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अपने मुँह मिया मिट्ठू बने ट्रंप हो गए ‘शांतिदूत’, पाकिस्तान ने नोबेल के लिए किया नामित: खुद को युद्ध रोकने वाला ‘मसीहा’ समझते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति, सांसदों ने पढ़े शान में कसीदे

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान और इज़राइल के बीच चल रहे ‘युद्ध’ को रोकने में अपनी सबसे बड़ी भूमिका बताई है। इसके बाद ट्रंप को ‘शांति दूत’ बनने के लिए 2025 के नोबेल प्राइस के लिए नामिक किया गया है।

ट्रंप की इस ‘शांति स्थापना’ के बाद ना सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों से भी लोग ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करने की बात कर रहे हैं। हालाँकि, इस पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सोशल मीडिया पर यह चर्चा जोरों पर है।

नोबेल शांति पुरस्कार: ट्रंप फिर रेस में, शांतिदूत बनने की होड़

डोनाल्ड ट्रंप को इज़रायल और ईरान के बीच युद्धविराम में उनकी ‘ऐतिहासिक भूमिका’ के लिए 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। अमेरिकी सांसद बडी कार्टर और पाकिस्तान ने उनके कूटनीतिक प्रयासों की खुलकर सराहना की है।

बडी कार्टर ने नोबेल शांति पुरस्कार समिति को लिखे पत्र में कहा कि ट्रंप की अगुवाई ने 12 दिन तक चले इज़रायल-ईरान युद्ध को खत्म करने में मदद की। उन्होंने दावा किया कि ट्रंप की कोशिशों से एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष को टाला जा सका और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका गया।

कार्टर ने ट्रंप की कार्रवाई को ‘निर्णायक’ बताया, जिसने एक ऐसा समझौता करवाया जिसे कई लोग असंभव मानते थे। उनके अनुसार, ट्रंप की कोशिशें शांति, युद्ध रोकने और अंतरराष्ट्रीय एकता के उन आदर्शों को दर्शाती हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार सम्मानित करता है।

यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप को नोबेल के लिए नामित किया गया है। इससे पहले, अमेरिकी सांसद डैरेल इस्सा ने भी 2024 के लिए उनके वैश्विक प्रभाव और चुनावी जीत के लिए नामांकन किया था।

पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भी नोबेल समिति को पत्र लिखकर ट्रंप को पुरस्कार देने की सिफारिश की है। उन्होंने भारत-पाकिस्तान के हाल के तनाव में ट्रंप के ‘निर्णायक कूटनीतिक दखल’ की तारीफ की थी।

नोबेल की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 2025 के शांति पुरस्कार के लिए कुल 305 लोग और संगठन नामांकित हैं।

युद्ध विराम का ‘ड्रामा’: ट्रंप का ऐलान और फिर ‘पलटवार’

यह सब तब हुआ जब क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई तेज़ हो गई थी। 13 जून 2025 को इज़राइल ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने इज़राइली सैन्य ठिकानों पर हमला किया। फिर अमेरिका भी इस लड़ाई में कूद गया और ईरान की तीन मुख्य परमाणु सुविधाओं – फोर्डो, नतान्ज़ और इस्फ़हान पर सटीक हमले किए।

ईरान ने भी अमेरिकी हमले के जवाब में कतर, सीरिया और ईराक के अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया था। इज़राइली वायु सेना (IAF) ने तेहरान के उत्तर में एक ईरानी रडार प्रतिष्ठान पर सीमित हमला किया।

एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने इज़राइल पर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। फिर ट्रंप ने ‘सीजफायर का उल्लंघन’ करने पर कड़ी नाराज़गी जताई और कहा कि दोनों देश ‘इतनी देर और इतनी मुश्किल से लड़ रहे हैं कि उन्हें पता नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं।”

नेतन्याहू और काट्ज़ का ‘ट्रंप प्रेम’: युद्धविराम का सम्मान, सहयोग का वादा

इसके तुरंत बाद, इज़राइली प्रधान मंत्री कार्यालय ने एक बयान में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच बातचीत के बाद, इज़राइल ने ईरान पर आगे के हमलों पर रोक लगा दी है।

इज़राइली रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज़ ने एक्स पर एक पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले और अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के साथ अपनी बातचीत के दौरान इज़राइल के साथ सहयोग की सराहना की।

काट्ज़ ने यह भी कहा कि अगर ईरान अपने समझौते का पालन करता है तो इज़राइल ‘युद्धविराम का सम्मान करेगा’। काट्ज़ ने एक्स पर कहा, “मैंने कुछ ही देर पहले अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ से बात की। मैंने ईरानी परमाणु खतरे के खिलाफ इज़राइल के साथ कार्रवाई करने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साहसिक फैसले के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। सचिव ने इज़राइल और IDF की ऐतिहासिक उपलब्धियों की सराहना की। मैंने जोर दिया कि इज़राइल युद्धविराम का सम्मान करेगा – जब तक दूसरा पक्ष करता है। हम घनिष्ठ अमेरिका-इज़राइल सुरक्षा सहयोग को गहरा करने पर सहमत हुए।”

गुजरात में बढ़ी BJP की लोकप्रियता, जनता का विश्वास भी बरकरार : गुजरात उपचुनाव के नतीजों में बिखरा दिखा विपक्ष, कॉन्ग्रेस हुई साफ

गुजरात की दो विधानसभा सीटों विसावदर और कादी पर हुए उपचुनाव के नतीजे सामने आ गए हैं। विसावदर सीट से आम आदमी पार्टी (AAP) के उम्मीदवार गोपाल इटालिया ने 17,554 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जबकि कादी सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राजेंद्र चावड़ा ने 39,452 वोटों की बड़ी बढ़त के साथ जीत हासिल की।

इन दोनों ही सीटों पर कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। हर सीट की स्थिति अलग थी, जिससे नतीजों में भी अंतर नजर आया। इन नतीजों से यह साफ होता है कि गुजरात में बीजेपी की पकड़ अब भी मजबूत है, लेकिन आम आदमी पार्टी ने कॉन्ग्रेस के समर्थन के साथ खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने में कुछ हद तक सफलता हासिल की है।

हालाँकि, कॉन्ग्रेस को लेकर यह धारणा भी बन रही है कि वह आप की ‘बी टीम’ बनती जा रही है, जिससे उसकी राजनीतिक साख को नुकसान हो रहा है। कुल मिलाकर यह उपचुनाव गुजरात की राजनीति में जारी बदलाव और सत्ता संतुलन की दिशा में एक संकेत माना जा सकता है।

विसावदर विधानसभा परिणाम

विसावदर विधानसभा सीट आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व विधायक भूपत भयानी के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। इस सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी, कॉन्ग्रेस और आप तीनों पार्टियों ने अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे।

हालाँकि चुनाव के नतीजों से यह साफ हो गया कि कॉन्ग्रेस की मौजूदगी इस बार बेहद कमजोर रही। कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार नितिन रणपारिया को सिर्फ 5,501 वोट मिले, जो यह दिखाता है कि पार्टी अपना पुराना गढ़ बचाने में पूरी तरह नाकाम रही। इस चुनाव में कॉन्ग्रेस की निष्क्रियता साफ नजर आई।

न तो प्रचार अभियान ज़ोरदार था और न ही स्थानीय स्तर पर कोई मजबूत नेतृत्व दिखाई दिया। जनता ने भी अब कॉन्ग्रेस के बजाय दूसरी पार्टियों को विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया है। देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के नाते यह उम्मीद की जाती है कि कॉन्ग्रेस का क्षेत्रीय स्तर पर पकड़ मजबूत होगी, लेकिन विसावदर के नतीजों ने इस धारणा को पूरी तरह उलट कर रख दिया।

विसावदर उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की हालत इतनी खराब रही कि उसका उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सका। कभी यह विधानसभा सीट कॉन्ग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाती थी, लेकिन अब पार्टी की पकड़ पूरी तरह ढीली पड़ गई है।

सिर्फ विसावदर ही नहीं, बल्कि पूरे गुजरात में कॉन्ग्रेस का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि गुजरात कॉन्ग्रेस अध्यक्ष शक्तिसिंह गोहिल ने चुनावी हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

आज के राजनीतिक माहौल में जब आम आदमी पार्टी जैसी नई पार्टी मजबूती से चुनाव लड़ रही है, तब कॉन्ग्रेस को अपनी रणनीति और नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठाने चाहिए। अगर पार्टी के पास साफ विज़न और योजना नहीं है, तो हार की जिम्मेदारी उसी पर आती है।

विसावदर में कॉन्ग्रेस का रवैया ऐसा दिखा जैसे वह आप को जानबूझकर मजबूत करने के लिए मैदान में लाई हो, मानो आप उसकी ‘बी टीम’ हो। आम आदमी पार्टी के प्रति कॉन्ग्रेस का यह उदासीन और कमजोर रवैया भी नतीजों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारण बना।

विसावदर उपचुनाव में कॉन्ग्रेस ने न तो मजबूत प्रचार किया और न ही स्थानीय मुद्दों पर ध्यान दिया। यही वजह रही कि पार्टी पाटीदार वोटरों को जोड़ने में नाकाम रही, जो बड़ी संख्या में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार गोपाल इटालिया के पक्ष में चले गए।

इससे साफ दिखता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी ने एक नई पार्टी के सामने हार मान ली है। कॉन्ग्रेस की कमजोरी का एक और बड़ा कारण उसके कार्यकर्ताओं की कमी थी। उम्मीदवार के साथ सिर्फ 5-7 लोग दिखाई दिए, बाकी कोई स्थानीय संगठन या समर्थन नजर नहीं आया।

इस तरह की लापरवाही किसी भी पार्टी के लिए राजनीतिक आत्महत्या के बराबर होती है और इससे यह सवाल खड़ा होता है कि गुजरात में कॉन्ग्रेस का भविष्य क्या होगा। दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे पर अक्सर बीजेपी की ‘बी टीम’ होने का आरोप लगाती रही हैं।

गोपाल इटालिया ने भी चुनाव प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस को भाजपा की ‘बी टीम’ कहा था। लेकिन इन चुनाव नतीजों को देखते हुए यह तस्वीर बन रही है कि कॉन्ग्रेस ही अब आप की ‘बी टीम’ बनकर रह गई है।

आंतरिक कलह और उम्मीदवार विवाद के कारण भाजपा को हार का सामना करना पड़ा

विसावदर में भाजपा की हार अब गुजरात की राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। हालाँकि यह सीट परंपरागत रूप से बीजेपी की मजबूत सीट नहीं रही है, लेकिन फिर भी यह पार्टी के लिए आगे बढ़ने का एक अच्छा मौका था।

2012 से विपक्ष इस सीट पर लगातार मजबूत रहा है और आम आदमी पार्टी की पिछली जीत ने उसके स्थानीय संगठन को और मज़बूत कर दिया। इस बार भी भाजपा की हार के पीछे कई वजहें रहीं, जिनमें सबसे अहम रही पार्टी के अंदर की खींचतान और गलत उम्मीदवार का चयन।

भाजपा ने किरीट पटेल को उम्मीदवार बनाया, जिनका चुनाव स्थानीय स्तर पर भारी विरोध हुआ। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराज़गी फैली, जो प्रचार अभियान में साफ नजर आई। दिलचस्प बात यह है कि किरीट पटेल पहले भी दो बार भाजपा को चुनाव में हरा चुके हैं।

साथ ही इस क्षेत्र में पाटीदार समुदाय के वोटर बड़ी संख्या में आम आदमी पार्टी के गोपाल इटालिया की ओर झुके। इसके अलावा, भाजपा नेता जवाहर चावड़ा का असर भी भाजपा की हार में अहम रहा। उन्हें दरकिनार करने की कोशिशें पार्टी को भारी पड़ीं, क्योंकि उनका क्षेत्र में अच्छा खासा प्रभाव है।

हालाँकि हार के बावजूद भाजपा ने परिपक्वता दिखाई और ईवीएम या चुनाव आयोग पर सवाल उठाने से बची। पार्टी नेता ऋषिकेश पटेल ने कहा कि वे हार की आंतरिक समीक्षा करेंगे और भविष्य में सुधार के लिए काम करेंगे। यही बात भाजपा को अन्य पार्टियों से अलग बनाती है, जो अक्सर हार के बाद सरकार या चुनाव प्रणाली पर आरोप लगाने लगती हैं।

वहीं, गोपाल इटालिया की जीत ने आम आदमी पार्टी में नई ऊर्जा भर दी है। लेकिन यह भी सच है कि उनकी जीत का एक बड़ा कारण भाजपा की आंतरिक समस्याएँ और कॉन्ग्रेस की कमजोरी रही। इसलिए ये नतीजे न सिर्फ एक सीट की जीत या हार हैं, बल्कि गुजरात की राजनीति में बदलाव के संकेत भी हैं।

गुजरात में भाजपा का दबदबा कायम, कादी में भाजपा की जीत

विधानसभा सीट पर भाजपा के राजेंद्र कुमार चावड़ा ने 39,452 वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की, जिससे राज्य में पार्टी की मजबूत स्थिति और ज्यादा पक्की हो गई है। इस जीत से साफ हो गया कि गुजरात में भाजपा का प्रभाव अभी भी मजबूत है और उसका संगठनात्मक ढाँचा पूरी तरह सक्रिय है।

जनसंघ के जमाने से पार्टी से जुड़े हुए वरिष्ठ नेता चावड़ा के उम्मीदवार बनने से पार्टी को अपने पारंपरिक वोटरों का समर्थन मजबूत करने में मदद मिली। इस चुनाव में 57.51% की अच्छी वोटिंग दर रही, जो दिखाता है कि भाजपा का चुनाव अभियान लोगों को जोड़ने और मतदान के लिए प्रेरित करने में कामयाब रहा। कुल मिलाकर, कड़ी की यह जीत भाजपा के लिए एक बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला संकेत है।

कादी विधानसभा सीट पर भाजपा की जीत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि पार्टी की लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत अभी भी मजबूत बनी हुई है।

इस सीट पर भाजपा ने विकास, औद्योगिकीकरण और किसानों के मुद्दों को लेकर प्रचार किया, जो शहरी और ग्रामीण दोनों ही मतदाताओं को काफी पसंद आया। भाजपा नेता ऋषिकेश पटेल ने इस जीत को ‘लोगों की जीत’ कहा, जिससे यह साफ है कि पार्टी इसे जनता के समर्थन और अपनी नीतियों की पुष्टि के रूप में देख रही है।

वहीं, आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस इस सीट पर भाजपा को कोई बड़ी चुनौती नहीं दे पाए। आप के उम्मीदवार जगदीशभाई गणपतभाई चावड़ा को सिर्फ 3,090 वोट ही मिल सके, जो विपक्ष की कमजोर उपस्थिति को दिखाता है।

हालाँकि विसावदर में मिली हार भाजपा के लिए एक चेतावनी भी है। यह हार दिखाती है कि पार्टी को अपनी रणनीतियों पर फिर से विचार करना होगा और स्थानीय स्तर पर मौजूद आंतरिक संघर्षों और नेताओं की नाराजगी को गंभीरता से लेना होगा।

भाजपा को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि हर क्षेत्र में उसका संगठन और नेतृत्व एकजुट और मजबूत रहे। कुल मिलाकर, जहाँ कादी की बड़ी जीत भाजपा को आत्मविश्वास देती है, वहीं विसावदर की हार उसे आत्ममंथन करने का मौका भी देती है, ताकि भविष्य में और मजबूत होकर सामने आ सके।

2022 के मुकाबले अब भाजपा बेहतर स्थिति में

अगर पूरे गुजरात की बात करें तो विसावदर उपचुनाव में मिली हार से भाजपा को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। दरअसल, आज की तारीख में भाजपा 2022 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले ज्यादा सीटों के साथ और भी मजबूत स्थिति में है।

जहाँ तक विसावदर की बात है, यह सीट पहले से ही भाजपा के पास नहीं थी, इसलिए यहाँ मिली हार को पार्टी के लिए झटका नहीं माना जा सकता। इस नजरिए से देखें तो भाजपा की स्थिति पहले से बेहतर है और एक सीट पर हार उसकी बड़ी सफलता की तस्वीर को धुँधला नहीं करती।

अब अगर 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को मौजूदा हालात से जोड़कर देखा जाए, तो साफ होता है कि भाजपा का जनाधार बना हुआ है और पार्टी राज्य में पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनी हुई है।

विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 2022 में बड़ी ऐतिहासिक जीत हासिल की। कुल 182 में से भाजपा ने 156 सीटें जीतकर एक नया रिकॉर्ड बनाया और सरकार बनाई। वहीं, कॉन्ग्रेस को सिर्फ 17 सीटें मिलीं और आम आदमी पार्टी को 5 सीटों पर जीत मिली। इसके अलावा समाजवादी पार्टी को 1 सीट और 3 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। इस चुनाव में भाजपा की शानदार सफलता ने साफ कर दिया कि गुजरात में उसका जनाधार बहुत मजबूत है।

अगर मौजूदा हालातों पर नजर डालें तो गुजरात विधानसभा में इस समय भाजपा के पास 162 सीटें हैं, जबकि कॉन्ग्रेस सिर्फ 12 सीटों पर सिमट गई है। आम आदमी पार्टी ने विसावदर में जीत दर्ज करके अपनी पिछली स्थिति को बरकरार रखा है।

अगर तुलना करें तो 2022 में भाजपा के पास 156 सीटें थीं, जो अब बढ़कर 162 हो गई हैं। यानी पार्टी ने पिछले तीन सालों में 6 और सीटें अपने नाम की हैं। यह दिखाता है कि राज्य में भाजपा की पकड़ और प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

विसावदर उपचुनाव में मिली हार भी भाजपा के लिए कोई बड़ा झटका नहीं है, क्योंकि यह सीट पहले से ही उसके पास नहीं थी। इस लिहाज से देखें तो भाजपा की स्थिति पहले से और मज़बूत हुई है और उसकी विधानसभा में संख्या में बढ़ोतरी ने यह साफ कर दिया है कि वह अब भी राज्य की सबसे ताकतवर पार्टी बनी हुई है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में राजगुरु भार्गव ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

कॉकरोच नहीं थे चंदा बाबू के बेटे, न CM की बेटी की शादी में शो रूम लूटने वाले कॉकरोच थे: मीडिया को दोषी बता जंगलराज को झुठला नहीं सकते तेजस्वी यादव

बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने है। पक्ष-विपक्ष अपने-अपने हथियारों को धार देने में जुटा है। मीडिया में भी बिहार को लेकर राजनीतिक साक्षात्कारों का सीजन लौट आया है। इसी कड़ी में बिहार के विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सामाचार एजेंसी ANI से करीब 57 मिनट की लंबी बातचीत की है।

इस दौरान तेजस्वी यादव ने बीजेपी नीत एनडीए से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कई आरोप लगाए। बिहार के हालात को बदतर बताने की कोशिश की। यह भी दावा किया कि 2020 का चुनाव राजद को धांधली से हराया गया था और इस बार उनकी पार्टी का बिहार की सत्ता में आना तय है।

इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। चुनावी मौसम में हर पार्टी/नेता अपने विरोधियों को नकारा बताते हैं। जब तक अंतिम नतीजे नहीं आते हर पार्टी/नेता अपनी जीत के दावे करती है। चुनाव के बाद हार का ठीकरा फोड़ने के लिए बकरा खोजते हैं।

इस साक्षात्कार के दौरान तेजस्वी यादव ने मीडिया पर भी निशाना साधा, जो भारत की राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उदय के बाद से विपक्षी नेताओं के लिए सबसे जरूरी कार्यों में से एक बन चुका है। तेजस्वी यादव ने नरेंद्र मोदी की लगातार तीसरी जीत से लेकर बिहार के जंगलराज तक का ठीकरा मीडिया पर फोड़ने की कोशिश की।

उन्होंने कहा कि मीडिया गुलाम हो चुकी है और उसके प्रोपेगेंडा से बीजेपी जीत रही है। जब उनसे पूछा गया कि बिहार से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक ने उनसे कब अनफेयर ट्रीटमेंट किया तो जवाब में तेजस्वी यादव ने कहा कि राजद की जब भी सरकार आती है तो कॉकरोच की मौत को भी बड़ा बनाकर दिखाया जाता है। आज अपराध हो रहे हैं, लेकिन कोई उसे जंगलराज नहीं बोलता है।

तेजस्वी यादव का यह भी कहना था कि कोई भी घटना होने पर अपराधी को राजद और उसके लोगों से जोड़ दिया जाता है। उसे लालू यादव और तेजस्वी यादव का करीबी बताकर मीडिया दिखाती है। उन्होंने कहा कि राजद की सरकारों को मीडिया ‘महाजंगलराज’ बातकर पेश करती है। कहा जाता है कि उस समय लोग बाहर नहीं निकलते थे। उन्हें उठा लिया जाता था।

आगे तेजस्वी यादव कहते हैं कि कानून-व्यवस्था की स्थिति की तुलना आँकड़ों के आधार पर ही हो सकती है। यदि राजद सरकारों से एनडीए सरकार के समय के अपराध के आँकड़ों की तुलना की जाए तो पता चलता है कि नीतीश कुमार के राज में अपराध सबसे बेलगाम है। लेकिन मीडिया सवाल नहीं पूछ रहा।

आप नीचे लगे वीडियो में 12 मिनट से लेकर 17 मिनट 40 सेकेंड के बीच यह पूरी बातचीत सुन सकते हैं।

जंगलराज ​बिहार का भयावह अतीत है

जंगलराज- एक ऐसा शब्द है, जिसका बिहार की राजनीति में बार-बार लगातार इस्तेमाल होता है। 1990 से 2005 तक का वह शासनकाल जब तेजस्वी यादव के माता-पिता लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रहीं, उस कार्यकाल को ‘जंगलराज’ कहा जाता है।

उस दौर में बिहार ने जातीय नरसंहार का भयावह सिलसिला देखा। ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा सुना। अपहरण को ‘उद्योग’ बनते देखा। एक मुख्यमंत्री की बेटी की शादी में शो रूम लूटते और भय से कारोबारियों को बिहार छोड़कर भागते देखा। रोजी-रोजगार से लेकर शिक्षण-स्वास्थ्य संस्थानों को मरते देखा। हेमा मालिनी के गालों की तरह सड़क बनाने का वादा करने वालों के राज में गड्ढों वाली सड़क पर जनता को हिचकोले खाते देखा। लालटेन वाला अंधकार युग देखा है।

सीवान के चंदा बाबू नाम के एक पिता के दो बेटों को तेजाब से नहलाने और एक को गोली मरवा देने वाला राजद का नेता देखा। राजद के उस विधायक को भी देखा जो एक दलित बच्ची को उसके घर से उठाकर अपनी जीप में डालता है। उससे रेप करता है। उसी दौर में IAS अधिकारी बीबी विश्वास की पत्नी, माँ, भतीजी का लगातार दो साल तक यौन शोषण किया गया। जब मामला सामने आया तो आरोपित को बचाने में पूरी सरकार को लगते देखा।

एएनआई को दिए इंटरव्यू में तेजस्वी यादव जंगलराज को झुठलाने की कोशिश करते हुए उदाहरण देने की बात करते हैं। ऊपर मैंने चंद घटनाओं के बारे में बताया है। पर ऐसी घटनाओं की फेहरिस्त इतनी लंबी और भयावह है कि मेरी उँगलियाँ थक जाएँगी, की बोर्ड दबाव से उखड़ जाएँगे, पढ़ते-पढ़ते आपकी आँखें धँस जाएँगी, लेकिन जंगलराज की वे घटनाएँ खत्म नहीं होंगी जो दर्ज हैं और उनसे अधिक जो कहीं दर्ज ही नहीं हुईं।

तेजस्वी यादव को बताना चाहिए कि इनमें से कौन सी घटना कॉकरोच का मरना है। या फिर इनमें से कौन सी घटना को अंजाम देने वालों का राजद से लिंक नहीं रहा है, बल्कि वे कॉकरोच थे।

क्या आँकड़ों की बात करने से धुल जाएगा जंगलराज?

यह सत्य है कि नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में अपराध पर जिस तरह अंकुश लगाया था, जैसे अपराधियों का दमन किया था, बाद में वैसा नहीं दिखा। इसकी सबसे बड़ी वजह नीतीश कुमार का दो मौकों पर राजद के साथ मिलकर सरकार बनाना भी है।

यह भी सच है कि बिहार पुलिस के पास दर्ज अपराधों की संख्या को एकमात्र मानक मान लिया जाए तो लालू-राबड़ी के 15 साल के मुकाबले संख्या कहीं अधिक दिखती है। पर यह अधूरा सत्य है। मीडिया और खासकर सोशल मीडिया के विस्तार से अब किसी अपराध को दफन कर देना आसान नहीं रहा। लोग मामले दर्ज कराने थाने तक पहुँच रहे हैं। बिहार ही नहीं अन्य राज्यों में भी इस पैमाने पर आपको नंबर अधिक ही देखने को मिलेंगे।

पर जंगलराज केवल अपराध की संख्या से नहीं आता। आँकड़ों में चंदा बाबू के तीन बेटों का मारा जाना तो केवल तीन हत्या के रूप में दर्ज है। लेकिन, क्या यही आँकड़े यह भी बताते हैं कि उन्हें किस बेरहमी से मारा गया था? चंदा बाबू ने किस भय में जिंदगी गुजारी? इस घटना ने कितने माँ-बाप को डराया ? इसने कितने शहाबुद्दीन को कानून को रौंद देने की छूट दी?

डाटा भले यह बता दे कि कितनी हत्या हुई। कितने किडनैप किए गए। लेकिन, क्या उससे यह भी पता चलेगा कि उस दौर में हत्या और अपहरण एक ‘उद्योग’ बन चुका था? एक कारोबार था, पैसे कमाने का एक जरिया था? राजनेताओं, अधिकारियों और माफियाओं का ऐसा गठजोड़ इसके पहले कहीं देखा ही नहीं गया था? और सबसे बड़ी बात अपराध का साम्राज्य शहाबुद्दीन जैसे गुंडों और ‘सालों’ के भरोसे चलता था?

बाथे नरसंहार हो या अन्य जातीय नरसंहार, डाटा में वह केवल चंद लोगों की हत्या कही जाएगी। लेकिन इसने भूमिहारों का जनमानस किस वृहद रूप से प्रभावित किया, वह डाटा से सामने नहीं आएगा। ‘भूरा बाल साफ करो’ के नारे से सवर्णों में पैदा हुआ डर आँकड़े नहीं बताते। डाटा नहीं बताता कि बिहार में लोगों ने अपना सरनेम छिपाना शुरू कर दिया था।

मीडिया का गढ़ा नहीं है जंगलराज

ANI को दिए साक्षात्कार में तेजस्वी यादव यह बताने की कोशिश करते हैं कि ‘जंगलराज’ मीडिया का गढ़ा प्रपंच है। वह यह भी बताने की कोशिश करते हैं 2014 से पहले मीडिया दूध की धुली थी। वास्तविकता यह है कि 2014 से पहले भी मीडिया चारा घोटाले के सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव पर ‘मेहरबान’ थी, आज भी है।

मुख्यधारा की मीडिया हो या लिबरल वामपंथी गैंग उसने पहले लालू यादव की सामाजिक न्याय के मसीहा के तौर पर छवि गढ़ने की कोशिश की। उसे राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की। बाद में इस लालू यादव की ‘मैनेजमेंट गुरु’ के तौर पर ब्रांडिंग की कोशिश की। यह मीडिया इतनी दरबारी रही है कि वह लालू यादव के कुर्ता फाड़ हुड़दंग को ही होली मानती थी।

यह बि​हारियों का जीवट था कि इन छवियों के सामने उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे जंगलराज की हर एक पीड़ा लेकर सामने आए। उन्होंने कानूनी लड़ाइयाँ लड़ी। सोशल मीडिया ने उन्हें दफन कर दी गई घटनाओं को फिर से सामने लाने का मंच दिया। फिर मीडिया गैंग भी ‘जंगलराज’ के सत्य को स्वीकार करने के लिए मजबूर हुई।

तेजस्वी यादव को तो इस मीडिया का शुक्रगुजार होना चाहिए, क्योंकि वह उनमें भी बिहार का भविष्य देखती है। वह उनके जंगलराज के दाग धोने की हरसंभव कोशिश करती है। अपराध के आँकड़े सामने रखकर यह जताने की कोशिश करती है कि जिसे जंगलराज कहा जाता है वो असल में ‘शांति के दिन’ थे।

पर तेजस्वी यादव का दुर्भाग्य यह है कि जंगलराज का सत्य बिहार के भीतर इतने गहरे तक धँसा है कि वह इन थोथले कु(तर्कों) के झाँसे में नहीं आता। लालू यादव के पूरे कुनबे के इसी दुर्भाग्य में बिहार का ‘सौभाग्य’ छिपा है।

बांग्लादेश में हिंदुओं का दमन जारी, ढाका में इस्लामी कट्टरपंथियों ने घेरा दुर्गा माता का मंदिर : कहा – ‘खुद मंदिर हटा लें, वर्ना तोड़ देंगे’, दी कुछ घंटों की मोहलत

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में भी मंदिर सुरक्षित नहीं है। शहर के खिलखेत इलाके में मुस्लिम भीड़ ने सोमवार (23 जून 2025) की रात एक हिंदू मंदिर को घेर लिया और मंगलवार तक तोड़ने की धमकी दी।

रिपोर्ट के अनुसार, ‘श्री श्री दुर्गा मंदिर’ इस इलाके का भव्य मंदिर है, जो इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर है। यहाँ बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। सोमवार को भी काफी संख्या में भक्त मौजूद थे, जब इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हिंदू भक्तों को मंगलवार (24 जून) दोपहर 12 बजे तक मंदिर खुद से तोड़ने या सजा भुगतने की धमकी दी।

मंदिर में मौजूद हिन्दू भक्त सुमन सुधा के मुताबिक इस्लामिक कट्टरपंथियों ने कहा, “अगर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय उनके हुक्म के आगे नहीं झुका तो वे हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर देंगे।”

मंदिर के पास भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस पहुँची और मामले को शांत कराया। घटना पर इंस्पेक्टर मोहम्मद आशिकुर रहमान ने कहा, “हमें घटना के बारे में पता चला है। हमारे वरिष्ठ अधिकारी मामले को (मंगलवार तक) सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।”

उन्होंने माना, “कुछ मुस्लिम वहाँ गए और तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर दी।” बाद में रहमान ने हिंदू मंदिर को तोड़ने के अल्टीमेटम को मंदिर के पास हुई बहसबाजी का नतीजा बताया और मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “हम पूरे मामले की जाँच कर रहे हैं ताकि कोई अप्रिय स्थिति पैदा न हो।”

1400 साल पुराने चंडी माता मंदिर की जमीन पर अब्दुल ने किया कब्जा

बांग्लादेश के ही एक अन्य मामले में कूमिला में अब्दुल अली नाम के व्यक्ति ने हिंदू मंदिर की जमीन पर कब्जा कर लिया। ये मामला लालमाई इलाके में 1400 साल पुराने चंडी माता मंदिर से जुड़ा है, जहाँ अब्दुल अली ने मंदिर की जमीन पर टिन का घर बना लिया और उसे अपनी पैतृक संपत्ति घोषित कर दी।

बांग्ला ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार अली ने हिंदू मंदिर की जमीन पर एक अस्थायी घर बनाया और इसे अपनी ‘पैतृक संपत्ति’ घोषित कर दिया। जब शिव चंडी मंदिर की एक महिला भक्त ने अवैध अतिक्रमण का विरोध किया, तो अली और उसके आदमियों ने उस पर हमला कर दिया। पीड़िता की पहचान चंदना राहुत के रूप में हुई है।

शिव चंडी मंदिर समिति के अध्यक्ष दीपक साहा ने उनके दावों को खारिज करते हुए कहा, “प्रवेश द्वार के पश्चिम की ओर 600 एकड़ जमीन मंदिर के नाम पर दर्ज है। हाल ही में हमने श्रद्धालुओं के लिए इस जमीन पर एक विश्राम गृह बनाया था। लेकिन शनिवार को उसने (अब्दुल अली) हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया। अली ने जमीन पर घर बना लिया है।”

17 जून 2025 को हिंदुओं ने मंदिर की जमीन पर कब्जा करने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया ।

एक अन्य मामले में मुस्ताक नामक एक स्थानीय इस्लामिक कट्टरपंथी और उसके समर्थकों ने संन्यास मंदिर और राधा गोविंदो मंदिर दोनों पर कब्जा कर लिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं के घरों में जाकर धमकी दी कि यदि किसी ने मंदिर में पूजा-अर्चना करने की कोशिश की तो उन्हें जान से मार दिया जाएगा।

हिन्दुओं ने एकजुटता दिखाई और धमकी का विरोध किया। इस दौरान 16 जून 2025 को मुस्ताक के समर्थकों ने हिन्दू मंदिर कमेटी के अध्यक्ष अतुल चंद्रा सरकार पर हमला कर दिया जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए।

सिर्फ पिता ही नहीं, सिंगल मदर के आधार पर भी बन सकेगा जाति प्रमाण पत्र: ‘न्याय’ के लिए सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने अकेली माँ के बच्चे को ओबीसी सर्टिफिकेट जारी करने को लेकर गाइडलाइंस जारी कर सकता है।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अहम बताते हुए 22 जुलाई को अगली सुनवाई करने की बात कही है। ये याचिका दिल्ली की एक सिंगल मदर ने दायर की है।

याचिका में सिंगल मदर ने बच्चे की माँ के पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसे ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने की माँग की है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केवी विश्वनाथन और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस पर सुनवाई करते हुए दिशानिर्देश की बात कही। कोर्ट ने इससे पहले विस्तृत सुनवाई करने पर जोर दिया है।

केन्द्र सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसडी संजय ने भी इस मुद्दे पर विचार करने का अनुरोध किया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा है कि वह याचिका की कॉपी सभी राज्यों के वकीलों को दे। जिस राज्य को अपनी बात रखनी होगी, वह अगली सुनवाई में रख सकता है।

जुलाई में सुनवाई के दौरान कोर्ट ये देखेगा कि सिर्फ पिता की जाति के आधार पर बच्चे को ओबीसी आरक्षण का फायदा मिलना चाहिए या नहीं। अगर किसी ओबीसी महिला ने दूसरी जाति के पुरुष से शादी की तो उनके होने वाले बच्चों को भी ओबीसी सर्टिफिकेट मिलना चाहिए या नहीं।

याचिकाकर्ता ने उस नियम को चुनौती दी है जिसमें पिता के ओबीसी होने पर ही बच्चे को ओबीसी सर्टिफिकेट दिया जाता है। कोर्ट अब इस मुद्दे पर गाइडलाइन्स जारी करने की बात कही है।

इस मामले में कोर्ट ने 2012 के उस फैसले का जिक्र किया जिसमें एक जनजातीय महिला और सवर्ण पुरुष की शादी हुई थी। ‘रमेशभाई दभाई नाइका बनाम गुजरात’ मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चे की परवरिश माँ ने किया, जो एससी/ एसटी से संबंधित है। सवर्ण पिता का बेटा होने के कारण उसे जीवन में कोई फायदा नहीं मिला, बल्कि माँ के समुदाय के कारण वह अभाव, अपमान और कई तरह की बाधाओं के बीच जिंदगी जी रहा है। बच्चे को भी माँ के समुदाय का सदस्य माना जा रहा है, न सिर्फ माँ के समुदाय द्वारा बल्कि दूसरे समुदाय के द्वारा भी, तो उसे माँ के समुदाय का फायदा मिलेगा।

कोर्ट ने कहा कि अगर माँ एससी/ एसटी है और पिता नहीं है तो क्या होगा? ऐसे मामलों की विस्तृत सुनवाई के दौरान चर्चा की जाएगी।

लोगों को खूब पता है किसे कहते हैं ‘इराज’, पर आपकी ‘चाराबुद्धि’ ही समझने को नहीं है तैयार: तेजस्वी यादव ने हिंदुओं को कोसते हुए बेटे के नाम पर फिर फैलाया झूठ, जानिए क्या है सत्य

बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के घर में उनके बेटे के नाम पर जितनी चर्चा नहीं हुई होगी उससे अधिक चर्चा उस नाम को लेकर देश के अन्य हिस्सों में होने लगी है। कोई इसे संस्कृत का शब्द कह रहा है तो कोई ऊर्दू का। इतना ही नहीं कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने तो ‘इराज’ नाम का मजाक उड़ाते हुए तेजस्वी को ईरान और इराक नाम रखने की भी सलाह दे दी थी।

अब एक इंटरव्यू में तेजस्वी ने जहाँ फिर एक बार इस नाम को भगवान ‘हनुमान’ का नाम बताया है, वहीं दूसरी तरफ संस्कृति के जाने-माने विद्वान, शोधकर्ता और संपादक नित्यानंद मिश्रा ने तेजस्वी के बेटे के नाम ‘इराज’ को ‘कामदेव’ का नाम बताया है।

न्यूज एजेंसी ANI के तेजस्वी यादव से लिए गए एक इंटरव्यू की वीडियो में 31 मिनट 9 सेकेंड से 33 मिनट 10 सेकेंड तक उनके बेटे के इराज नाम पर चले सवाल-जवाब वाली क्लिप में तेजस्वी यादव से पूछा गया कि बीजेपी आप पर हमेशा आरोप लगाती है कि आप मुस्लिमों के हितैषी हैं, आपने बेटी का नाम कात्यायानी रखा है जो कि माँ दुर्गा के नाम पर है। वहीं बेटे का नाम इराज रखा है, जो कि भगवान हनुमान के नाम पर है। तो आप इसके जरिए क्या मैसेज देना चाह रहे हैं?

इस पर जवाब देते हुए तेजस्वी ने कहा कि जब हमने अपने बेटे का नाम इराज रखा और लालूजी ने सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। इसके बाद कई भक्त लोग ऐसे थे जिन्होंने कमेंट में लिखा कि इराज क्यों नाम रख रहे हो, एजाज खान नाम रख लेते। ईरान और इराक रख लेते।

तेजस्वी ने कहा “लोगों को ये नहीं पता है कि ‘इराज’ संस्कृत का शब्द है और इसका मतलब है ‘पवनपुत्र’। जो कि हनुमान जी का नाम है। उन लोगों को कोई ज्ञान नहीं है सनातन का।” भाजपा पर तंज कसते हुए तेजस्वी ने कहा कि पार्टी के लोगों को ना ही संविधान का ज्ञान है ना ही धर्म का।

वहीं हिंदू धर्म और संस्कृत पर एक दर्जन से अधिक किताबें लिख चुके संपादक नित्यानंद मिश्रा ने यूट्यूब पर एक वीडियो जारी करते हुए बताया है कि इराज नाम तो बेशक संस्कृत का शब्द है, लेकिन इसका भगवान हनुमान से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि लालू यादव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए इराज नाम रखने के पीछे कारण बताया था कि क्योंकि उनके पोते का जन्म मंगलवार को हुआ है और मंगलवार भगवान हनुमान का दिन माना जाता है, इसलिए उन्होंने हनुमान जी के ही एक नाम इराज पर अपने पोते का नाम रखा है।

नित्यानंद ने कहा कि उसके बाद से लगातार उनसे सवाल किया जा रहा था कि इराज नाम को लेकर काफी चर्चा है, वो बताएँ कि असल में यह शब्द हिंदी का ही है या संस्कृत का। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को ये भी शक है कि ये उर्दू का शब्द है। नित्यानंद ने इस पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि इंटरनेट भी इराज को भगवान हनुमान का नाम बता रहा है जबकि इराज संस्कृत का शब्द तो है, लेकिन यह हनुमान जी का नहीं बल्कि कामदेव का नाम है।

नित्यानंद ने बकायदा प्रमाण देते हुए बताया, “संस्कृत के दो प्रामाणिक कोश शब्दकल्पद्रुम और वाचस्पत्यम में इराज शब्द है। इन दोनों कोशों में हलायुध कोश का उद्धरण देते हुए बताया गया है कि इराज का अर्थ है कन्दर्प अर्थात कामदेव। इस प्रकार इराज एक संस्कृत नाम तो है पर कामदेव का, ना कि हनुमान का।”  

एक नहीं नित्यानंद ने अपनी वीडीयो में अनेक ऐसे साक्ष्य पेश किए जो इराज नाम का संबंध कामदेव से होने की पुष्ट करते हैं। अपनी वीडियो में उन्होंने ‘आप्टे संस्कृत हिंदी कोश’ और ‘मोनियर विलियम्स संस्कृत अंग्रेजी कोश’ का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें ईरज शब्द है और उसका मतलब है जिसका जन्म वायु से हुआ है, अर्थात भगवान हनुमान। उनका कहना है कि एक जैसे लगने वाले इन शब्दों में ईरज हनुमान का नाम है और इराज कामदेव का।

सोचने वाली बात है कि जिन्हें हिंदू धर्म और संस्कृति पर ज्ञान देने का शौक हो कम से कम उन्हें तो इससे संबंधित फैसले भली-भाँति जाँच कर के ही लेने चाहिए। असल में बात तो ये है कि लोगों की मानसिकता इतने तक ही सिमट कर रह गई है कि हम समाज में अपने किसी फैसले से समाज में एक उदाहरण पेश करें, भले ही बाद में उसकी आलोचना हो या वह पूर्ण असत्य और निराधार ही साबित क्यों ना हो जाए।

‘मैं दक्षिण एशियाई नहीं, भारतीय हूँ’: ब्रिटेन में ‘ग्रूमिंग जिहाद’ कर रहे पाकिस्तानियों की पहचान पर ‘नकाब’ डाल रही पश्चिमी मीडिया, यह भारत की पहचान से खिलवाड़

आजकल भारतीय उपमहाद्वीप की जगह दक्षिण एशिया शब्द ज्यादा इस्तेमाल किया जाने लगा है। यह बदलाव कोई संयोग नहीं था, बल्कि 1940 से 1970 के बीच अमेरिकी विदेश विभाग के नीति-नियामक संस्थाओं ने इसे जानबूझकर बढ़ावा दिया। इसका मकसद ऐसा शब्द देना था जो भारत समेत आस पास के पूरे क्षेत्र को एक साथ दर्शाए।

असल में इसमें एक और छुपा हुआ उद्देश्य था- पूरे क्षेत्र की भारतीय विरासत और सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर कर उसे उसके सनातन (प्राचीन) इतिहास से अलग करना। धीरे-धीरे यह एजेंडा काम भी करता गया।

अब हालात ये हैं कि दिवाली जैसे खास भारतीय त्योहार को दक्षिण एशियाई त्योहार कहा जाने लगा है और ओलंपिक विजेता नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ियों को दक्षिण एशियाई ओलंपियन कहा जाता है, न कि भारतीय।

भारतीय पहचान और हिंदू संस्कृति से समझौता करना एक कड़वा घूँट तो था ही, पर बात अगर गलत एजेंडे पर ही खत्म हो जाती तो शायद इतनी चिंता नहीं होती। लेकिन हालात इसके बिल्कुल उलट निकले। ऐसा लगा जैसे यह योजना पूरी नहीं हुई हो, क्योंकि बाद में दक्षिण एशिया शब्द का गलत इस्तेमाल किया गया।

इसका उपयोग कुछ खास धर्म, देश और विचारधारा से जुड़े लोगों के बड़े अपराधों को छिपाने के लिए किया गया और इन अपराधों का दोष पूरे क्षेत्र, खासकर भारत पर गलत तरीके से डाला गया।

दक्षिण एशिया शब्द के इस दुरुपयोग को कई बार बढ़ावा मिला। कई भारतीयों ने इसके विरोध में आवाज तो उठाई मगर इस गलत प्रथा को रोकने के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया गया। यह बात खासकर तब साफ तौर पर दिखी जब यूनाइटेड किंगडम में कई दशकों से नाबालिग ब्रिटिश लड़कियों के बलात्कार, उत्पीड़न और जघन्य अपराधों में शामिल पाकिस्तानी ग्रूमिंग गिरोहों का खुलासा हुआ। फिर भी, उनकी असली पहचान और पृष्ठभूमि को छुपाने के लिए उन्हें दक्षिण एशियाई कहकर एक बड़े समूह में डाल दिया गया।

इस तरह दक्षिण एशिया शब्द का इस्तेमाल न केवल क्षेत्र की असली पहचान को कमजोर करने के लिए हुआ, बल्कि अपराधों के दोष को भी गलत जगह पर ले जाने के लिए किया गया।

मैं अपनी पहचान का इस तरह का अनादर बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती, खास तौर पर तब जब यह उन लोगों की ओर से हो जो असली मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय, सब कुछ दक्षिण एशिया के नाम पर छिपाने की कोशिश करते हैं। ये लोग उन अपराधों को नजरअंदाज कर देते हैं जो उनके पसंदीदा समूहों द्वारा किए जाते हैं, लेकिन राजनीतिक शुद्धता की आड़ में उन्हें ढकने की कोशिश करते हैं।

उदाहरण के लिए, अगर कोई पाकिस्तानी कुछ अच्छा करता है, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो, तो उसका नाम, देश और धर्म खुलकर बताया जाता है, ताकि उसकी पहचान उससे जोड़ी जा सके। लेकिन अगर कोई भारतीय किसी छोटी गलती का भी दोषी पाया जाता है, तो उसके साथ ऐसा नहीं होता। उसकी राष्ट्रीयता और पहचान को दक्षिण एशिया कहकर नहीं छिपाया जाता, बल्कि उसे पूरी तरह उजागर किया जाता है।

इस तरह, भारतीयों को वो समान व्यवहार नहीं मिलता जो दूसरों को मिलता है। उनकी राजनीतिक शुद्धता उस समय अचानक गायब हो जाती है और भारतीयों की पहचान को ही निशाना बना लिया जाता है।

ठीक इसी तरह, जब कोई भारतीय या भारत कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करता है, तो उसका पूरा श्रेय भारत को नहीं दिया जाता। इसके बजाय, इसे दक्षिण एशिया की उपलब्धि बताकर पेश किया जाता है। जैसे इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे बाकी देशों ने भी अपना योगदान दिया हो।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को न सिर्फ अपनी उपलब्धियों का श्रेय दूसरों के साथ बाँटना पड़ता है, बल्कि कई बार उसे उन देशों के साथ दोष भी साझा करना पड़ता है, जिनका भारत से कोई सीधा लेना-देना नहीं होता। कभी-कभी तो हालात इतने कठिन हो जाते हैं कि असल हकीकत भी मजाक जैसी लगने लगती है।

प्रधानमंत्री कीर स्टारमर पर भड़के ब्रिटिश-भारतीय

मेरी तरह, कई भारतीयों और ब्रिटिश भारतीयों ने भी प्रधानमंत्री कीर स्टारमर पर नाराजगी जताई है। 2008 से 2013 तक जब वे लोक अभियोजन निदेशक (DPP) थे, तब उनके लिए गए फैसलों में खुद का बचाव करते हुए उन्होंने एशियाई ग्रूमिंग गैंग जैसे शब्द का इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से विवाद और बढ़ गया।

यह मामला इतना बढ़ा कि एलन मस्क तक को कहना पड़ा कि ब्रिटिश सरकार इस मुद्दे पर हमेशा टालमटोल करती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्टारमर अपने कार्यकाल के दौरान ग्रूमिंग गैंग से जुड़ी गंभीर और संस्थागत समस्याओं को भी ठीक से निपटा नहीं सके।

सिख और ब्रिटिश भारतीय नेताओं ने भी इस शब्दावली पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि एशियाई शब्द का इस्तेमाल करके श्रीलंकाई, भारतीय और अन्य समुदायों को भी बदनाम किया जाता है, जबकि ये ज्यादातर मामले पाकिस्तानी मूल के लोगों से जुड़े होते हैं। उनकी वजह से पूरे एशियाई समुदाय पर बेवजह दाग लगता है।

यूके हिंदू परिषद के अध्यक्ष कृष्ण भान ने निराशा जताई कि प्रधानमंत्री ने इन गंभीर मामलों को छुपाने के लिए ‘एशियन’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि जब हिंदू और सिख लड़कियाँ भी इन ग्रूमिंग गिरोहों की शिकार बनी हैं, तो ऐसे अस्पष्ट शब्द का इस्तेमाल करना सभी एशियाई समुदायों का अपमान है।

फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसाइटी इंटरनेशनल यूके के प्रवक्ता जय शाह ने भी इस दोहरे मापदंड पर सवाल किया कि हमें इस ग्रूमिंग गैंग्स की श्रेणी में क्यों रखा जाता है? उन्होंने कहा कि जब ग्रूमिंग गैंग्स की बात होती है, तो हमें एशियाई कह दिया जाता है। लेकिन जब कश्मीर जैसे मुद्दों की बात आती है, तो हमें खास तौर पर भारतीय बना दिया जाता है।

शाह ने कहा कि यह भेदभाव और पक्षपात बहुत अपमानजनक है। दोनों नेताओं ने साफ तौर पर कहा कि सभी एशियाई लोगों को एक ही रंग में रंगना गलत है, खासकर जब हकीकत में जिम्मेदार केवल कुछ खास समूह होते हैं।

समुदाय के नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि एशियाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि इससे समाज में पूर्वाग्रह भी बढ़ते हैं और अलग-अलग जातियों और समुदायों के बीच के भरोसे को भी खत्म करता है।

सिख फेडरेशन यूके ने राजनेताओं की आलोचना की कि वे राजनीतिक शुद्धता की आड़ में असली मुद्दों को नजरअंदाज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं, लेकिन सरकार और मीडिया लगातार इनसे मुँह मोड़ते रहे हैं।

हालाँकि इन अपराधों में मुस्लिम पाकिस्तानी पुरुषों की भूमिका साफ तौर पर सामने आई है, फिर भी ब्रिटिश सरकार और मीडिया ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर उठाने से हमेशा परहेज किया है।

‘गैर-इस्लामी जानवर हैं’ इस बयान से मशहूर हुए पत्रकार मेहदी हसन एक बार फिर पाकिस्तानी अपराधियों का बचाव करते नजर आए और उनको हैवान बताने पर अपना प्रलाप जारी रखा।

हसन ने टेस्ला के सीईओ एलन मस्क पर यह भी आरोप लगाया कि वे H1B वीजा को लेकर हुए टकराव के बाद दक्षिणपंथियों को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि असल में मस्क ने अमेरिका में उच्च कौशल वाले भारतीय पेशेवरों का समर्थन किया था।

पाकिस्तानी अपराधियों को उनकी असली पहचान से बुलाना जहाँ एक तरह से अस्वीकार्य माना जाता है, वहीं उनके द्वारा किए गए जघन्य अपराधों के लिए पूरे दक्षिण एशिया या एशिया को जिम्मेदार ठहराना सेक्युलरिज्म और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का आदर्श माना जाता है, यह साफ तौर पर दोहरापन है।

जो कोई भी इस एकतरफा सोच से हटकर कुछ कहता है, उसे तुरंत इस्लामोफोब या कट्टरपंथी कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि मुख्यधारा की मीडिया बार-बार सच्चाई को नजरअंदाज करती है। ये अपराधियों को बचाने की कोशिश करती है और पॉलिटिकल करेक्टनेस के नाम पर पूरे एशियाई महाद्वीप की छवि को नुकसान पहुँचाती है।

एशियाई ग्रूमिंग गैंग जैसे शब्दों का लगातार इस्तेमाल होता रहा है, जबकि कई रिपोर्टें और यूके के सिटी काउंसिल्स स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि ज्यादातर मामलों में अपराधी पाकिस्तानी मूल के थे। इसके बावजूद पूरे महाद्वीप को इस एक शब्द से बदनाम कर दिया जाता है, जो न सिर्फ गलत है, बल्कि गहराई से अनुचित भी।

सबसे दुखद बात यह है कि यूके सरकार और उसके अधिकारियों ने कई बार आरोपितों पर सख्त कार्रवाई से नजरअंदाज कर दिया ताकि वे नस्लवादी न लगें। ऐसे में न्याय, सच्चाई और पीड़ित लड़कियों की सुरक्षा जैसे सतही प्रथमिकताओं पर ही चिंता दिखी।

दक्षिण एशिया कह कर भारत की उपलब्धियों को कमतर दिखाना

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन  (ISRO) ने 2023 में चंद्रयान-3 मिशन का तीसरा चरण सफलतापूर्वक पूरा किया और चंद्रमा के अब तक अनछुए दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग की। यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, जिस पर पूरे देश ने गर्व महसूस किया। हालाँकि इस खुशी के बीच भारतीयों को अपने जहरीले पड़ोसी मुल्क की सोच की एक और झलक देखने को मिली।

पाकिस्तानी खेल पत्रकार फरीद खान ने सोशल मीडिया पर लिखा, “चंद्रयान-3 के 23 अगस्त की शाम 5:47 बजे भारतीय समयानुसार चंद्रमा पर उतरने की उम्मीद है। दक्षिण एशिया और तीसरी दुनिया के देशों के लिए यह एक बड़ा पल है।”

इस टिप्पणी ने कई भारतीयों को नाराज कर दिया। उनका मानना था कि यह उपलब्धि पूरी तरह भारत की है और इसे दक्षिण एशिया के नाम पर पेश करना गलत है। सोशल मीडिया पर फरीद खान के बयान को लेकर मीम्स बने औरल उन्हें खूब ट्रोल किया गया।

गौरतलब बात ये है कि जब चंद्रयान-2 अपने तय लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया था, तब पाकिस्तान के नेताओं और खासकर उस समय के मंत्री फवाद चौधरी ने इसरो, प्रधानमंत्री मोदी और भारत के अंतरिक्ष मिशन का खूब मजाक उड़ाया था।

ये वही लोग हैं जिनका खुद का अंतरिक्ष कार्यक्रम लगभग न के बराबर है, फिर भी वे भारत की असफलता पर खूब हँसे। लेकिन जब चंद्रयान-3 ने सफलता हासिल की, तो इन्हीं लोगों ने उसे दक्षिण एशिया की जीत बताने में एक पल भी नहीं गँवाया ताकि भारत की मेहनत का श्रेय खुद के नाम भी बाँटा जा सके। विलियम शेक्सपियर के हेमलेट से कहें तो, “बेशर्मी, तेरा नाम पाकिस्तान है।”

यह पूरा घटनाक्रम इस बात की साफ मिसाल है कि भारत की असफलताओं का मजाक उड़ाया जाता रहा है, लेकिन उसकी कामयाबियों में हिस्सेदार बनने की होड़ लग जाती है और सबसे आगे होता है यही पड़ोसी देश जो भारत को दुश्मन राष्ट्र कहता है और आतंकवाद के जरिए उसे हजार घावों से लहूलुहान करने की हर कोशिश में रहता है।

दुख की बात ये है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई लोग इस दोगले नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं और ऐसी भ्रामक बातें फैलाते हैं, जो भारत की असली तस्वीर को छुपा देती है।

पाकिस्तानियों ने भारतीयों के खिलाफ फैले नस्लवाद को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। ये बात अब सोशल मीडिया पर भी साफ दिखाई देने लगी है। वे भारतीयों को तरह-तरह की गालियाँ देते हैं, हिंदू धर्म पर निशाना साधते हैं और भारतीयों के खिलाफ झूठ और अपमानजनक बातें फैलाते हैं, जो अब उनके लिए एक आम आदत बन चुकी है।

ये लोग अक्सर भारत को गलत तरीके से दिखाते हैं। भारतीयों द्वारा किए गए किसी भी अपराध को पूरे देश से जोड़ देते हैं और सोशल मीडिया पर उन लोगों का साथ देते हैं जो भारतीयों के प्रति नफरत फैलाते हैं। खासकर वे उन पश्चिमी नस्लवादी विचारों के साथ दिखाई देते हैं जो भारतीय अमेरिकियों की कामयाबी और भारत के तेजी से बढ़ते विकास को पचा नहीं पाते।

फिर जब कोई उनके इस व्यवहार की सच्चाई सामने लाता है तो ये लोग उल्टे नाराज हो जाते हैं और खुद को पीड़ित बताने लगते हैं, जबकि असल में वे खुद दूसरों के खिलाफ जहर फैला रहे होते हैं।

निष्कर्ष

दक्षिण एशिया शब्द को अमेरिकी शिक्षाविदों ने इस क्षेत्र के लिए एक राजनीतिक तौर पर उदासीन रहने के तौर पर गढ़ा था। उद्देश्य ये था कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों के राजनेता, नीति निर्माता और शिक्षाविद् बिना किसी देश, खासकर गैर-भारतीय देशों, की संवेदनशीलता को ठेस पहुँचाए भारतीय उपमहाद्वीप पर चर्चा कर सकें ।

इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए बढ़ गया कि इससे उन देशों को संतुष्ट रखा जा सके जो भारतीय उपमहाद्वीप शब्द से असहज महसूस करते हैं और इनमें सबसे ऊपर पाकिस्तान का नाम आता है। पाकिस्तान हमेशा इस बात से परेशान रहा है कि पूरा क्षेत्र भारत के नाम से जुड़ा हुआ है, इसलिए दक्षिण एशिया जैसे शब्दों को बढ़ावा देना उसके लिए फायदेमंद रहा है।

अब, पाकिस्तान से बाहर बसे प्रवासी समुदायों, खासकर अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में रहने वालों ने इस शब्द को और ज्यादा लोकप्रिय बना दिया। इसका नतीजा ये हुआ है कि आज वैश्विक स्तर पर दक्षिण एशिया एक आम शब्द बन गया है, जिससे भारत की ऐतिहासिक और भौगोलिक भूमिका को धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में धकेला जा रहा है।

जैसा कि अब साफ होता जा रहा है, पाकिस्तानियों में एक अजीब सी मानसिकता बन गई है, एक तरफ वे भारत से जुड़ी हर अच्छी खबर से खुद को जोड़ना चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उसी भारत से जलते और नफरत करते भी हैं।

भारत की कोई भी उपलब्धि हो, उसे दक्षिण एशिया की सफलता बताकर पेश किया जाता है, ताकि पाकिस्तान जैसे देशों को भी उसका श्रेय मिल सके। वहीं जब पाकिस्तानियों द्वारा कोई अपराध होता है, तो उसके लिए पूरे क्षेत्र या पूरे एशियाई महाद्वीप को दोषी ठहरा दिया जाता है।

पाकिस्तान की स्थिति बिल्कुल वैसी है जैसे कोई केक रखना भी चाहता है और खा भी लेना चाहता है, यानी वह भारत की कामयाबियों में हिस्सा भी चाहता है और भारत के खिलाफ नफरत फैलाना भी नहीं छोड़ता।

फिर भी एक भारतीय होने के नाते, यह जरूरी है कि हम पाकिस्तान और उसके समर्थक उदार पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा हमारी पहचान के लगातार हो रहे उल्लंघन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाएँ। अब और यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान की गलतियों और हरकतों के लिए पूरे दक्षिण एशिया या एशिया को दोषी ठहराया जाए।

चाहे उन्हें राजनीतिक शुद्धता, इस्लामोफोबिया के डर या नस्लवाद-विरोधी के नाम पर कितना भी समर्थन मिल जाए चाहे वो मीडिया से हो, अंतरराष्ट्रीय राजनीति से या अन्य देशों के संस्थानों से। यह बात साफ है कि यही समर्थन भारतीयों को शायद ही कभी उसी इज्जत या सहानुभूति के रूप में मिलता है।

सच तो यह है कि पाकिस्तान जैसे एक मतलबी मुल्क के साथ भारत को न सिर्फ महाद्वीप और क्षेत्र, बल्कि सीमाएँ भी साझा करनी पड़ती हैं। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि भारत को उसकी गलतियों का जिम्मेदार ठहराया जाए। भारत की पहचान, उसका सम्मान और उसकी उपलब्धियाँ खुद की हैं और हमें उन्हें किसी और के नाम पर नहीं बाँट सकते।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुकमा राठौड़ ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे।

डॉन बॉस्को स्कूल में KG के बच्चे का ‘तिलक’ ईसाई महिला टीचर ने जबरन पोछा, कहा-दोबारा लगाया तो मार पड़ेगी: ऑपइंडिया से बोले पीड़ित परिजन- जानबूझकर करते हैं हिंदू धर्म का अपमान

असम के सोनितपुर ज़िले के सिरजुली स्थित डोन बॉस्को स्कूल में एक ईसाई कैथोलिक स्कूल की टीचर ने एक हिंदू बच्चे के माथे से ज़बरदस्ती ‘तिलक’ हटा दिया। मंगलवार (24 जून 2025) को भी बच्चे के साथ ऐसा ही व्यवहार किया गया और उसे दोबारा तिलक लगाकर आने पर धमकाया गया। इस घटना की जानकारी बच्चे ने माता-पिता को दी।

मामला क्या है?

सोमवार (23 जून 2025) को किंडरगार्टन (KG) में पढ़ने वाले बच्चे के माथे से टीचर रिनी रोज़ ने ‘तिलक’ मिटा दिया था। जब बच्चे ने घर जाकर अपने माता-पिता को यह बताया, तो वे तुरंत स्कूल पहुँचे और प्रिंसिपल (फादर) से शिकायत की। प्रिंसिपल ने माता-पिता को भरोसा दिलाया गया कि ऐसा फिर नहीं होगा।

लेकिन, अगले ही दिन मंगलवार (24 जून 2025) को बच्चे के साथ फिर वही हुआ। उसके माथे से तिलक ज़बरदस्ती हटाया गया। टीचर रिनी रोज़ ने बच्चे को धमकी भी दी कि अगर उसने दुबारा तिलक लगाया तो उसे मारा जाएगा। इस धमकी से बच्चा बहुत परेशान हो गया है।

हिंदू धर्म का जानबूझकर अपमान

पीड़ित बच्चे के चाचा, अवध किशोर वर्मा ने ढेकियाजुली पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई है। चाचा वर्मा ने कहा है कि यह सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि संविधान में दिए गए धर्म के पालन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। चाचा ने इसे धार्मिक भेदभाव और हिंदू धर्म का जानबूझकर किया गया अपमान बताया है।

पुलिस शिकायत के बाद डोन बॉस्को स्कूल पहुँची, लेकिन प्रिंसिपल ने बताया कि आरोपित टीचर रिनी रोज़ घर जा चुकी हैं। स्कूल प्रशासन ने ‘ऑपइंडिया’ को बताया कि वे मामले की जानकारी लेने पुलिस स्टेशन जा रहे हैं।

अवध किशोर वर्मा ने यह भी बताया कि कुछ दिन पहले इसी कैथोलिक स्कूल के अधिकारियों ने एक हिंदू बंगाली छात्र की ‘तुलसी माला‘ भी ज़बरदस्ती हटा दी थी।

बंगाल के स्कूल ने तुलसी माला पहनने से रोका

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना ज़िले में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था। बारासात के नबापल्ली जोगेंद्रनाथ बालिका विद्यामंदिर में हिंदू छात्राओं को स्कूल की प्रधानाचार्य ने तुलसी की माला पहनने से रोक दिया था। स्कूल की प्रधानाचार्य इंद्राणी दत्ता चक्रवर्ती को छात्रा को कहते हुए सुना था स्कूल में तुलसी की माला पहनकर नहीं आ सकतें।

स्कूल की प्रधानाचार्य के इस आदेश की ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। इस पर काफी हंगामा हुआ, जिसके बाद स्कूल की प्रधानाचार्य को अपना आदेश वापस लेना पड़ा और बकायदा बिना किसी शर्त माफी माँगनी पड़ी।

UCC की वकालत करने वाले जस्टिस शेखर यादव पर महाभियोग चाहते हैं सांसद, पर जिस जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में मिले नोटों के बंडल उन पर चुप्पी: क्या न्यायपालिका में ‘सुधार’ को लेकर गंभीर है विधायिका?

भारतीय राजनीति में इन दिनों दोहरे मापदंडों का ‘नंगा नाच’ चल रहा है और इस नाटक के मुख्य किरदार हैं विपक्षी सांसद, जो अपनी सुविधा के हिसाब से मुद्दों को उठाते और दबाते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव और जस्टिस यशवंत वर्मा के मामलों में विपक्ष का रवैया उनकी नीयत को साफ उजागर करता है।

एक तरफ जस्टिस यादव के खिलाफ महाभियोग की माँग को लेकर सांसदों की बेचैनी चरम पर है, भले ही उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस नोटिस को खारिज नहीं किया हो। दूसरी तरफ जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की कमेटी की सिफारिश के बावजूद विपक्षी सांसदों ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।

यह दोहरापन न केवल उनकी मंशा पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जनता की भलाई से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे केवल अपना एजेंडा चलाने और सरकार के खिलाफ हल्ला मचाने में मशगूल हैं।

जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग क्यों?

दरअसल, जस्टिस शेखर यादव का मामला पिछले साल दिसंबर में तब सुर्खियों में आया, जब उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में कथित तौर पर सांप्रदायिक टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने कहा था, “यह हिंदुस्तान है… और देश बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा।” इसके साथ ही उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन करते हुए मुस्लिम समुदाय की कुछ प्रथाओं पर टिप्पणी की थी।

पीछे ही पड़ गए विपक्षी सांसद

इस बयान पर विपक्षी सांसदों ने तुरंत महाभियोग का नोटिस तैयार कर लिया। 54 राज्यसभा सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कॉन्ग्रेस, तृणमूल कॉ्नग्रेस, आप, राजद और अन्य दलों के नेता शामिल थे। लेकिन इस नोटिस की प्रक्रिया में गड़बड़ियाँ सामने आईं। नौ सांसदों के हस्ताक्षर रिकॉर्ड से मेल नहीं खाए और एक सांसद के हस्ताक्षर दो बार पाए गए।

इसके बावजूद कपिल सिब्बल जैसे सांसद इस मुद्दे को बार-बार उठा रहे हैं, यह दावा करते हुए कि उप-राष्ट्रपति इस पर कार्रवाई नहीं कर रहे। सिब्बल ने तो यह तक कह दिया कि अगर नोटिस खारिज होता है, तो वे सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। यह बेचैनी और जल्दबाजी क्या दर्शाती है? यह साफ है कि विपक्ष इस मामले को तूल देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ उठाना चाहता है, ताकि जनता के बीच यह संदेश जाए कि वे ‘सेकुलरिज्म’ के रक्षक हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा पर साध ली चुप्पी

लेकिन जब बात जस्टिस यशवंत वर्मा की आती है, तो यही सांसद अचानक चुप्पी साध लेते हैं। जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में मार्च 2025 में आग लगी, और फायरफाइटर्स को वहाँ ‘जले हुए नोटों का पहाड़’ मिला। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की कमेटी ने 64 पेज की रिपोर्ट में साफ कहा कि ये नोट जस्टिस वर्मा के स्टोररूम में थे, जहाँ केवल उनके परिवार की पहुँच थी। कमेटी ने यह भी पाया कि जस्टिस वर्मा और उनके निजी सचिव ने फायर ऑफिसरों को इस मामले को दबाने के लिए कहा था।

कपिल सिब्बल ने बताया सबसे बेहतरीन जज

इतने गंभीर आरोपों के बावजूद जस्टिस वर्मा को न कोई ज्यूडिशियल काम सौंपा गया है, न उन्होंने इस्तीफा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की है और संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। लेकिन विपक्ष, खासकर कपिल सिब्बल इस मामले में जस्टिस वर्मा का बचाव कर रहे हैं। कपिल सिब्बल ने जस्टिस यशवंत वर्मा को ‘देश के सबसे बेहतरीन जजों में से एक’ करार दिया और सरकार पर आरोप लगाया कि वह कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करने की साजिश रच रही है।

यह दोहरापन क्यों? जब जस्टिस यादव के बयान का मामला आया, तो सिब्बल और उनके साथी सांसदों ने तुरंत महाभियोग की माँग की, लेकिन जस्टिस वर्मा के खिलाफ ठोस सबूत होने के बावजूद वे उनका बचाव कर रहे हैं। क्या यह उनकी अपनी सुविधा और एजेंडे का हिस्सा नहीं है?

न्यापालिका में सुधार नहीं, नरेटिव सेट करना है एजेंडा

विपक्ष का यह रवैया केवल सत्ता के खिलाफ हल्ला मचाने का हिस्सा है। जस्टिस यादव का मामला उनके लिए एक मौका है, जिसे वे सांप्रदायिक रंग देकर अपनी वोट बैंक की राजनीति चमकाना चाहते हैं। लेकिन जस्टिस वर्मा के मामले में, जहाँ भ्रष्टाचार का आरोप साफ तौर पर सिद्ध हो चुका है, वे चुप हैं, क्योंकि यह उनके ‘सेकुलर’ नैरेटिव में फिट नहीं बैठता। यह दोहरापन न केवल उनकी विश्वसनीयता को कम करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि उन्हें न्यायपालिका में सुधार या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ सरकार को घेरना और जनता को गुमराह करना है।

विपक्षी सांसदों की यह रणनीति नई नहीं है। वे हमेशा से चुनिंदा मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करते रहे हैं। उदाहरण के लिए जब 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, तब भी विपक्ष ने इसे सरकार के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। उस समय भी कपिल सिब्बल इस अभियान में सबसे आगे थे। लेकिन जब बात भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दों की आती है, तो यही नेता पीछे हट जाते हैं। यह साफ है कि उनकी लड़ाई सिद्धांतों के लिए नहीं, बल्कि सियासी फायदे के लिए है।

विपक्ष का यह नाटक जनता के सामने भी अब खुल चुका है। सोशल मीडिया खासकर एक्स पर भी लोग इस दोहरे रवैये की आलोचना कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “जब जज सांप्रदायिक बयान देता है, तो विपक्ष को महाभियोग चाहिए, लेकिन जब जज के घर से नोटों का पहाड़ मिलता है, तो वही लोग उसे ‘बेस्ट जज’ बताते हैं। यह कैसी राजनीति है?” एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “विपक्ष को भ्रष्टाचार से कोई दिक्कत नहीं, बस मुद्दा ऐसा चाहिए जो सरकार को घेर सके।” ये प्रतिक्रियाएँ दर्शाती हैं कि जनता अब विपक्ष के इस नकली नैरेटिव को समझ चुकी है।

न्यायपालिका में सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दे बेहद गंभीर हैं। लेकिन राजनीतिक दल इनका इस्तेमाल केवल अपनी सियासत चमकाने के लिए कर रहा है। जस्टिस यादव के मामले में उनकी बेचैनी और जस्टिस वर्मा के मामले में उनकी चुप्पी यह साफ करती है कि उनका मकसद जनता की भलाई नहीं, बल्कि सत्ता के खिलाफ नाटक करना है। जनता को अब इस नौटंकी को समझने और इन नेताओं के दोहरे चरित्र को बेनकाब करने की जरूरत है। अगर नेता गण वाकई में न्यायपालिका को मजबूत करना चाहता है, तो उसे दोनों मामलों में एक समान रुख अपनाना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे केवल अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं और यह जनता के साथ धोखा है।

ST परिवार के 40 लोगों की हुई ‘शुद्धि’ क्योंकि उनकी लड़की ने SC लड़के से कर ली शादी, लेकिन घृणा मनु से लेकर BJP-RSS तक फैलाई गई: जानिए वायरल Video का सच

ओडिशा में 40 सदस्यों वाली जनजातीय परिवार का ‘शुद्धिकरण’ किया गया। दरअसल परिवार की एक युवती ने दलित वर्ग (scheduled caste) के लड़के से शादी कर ली थी। अनुसूचित जनजाति (scheduled tribes )समाज की परंपरा के मुताबिक समाज का कोई व्यक्ति समाज से बाहर शादी नहीं कर सकता है।

शुद्धिकरण में शामिल 40 लोग युवती के परिवार के सदस्य या दूर के रिश्तेदार हैं। ये घटना 19 जून को राज्यगड़ा जिले के बैगानगोडा गाँव में हुई थी।

युवती ने अपने गाँव के एक अनुसूचित जाति के लड़के से शादी कर ली थी। इसके बाद गाँववालों ने पूरे परिवार को समाज से बाहर निकाल दिया। गाँव की पंचायत ने परिवार के 40 सदस्यों को सिर मुंडवाने का फरमान सुनाया। इस दौरान गाँव के देवता के सामने बकरे, सूअर और मुर्गियों की बलि दी गई। अनुष्ठान के बाद समाज को भोज खिलाया गया।

इस पूरे कार्यक्रम में जो खर्च आया वह परिवार को वहन करना पड़ा। सिर मुंडवाने की घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है।वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि परिवार के दर्जनों सदस्य सिर मुंडवाकर एक साथ खेत में बैठे हैं। इनलोगों ने अपने सिर झुका लिए हैं और कुछ लोग धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं।

वीडियो सामने आने के बाद प्रशासन ने जाँच के आदेश दिये हैं। स्थानीय बीडीओ बिजय सोई ने मीडियो को कहा कि ब्लॉक स्तर पर एक टीम बनाई गई है जो गाँव पहुँची है और मामले की जाँच कर रही है।

हालाँकि महिला के परिवारवालों ने सरकारी अधिकारियों को कहा है कि समाज के नियम तोड़ने की वजह से उन लोगों ने अपनी मर्जी से ये पूरा अनुष्ठान किया है। उनसे समाज ने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की।

वायरल वीडियो में गलत दावा किया गया

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए कई लोगों ने गलत प्रचार किया। कुछ लोगों ने ‘शुद्धिकरण’ को जाति-व्यवस्था से जोड़ा और सवर्णों पर आरोप लगाए।

एक ‘ट्राइबल आर्मी’ नाम की एक्स हैंडल ने वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि यह मनुवादी वर्चस्व और भारतीय समाज में फैले जातिवाद की खौफनाक तस्वीर पेश करता है। इसमें लिखा गया है कि ये केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समानतावदी मूल्य व्यवस्था पर हमला है। इसमें महिला को दूसरी जाति में शादी करने पर पूरे परिवार को ‘सजा’ देती है।

इस हैंडल ने यह आरोप लगाया कि शुद्धिकरण अनुष्ठान सवर्णों ने करवाया। जबकि यह अनुष्ठान परिवार ने अपने जनजातीय समुदाय को खुश करने के लिए किया था। परिवार को किसी जाति विशेष ने मजबूर नहीं किया था।

हैंडल ने जानबूझकर इसे उच्च जातियों द्वारा ‘उत्पीड़न’ के रूप में पेश किया है और जातिवाद के नाम पर जमकर सर्वर्णों को कोसा है।

कुछ अन्य हैंडलों ने जनजातीय समुदाय के ऐसे रीति-रिवाजों के लिए बीजेपी और आरएसएस को दोषी ठहराया है। घटना को लेकर हैंडल ने कहने की कोशिश की है कि यह भाजपा या संघ ही था जिसने परिवार के सदस्यों को शुद्धिकरण अनुष्ठान करने के लिए मजबूर किया।

कुछ मीडिया पोर्टल जैसे ललनटॉप ने अपने हेडलाइन से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की।

दरअसल जातियों का मामला आने पर अक्सर मीडिया, सोशल मीडिया मनुवादी कहते हुए सर्वर्णों को खरी-खोटी सुनाना शुरू कर देते हैं। वे ये तक जानने की जहमत नहीं उठाते है कि घटना में कौन शामिल है? किनके बीच हुई है? क्या वजह है?