़िया नेमप्लेट हटाने के लिए मजबूर किया गया, जबकि पहले से कन्नड़ में नाम का बोर्ड लगा हुआ था।

झारखंड में 2022 में JMM सरकार ने भोजपुरी और मगही को क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से बाहर कर दिया, जबकि उर्दू को बनाए रखा और हिंदी को किसी भी जिले में क्षेत्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया, जिससे भारी विरोध हुआ।

शिवसेना (UBT) ने भी मुस्लिम बहुल इलाकों में उर्दू में पोस्टर लगाकर उद्धव ठाकरे को ‘अली जनाब’ बताया, लेकिन हिंदी को अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में भी उर्दू को बढ़ावा दिया जा रहा है जबकि हिंदी का विरोध किया जाता है।

यूपी में उर्दू अनुवाद की माँग पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इसका मकसद बच्चों को मौलवी बनाना है, वैज्ञानिक नहीं। इन सभी घटनाओं से साफ है कि कुछ राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बना रहे हैं, जहाँ खासकर हिंदी को निशाना बनाया जा रहा है और उर्दू को विशेष छूट दी जा रही है।

हिंदी से नफरत लेकिन वोट के लिए उर्दू और अंग्रेजी भाषा स्वीकार्य

देश में भाषाओं को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है, लेकिन यह विवाद भाषा की असली चिंता से ज्यादा राजनीति से जुड़ा है। कुछ क्षेत्रीय और मुस्लिम-तुष्टिकरण करने वाली पार्टियाँ हिंदी का विरोध हमेशा से करती रही हैं और इसे थोपने का आरोप भी लगाती हैं।

जबकि उर्दू को बढ़ावा देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती तो सवाल ये है कि भाषा के साथ इस तरह का राजनीतिक और सामाजिक भेदभाव आखिर क्यों हो रहा है। उत्तर प्रदेश में 1989 में कॉन्ग्रेस सरकार ने सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बना दिया था।

यही हाल पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी देखा गया, जहाँ उर्दू को विशेष दर्जा मिला। लेकिन हिंदी, जो संस्कृत से निकली है और देश की जमीन से जुड़ी है, उसे ‘उत्तर भारतीय’ कहकर बदनाम किया जाता है। उर्दू की उत्पत्ति इस्लामी आक्रमणों के समय हुई थी, जब विदेशी शासकों को स्थानीय जनता से संवाद के लिए एक मिली-जुली भाषा की जरूरत थी।

वहीं, बॉलीवुड में भी उर्दू को खास बढ़ावा मिलता रहा है। गीतकारों और लेखकों ने उर्दू के शब्दों और इस्लामिक शब्दावली (जैसे जन्नत, खुदा, काफिर आदि) को फिल्मों में खूब इस्तेमाल किया, जिससे हिंदी को कमतर और उर्दू को ज्यादा शिष्ट भाषा की तरह पेश किया गया।

इसने उर्दू की एक खास छवि बना दी और आम हिंदी को हाशिए पर डाल दिया। इसका नतीजा ये रहा कि आज भी कुछ राजनीतिक दल उर्दू को विशेष दर्जा देते हैं, उसके लिए फंड जारी करते हैं जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नजरअंदाज किया जाता है।

महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिंदी बोलने वाले आम लोगों को निशाना बनाया जाता है, जबकि उर्दू बोलने वाले मुसलमानों पर कोई सवाल नहीं उठाता। मुसलमानों से कोई यह नहीं पूछता कि वे मराठी या कन्नड़ में बात क्यों नहीं करते।

हाल ही में महाराष्ट्र में एमएनएस का एक कार्यकर्ता मुस्लिम इलाके में मराठी थोपने गया तो उसे माफी तक माँगनी पड़ी और वो भी हिंदी में। इसके बावजूद हिन्दी को सम्मान नहीं मिल पा रहा है, लोग उसी का विरोध कर रहे है।

अगर इसे ठीक तरह से समझने की कोशिश की जाए, तो ये भाषा की लड़ाई नहीं बल्कि एकतरफा राजनीति है जिसमें मुस्लिम समुदाय और उर्दू को छूने से सभी पार्टियाँ डरती हैं क्योंकि विरोध का डर होता है, जबकि हिंदुओं और हिंदी के खिलाफ बोलना ‘सुरक्षित’ माना जाता है। यही कारण है कि उर्दू, जो थोपी गई भाषा थी, आज विशेष दर्जा पाती है और हिंदी को बदनाम किया जाता है।

वैसे, उर्दू कभी आम जन की भाषा थी भी नहीं। उत्तर भारत में पढ़े-लिखे तबके ने इसे इसलिए अपनाया, क्योंकि ये राजकीय यानी कामकाज की भाषा थी। ये अलग बात है कि इसका व्याकरण हिंदी वाला रहा, तो आम लोग लिखने की लिपि अपनी सुविधानुसार सीखते रहे, लेकिन बोलने-समझने के लिए जरूरी व्याकरण वो हिंदी से ही लेते रहे। वाक्य विन्यास से लेकर सबकुछ। ऐसे में उर्दू का न सिर्फ जन्म उत्तर भारत में हुआ, बल्कि इसका व्याकरण भी हिंदी वाला है।

हालाँकि इसके पीछे की वजहें यानी जड़ें विदेशी हैं। इसके बावजूद उर्दू न सिर्फ प्योर ‘नॉर्थ इंडियन’ है, बल्कि पूरी तरह से भारत में ही जन्मी है। ये बात समझने वाले लोग कभी हिंदी का विरोध करेंगे ही नहीं, लेकिन उन्हें यही समझने नहीं दिया जा रहा है। जबकि इन लोगों को यही समझना जरूरी है।

अपनी क्षेत्रीय भाषा पर गर्व करना गलत नहीं, लेकिन दूसरी भाषाओं के अस्तित्व को नकारना या उसे अपमानित करना नैतिकता के लिहाज से कैसे सही हो सकता है? महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु या अन्य किसी भी जगह जितनी लोग हिंदी बोलते हैं, उतने उर्दू भी बोलते होंगे।

आम बोलचाल की भाषा हो या फिर साहित्य की। हिंदी की तरह उर्दू का भी प्रयोग है। लेकिन कुछ नेता केवल अपनी राजनीति साधने के लिए हिंदी भाषा सत्ता का प्रतीक मानकर इसके विरोध में जुटे हुए हैं। वहीं एक समुदाय के वोट की लालच में उर्दू को सामाजिक सौहार्द वाली भाषा करके पेश किया जाता है।

जबकि हकीकत ये है कि उर्दू पर मुस्लिम समुदाय का एकाधिकार नहीं है। ये भाषा भी उत्तरी भारत की भाषा है जैसे हिंदी। अगर इन नेताओं के लिए उर्दू बाहरी भाषा नहीं है तो फिर पूछा जाना चाहिए कि हिंदी पर इतना बवाल क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि सत्ताधारी पार्टी अन्य भाषाओं की तरह इस भाषा को भी सम्मान देती है और ये बात राजनीति करने वालों को नहीं पसंद आती।

(नोट: मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक करके विस्तार से पढ़ें।)