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आजादी से पहले सृजित हुआ चर्चिल के लिए गोपनीय पद, बाद में भी जारी रहा CCA का पद: PM मोदी ने सुनाई सिस्टम के जड़ता की कहानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (फरवरी 10, 2021) को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान कहा कि सत्ता में हो या विपक्ष में हर किसी को किसानों के लिए काम करने की आवश्यक्ता है। किसानों को सशक्त बनाने की जिम्मेदारी हम सभी की है।

उन्होंने कहा कि हमारे यहाँ एग्रीकल्चर समाज के कल्चर का हिस्सा रहा है। हमारे पर्व, त्योहार सब चीजें फसल बोने और काटने के साथ जुड़ी रही हैं। यहाँ राजा जनक और कृष्ण के भाई बलराम ने भी हल चलाई है। कृषि के क्षेत्र में बदलाव की आवश्यक्ता है। हमारे यहाँ संभावना है। किसानों को सही तरीके से गाइड करना होगा। कृषि में निवेश की आवश्यक्ता है। केंद्र और राज्य सरकार उतना काम नहीं कर पा रही है। किसान के बस की भी बात नहीं है।

पीएम मोदी ने सुनाया यह किस्सा

पीएम मोदी ने आज लोकसभा में बोलते हुए 40-50 साल पुरानी घटना सुनाई। उन्होंने कहा कि आजादी से पहले यहाँ से चर्चिल को सिगार भेजी जाती थी। इसको लेकर पद भी सृजित किए गए थे। सीसीए (Churchill’s Cigar Assistant) का पद आजादी के बाद भी जारी रहा।

दरअसल, 60 के दशक में तमिलनाडु में राज्य के कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाने के लिए कमीशन बैठा था। उस कमेटी के चेयरमैन के पास एक लिफाफा आया, जिस पर ‘टॉप सीक्रेट’ लिखा था। उन्होंने देखा तो उसमें एक अर्जी थी। उसमें लिखा था- मैं बहुत सालों से सिस्टम में ईमानदारी से काम कर रहा हूँ लेकिन वेतन नहीं बढ़ रही है इसे बढ़ाया जाए। चेयरमैन ने लिखा कि आप कौन हो, पद क्या है। जवाब मिला कि मैं सरकार में मुख्य सचिव के कार्यालय में CCA के पद पर बैठा हूँ।

सवाल पर दिया गया यह जवाब

जब आयोग के सदस्यों ने खँगाला तो पता चला कि ऐसा तो कोई पद रिकॉर्ड पर है ही नहीं। इस मामले में आयोग के सदस्यों ने उन्हीं सज्जन से पूछा कि आप ही बताओ कि यह क्या पद है, क्या काम करते हो? उन सज्जन ने कहा कि यह तो गोपनीय जानकारी है और वह 1975 से पहले नहीं बता सकते। तब आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि यह तो बड़ी मुश्किल है। फिर आप ऐसा कीजिए कि 1975 के बाद जो आयोग बैठेगा, उसे बताइएगा।

यह था सीसीए का मतलब

बात बिगड़ती देख उस व्यक्ति ने राज खोला। उसने बताया कि सीसीए का मतलब है- चर्चिल सिगार असिस्स्टेंट। मामला कुछ यूँ था कि 1940 में जब विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, तब उनके लिए तमिलनाडु के त्रिची (तिरुचरापल्ली) से सिगार जाते थे। ये सिगार व्यवस्थित रूप से चर्चिल तक पहुँचते रहें, इसके लिए एक पद सृजित किया गया था। 

मजेदार बात यह है कि 1945 के बाद तो विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री नहीं रहे। फिर 1947 में भारत आजाद हो गया, लेकिन सीसीए का यह पद बना रहा। चर्चिल को सिगरेट पहुँचाने की जिम्मेदारी वाला पद मुख्य सचिव के कार्यालय में चल रहा था। उसने प्रमोशन और तनख्वाह के लिए चिट्ठी लिखी। दरअसल, इस घटना के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी ने व्यवस्था की उस सड़ांध को उजागर किया, जहाँ यथास्थिति बनाए रखने के चलते कई इसी तरह के आश्चर्यजनक और हास्यास्पद उदाहरण कायम हैं। पीएम ने कहा कि अगर हम बदलाव नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा, इससे बड़ा क्या उदाहरण हो सकता है।

पीएम ने कहा कि चर्चिल का उदाहरण बताता है कि मानव नवीनता से जब दूरी बना लेता है तब पुरानी व्यवस्थाएँ, जिसकी काेई तार्किकता बचती नहीं है, वैसे ही पड़ी रहती है। भारत काे अगर आगे बढ़ाना है ताे ऐसी व्यवस्थाओं काे हटाना ही हाेगा और कृषि मे किए गए सुधार उसी तरफ बढ़ा एक कदम है।

नेहरू का सहारा लेकर प्रियंका ने कृषि कानून पर किया हमला, लेकिन भूल गई कि कैसे पहले PM ने दिया था ‘कॉन्ग्रेस घास’ का तोहफा

नए कृषि कानून के खिलाफ दिल्ली सीमा पर चल रहे किसान विरोध प्रदर्शन में कॉन्ग्रेस अपने राजनीतिक फायदे की ताक में है। कॉन्ग्रेस मोदी सरकार के खिलाफ लोगों को बरगलाने, उनके बीच मनमुटाव पैदा करने और संदेह के बीज बोने का भरपूर प्रयास कर रही है।

इस बीच कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका गाँधी आज उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में किसान महापंचायत में पहुँची थी, जहाँ उन्होंने नए कृषि कानूनों को लेकर लोगों के भीतर डर फैलाने का काम किया।

प्रियंका गाँधी ने कहा, “1955 में जवाहरलाल नेहरू ने जमाखोरी के खिलाफ कानून बनाए थे। लेकिन इस कानून को भाजपा सरकार ने खत्म कर दिया है। अब इन नए कानूनों से सिर्फ ‘अरबपतियों’ को मदद मिलेगी। उन्होंने कहा अब ये किसानों की उपज की कीमत खुद तय करेंगे।”

वहीं अपने राजनीतिक फायदे को मद्देनजर रखते हुए प्रियंका ने आगे कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी सत्ता में आने पर नए कानूनों को खत्म कर देगी। तीन कृषि कानून राक्षस की तरह हैं। अगर सत्ता में वापसी के लिए उन्हें वोट दिया जाता है, तो कॉन्ग्रेस की सरकार के तहत कृषि कानूनों को रद्द किया जाएगा।”

एक तरफ जहाँ प्रियंका गाँधी वाड्रा अपने परदादा जवाहरलाल नेहरू के तारीफों की पुल बाँधने में जुटी थी, कि कैसे उन्होंने देश के हित में काम किया है, वहीं ऐसे समय पर उन बातों पर भी विचार करना महत्वपूर्ण है कि कैसे देश के पहले प्रधानमंत्री और कॉन्ग्रेस के प्रमुख द्वारा लिए गए फैसले के चलते देश भर में एक जहरीले खरपतवार का प्रसार हुआ था।

स्वतंत्रता के बाद 1950 के दशक के दौरान भारत खाद्य सामग्री की कमी का सामना कर रहा था। इस संकट को कम करने के लिए उस समय केंद्र में कॉन्ग्रेस सरकार ने संयुक्त राज्य अमेरिका से गेहूँ आयात करने का फैसला किया था। बता दें, उस वक्त संयुक्त राज्य अमेरिका के पीएल 480 (शांति के लिए भोजन) कार्यक्रम के तहत खाद्य-अनाज प्राप्त किया गया था। लेकिन भारत को जो गेहूँ भेजा गया था वह काफी खराब गुणवत्ता का था, और इसे पार्थेनियम के बीज के साथ मिलाया गया था। जिस वजह से संयुक्त राज्य अमेरिका के इस शिपमेंट से भारत में खतरनाक खरपतवार फैल गया।

पहली बार इसे पाँच दशक पहले पुणे में देखा गया था, हालाँकि यह अब भी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पाया जा सकता है। आरोप है कि जब पहली बार खरपतवार देखा गया, तब कॉन्ग्रेस की सरकार ने इसके प्रसार को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया था। जिस कारण लोगों ने खरपतवार को ‘कॉन्ग्रेस घास’ का नाम दे दिया था और इसे राष्ट्र को कॉन्ग्रेस सरकार की तरफ से तोहफा माना।

बता दें, जहरीला और आक्रामक पार्थेनियम, जिसे आमतौर पर ‘कॉन्ग्रेस घास’ या ‘गाजर घास’ के रूप में जाना जाता है, को दुनिया के कई हिस्सों में उपद्रव के रूप भी जाना जाता है। त्वचा और श्वसन रोगों वाला यह जहरीली खरपतवार हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश सहित कई भारतीय राज्यों में पहले कहर बन चुका है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस घास गाँवों में सड़कों के किनारे बहुत तेजी से बढ़ती है, जोकि कई अन्य वनस्पतियों को समाप्त कर देता है। खरपतवार उन जगहों पर भी पनपने में कामयाब रहे, जहाँ खरपतवारों की अन्य प्रजातियाँ नहीं बची हैं। यहाँ तक कि मवेशी भी उनसे दूर रहते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, खरपतवार को हाथों हाथ बढ़ने से पहले ही हटाना पड़ता है ताकि वह और अधिक न फैले। यह प्रजाति मनुष्यों के साथ-साथ जानवरों के लिए भी काफी हानिकारक है।

वहीं अगर इसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाता है तो थोड़े समय के भीतर ही यह घास आसपास के सारे जगहों को घेरकर वहाँ फैल सकती है। इसका पौधा लगभग 5-6 फीट की ऊँचाई तक बढ़ता है और 5,000-10,000 बीजों का उत्पादन कर सकता है। इसके बीज काफी हल्के होते है, जो हवा, बारिश, मानव और मवेशियों की मदद से दूर-दूर तक फैल सकते हैं, जिससे हर जगह आसानी से फैल जाता है।

वामपंथियों ने लाल बहादुर शास्त्री को बताया था ‘अमेरिकी एजेंट’: PM मोदी ने कृषि कानून के विरोध को ‘हरित क्रांति’ से जोड़ा

तीन कृषि कानूनों को लेकर चल रही राजनीति को देखते हुए सोमवार (8 दिसंबर, 2021) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वामपंथियों को जमकर लताड़ा। पीएम मोदी ने केंद्र द्वारा लागू किए गए तीन कृषि कानूनों का दृढ़ता से बचाव किया, जोकि कृषि क्षेत्र में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव लाएँगे।

देश के छोटे और सीमांत किसानों के फायदे को देखते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कृषि कानूनों को निरस्त नहीं किया जाएगा। हालाँकि, विरोध में उतरे किसानों को लेकर पीएम ने कहा कि सरकार आपसे इस मामले में खुलकर बातचीत करने को भी तैयार है।

राज्य सभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि वामपंथी इकोसिस्टम द्वारा कृषि सुधारों के खिलाफ जमकर बाधाएँ पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जैसा कि उन्होंने हरित क्रांति के वक्त भी किया था।

राज्यसभा में अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने 1960 के दशक के मध्य में शुरू हुई हरित क्रांति और पिछले छह वर्षों में उनकी सरकार द्वारा शुरू किए गए कृषि क्षेत्र सुधारों को एक समानांतर बताया। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे वामपंथियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आलोचना की थी, जैसा अब वे हमारी सरकार द्वारा किए जा रहे सुधारों को शुरुआत करने से रोक रहे है।

गौरतलब है कि नेहरू की मृत्यु और भारत-चीन 1962 के युद्ध में हार के बाद, देश खराब समय का सामना कर रहा था, बड़े पैमाने पर भोजन की कमी, मानसून विफलताओं आदि के साथ, उस समय भारत PL 480 के तहत भोजन के लिए अमेरिकी सहायता पर निर्भर था। इस योजना के जरिए अमेरिका भारत को खाने का सामान भेजता था, ताकि भारतीय भूखे न रहें।

हालाँकि, मौजूदा स्थिति को देखते हुए पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नई किस्मों (फसलों), हाइब्रिड, पौधों के प्रजनन, उर्वरकों और आधुनिक सिंचाई (जो कि हरित क्रांति का नेतृत्व किया) को लाकर इस खाद्य असुरक्षा को समाप्त करने का संकल्प लिया था।

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए, पीएम मोदी ने बताया कि कैसे कृषि सुधारों में सख्त फैसले लेने के लिए शास्त्री कैबिनेट में कोई कृषि मंत्रालय लेना ही नहीं चाहता था। उन दिनों कॉन्ग्रेस नेताओं में चुनौती लेने की हिम्मत नहीं थी। प्रधानमंत्री ने याद किया कि ‘हरित क्रांति’ के दौर में खाद्य सुरक्षा हासिल करने और कृषि क्षेत्र में सुधार लाने जैसे साहसी निर्णय लेने के लिए लाल बहादुर शास्त्री के खिलाफ उन्हीं की पार्टी में विरोध और लोगों का रोना चालू था।

मोदी ने कहा, “हरित क्रांति के समय जो सुधार हुए थे, उसे लेकर भी आंदोलन हुए। लाल बहादुर शास्त्री का यह हाल था कि कोई कृषि मंत्री बनने को तैयार नहीं था। लेकिन देश की भलाई के लिए शास्त्री जी आगे बढ़े। लेफ्ट पार्टी, जो इस समय भाषा बोलती है यही भाषा उस समय भी बोल रहे थे कि अमेरिका के इशारे पर कॉन्ग्रेस ऐसा कर रही रही है।”

उन्होंने बताया कैसे आज ही कि तरह उस दौरान भी कई विरोध आंदोलन हुए थे। वर्तमान में विरोध प्रदर्शनों को हवा देने वाले देश में वामपंथी इकोसिस्टम पर हमला करते हुए, पीएम मोदी ने कहा कि हरित क्रांति का विरोध करने के लिए वामपंथियों ने उसी भाषा का उपयोग किया था, जैसा वे अब कर रहे हैं।

पीएम मोदी ने याद करते हुए कहा कि, कैसे हरित क्रांति के दौर में कॉन्ग्रेस के नेताओं को अमेरिका का एजेंट तक कह दिया जाता था। “मुझे भी आज वैसा ही बोला जाता है। देशभर में हजारों आंदोलन चल रहे थे। लेकिन शास्त्री जी ने जो किया आज उसी का परिणाम है कि देश अपनी मिट्टी में अनाज उगा रहा है। आज मुझे भी गाली दी जा रही है। कोई भी कानून आया हो, कुछ वक्त के बाद सुधार होते ही हैं।”

विपक्ष कृषि कानूनों के रंग पर कर रहा चर्चा, कंटेंट और इंटेंट पर नहीं: लोकसभा में PM मोदी का विरोधियों पर वार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (फरवरी 10, 2021) को लोकसभा में कहा कि विकट और विपरीत काल में भी यह देश किस तरह से रास्ता चुनता है, राष्ट्रपति ने अभिभाषण में यह बात बताई है। राष्ट्रपति का अभिभाषण हर एक शब्द देशवासियों में विश्वास पैदा करने वाला है। राष्ट्रपति का अभिभाषण भारत के 130 करोड़ भारतीयों की संकल्प शक्ति को प्रदर्शित करता है।

पीएम मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान जवाब देते हुए कहा हम जल्दी ही आजादी के 75 साल पूरे करने वाले हैं। आजादी का 75वाँ साल गर्व का साल होगा। 75 वर्ष का पड़ाव गर्व करने और आगे बढ़ने का मौका होगा। आजादी के 75वें साल में हमें नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ना है। कोरोना संकट काल में देश ने अपना रास्ता चुना और आज हम दुनिया के सामने मजबूती से खड़े हैं। इस दौरान भारत सभी भ्रमों को तोड़कर आगे बढ़ा है।

पीएम मोदी ने कहा कि हर राष्ट्र का एक मिशन होता है, एक नियति होती है जिसे वह प्राप्त होता है। कोरोना काल में जिस तरह से भारत ने खुद को सँभाला और दूसरे देशों को संभलने में मदद की, वह अपने आप में अभूतपूर्व है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई में हम आत्मनिर्भर बने। अंग्रेजों को भारत के एक राष्ट्र बनने को लेकर शक था, लेकिन लोकतंत्र हमारी रगों में बसा हुआ है। बीते 70 सालों में सत्ता परिवर्तन हमेशा बेहद आसानी से हुआ है।

कुछ लोग ये कहते थे कि इंडिया वाज ए मिरेकल डेमोक्रेसी। ये भ्रम भी हमने तोड़ा है। लोकतंत्र हमारी रगों और साँस में बुना हुआ है, हमारी हर सोच, हर पहल, हर प्रयास लोकतंत्र की भावना से भरा हुआ रहता है। उन्होंने कहा कि हमारे लिए यह संतोष का विषय है कि कोरोना को लेकर जो भयावह परिणाम बताए गए थे, ऐसे में यह 130 करोड़ लोगों का समर्पण आज हमें बचा कर रखा है। इसका श्रेय 130 करोड़ हिन्दुस्तानियों को जाता है।

पीएम मोदी ने कहा, “आज जब हम भारत की बात करते हैं तो मैं स्वामी विवेकानंद की बात का स्मरण करना चाहूँगा। हर राष्ट्र के पास एक संदेश होता है, जो उसे पहुँचाना होता है, हर राष्ट्र का एक मिशन होता है, जो उसे हासिल करना होता है, हर राष्ट्र की एक नियति होती है, जिसे वो प्राप्त करता है।”

कॉन्ग्रेस के मनीष तिवारी को जवाब देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि ये भगवान की ही कृपा है कि कोरोना से दुनिया हिली लेकिन भारत बचा रहा। कोरोना काल में डॉक्टर और नर्स भगवान बनकर आए। कोरोना काल में ऐम्बुलेंस का ड्राइवर भी भगवान के ही रूप में आया। बोलते वक्त जब कुछ विपक्षी सांसद हंगामा करने लगे तो पीएम मोदी ने मजाकिया लहजे में कहा कि मुझे एक मिनट का ब्रेक देने के लिए मैं आपका आभारी हूँ।

पीएम ने कहा कि हमारे लिए आवश्यक है कि हम आत्मनिर्भर भारत के विचार को बल दें। ये किसी शासन व्यवस्था या किसी राजनेता का विचार नहीं है। आज हिंदुस्तान के हर कोने में वोकल फ़ॉर लोकल सुनाई दे रहा है। ये आत्मगौरव का भाव आत्मनिर्भर भारत के लिए बहुत काम आ रहा है।

पीएम मोदी ने लोकसभा में कहा कि इस कोरोना काल में 3 कृषि कानून भी लाए गए। ये कृषि सुधार का सिलसिला बहुत आवश्यक है। वर्षों से हमारा कृषि क्षेत्र जो चुनौतियाँ महसूस कर रहा है उसमें सुधार लाने के हमने इमानदार प्रयास किया है। लेकिन विपक्ष कानून के रंग पर चर्चा कर रहा है, कंटेंट पर नहीं, अच्छा होता कि कानून के तथ्यों पर चर्चा होती।

पीएम ने कहा, “जो हुआ नहीं उसका डर फैलाया जा रहा है, ऐसे तरीके आंदोलनजीवी अपनाते हैं। मैं किसानों से पूछना चाहता हूँ कि वे बताएँ उनका कौन सा हक मारा छीना गया है। ये कानून बंधन नहीं बल्कि किसानों की आजादी के लिए लाए गए हैं। प्रगति के लिए कुछ कानून जरूरी होते हैं।”

कॉन्ग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा पार्टी इतनी कन्फ्यूज है कि उसका एक धड़ा राज्य सभा में अलग स्टैंड रखता है और दूसरा धड़ा लोकसभा में अलग स्टैंड रखता है। ऐसी पार्टी न अपना भला कर सकती है और न ही देश का भला कर सकती है।

16 करोड़ रुपए का इंजेक्शन… ताकि बच सके यह बच्ची: PM मोदी ने माफ किया ₹6.5 करोड़ का टैक्स

केंद्र सरकार ने दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त पाँच महीने की एक बच्ची की दवाइयों पर 6 करोड़ रुपए का आयात शुल्क एवं GST माफ कर दिया है। भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार (फरवरी 9, 2021) को यह जानकारी दी

मुंबई के एक अस्पताल में मौत से जंग लड़ रही 5 महीने की तीरा कामत के इलाज के लिए बड़ा कदम उठाया गया है। तीरा के इलाज के लिए विदेश से आने वाले इंजेक्शन को टैक्स से छूट दे दी गई है।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद ये छूट दी गई। जानकारी के मुताबिक, विदेश से आने वाला ये इंजेक्शन करीब 16 करोड़ रुपए की कीमत का था। साथ ही इस पर टैक्स की कीमत 6 करोड़ रुपए थी, जिससे अब छूट दे दी गई है।

देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी थी और अपील की थी कि बाहर से आने वाले इंजेक्शन में टैक्स की छूट दी जाए ताकि बच्ची का इलाज हो सके। जिस पर पीएमओ की ओर से एक्शन लिया गया और टैक्स में छूट दे दी गई।

बता दें कि तीरा कामत का इलाज मुंबई के एक अस्पताल में चल रहा है। तीरा SMA Type 1 बीमारी से जूझ रही है। एक्सपर्ट का कहना है कि इस बीमारी के कारण बच्ची की जिंदगी सिर्फ 18 महीने तक ही हो सकती है, यही कारण है कि अमेरिका से लाया गया इंजेक्शन काफी जरूरी था।

किस बीमारी से पीड़‍ित है तीरा कामत?

इस मासूम का जन्‍म पाँच महीने पहले हुआ था। तब वह जन्‍म के वक्‍त रोई थी थी और सब ठीक ही था। हाँ, आम बच्‍चों की तुलना में उसकी लंबाई थोड़ी ज्‍यादा थी और इसलिए माँ-बाप ने उसका ये खास नाम तीरा रखा, यानी तीर की तरह लंबी।

तीरा अस्‍पताल से घर आ गई थी और सब ठीक ही चल रहा था, लेकिन अचानक उसे माँ का दूध पीने में द‍िक्‍कत होने लगी। दूध पीते वक्‍त उसका दम घुटता था और एकाध बार कुछ सेकंड के लिए उसकी साँस भी थम गई थी। पोलियो ड्रॉप पिलाए जाने के दौरान भी जब उसे इसी तरह की दिक्‍कत हुई, तब खतरे का अंदाजा लगा।

डॉक्‍टरों ने उसे स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉपी यानी SMA टाइप 1 से पीड़ित पाया। उसके शरीर में प्रोटीन बनाने वाला जीन ही मौजूद नहीं था, जिससे मांसपेशियाँ और तंत्रिकाएँ जीवित रहती हैं। यही वजह है कि उसके शरीर की तंत्रिकाएँ निर्जीव होने लगी थीं। दिमाग की मांसपेशियाँ भी निर्जीव होती जा रही थीं, जिससे उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। उसे 13 जनवरी को मुंबई के अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था। धीरे-धीरे उसके एक फेफड़े ने भी काम करना बंद कर दिया, जिसके बाद उसे वेंटिलेटर पर रखा गया।

इंजेक्‍शन पर नहीं लगेगा कोई टैक्‍स

तीरा के माता-पिता का नमा प्रियंका और मिहिर है, जिनके पैरों के नीचे से उस वक्‍त जमीन खिसक गई थी, जब डॉक्‍टरों ने उन्‍हें बताया कि यह मासूम ज्‍यादा दिनों तक जी नहीं सकेगी, क्‍योंकि भारत में इसका उपचार उपलब्‍ध नहीं है। नाजुक हालत में उसे कहीं लेकर जाना भी मुश्किल था, इसलिए यह खास इंजेक्‍शन अमेरिका से मँगाने की कोशिश हुई। इंजेक्‍शन की 16 करोड़ रुपए की कीमत सुनकर पहले तो वे सकते में आए, लेकिन फिर उन्‍होंने क्राउड फंडिंग के जरिए यह रकम जुटाने की कोशिश शुरू कर दी, जिसमें उन्‍हें सफलता भी मिली।

उनकी चिंता अब इस इंजेक्‍शन पर लगने वाले अलग-अलग तरह के टैक्‍स को लेकर थी, जो तकरीबन 6.5 करोड़ रुपए है। अब सरकार ने इस पर लगने वाले सभी तरह के टैक्‍स से छूट देने का फैसला किया है, जिसे तीरा के परिजनों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है।

‘नंदी का मुख मस्जिद की तरफ, विवाद पर यथास्थिति कानून लागू नहीं’: ज्ञानवापी पर HC में मंदिर पक्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट में काशी के ज्ञानवापी मस्जिद और विश्वनाथ मंदिर को लेकर सुनवाई चल रही है। इस मामले में अगली सुनवाई के लिए बुधवार (फरवरी 17, 2021) की तारीख़ तय की गई है। मंदिर पक्ष ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि काशी में तत्कालीन विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर उसे ज्ञानवापी मस्जिद का रूप दे दिया गया। तहखाने सहित चारों ओर की भूमि पर हिन्दुओं का वैध नियंत्रण होने की बात भी कही गई।

विश्वनाथ मंदिर पक्ष ने बताया कि अभी भी मस्जिद के पीछे शृंगार गौरी की पूजा की जाती है। नंदी का मुख भी मस्जिद की तरफ है, जो बताता है कि वही मंदिर हुआ करता था। साथ ही पूजा वाले स्थल पर कथा भी आयोजित की जाती है। आगे सबूत दिया गया कि तहखाने के दरवाजे पर हिन्दुओं और मंदिर प्रशासन का ताला लगा हुआ है। दरवाजा दोनों तरफ से खुलता है। मस्जिद के पीछे मंदिर निर्माण का ढाँचा स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

जहाँ मुस्लिम समाज नमाज पढ़ता है, वो विवादित ढाँचे के तहखाने की छत है। मंदिर पक्ष ने याद दिलाया कि इस्लाम में विवादित स्थल पर पढ़ी गई नमाज कबूल ही नहीं होती है, इसीलिए अवैध कब्जे के खिलाफ वाद पर सुनवाई चलनी चाहिए और इस पर आपत्ति जताने वाले याचिका को ख़ारिज किया जाए। वहीं मस्जिद पक्ष कानून का हवाला देकर 1947 की मंदिर-मस्जिद की स्थिति में बदलाव न किए जाने की दलीलें दे रहा है।

उनका कहना है कि यथास्थिति बनाए रखने वाले कानून के कारण मुकदमे पर रोक लगाई जाए। मस्जिद पक्ष ने कहा कि वाराणसी के अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा मुकदमे की सुनवाई का आदेश देना गलत है। मंदिर पक्ष ने इस दलील की बखिया उधेड़ते हुए कहा कि ये विवाद आज़ादी से भी पहले का है, इसीलिए उसके बाद वाला ये कानून इस पर लागू नहीं होता। इसे विधिक अधिकार बताते हुए मस्जिद हटाने की माँग की गई, क्योंकि इसे जबरन मंदिर तोड़ कर बनाया गया था।

याद हो कि अक्टूबर 2020 में कोर्ट ने देर से याचिका दायर करने के लिए सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड पर 3000 रुपए का जुर्माना लगाया था। दावा है कि काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव के जिस ज्योतिर्लिंग का दर्शन किया जाता है, उसका मूल स्वरूप वो नहीं बल्कि उस जगह पर मौजूद है जहाँ 350 वर्ष पहले मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश पर एक मस्जिद बना दी गई थी। हिंदू पक्ष ने वाराणसी की उस अदालत में 351 वर्ष एक महत्वपूर्ण कागज जमा कराया था।

बच्चों के नाम पर NDTV वसूल रहा था पैसे… लेकिन भर रहा था खुद की जेब? – NCPCR ने दर्ज की शिकायत

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR, देश में बाल अधिकारों के कानूनों और नीतियों के लिए जिम्मेदार शीर्ष निकाय) ने आर्थिक अपराध शाखा को पत्र लिखते हुए विवादास्पद न्यूज़ चैनल NDTV के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए मामले में उचित कार्रवाई की माँग की है। आयोग का आरोप है कि चैनल बच्चों की आड़ में अवैध रूप से पैसा कमाने का काम कर रहा है।

दिल्ली पुलिस के ईओडब्ल्यू के जॉइंट कमिश्नर को लिखे गए पत्र में – NCPCR ने भारत सरकार के साथ काम करने वाले एक फाउंडेशन के नाम का उपयोग करके बच्चों के लिए कथित फंड इकट्ठा करने के लिए NDTV के खिलाफ एक शिकायत की जाँच करने के लिए कहा है।

NCPCR ने अपने पत्र में कहा कि उन्हें NDTV के खिलाफ एक शिकायत मिली है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि विवादास्पद समाचार कंपनी UNICEF के साथ मिल कर चीन से फैले कोरोना वायरस महामारी से प्रभावित बच्चों की मदद के लिए फंड इकट्ठा कर रहा है।

शिकायतकर्ता ने कहा था कि NDTV ने दावा किया है कि ये फंड चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन के लिए इकट्ठा किया जा रहा है, जो महिला और बाल विकास मंत्रालय के साथ काम करती है। बता दें कि चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन मंत्रालय के तहत एक नोडल एजेंसी है, जो संकटग्रस्त बच्चों के लिए ‘चाइल्डलाइन 1098’ नामक एक टेलीफोन हेल्पलाइन संचालित करती है।

हालाँकि, यह बात चौकाने वाली है कि कथित फाउंडेशन और मंत्रालय को NDTV द्वारा इनके नाम पर आयोजित धन उगाही अभियान के बारे में पता नहीं है।

NCPCR को लिखे गए अपने पत्र में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि NDTV द्वारा शुरू किया गया कथित धन उगाहने वाला आयोजन महज एक धोखाधड़ी था, जिसमें चैनल द्वारा अपने फायदे के लिए अवैध तरीके से बच्चों के नाम का इस्तेमाल पैसा जुटाने के लिए किया गया था।

ईओडब्ल्यू की शिकायत को फॉरवर्ड करते हुए NCPCR ने अब NDTV के खिलाफ कार्रवाई के लिए एक पत्र लिखा है और समाचार कंपनी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए इस तरह धन जुटाने और इससे प्राप्त धन के उपयोग को लेकर जाँच की माँग की है। इसके अलावा NCPCR ने बाल अधिकारों के संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 13 (1) (j) के तहत NDTV पर कार्रवाई करने की बात कही है।

NCPCR का इस संबंध में पत्र

विवादास्पद मीडिया हाउस NDTV, जिसके प्रमोटर्स मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स धोखाधड़ी के मामलों में आरोपित हैं, ने नवंबर 2020 में COVID-19 संकट के दौरान बच्चों की सहायता के लिए ‘NDTV-UNICEF रिइमैजिन टेलीथॉन‘ के तहत धन इकट्ठा करने वाली एक कथित पहल शुरू की थी।

NDTV के अनुसार, इसने बच्चों के लिए फंड इकट्ठा करने के लिए UNICEF के साथ हाथ मिलाया था। ‘रिइमैजिन’ स्पेशल टेलीथॉन का मुख्य उद्देश्य COVID-19 संकट से प्रभावित सबसे कमजोर बच्चों की मदद करना है, जो कि NDTV द्वारा निर्धारित फंड लॉन्च पर दावा किया गया था।

लॉन्च के दौरान NDTV ने कहा था, “इस महामारी से शिकार बच्चों को भुला दिया गया है। COVID ने न केवल बच्चों के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, बल्कि इसके चलते कई बच्चों ने अपना स्कूल छोड़ दिया है। लॉकडाउन के सुकून के साथ, चीजों में सुधार होगा लेकिन बहुत लंबे समय तक यह स्थिति सामान्य नहीं होगी। जिसके चलते जीवन, शिक्षा और भविष्य में काफी नुकसान होगा।”

लॉन्च के दौरान, NDTV ने दावा किया था कि स्वास्थ्य देखभाल, पोषण और टीकाकरण जैसे तत्काल वित्त पोषण और महत्वपूर्ण जीवन-यापन हस्तक्षेप के बिना, अगले छह महीनों में हर दिन भारत में अतिरिक्त 1600 बच्चे मर सकते हैं। बच्चों की मदद करने के नाम पर फंड की माँग करते हुए NDTV ने यह दावा करते हुए धनराशि माँगी थी कि वे सबसे कमजोर वर्ग के बच्चों की रक्षा करेंगे।

NDTV ने दावा किया, “हमारे बच्चों के भविष्य को फिर से रिइमैजिन करें। NDTV और UNICEF के विशेष अभियान, “रिइमैजिन अवर चिल्ड्रन फ्यूचर में शामिल हों।”

गौरतलब है, जहाँ एक तरफ NDTV ने दावा किया है कि उन्होंने UNICEF के साथ धन इकट्ठा करने का आयोजन किया था, वहीं वैश्विक बाल अधिकार संस्था ने NDTV द्वारा किए गए इस तरह के दावों का खंडन किया। NDTV द्वारा यूनिसेफ के नाम के इस्तेमाल को लेकर वैश्विक संगठन ने एक बयान जारी कर कहा कि कुछ संगठन और व्यक्ति बिना किसी प्राधिकरण के धन जुटाने और प्रचार के लिए यूनिसेफ के नाम का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।

UNICEF ने विवादास्पद न्यूज़ आउटलेट का नाम लिए बिना NDTV के धन उगाहने वाले अभियान की आलोचना करते हुए कहा, “हम इस अनैतिक अभ्यास की निंदा करते हैं और इसमें शामिल संगठनों/व्यक्तियों से नाता तोड़ते हैं।”

उल्लेखनीय है कि NDTV ने अभी तक अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब नहीं दिया है। बता दें कि NCPCR में दर्ज शिकायत और NDTV के कथित धन उगाहने की घटना को लेकर आर्थिक अपराध शाखा को दिए गए पत्र के बाद अब इस समाचार कंपनी के खिलाफ विस्तृत जाँच हो सकती है।

हंबा-रंबा-कम्मा-दुम्मा-बुम्बा… : ममता बनर्जी का वायरल वीडियो, लोगों ने पूछा- आखिर कहना क्या चाहती हैं

पश्चिम बंगाल में अगले कुछ महीने के भीतर विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहें हैं राज्य का राजनीतिक माहौल भी गर्म होता जा रहा है। एकतरफ सत्तारूढ़ दल तृणमूल कॉन्ग्रेस फिर से अपनी जीत की दावेदारी ठोक रही है तो दूसरी तरफ बीजेपी भी सरकार बनाने का दावा कर चुकी है। इस सिलसिले में दोनों पार्टियों के नेताओं के कई नारे और व्यंग्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल भी हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रैली से जुड़ा एक वीडियो इंटरनेट की दुनिया में बड़ी तेजी से सुर्खियाँ बटोर रहा है। इस वायरल वीडियो में ममता को अजीब अंदाज में बोलते हुए देखा जा सकता है। बंगाल की सीएम ममता बनर्जी लगातार बीजेपी के नेताओं पर हमला बोल रही हैं। हाल में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को ‘नड्डा-चड्ढा-फड्डा’ कहा था, अब ममता बनर्जी का एक ऐसा वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह किसी बात पर भड़ास निकालते हुए ‘हंबा-हंबा, रंबा-रंबा, कम्मा-कम्मा’ बोलती दिख रही हैं। ममता बनर्जी पूर्वी बर्धमान के कलना और मुर्शिदाबाद में रैली कर रही थीं।

बुधवार (फरवरी 10, 2021) को जेपी नड्डा ने खड़गपुर में बीजेपी पर हमला बोला। तो दूसरी ओर ममता बनर्जी भी बीजेपी पर पलटवार कर रही हैं। इस बीच ममता बनर्जी का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह किसी बात पर भड़ास निकालते हुए ‘हंबा-हंबा, रंबा-रंबा, कम्मा-कम्मा’ बोलती दिख रही हैं।

उनका ये अंदाज लोगों को इतना भा रहा है कि हर कोई ये जानने में लगा है कि उन्होंने आखिर कहा क्या? इस वीडियो को देखने के बाद ज्यादातर यूजर्स यही पूछने में लगे हैं कि ममता बनर्जी ने किस भाषा में लोगों को क्या कहा।

ट्विटर यूजर्स बना रहे हैं मीम 

ममता बनर्जी मंगलवार को पूर्वी बर्धमान के कलना और मुर्शिदाबाद में रैली कर रही थीं। इसी रैली का एक क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें ममता ‘हंबा-हंबा, रंबा-रंबा, कम्मा-कम्मा, दुम्मा-दुम्मा, बुंबा-बुंबा, बंबा-बंबा’ बोलती नजर आ रही हैं। 

ट्विटर यूजर्स ने इस पर मीम बनाने भी शुरू कर दिए हैं। एक यूजर ने इस वीडियो के मजे लेते हुए कहा कि अक्सर जब मुझे एग्जाम में किसी सवाल का जवाब नहीं पता होता तब मैं अमूमन ऐसे ही करता हूँ। वहीं दूसरे यूजर ने कहा कि अभी तो सिर्फ शुरुआत हुई है, जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, लोगों को और मजेदार चीजें देखने को मिलेगी। एक ट्विटर यूजर ने मीम शेयर करते हुए पूछा, “अरे भाई आखिर कहना क्या चाहते हो।”

वैसे ममता का यह फनी वीडियो पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले भी वह विपक्षी दलों पर इस तरह भड़ास निकाल चुकी हैं, पिछले साल दिसंबर महीने में जब जेपी नड्डा के काफिले पर पथराव हुआ था तो ममता बनर्जी ने इसे बीजेपी का नाटक बताते हुए चड्ढा, नड्डा, फड्डा, भड्डा तक बोल दिया था। ममता ने कहा था, “उनके (बीजेपी) पास कोई और काम नहीं है। अकसर गृह मंत्री यहाँ होते हैं, बाकी समय उनके चड्ढा, नड्डा, फड्डा, भड्डा यहाँ होते हैं। जब उनके पास कोई दर्शक नहीं होता है, तो वे अपने कार्यकर्ताओं को नौटंकी करने के लिए कहते हैं।”

अखिलेश ने राम मंदिर भक्तों को कहा- चंदाजीवी, लोगों ने ‘टोंटीजीवी मुस्लिम परस्त’ बताकर दिया जवाब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आंदोलनजीवी’ वाले बयान पर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा पर पलटवार किया। सपा नेता ने मंगलवार (फरवरी 9, 2021) को संसद में राम मंदिर के नाम पर चंदा इकट्ठा कर रहे कार्यकर्ताओं को चंदाजीवी संगठन का सदस्य कहकर बुलाया।

कथित किसान आंदोलनकारियों के पक्ष में अपनी बात रखते हुए अखिलेश यादव बोले, “आंदोलन के बारे में क्या कहा जा रहा है? वे लोग आंदोलनजीवी हैं। मुझे उन लोगों को क्या कहना चाहिए जो दान लेने के लिए बाहर जाते हैं? क्या वे चंदाजीवी संगठन के सदस्य नहीं है?”

आगे उन्होंने एमएसपी को लेकर भी बात की। मगर, सोशल मीडिया पर उनका चंदाजीवी वाला बयान वायरल होने लगा। भाजपा कार्यकर्ता विकास प्रीतम सिंह ने कहा, “प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए लोगों द्वारा किए जा रहे धनार्पण को संग्रहित करने में समय व श्रम लगा रहे लोगों को चंदाजीवी कहना- अखिलेश यादव की न केवल तुच्छ सोच को दर्शाता है अपितु कारसेवकों को गोलियों से भून देने वाली उनकी विरासत का भी प्रकटीकरण है।”

विनय श्रीवास्तव लिखते हैं, “ये खुद तो ‘टोंटीजीवी’ हैं, विरासती गद्दी धारी हैं, हिन्दू और हिंदुत्व विरोधी हैं, मुस्लिम परस्त हैं। बाप मुलायम सिंह यादव का सबके सामने स्टेज पर ही अपमान कर चुके हैं। यूपी का सीएम रहते अरबों रुपए का घोटाला करवा चुके हैं और दूसरों को नसीहत दे रहे हैं। खुद मियाँ फजीहत।”

रक्षित राठौर लिखते हैं, “भैया ये क्या कह दिए आप। मानते है हम कि आपकी विचार धारा दूषित है,पर इसको सार्वजनिक पटल पर तो न लाते कम से कम। कही ऐसा न हो। 2022 के चुनाव में, जनता आपको चंदा माँगने लायक न छोड़े।”

बता दें कि इस भाषण में अखिलेश यादव ने आंदोलन करने वालों की महत्ता बताई। वह बोले कि राष्ट्र ने आंदोलन के जरिए स्वतंत्रता प्राप्त की। आंदोलन के माध्यम से असंख्य अधिकार प्राप्त हुए। महिलाओं को आंदोलन के माध्यम से मतदान का अधिकार प्राप्त हुआ। महात्मा गाँधी राष्ट्र के पिता बने क्योंकि उन्होंने अफ्रीका, देश और विश्व में आंदोलन किया। इसके अलावा कई नेता भी सिर्फ़ ऐसे आंदोलनों से निकले।

उन्होंने पूछा कि यदि सरकार कहती है कि कानून किसानों के लिए हैं, अगर किसान इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो इसे वापस क्यों नहीं लिया जा रहा है। आखिर सरकार को कौन रोक रहा है? अखिलेश ने आगे कहा कि ऐसे आरोप हैं कि सरकार ने कॉरपोरेट्स के लिए कारपेट बिछाया है। 

गौरतलब है कि कि प्रधानमंत्री ने राज्य सभा में पिछले दिनों बयान दिया था कि पहले श्रमजीवी और बुद्धिजीवी हुआ करते थे, अब एक नया वर्ग जुड़ गया है – आन्दोलनजीवी… और ये सारे आंदोलनजीवी परजीवी होते हैं। पीएम के इसी बयान पर कल अखिलेश यादव ने राम मंदिर के नाम पर चंदा लेने जा रहे लोगों को चंदाजीवी कहकर बुलाया।

‘इस्लाम अपना लो… जन्नत जाओगे’: वसीम जाफर मामले के बाद अब ‘क्रिकेट जिहाद’ का वीडियो वायरल

वसीम जाफर के ऊपर मजहबी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप और उनके उत्तराखंड क्रिकेट टीम के मुख्य कोच पद से इस्तीफा देने के बाद लोग ‘क्रिकेट जिहाद’ शब्दावली का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी बीच पाकिस्तानी क्रिकेटर अहमद शहजाद का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वो श्रीलंका के तूफानी सलामी बल्लेबाज रहे तिलकरत्ने दिलशान पर इस्लाम अपनाने के लिए दबाव बनाते हुए नजर आ रहे हैं।

ये वीडियो अभी का नहीं है, बल्कि 7 साल पुराना है। ये वीडियो अगस्त-सितम्बर 2014 का है, जब श्रीलंका और पाकिस्तान के बीच मैच खेला जा रहा था। वायरल वीडियो में दिलशान बल्लेबाजी कर के लौट रहे हैं और उनके साथ चल रहे अहमद शाहजाद उन्हें कह रहे हैं कि अगर आप नॉन-मुस्लिम हैं और इस्लाम अपना लेते हैं तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि फिर अपने जीवन में आप क्या करते हो, आप अंततः जन्नत हो जाओगे।

तब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने भी इस वीडियो का संज्ञान लिया था और इस पर जाँच बिठाई थी। हालाँकि, दिलशान ने इस वीडियो में उन्हें क्या जवाब दिया – ये स्पष्ट नहीं है। शहजाद को इसके बाद लाहौर में PCB के मुख्यालय में बुलाया गया था। उनसे पूछताछ भी की गई थी। तब उन्होंने बोर्ड के समक्ष कहा था कि ये दिलशान के साथ उनका व्यक्तिगत संवाद था और इसका क्रिकेट से कुछ लेना-देना नहीं है।

इस मामले में किसी ने भी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी, जिस कारण PCB ने मामले को रफा-दफा कर दिया। दिलशान के पिता मुस्लिम ही थे और उनका नाम तुवान मुहम्मद था। हालाँकि, 1999 में डेब्यू करने के साथ ही उन्होंने अपनी मुस्लिम पहचान को त्याग दिया था। वो खुद को सिंहला-बौद्ध ही मानते हैं। उनके कोच ने भी बताया था कि दिलशान और उनके सभी भाई-बहन अपनी माँ की तरह बौद्ध हैं।

वसीम जाफर पर आरोप लगा है कि CAU के अधिकारियों से लड़ रहे थे और मजहबी गतिविधियों के आधार पर टीम को तोड़ने की कोशिश में लगे हुए थे। टीम के कैम्प के दौरान वसीम जाफर मौलवियों को बुलाते थे। टीम के स्लोगन ‘राम भक्त हनुमान की जय’ को हटा देने के आरोप भी उन पर लगे हैं। आरोप है कि इक़बाल को आगे बढ़ाने के चक्कर में उन्होंने चंदेला को निचले क्रम का बल्लेबाज बना दिया।