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CAA उस हिंदू की बनी ढाल जिसे ममता सरकार ने रिटायर होने से 2 महीने पहले नौकरी से निकाला, सुप्रीम कोर्ट ने माना भारत का नागरिक: पाकिस्तानी फौज के अत्याचार से बचकर भागे थे

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे हिन्दू व्यक्ति को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के प्रावधानों का फायदा दिया है, जिसकी पश्चिम बंगाल सरकार ने नौकरी छीन ली थी। पीड़ित शख्स वर्ष 1969 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से अपने पिता के साथ भाग कर भारत आया था। उसकी नौकरी रिटायरमेंट से 2 महीने पहले छीनी गई थी। पश्चिम बंगाल सरकार का कहना था कि उस शख्स की भारतीय नागरिकता पर गहरा शक है। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की सरकार को आदेश दिया है कि उसकी नौकरी से जो भी फायदे उसे मिलने थे, उसे तुरंत दिए जाएँ।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उस व्यक्ति की नौकरी बिना कारण बताए छीनने का पश्चिम बंगाल सरकार को कोई अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपनाई गई प्रक्रिया पर भी प्रश्न खड़े किए हैं। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि पीड़ित व्यक्ति को बिना कोई मौका दिए ही मात्र एक पुलिसिया रिपोर्ट के आधार पर उसकी नौकरी छीन ली गई, जो कि कानूनन ठीक नहीं हैं। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जेके माहेश्वरी की बेंच ने दिया है।

क्या था मामला?

यह पूरा मामला हरिनंद दत्ता की तरफ से दायर किया गया था। दत्ता ने बताया कि 1969 में वह अपने पिता के साथ पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भारत आए थे। उस दौरान पूर्वी पाकिस्तान में फ़ौज बंगालियों और विशेषकर हिन्दुओं पर अत्याचार कर रही थी। दत्ता ने बताया कि भारत आने पर उनके पिता को एक प्रवासी प्रमाण पत्र मिला था, जिसमें उनका भी नाम था। इसके बाद उनका वोटर आईडी कार्ड, राशन कार्ड और बाकी कागज भी बने।

इसके बाद उन्होंने कलकत्ता में अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और 1985 में उन्हें स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिल गई। वह यह नौकरी लगातार करते रहे। उनको इस नौकरी के साथ ही वेतन भत्ते और बाकी सुविधाएँ भी मिलती रहीं। हालाँकि, 2010 में उनके रिटायरमेंट से मात्र 2 महीने पहले ही उनके विभाग को भेजी गई एक पुलिसिया रिपोर्ट के आधार पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। पुलिस की रिपोर्ट में उन्हें नौकरी के लिए ‘अनुपयुक्त’ करार दिया गया था। यह पुलिस रिपोर्ट उनकी नागरिकता सम्बन्धी जाँच के बाद दी गई थी।

हरिनंद दत्ता को ना ही यह पुलिस रिपोर्ट दी गई और ना ही उन्हें उनके अपने स्वास्थ्य विभाग ने अपनी सफाई पेश करने का मौक़ा दिया। इस फैसले के खिलाफ वह सेवा ट्रिब्यूनल चले गए जहाँ उन्हें राहत मिली लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए उनको नौकरी से निकाले जाने को सही ठहराया। वह इसके बाद सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए जहाँ उन्होंने अपने नागरिकता संबधी कागज रखे और विभाग का फैसला पलटने की माँग की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया उनके दादा भी भारत के ही निवासी थे, ऐसे में वह भारत के नागरिक हुए।

पश्चिम बंगाल की सरकार क्या बोली?

सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल की सरकार ने कहा कि भले ही हरिनंद दत्ता ने पैन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड और बाकी कागज रखे हैं लेकिन इससे उनकी नागरिकता प्रमाणित नहीं होती। पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा कि उनका पुलिस सत्यापन करने में 25 वर्ष की देरी उनकी नौकरी ना खत्म करने का आधार नहीं मानी जा सकती। पश्चिम बंगाल सरकार ने यह सब कारण देते हुए कहा कि उनकी नौकरी का पुलिस की रिपोर्ट के बाद खत्म किया जाना सही था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता हरिनंद दत्ता की दलीलों को सही पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दत्ता के दादाजी भी भारत के नागरिक थे। ऐसे में उसके पिता भी नागरिक माने जाएँगे। इसके अलावा वह भारत में नागरिकता के लिए आवेदन करने से पहले 7 वर्ष तक रह चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा 2020 से लागू हुआ CAA कानून भी उनका पक्ष लेता है और वह अवैध प्रवासी नहीं माने जा सकते। कोर्ट ने कहा कि दत्ता ने आवेदन दे दिया था लेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं हुआ, ऐसे में पूरा मामला दत्ता के पक्ष में है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी प्रश्न उठाए कि आखिर उनको भेजी गई नोटिस में कोई कारण क्यों नहीं बताया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया जिससे पता नहीं चलता कि आखिर किस आधार पर उन्हें नौकरी से निकालने का फैसला लिया गया। कोर्ट ने कहा कि हरिनंद दत्ता को नौकरी से निकालने का आदेश अवैध, कानून के खिलाफ और न्याय के खिलाफ है, ऐसे में इसे लागू नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार उन्हें नियमानुसार अब पेंशन समेत बाकी फायदे दे।

वक्फ बिल का विरोध कर रहा ईसाई सांसदों का समूह, केरल में बिल पास होने के लिए चर्चों में हो रही प्रार्थना: पीड़ित बोले- हमने रेत भरकर रहने लायक बनाया, वे कर रहे दावा

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित वक्फ संशोधन बिल के विरोध में मुस्लिमों का साथ ईसाई संगठनों ने दिया है। वहीं, केरल में ईसाई और हिंदुओं की आबादी वाली 404 एकड़ पर वक्फ बोर्ड द्वारा दावा करने के बाद लोग इस संशोधन बिल के संसद में पास होने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं। इस तरह की प्रार्थना सिर्फ केरल ही नहीं, बल्कि कर्नाटक एवं तमिलनाडु सहित कई राज्यों के हजारों परिवार कर रहे हैं, क्योंकि उनकी जमीनों पर वक्फ के दावों से उनके सामने जीवन का संकट उत्पन्न हो गया है।

दरअसल, ईसाई सांसदों के एक वर्ग ने भारत के कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CBCI) से वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े होने के लिए कहा है। विपक्षी ईसाई सांसदों ने कैथोलिक चर्चों का प्रतिनिधित्व करने वाली CBCI से कहा कि चर्च को अल्पसंख्यक अधिकारों का समर्थन करने के अपने उसी रुख को अपनाना चाहिए, जो संविधान में दिए गए हैं। इस संबंध में CBCI ने दिल्ली में एक बैठक भी की।

बैठक में भाग लेने वाले एक सांसद ने कहा कि चर्च के नोटिस में ये बात लाई गई कि वक्फ संशोधन विधेयक संवैधानिक मूल्यों पर उल्लंघन करता है। एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम तट में 404 एकड़ पर वक्फ के दावे जैसे व्यक्तिगत मामलों के बावजूद इसका विरोध किया जाना चाहिए। दरअसल, जिस जगह पर केरल वक्फ बोर्ड ने दावा किया है, वहाँ कुछ 600 ईसाई और हिंदू परिवारों पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं।

इस विवाद में मुख्य रूप से मुनम्बम, चेराई, और पल्लिकाल द्वीप के इलाके शामिल हैं, जो कई दशकों से इन परिवारों की संपत्ति रही है। अब यह इलाका वक्फ बोर्ड की नज़र में है, जिससे इन परिवारों को अपनी जमीन खोने का डर सताने लगा है। करीब पाँच साल पहले साल 2019 वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल के इलाके उनकी संपत्ति हैं।

यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। इन लोगों के पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया। इन परिवारों ने अपनी जमीन को वैध रूप से खरीदा था, लेकिन अब उन्हें जबरन खाली करने के आदेश दिए जा रहे हैं, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

साल 1902 तक जाती है विवाद की जड़

दरअसल, 1341 ईस्वी में केरल में भयानक बाढ़ आई। इस दौरान वाइपिन आईलैंड के ऊतरी हिस्से पर मुनम्बम बना। साल 1503 में पुर्तगालियों ने यहाँ हमला किया और 1663 में डचों ने इस पर कब्जा कर लिया। यह डचों के अधिकार में लंबे समय तक रहा। इसके बाद 1789 ईस्वी में डचों ने मुनम्बम को त्रावणकोर के महाराजा को बेच दिया। इसके बाद विवाद की शुरुआत होती है।

साल 1902 में त्रावणकोर के महाराजा ने गुजरात से आए एक किसान अब्दुल सत्तार मूसा हाजी सैत को यहाँ की 404 एकड़ जमीन और 60 एकड़ जल क्षेत्र पट्टे पर दिया था। उस समय, यह जमीन मछुआरों के लिए अलग रखी गई थी, जो वहाँ कई वर्षों से रह रहे थे। 1948 में सेठ के उत्तराधिकारी एवं दामाद सिद्दीक सैत ने यह जमीन अपने नाम पर पंजीकृत करवा ली।

इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्री कटाव के कारण खो गया और साल 1934 की भारी बारिश ने पांडरा समुद्र किनारे की जमीन को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। हालाँकि, सिद्दीक सैत द्वारा पंजीकृत जमीन में मछुआरों के रहने वाले इलाके भी शामिल हो गए। साल 1950 में सिद्दीक सैत ने यह जमीन फरूख कॉलेज को उपहार में दे दी, जो मुस्लिमों को शिक्षित करने के लिए 1948 में बनाया गया था।

इसके साथ ही सिद्दीकी सैत ने शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि कॉलेज केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही इसका उपयोग करेगा। अगर कभी कॉलेज बंद हो जाता है तो जमीन वापस सिद्दीकी सैत के वंशजों को लौटा दी जाएगी। हालाँकि, दस्तावेजों में गलती से या जानबूझकर ‘वक्फ’ शब्द लिख दिया गया, जिससे अब यह विवाद खड़ा हो गया है। कहा जाता है कि 1 नवंबर 1950 को कोच्चि के एडापल्ली में उप-पंजीयक कार्यालय में एक वक्फ पंजीकृत किया गया था। इसमें सैत ने फारूक कॉलेज के अध्यक्ष के पक्ष में पंजीकृत कराया था।

विवाद की शुरुआत और आयोग का गठन

फारूख कॉलेज के प्रबंधन को करीब एक दशक बाद जमीन का मालिकाना हक मिल गया। साल 1960 के दशक के आखिर में जमीन पर कब्जा करने वालों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई। कॉलेज प्रबंधन यहाँ रहने वाले लोगों को बेदखल करना चाहता था। कैथोलिक ईसाई और दलित हिंदू समुदाय के ये लोग पीढ़ियों से वहाँ रह रहे थे, लेकिन उनके पास स्वामित्व साबित करने के लिए कानूनी दस्तावेज नहीं थे।

आखिरकार, अदालत के बाहर समझौते में कॉलेज प्रबंधन ने बाजार दर पर जमीन को अपने कब्जेदारों को बेचने का फैसला किया। दस्तावेजों से पता चलता है कि बिक्री के कामों में कॉलेज प्रबंधन ने यह उल्लेख नहीं किया कि विचाराधीन भूमि वक्फ संपत्ति थी, जिसे शिक्षा के उद्देश्य से कॉलेज प्रबंधन समिति के अध्यक्ष को दिया गया था। इसके बजाय उन्होंने कहा कि यह संपत्ति 1950 में गिफ्ट डीड में मिली थी।

निसार आयोग और नया विवाद: केरल राज्य वक्फ बोर्ड के खिलाफ कई शिकायतों मिलने के बाद वीएस अच्युतानंदन के नेतृत्व वाली सीपीआई (एम) सरकार ने 2008 में एक आयोग गठित किया। यह आयोग सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश एमए निसार के नेतृत्व में नियुक्त किया गया। आयोग का काम बोर्ड द्वारा परिसंपत्तियों के नुकसान के लिए जिम्मेदारी तय करना था।

इसके अलावा, अयोग को इन परिसंपत्तियों की वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश करना भी शामिल था। आयोग ने साल 2009 में अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में आयोग ने मुनंबम में जमीन को वक्फ संपत्ति माना और कहा कि कॉलेज प्रबंधन ने बोर्ड की सहमति के बिना इसकी बिक्री को मंजूरी दे दी थी। इसने इसकी वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश की थी।

वक्फ बोर्ड ने घोषित कर दी वक्फ संपत्ति: इसके बाद साल 2019 में वक्फ बोर्ड ने खुद ही मुनंबम भूमि को वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 40 और 41 के अनुसार वक्फ संपत्ति घोषित कर दी। बोर्ड ने राजस्व विभाग को निर्देश दिया कि वह भूमि के वर्तमान कब्जेदारों (जो कई वर्षों से कर का भुगतान कर रहे थे) से भूमि कर स्वीकार ना करे।

राजस्व विभाग को दिए गए इस निर्देश को राज्य सरकार ने साल 2022 में खारिज कर दिया। इसके बाद बोर्ड ने राज्य सरकार के फैसले को केरल हाई कोर्ट में उसी साल चुनौती दी। न्यायालय ने फिलहाल राज्य सरकार के फैसलों पर रोक लगा दी है। वर्तमान में, इस विवाद को लेकर भूमि के कब्जेदारों के साथ-साथ वक्फ संरक्षण समिति की ओर से एक दर्जन से अधिक अपीलें न्यायालय में लंबित हैं।

हालात को लेकर असमंजस में लोग

केरल के एर्नाकुलम जिले में कोच्चि से लगभग 38 किलोमीटर दूर अरब सागर के किनारे मुनम्बम स्थित है। यहाँ 610 परिवारों रहते हैं, जिनमें 510 कैथोलिक ईसाई और 100 हिंदू परिवार हैं। इन लोगों कहना है कि इन लोगों ने फारूख कॉलेज के मैनेजमेंट से यह जमीन खरीदी थी। इसको लेकर वे पिछले 60 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं, साल 2019 में वक्फ ने इसे अपनी संपत्ति घोषित कर दी।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, मुनम्बम में रहने वाले समर समिति (एक्शन काउंसिल) के संयोजक जोसेफ बेनी ने बताया कि यहाँ पर अधिकतर मछुआरा समुदाय के लोग रहते हैं। वे पीढ़ियों से यहाँ रह रहे हैं और सालों से भूमि कर भर रहे हैं। बेनी का कहना है कि साल 2022 में उन्हें बताया गया था कि वे टैक्स नहीं भर पाएँगे और ना ही जमीन बेच या गिरवी रख सकते हैं।

लगभग 68 साल की ओमाना यायी का कहना है कि वह पिछले 50 साल से मुनम्बम में रह रही हैं। उनकी शादी यहीं से हुई थी। उन्होंने कहा कि जब कॉलेज वालों से जमीन खरीदी गई थी, तब यहाँ पानी भरा हुआ था। उन्होंने कहा, “हम आधी रात को मछली पकड़ने जाते थे और लौटते समय सिर पर रेत लेकर आते थे। रेत भर-भरकर जमीन ऊँचा किया, तब यह जमीन रहने लायक हुई। इसमें वक्फ कहाँ से आ गया?”

जॉर्ज सोरोस से लिंक पर घिरीं सोनिया गाँधी, जिस फाउंडेशन की को-चेयरपर्सन वह ‘आजाद कश्मीर’ की पैरोकार: BJP ने पूछा- भारत विरोधियों से कॉन्ग्रेस का कैसा रिश्ता?

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी पर विदेशी ताकतों से जुड़ाव का गंभीर आरोप लगाया है। बीजेपी ने कहा है कि सोनिया गाँधी का संबंध ‘फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन एशिया पैसिफिक’ (FDL-AP) से है, जिसे जॉर्ज सोरोस फाउंडेशन द्वारा वित्तीय मदद मिलती है। बीजेपी का दावा है कि यह संगठन कश्मीर को भारत से अलग करने की वकालत करता रहा है। इस मुद्दे को लेकर संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ और कई बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

सोनिया-सोरोस मुद्दे पर संसद में हंगामा

सोमवार (9 दिसंबर 2024) को संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर गर्मागर्म बहस देखने को मिली। जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी दलों ने इसे बेबुनियाद आरोप बताते हुए जोरदार हंगामा किया। स्पीकर ओम बिरला ने विपक्ष को शांत करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार, लोकसभा की कार्यवाही को दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दिया गया। इसी तरह, राज्यसभा में भी भारी हंगामा हुआ और कार्यवाही पहले 12 बजे और फिर 2 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी।

बीजेपी ने सोनिया गाँधी पर लगाए गंभीर आरोप

बीजेपी ने दावा किया है कि सोनिया गाँधी, एफडीएल-एपी की सह-अध्यक्ष होने के नाते, उस संगठन से जुड़ी रही हैं जो कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र मानने का समर्थन करता है। बीजेपी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “सोनिया गाँधी और जॉर्ज सोरोस के बीच का यह संबंध भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप को दर्शाता है।” बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि राजीव गाँधी फाउंडेशन और सोरोस फाउंडेशन के बीच साझेदारी हुई थी, जो इस विदेशी प्रभाव को और पुष्ट करती है।

बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल गाँधी ने अडानी समूह के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओसीसीआरपी (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) की रिपोर्ट का हवाला दिया था। ओसीसीआरपी को भी सोरोस फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा, “राहुल गाँधी और ओसीसीआरपी के बीच यह संबंध दिखाता है कि विपक्ष किस तरह से भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहा है।”

निशिकांत दुबे ने संसद में अपनी आवाज दबाने का आरोप लगाया और एक्स पर लिखा, “आज लोकसभा में मुझे बोलने का अवसर शून्य काल में था, लेकिन विपक्ष ख़ासकर कॉॉन्ग्रेस पार्टी ने सोरोस के सम्बन्ध में पोल खुलने के डर से मेरी आवाज़ को दबाया। संसद में नियम के अनुसार यदि आवाज़ उठाने पर हल्ला कर दबाया जाए तो लोकतंत्र ख़तरे में है। संविधान कैसे बचेगा?”

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सभी दलों से की एकजुटता की अपील

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मामले को ‘भारत की संप्रभुता पर हमला‘ बताया। उन्होंने कहा, “अगर कोई भारत-विरोधी ताकतों के साथ काम करता है, तो सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर उसका विरोध करना चाहिए। यह सिर्फ कॉन्ग्रेस का मुद्दा नहीं है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।” रिजिजू ने कॉन्ग्रेस नेताओं से अपील की कि अगर उनकी पार्टी का कोई सदस्य देशविरोधी तत्वों से जुड़ा है, तो उसे सामने लाएँ।

वहीं, कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इन आरोपों को ‘राजनीतिक साजिश’ करार दिया। कॉन्ग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “जब सरकार को कुछ छिपाना होता है, तो वह ऐसे मुद्दे उछालती है। अगर उनके पास कोई ठोस सबूत है, तो जाँच कराएँ।” वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा ने कहा, “सरकार को पहले अपने घर की सफाई करनी चाहिए। विपक्ष को डराने-धमकाने की यह कोशिश अब नहीं चलेगी।”

ओसीसीआरपी और सोरोस फाउंडेशन पर क्या हैं आरोप?

ओसीसीआरपी एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन है, जो अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करता है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि यह संगठन भारत की छवि खराब करने और मोदी सरकार को अस्थिर करने के लिए विपक्ष के साथ मिलकर काम कर रहा है। हालाँकि, अमेरिका ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ओसीसीआरपी जैसे संगठन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और उनकी संपादकीय नीति पर किसी का नियंत्रण नहीं होता।

बीजेपी के आरोपों पर अमेरिकी दूतावास ने बयान जारी कर कहा, “यह निराशाजनक है कि भारत की सत्ताधारी पार्टी इस तरह के आरोप लगा रही है। अमेरिकी सरकार पत्रकारों को पेशेवर प्रशिक्षण और विकास के लिए मदद करती है, लेकिन इसका संपादकीय स्वतंत्रता से कोई लेना-देना नहीं है।” बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने इस बयान को आधार बनाते हुए कहा, “अमेरिका ने खुद स्वीकार किया है कि ओसीसीआरपी और सोरोस फाउंडेशन को उनके फंड मिलते हैं। यह साफ दिखाता है कि विपक्ष और विदेशी ताकतें भारत के खिलाफ साजिश रच रही हैं।”

संसद में सोरोस चैप्टर कैसे शुरू हुआ

संसद में सोरोस का मुद्दा सबसे पहले बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने 6 दिसंबर को उठाया था। उन्होंने राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान सोरोस के करीबियों के साथ मुलाकात का जिक्र किया और इसे ‘भारत-विरोधी ताकतों’ से जोड़ा। उन्होंने संसद में कहा, “कॉन्ग्रेस का हाथ जार्ज सोरोस के साथ, राहुल गाँधी जी की भारत जोड़ो यात्रा का खर्च सोरोस ने दिया या नहीं, सोरोस ने 1000 भारतीय बच्चों को विदेश में पढ़ाई का खर्च दिया, उसमें कितने कॉंग्रेस नेताओं के बच्चे हैं? मेरा कॉन्ग्रेस पार्टी से प्रश्न पूछने का सिलसिला जारी रहेगा।” इसके बाद, यह मुद्दा संसद में हंगामे का कारण बन गया।

बीजेपी ने यह भी कहा है कि जॉर्ज सोरोस की फंडिंग से चलने वाले खोजी पत्रकारों ने ही अडानी पर हमले को लेकर राहुल गाँधी के भाषणों का प्रसारण किया। राहुल गाँधी भी इसे अपने सोर्स के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाए। बीजेपी ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर भी जॉर्ज सोरोस को अपना दोस्त बता चुके हैं।

बहरहाल, सोरोस और सोनिया गाँधी के बीच कथित संबंधों को लेकर संसद में उठा यह मुद्दा राजनीतिक संघर्ष का नया अध्याय बन गया है। जहाँ बीजेपी इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का सवाल बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘ध्यान भटकाने की चाल’ करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद संसद के बाहर जनता के बीच कितना असर डालता है।

कुवैत में नर्स का काम करने गए, गल्फ बैंक से किया ₹700 करोड़ फ्रॉड: केरल के 1425 लोग जाँच के दायरे में, भारी-भरकम लोन लेकर दूसरे देशों में हो गए शिफ्ट

केरल के कुछ लोगों द्वारा कुवैत के गल्फ बैंक के साथ 700 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने का मामला प्रकाश में आया है। इस धोखाधड़ी केस में करीबन 1425 मलयालियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। आरोप है कि ये सारे लोग गल्फ बैंक से बड़े अमाउंट का लोन ले-लेकर अलग-अलग देशों में शिफ्ट हो गए।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन आरोपितों ने फर्जी दस्तावेजों और पहचान पत्रों का इस्तेमाल करते हुए बैंक से ऋण प्राप्त करने का प्रयास किया। अब पुलिस ने कानूनी कार्रवाई करते हुए इनके खिलाफआई आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (विश्वासघात) के तहत मामला दर्ज किया है।

मामले में कुल 1425 आरोपित हैं, सबके खिलाफ जाँच जारी है और अन्य संभावित आरोपितों की पहचान की जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन आरोपितों ने धोखाधड़ी करने के क्रम में बैंक से पहले 50 लाख रुपए से 2 करोड़ रुपए तक का लोन लिया। इसके बाद इस वाले लोन को इन लोगों ने समय से लौटा दिया लेकिन बाद में बड़े लोन ले लेकर फरार हो गए।

कहा जा रहा है कि ये आरोपित गल्फ बैंक को चूना लगाने के बाद ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में जाकर बसे हुए हैं। वहीं बैंक ने इस मामले में अपनी छानबीन को तीन महीने पहले ही करना शुरू किया। तब शुरू किया है जब कर्ज चुकाने की तारीख लेट होती गई। बैंक के अधिकारी केरल आए। यहाँ उन्होंने सीनियर पुलिस अधिकारी से मुलाकात की और सारा मामला बताया। इसके बाद शिकायत के आधार पर एर्नाकुलम और कोट्टायम जिलों में 10 मामले दर्ज किए गए हैं।

अभी तक की जाँच में सामने आया है कि इस घटना में 800 ऐसे लोग हैं तो कुवैत के स्वास्थ्य मंत्रालय में बतौर नर्स काम करते थे। बैंक का मानना है कि शायद शुरुआत में कुछ लोगों ने इस गड़बड़ी को अंजाम दिया हो और बाद में उनसे सीखकर दूसरे मलयाली भी इस अपराध को किए हों।

जहाँ से PM मोदी ने फूँका था ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का बिगुल, अब वहीं से लॉन्च किया ‘बीमा सखी’: 10वीं पास महिला भी करेंगी कमाई, LIC की योजना के बारे में जानिए सब कुछ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरियाणा के पानीपत में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की बीमा सखी योजना का शुभारंभ किया है। केंद्र सरकार की योजना का उद्देश्य महिलाओं को रोजगार का साधन देना और उन्हें वित्तीय तौर पर साक्षर बनाना है। इस योजना के तहत महिलाओं को ट्रेनिंग भी मिलेगी और साथ ही में उन्हें हर महीने स्टाइपेंड भी मिलेगा। इस योजना के जरिए देश की हजारों महिलाएँ लाभान्वित होंगी। पीएम मोदी ने इस योजना को उसी पानीपत से चालू किया है, जहाँ से उन्होंने 2015 में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत की थी।

क्या है बीमा सखी योजना?

बीमा सखी योजना 18-70 वर्ष की आयु की उन महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए बनाई गई है जो 10वीं कक्षा तक पढ़ी हुई हैं। इस महिलाओं को LIC तीन वर्षों तक ट्रेनिंग देगी। इन महिलाओं को लोगों को वित्तीय साक्षरता के साथ ही बीमा के बारे में जानकारी देने के लिए ट्रेनिंग दी जाएगी। यह महिलाएँ 3 वर्ष तक ट्रेनिंग लेने के बाद LIC एजेंट के तौर पर काम कर सकेंगी। इन्हें सिर्फ एजेंट के तौर पर ही नहीं बल्कि LIC अधिकारी के काम का भी मौका मिला सकेगा। इन्हें बीमा अधिकारी बनने के लिए स्नातक की योग्यता होनी चाहिए होगी।

इस योजना के तहत भर्ती की गई बीमा सखी निगम की स्थायी कर्मचारी नहीं होंगी। हालाँकि, वह निगम की एजेंट के तौर पर काम कर सकेंगी और इससे होनी वाली आय से वह स्वयं और अपने परिवार को सशक्त कर सकेगी। उन्हें LIC के लिए काम करने के दौरान स्टाइपेंड मिलता रहेगा और साथ ही उन बीमा पॉलिसी का कमीशन भी मिलेगा, जो उन्होंने बेचीं होंगी।

क्या-क्या फायदे मिलेंगे?

LIC के जरिए बीमा सखी बनने वाली महिलाओं को ट्रेनिंग के 3 वर्ष तक लगातार फायदे मिलते रहेंगे। उन्हें पहले वर्ष प्रतिमाह ₹7000 दिए जाएँगे। जबकि दूसरे वर्ष प्रतिमाह ₹6000 और तीसरे वर्ष ₹5000 मिलेंगे। इनके तीनों वर्ष के लिए ट्रेनिंग के दौरान कुछ मानक भी पूरे करने हैं। इसके अलावा वह पॉलिसी बेच कर कितना भी पैसा कमा सकती हैं। इसमें काम करने के घंटे भी तय नहीं हैं। यानी महिलाएँ अपनी सुविधा के अनुसार, काम कर सकेंगी।

कौन महिला बन सकेगी बीमा सखी?

बीमा सखी बनने के लिए 18-70 की वह सभी महिलाएँ पात्र होंगी जो 10वीं पास हैं। महिलाओं को इसके लिए ऑनलाइन आवेदन देना होगा। महिलाओं को इसके बाद LIC खुद ही आगे बढ़ने में सहायता करेगी। हालाँकि, उन महिलाओं को इसमें योग्य नहीं माना जाएगा, जिनके परिवार में पहले से कोई LIC का एजेंट है। LIC में काम कर चुकी महिलाएँ भी इस योजना की पात्र नहीं होगी। यह योजना पूरी तरह से इस आयाम रही महिलाओं के लिए लाई गई हैं।

जो कभी कहते थे शपथ राम की खाते हैं, वे अब पीर बाबर शेख की ले रहे कसम: उद्धव ठाकरे के प्रति वफादारी जताने दरगाह पहुँचे शिवसेना (UBT) के कार्यकर्ता

उद्धव ठाकरे के गुट वाली शिवसेना (यूबीटी) के कार्यकर्ताओं ने 8 दिसंबर 2024 (रविवार) को एक दरगाह पर जाकर पार्टी के प्रति वफादारी की शपथ ली। यह दरगाह रत्नागिरी जिले के हाटिस में स्थित है और इसका नाम पीर बाबर शेख दरगाह है। इस तरह की शपथ लेने के लिए एक महजबी जगह चुनने पर सोशल मीडिया यूजर की भौहें टेढ़ी हो गई हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह आयोजन महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर उपजे कलह को शांत करने का प्रयास था। दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव की प्रतीक का दावा किया जाता है। ABP न्यूज ने अनाम सूत्रों के हवाले लिखा है कि प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए शपथ एक महजबी स्थल को चुना गया और यहाँ पर शपथ ली गई।

शिवसेना के कार्यकर्ता दरगाह क्यों गए?

शिवसेना (यूबीटी) को हाल के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में गंभीर झटका लगा है। पार्टी राज्य भर में सिर्फ 20 सीटें जीतने में कामयाब रही। वहीं, महाविकास अघाड़ी गठबंधन में शिवसेना (UBT), कॉन्ग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) शामिल हैं। इस गठबंधन को कुल 60 सीटें ही मिलीं। शिवसेना को विशेष रूप से कोंकण में हुआ नुकसान चुभ रहा है। यह ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट का गढ़ माना जाता था।

विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष पैदा हो गया। कई कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर आरोप लगाया कि वरिष्ठ नेताओं की लापरवाही और अक्षमता के कारण विधानसभा चुनावों में इस तरह की हार हुई। इस असंतोष के परिणामस्वरूप बैठकों और प्रमुख पदों से इस्तीफे के दौरान गर्मागर्म चर्चा हुई। इसके कारण पार्टी कैडर के भीतर गुस्सा बढ़ गया।

पार्टी के भीतर उथल-पुथल का समाधान वरिष्ठ नेता एवं उद्धव ठाकरे के करीबी विश्वासपात्र विनायक राउत ने निकालने की सोची। पार्टी के नेताओं द्वारा पीर बाबर शेख दरगाह में वफादारी की शपथ लेने का एक निर्णय लिया गया। इसका उद्देश्य जनता को यह दिखाना था कि पार्टी में विश्वास और एकता है। कार्यकर्ताओं से इसमें भाग लेने के लिए कहा गया था। सोर्स ने बताया कि जो व्यक्ति अनुपस्थिति रहे उन्हें असंतुष्ट या पार्टी विरोधी माना जाएगा।

दरगाह का एक संक्षिप्त इतिहास

डीप्रा दांडेकर द्वारा लिखित ‘ग्रे लिटरेचर ऐट दि दरगाह ऑफ पीर बाबर शेख ऐट हैटिस’ के अनुसार, पीर बाबर शेख दरगाह कोंकण क्षेत्र के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परिदृश्य में एक अनूठा स्थान रखता है। यह हैटिस गाँव में स्थित यह दरगाह सूफी संत पीर बाबर शेख को समर्पित है। कहा जाता है कि वह सदियों पहले इस गाँव में आए थे। वे आध्यात्मिक ज्ञान और सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते थे।

जब पीर बाबर शेख का निधन हो हुआ तो ग्रामीणों के उन्हें दफनाने को लेकर दुविधा उत्पन्न हो गई, क्योंकि स्थानीय लोग मुख्य रूप से हिंदू थे। आखिरकार, पास के इब्राहिम्पट्टन के मुस्लिमों ने उनके अंतिम संस्कार करने में सहायता की। उन्हें दफन करने के बाद कब्र को एक दरगाह का रूप दे दिया गया और उस स्थान को ‘सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक’ के रूप में स्थापित किया गया।

कहा जाता है कि यहाँ पर हिंदू और मुस्लिम दोनों सक्रिय रूप से इसके रखरखाव और यहाँ के अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यहाँ सालाना होने वाले उर्स मेले में पूरे क्षेत्र के हजारों भक्त आते हैं, जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग शामिल हैं। हालाँकि, दरगाह कोंकणी मुस्लिमों के लिए महत्व रखता है, लेकिन इस स्थान का प्रशासन और गतिविधियाँ स्थानीय हिंदू नागवेकर कबीले से बहुत प्रभावित हैं।

‘सांप्रदायिक एकता’ की अपनी कथा के बावजूद इस दरगाह का इतिहास भी तनाव को प्रकट करता है। चूँकि हैटिस में मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति कम है तो यहाँ धार्मिक सह-अस्तित्व के इतिहास पर सवाल उठता है। हैटिस में एक स्थायी मुस्लिम समुदाय की अनुपस्थिति, अनुष्ठान गतिविधियों के लिए पड़ोसी गाँवों के मुस्लिमों पर निर्भरता दरगाह की विरासत को परिभाषित करती है।

राजनीतिक निहितार्थ और भविष्य के दृष्टिकोण

पार्टी की आंतरिक चुनौतियों का समाधान करने और कार्यकर्ताओं के बीच एकता को बनाए रखने के लिए एक दरगाह का चुनाव करना शिवसेना के हिंदुत्व विचारधारा के साथ मेल नहीं खाता। इसको लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाए हैं। इसको लेकर सवाल किया जा रहा है कि क्या पार्टी ने अपनी पारंपरिक विचारधारा को अब पूरी तरह से छोड़ने का फैसला कर लिया है।

इधर बांग्लादेश के दौरे पर भारत के विदेश सचिव, उधर इस्कॉन के संत चिन्मय दास सहित सैकड़ों हिंदुओं पर FIR : दावा- कोर्ट में ‘टोपी’ को बनाया निशाना

बांग्लादेश लगातार अपनी नीतियों और कार्रवाई से विवादों में घिरता जा रहा है। पहले हिंदुओं और उनके धार्मिक स्थलों पर हमले की घटनाएँ सामने आई थीं, और अब बांग्लादेशी सरकार हिंदुओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके उन्हें परेशान करने की नई रणनीति अपनाई है। गिरफ्तार हिंदू संत चिन्मय कृष्ण दास समेत सैकड़ों हिंदुओं पर FIR दर्ज की गई है। यह घटना ऐसे समय में हुई है, जब भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी बांग्लादेश दौरे पर पहुँचे हैं। उनका यह दौरा बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमलों, कट्टरपंथी ताकतों की बढ़ती हिंसा और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मुद्दे पर भारत की चिंताओं को लेकर महत्वपूर्ण है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विक्रम मिसरी के दौरे से ठीक पहले इस्कॉन के संत चिन्यम कृष्ण दास और उनके सैकड़ों अनुयायियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। चिन्मय कृष्ण दास और उनके अनुयायियों पर एफआईआर दर्ज के अनुसार, 164 पहचाने गए लोग और 400 से 500 अज्ञात लोग इसमें आरोपित बनाए गए हैं। ये मामले चटगाँव कोर्ट परिसर में पुलिस और चिन्मय कृष्ण दास के अनुयायियों के बीच हुई झड़प के बाद दर्ज किए गए हैं।

इस शिकायत को व्यवसाई और हिफाजत-ए-इस्लाम बांग्लादेश के कार्यकर्ता इनामुल हक ने चटगाँव मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट मोहम्मद अबू बकर सिद्दीकी की अदालत में दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि 26 नवंबर को जब वह कोर्ट में अपना काम पूरा करके घर लौट रहे थे, उनके ऊपर चिन्मय कृष्ण दास के अनुयायियों ने हमला किया। इनामुल हक ने अपनी शिकायत में कहा कि उन्हें उनके कपड़े और पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया।

इनामुल हक का कहना है कि उन्हें उनके कपड़े, यानी ‘पंजाबी और टोपी’ पहनने की वजह से हमला किया गया, जिसके चलते उनके दाहिने हाथ और सिर में गंभीर चोटें आईं। बांग्लादेशी अस्पताल में उनका इलाज किया गया, लेकिन उनकी हालत पर भी चिंता जताई जा रही है।

विक्रम मिसरी का दौरा और बांग्लादेश पर भारत का दबाव

भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी का यह दौरा बेहद अहम माना जा रहा है। वह ढाका पहुँच चुके हैं और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के मुद्दे पर भारत की चिंताओं को उठा सकते हैं। उनके दौरे के दौरान बांग्लादेश के कार्यवाहक विदेश मंत्री मोहम्मद तौहीद हुसैन और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ बातचीत करने की संभावना है। इसके अलावा, उनके दौरे के दौरान बांग्लादेश के अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस से भी मुलाकात हो सकती है।

बांग्लादेश में हिंसा और कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत का यह दौरा एक संकेत है कि भारत किसी भी प्रकार की हिंसा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की घटनाओं पर गंभीर है। वहीं, विक्रम मिसरी का यह दौरा बांग्लादेश सरकार को एक मौका देगा कि वह इन गंभीर मुद्दों पर कार्रवाई करें और हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करें।

कोर्ट में जमा नहीं हुई जामा मस्जिद की सर्वे रिपोर्ट, संभल हिंसा में सूफियान और शारिक सहित 4 दंगाई गिरफ्तार: 400 पत्थरबाजों के पोस्टर जारी

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में पुलिस ने रविवार (23 नवंबर 2024) को हुई हिंसा में शामिल 4 अन्य उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है। फरार चल रहे लगभग 400 अन्य पत्थरबाजों के पोस्टर प्रशासन ने जारी कर दिए हैं। सैकड़ों हमलावर घर छोड़ कर अन्य प्रदेशों में छिपे हुए हैं, जिनकी तलाश में दबिश दी जा रही है। वहीं कोर्ट कमिश्नर का स्वास्थ्य खराब होने की वजह से सर्वे रिपोर्ट आज सोमवार (9 दिसंबर 2024) को अदालत में नहीं दाखिल हो पाई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 23 नवंबर की हिंसा में गिरफ्तार हुए 4 अन्य आरोपितों में से 2 को कोतवाली नगर और 2 को नखासा थाना पुलिस ने दबोचा है। कोतवाली पुलिस ने तनवीर और शारिक को पकड़ा है। ये दोनों संभल के कोट गर्बी क्षेत्र के रहने वाले हैं। हिंसा के दौरान पुलिस द्वारा जुटाई गई CCTV से दोनों आरोपित चिन्हित किए गए थे। हालाँकि तनवीर और शारिक को वहम था कि पुलिस उन्हें नहीं पहचान पाएगी। दोनों की गिरफ्तारी रविवार (8 दिसंबर 2024) को हुई है।

संभल में 23 नवंबर को ही पुलिस पर हुए हमले में शामिल 2 अन्य आरोपितों को नखासा थानाक्षेत्र की टीम ने पकड़ा है। इनके नाम अनस और सूफियान हैं। दोनों ही संभल जिले के निवासी हैं। ये दोनों हिन्दूपुरा क्षेत्र में जमा उसी भीड़ का हिस्सा था, जिसने पुलिस अधीक्षक के जनसम्पर्क अधिकारी (PRO) की हत्या करने के लिए गोली चलाई गई थी। पुलिस ने इन दोनों को चिन्हित कर रखा था और गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही थी। पूछताछ में अनस और सूफियान ने खुद को हिंसा में शामिल बताया है।

इस पूरी हिंसा में शामिल रहे लोगों की पहचान पुलिस कर रही है। इसमें अभी तक 400 बलवाइयों की पहचान भी हो चुकी है। इनको CCTV फुटेज, पुलिसकर्मियों की अपनी वीडियोग्राफ़ी व अन्य सबूतों के आधार पर पहचाना गया है। इन सभी के पोस्टर जारी कर गिरफ्तारी में आम लोगों से सहयोग की अपील की गई है। साथ ही दंगाइयों के संभावित ठिकानों पर पुलिस की टीमें दबिश दे रहीं हैं। प्रशासन के अनुसार कई हमलावर घर छोड़ कर फरार हैं, जो दिल्ली समेत कई अन्य प्रदेशों में छिपे हुए हैं।

कोर्ट में नहीं पेश हो पाई सर्वे रिपोर्ट

वहीं जामा मस्जिद की सर्वे रिपोर्ट सोमवार (9 दिसंबर 2024) को कोर्ट में पेश नहीं हो पाई। कोर्ट कमिश्नर रमेश सिंह राघव ने अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए अदालत से थोड़ा समय माँगा है। रमेश सिंह के मुताबिक सर्वे रिपोर्ट लगभग तैयार हो चुकी है। बताते चलें कि 29 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने 10 दिनों के अंदर सर्वे पूरा कर के रिपोर्ट दाखिल करने की समय सीमा तय की थी। 9 दिसंबर को यह समय सीमा पूरी हो रही है।

‘ईसा मसीह ही असली भगवान, बाकी सब नकली’: मेरठ के विनीत ने घर में ही बना रखा है ‘चर्च’, बीमारी भगाने और नौकरी लगाने का लालच दे बनाता था ईसाई

उत्तर प्रदेश के मेरठ में मसीही सभा का आयोजन करके गरीब लोगों का ईसाई में धर्मांतरण करने की साजिश का पता चला है। इस दौरान हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया जा रहा था और ईसा मसीह को ही असली बताया जा रहा था। इसकी जानकारी मिलते ही रविवार (8 दिसंबर 2024) को हिंदू संगठन घटनास्थल पर पहुँचे। शिकायत के बाद पुलिस ने 5 आरोपितों को हिरासत में ले लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना मेरठ के थाना क्षेत्र परतापुर की है। यहाँ शंकरपुरी इलाके में विनीत नाम के व्यक्ति का घर है। विनीत ने लगभग 10 साल पहले ईसाई मत अपना लिया था और अब वो आसपास के लोगों को भी ऐसा ही करने के लिए उकसा रहा है। बताया जा रहा है कि बिना रजिस्ट्रेशन के ही वह पिछले 5 साल से अपने घर के एक हिस्से को चर्च के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।

हिन्दू संगठन के सदस्यों और किसान मोर्चे से जुड़े कार्यकर्ताओं को रविवार को विनीत के घर पर लोगों के जमावड़े की सूचना मिली। पता चला कि आसपास के लगभग 500 लोगों को वहाँ बाइबिल पढ़ाई जा रही है। इनमें महिलाएँ भी शामिल हैं। इस जमावड़े में कुछ बाहर से भी लोग आए थे। हिंदू संगठनों ने देखा कि विनीत के घर के एक हॉल में मसीही प्रार्थना सभा हो रही थी। इसके बाद विरोध शुरू कर दिया।

किसान संगठन से जुड़े गौरव पराशर ने मीडिया को बताया कि विनीत के घर में भोले-भाले हिन्दुओं को बीमारी ठीक करने से लेकर नौकरी दिलाने तक के प्रलोभन दिए जा रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सभा के नाम पर हिन्दू धर्म को अपमानित किया जा रहा था और ईसा मसीह को ही असली देवता बताया जा रहा था। यहाँ धर्मान्तरण के लिए अधिकतर महिलाओं और नाबालिग बच्चों को उकसाया जा रहा था।

हिंदू संगठनों की सूचना पर पुलिस तत्काल मौके पर पहुँची। पुलिस ने मौके की वीडियोग्राफ़ी करवाई और लोगों के बयान भी लिए। सभी पक्षों को समझा-बुझाकर शांत करवाया गया और मामले की जाँच शुरू कर दी गई। घटनास्थल से पुलिस ने कुछ ईसाई साहित्य व एक रजिस्टर बरामद किया है, जिसमें लोगों के नाम-पते लिखे हुए हैं।

पुलिस ने केस दर्ज करके अब तक 5 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। एसपी का कहना है कि पुलिस इस मामले की जाँच करके पता लगाएगी कि विनीत कुमार ने अभी तक कितने लोगों का धर्मांतरण किया है। इसके साथ ही यह पता किया जाएगा कि वह किस संगठन से जुड़ा है और लोगों के धर्मांतरण के लिए उसके पास पैसे कहाँ से आते हैं।

पश्चिम बंगाल में डेमोग्राफी बदलाव चिंताजनक, बांग्लादेशियों की धमकी को हल्के में ना लें: भाजपा नेता अर्जुन सिंह बोले- ‘जिहादियों’ के हमले पर चुप रहती है बंगाल पुलिस

पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता अर्जुन सिंह ने राज्य में तेजी से हुए डेमोग्राफी बदलाव को लेकर चिंता जताई है। अर्जुन सिंह ने इसी के साथ पश्चिम बंगाल की ममता सरकार पर राज्य की पुलिस को कमजोर करने का आरोप लगाया है। उन्होंने साथ ही में बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथियों की कोलकाता कब्जा करने की धमकियों को हल्के में नहीं लेने की बात कही है।

पश्चिम बंगाल की बैरकपुर लोकसभा सीट से सांसद रहे अर्जुन सिंह ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा, “बांग्लादेश में पूर्व फौजियों और कुछ जमीयत के नेता दावा कर रहे हैं कि वे 4 दिन में कोलकाता पर कब्जा कर सकते हैं। हमें इस खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि पिछले एक दशक में सीमावर्ती जिलों में जिस तरह से डेमोग्राफी में बदलाव आए हैं, वह काफी चिंता की बात है। अर्जुन सिंह ने यह भी आरोप लगाया की राज्य की पुलिस पर भी प्रश्न खड़े किए और उनके ऊपर आरोप लगाया कि वह इस्लामी कट्टरपंथियों पर नरमी बरत रहे हैं।

अर्जुन सिंह ने कहा कि सीमा की सुरक्षा के लिए सीमा क्षेत्र से 50 किलोमीटर क्षेत्र को BSF के अधीन रखने का प्रस्ताव था, लेकिन ममता सरकार ने पहले दिन से ही BSF को निशाने पर ले लिया और केवल अपने ‘गाय’ वोट बैंक की रक्षा करने और तस्करों को खुश रखने के लिए BSF की छवि को खराब करने की कोशिश की। हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में कट्टरपंथियों ने मंदिरों और पूजा पंडालों पर हमला किया, तोड़फोड़ की गई और पुलिस चुप रही। यहाँ तक ​​कि जब हावड़ा में जिहादियों ने पुलिस पर हमला किया, तब भी पुलिस ने कुछ नहीं किया।”

अर्जुन सिंह ने माँग की है कि केंद्र सरकार कश्मीर से अधिक अभी पश्चिम बंगाल पर ध्यान दे। उन्होंने कहा, “इस समय देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए कश्मीर से ज्यादा पश्चिम बंगाल पर ध्यान देने की जरूरत है। मैं प्रधानमंत्री मोदी जी और गृह मंत्री अमित शाह जी से अनुरोध करता हूँ कि सीमाओं की सुरक्षा के लिए पश्चिम बंगाल पर ध्यान दें।” उन्होंने एक वीडियो भी साझा किया जिसमें एक भीड़ पुलिसकर्मियों पर हमला करते दिखती है।

गौरतलब है कि हाल ही में सोशल मीडिया में बांग्लादेश का एक वीडियो वायरल हुआ था। यह वीडियो बांग्लादेश में आयोजित की गई एक भारत विरोधी रैली का था। इसमें खुद को बांग्लादेशी फ़ौज का रिटायर्ड फौजी बताने वाले दो लोगों ने दावा किया था कि वह हमला करके 4 दिनों के भीतर कोलकाता पर कब्जा कर सकते हैं। बांग्लादेश में बीते दिनों में भारत के प्रति घृणा कैम्पेन चलाए जा रहे हैं। बंगलादेशी अकाउंट्स लगातार कहीं पूर्वोत्तर भारत तो कहीं पश्चिम बंगाल पर कब्जा करने की बात कर रहे हैं।