भारतीय जनता पार्टी के नेता और व्यवसाई गोपाल खेमका की शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की देर रात गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने बिहार के पटना में स्थित उनके घर के बाहर उन्हें गोली मारी। साल 2018 में उनके बेटे गुंजन खेमका की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोपाल खेमका की हत्या की घटना पटना के गाँधी मैदान थाना क्षेत्र के रामगुलाम चौक के पास हुई। उस समय खेमका बांकीपुर क्लब से आ रहे थे, जहाँ घर के बाहर ही उन पर गोलियाँ चला दी गई। तुरंत उन्हें मेडिवर्सल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
खेमका के परिवारवालों का आरोप है कि घटनास्थल से पुलिस थाना केवल 300 मीटर की दूरी पर है, इसके बावजूद पुलिस ने वहाँ पहुँचने में देरी की। खेमका के छोटे भाई शंकर खेमका ने पुलिस पर लापरवाही और धीमी प्रतिक्रिया का आरोप लगाया।
सेंट्रल सिटी एसपी दीक्षा ने जानकारी देते हुए बताया, “देर रात जब वह एग्जीबिशन रोड स्थित अपने अपार्टमेंट में पहुँचने वाले थे, तभी एक हथियारबंद अपराधी ने उन्हें नजदीक से गोली मार दी। पुलिस ने घटनास्थल से एक गोली और एक खोखा बरामद किया है। बिहार पुलिस ने मामले की जाँच के लिए SIT भी गठन किया है। घटना की सूचना मिलने के बाद पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने खेमका के आवास पर पहुँच कर शोक संतप्त परिवार को सांत्वना दी।
वही हमलावर का पता लगाने के लिए सीसीटीवी फुटेज भी निकाल लिया गया है, जिसमें नीली शर्ट और काला हेलमेट पहने एक व्यक्ति खेमका के घर के बाहर खड़ा दिखाई दे रहा है। वीडियो में दिख रहा है कि कुछ देर बाद दो गाड़ियाँ आती हैं और गार्ड के गेट खोलने का इंतजार करती है। इसमें पहली कार खेमका खुद चला रहे थे, जबकि पीछे आ रही दूसरी कार कोई दूसरा व्यक्ति चला रहा था।
इसी दौरान हमलावर उनकी तरफ दौड़ा और कार में ही उन्हें गोली मार दी। इसके बाद अपना स्कूटर लेकर भाग गया। इसके बाद बाहर आए गार्ड ने गेट खोला। सीसीटीवी फुटेज में खेमका को अपनी कार की स्टीयरिंग व्हील पर आगे की ओर पड़ा हुआ देखा जा सकता है। जबकि दूसरी कार में बैठा व्यक्ति भागकर कार से बाहर आता दिख रहा है।
इससे पहले गोपाल खेमका के बेटे गुंजन खेमका की भी 2018 में हथियारबंद अपराधियों ने वैशाली जिले के हाजीपुर औद्योगिक क्षेत्र में इसी तरह गोली मारकर हत्या कर दी थी।
नीतीश कुमार बोले- अपराधी बख्शे नहीं जाएँगे
इस बीच, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में कानून व्यवस्था को लेकर पुलिस पुलिस अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की है। इस बैठक के बाद नीतीश कुमार ने एक्स पर पोस्ट किया, “विधि व्यवस्था सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। अपराध करने वाले कोई भी हों, उन्हें किसी कीमत पर बख़्शा नहीं जाए। घटित आपराधिक घटनाओं के अनुसंधान कार्यों में तेजी लाने और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई करने का निर्देश दिया।”
1 अणे मार्ग स्थित ‘संकल्प’ में पुलिस महानिदेशक एवं अन्य वरीय पुलिस पदाधिकारियों के साथ विधि व्यवस्था की समीक्षा बैठक की। विधि व्यवस्था सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। अपराध करने वाले कोई भी हों, उन्हें किसी कीमत पर बख्शा नहीं जाए। घटित आपराधिक घटनाओं के अनुसंधान कार्यों में तेजी…
कोलकाता गैंगरेप केस में छानबीन के दौरान गिरफ्तार सुरक्षा गार्ड ने घटना वाले दिन को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उसने बताया है कि रेप से पहले मुख्य आरोपित मनोजीत ने उसे कमरे में पर्याप्त मात्रा में पानी और साफ चादर रखने को कहा था। सुरक्षा गार्ड पिनाकी बनर्जी कहना है कि गार्ड रुम में अक्सर शराब पार्टियाँ होती थी, इसलिए उसे इस बात का शक नहीं हुआ कि मनोजीत इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने की सोच रहा है।
पिनाकी बनर्जी ने दावा किया है कि आरोपित जैब अहमद और प्रमित मुखर्जी ने उससे कहा था कि वह मेन गेट को बंद कर दे और गार्ड रुम की चाबियाँ उन लोगों को देकर कहीं और जा कर ड्यूटी करे। बनर्जी ने कहा कि उसने मनोजीत को यह भी बताया कि कॉलेज आज खत्म हो रहा है, तो उसने उसे धमकी दी और हद में रहने को कहा।
उसने कहा, “तुम्हें क्या लगता है कि तुम मेरे बिना यहाँ जिंदा रह सकते हो?” उसने पुलिस को बताया कि उसने आरोपित जैब को एक इनहेलर लाते हुए भी देखा था। उसने उससे इस बारे में पूछा तो जैब ने कथित तौर पर कहा कि किसी को इसकी जरूरत थी।
इससे पहले पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा था कि घबराहट के कारण उसे साँस लेने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए आरोपितों ने उसे इन्हेलर दिया था और फिर उसके साथ बलात्कार किया गया। सुरक्षागार्ड पिनाकी बनर्जी को शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को अलीपुर अदालत में पेश करने के बाद 8 जुलाई तक के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है।
गैंगरेप के सात दिन बाद पुलिस ने शुक्रवार (4 जुलाई) को लॉ कॉलेज में चारों आरोपितों और पीड़िता की मौजूदगी में क्राइम सीन को री-क्रिएट किया। इस दौरान पूरे प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और घटनास्थल की 3डी मैपिंग की गई। इससे पहले सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कॉलेज के आस-पास बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था।
पुलिस का कहना है कि जाँच में सामने आए निष्कर्षों और पीड़िता द्वारा की गई शिकायतों को मिलाकर आगे की जाँच की जाएगी। साथ ही अन्य सबूतों से भी मामले की पुष्टि की जाएगी। वहीं गिरफ्तार सुरक्षा गार्ड पिनाकी बनर्जी को भी पुलिस ने गवाह बना लिया है।
राजस्थान में भीलवाड़ा के जहाजपुर में एक हिंदू युवक की कार मस्जिद के पास खड़े सब्जी के ठेले से टकरा गई। माफी माँगने के लिए वह गाड़ी से उतरा तो पास खड़ी मुस्लिम भीड़ ने उसके साथ मॉब लिंचिंग कर मौत के घाट उतार दिया। मामले पर पुलिस को शिकायत दी गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, टोंक जिले से सिकंदर, सीताराम, दिलकुश और दीपक जहाजपुर आए थे। यहाँ से गुजरते समय शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम को टकिया मस्जिद के पास उनकी कार एक आलू-प्याज के ठेले से टकरा गई। ये ठेला रईस फकीर नाम के आदमी का है।
कार के टकराने से आलू और प्याज जमीन में फैल गए। पूरे मामले पर लोगों से माफी माँगने और सब्जियाँ उठाने के लिए सीताराम कार से बाहर उतरा। उसने लोगों से हाथ जोड़कर माफी माँगी और नुकसान की भरपाई करने की भी बात कही।
हालाँकि सीताराम की बात सुनने के बजाय वहाँ का माहौल हिंसा में बदल गया। पास ही खड़े मुस्लिम युवकों की भीड़ में से बाबू खान, वसीम, शाहरुख, सद्दाम, हसनैन, मोहसिन, साहिल, इस्लाम, तनवीर, शारिफ, हनीफ, आबिद, इदरीस, गुलजार और मुर्तजा ने सीताराम को पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया।
यहाँ तक कि उसके दोस्तों ने भी उसे बचाने की कोशिश की। इसमें उन्हें भी चोटें आईं। लेकिन सीताराम के साथ इस कदर मॉब लिंचिंग की गई कि घटना स्थल पर ही उसकी मौत हो गई।
मुस्लिम भीड़ यहीं पर नहीं रुकी। चारों हिंदू लड़के कहीं जा न पाएँ इसके लिए पहले उन्होंने कार की वायरिंग निकाल दी। सीताराम को तीनों दोस्तों ने किसी तरह मोटरसाइकिल पर अस्पताल तक पहुँचाया। हालांकि डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
सीताराम की मौत की खबर फैलते ही स्थानीय लोगों की गुस्साई भीड़ ने जहाजपुर के अस्पताल में जुटकर विरोध प्रदर्शन किया और दोषियों पर कार्रवाई की माँग की। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने भी घटना पर रोष व्यक्त किया है। BJP विधायक गोपीचंद मीणा भी वहाँ पहुँचे और घटना पर आक्रोश व्यक्त किया है। साथ ही उन्होंने आरोपितों के खिलाफ कड़ी सजा की माँग की है।
इस मामले की जानकारी मिलने पर भीलवाड़ा में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। बाजार को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। पुलिस ने एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है और शक के दायरे में आए अन्य लोगों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
सीताराम की निर्मम हत्या के बाद समुदाय में तनाव का माहौल है। स्थानीय लोगों ने हिंदू समुदाय के खिलाफ की जा रही बर्बरतापूर्ण हिंसा और हत्या के लिए समुचित जाँच की माँग की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 देशों की आधिकारिक यात्रा के तहत शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को पोर्ट ऑफ स्पेन पहुँचे। यहाँ पीएम ने त्रिनिदाद और टोबैगो की संसद को भी संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक मॉडल नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय 5 देशों की आधिकारिक यात्रा पर हैं। शुक्रवार (4 जुलाई) को जब वह त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा पर पोर्ट ऑफ स्पेन पहुँचे तो उनका स्वागत पारंपरिक तरीके से स्वागत हुआ। इसके साथ ही प्रधानमंत्री को त्रिनिदाद और टोबैगो के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘द ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया।
त्रिनिदाद और टोबैगो की संसद में संयुक्त बैठक को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि मैं इस प्रतिष्ठित रेड हाउस में बोलने वाला भारत का पहला प्रधानमंत्री बनकर गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।
It was an honour to address the Parliament of Trinidad & Tobago. I spoke of our shared journey rooted in history, culture and the vibrant spirit of our people. I am confident that this partnership will continue to thrive in the times to come. My sincere thanks to the Members of… pic.twitter.com/r1lQEQwXjm
उन्होंने कहा कि हम भारतीयों के लिए लोकतंत्र सिर्फ एक राजनीतिक मॉडल नहीं बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है। हमारे पास हजारों सालों की समृद्ध विरासत है। यहाँ के कई सांसदों के पूर्वज उस बिहार से हैं, जो महाजनपदों और प्राचीन गणराज्यों का घर था।
पीएम ने कहा “इस महान राष्ट्र के लोगों ने दो उल्लेखनीय महिला नेताओं को चुना है राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री। वे गर्व से खुद को प्रवासी भारतीयों की बेटियाँ कहती हैं। उन्हें अपनी भारतीय विरासत पर गर्व है। हमारे दोनों राष्ट्र औपनिवेशिक शासन की छाया से ऊपर उठे और साहस को अपनी स्याही और लोकतंत्र को अपनी कलम बनाकर अपनी कहानियाँ लिखीं”।
On the Speaker’s Chair in the Parliament of Trinidad & Tobago it is written – From The People of India to the People of Trinidad & Tobago. This made me very proud. pic.twitter.com/Yz14f5yuxB
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा “मैं इस सदन में इतनी सारी महिला सदस्यों को देखकर प्रसन्न हूँ। महिलाओं के प्रति सम्मान भारतीय संस्कृति में गहराई से निहित है। हमारे महत्वपूर्ण पवित्र ग्रंथों में से एक स्कंद पुराण में कहा गया है कि एक बेटी दस बेटों के बराबर खुशी लाती है।”
त्रिनिदाद और टोबैगो की संसद की संयुक्त सभा को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारतीय क्रिकेट प्रेमी वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम के सबसे उत्साही प्रशंसकों में से हैं। हम दिल से उनका उत्साहवर्धन करते हैं, सिवाय उस समय के जब वे भारत के खिलाफ खेल रहे हों।
There is a natural warmth between the people of India and Trinidad & Tobago, which is reflected across sectors. pic.twitter.com/2xNdSZReeC
अपनी यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने त्रिनिदाद की प्रधानममंत्री कमला बिसेसर को भी अपने ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान में शामिल किया। दोनों ने एक पेड़ लगा कर पृथ्वी को हरबार और आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर कल की कामना की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो की यात्रा के अवसर पर पीएम मोदी को सोहारी पत्ते पर खाना परोसा गया। इस मौके की तस्वीरें एक्स पर शेयर करते हुए प्रधानमंत्री ने लिखा “प्रधानमंत्री कमला प्रसाद बिसेसर द्वारा आयोजित रात्रिभोज में सोहारी पत्ते पर भोजन परोसा गया। इसका त्रिनिदाद और टोबैगो के लोगों, खासकर भारतीय मूल के लोगों के लिए सांस्कृतिक महत्व है। यहाँ, त्योहारों और अन्य विशेष कार्यक्रमों के दौरान अक्सर इस पत्ते पर भोजन परोसा जाता है”।
The dinner hosted by Prime Minister Kamla Persad-Bissessar had food served on a Sohari leaf, which is of great cultural significance to the people of Trinidad & Tobago, especially those with Indian roots. Here, food is often served on this leaf during festivals and other special… pic.twitter.com/KX74HL44qi
इसके बाद से SohariLeaf जैसे हैशटैग सोशल मीडिया पर खूब ट्रेंड कर रहे हैं। भारत के लोग यह देखकर गौरवान्वित महसूस कर रहें हैं कि अन्य देशों में भी भारतीय संस्कृति को इतना ही सम्मान दिया जाता है, जितना कि भारत में। भारतीयों का कहना है कि भारत सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक ऐसी संस्कृति है जो सम्पूर्ण विश्व में बसती है।
अमेरिका के 249वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को व्हाइट हाउस में पिकनिक मनाया गया। इसी दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैक्स और सरकारी खर्च संबंधी अपने पसंदीदा विधेयक ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ पर हस्ताक्षर भी किए।
इस बिल को एक दिन पहले अमेरिकी संसद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 218-214 वोटों से पारित किया था।
BREAKING: President Trump Signs One Big Beautiful Bill Into Law – MAKE AMERICA GREAT AGAIN! ??? pic.twitter.com/xHpsiQJcaP
अमेरिका के 249वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर व्हाइट हाउस में पिकनिक मनाया गया। इस दौरान बिल पर साइन करते हुए ट्रंप ने कहा कि ये बिल अमेरिका के लोगों, परिवार और व्यापार के लिए नई शुरुआत है। हम गैर जरूरी खर्चों को कम कर टैक्स घटा रहे हैं ताकि हमारी अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत हो सके।
SIGNED. SEALED. DELIVERED. ???
President Trump’s One Big Beautiful Bill is now LAW — and the Golden Age has never felt better. pic.twitter.com/t0q2DbZLz5
ट्रंप ने इस अवसर पर कहा कि मैंने अमेरिका के लोगों को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा। इस बिल के कारण अलग अलग वर्गों के लोग भी सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
इस बिल का पास होना ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हालाँकि इसे लेकर अमेरिका में दो अलग अलग मतों पर बहस छिड़ी हुई है। बिल के अमेरिकी संसद में पारित होने से पहले विपक्ष की डेमोक्रैट पार्टी ने बिल के विरोध में लगभग 8 घंटे तक लंबा भाषण दिया था। विपक्ष का कहना है कि ये बिल आने वाले वर्षों में लोगों को स्वास्थ्य बीमा और शिक्षा की सुविधा से वंचित कर सकता है।
869 पन्नों के बिल में कई तरह की कटौती, सेना के लिए बजट, डिफेंस और एनर्जी उत्पादन के बढ़े हुए खर्च, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में कटौती समेत कई बातें शामिल हैं। इसके अलावा अवैध प्रवासियों के लिए डिपोर्टेशन के लिए बजट बढ़ाने मुद्दे भी रखे गए हैं।
कुछ विश्लेषकों का ये भी मानना है कि इस बिल के कारण देश के 36.2 ट्रिलियन डॉलर (2715 लाख करोड़ रुपए) के कर्ज में 3 ट्रिलियन डॉलर (2 खरब 50 लाख करोड़ रुपए) का अधिक इजाफा कर सकता है। यहाँ तक कि डोनाल्ड ट्रंप के चहेते रहे एलन मस्क ने भी इस बिल का विरोध किया था। टेस्ला के CEO मस्क का कहना है कि इस बिल से सस्ते और स्वच्छ ऊर्जा के उद्योग में अमेरिका को नुकसान हो सकता है।
अक्षय ऊर्जा की माँग लगातार बढ़ रही है। इस बिल के कारण अमेरिका में अगले 10 वर्षों में ऊर्जा की कीमतें 50% तक बढ़ जाएँगी। ऐसे में इस उद्योग से जुड़ी नौकरियों के अमेरिका में खत्म होने की आशंका जता ई जा रही है।
बिल में क्या-क्या शामिल
इस बिल में अमेरिका- मेक्सिको के बॉर्डर वॉल के लिए 46 अरब डॉलर (लगभग 3,85,730 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है। इसके अलावा 10,000 नए ICE अधिकारियों की भर्ती की जाएगी। 1 लाख प्रवासी डिटेंशन बेड्स के लिए 45 अरब डॉलर (3 लाख 73 हजार 777 करोड़ रुपए) का बजट रखा गया है।
इस बिल के तहत पेंटागन बजट में इजाफा किया गया है। अमेरिकी गोल्डन डोम कहे जाने वाले मिसाइल शील्ड के लिए 25 अरब डॉलर (लगभग 207,000 करोड़ रुपए) और मंगल ग्रह पर जाने वाले मिशन के लिए 10 अरब डॉलर (लगभग 83,000 करोड़ रुपये) का बजट तय किया गया है।
हर साल की तरह इस बार भी मुहर्रम और काँवड़ यात्रा का समय एक साथ आ रहा है। हिंदू भगवान शिव को जल चढ़ाने के लिए काँवड़ यात्रा निकालते हैं, तो मुस्लिम समुदाय मुहर्रम में इमाम हुसैन की शहादत को याद करता है। ये दोनों धार्मिक-मजहबी आयोजन अपने आप में बहुत खास हैं, लेकिन जब ये एक साथ होते हैं, तो कई बार तनाव और हिंसा की खबरें सामने आती हैं।
इसे रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन पहले से ही शांति समितियों (पीस कमेटी) की बैठकें आयोजित कर रहा है, खासकर उन इलाकों में जहाँ हिंदू और मुस्लिम आबादी मिली-जुली है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल बार-बार उठता है – हिंसा हो या न हो, दोष ज्यादातर हिंदुओं पर ही क्यों डाला जाता है? आखिर यह खेल क्या है?
शांति समितियों की कहाँ-कहाँ हो रही हैं बैठकें?
इसका जवाब है – देश के कई हिस्सों में… जहाँ हिंदू और मुस्लिम आबादी साथ-साथ रहती है, शांति समितियाँ बनाई गई हैं। इनका मकसद है कि मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान शांति बनी रहे। कुछ जगहों पर ये बैठकें हो चुकी हैं-
दिल्ली: सीलमपुर, जहाँगीरपुरी और मंडावली जैसे इलाकों में पुलिस ने शांति समितियों के साथ बैठकें कीं। इनमें काँवड़ यात्रा के रास्तों, लाउडस्पीकर की आवाज और सुरक्षा पर बात हुई।
उत्तर प्रदेश:गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, मेरठ, मुरादाबाद, सीतापुर और रायबरेली में जिला प्रशासन ने दोनों समुदायों के धार्मिक नेताओं को बुलाकर बैठकें कीं।
पश्चिम बंगाल: मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में भी शांति समितियाँ सक्रिय हैं, खासकर हाल की वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 के विरोध के बाद।
बिहार और झारखंड: कुछ संवेदनशील इलाकों में भी ऐसी बैठकें हुईं, जहाँ दोनों समुदायों के लोग शामिल हुए।
इन बैठकों में पुलिस, प्रशासन और दोनों समुदायों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। मकसद होता है कि रास्तों का बँटवारा हो, समय का ध्यान रखा जाए और कोई विवाद न हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये समितियाँ वाकई निष्पक्ष हैं या इनका इस्तेमाल सिर्फ हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करने के लिए होता है?
हिंदुओं को दोषी ठहराने की आदत
बीते सालों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं, जहाँ हिंसा के बाद हिंदुओं को ही दोषी ठहराया गया, भले ही शुरुआत दूसरी ओर से हुई हो। कुछ उदाहरण देखिए—
जहाँगीरपुरी-2022 (दिल्ली): हनुमान जयंती की शोभा यात्रा पर पथराव हुआ। कई लोग घायल हुए, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे। जाँच में पता चला कि पथराव मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने किया। लेकिन शांति समिति की बैठकों और कुछ मीडिया में यह नैरेटिव बनाया गया कि हिंदुओं ने ‘उकसावे’ वाली हरकत की।
खरगोन-2022 (मध्य प्रदेश): रामनवमी के जुलूस पर पथराव हुआ। दुकानें और घर जले। जाँच में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों को दोषी पाया गया। लेकिन प्रशासन और कुछ मीडिया ने हिंदुओं पर इल्जाम लगाया कि उन्होंने भड़काऊ नारे लगाए।
मुजफ्फरनगर-2016 (उत्तर प्रदेश): काँवड़ यात्रा के दौरान एक छोटा-सा विवाद हिंसा में बदल गया। बाद में पुलिस और स्थानीय नेताओं ने काँवड़ियों पर ही इल्जाम लगाया कि उन्होंने हंगामा किया।
इन घटनाओं में एक पैटर्न दिखता है – हिंसा की शुरुआत चाहे कोई भी करे, दोष ज्यादातर हिंदुओं पर ही डाला जाता है। शांति समितियों की बैठकों में भी हिंदुओं को ही सलाह दी जाती है कि वे ‘सावधानी’ बरतें, लाउडस्पीकर न बजाएँ या जुलूस में भीड़ न करें, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘उत्तेजित’ न हो। लेकिन क्या मुस्लिम समुदाय को ऐसी सलाह दी जाती है? यह सवाल हर बार उठता है।
शांति समितियों की जरूरत क्यों?
पुलिस का कहना है कि शांति समितियाँ बनाना जरूरी है, क्योंकि अतीत में मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान हिंसा की कई घटनाएँ हुई हैं।
कुछ बड़े उदाहरण इस तरह से हैं-
अहमदाबाद दंगा-1969: मुहर्रम और अन्य आयोजनों के समय हुए दंगों में करीब 1000 लोग मारे गए।
मुरादाबाद दंगा-1980: ईद और अन्य आयोजनों के दौरान हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए।
मुजफ्फरनगर दंगा-2013: एक छोटी-सी घटना ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया, जिसमें कई लोग मारे गए और हजारों बेघर हुए।
पुलिस का मानना है कि शांति समितियाँ दोनों समुदायों के बीच संवाद का रास्ता खोलती हैं। इन बैठकों में रास्तों, समय और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बात होती है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ये समितियाँ सिर्फ औपचारिकता हैं और इनका असल मकसद हिंदुओं को ‘नियंत्रण’ में रखना है।
कॉन्ग्रेस और शांति समितियों का इतिहास
शांति समितियों की शुरुआत का इतिहास कॉन्ग्रेस सरकारों से जुड़ा है। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद देश में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं हुईं। नोआखली (बंगाल) और बिहार के दंगों में हजारों लोग मारे गए। उस समय कॉन्ग्रेस ने शांति समितियों (या अमन कमेटियों) का गठन शुरू किया। इनका मकसद था –
हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच विश्वास बहाल करना।
धार्मिक आयोजनों के दौरान तनाव रोकना।
हिंसा की आशंका को कम करना।
लेकिन लोगों का कहना है कि कॉन्ग्रेस ने इन समितियों का इस्तेमाल अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए किया। खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में, इन समितियों के जरिए कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम समुदाय को यह दिखाने की कोशिश की कि वह उनकी सुरक्षा की गारंटी है। इस प्रक्रिया में हिंदुओं को बार-बार “संयम” बरतने का संदेश दिया गया।
सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में क्यों?
शांति समितियाँ ज्यादातर उन इलाकों में बनाई जाती हैं जहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा है। जैसे दिल्ली का सीलमपुर, जहाँगीरपुरी या पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद। इसका कारण यह बताया जाता है कि इन इलाकों में सांप्रदायिक तनाव की आशंका ज्यादा रहती है। लेकिन यह बात कई सवाल उठाती है-
एकतरफा नीति: हिंदू बहुल इलाकों में ऐसी समितियाँ क्यों नहीं बनतीं? या उनकी जरूरत ही क्यों नहीं पड़ती?
हिंदुओं पर दबाव: काँवड़ यात्रा जैसे हिंदू आयोजनों में हिंदुओं को सलाह दी जाती है कि वे लाउडस्पीकर न बजाएँ, जुलूस छोटा रखें, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘नाराज’ न हो। लेकिन मुहर्रम के जुलूसों में ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखती?
दोष का खेल: हिंसा होने पर हिंदुओं को ही दोषी ठहराया जाता है, यह कहकर कि उन्होंने ‘उकसाया’। और मामलों की जाँच में ये बात हमेशा सामने आती है कि शुरुआत मुस्लिम समुदाय ही करता है।
यह नीति न सिर्फ एकतरफा लगती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या प्रशासन मुस्लिम समुदाय को ‘तुष्टिकरण’ करने की कोशिश कर रहा है?
हिंदुओं को क्यों बार-बार सलाह?
हिंदू त्योहारों जैसे काँवड़ यात्रा, रामनवमी या हनुमान जयंती के दौरान हिंदुओं को ही सलाह दी जाती है कि वो…
‘लाउडस्पीकर धीमा रखें।’
‘जुलूस में ज्यादा भीड़ न करें।’
‘मुस्लिम बहुल इलाकों से बचें।’
ऐसा इसलिए, ताकि मुस्लिम समुदाय ‘उत्तेजित’ न हो। लेकिन मुहर्रम जैसे मुस्लिम आयोजनों में ऐसी सख्ती कम दिखती है। और जब दोनों त्योहार एक साथ होते हैं, तो दोनों से शांति की अपील की जाती है, लेकिन हिंसा होने पर दोष फिर भी हिंदुओं पर ही डाला जाता है। यह स्थिति एक खतरनाक नैरेटिव को जन्म देती है – कि मुस्लिम समुदाय की हिंसा को ‘जायज’ माना जाए और हिंदुओं को हर बार ‘संयम’ बरतना चाहिए।
इस साल भी वही कहानी
इस साल भी मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के लिए शांति समितियों की बैठकें हो रही हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में पुलिस और प्रशासन सक्रिय है। लेकिन हर बार की तरह, हिंदुओं को ही ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। अगर इस बार हिंसा होती है, तो क्या फिर से हिंदुओं को ही दोषी ठहराया जाएगा?
यह ‘नाटक’ क्यों? ऐसे में लोग शांति समितियों को एक ‘नाटक’ ही मानते हैं। क्योंकि…
हिंदुओं को कटघरे में खड़ा करना: हिंसा की शुरुआत चाहे कोई भी करे, दोष हिंदुओं पर ही डाला जाता है।
राजनीतिक फायदा: कुछ राजनीतिक दल इन समितियों का इस्तेमाल अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए करते हैं।
एकतरफा अपील: हिंदुओं को बार-बार संयम बरतने की सलाह दी जाती है, लेकिन मुस्लिम समुदाय को ऐसी सख्ती कम दिखाई देती है।
यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाता है, जहाँ हिंदू अपने ही देश में अपने त्योहार मनाने से डरने लगते हैं।
शांति समितियाँ बनाना गलत नहीं है। अगर ये वाकई शांति ला सकती हैं, तो यह अच्छा कदम है। लेकिन इनकी कार्यप्रणाली और नीयत पर सवाल उठते हैं। बार-बार हिंदुओं को दोषी ठहराने की आदत न सिर्फ एकतरफा है, बल्कि यह सांप्रदायिक तनाव को और बढ़ाती है।
अगर शांति समितियाँ निष्पक्ष हों, तो दोनों समुदायों की जिम्मेदारी बराबर होनी चाहिए। हिंसा को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता। हालाँकि अब इस बार मुहर्रम और काँवड़ यात्रा के दौरान शांति बनी रहे, ऐसा हर कोई चाहता है, लेकिन इसके लिए प्रशासन और शांति समितियों को निष्पक्ष रहना होगा।
केंद्र सरकार ने गुरुवार (3 जुलाई 2025) को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत नए वक्फ नियम 2025 लागू किए। इसे एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास नियम – 2025 (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development Rules, 2025) कहा जा रहा है। ये नियम हाल ही में लागू वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के तहत बनाए गए हैं, जो 8 अप्रैल 2025 से लागू हुआ था।
इस कदम का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन को पारदर्शी, उत्तरदायी और आधुनिक तकनीक से युक्त बनाना है। यह पहली बार है जब देशभर की वक्फ संपत्तियों को एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल पर लाने का प्रयास किया जा रहा है।
इस नए नियम के अंतर्गत एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म केंद्रीय वक्फ प्रबंधन प्रणाली (Central Waqf Management System – CWMS) बनाया गया है। इसमें वक्फ संपत्तियों और उनके अतिक्रमण, विकास योजनाओं और वित्तीय जानकारी को डिजिटल रूप से दर्ज किया जाएगा। यह पोर्टल अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय में वक्फ विभाग के संयुक्त सचिव के अधीन कार्य करेगा।
हर वक्फ संपत्ति को एक विशेष पहचान संख्या (ID) दी जाएगी जिससे उनकी निगरानी और भविष्य में निर्देश लेना आसान होगा। अब राज्य वक्फ बोर्डों की फाइलों में सीमित जानकारी की जगह सारी जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर मौजूद रहेगी।
नियमों के अनुसार, हर राज्य सरकार को एक नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा जिसकी रैंक कम से कम संयुक्त सचिव के बराबर हो। साथ ही, एक केंद्रीय सहायता इकाई बनाई जाएगी जो वक्फ की जानकारी, पंजीकरण, अकाउंट मैन्ट्नन्स, ऑडिट और अन्य कार्यों को सुचारू रूप से कराने में मदद करेगी।
सभी मुतवल्लियों (वक्फ संपत्तियों के प्रबंधकों) को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा। उन्हें मोबाइल और ईमेल के जरिए ओटीपी द्वारा प्रमाणित किया जाएगा। इसके बाद वों सभी अपनी वक्फ संपत्तियों की जानकारी पोर्टल पर दर्ज करा सकेंगे और नियमित वित्तीय व प्रशासनिक रिपोर्ट वक्फ बोर्ड को देनी होगी।
नए नियमों में वक्फ संपत्तियों का समय पर पंजीकरण, जियो टैगिंग और डिजिटल मैपिंग को अनिवार्य कर दिया गया है। इससे अपंजीकृत और सीमा-विवादित संपत्तियों की पहचान की जा सकेगी। हर वक्फ बोर्ड को समय-समय पर ऑडिट रिपोर्ट जमा करना होगा और देरी की स्थिति में कार्रवाई की जा सकती है।
एक तय किए गए प्रारूप में अकाउंट मैन्ट्नन्स की व्यवस्था की गई है जिससे पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित हो सके। अतिक्रमित वक्फ संपत्तियों की सूची अब सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाएगी जिसमें उनकी कानूनी स्थिति और पुनः प्राप्ति की जानकारी भी होगी।
इससे वक्फ बोर्डों पर दबाव रहेगा कि वे समय पर कार्रवाई करें और अतिक्रमण पर सख्ती दिखाएँ। यह व्यवस्था आम जनता को सूचनाएँ उपलब्ध कराने का काम भी करेगी। इसके अलावा, विधवाओं, तलाकशुदा महिलाओं और अनाथों को वक्फ से सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। अकाउंटिंग, ऑडिट, रजिस्टर संधारण आदि के तरीके भी नियमों में शामिल किए गए हैं।
सरकार का कहना है कि यह पहल वक्फ संपत्तियों की गड़बड़ियों, अतिक्रमण और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जरूरी थी, जिसे कई बार संसद और ऑडिट रिपोर्टों में उजागर किया गया था।
हालाँकि वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिनमें वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं समेत कई याचिकाकर्ताओं ने इसकी वैधता पर सवाल उठाए हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा है।
यह विषय आगामी मानसून सत्र में संसद में भी चर्चा का केंद्र रह सकता है। सरकार का कहना है कि ये नियम मजहबी और सामाजिक संपत्तियों को समाज के ज़रूरतमंद तबकों के हित में उपयोग में लाने की दिशा में एक अहम और निर्णायक पहल हैं।
पिछले छह साल यानी 2019 से चुनाव नहीं लड़ने वाले राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किया है। आयोग ने ऐसे सभी पार्टियों को सूची से हटाने के संबंधित राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश दिए हैं। फिलहाल इन पार्टियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया है। सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग अपना फैसला लेगा कि इन पार्टियों को सूची से बाहर करना है या नहीं।
छत्तीसगढ में ऐसी 9 पार्टियाँ हैं जिन्हें नोटिस थमाया गया है।
छत्तीसगढ़ एकता पार्टी
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा
छत्तीसगढ़ समाजवादी पार्टी
छत्तीसगढ़ संयुक्त जातीय पार्टी
छत्तीसगढ़ विकास पार्टी
पृथक बस्तर राज्य पार्टी
राष्ट्रीय आदिवासी बहुजन पार्टी
राष्ट्रीय मानव एकता कांग्रेस पार्टी
राष्ट्रीय समाजवादी स्वाभिमान मंच
राजस्थान की बात करें तो यहाँ भी ऐसी 9 पार्टियाँ हैं। इनमें पूर्व बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी की पार्टी का नाम भी शामिल है।
राजस्थान की 9 पार्टियाँ
राजस्थान जनता पार्टी
राष्ट्रीय जनसागर पार्टी
खुशहाल किसान पार्टी
भारत वाहिनी पार्टी
भारतीय जन हितकारी पार्टी
नेशनल जनसत्ता पार्टी
नेशनल पीपुल्स फ्रंट
स्वच्छ भारत पार्टी
महाराणा क्रांति पार्टी
दरअसल ये पार्टियाँ चुनाव के समय राजनीतिक फायदे के लिए पेपर पर बनाई जाती हैं। पार्टी बनने पर सरकार से वित्तीय मदद और दूसरी सुविधाओं का लाभ उठा लिया जाता है और धरातल पर इसका वजूद नहीं होता।
भारत में रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1951 की धारा 29A के तहत राजनीतिक पार्टियों का रजिस्ट्रेशन चुनाव आयोग करता है। इसमें टैक्स में छूट का भी फायदा मिलता है। चुनाव चिन्ह मिलने और राजनीतिक फायदा उठाने के लिए पार्टियाँ माध्यम बन जाती हैं।
15 दिनों की मोहलत
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इन पार्टियों को 15 दिन में आयोग के ऑफिस आकर जवाब देने के लिए कहा है। पार्टियों के अध्यक्ष, महासचिव या पार्टी प्रमुख जो भी चाहे आयोग आकर जवाब दे सकते हैं। इसमें ये बताना होगा कि 2019 के बाद 6 साल तक इनलोगों ने किसी भी चुनाव में हिस्सा क्यों नहीं लिया? और अब तक धरातल पर क्या-क्या किया है या इनकी गतिविधि चल रही है या नहीं।
नोटिस में ये भी कहा गया है कि यदि वक्त रहते इन पार्टियों के नुमाइंदे आयोग के सामने प्रस्तुत होकर जवाब नहीं दिया तो आयोग इन पार्टियों को निष्क्रिय मानते हुए पार्टियों की सूची से हटा सकता है।
क्यों छीनी जाती है पार्टियों की मान्यता ?
पार्टियाँ अगर चुनाव आयोग द्वारा तय वोट प्रतिशत से कम वोट पाती हैं तो मान्यता छिन जाती है।
चुनाव आयोग के नियम और संविधान का उल्लंघन करने पर पार्टियों की मान्यता जा सकती है।
चुनाव आयोग समय-समय पर समीक्षा करता है कि पार्टियाँ धरातल पर एक्टिव हैं या नहीं।
अगर कोई राजनीतिक दल टूट जाता है और उसका वजूद नहीं बचता तो पार्टी की मान्यता खत्म हो जाती है।
अगर पार्टी का रजिस्ट्रेशन गलत तरीके से किया गया हो, तो मान्यता रद्द हो सकती है
भारतीय सेना के डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर बड़ा खुलासा किया है। दिल्ली में FICCI के ‘न्यू एज मिलिट्री टेक्नोलॉजीज’ कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि मई 2025 में हुए इस ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान को चीन से भारतीय सेना की गतिविधियों की लाइव जानकारी मिल रही थी।
जनरल सिंह ने कहा, “भारत और पाकिस्तान के बीच DGMO स्तर की बातचीत चल रही थी, तब पाकिस्तान को चीन हमारे सैन्य ठिकानों की लाइव अपडेट्स दे रहा था। जनरल सिंह ने कहा कि भारत को एक साथ तीन दुश्मनों पाकिस्तान, चीन और तुर्की का सामना करना पड़ा।” उन्होंने कहा, “एक बात जो चीन ने शायद देखी है वो ये कि वो अपने हथियारों को अलग-अलग सिस्टम्स के खिलाफ आजमा सकता है। जैसे एक तरह की ‘लाइव लैब’ उसे मिल गई हो।”
जनरल राहुल सिंह ने बताया कि पिछले पाँच सालों में पाकिस्तान के 81% हथियार चीन से आए हैं। चीन ने पाकिस्तान को एक लाइव लैब की तरह इस्तेमाल किया, जहाँ वह अपने हथियारों को दूसरे हथियारों के खिलाफ टेस्ट कर रहा था। तुर्की ने भी पाकिस्तान को खुफिया जानकारी और राजनीतिक समर्थन देकर उसका साथ दिया। उन्होंने कहा कि जंग एक बॉर्डर पर हो रही थी लेकिन विरोधी तीन थे। वैसे, आपको बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सभी चीनी हथियार फुस्स साबित हुए।
#WATCH | Delhi: At the event 'New Age Military Technologies' organised by FICCI, Deputy Chief of Army Staff (Capability Development & Sustenance), Lt Gen Rahul R Singh says, "Air defence and how it panned out during the entire operation was important… This time, our population… pic.twitter.com/uF2uXo7yJm
जनरल सिंह ने कहा कि हमारे कुछ स्वदेशी हथियारों ने शानदार काम किया, लेकिन कुछ ने निराश किया। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसे खतरों से निपटने के लिए मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत है।
डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने कहा, “हमारे पास इजरायल जैसा आयरन डोम नहीं है। हमारा देश बहुत बड़ा है और ऐसी तकनीक में भारी खर्चा आता है।” फिर भी भारतीय सेना ने पाकिस्तान के हमलों को नाकाम कर दिया। ऑपरेशन के चार दिन बाद 10 मई को भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर हुआ। जनरल सिंह ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर पर भी जोर दिया और कहा कि हमें अपने सिस्टम को और मजबूत करना होगा। इस ऑपरेशन से भारत को कई सबक मिले हैं।
बता दें कि ये सब 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुआ, जिसमें 26 लोग मारे गए, जिनमें पर्यटक और स्थानीय लोग शामिल थे। इसके जवाब में भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन में भारतीय सेना ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-ऑक्यूपाइड कश्मीर (PoK) में नौ आतंकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से सटीक हमले किए। जवाब में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर और पंजाब में ड्रोन हमले किए खासकर पुंछ और राजौरी में, जहाँ कई नागरिकों की जान गई।
भारतीयों की पहचान उनकी मेहनत, सफलता और हर मुसीबत से लड़ने की कर्मठता के लिए जानी जाती है। ये अपनी संस्कृति के साथ हर नई जगह में घुलमिल जाते हैं। यही वजह है कि भारतीय सदियों से दुनिया भर में प्रवास करते रहे हैं। भारतीयों की कार्यकुशलता, शिक्षा और उद्यमशीलता का लोहा आज दुनिया मान रही है।
एक समय ऐसा भी था जब उन्हें जबरन दूसरे देशों में मजदूरी के लिए ले जाया जाता था। धीरे-धीरे गुलाम जैसी जिंदगी से आगे बढ़े और जहाँ बसे वहाँ की पहचान बन गए। पराधीनता, दर्द और पीड़ा से मुक्त होकर अपना नाम कमाया।
पीएम मोदी ने भारतीय समुदाय की प्रशंसा की
वेनेजुएला के पास एक छोटे सा द्वीप है जिसे त्रिनिदाद और टोबैगो के नाम से जाना जाता है। इसका इतिहास भारत से जुड़ा हुआ है क्योंकि भारतीय यहाँ भी ले जाकर बसाए गए थे।
5 देशों के दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब त्रिनिदाद और टोबैगो पहुँचे तो उसका जमकर स्वागत किया गया। कोवा में नेशनल साइक्लिंग वेलोड्रोम में एक कार्यक्रम में पीएम मोदी ने कहा, “मैं जानता हूँ कि त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय समुदाय की मौजूदगी उनके साहस और कार्यकुशलता के बारे में बताता है,”
फोटो साभार-Focus2Move
भगवान राम के जयकारे सुनकर पीएम मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने कहा, “मैं भी इसी तरह की भक्ति भावना के साथ कुछ लेकर आया हूँ। अयोध्या में स्थित राम मंदिर की प्रतिकृति और सरयू नदी का कुछ जल”
पीएम ने कहा, “हम अपने प्रवासी समुदाय की ताकत और समर्थन को बहुत महत्व देते हैं। दुनिया भर में फैले 35 मिलियन से अधिक लोगों के साथ, भारतीय प्रवासी हमारा गौरव हैं। जैसा कि मैंने अक्सर कहा है, आप में से प्रत्येक एक राष्ट्रदूत है, भारत के मूल्यों, संस्कृति और विरासत का एक राजदूत है।” उन्होंने वैश्विक स्तर पर भारतीय समुदाय के योगदान की चर्चा की
19वीं शताब्दी से है रिश्ता हमारा
19वीं शताब्दी में भारत के लोगों को मजदूरी करने के लिए अंग्रेजों ने अपने उपनिवेशों में भेजा। कम मजदूरी और दयनीय हालत के बावजूद भारतीय मजदूर बड़ी संख्या में अनुबंध समाप्त होने के बाद वहीं रह गए।
इसकी शुरुआत 1834 में मॉरीशस से हुई। 87 साल की औपनिवेशिक अनुबंध के तहत 1.5 मिलियन से ज्यादा भारतीय दूसरे देशों में बंधुआ मजदूरों के रूप में लाए गए। अनुबंध समाप्त होने के बाद इनमें से कई अप्रवासियों ने विदेशी धरती पर ही रहने का फैसला किया। इन लोगों ने समृद्ध बस्तियाँ बनाईं और अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाया।
पीएम मोदी ने इसको याद करते हुए कहा, “आपके पूर्वजों ने जिन परिस्थितियों का सामना किया, वो मजबूत इरादे वाले लोगों को भी तोड़ सकती थी। लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी और समस्याओं का डटकर सामना किया। पूर्वजों ने गंगा और यमुना को पीछे छोड़ दिया, लेकिन अपने दिलों में रामायण को बसाए रखा। उन्होंने अपनी मिट्टी छोड़ी, लेकिन अपनी आत्मा नहीं।”
Splendid atmosphere at the community programme in Trinidad & Tobago. https://t.co/qlW5JqaCCl
प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासियों को “एक शाश्वत सभ्यता के संदेशवाहक” के रूप में भी याद किया। प्रवासियों के योगदान से देश को सांस्कृतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक फायदा हुआ। इस खूबसूरत देश पर आप का प्रभाव दिख रहा है।”
उल्लेखनीय है कि त्रिनिदाद और टोबैको की पहली महिला और वर्तमान प्रधानमंत्री कमला सुशीला प्रसाद-बिसेसर एक हिंदू हैं। उनकी विरासत दक्षिण भारत और उत्तर भारत दोनों से मिलती है। उनके पूर्वज भारतीय अनुबंध प्रणाली के तहत त्रिनिदाद और टोबैको आए और यहीं बस गए।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत में लोग प्रधानमंत्री कमला को बिहार की बेटी मानते हैं। उनकी तरह यहाँ भी ऐसे कई लोग हैं जिनकी जड़ें बिहार में हैं। बिहार की विरासत हम सभी के लिए गर्व की बात है।” दुनिया के महान प्रवासी भारतीयों की शानदार उपलब्धियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कई प्रतिष्ठित हस्तियों का नाम भी लिया।
पीएम ने कहा, “आप, गिरमिटिया (ब्रिटिश भारत से आए गिरमिटिया मजदूर) के बच्चे हैं लेकिन अब उन संघर्ष से आगे अपनी सफलताओं के लिए जाने जाते हैं।” कैरेबियाई राष्ट्र के क्रिकेट के प्रति दीवानगी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “25 साल पहले जब मैं यहाँ आया था, तो हम सभी ब्रायन लारा के कवर ड्राइव और पुल शॉट से मंत्रमुग्ध हो गए थे। फिलहाल सुनील नरेन और निकोलस पूरन हमारे युवाओं के दिलों में बसते हैं। पिछले कुछ सालों में हमारी दोस्ती और गहरी हुई है।”
दोनों देशों के बीच गहरे और ऐतिहासिक संबंधों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “बनारस, पटना, कोलकाता, दिल्ली भारत के शहर हो सकते हैं, लेकिन वे यहाँ की सड़कों के नाम भी हैं। नवरात्रि, महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी यहाँ दोगुने उत्साह और गर्व के साथ मनाई जाती है।”
उन्होंने भगवान राम का भी जिक्र किया और भारतीय समुदाय की भगवान राम में गहरी आस्था के बारे में बताया। उन्होंने कहा, “मुझे यकीन है कि आप सभी ने 500 साल बाद अयोध्या में राम लला की वापसी का बहुत उत्साह के साथ स्वागत किया होगा। हमें याद है कि आपने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पवित्र जल और शिलाएं भेजी थीं।”
यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने 1998 में दास व्यापार और उन्मूलन को याद करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस की स्थापना की ।
कौन हैं गिरमिटिया?
1833 में ब्रिटिश साम्राज्य, 1848 में फ्रांसीसी उपनिवेशों और 1863 में डच साम्राज्य में दास प्रथा का अंत हो गया। ब्रिटेन में भारतीयों की गिरमिटिया दासता 1920 के दशक तक जारी रही। इससे इंडो-साउथ अफ़्रीकी, इंडो-कैरिबियन, इंडो-मॉरीशस और इंडो-फिजियन समुदायों का विकास हुआ।
दरअसल दास प्रथा खत्म होने के बाद काम करवाने के लिए अंग्रेजी साम्राज्य को मजदूरों की जरूरत पड़ी। तब भारत से 5 साल के अनुबंध पर इन मजदूरों को 1834 के दशक में अमेरिका, अफ्रीका और यूरोप भेजा गया। 5 साल बीत जाने के बाद आने के पैसे नहीं थे इसलिए ज्यादातर लोग यहाँ बस गए और इन्हें गिरमिटिया कहा गया।
भारत से बाहर भेजे गए मजदूरों के लिए गिरमिटिया शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले अंग्रेजों ने ही किया। जब मजदूरों को अनुबंध के तहत भेजा जाता था तो उसे गिरमिटिया कहा जाता था। गिरमिटिया की पूरी कहानी ब्रिटिश उपनिवेशवाद से जुड़ी हुई है। दरअसल ब्रिटिश साम्राज्य को स्थापित करने और उसे मजबूत बनाने के लिए सस्ते और मेहनतकश लोगों की जरूरत थी। उस वक्त ब्रिटिश शासन ने भारतीय किसानों पर भारी टैक्स लगा दिया था और कर्ज के चंगुल में किसान लगातार फँसते जा रहे थे। ऐसे में गिरमिटिया बनकर बड़ी संख्या में लोगों ने पलायन किया।
त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय प्रवासियों का संक्षिप्त इतिहास
1498 में क्रिस्टोफर कोलंबस के त्रिनिदाद और टोबैगो के समुद्र तट पर कदम रखा। इससे पहले इस द्वीप को कोई नहीं जानता था। बाद में जब इस द्वीप का दुनिया से सामना हुआ तो यहाँ के लोगों को दास के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया गया। स्पेनिश साम्राज्य में 1796 तक त्रिनिदाद शामिल था।
1802 में इस क्षेत्र को ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया और ये द्वीप ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा बन गया। अंग्रेजी निवेशक त्रिनिदाद के चीनी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहते थे। अंग्रेजी कंपनियों को इससे जबरदस्त फायदा हो रहा था। द्वीप के चीनी और कोको बागानों में काम करने के लिए अफ्रीकी देशों से मजदूरों को दास के रूप में लाया गया था।
1838 में ब्रिटिश संसद के दास प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया। इसका असर त्रिनिदाद पर पड़ा। यहाँ की कृषि अर्थव्यवस्था तब ढहने के कगार पर पहुँच गई थी। यहाँ अफ्रीकी लोगों ने खेतों, बागानों में काम करने से इनकार कर दिया।
चीनी और चॉकलेट उद्योगों ने खुद को पूरी तरह से ढहने से बचाने के लिए नए मजदूरों को लाना शुरू किया। इस वक्त चीनी, पुर्तगाली, अफ्रीकी-अमेरिकी और सबसे ज्यादा भारतीय मजदूरों को यहाँ लाया गया। भारतीय सबसे मेहनती और तैयार मजदूर माने जाते थे और कथित तौर पर इन्हें ‘मूल्यवान स्थिर मजदूर’ कहा जाता था।
इसलिए भारतीय मजदूरों की माँग यहाँ ज्यादा थी और किसी भी अन्य राष्ट्र से अधिक संख्या में इन्हें काम पर रखा गया था। 1891 तक इन द्वीपों में 45,800 से अधिक भारतीय रह रहे थे। 1917 में ब्रिटिश सरकार ने गिरमिटिया व्यवस्था को खत्म कर दिया।
सच में, दास व्यापार का उन्मूलन केवल एक दिखावा था, क्योंकि उपनिवेशों में गिरमिटिया व्यवस्था उससे कम अमानवीय नहीं था। भारतीयों को केवल ब्रिटिश हितों के लिए हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर को पार करके हजारों किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए मजबूर किया गया।
भारतीय मजदूरों की जिंदगी
217 भारतीय मजदूरों को लेकर पहला जहाज 1845 में त्रिनिदाद के पोर्ट-ऑफ-स्पेन पहुँचा। त्रिनिदाद में अधिकांश भारतीय कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) के बंदरगाहों से आए थे। इनमें ज्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के लोग शामिल थे। इसके बाद 1845 और 1917 के बीच जहाजों में भरकर हजारों भारतीयों को कैरीबियाई देशों में ले जाया गया।
यात्रा के दौरान मुश्किलों के बाद जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो परिस्थितियाँ काफी मुश्किलभरी थी। भारतीयों को दुर्व्यवहार, घटिया भोजन और मौसम की मार का सामना करना पड़ा।
प्रसिद्ध बारबेडियन उपन्यासकार जॉर्ज लैमिंग ने कहा, “त्रिनिदाद और गुयाना का ऐसा कोई इतिहास नहीं हो सकता जो भारतीय मजदूरों की मेहनत से परे हो।”
बाद में परिस्थितियाँ बदली। यहां एक कानून बनाया गया जिसके तहत मज़दूरों को जमीन दी गई। कई भारतीय मजदूरों ने इसे मान लिया और वहीं के होकर रह गए। 1960 के दशक तक बड़ी संख्या में त्रिनिदाद में बसे भारतीय ईसाई मिशनरियों के चंगुल में फँस गए और वहाँ बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ। इनमें से ज्यादातर निरक्षर और गरीब थे।
20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय यहाँ के व्यापार और राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने एकजुट होकर राजनीतिक संगठन बनाए। धीरे-धीरे यहाँ की राजनीति पर इनकी पकड़ मजबूत होती चली गई।
निष्कर्ष
30 मई को मनाया जाने वाला भारतीय प्रवासी दिवस उन पहले भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को याद करता है, जो मई 1845 में फेटेल रजाक जहाज पर सवार होकर त्रिनिदाद पहुंचे थे,। हालाँकि वे अपनी मर्जी से नहीं गए थे, बल्कि बिना किसी विकल्प के इस यात्रा पर निकलने के लिए मजबूर थे। धीरे- धीरे इन लोगों ने विदेशी भूमि को अपने घर के रूप में अपनाया और इसे भारत के रंगों और परंपराओं से समृद्ध किया।
जैसा कि पीएम मोदी ने कहा कि गिरमिटिया के बच्चों ने वास्तव में इतिहास रच दिया है। उन्होंने दिखाया कि उनकी ताकत, मेहनत और जीवन जीने का दृढ़ संकल्प ब्रिटिश उत्पीड़न और अत्याचारों के कहीं ऊपर था। स्थिति अब बदल गई है। कई देशों की तरह त्रिनिदाद और टोबैगो में ये लोग प्रमुख पदों पर पहुँच गए हैं और देश की उपलब्धियों में अपना अहम योगदान दे रहे हैं।