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अमेरिका-इजरायल ही नहीं और भी देशों की है ईरान में सत्ता-परिवर्तन की चाहत: जानिए – सुप्रीम लीडर खामेनेई की जगह लेने को कौन से लोग और संगठन हैं आतुर, वो कितने मजबूत

‘मेक ईरान ग्रेट अगेन’ ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ये बयान दिया था। दरअसल अमेरिका ऐसा कह कर ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना तलाश रहा है।

अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा, “सत्ता परिवर्तन शब्द का उपयोग करना राजनीतिक रूप से सही नहीं है, लेकिन अगर वर्तमान शासन ईरान को फिर से महान बनाने में समर्थ नहीं है, तो सत्ता परिवर्तन क्यों नहीं होगा?? MIGA (Make Iran Great Again)!”

अमेरिका ने ईरान में सुप्रीम लीडर खामेनेई को सत्ता से हटाने की कई बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोशिश की है। लेकिन मुस्लिम शिया धर्म के सुप्रीम लीडर खामेनेई को हटाना संभव नहीं हो सका। इस वक्त भी ईरान में सत्ता परिवर्तन की माँग उठ रही है। खुद खामेनेई के परिवार से इसकी माँग उठने लगी है।

कौन हैं महमूद मोरदखानी

महमूद मोरादखानी ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के भतीजे हैं। वह 1986 में ईरान छोड़कर फ्रांस चले गए थे और निर्वासन की जिंदगी जी रहे हैं। महमूद मोरदखानी ने कहा है कि वह युद्ध के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन ईरानी सरकार का खात्मा ही यहाँ स्थायी शांति के लिए जरूरी है।

उन्होंने कहा, ” जो भी इस शासन को मिटा सके, वह जरूरी है।” उनका मानना है कि कई ईरानी लोग खामेनेई के कमजोर होने से ईरान में खुश हैं।

कौन हैं रजा पहलवी

ईरान के पूर्व शहजादे रजा पहलवी ने भी शासन में बदलाव पर जोर दिया है। उनका कहना है कि तेहरान में सत्ता पतन जरूरी है।

रजा पहलवी ईरान के अंतिम पहलवी शासक मोहम्मद शाह पहलवी के बड़े बेटे हैं। उनका परिवार अमेरिका में निर्वासन की जिंदगी गुजार रहा है। 1979 में देश छोड़कर भागे पूर्व शाह के बेटे रजा पहलवी इस वक्त काफी सक्रिय हैं।

रजा अमेरिका में रहते हैं और खुद को ईरान के शासक के रूप में देखना चाहते हैं। 2016 में पहली बार जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने थे तो शाह ने ईरान में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने और लोकतंत्र की बहाली की वकालत की थी।

इसके बाद फिर जब ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने तो पहलवी ने ईरान में लोकतंत्र की वकालत करते हुए पश्चिमी राष्ट्रों से उसके संबंध सुधारने पर जोर दिया था। अब जब इजरायल ने ईरान पर हमला किया तो वह इजरायल का पक्ष लेते हुए नजर आए। उन्होंने कहा कि ईरान में अभी कई ऐसे लोग हैं जो इजरायल के इस कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं और खामनेई को सत्ताच्युत करना चाहते हैं।

माना जा रहा है कि अब राष्ट्रपति ट्रंप ईरान में सत्ता परिवर्तन में रजा पहलवी को समर्थन दे सकते हैं और ईरान में लोकतंत्र की स्थापना की पहल कर सकते हैं। हालाँकि खामनेई ने अपने विकल्प के तौर पर तीन उत्तराधिकारियों को चुन लिया है। ये तीनों ही मौलवी हैं यानी ईरान को इस्लामिक राष्ट्र बनाए रखने की व्यवस्था खामेनेई ने कर दी है।

खामेनेई के खिलाफ सड़कों पर उतरे कई संगठन

ईरान में अभी कई संगठन एक्टिव हैं जो चाहते हैं कि सत्ता परिवर्तन हो। इनमें पीपुल्स मुजाहिदीन या मोजाहिदीन ए खल्क यानी एमईके, ग्रीन मूवमेंट प्रमुख हैं। एमईके ऐसा संगठन है जिसे गोरिल्ला युद्ध लड़ने में महारत हासिल है। लेकिन अमेरिका इसे नहीं पसंद करता क्योंकि ये संगठन रूस के नजदीक रहा है। अमेरिका विरोध के बावजूद खामेनेई को उखाड़ फेंकने की कोशिश में ये संगठन लगा हुआ है।

दरअसल खामेनेई ने ही इस संगठन को कुचला था। धीरे-धीरे खुद को खड़ा करने के दौरान संगठन अमेरिका के संपर्क में भी आ गया। इस दल के नेता को अल्बानिया में स्थापित करने में अमेरिका ने अहम भूमिका निभाई। हालाँकि आज की तारीख में ये कहना काफी मुश्किल है कि संगठन ईरान की इस्लामिक सत्ता को उखाड़ फेंकने में सक्षम है।

ग्रीन मूवमेंट ईरान में 2009 में सुर्खियों में आया। राष्ट्रपति चुनाव में धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए संगठन ने आंदोलन चलाया। देश में लोकतांत्रिक सुधारों की बात करने वाला ये संगठन खामेनेई को सत्ता से हटाना चाहता है और अक्सर विरोध प्रदर्शन करता रहता है।

इस संगठन ने 2010 में बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। इस्लामिक राष्ट्र का विरोध करने के कारण इसके आंदोलन को दबा दिया गया और इसके नेताओं को गिरफ्तार किया गया। आज की परिस्थिति में ये उम्मीद करना मुश्किल है कि ये संगठन ईरान में इस्लामिक सत्ता को हटा सकता है।

खामेनेई के विरोध में महिलाएँ

ईरान में इस्लामिक शासन के दौरान वर्षों से महिलाओं का दमन किया जाता रहा है। हिजाब के खिलाफ महिलाएँ सड़कों पर उतरती रही हैं और सरेआम इसे उतार कर फेंकती रही हैं। विरोध प्रदर्शन में हिजाब जलाना, खामेनेई की तस्वीर जलाकर ‘मुल्ला भाग जाओ’ का नारा बुलंद करना आम रहा है। अब इन महिलाओं को खामेनेई को सत्ता से हटाने का विकल्प सामने दिखने लगा है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस का बयान

इधर अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान में सत्ता परिवर्तन पर बड़ा बयान दिया। उनका कहना है कि वो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना चाहते हैं। वे सत्ता परिवर्तन नहीं चाहते।

अमेरिका और इजरायल के अलावा भी कई देश हैं जो खामेनेई को सत्ता से बेदखल होते हुए देखना चाहते हैं। इनमें इराक, सऊदी अरब, लेबनान, मिस्र जैसे पड़ोसी इस्लामिक देश भी शामिल हैं। दरअसल इन राष्ट्रों का झगड़ा शिया-सुन्नी को लेकर है। ईरान एकमात्र शिया इस्लामिक देश है, जबकि बाकी देश सुन्नी इस्लामिक राष्ट्र हैं।

लाउडस्पीकर-माइक लगाओ या नहीं लगाओ, अनुमति लिए बिना घर को नहीं बना सकते ‘प्रार्थना स्थल’: पादरी की याचिका HC ने की खारिज, जानिए क्यों दोहराया अपना पुराना फैसला

मद्रास हाई कोर्ट ने फिर साफ कर दिया कि बिना सरकार की इजाजत कोई भी घर प्रार्थना सभा का अड्डा नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि आप की प्रार्थना सभा से शोर हो या ना हो, किसी को कोई समस्या हो ना हो लेकिन बिना अनुमति लिए किसी भी घर को प्रार्थना सभा नहीं बनाया जा सकता है। तिरुवर जिले के पादरी एल जोसेफ विल्सन के मामले में कोर्ट ने ये फैसला सुनाया।

क्या है नया मामला

तिरुवर जिले के कोडावसल के पादरी एल जोसेफ विल्सन के घर को उनके क्षेत्र के जिला कलेक्टर ने साल 2024 में सील करने और वहाँ प्रार्थना सभाएँ आयोजित ना करने का आदेश दिया था। जिसके बाद विल्सन ने मद्रास हाई कोर्ट का सहारा लिया और कोर्ट से इस आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया था।

विल्सन ने अपनी याचिका में कहा था कि वह ‘वर्ड ऑफ गॉड मिनिस्ट्रीज ट्रस्ट’ के नाम से एक ट्रस्ट चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि 2023 में एक संपत्ति खरीदी थी तब से नियमित तौर पर उसमें प्रार्थना सभाएँ आयोजित की जाती हैं। हालाँकि विल्सन ने घर में चर्च के निर्माण के लिए परमिशन और प्लान अप्रूवल के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था, लेकिन जिला कलेक्टर ने इसे खारिज कर दिया था।

कुछ दिनों बाद तहसीलदार ने एक नोटिस जारी कर विल्सन को 10 दिनों में प्रार्थना कक्ष बंद करने को कहा। जब विल्सन ने इसे रद्द करने की अपील की तो कलेक्टर ने कोर्ट में दलील दी कि विल्सन बिना अनुमति के प्रार्थना कक्ष नहीं चला सकते हैं। उन्होंने कहा कि उनके प्रार्थना सभा के समय होने वाले शोर और लोगों के जमा होने से आस-पास के लोगों को परेशानी हो रही है।

मामले में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने कहा, “याचिकाकर्ता की ओर से जारी हलफनामे में उसने भरोसा दिया है कि वह लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन का उपयोग किए बिना शांतिपूर्ण तरीके से घर में प्रार्थना करेगा। लेकिन लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन का उपयोग न करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। मुद्दे की जड़ यह है कि याचिकाकर्ता प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए घर को प्रार्थना कक्ष में नहीं बदल सकता।”

कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट रुप से कहा है कि किसी हॉल में प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए संबंधित नियमों के तहत संबंधित प्राधिकरण से अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए, याचिकाकर्ता अधिकार के तौर पर बिना अनुमति के प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए प्रार्थना हॉल नहीं रख सकता।

पुराने मामले में कन्याकुमारी के जिला कलेक्टर ने टी विल्सन नाम के एक शख्स के खिलाफ एक याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि वह बिना किसी अनुमति के लोगों की भीड़ जमाकर प्रार्थना सभा कर रहें हैं। उनका कहना था कि विल्सन के घर में नियमित तौर पर सुबह के 9 बजे से दोपहर के 12 बजे तक क्रिश्चियन रिलीजियस ट्रस्ट की ओर से प्रार्थना सभा का आयोजन होता था। इस दौरान स्पीकर और माइक्रोफोन का भी इस्तेमाल होता था। इससे आस-पास के लोगों को भी दिक्कत होती है।

इस पर टी विल्सन ने भी खुद को बचाते हुए एक याचिका दायर की थी और कहा था कि सांप्रदायिक सद्भावना को ठेस पहुँचाते हुए उनकी निजी प्रार्थना को लेकर झूठी शिकायत की गई है। हालाँकि जिला कलेक्टर ने अदालत के सामने फोटोग्राफ्स और अन्य सबूत पेश किए, जिसमें इकट्ठा हुई भीड़ देखी जा सकती थी और स्पीकर भी चलता दिख रहा था।

इसके बाद मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच के जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने 29 अप्रैल 2021 को टी विल्सन की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि इस तरह की सार्वजनिक प्रार्थना के लिए याचिकाकर्ता को तमिलनाडु पंचायत भवन नियमावली, 1997 के नियम 4 (3) के तहत जिला कलेक्टर से अनुमति लेनी चाहिए थी।

देखा जाए तो किसी को भी इस तरह घर को प्रार्थना सभा बनाने की अनुमति होनी भी नही चाहिए। हाल के ही दिनों में कई ऐसे मामले देखने को मिले हैं, जहाँ घर के अंदर ईसाइयों की प्रार्थना सभा होती है। इतना ही नहीं, कई मामले ऐसे भी रहें हैं, जिसके तहत प्रार्थना सभा के नाम पर ईसाइयों के अलावा हिंदू धर्म के लोगों को आमंत्रित किया जाता है और फिर उनका धर्म परिवर्तन करा दिया जाता है। ऐसे में यह फैसला आवश्यक भी था ताकि कम से कम यह सरकार के संज्ञान में हो कि कौन से ऐसे घर हैं, जो बाहर से तो सामान्य घर ही लगते हैं, लेकिन अंदर का माहौल एक चर्च का है।

‘मेरे धर्म का अपमान न करें’: आंध्र प्रदेश के डिप्टी CM पवन कल्याण ने फर्जी सेकुलरों को दिखाया आईना, कहा- हिंदुओं के धैर्य को कमजोरी न समझें

आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने रविवार (22 जून 2025) को मदुरै में फर्जी सेकुलरों पर तीखा हमला किया। हिंदू मुन्नानी द्वारा आयोजित ‘मुरुगा भक्तरगल मानदु’ कार्यक्रम में बोलते हुए पवन कल्याण ने कहा कि ये लोग ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की आड़ में हिंदू देवताओं और आस्थाओं को जानबूझकर निशाना बना रहे हैं।

मुख्य रूप से तमिल भाषा में दिए गए अपने भाषण में पवन कल्याण ने खुद को ‘कट्टर हिंदू’ बताया और कहा कि उन्हें अपने धर्म के लिए वही सम्मान चाहिए जो दूसरों को मिलता है।

पवन कल्याण ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए, लेकिन आज इसे केवल हिंदू धर्म को छोड़कर बाकी सभी की रक्षा के रूप में पेश किया जा रहा है।

भाजपा नेता के. अन्नामलाई और AIADMK के प्रतिनिधियों समेत कई बड़े नेता और बड़ी संख्या में भक्त इस कार्यक्रम में मौजूद थे। पवन कल्याण ने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की चीजों से हिंदू धर्म की जड़ों को नुकसान पहुँच रहा है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे शब्द कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक हथियार बन गए हैं।

उन्होंने कहा कि आजकल अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिंदू देवताओं को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है, जो एक गंभीर समस्या है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह चलन नहीं रुका, तो हमारे धर्म और आस्था को बचा पाना मुश्किल हो जाएगा।

पवन कल्याण ने यह भी साफ किया कि वह कट्टरपंथी नहीं हैं, बल्कि एक प्रतिबद्ध हिंदू हैं। उन्होंने कहा कि वह ईसाई और इस्लाम धर्म का भी सम्मान करते हैं और बस यही चाहते हैं कि उनके विश्वास का भी सम्मान किया जाए। उन्होंने भारत की ताकत को धर्म (या धार्मिक मूल्यों) में बताया और कहा कि तमिलनाडु में हिंदू सम्मेलनों पर उठाए जा रहे सवाल बहुत खतरनाक हैं और इससे समाज में बेवजह का विभाजन पैदा हो रहा है।

आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने मदुरै में हिंदू मुन्नानी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए धर्मनिरपेक्षता के दोहरे मापदंडों पर तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा, “ईसाई को ईसाई और मुसलमान को मुसलमान होने की आजादी है, लेकिन जब कोई हिंदू अपने धर्म की बात करता है, तो उसे सांप्रदायिक कह दिया जाता है। यही नकली धर्मनिरपेक्षता है।”

पवन कल्याण ने कहा कि हिंदुओं के धैर्य को उसकी कमजोरी न समझा जाए। उन्होंने कहा, “अगर आप मेरी आस्था का सम्मान नहीं कर सकते, तो कम से कम उसका अपमान भी न करें।” पारंपरिक मुरुगन भक्त की पोशाक में आए कल्याण ने कंद षष्ठी कवचम् जैसे पवित्र भजनों का मजाक उड़ाने पर दुख जताया और इसे गलत बताया। उन्होंने सभी से एकजुट होकर धर्म की रक्षा करने का आग्रह किया और विश्वास जताया कि बदलाव जरूर आएगा।

इस कार्यक्रम में भाजपा नेता के. अन्नामलाई ने कहा कि यह सम्मेलन राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सवाल उठाना और अधिकारों की माँग करना है। उन्होंने कहा, “हम किसी के दुश्मन नहीं हैं, हम बस अपने धर्म के लिए न्याय चाहते हैं।” कार्यक्रम का समापन कंद षष्ठी कवचम् के सामूहिक पाठ के साथ हुआ, जिससे इसकी भक्ति भावना और सांस्कृतिक एकता का संदेश सामने आया।

हमास के हमलों पर नहीं बोला… इजरायल ने सोनिया गाँधी को ‘ईरान प्रेम’ पर घेरा, कहा- उन्हें क्षेत्रीय हालात की जानकारी होनी चाहिए: जंग में भारत को झोंकना चाहती हैं कॉन्ग्रेस नेता

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने ईरान के पक्ष में जो लेख लिखा था, उसपर इजरायल के राजदूत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। लेख में सोनिया गाँधी ने कहा था कि इजराइल के खिलाफ भारत को ईरान का समर्थन करना चाहिए।

भारत में इजरायल के राजदूत रुवेन अजार ने कहा है कि सोनिया गाँधी को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन उन जैसे नेताओं को क्षेत्रीय (मध्यपूर्व) हालात की जानकारी होनी चाहिए। इस इलाके में तीन दशकों से चल रही ईरानी आक्रमकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा, “हमें यह देखकर निराशा हुई कि जिनका (सोनिया गाँधी) आपने जिक्र किया, उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 (हमास अटैक) के हमलों की उस तरह निंदा नहीं की, जैसे की जानी चाहिए थी। ईरान द्वारा पिछले तीन दशकों से की जा रही आक्रामकता को नजरअंदाज करना पूरी तरह अस्वीकार्य है।”

दरअसल सोनिया गाँधी ने एक अंग्रेजी अखबार को लिखे लेख में इजरायल के बीच चल रहे युद्ध में ईरान का पक्ष लेने की बात कही थी। उन्होंने मोदी सरकार को ‘जिम्मेदार और बुलंद आवाज में बोलने’ की नसीहत भी दी थी, साथ ही भारत की कथित चुप्पी को लेकर सवाल खड़े किए। सोनिया गाँधी ने कहा था कि ईरान भारत का मित्र रहा है जबकि इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध हालिया हैं।

उन्होंने मोदी सरकार पर स्वतंत्र फिलिस्तीन की कल्पना करने वाले दो राष्ट्रसिद्धांत के सिद्धांत को समर्थन करने वाली विदेश नीति को त्यागने का आरोप भी लगाया था। उन्होंने कहा कि इजरायल ने ईरान की संप्रभुत्ता का उल्लंघन किया है और एकतरफा कार्रवाई कर रहा है। इजरायल के पीएम नेतन्याहू पर उन्होंने लगातार शांति भंग करने और आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाया। वहीं ईरान के पक्ष में बोलते हुए उन्होने 1994 का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि “1994 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर मुद्दे पर प्रस्ताव रोकने में मदद की।”

दरअसल ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के रुख पर हमेशा गोलमोल रवैया अपनाया है। कई बार उसने सोशल मीडिया के माध्यम से गलत बयानबाजी की है। उसने कश्मीर में ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ के अधिकार का समर्थन किया है। इसके अलावा कई बार उसने भारत के मुस्लिम समुदाय का जिक्र करते हुए मोदी सरकार को कटघरे में खड़े किया था।

ऐसे में साफ है कि ईरान भारत का हमेशा से दोस्त नहीं रहा है। जबकि इजरायल ने लगातार पाकिस्तान के खिलाफ भारत का समर्थन देता आ रहा है चाहे वो सीमा पार आतंकवाद का मसला हो या पाकिस्तान में घुसकर बदला लेने की भारतीय कार्रवाई हो।

भारत हमेशा से शांति का समर्थक रहा है। चाहे यूक्रेन-रूस जंग हो या इजरायल-ईरान युद्ध। भारत ने शांति की बात की है। प्रधानमंत्री मोदी ने साइप्रस दौरे के दौरान भी दोहराया था कि जंग इस शताब्दी में समस्या का हल नहीं निकाल सकता। हर समस्या का समाधान शांति से ही हो सकता है।

पश्चिम बंगाल में रथ यात्रा पर नहीं लगेगा मेला, मुस्लिम बहुल मालदा में 629 साल पुरानी परंपरा पर ममता सरकार ने लगाई रोक: ‘हलाल प्रसाद’ के बाद हिंदू आस्था पर एक और चोट

पश्चिम बंगाल में इस बार के 629 साल पुरानी परंपरा रथ मेला के आयोजन की अनुमति ममता सरकार ने नहीं दी है। ये मेला हर साल मालदा जिले के जलालपुर कस्बे में आयोजित किया जाता है। ममता सरकार के फैसले से यहाँ रहने वाले हिंदुओं को बड़ा झटका लगा है।

मेला का आयोजन श्री महाप्रभु मंदिर के पास होता है, जो करीब एक हफ्ते तक चलता है। रथ यात्रा इसका हिस्सा होती है। पुलिस ने सिर्फ रथ यात्रा की अनुमति दी है, लेकिन मेले की मंजूरी नहीं दी। पुलिस का कहना है कि इससे इलाके में कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।

पुलिस का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में रथ यात्रा के दौरान असामाजिक तत्वों ने हत्या जैसी कई संगीन वारदातों को अंजाम दिया। इसलिए मेला को रोकने का फैसला स्थानीय प्रशासन ने टीएमसी सरकार के निर्देश पर लिया है। हिंदू समुदाय इस फैसले से नाराज है। यह सैकड़ों साल पुरानी परंपरा है, जो पहली बार ममता सरकार रोकने जा रही है।

629 साल पुराने रथ मेले को रोकने के फैसले से आयोजक भी हैरान हैं। उनका कहना है कि यह मेला सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि इलाके की अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत जरूरी है। इसमें हर जाति और धर्म के लोग शामिल होते हैं।

परिस्थितियों से मजबूर होकर आयोजकों ने अब जिला मजिस्ट्रेट (DM) और कोर्ट का रुख करने का फैसला किया है।  रथ यात्रा समिति के सचिव गौतम मंडल ने कहा, “यह मेला बाबर और मुगलों के आने से भी पहले से हो रहा है। इसे सिर्फ वोट बैंक की राजनीति के कारण रोका जा रहा है।”

टीएमसी के राज्य महासचिव कृष्णेंदु नारायण चौधरी ने पुलिस के फैसले को सही बताया और इसे कानून-व्यवस्था का मामला कहा। वहीं, स्थानीय बीजेपी नेता अजय गांगुली ने आरोप लगाया कि यह फैसला दिखाता है कि पुलिस ने लिया है लेकिन इसके पीछे टीएमसी सरकार है।

दीघा में जगन्नाथ मंदिर के लिए प्रसाद की आपूर्ति करने वाली मुसलमानों की ‘हलाल’ मिठाई की दुकानें

पश्चिम बंगाल के दीघा में हाल ही में बने जगन्नाथ मंदिर की प्रतिकृति को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। अप्रैल 2025 में उद्घाटन के बाद से यह मंदिर लगातार चर्चा में बना हुआ है। ताजा विवाद मंदिर में बाँटे जा रहे प्रसाद को लेकर है।

भाजपा ने ममता बनर्जी सरकार पर आरोप लगाया है कि मंदिर का प्रसाद तैयार करने का काम मुस्लिम दुकानदारों को दिया गया है। भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने मंगलवार (17 जून 2025) को एक्स पर एक पोस्ट में यह दावा किया।

उन्होंने एक सूची भी पोस्ट की, जिसमें उन दुकानों के नाम हैं जिनके मालिक मुसलमान बताए जा रहे हैं। मालवीय ने कहा कि ये दुकानें मंदिर में बाँटे जाने वाले गाजा और पेड़ा जैसी मिठाइयाँ बना रही हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जहाँ पुरी का असली जगन्नाथ मंदिर गैर-हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति नहीं देता, वहीं ममता सरकार मुसलमानों द्वारा बनाया गया प्रसाद बाँट कर मंदिर की पवित्रता का अपमान कर रही है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक गर्मी तेज हो गई है, और भाजपा इसे हिंदू भावनाओं से जुड़ा मामला बता रही है।

होर्मुज स्ट्रेट को ईरान ने किया ब्लॉक करने का फैसला, ठप पड़ जाएगी दुनिया भर में 20% कच्चे तेल की सप्लाई: अमेरिकी हमले के बाद ईरानी काउंसिल ने लिया फैसला

ईरान की संसद ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि अंतिम फैसला अब ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा लिया जाएगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब अमेरिका ने ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमला किया है।

इस घटना के बाद पश्चिम एशिया में तनाव काफी बढ़ गया है और दुनिया भर में तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। ईरान के विदेश मंत्री सईद अब्बास अरागची ने कहा है कि ‘ईरान के पास कई विकल्प उपलब्ध हैं।’ होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना इनमें से सबसे प्रभावशाली और खतरनाक विकल्प माना जा रहा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है, और यह दुनिया का सबसे अहम तेल व्यापार मार्ग है। इस संकीर्ण समुद्री रास्ते से सऊदी अरब, ईरान, यूएई जैसे देशों का तेल और गैस दुनियाभर में जाता है। इसकी चौड़ाई सबसे संकरे हिस्से में सिर्फ 33 किलोमीटर है, जिससे इसे रोकना या बाधित करना आसान हो जाता है।

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, 2024 में दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का 25% और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का लगभग 20% हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरा है। अगर ईरान इस जलमार्ग को बंद करता है तो इससे वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होगी और कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।

भारत पर क्या असर पड़ेगा?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और इसका एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। EIA की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल का 69% हिस्सा चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया को गया। अगर यह रास्ता बाधित होता है, तो भारत को तेल मिलना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन दाम जरूर बढ़ सकते हैं।

भारत रूस, अमेरिका और अफ्रीका जैसे विकल्पों से भी तेल खरीदता है, लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर पेट्रोल-डीजल से लेकर अन्य उत्पादों पर भी पड़ेगा। इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार ने तैयारी शुरू कर दी है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने कहा है कि भारत फारस की खाड़ी के बाहर से तेल मँगाने की योजना बना रहा है और रिफाइन्ड प्रोडक्टस (जैसे पेट्रोल-डीजल) के निर्यात में कटौती करेगा।

IIT गाँधीनगर में ‘वामपंथी प्रोफेसर’ का प्रोपेगेंडा जारी, RTI के भी नहीं दिए जा रहे सही जवाब: टैक्स पेयर्स के पैसों पर ‘पलने’ वालों में किसी को भगवान राम से दिक्कत, तो कोई उमर खालिद का हमदर्द

गुजरात के गाँधीनगर में स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT Gandhinagar) पिछले कुछ समय से लगातार विवादों के घेरे में है। पहले इसके ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस (HSS) विभाग में छात्रों द्वारा इस्लामिक विषयों पर रिसर्च को लेकर सवाल उठे थे। अब संस्थान के प्रोफेसरों की सोशल मीडिया गतिविधियाँ चर्चा का केंद्र बन गई हैं।

खास तौर पर मटेरियल साइंस विभाग के प्रोफेसर अमित अरोड़ा के कुछ पुराने और हाल के सोशल मीडिया पोस्ट वायरल हो गए हैं। इन पोस्ट्स में उन्होंने राम मंदिर, उमर खालिद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार की नीतियों पर टिप्पणियाँ की हैं, जो लोगों के गुस्से का कारण बनीं।

इन पोस्ट्स के वायरल होने और स्क्रीनशॉट्स के फैलने के बाद प्रोफेसर ने अपना सोशल मीडिया एकाउंट ही डिलीट कर दिया। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

राम मंदिर पर टिप्पणी और वामपंथी विचारधारा

27 मई, 2020 को प्रोफेसर अमित अरोड़ा ने तत्कालीन ट्विटर (अब X) पर एक पोस्ट की थी, जिसमें उन्होंने राम मंदिर को लेकर तंज कसा। यह वह समय था जब सुप्रीम कोर्ट का राम मंदिर पर फैसला कुछ महीने पहले आया था और राम मंदिर ट्रस्ट बनाने का काम चल रहा था। प्रोफेसर ने लिखा, “रामलला उस बच्चे में हैं, जो प्लेटफॉर्म पर पड़ी अपनी माँ के मृत शरीर को जगाने की कोशिश कर रहा है। जब तक ऐसा एक भी बच्चा है, रामलला आपके मंदिर में कभी नहीं आएँगे। जाओ, बना लो मंदिर।”

प्रोफेसर का ट्वीट

यह बयान एक खास तरह की विचारधारा को दर्शाता है, जिसे लोग वामपंथी मानसिकता कहते हैं। इस तरह की टिप्पणियों में सामाजिक या आर्थिक समस्याओं को हिंदू धर्म, मंदिर या भगवान से जोड़कर हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है। आलोचकों का कहना है कि ऐसी समस्याएँ किसी भी धर्म या समुदाय से जोड़ी जा सकती हैं, लेकिन आमतौर पर सिर्फ हिंदुओं को ही टारगेट किया जाता है। इस पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर खूब हंगामा हुआ और लोगों ने इसे हिंदू-विरोधी प्रचार का हिस्सा बताया।

‘भारत’ बनाम ‘इंडिया’ पर विवादास्पद बयान

1 अप्रैल, 2025 को एक वामपंथी सोशल मीडिया एकाउंट ने एक पोस्ट की, जिसमें ‘संघियों’ पर सवाल उठाया गया। पोस्ट में लिखा था कि कुछ लोग अचानक ‘इंडिया’ की जगह ‘भारत’ शब्द का इस्तेमाल क्यों बढ़ा रहे हैं? क्या वे ‘भारत को इंडिया का विकसित वर्जन’ साबित करके लोगों को बेवकूफ बनाना चाहते हैं? इस पोस्ट के जवाब में प्रोफेसर अमित अरोड़ा ने लिखा, “‘भारत’ असली धर्मनिरपेक्ष इंडिया का संघियों का ब्राह्मणवादी, दमनकारी और कट्टर धार्मिक वर्जन है।”

ट्वीट का स्क्रीनशॉट

इस बयान से उनकी विचारधारा और साफ हो गई। उन्होंने ‘भारत’ शब्द को नकारात्मक अर्थ में पेश किया और इसे ब्राह्मणवाद और धार्मिक कट्टरता से जोड़ा। इस पोस्ट ने भी सोशल मीडिया पर काफी विवाद खड़ा किया, क्योंकि लोगों ने इसे भारत की सांस्कृतिक पहचान पर हमला माना।

पीएम नरेंद्र मोदी पर लगातार कटाक्ष

प्रोफेसर अमित अरोड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कई बार तंज कसे हैं। जून 2024 में उन्होंने एक फोटो शेयर करके पीएम मोदी पर व्यंग्य किया। 2020 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के 2014 के एक पोस्टर की तस्वीर पोस्ट की, जिसमें लिखा था कि मोदी सरकार आने के बाद पेट्रोल और डीजल के दामों में राहत मिलेगी। इस पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा, “अब यहाँ कुछ लिखने को बाकी नहीं है।” उनका इशारा पेट्रोल-डीजल की बढ़ती की कीमतों की ओर था, जिसे उन्होंने सरकार की नाकामी से जोड़ा।

कुछ समय पहले 25 अप्रैल, 2025 को उन्होंने गुजराती पत्रकार उर्वीश कोठारी की एक पोस्ट को रीट्वीट किया। इस पोस्ट में उर्वीश ने पीएम मोदी पर तंज कसते हुए लिखा था कि वे अमेरिका जाकर हिंदी बोलते हैं और बिहार जाकर अंग्रेजी। प्रोफेसर अरोड़ा ने इसे रीट्वीट करते हुए लिखा, “अमेरिका जाकर हिंदी बोलते हैं और बिहार जाकर अंग्रेजी। इनके (मोदी के) जलवे ही अलग हैं, नाटक खत्म नहीं होते।” यह टिप्पणी पीएम मोदी के प्रति उनके पूर्वाग्रह को और स्पष्ट करती है।

उमर खालिद और हमास का समर्थन

प्रोफेसर अरोड़ा की कुछ पोस्ट्स में विवादास्पद व्यक्तियों और मुद्दों का समर्थन भी देखने को मिला। उन्होंने एक सोशल मीडिया यूजर अर्पित शर्मा की पोस्ट को रीट्वीट किया, जिसमें लिखा था, “अगर उमर खालिद का नाम उमेश या उमंग होता, तो वह अब तक जेल से बाहर होता।” इस पोस्ट को रीट्वीट करके प्रोफेसर ने उमर खालिद को निर्दोष बताने की कोशिश की।

यहाँ यह समझना जरूरी है कि उमर खालिद पर 2020 के दिल्ली दंगों में साजिश रचने का गंभीर आरोप है। आलोचकों का कहना है कि ऐसी पोस्ट्स के जरिए जानबूझकर यह प्रचार किया जा रहा है कि उमर खालिद को उनके धर्म की वजह से निशाना बनाया जा रहा है। इससे यह धारणा बनाई जा रही है कि उनके खिलाफ कार्रवाई में धार्मिक भेदभाव है, जो एक गंभीर और संवेदनशील मुद्दा है।

इसके अलावा प्रोफेसर अरोड़ा ने हमास का समर्थन करने वाले अमेरिकी छात्रों का भी पक्ष लिया। इस पोस्ट ने भी सोशल मीडिया पर खूब हंगामा मचाया, क्योंकि हमास को कई देश आतंकवादी संगठन मानते हैं। ऐसे में एक प्रोफेसर का इस तरह का समर्थन करना लोगों को गलत लगा।

रवीश कुमार और वामपंथी पोस्ट्स को समर्थन

प्रोफेसर अरोड़ा की ट्विटर प्रोफाइल (जो अब डिलीट हो चुकी है) से यह भी पता चलता है कि वे पत्रकार रवीश कुमार की पोस्ट्स को रीट्वीट करते थे। इसके अलावा, वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े अन्य एकाउंट्स की पोस्ट्स को भी समर्थन देते थे। उनकी प्रोफाइल में ऐसी कई पोस्ट्स थीं, जो सरकार-विरोधी और एक खास विचारधारा को बढ़ावा देने वाली थीं।

सोशल मीडिया पर गुस्सा और एकाउंट डिलीट

जैसे ही प्रोफेसर अरोड़ा की ये पोस्ट्स वायरल हुईं और उनके स्क्रीनशॉट्स सोशल मीडिया पर फैलने लगे, लोगों ने तीखी प्रतिक्रियाएँ दीं। कई लोगों ने इसे सरकारी संस्थान में पढ़ाने वाले प्रोफेसर की गैर-जिम्मेदाराना हरकत बताया। सोशल मीडिया पर गुस्से के बाद प्रोफेसर ने अपना ट्विटर एकाउंट डिलीट कर दिया। अब उनका एकाउंट दिखाई नहीं देता, लेकिन उनके पोस्ट्स के स्क्रीनशॉट्स अभी भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं।

IIT गाँधीनगर से जुड़े पुराने विवाद

यह पहली बार नहीं है जब IIT गाँधीनगर विवादों में घिरा है। इससे पहले भी इसके ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंस (HSS) विभाग के कुछ प्रोफेसरों और छात्रों की गतिविधियों पर सवाल उठ चुके हैं। ऑपइंडिया गुजराती की एक रिपोर्ट के मुताबिक, HSS विभाग के छात्रों ने अपने वार्षिक थीसिस प्रोजेक्ट के लिए इस्लामिक विषयों को चुना था। इन विषयों को देखकर ऐसा लगता था जैसे यह कोई शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि इस्लामिक रिसर्च सेंटर है।

जब यह मामला सोशल मीडिया पर उछला, तो HSS विभाग के प्रोफेसरों ने छात्रों को मेल भेजकर धमकी दी थी कि वे इस बारे में बाहर बात न करें। लेकिन यह मेल भी लीक हो गया, जिससे विवाद और बढ़ गया। ऑपइंडिया ने इस मामले में प्रोफेसर निशांत चोकसी से उनका पक्ष जानने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

प्रोफेसरों का एनजीओ से कनेक्शन

ऑपइंडिया की एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया था कि HSS विभाग के कुछ प्रोफेसर विवादास्पद एनजीओ से जुड़े हैं, जो आदिवासी क्षेत्रों और खास तौर पर नर्मदा के विस्थापितों के बीच काम करते हैं। इनमें प्रोफेसर निशांत चोकसी का नाम सामने आया, जो एक ऐसे एनजीओ से जुड़े हैं, जिसके संचालकों में फादर फर्नांड डुराई जैसे लोग शामिल हैं। इस एनजीओ ने प्रोफेसर चोकसी की कुछ किताबें भी प्रकाशित की हैं।

RTI के जवाबों में विरोधाभाष

मई 2025 में एक एक्टिविस्ट ने RTI के जरिए IIT गाँधीनगर से प्रोफेसर निशांत चोकसी के एनजीओ से संबंधों के बारे में जानकारी माँगी। जून 2025 में संस्थान ने जवाब दिया कि उनके पास कोई ऐसी जानकारी नहीं है कि प्रोफेसर चोकसी किसी एनजीओ से जुड़े हैं।

आरटीआई के जवाब की कॉपी

लेकिन यह जवाब चौंकाने वाला था, क्योंकि 12 जनवरी, 2025 को IIT गाँधीनगर के HSS विभाग के आधिकारिक X हैंडल से एक पोस्ट की गई थी। इस पोस्ट में बताया गया था कि प्रोफेसर निशांत चोकसी और रिसर्च स्टाफ कल्पेश राठवा ने नर्मदा घाटी के विस्थापितों की संस्कृति और भाषा पर किताबें लिखी हैं, और इनका प्रकाशन आदिलोक नाम के एनजीओ ने किया है।

अब सवाल यह है कि अगर संस्थान को प्रोफेसर के एनजीओ से संबंधों की कोई जानकारी नहीं थी, तो यह पोस्ट कैसे की गई? यह विरोधाभास IIT गाँधीनगर की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।

कश्मीर पर विवादास्पद सेमिनार

जनवरी 2021 में IIT गाँधीनगर के HSS विभाग ने एक सेमिनार आयोजित किया था, जिसमें यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न कोलोराडो की प्रोफेसर अत्थर जिया को बुलाया गया था। सेमिनार का विषय था, “एथनो-नेशनलिस्ट-नियोकॉलोनियल डेवलपमेंट, जेंडर डिस्क्रिमिनेशन और द केस ऑफ कश्मीर।” इस विषय में कश्मीर को भारत से अलग दिखाने की कोशिश की गई थी।

‘नियोकॉलोनियल’ का मतलब है आधुनिक उपनिवेशवाद, जिसमें एक शक्तिशाली देश या संगठन किसी कमजोर क्षेत्र की आंतरिक नीतियों में हस्तक्षेप करता है। इस सेमिनार में कश्मीर को भारत के ‘कब्जे’ वाले क्षेत्र के रूप में पेश करने की कोशिश की गई, जबकि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है।

प्रोफेसर अत्थर जिया खुद एक विवादास्पद व्यक्ति हैं, जो कश्मीर को ‘कब्जे वाला’ क्षेत्र कहती हैं और भारत-विरोधी प्रचार में शामिल रही हैं। जब RTI में इस सेमिनार के बारे में सवाल पूछा गया, तो IIT गाँधीनगर ने जवाब दिया कि अत्थर जिया को सिर्फ ‘जेंडर इश्यू’ पर बोलने के लिए बुलाया गया था और उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उनका चयन हुआ था। लेकिन यह जवाब संतोषजनक नहीं था, क्योंकि सेमिनार का विषय स्पष्ट रूप से कश्मीर और भारत को अलग-अलग दिखाने की कोशिश करता था।

IIT गाँधीनगर की गतिविधियों पर गंभीर सवाल

इन सभी घटनाओं ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या सरकारी फंड से चलने वाले शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर इस तरह की टिप्पणियाँ कर सकते हैं? क्या वे एक खास विचारधारा को बढ़ावा देकर प्रोपेगेंडा का हिस्सा बन सकते हैं?

IIT गाँधीनगर टैक्सपेयर्स के पैसे से चलता है। अगर यहाँ के प्रोफेसर इस तरह की गतिविधियों में शामिल हैं, तो वहाँ पढ़ने वाले छात्रों पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या IIT गाँधीनगर में एक खास वैचारिक माहौल बनाया जा रहा है, जो छात्रों को प्रभावित कर सकता है? खास तौर पर तब, जब HSS विभाग पहले भी इस्लामिक रिसर्च और एनजीओ से जुड़े विवादों में फँस चुका है।

इन सवालों का जवाब अभी तक नहीं मिला है। न ही संस्थान की ओर से इन मामलों में कोई ठोस कार्रवाई हुई है। लेकिन प्रोफेसर अमित अरोड़ा के पोस्ट्स और HSS विभाग के पुराने विवादों ने IIT गाँधीनगर की कार्यप्रणाली और शैक्षिक माहौल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह देखना बाकी है कि इन विवादों का समाधान कैसे होता है और क्या संस्थान कोई कदम उठाएगा।

DU की अनूठी शुरुआत, जेन Z को सिखाएगा प्यार, दोस्ती और टॉक्सिक रिश्तों को समझने की कला: जानिए – ‘नेगोशिएटिंग इंटिमेट रिलेशनशिप’ कोर्स के बारे में सबकुछ

आज का युवा वर्ग, जिसे हम जेनरेशन Z (Gen-Z) कहते हैं, इस बदलती हुई तेज रफ्तार डिजिटल दुनिया में जीता है। प्यार अब चिट्ठियों और मुलाकातों का नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम लाइक्स, टिन्डर स्वाइप्स और सिचुएशनशिप्स जैसी चीजों का हिस्सा मात्र बन कर रह गया है।

रिश्ते होने के बावजूद भी लोगों को अकेलापन महसूस होता है। कभी छोटी सी अनबन से रिश्ते टूट जाते हैं, कभी आपस का प्रेम हिंसा में बदल जाता है। आज के समय में रिश्तों को लेकर भावनात्मक समझ की बहुत कमी दिखती है।

दिल्ली विश्वविद्यालय ने इन सब बातों को देखते हुए और इस जरूरत को ध्यान में रखते हुए एक नया पाठ्यक्रम शुरू किया है, जिसे ‘नेगोशिएटिंग इंटिमेट रिलेशनशिप’ नाम दिया गया है। जिसमें रिश्तों को बेहतर ढंग से समझने, उनकी सीमाएँ तय करने, सहमति को पहचानने और बेहतर कम्यूनिकेशन पर जोर दिया जाएगा।

यह पहल इसलिए भी बेहद जरूरी है क्योंकि हाल के वर्षों में कोमल, महक और हाल ही में निकिता और मुस्कान जैसे मामलों ने साबित कर दिया है कि जब रिश्तों में समझ नहीं होती, तो प्यार भी हिंसा में बदल सकता है और सही-गलत की समझ को भी खत्म कर सकता है।

रिश्तों में बढ़ती हिंसा

आज का समाज एक बहुत ही खतरनाक मोड़ पर आ गया है, जहाँ प्यार जैसा खूबसूरत रिश्ता भी नफरत, ईर्ष्या और हिंसा में बदलता जा रहा है। हाल के दिनों में दिल्ली में कोमल, विजयलक्ष्मी और महक जैसी युवतियों की हत्या उनके ही साथियों ने कर दी, जिससे समाज दहल उठा।

इससे पहले श्रद्धा वाकर का मामला भी देश को हिला चुका था। लेकिन यह केवल लड़कों द्वारा की जा रही हिंसा तक सीमित नहीं है। निकिता और मुस्कान जैसे मामलों ने यह साबित कर दिया है कि लड़कियाँ भी अब असफल रिश्तों में हिंसा पर उतर आ रही हैं।

मुस्कान, जो एक विवाहित महिला थी, उस पर अपने पति की हत्या का आरोप है, और निकिता के केस में भी प्रेमी की जान चली गई। दूसरी ओर, ऐसे कई लड़के भी सामने आए हैं जो प्रेम में असफल होकर आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं।

यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर हम रिश्तों को समझ क्यों नहीं पा रहे? रिश्तों में संवाद की कमी, अस्वीकृति को न सह पाने की आदत, और भावनात्मक परिपक्वता की कमी आज के युवाओं को इस हद तक ले जा रही है कि वे उस इंसान को, जिससे कभी बेइंतहा प्यार करते थे, मार डालते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में होने वाली हत्याओं का तीसरी सबसे बड़ी वजह उनके टूटे प्रेम संबंध थे। यह आँकड़ा एक चेतावनी है कि अब रिश्तों को समझना, सीमाएँ तय करना और न को स्वीकार करना केवल भावनात्मक नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है।

हमें यह समझना होगा कि किसी के इनकार को अपनी हार न समझें, न ही किसी इंसान को अपनी ‘मिल्कियत’ समझें। प्यार में बराबरी, सहमति और सम्मान जरूरी है। जब रिश्ते खत्म हों तो भी इंसानियत बची रहनी चाहिए। हमें युवाओं को बात-चीत करना, इमोशनल रूप से मजबूत बनना और जरूरत पड़ने पर मानसिक मदद लेना सिखाना होगा, तभी हम इस समाज को रिश्तों की हिंसा से बचा सकते हैं।

प्रतीकात्मक फोटो साभार: AI Grok

रिश्तों की शिक्षा

आज के समय में रिश्तों को समझना और उन्हें बेहतर बनाना बेहद ज़रूरी हो गया है। बढ़ते तनाव, टूटते रिश्ते और गलतफहमियों के इस दौर में दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक सराहनीय कदम उठाया है। यहां मनोविज्ञान विभाग ने ‘रिश्तों की शिक्षा’ पर एक पाठ्यक्रम शुरू किया है।

यह कोर्स सभी विषयों के स्नातक छात्रों के लिए खुला है। इसका उद्देश्य सिर्फ रिश्तों की जानकारी देना नहीं, बल्कि छात्रों को संवाद, सम्मान और सीमाओं को समझने व अपनाने की कला सिखाना है।

भारत में यह अपनी तरह की पहली पहल है, लेकिन समय की माँग को देखते हुए इसकी जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। आजकल युवाओं को रिश्तों में सही व्यवहार, सहमति का महत्व और भावनात्मक समझ की शिक्षा मिलना बेहद जरूरी है।

दूसरे देशों की बात करें तो अमेरिका की हार्वर्ड एक्सटेंशन स्कूल में ऐसा ही एक कोर्स ‘द साइकालजी ऑफ क्लोज रिलेशनशिप्स’ के नाम से पढ़ाया जाता है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे Coursera, edX और Udemy पर भी रिश्तों से जुड़े कई कोर्स मिलते हैं।

वहीं, यूके में स्कूली स्तर पर भी रिश्तों और भावनाओं की शिक्षा दी जाती है। यह दिखाता है कि रिश्तों की शिक्षा अब एक वैश्विक जरूरत बन चुकी है और दिल्ली विश्वविद्यालय का यह कदम सही समय पर सही दिशा में लिया गया एक अहम शुरुआत है।

डिजिटल दुनिया में रिश्तों की समस्या

आज जब हर चीज एक क्लिक पर है, तो रिश्ते भी तेजी से बनते और टूटते हैं। सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स ने प्यार को आसान बना दिया है, लेकिन इसमें गहराई कहीं खो गई है। लोग दूर चले जाते है, बिना कोई वजह बताए और रिश्ता खत्म कर देते हैं। इन सभी का असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।

युवा खुद को अकेला पाते है और बेबस महसूस करते हैं। बिना किसी बातचीत के रिश्ते बनाना और बिना कुछ बताए उसको खत्म कर देना, आज कल के समय की आम बात हो गई है। इसलिए यह कोर्स युवाओं को डिजिटल रिश्तों को समझाने में मदद करेगा।

रिश्तों का असली आधार

इमोशनल इंटेलीजेंस (EQ) का मतलब है अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझना, उसे व्यक्त करना साथ ही उस पर जवाब देना। एक रिपोर्ट के अनुसार EQ जितना ज्यादा होता है, उतना ही रिश्तों में संतुलन, सहानुभूति और समझदारी रहती है। आज के रिश्तों में EQ की कमी दिखती है।

लोग अपनी भावनाओं को पहचान ही नहीं पाते, इसलिए वे अक्सर गुस्से, ईर्ष्या या असुरक्षा से रिश्तों को बिगाड़ देते हैं। इस कोर्स से युवाओं को EQ को बढ़ाने में मदद मिलेगी, जिससे वे न सिर्फ बेहतर साथी बनेंगे बल्कि ज्यादा समझदार इंसान भी बनेंगे।

भारत जैसे देश में प्यार केवल दो लोगों का मामला नहीं होता। जाति, धर्म, लिंग और परिवार का भी दखल इसमें बहुत मायने रखती है। सोनम रघुवंशी का मामला इसका बड़ा उदाहरण है, जिसमें लड़की को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ शादी करने को मजबूर किया गया और बाद में उस पर हत्या का आरोप लगा।

कई राज्यों में लिव-इन संबंधों को लेकर कठोर नियम बनाए जा रहे हैं, जैसे उत्तराखंड का रजिस्ट्रेशन कानून। इस कोर्स को इन सामाजिक चुनौतियों के प्रति भी संवेदनशील होना होगा, ताकि छात्र समझ सकें कि सच्चा प्रेम तब ही संभव है, जब समाज और कानून भी उस पर यकीन करे।

इस कोर्स से समाज को पहुँचेगा फायदा

दिल्ली विश्वविद्यालय का यह पाठ्यक्रम केवल किताबों तक सीमित नहीं है, यह एक भावनात्मक क्रांति की शुरुआत है। यह युवाओं को न सिर्फ रिश्तों की समझ देगा, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य, आत्म-सम्मान और सामाजिक जीवन को भी बेहतर बनाएगा। यह कोर्स रिश्तों को लेकर एक नई सोच विकसित करेगा जहाँ प्रेम का मतलब केवल आकर्षण नहीं, बल्कि सम्मान, सहमति और संवाद होगा।

आज के समय में जब रिश्ते गहराई के बजाय केवल सतह पर टिके हैं, जब हिंसा प्रेम के नाम पर हो रही है और जब समाज प्यार करने वालों को डराने की कोशिश करता है, ऐसे में इस कोर्स से युवा बहुत कुछ सीख सकते है, जो उन्हे बेहतर इंसान और साथी बनने में मदद करेगा।

पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी पर फूल बरसा रहा कार्यकर्ता उन्हीं की गाड़ी के नीचे आया, गले पर चढ़ निकली कार: नेताजी को कोई खबर नहीं, मौत के बाद वीडियो वायरल

आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वाईएसआरसीपी अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी के वाहन से कुचल कर एक व्यक्ति की बुधवार (18 जून 2025) को मौत हो गयी थी। दिल दहला देने वाली इस घटना का वीडियो सामने आया है।

इसमें देखा जा सकता है कि पूर्व सीएम रेड्डी को ले जा रहे वाहन के पहियों के नीचे शख्स आ जाता है और उसकी मौत हो जाती है। ये वीडियो अब वायरल हो गया है। जगन मोहन रेड्डी ने घटना पर दुख जताते हुए मृतक के परिजनों को 10 लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान किया है।

हाथ मिलाते नेता और धक्का-मुक्की करते कार्यकर्ता

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि पूर्व सीएम जगन मोहन रेड्डी अपना हाथ हिलाते हुए अपनी कार की गेट पर खड़े हैं। इस दौरान समर्थक उनसे हाथ मिलाने के लिए एक-दूसरे को धक्का-मुक्की करते नजर आ रहे हैं। कार धीमी रफ्तार से आगे बढ़ रही है। तभी एक व्यक्ति कार के अगले पहिए के नीचे आ जाता है और किसी को पता भी नहीं चलता। ये घटना गुंटूर जिले के इटुकुरु गाँव से गुजरने वाली नेशनल हाइवे पर हुई है।

कार की पहिए के नीचे आया शख्स

पूर्व सीएम रेड्डी की कार के पहिए के नीचे आने वाले शख्स का नाम चीली सिंगैया है। वह वेंगलयापलेम गाँव का रहनेवाला है और वाईएसआरसीपी का समर्थक है। दरअसल जगन मोहन रेड्डी की सत्तेनापल्ली मंडल के रेंटापल्ली गाँव में एक प्रतिमा का अनावरण करना था, इसलिए वहाँ काफी भीड़ जमा थी। सड़क के दोनों किनारों पर लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। जब काफिला गुजरा तो सिंगैया ने पूर्व सीएम पर फूल बरसाने का प्रयास किया।

इस दौरान वह पूर्व सीएम रेड्डी की गाड़ी से टकरा गया और उसके नीचे आ गया। हुजूम अपने नेता पर फूल बरसाने में बिजी रही, जय-जयकार करती रही। इतने शोर-शराबे में एक समर्थक की चीख न नेताजी के कान तक पहुँची और न ही किसी समर्थक ने इस पर ध्यान दिया।

कार चालक कार बढ़ाता गया और समर्थक नेताजी की कार के नीचे बुरी तरह से कुचल गया। इस घटना के दौरान ही कई लोग कार पर चढ़े दिखे। हर कोई सीएम रेड्डी को छू लेना चाहता था। लेकिन किसी को कार के सामने गिरे व्यक्ति की आवाज सुनाई नहीं दी।

वीडियो में दिखा गर्दन पर चढ़ा कार का पहिया

वीडियो फुटेज में देखा जा सकता है कि जब सिंगैया गाड़ी के पास गिरते हैं, गाड़ी बिना रुके आगे बढ़ती रहती है, और पहिया उनकी गर्दन के ऊपर से गुजर जाता है। जब तक किसी ने देखा और उन्हें बचाने की कोशिश की तब तक वे बुरी तरह घायल हो चुके थे। पुलिस ने सिंगैया को गुंटूर के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

गुंटूर के पुलिस अधीक्षक सतीश कुमार और गुंटूर रेंज के आईजी श्रेष्ठा त्रिपाठी ने घटना की पुष्टि की है। शुरुआती जाँच में पता चला है कि इस काफिले में 30-35 गाड़ियाँ थीं, जबकि पुलिस ने सिर्फ 3 गाड़ियों की परमिशन दी थी। पुलिस अधिकारियों ने जाँच के बाद काफिले में शामिल अन्य गाड़ियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जाँच कर रही है कि क्या ये लापरवाही था या जानबूझ कर घटना को अंजाम दिया गया।

पीड़ित परिवार ने न्याय की लगाई गुहार

घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं साथ ही पूर्व सीएम के काफिले के कुप्रबंधन को भी उजागर किया है। मृतक सिंगैया के परिजनों ने सरकार से घटना की जाँच कराने और न्याय देने की माँग की है।

वीडियो सामने आने के बाद, राज्य के मंत्री गोट्टीपति रवि कुमार ने कहा कि वाईएसआरसीपी नेता अपने प्रचार स्टंट के लिए लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल रहे हैं।

चमगादड़ जैसा डिजाइन, लेकिन कीमत ₹17 हजार करोड़… जानें जिस B-2 बॉम्बर से US ने ईरान में किए न्यूक्लियर ठिकाने बर्बाद, वो क्यों है सबसे खास

अमेरिका ने ईरान में घुसकर उसके तीन न्यूक्लियर साइट्स (परमाणु ठिकानों) को तबाह कर दिया। इसमें उसने बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) का इस्तेमाल किया। ये स्टील्थ फाइटर जेट दुनिया के सबसे खतरनाक और आधुनिक हथियारों में से एक है। ये ऐसा विमान है जो न सिर्फ दुश्मन के इलाके में घुसकर हमला कर सकता है, बल्कि उनकी रडार (Radar) और हवाई रक्षा (Air Defense) को भी चकमा दे देता है।

ईरान के तीन परमाणु ठिकानों फोर्डो, नतांज और इस्फहान पर अमेरिकी हमले के बाद बी-2 स्पिरिट्स ने एक बार फिर से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ये ऐसा फाइटर जेट है, जिसने बार-बार दुनिया के सामने अपनी ताकत दिखाई है। ये अमेरिका के न्यूक्लियर ट्रॉयड की रीढ़ है।

बी-2 स्पिरिट की क्षमताओं को समझने के लिए ये जानना जरूरी कि ये फाइटर जेट इतना खास क्यों है? ये कैसे काम करता है? ये कौन-कौन से हथियार ले जा सकता है? ये दुश्मन की नजरों से कैसे बचता है? और इसकी इतनी अहमियत क्यों है?

बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) क्या है?

बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) एक ऐसा फाइटर जेट है, जिसे अमेरिकी कंपनी नॉर्थरॉन ग्रुम्मन ने बनाया। इसकी पहली उड़ान 1989 में हुई थी, और 1997 में इसे अमेरिकी वायुसेना (US Air Force) में शामिल किया गया।

इसका डिज़ाइन बहुत अनोखा है – ये एक चमगादड़ जैसा चपटा विमान है, जिसमें कोई पूँछ या धड़ (Fuselage) नहीं होता। इसे फ्लाइंग विंग डिज़ाइन कहते हैं। इसकी कीमत इतनी ज्यादा है – लगभग 2.1 बिलियन डॉलर (करीब 17,000 करोड़ रुपये) प्रति विमान, कि इसे दुनिया का सबसे महँगा फाइटर जेट माना जाता है।

अमेरिका के पास सिर्फ 21 बी-2 फाइटर जेट हैं, क्योंकि ये इतना महँगा है कि ज्यादा बनाना मुमकिन नहीं हुआ। ये फाइटर जेट खास तौर पर उन मिशनों के लिए बनाया गया है, जहाँ दुश्मन के इलाके में गहरे जाकर, बिना पकड़े गए, हमला करना हो।

ये सामान्य बमों से लेकर परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) तक ले जा सकता है। हाल ही में ईरान के परमाणु ठिकानों पर हुए हमले में इसने अपनी ताकत दिखाई, जहाँ इसने 37 घंटे की लगातार उड़ान भरी और बंकर बस्टर बम (Bunker Buster Bombs) दागे।

बी-2 की जरूरत क्यों पड़ी?

बी-2 स्पिरिट का जन्म कोल्ड वॉर (शीत युद्ध) के समय हुआ, जब अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच हथियारों की होड़ थी। 1970 के दशक में अमेरिका को एक ऐसे फाइटर जेट की जरूरत थी, जो सोवियत संघ की मजबूत हवाई रक्षा को भेद सके। इसके लिए नॉर्थरॉप ग्रुम्मन ग्रुप ने स्टील्थ तकनीक (Stealth Technology) पर काम शुरू किया।

फोटो साभार: ChatGPT

पहली उड़ान: 17 जुलाई 1989 को बी-2 ने पहली बार उड़ान भरी।

वायुसेना में शामिल: 1997 में इसे आधिकारिक तौर पर अमेरिकी वायुसेना में शामिल किया गया।

पहला युद्ध इस्तेमाल: 1999 में कोसोवो युद्ध में बी-2 का पहली बार इस्तेमाल हुआ। इसने सर्बिया के ठिकानों पर सटीक बमबारी की और बिना पकड़े गए वापस लौट आया।

अन्य मिशन: बी-2 का इस्तेमाल अफगानिस्तान (2001), इराक (2003), और लीबिया (2011) में भी हुआ। हर बार इसने दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर हमले किए।

बी-2 को शुरू में परमाणु हमलों के लिए बनाया गया था, लेकिन बाद में इसे सामान्य युद्धों (Conventional Warfare) के लिए भी तैयार किया गया। इसका डिज़ाइन और तकनीक इतनी खास थी कि ये आज भी दुनिया का सबसे उन्नत फाइटर जेट माना जाता है।

खास फीचर्स बनाते हैं बी-2 को खास

बी-2 की ताकत इसके अनोखे डिज़ाइन और आधुनिक तकनीकों में है। इसे समझने के लिए इसके फीचर्स को आसान तरीके से समझते हैं-

स्टील्थ तकनीक (Stealth Technology): बी-2 को रडार (Radar) पकड़ नहीं सकता। इसका रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) सिर्फ 0.001 वर्ग मीटर है, यानी रडार पर ये एक छोटे से पक्षी जितना दिखता है। इसका चपटा डिज़ाइन और खास पेंट (Radar-Absorbent Material) रडार की तरंगों को सोख लेता है। इसकी गर्मी (Infrared Signature) और आवाज बहुत कम होती है, जिससे इसे सेंसर (Sensors) से पकड़ना मुश्किल है।

लंबी उड़ान की ताकत: बी-2 बिना रिफ्यूलिंग (Refueling) के 6,000 नॉटिकल मील (लगभग 11,000 किमी) तक उड़ सकता है। हवा में रिफ्यूलिंग के साथ ये दूरी 10,000 नॉटिकल मील (19,000 किमी) तक हो सकती है। जैसे, ईरान हमले में इसने मिसूरी से 37 घंटे की उड़ान भरी। ये 50,000 फीट (15,000 मीटर) की ऊँचाई पर उड़ सकता है, जहाँ ज्यादातर एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलें (Anti-Aircraft Missiles) नहीं पहुँचतीं।

फोटो साभार: ChatGPT

दो लोगों की टीम: बी-2 को सिर्फ दो लोग चलाते हैं – एक पायलट और एक मिशन कमांडर। इसका कॉकपिट (Cockpit) इतना आधुनिक है कि लंबे मिशनों में भी पायलट थकते नहीं। इसमें ऑटोमेशन सिस्टम (Automation System) हैं, जो काम को आसान बनाते हैं।

हर मौसम में काम: बी-2 दिन हो या रात, बारिश हो या तूफान, हर हाल में मिशन पूरा कर सकता है। इसका जीपीएस (GPS) और नेविगेशन सिस्टम इतना सटीक है कि ये बिल्कुल सही निशाने पर हमला करता है।

लचीलापन: ये ऊँची उड़ान (High-Altitude) और जमीन के करीब (Low-Altitude) दोनों तरह से काम कर सकता है। दुश्मन की रक्षा के हिसाब से ये अपनी रणनीति बदल लेता है।

बी-2 कौन-कौन से हथियार ले जा सकता है?

बी-2 इतने ज्यादा हथियार – 40,000 पाउंड (18,000 किलोग्राम) ले जा सकता है कि इसे ‘उड़ता हुआ हथियारखाना’ कह सकते हैं। ये सामान्य बमों से लेकर परमाणु हथियार तक ले जा सकता है। इसके प्रमुख हथियार हैं-

मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (MOP, बंकर बस्टर): ये 30,000 पाउंड (13,600 किलोग्राम) का भारी बम है, जो जमीन के अंदर बने बंकरों (Bunkers) को नष्ट करता है। ये 200 फीट (61 मीटर) तक जमीन में घुस सकता है और फिर फटता है। पहाड़ के अंदर 300 फीट नीचे ईरान के फोर्डो ठिकाने को 6 MOP बमों से नष्ट किया गया। बी-2 एक बार में दो MOP ले जा सकता है।

परमाणु हथियार (Nuclear Weapons): बी-2 16 B83 परमाणु बम (2,400 पाउंड प्रत्येक) ले जा सकता है। ये इसे परमाणु हमलों के लिए खास बनाता है। ये अमेरिका के न्यूक्लियर ट्रायड (परमाणु त्रिकोण) का हिस्सा है, जिसमें जमीन, समुद्र, और हवा से हमले की ताकत शामिल है।

सामान्य बम (Conventional Bombs): JDAM (जॉइंट डायरेक्ट अटैक म्यूनिशन): ये जीपीएस-गाइडेड बम हैं, जो सटीक निशाना लगाते हैं। बी-2 80 ऐसे 500-पाउंड बम ले जा सकता है।

JSOW (जॉइंट स्टैंडऑफ वेपन): ये ग्लाइड बम हैं, जो दूर से हमला करते हैं।

JASSM-ER (जॉइंट एयर-टू-सरफेस स्टैंडऑफ मिसाइल): ये लंबी दूरी की मिसाइलें हैं, जो 500 मील (805 किमी) तक निशाना लगा सकती हैं।

टॉमहॉक मिसाइलें (Tomahawk Missiles): ईरान के नतांज और इस्फहान ठिकानों पर 30 टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं। ये लंबी दूरी की सटीक मिसाइलें हैं, जो बी-2 के साथ-साथ अन्य प्लेटफॉर्म्स से भी छोड़ी जा सकती हैं।

बी-2 दुश्मन की पकड़ से कैसे बचता है?

बी-2 को टअदृश्य योद्धाट कहा जाता है, क्योंकि ये दुश्मन की रडार और हवाई रक्षा को आसानी से चकमा दे देता है। इसके पीछे कई खास तकनीकें हैं-

रडार-शोषक सामग्री (Radar-Absorbent Material): बी-2 की बॉडी पर खास पेंट और सामग्री होती है, जो रडार की तरंगों को सोख लेती है। इससे रडार को सिग्नल वापस नहीं मिलता, और विमान स्टील्थ यानी ‘अदृश्य’ रहता है।

फ्लाइंग विंग डिज़ाइन: इसका चपटा और बिना पूंछ वाला डिज़ाइन रडार सिग्नल्स को बिखेर देता है। इसमें कोई नुकीले किनारे नहीं होते, जो रडार की पकड़ में आएँ।

कम गर्मी और आवाज (Low Infrared and Acoustic Signature): बी-2 के इंजन कम गर्मी और आवाज पैदा करते हैं, जिससे इसे इन्फ्रारेड सेंसर (Infrared Sensors) या साउंड डिटेक्टर से पकड़ना मुश्किल है।

हथियार अंदर रखने की जगह (Internal Weapons Bay): इसके सारे हथियार विमान के अंदर रखे जाते हैं, जिससे बाहर कुछ दिखाई नहीं देता। इससे रडार सिग्नेचर और कम हो जाता है।

जैमिंग सिस्टम (Electronic Countermeasures): बी-2 में ऐसे सिस्टम हैं, जो दुश्मन के रडार और मिसाइलों को भटका सकते हैं। ये इसे और सुरक्षित बनाते हैं।

बी-2 की इतनी अहमियत क्यों है?

बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) की अहमियत कई कारणों से है-

रणनीतिक डर (Strategic Deterrence): बी-2 अमेरिका के परमाणु त्रिकोण का हिस्सा है। ये दुश्मनों को ये सोचने पर मजबूर करता है कि अमेरिका उनके सबसे मजबूत ठिकानों को भी नष्ट कर सकता है। इसके 2 और साथी भी हैं -रॉकवेल बी-1 लॉन्सर और बी-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस।

गहरे हमले की ताकत: बी-2 उन ठिकानों पर हमला कर सकता है, जो जमीन के अंदर गहरे बने हों, जैसे ईरान का फोर्डो बंकर। MOP जैसे बमों के साथ, ये दुनिया में अकेला ऐसा फाइटर जेट है।

दुनिया में कहीं भी हमला: इसकी लंबी उड़ान और हवा में रिफ्यूलिंग की ताकत इसे दुनिया के किसी भी कोने में हमला करने लायक बनाती है।

मनोवैज्ञानिक दबाव: बी-2 का इस्तेमाल दुश्मन पर डर पैदा करता है। जैसे ईरान पर हमले ने दिखाया कि कोई भी ठिकाना सुरक्षित नहीं है।

कम संख्या, बड़ा असर: सिर्फ 21 फाइटर जेट होने के बावजूद, बी-2 की ताकत इतनी है कि ये पूरी जंग का रुख बदल सकता है।

ईरान परमाणु ठिकानों पर बी-2 का इस्तेमाल

21 जून 2025 को अमेरिका ने बी-2 का इस्तेमाल करके ईरान के तीन परमाणु ठिकानों फोर्डो, नतांज और इस्फहान पर हमला किया। इस हमले की कुछ खास बातें-

फोर्डो पर हमला: फोर्डो एक ऐसा ठिकाना था, जो पहाड़ के अंदर 300 फीट नीचे बना था। बी-2 ने 6 MOP बमों से इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया।

नतांज और इस्फहान: इन ठिकानों पर 30 टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं, जो सतह पर बने ढाँचों को खत्म करने के लिए थीं।

37 घंटे की उड़ान: बी-2 ने मिसूरी (अमेरिका) से उड़ान भरी, हवा में कई बार रिफ्यूलिंग की और 11,400 किमी की दूरी तय करके हमला किया।

रणनीतिक संदेश: इस हमले ने ईरान को साफ बता दिया कि उनकी सबसे मजबूत सुविधाएँ भी अमेरिका की पहुँच से बाहर नहीं हैं।

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बी-2 स्पिरिट बॉम्बर्स का भविष्य

हालाँकि बी-2 अब 36 साल पुराना है, लेकिन ये अभी भी दुनिया का सबसे उन्नत फाइटर जेट है। अमेरिका इसे 2030 तक इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है, जब तक कि नया बी-21 रेडर स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) पूरी तरह तैयार न हो जाए। बी-2 को लगातार अपग्रेड किया जा रहा है, जैसे-

नए रडार और सेंसर: इनसे ये और सटीक और सुरक्षित हो रहा है।

आधुनिक हथियार: नए बम और मिसाइलें जोड़ी जा रही हैं।

सॉफ्टवेयर अपडेट: इससे इसका सिस्टम और तेज और स्मार्ट हो रहा है।

बी-21 रेडर आने के बाद बी-2 धीरे-धीरे रिटायर हो सकता है, लेकिन अभी ये अमेरिका की सैन्य ताकत का अहम हिस्सा है।

अमेरिका का न्यूक्लियर ट्रॉयड क्या है और भविष्य कैसा होगा?

अमेरिका का न्यूक्लियर ट्रॉयड 3 बड़े फाइटर-स्ट्रेटजिक बॉम्बर्स से मिलकर बना है। इसमें हैं – रॉकवेल बी-1 लॉन्सर, बी-2 स्पिरिट और बी-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस। हालाँकि बी-52 स्ट्रैटोफोर्ट्रेस स्टील्थ नहीं है बल्कि जेट पॉवर्ड स्ट्रेटजिक बॉम्बर है। पर ये बी-2 से भी ज्यादा हथियार ले जा सकता है। वहीं, रॉकवेल बी-1 भी 34 हजार किलो के बम ले जा सकते हैं। ये तीनों साइज में न सिर्फ बड़े हैं, बल्कि पूरी दुनिया में कहीं भी हमला करने में सक्षम हैं और कितने भी बड़े बमों के साथ।

हालाँकि बी-2 स्पिरिट इन सबसे सबसे खास है, क्योंकि वो स्टील्थ यानी अदृश्य रहकर हमला करता है और किसी रडार की पकड़ में नहीं आता। ये तीनों स्ट्रेटजिक बॉम्बर अमेरिका के न्यूक्लियर ट्रॉयड का हिस्सा हैं, जो कन्वेंशनल यानी आम बमों के साथ ही परमाणु बम भी ले जा सकते हैं।

आने वाले समय में इन्हें रिप्लेस किया जाना है। सबसे पहले बी-2 स्पिरिट और बी-1 लॉन्सर 2030 से 2024 तक रिटायर होंगे, इसके बाद 2050 से पहले तक बी-52। इनकी जगह लेने के लिए बी-21 रेडर जेट तैयार हो रहे हैं, जिन्हें लॉन्ग रेंज स्ट्राइक बॉम्बर के तौर पर बनाया जा रहा है। ये स्टील्थ भी होंगे और ज्यादा ताकतवर भी।

बहरहाल, बी-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बर (बमवर्षक विमान) सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि अमेरिका की सैन्य ताकत का प्रतीक है। इसका इतिहास कोल्ड वॉर से शुरू हुआ और आज ये ईरान जैसे मिशनों में अपनी ताकत दिखा रहा है। इसकी स्टील्थ तकनीक, लंबी उड़ान और भारी हथियार ले जाने की ताकत इसे बेजोड़ बनाती है। ये दुश्मन की नजरों से बचकर उनके सबसे सुरक्षित ठिकानों को नष्ट कर सकता है।

भविष्य में बी-21 रेडर इसका स्थान ले सकता है, लेकिन अभी बी-2 दुनिया का सबसे खतरनाक फाइटर जेट है। चाहे रणनीतिक डर हो या गहरे हमले बी-2 हर मोर्चे पर लाजवाब है।