उतर प्रदेश के नोएडा से एक लव जिहाद का मामला सामने आया है। यहाँ एक ताबिश असगर नाम के मुस्लिम लड़के ने खुद की हिन्दू पहचान बता कर एक हिन्दू युवती से शादी कर ली। इसके बाद हिन्दू युवती पर दबाव डाल कर उसने इस्लाम भी कबूल करवाने की की कोशिश की। हिन्दू लड़की को फंसाने के पूरे मामले में मुस्लिम लड़के के परिजन भी शामिल रहे। हिन्दू युवती की पहाड़ से धक्का देकर हत्या करने की भी कोशिश की गई। मामले में पीड़िता पुलिस के पास पहुँची है। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मुस्लिम लड़के को गिरफ्तार कर लिया है।
यह पूरा मामला नोएडा के थाना सेक्टर 113 का है। इस थाने में एक हिन्दू युवती ने 3 दिसंबर,2024 को एक शिकायत दर्ज करवाई है। पीड़िता ने बताया है कि 4 साल पहले उसका एक युवक से फेसबुक से सम्पर्क हुआ था। फेसबुक प्रोफाइल पर उसका नाम विशाल था। इसके बाद उससे मुलाक़ात भी हुई। इस दौरान उसने अपना नाम विशाल राणा और पता अमरोहा जिला बताया था। विशाल बताने वाले मुस्लिम युवक ने खुद को हिन्दुओं की राजपूत जाति से बताया और पीड़िता को प्रेमजाल में फंसा लिया।
20 दिसंबर 2021 को पीड़िता और विशाल राणा की सगाई भी हो गई। इस कार्यक्रम में विशाल का भाई भी मौजूद था जिसने उस समय अपना नाम वासू राणा बताया था। 22 फरवरी 2023 को गाजियाबाद के एक मैरिज लॉन में हिन्दू युवती और विशाल राणा की शादी हिन्दू विधि-विधान से शादी भी हुई। इस शादी में पीड़िता के परिजन और तमाम नाते-रिश्तेदार भी मौजूद थे। शादी के बाद विशाल और हिन्दू युवती एकसाथ रहने लगे।
शादी के कुछ दिनों बाद विशाल राणा ने हिन्दू युवती से कोर्ट मैरिज की बात कही। इसके लिए वह उसे इलाहबाद हाईकोर्ट ले गया। विशाल नाम की सच्चाई का खुलासा यहाँ हुआ। हिन्दू युवती ने जब यहाँ कागज देखे तो पता चला कि वह विशाल नहीं बल्कि ताबिश असगर है। यहीं पर उस यह भी पता चला कि उसकी मंगनी में वासू राणा बन कर शामिल हुआ युवक वसीम है।
जब लड़की ने इस पर सवाल-जवाब किया तो ताबिश ने उसे भविष्य का डर दिखा कर चुप करवा दिया। पोल खुलने के बाद से ताबिश असगर पीड़िता पर लगातार इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाने लगा। इंकार करने पर वो पीड़िता को जान से मारने की धमकी भी देता था।
फरवरी 2024 में पीड़िता गर्भवती हुई तो ताबिश ने उसका जबरदस्ती गर्भपात भी करवा दिया। इसके बाद परेशान हो कर पीड़िता अपने मायके में रहने लगी। कुछ दिनों बाद ताबिश पीड़िता के मायके गया और तमाम मिन्नत कर के उसे वापस अपने पास ले लाया।
पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया है कि कुछ दिन तक ठीक से रहने के बाद ताबिश उन पर फिर से इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाने लगा। जब पीड़िता ने पुलिस की बात इस मामले को लेकर कही तो ताबिश फरार हो गया और पीड़िता अकेले रह गई।
पीड़िता ने इसके बाद नोएडा पुलिस में ताबिश की गुमशुदगी दर्ज करवाई। पुलिस ने लगभग 20 दिनों के अंदर ताबिश को खोज निकाला। ताबिश की तमाम मिन्नतों पर पीड़िता पिघल गई और उस पर कोई केस नहीं दर्ज करवाया। ताबिश पर पीड़िता को धोखे में रख कर लव मैरिज के नाम पर लिव-इन-रिलेशनशिप के कागजात बनवाने के भी आरोप हैं।
इस बीच ताबिश पीड़िता को झाँसा दे कर अपने साथ 18 नवंबर 2024 को उत्तराखंड के रामनगर घुमाने ले गया। यहाँ उसने पहाड़ों से धक्का दे कर पीड़िता को मार डालने की कोशिश की। खुद को बचाने के चक्कर में पीड़िता और आरोपित की हाथापाई हुई। इसी दौरान पीड़िता के हाथों में चोट भी लग गई।
पुलिस को दी गई शिकायत में पीड़िता ने ताबिश पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने ताबिश के खिलाफ धारा 323, 313, 506 और धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत मामला दर्ज कर लिया है। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया है।
मन्नत नाम रखने की थी तैयारी
ऑपइंडिया ने इस मामले में हिन्दू पीड़िता से बात भी की है। उसने ऑपइंडिया को बताया कि ताबिश ने उसका नाम बदल कर मन्नत रखने की तैयारी कर ली थी। पीड़िता ने आगे बताया कि आरोपित कोई काम नहीं करता था और वो खुद नौकरी कर के परिवार चलाती थी।
पीड़िता ने बताया कि ताबिश का परिवार चाहता था कि वो बच्चे पैदा करें लेकिन उनकी परवरिश इस्लामी तरीके से हो। इसके लिए पीड़िता तैयार नहीं हुई। पीड़िता ने बताया कि उसे कई मज़हबी लाइनें रटाने की भी कोशिश की गई। पीड़िता ने माँग की है कि ताबिश के भाई वसीम को भी गिरफ्तार किया जाए।
पंजाब से आए किसानों ने रविवार (8 दिसम्बर, 2024) को भी शंभू बॉर्डर पर खूब हंगामा काटा। हरियाणा पुलिस ने किसानों पर फूल बरसाए लेकिन उसका जवाब ने पत्थर से दिया दिया। पुलिस ने जब उन 101 किसानों की पहचान चेक करने की कोशिश की, जिनकी दिल्ली जाने के लिए लिस्ट दी गई थी, तो इस पर भी बवाल हुआ। पुलिस ने हंगामा काट रहे किसानों को तितर बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले चलाए। किसानों ने रविवार का जत्था वापस ले लिया।
#WATCH | Police sprinkle flower petals on the farmers at the Punjab-Haryana Shambhu border who are protesting and trying to move ahead as they begin their 'Dilli Chalo' march, today pic.twitter.com/EjIs3vVWsc
हरियाणा पुलिस के अनुसार, जिन 101 किसानों की लिस्ट उन्हें सौंपी गई थी, वह उन किसानों से मेल नहीं खा रही थी जो दिल्ली जा रहे थे। पुलिस ने उनकी पहचान किए गए बगैर आगे जाने की अनुमति देने से मना कर दिया। पुलिस ने यह भी कहा कि इन किसानों को दिल्ली जाने की अनुमति नहीं दी गई है।
वहीं इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सरवन सिंह पंढेर ने कहा कि किसान किसी भी त्याग के लिए तैयार हैं और वह पुलिस से सहयोग करेंगे। सरवन सिंह पंढेर ने बताया कि उनकी समस्याओं का हल पीएम मोदी के पास ही है। हरियाणा पुलिस ने इस बवाल के चालू होने से पहले किसानों के ऊपर फूल बरसाए।
#WATCH | At Punjab-Haryana Shambhu border, DSP Shahabad Ramkumar says, "The team has been deployed here since morning…We gave clear instructions that we will check their (farmers) identity and permission and only then will we allow them to move forward…They disagreed…we… pic.twitter.com/bgqlVBmsKe
हरियाणा पुलिस के एक जवान ने बताया कि उन्होंने किसानों पर फूल बरसाए लेकिन जवाब में उनके ऊपर पत्थर मारे गए और जालियाँ तोड़ने की कोशिश हुई। पुलिसकर्मी ने बताया कि उन्होंने किसानों को समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं माने, उन्होंने अपनी आईडी और परमिशन भी नहीं चेक करवाई।
पुलिसकर्मी ने बताया कि जब पुलिस पर हमला हुआ तब उन्होंने हल्का बल प्रयोग किया। पुलिसकर्मी ने कहा कि वह लगातार किसानों से विनती करते रहे लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए लगाई गई जाली पर भी हमला हुआ। काफी देर तक चले हंगामे के बीच रविवार का जत्था वापस हो गया।
सरवन सिंह पंढेर ने दावा किया कि रविवार को हवा किसान जिस दिशा में हैं, उस तरफ बह रही है, इसलिए पुलिस अधिक आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। उन्होंने दावा किया कि रविवार को पुलिसिया कार्रवाई के चलते एक 8 किसान घायल हुए हैं। सरवन सिंह पंढेर ने कहा है कि अब दोबारा बातचीत करके रणनीति तैयार की जाएगी।
गौरतलब है कि बीते कुछ दिनों से लगातार किसान फिर से दिल्ली जाने का प्रयास कर रहे हैं। इस बार किसानों ने कहा है कि वह पैदल ही दिल्ली की तरफ जाना चाहते हैं। वहीं हरियाणा पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए पंजाब और हरियाणा के बॉर्डर पर ही बैरीकेडिंग लगा दी है और रास्ता रोक दिया है। बीते लगभग एक वर्ष से यही स्थिति बनी हुई है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (रिपोर्टर्स सेंस फ्रंटियर्स या RSF) ने 3 दिसंबर 2024 को अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में प्रेस फ्रीडम अवॉर्ड्स का 32वाँ संस्करण आयोजित किया। इस दौरान खुद को पत्रकार कहने वाले प्रोपेगैंडिस्ट यूट्यूबर रवीश कुमार को ‘इंडिपेनडेंस प्राइज’ दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि RSF फोर्ड फाउंडेशन और पश्चिमी सरकारों द्वारा फंडेड भारत एवं मोदी विरोधी संगठन है।
रवीश कुमार को भारतीय मीडिया में राजनीतिक दबाव के प्रतिरोध का प्रतीक बताया गया है। RSF ने उन्हें देश में पत्रकारिता का सच्चा नायक कहा। RSF ने दावा किया कि अडानी समूह द्वारा मीडिया हाउस का अधिग्रहण करने के बाद रवीश कुमार को ‘NDTV से बेरहमी से बाहर निकाल दिया गया’। हालाँकि, यह एक झूठा आरोप है। दरअसल, रवीश ने चैनल से इस्तीफा दे दिया था।
"This is a difficult time for journalists all over the world. Many are knowingly risking their lives everyday. It is only a very firm belief in the value of our independence that has enabled journalists like us to continue our work." -Ravish Kumar pic.twitter.com/SoTIEtzbuj
हालाँकि, RSF ने किसी कारण से अडानी समूह का नाम नहीं लिया, बल्कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी एक व्यवसायी’ कहकर उनकी तरफ संकेत किया। RSF हाल ही में तथाकथित फैक्ट-चेकर एवं ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर के समर्थन में सामने आया था। उस समय मोहम्मद जुबैर के खिलाफ यूपी पुलिस ने भारत की संप्रभुता और एकता को खतरे में डालने के आरोप में मामला दर्ज किया था।
Ford Foundation और पश्चिमी सरकारों द्वारा फंडेड है RSF
जो नहीं जानते, उन्हें बता दें कि RSF को Ford Foundation सहित पश्चिमी सरकारों और निजी संस्थाओं द्वारा भारी मात्रा में फंड दिया जाता है। इसके 2023 के फिनांशियल स्टेटमेंट के अनुसार, SRF को फंड देने वालों में यूरोपीय आयोग MFA, AIDS, Front Line, Oak Foundation, NHRF TAPIEI, MOF Danida Taiwan, Ford Foundation, OSF Core Support प्रमुख हैं।
SRF के वित्तीय विवरण से पता चलता है कि यूरोपीय आयोग MFA ने साल 2023 में SRF को 1,760,915 यूरो (लगभग 15.75 करोड़ रुपए) दिए हैं। अमेरिकी सरकार द्वरा फंडेंड एक संगठन NED ने इस अवधि में RSF को 333,283 यूरो (लगभग 3 करोड़ रुपए) दिए हैं। वहीं, Ford Foundation ने साल 2023 में RSF को 384,008 यूरो (3.43 करोड़ रुपए) दिए हैं।
सोर्स: SRF
SRF के अन्य महत्वपूर्ण सहयोगियों में से एक नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) है। इसे अमेरिकी सरकार से फंड मिलता है। NED की वेबसाइट के अनुसार, “अमेरिकी कॉन्ग्रेस द्वारा बड़े पैमाने पर फंडेड NED विदेशों में उन समूहों को समर्थन देता है, जो गुमनाम रहकर स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के काम करने वाले लोकतंत्रवादियों को एकजुट रखने का काम करता है।”
इसमें आगे कहा गया है, “रिपब्लिकन और डेमोक्रेट द्वारा संयुक्त रूप से निर्मित NED का संचालन दोनों दलों के बीच संतुलित बोर्ड द्वारा किया जाता है और इसे राजनीतिक स्पेक्ट्रम में कॉन्ग्रेस का समर्थन प्राप्त है। NED उच्च स्तर की पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ काम करता है, जो हमारे संस्थापकों के इस विश्वास को दर्शाता है कि विदेशों में लोकतंत्र को बढ़ावा देना खुले तौर पर किया जाना चाहिए।”
SRF को फोर्ड फाउंडेशन भी सहयोग करता है। फोर्ड फाउंडेशन का भारत में असामाजिक तत्वों को फंडिंग करने का इतिहास रहा है। द ग्रेज़ोन की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की आलोचना कई वर्षों से अमेरिका और यूरोप द्वारा शासन परिवर्तन के लिए लक्षित सरकारों के प्रति अपने पूर्वाग्रह के लिए की जाती रही है। SRF ने वेनेजुएला के लिए विशेष पूर्वाग्रह दिखाया है।”
ग्रेजोन की रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “वहाँ लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित समाजवादी सरकार के खिलाफ कई हिंसक तख्तापलट के प्रयासों में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले कुलीनतंत्र के स्वामित्व वाले दक्षिणपंथी मीडिया आउटलेट और अमेरिका द्वारा वित्त पोषित विपक्षी समूहों को कथित निरंकुश शासन के असहाय पीड़ितों के रूप में चित्रित किया है।”
SRF द्वारा दी गई भारत की प्रेस स्वतंत्रता रेटिंग संदिग्ध
मई 2023 में RSF ने अपनी वार्षिक प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने भारत को 180 देशों में से 161वें स्थान पर रखा। RSF के अनुसार, 2022 से भारत 11 पायदान नीचे खिसक गया है। दिलचस्प बात यह है कि RSF के अनुसार, पाकिस्तान के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में सुधार हुआ है। 2022 में 157वें स्थान से पाकिस्तान ने सूची में 150वां स्थान प्राप्त किया है।
RSF की रेटिंग में यही बात तालिबान शासित अफ़गानिस्तान पर भी लागू होती है, जिसकी रैंकिंग 156 से सुधर कर 152 हो गई है। RSF ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार द्वारा विज्ञापनों पर खर्च किए जाने वाले पैसे को लेकर दावा किया है। RSF ने दावा किया है कि केंद्र सरकार प्रिंट और ऑनलाइन मीडिया में विज्ञापनों पर सालाना 130 बिलियन रुपए (13,000 करोड़ रुपये) खर्च कर रही है।
ऑपइंडिया ने आरटीआई दायर कर केंद्र सरकार द्वारा प्रिंट, आउटडोर विज्ञापन, सोशल मीडिया, रेडियो और टेलीविजन समेत अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर किए गए विज्ञापन खर्च की जानकारी माँगी थी। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से भेजे गए जवाब के अनुसार, वास्तविक आँकड़े आरएसएफ द्वारा किए गए दावों से कहीं भी मेल नहीं खाते हैं।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2022-23 में टेलीविजन विज्ञापनों पर 26.44 करोड़ रुपए और सोशल मीडिया विज्ञापनों पर 1.33 करोड़ रुपए खर्च किए। बता दें कि साल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से विज्ञापन खर्च में काफी कमी आई है। सरकार ने टेलीविजन विज्ञापनों पर सबसे अधिक 280.77 करोड़ रुपए वित्त वर्ष 2016-17 में खर्च किए थे।
भारत पर अपनी रिपोर्ट के दौरान RSF ने कई ऐसे दावे किए जो वास्तविकता के करीब नहीं थे। RSF ने दावा किया कि मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस इंडस्ट्रीज समूह के पास 70 से अधिक मीडिया आउटलेट हैं। यह दावा सही नहीं है, क्योंकि यह मुकेश अंबानी के 2019 के एक बयान पर आधारित है जहाँ उन्होंने कहा था कि रिलायंस के पास 72 टेलीविज़न चैनल हैं, जिनमें सभी प्रकार के चैनल शामिल हैं, न कि केवल समाचार चैनल।
इनमें News18 ब्रांडेड टीवी समाचार प्लेटफ़ॉर्म जैसे CNN Worldwide, CNN-News18, CNBC-TV18, CNN-IBN, CNBC आवाज़ आदि शामिल हैं। समाचार चैनलों के अलावा, इसमें Viacom18 Media के तहत एक मनोरंजन पोर्टफोलियो भी शामिल है, जो 50 चैनलों की मूल कंपनी है। ये सभी मनोरंजन चैनल हैं। रिलायंस का Jio प्लेटफ़ॉर्म भी अपने ग्राहकों के लिए समाचार का एक स्रोत है, लेकिन यह चैनलों या मीडिया आउटलेट के मालिक के बजाय एक एग्रीगेटर है।
RSF ने अलग-अलग वर्षों के डेटा का इस्तेमाल करके दावा किया कि कोविड-19 से संबंधित मीडियाकर्मियों की एक-तिहाई मौतें भारत में हुईं। आरएसएफ ने जून 2021 की ढाका ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट को लिंक किया, जिसमें कहा गया था कि दुनिया भर में 1,500 मीडियाकर्मियों की कोविड से मौत हुई। ढाका ट्रिब्यून ने प्रेस एम्बलम कैंपेन के डेटा का इस्तेमाल किया था।
इसके बाद उसने नेटवर्क ऑफ वीमेन इन मीडिया, इंडिया द्वारा बनाए गए एक दस्तावेज को लिंक किया, जिसमें कहा गया था कि भारत में 500 से अधिक मीडियाकर्मियों की कोविड से मौत हुई। उस दस्तावेज पर अब यह संख्या 626 है। इन दो डेटा बिंदुओं का उपयोग करते हुए आरएसएफ ने 2021 में दावा किया कि कोविड-19 से मीडियाकर्मियों की 1/3 (33 प्रतिशत) मौतें भारत में हुईं।
इस रिपोर्ट का उपयोग करते हुए RSF ने कहा, “कोविड-19 का मुकाबला करने की आड़ में सरकार और उसके समर्थकों ने मीडिया आउटलेट्स के खिलाफ मुकदमों का गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया, जिनकी महामारी की कवरेज आधिकारिक बयानों के विपरीत थी।” हालाँकि, जब हमने जाँच की तो पाया कि पीईसी ने मार्च 2022 तक नोट किया कि कोविड-19 से 1,994 मीडियाकर्मियों की मृत्यु हुई और उनमें से 284 भारत के थे।
RSF ने दावा किया था कि भारत सरकार ने किसानों के विरोध प्रदर्शन को कवर करने वाले मीडियाकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार किया। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने उस समय का भी जिक्र किया जब हिंसा के बारे में फर्जी खबरें साझा करने के लिए मीडियाकर्मियों के ट्विटर हैंडल को निलंबित कर दिया गया था।
RSF ने द वायर के सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ एक प्रदर्शनकारी की मौत की रिपोर्टिंग के लिए मामला दर्ज किए जाने का भी जिक्र किया। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस और मृतक का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की ओर से बार-बार स्पष्टीकरण दिए जाने के बाद भी वरदराजन ने प्रदर्शनकारी की मौत के बारे में फर्जी खबरें साझा करना जारी रखा था।
यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि द वायर को टेक फॉग और मेटा से संबंधित कई रिपोर्ट हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा था, क्योंकि वो सभी खबरें झूठे सबूतों पर आधारित थीं। आरएसएफ की यह रिपोर्ट साल 2021 में प्रकाशित हुई थी और साल 2023 की रैंकिंग में शामिल हुई थी। उन्होंने तथाकथित पत्रकार सिद्दीक कप्पन की गिरफ़्तारी का भी ज़िक्र किया था।
सिद्दीकी कप्पन को उत्तर प्रदेश पुलिस ने साल 2020 में हाथरस मामले के दौरान लोगों को भड़काने की योजना बनाने के आरोप में गिरफ़्तार किया था। RSF ने प्रोपेगेंडा पत्रकार राना अय्यूब को भी समर्थन दिया। अय्यूब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर झूठे दावे के लिए जानी जाती हैं। उन पर वित्तीय धोखाधड़ी का आरोप है। हाल ही में उन्होंने यूनेस्को के एक कार्यक्रम में गैंगस्टर अतीक अहमद के अपराधों को कमतर आँका।
RSF ने एक पुरानी रिपोर्ट को भी लिंक किया जिसमें दावा किया गया कि कश्मीर में स्थिति ‘अभी भी चिंताजनक’ है। RSF ने कश्मीरी पत्रकार फहाद शाह की रिहाई की माँग करने वाले एक लेख को लिंक किया था। उल्लेखनीय है कि फहाद शाह को आतंकवाद का महिमामंडन करने के लिए NIA ने गिरफ्तार किया था।
जनवरी 2023 में फहाद शाह के खिलाफ आरोप तय किए गए थे। फहाद पर ‘मी टू (Me Too) का भी आरोप लगाया गया था। RSF ने साल 2020 में फहाद शाह को उसके ‘साहस’ के लिए सम्मानित किया था। वे कश्मीर के एक कथित पत्रकार इरफान मेहराज के समर्थन में भी सामने आए, जिन्हें आतंकी फंडिंग मामले में गिरफ्तार किया गया था।
फोर्ड फाउंडेशन और इसकी भारत विरोधी गतिविधियाँ
फोर्ड फाउंडेशन अमेरिका का एक धर्मार्थ संगठन है, जो खुद को मानव कल्याण को आगे बढ़ाने में लगे एक समूह के रूप में प्रस्तुत करता है। वास्तव में यह असहिष्णु और कट्टर वामपंथी उग्रवादियों का एक गढ़ है। इस समूह का वामपंथी समर्थकों द्वारा समर्थित उद्देश्यों को वित्तपोषित करने का एक लंबा इतिहास रहा है। इन समूहों में भारत के वामपंथी समूह भी शामिल हैं।
साल 2015 में तीस्ता सीतलवाड़ के गबन मामले की जाँच करते समय गुजरात सरकार को फोर्ड फाउंडेशन द्वारा उनकी संस्थाओं को दिए गए धन का पता चला था। तीस्ता के ट्रस्ट ने FCRA मानदंडों का भी उल्लंघन किया था। तीस्ता के सबरंग कम्युनिकेशन एंड पब्लिशिंग प्राइवेट लिमिटेड को फोर्ड फाउंडेशन से भारत में सांप्रदायिकता आदि से लड़ने के लिए 2.9 लाख डॉलर (2.46 करोड़ रुपए) मिले थे।
बाद में गुजरात पुलिस द्वारा एक पत्र जारी किया गया था। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने फोर्ड फाउंडेशन की गतिविधियों की जाँच करने का इरादा व्यक्त किया थी। संभवतः इससे घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू हुई, जिनमें से अधिकांश पृष्ठभूमि में घटित हुईं और बाद में विकीलीक्स द्वारा उजागर की गईं। यह खुलासा फोर्ड फाउंडेशन के लीक ईमेल पर आधारित थी।
लीक हुए ईमेल के अनुसार, फोर्ड फाउंडेशन का दावा था कि तीस्ता के सबरंग ट्रस्ट को दिए गए अपने फंड को लेकर वह विवाद में उलझ गया था। 26 मई 2015 को लिखे गए इस पत्र का शीर्षक है, ‘भारत में फोर्ड फाउंडेशन: जॉन पोडेस्टा को नोट्स’। इसमें सरकार की कार्रवाई के संभावित कारण के रूप में राजनीति में आने से पहले अरविंद केजरीवाल के एनजीओ को दिए गए उसके फंड का भी उल्लेख है।
इस बात की पुष्टि किसी और ने नहीं, बल्कि भारतीय वामपंथी जगत की एक प्रमुख हस्ती अरुंधति रॉय ने की थी। सागरिका घोष के साथ एक साक्षात्कार में रॉय ने द हिंदू के लिए लिखे अपने एक लेख के बारे में बात की, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि केजरीवाल के एनजीओ को तीन साल के समय में फोर्ड फाउंडेशन से 400,000 डॉलर से अधिक मिले थे।
अरुंधती रॉय ने यह भी दावा किया था कि शुरू किए गए आंदोलन के शीर्ष ‘प्रबंधन’ वाले दस लोगों के समूह के पास अच्छी तरह से वित्तपोषित एनजीओ थे। उन्होंने कहा था कि टीम के तीन मुख्य सदस्यों ने मैग्सेसे पुरस्कार जीता है और इस पुरस्कार को फोर्ड फाउंडेशन द्वारा वित्तपोषित किया जाता है।
गुजरात के नवसारी जिले में मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं पर हमला कर दिया। मुस्लिम भीड़ के निशाने पर हिन्दू महिलाएँ रहीं। महिलाओं को पीटा गया और उनके साथ छेड़खानी की गई। मुस्लिम भीड़ ने इस पूरी हिंसा का बहाना वाहन पार्किंग के मामूली से विवाद को बनाया। मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं को नरसंहार और इलाके से भगा देने की धमकी भी दी। वहीं, मामले की जाँच के बाद पुलिस ने कहा है कि इस विवाद में कोई धार्मिक एंगल नहीं है, बल्कि गाड़ी पार्किंग को लेकर हंगामा हुआ था।
यह घटना शनिवार (7 दिसंबर, 2024) को टाउन पुलिस स्टेशन में पड़ने वाले दरगाह रोड में हुई है। मामले में पीड़ित हिन्दू पक्ष ने पुलिस को शिकायत सौंपी है। ऑपइंडिया ने इस मामले में पीड़ितों से बात की है।
ऑपइंडिया से बात करते हुए पीड़ित चंदन राठौर ने बताया कि शनिवार रात गाड़ी खड़ा करने को लेकर हिन्दू युवक की किसी मुस्लिम से कहासुनी हो गई थी। कुछ ही देर बाद 100-150 की तादाद में मुस्लिम भीड़ यहाँ पहुँच गई। भीड़ के हाथों में लाठी-डंडे और अन्य हथियार भी थे।
काफिरों भाग जाओ
चंदन राठौर ने बताया कि हमलावरों ने यहाँ मौजूद हिन्दू महिलाओं को मारपीटा और उनके साथ अश्लील हरकतें की। उनको ‘नंगा कर के मारने’ जैसी बातें कही गईं। जब पीड़ित परिवारों ने हमलावरों को रोकने की कोशिश की तो उनको गंदी-गंदी गालियाँ और जान से मार डालने की धमकी दी गई। हमलावरों ने कहा,”काफिरों यहाँ से भाग जाओ। यह हमारा इलाका है। अभी तो सिर्फ शुरुआत है।”
पीड़ितों ने टाउन पुलिस क्षेत्र में घटना की शिकायत दी है। शिकायत में उन्होंने पर शाहनवाज़ भंडारी को इस हिंसा मास्टरमाइंड बताया है। इसके अलावा एजाज शेख, शोएब, सूफियान, सलीम और रफीक बेट का भी जिक्र है। 150 अज्ञात लोगों को भी आरोपित बनाया गया है।
ऑपइंडिया ने इस मामले में स्थानीय थाने से भी सम्पर्क किया है। ऑपइंडिया से हुई बातचीत के अनुसार, समाचार लिखे जाने तक पुलिस ने इस घटना की FIR दर्ज नहीं की थी। इस कारण हिन्दू संगठनों और स्थानीय निवासियों में भारी नाराजगी है। ऑपइंडिया के पास हिन्दुओं द्वारा दी गई शिकायत कॉपी मौजूद है।
नवरात्रि और गणेशोत्सव पर भी मुस्लिम करते हैं हंगामा
चंदन राठौर ने ऑपइंडिया को बताया कि दरगाह रोड इलाका मुस्लिम बाहुल्य है। यहाँ एक दरगाह है जिसके बगल ही एक हिन्दू मंदिर भी बना हुआ है। चंदन का आरोप है कि पिछले 3 वर्षों से मुस्लिम कट्टरपंथी उन्हें त्यौहार तक नहीं मनाने दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि गणेशोत्सव के दौरान मुस्लिम भीड़ ने जबरन पंडाल में घुस कर भजन-कीर्तन बंद करवाया था। उन्होंने बताया कि यहाँ पर होने वाले धार्मिक आयोजनों में आने वाली हिन्दू महिलाओं के साथ छेड़खानी की जाती है।
इस इलाके में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के दौरान द्वार लगाए गए थे, इस पर मुस्लिमों ने विरोध किया था। तब उन्होंने हिन्दुओं को धमकी दी थी कि वह यह सारे द्वार उखाड़ देंगे। चंदन राठौर का आरोप है कि शाहनवाज़ भंडारी और शोएब का क्षेत्र में होने वाली लगभग हर बड़ी घटना में कहीं न कहीं हाथ जरूर होता है। इन दोनों के बुलावे पर भीड़ भी जमा हो जाती है।
हिन्दुओं के लिए बांग्लादेश जैसे हालात
चंदन राठौर के अलावा कई अन्य महिलाओं ने भी अपने वीडियो साझा किए हैं। एक महिला ने कहा, “क्या हिन्दू होना गुनाह है? वो गला काटने और हमें यहाँ से भगा देने की धमकी देते हैं। अब बांग्लादेश जैसा हाल भारत में भी होने लगा है। हिन्दुओं को हिंदुस्तान में रहने का क्या अब अधिकार नहीं है ?” एक अन्य पीड़िता ने बताया कि मुस्लिम भीड़ ने उनके सीने पर हाथ लगाया।
हिन्दू संगठन से जुड़े स्थानीय लोगों ने ऑपइंडिया से बातचीत में इस घटना पर आक्रोश जताया है। उन्होंने माँग की है कि सभी हमलावरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। स्थानीय पुलिस अधिकारियों को इस माँग का एक ज्ञापन भी सौंपा गया है।
मारपीट नहीं हुई, धार्मिक एंगल भी गलत- नवसारी पुलिस
हालाँकि पुलिस ने हमले से इनकार किया है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, शिकायत में मारपीट का जिक्र नहीं था। ये झगड़ा गाड़ियों की पार्किंग को लेकर हुए विवाद के चलते हुआ था। इस मामले में आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया गया है। इस बीच पुलिस ने इस बात से भी इनकार किया है कि हिंदुओं के खिलाफ कोई धार्मिक टिप्पणी की गई थी और पुलिस का कहना है कि वायरल वीडियो में ऐसी कोई बात नहीं कही गई थी। इस मामले में पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता 2023 और एसटी/एससी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है और आगे की कार्रवाई कर रही है।
(नए विवरण सामने आने के बाद रिपोर्ट को अपडेट किया गया है।)
मध्य प्रदेश के दमोह में एक नाबालिग छात्रा का उसके ही साथ पढ़ने वाले लड़कों ने गैंगरेप किया। उन्होंने इसका वीडियो भी बना लिया। गैंगरेप के बाद छात्रा को दोनों इसी वीडियो के सहारे ब्लैकमेल करने लगे। इससे परेशान होकर छात्रा ने आत्महत्या कर ली। मामले में पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है। गैंगरेप करने वाले आरोपित फरार हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना गुरुवार (5 दिसम्बर, 2024) को दमोह जिले के पथरिया थाना इलाके में हुई हैं। मृतका के पिता का आरोप है कि उनकी बेटी सोमवार (2 दिसंबर) को स्कूल जाने के बाद गैंगरेप का शिकार हुई थी। पीड़िता के पिता ने बताया कि उसके साथ पढ़ने वाले दो लड़के लंच टाइम के दौरान उसे पहाड़ी पर घुमाने ले गए थे।
यहीं पर उन्होंने छात्रा के साथ बारी-बारी से रेप किया। इस दौरान यहाँ पर 2 और लोग मौजूद थे, उन्होंने भी छात्रा के साथ रेप किया। इस दौरान गैंगरेप का वीडियो भी बना लिया गया। इसी वीडियो से लगातार नाबालिग को ब्लैकमेल किया जाता रहा। आखिरकार तंग आ कर लड़की ने सारी बात अपने घर बता दी।
पीड़िता के परिजन शिकायत के लिए थाने निकलने ही वाले थे कि तभी उनके घर में कुछ मेहमान आ गए। मेहमानों के कारण थोड़ी देर हुई और इसी बीच छात्रा ने खुद को एक कमरे में बंद कर फाँसी लगा ली। पुलिस के अनुसार, आरोपितों के परिजनों द्वारा मामले को आपस में ही सुलझाने का प्रयास किया गया था।
इसी दौरान पीड़िता को इस बात की भी आशंका हो गई कि उसके साथ घटी घटना की सबको जानकारी हो गई है, जिसके बाद उसने यह कदम उठाया। मामले में मृतक छात्रा के माता-पिता ने FIR दर्ज करवाई है। पुलिस ने 2 लोगों को इस मामले में आरोपित बनाया है।
घटना में अन्य आरोपितों की मिलीभगत के आरोपों की भी जाँच जारी है। केस दर्ज होने के बाद से सभी फरार है। पुलिस ने टीमे बनाकर उनकी तलाश के लिए दबिश देना चालू कर दिया है।
जम्मू शहर में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के पानी कनेक्शन काट दिए गए हैं। जम्मू प्रशासन ने 400 से अधिक रोहिंग्या के पानी कनेक्शन खत्म कर दिए हैं। उनके बिजली कनेक्शन भी खत्म किए गए हैं। रोहिंग्या जिन जमीनों पर रह रहे हैं, उन्हें भी खाली करने का आदेश दिया गया है। इस कार्रवाई से जम्मू कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार खफा हो गई है। उमर अब्दुल्ला सरकार के मंत्री ने वादा किया है कि रोहिंग्या को लगातार पानी मिलता रहेगा। उन्होंने कहा है कि यह मानवता के आधार पर किया जा रहा है।
जम्मू में अवैध रूप से आकर बसे आकर बसे रोहिंग्या के खिलाफ यह कार्रवाई बीते कुछ दिनों से लगातार जारी है। उनका सत्यापन भी हो रहा है। रोहिंग्याओं को भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ बड़ा खतरा मानती हैं। जम्मू में उनके 409 बिजली पानी कनेक्शन काटे गए हैं।
यह सभी परिवार 14 प्लाट पर रह रहे थे। इन जमीनों के मालिकों से कहा गया है कि वह जल्द से जल्द इन रोहिंग्याओं को यहाँ से बेदखल करें। जम्मू में पुलिस ने ऐसे 18 मकान मालिकों पर FIR भी दर्ज की है, जो बिना सत्यापन के लोगों को कमरे किराए पर दे रहे थे।
पुलिस ने इस दौरान 4 रोहिंग्या को गिरफ्तार भी किया है। यह कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी। इस एक्शन से जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार में मंत्री जावेद राणा नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा है कि किसी से पानी-बिजली छीने जाने का कोई अधिकार नहीं है।
उन्होंने वादा किया है कि सरकार इस मामले में प्रशासन से पूछताछ करेगी। उन्होंने कहा है कि अवैध रूप से बसे रोहिंग्या को पानी लगातार सप्लाई किया जाएगा। जावेद राणा जम्मू कश्मीर सरकार में जल मंत्री हैं।
वहीं भाजपा नेताओं ने इस करवाई का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि यह मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है और कार्रवाई के योग्य है। जम्मू शहर में रोहिंग्या आबादी एक बड़ी समस्या रही है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि शहर में 13000 से अधिक रोहिंग्या और बांग्लादेशी रह रहे हैं।
यह बीते एक दशक से यहाँ रह रहे हैं और इनकी आबादी बढ़ भी रही है। आशंका है कि कुछ रोहिंग्या जम्मू से आगे बढ़ कर राजौरी, कठुआ समेत संवेदनशील इलाकों में भी जा चुके हैं। कठुआ के होल्डिंग सेंटर में ऐसे ही 200 से अधिक रोहिंग्या बंद हैं।
रोहिंग्या को जम्मू के नगर निगम में काम देने तक का मामला सामने आ चुका है। एक रिपोर्ट में बताया गया था कि स्थानीय कामगारों के बदले रोहिंग्या को साफ़ सफाई का काम दिया जा रहा है। इसके लिए उन्हें स्थानीय कामगारों से दोगुने पैसे भी दिए जा रहे थे।
मणिपुर के जिरीबाम में कुकी अपराधियों ने तीन महिलाओं एवं तीन बच्चों की निर्मम तरीके से हत्या करके लाश फेंक दी थी। इसके बाद राज्य में नए सिरे से हिंसा भड़क उठी थी। जिरीबाम हिंसा के शिकार लोगों के परिजन शनिवार (7 सितंबर 2024) को दिल्ली पहुँचे और केंद्र सरकार से न्याय की गुहार लगाई। पीड़ित परिजनों ने कहा कि हत्या को अंजाम देने वालों को ‘कुकी शहीद’ कहा जा रहा है।
बता दें कि 11 नवंबर 2024 को कुकी समुदाय के अपराधियों ने 6 मैतेई लोगों का अपहरण कर लिया था। इनमें तीन महिलाएँ, दो नाबालिग और एक 10 महीने का बच्चा शामिल था। इन्हें अगवा करने के बाद इन्हें बुरी तरीके से प्रताड़ित किया गया। इसके बाद उनकी बर्बर तरीके से हत्या कर दी गई। कहा जा रहा है कि इनमें कुछ लोगों को जलाकर मार दिया गया था।
मृतकों के परिजनों ने बताया कि इस हत्याकांड में अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मृतक मैतेई लोगों के परिजनों ने कहा, “मेरी पत्नी और बच्चों सहित परिवार के 6 सदस्यों के शवों को देखने पर यातना और यौन उत्पीड़न के निशान मिले। मुझे संदेह है कि मारने से पहले रेप किया गया था और फिर बराक नदी में शव को फेंक दिया गया था।”
‼️Family of the butchered Jiribam Victim travels to #Delhi and appeals for justice as the killers have been hailed as ‘#KukiMartyrs’ ‼️
Please hear their heart wrenching story and help bring justice .
मृतक टेलीम थोइबी देवी के 38 वर्षीय पति और थजमनबी (8 वर्ष) के पिता टेलीम उत्तम सिंह ने कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे पूरे परिवार के सदस्यों को सीआरपीएफ के सामने अपहरण कर लिया जाएगा और उन्हें मार दिया जाएगा। इसलिए, मैं अधिकारियों से अपील करता हूँ कि वे जाँच करें और उन हमलावरों को कड़ी सजा दें।”
घटना को याद करते हुए टेलीम ने कहा, “जब मैं घर में था तो मेरी माँ ने मुझे बताया कि कुकी उग्रवादियों ने घर को घेर लिया है। माँ ने मुझसे कहा कि अगर संभव हो तो भागकर छिप जाऊँ, ताकि मेरी जान बच जाए। जब मैं बाहर गया तो देखा कि कुकी उग्रवादी मेरी माँ और बहनों को घसीटकर गाड़ियों में डाल रहे थे। 30 से ज़्यादा कुकी उग्रवादियों ने हमारे गाँव को घेर लिया था।”
उन्होंने बताया कि इस दौरान कुकी उग्रवादियों ने मैतेई समुदाय के लोगों के घरों पर गोलीबारी शुरू कर दी। पीड़ित परिवार ने बताया कि घटना वाली जगह से सीआरपीएफ़ की चौकी ज़्यादा दूर नहीं थी, फिर भी सीआरपीएफ़ की टीम अगवा की गईं महिलाओं को कुकी उग्रवादियों से नहीं बचा पाई और वे उनका अपहरण करके अपने साथ ले गए।
पीड़ितों की बेटी और बहन संध्या ने बताया, “जब मेरी माँ और बहनों की लाशें मिलीं तो वे अर्धनग्न थीं। मेरी बहन के सिर का ऊपरी हिस्सा फटा हुआ था और उनके शरीर पर कई चोट के निशान थे। मुझे संदेह है कि कुकी उग्रवादियों ने उनके साथ बलात्कार किया और फिर उन्हें मार डाला।”
वहीं, 12 वर्षीय नोंगयाई ने बताया कि उन्हें हमले के बारे में कुछ भी पता नहीं था क्योंकि वे झाड़ियों में छिपे हुए थे। उन्हें इस बारे में बहुत बाद में पता चला, जब सीआरपीएफ के लोगों ने आकर उन्हें बचाया। उन्होंने बताया कि उन्हें तब पता चला कि उनकी माँ, बहन, दादी, चाची और उनके बच्चों का अपहरण कर लिया गया है।
मणिपुर सरकार ने कैबिनेट प्रस्ताव में जिरीबाम नरसंहार के अपराधियों को ‘कुकी उग्रवादी’ कहा है। मारे गए मैतेई लोगों के परिवार के सदस्यों ने संवाददाताओं से कहा कि वे चाहते हैं कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि जिरीबाम नरसंहार में शामिल सभी कुकी उग्रवादियों को मृत्युदंड दिया जाए।
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में ईसाई मत अपनाने के दबाव की वजह से एक युवक ने अपनी जान दे दी है। मृतक का नाम लीनेश साहू है। लीनेश को यह दबाव उसकी बीवी व कुछ अन्य ससुराली जनों की तरफ से दिया जा रहा था। आत्महत्या से पहले शनिवार (7 दिसंबर 2024) को लीनेश ने अपनी पीड़ा को व्हाट्सएप स्टेट्स में लिख कर शेयर भी किया था।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला धमतरी जिले के थानाक्षेत्र अर्जुनी में पड़ने वाले गाँव पटियाडीह का है। यहाँ रहने वाले 30 वर्षीय लीनेश साहू टेलरिंग (दर्जी) का काम कर के अपने परिवार का भरण पोषण करते थे। रविवार की सुबह उनका शव अपने घर के अंदर फाँसी के फंदे पर लटका मिला। परिजनों की सूचना पर पहुँची पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामले की जाँच शुरू कर दी।
प्रथम दृष्टया पुलिस ने इस घटना को आत्महत्या माना है। जाँच के दौरान पुलिस को लीनेश साहू का मोबाइल मिला। फाँसी लगाने से पहले लीनेश ने व्हाट्सएप स्टेटस लगाया था। इस स्टेटस में मृतक ने खुद को अपनी बीवी से परेशान बताया और लिखा, “मेरे को धर्म परिवर्तन करने के लिए बहुत ज्यादा परेशान करती है। ईसा मसीह ईसा मसीह करके मेरे को रात भर परेशान करती है।” लीनेश ने इसी स्टेटस में आगे बताया था कि वो अपने पूरे हफ्ते की कमाई अपनी बीवी को दे देते थे। हालाँकि इसके बावजूद उनकी पत्नी से उनसे कभी प्यार से बात नहीं की।
लीनेश साहू ने धर्मान्तरण के लिए होने वाली प्रताड़ना में अपनी सास के साथ पत्नी की छोटी व बड़ी बहन को भी शामिल बताया है। इन सभी ने लीनेश से कहा, “तू आ जा। फिर तेरे पापा को भी मना लेंगे।” लीनेश के अनुसार उन्होंने अपनी ससुराल में कभी खाना तक नहीं खाया। मृतक ने अपनी पत्नी पर न सिर्फ धर्मान्तरण के दबाव बल्कि झूठ बोलने का भी आरोप लगाया है। 8वीं पास लीनेश की पत्नी ने शादी से पहले खुद को कक्षा 12 पास बताया था।
फ़िलहाल पुलिस ने इस पूरे मामले का संज्ञान ले कर जाँच शुरू कर दी है। मोबाइल स्टेटस में जिनका जिक्र किया गया था उनसे पूछताछ की जा रही है। डिप्टी एसपी नेहा पवार ने मीडिया को बताया कि जाँच में सामने आए तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचार के कारण एक हिन्दू परिवार भाग कर भारत आ गया। उसे त्रिपुरा में गिरफ्तार किया गया है। हिन्दू परिवार ने कहा है कि भले ही उन्हें भारत के भीतर जेल में डाल दिया जाए लेकिन वह वापस बांग्लादेश वापस नहीं जाएँगे।
हिन्दू परिवार में बूढ़े-बच्चे सभी शामिल हैं। उन्होंने बताया है कि कैसे प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति बदतर हो गई है। यह परिवार जंगल-नदी किसी तरह पार करके भारत पहुँचा है।
इस परिवार के मुखिया शंकर चंद सरकार हैं। वह बांग्लादेश के किशोरगंज जिले से अपने परिवार के 9 सदस्यों को लेकर भारत आए हैं। उनके परिवार में उनके बूढ़े पिता, पत्नी, छोटा भाई और बच्चे शामिल हैं। शंकर चंद सरकार अपने परिवार को लेकर बांग्लादेश से किसी तरह छुपते-छुपाते भारत आए हैं।
उन्होंने त्रिपुरा के रास्ते अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की है। हालाँकि, उन्हें उनके परिवार समेत त्रिपुरा के ही धलाई जिले में एक रेलवे स्टेशन के बाहर से रेलवे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। शंकर चंद सरकार बांग्लादेश में ड्राइवर के तौर पर काम करते थे।
उन्होंने बताया है कि जब से बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार का पतन हुआ तब से वहाँ हिन्दुओं के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों से भी बदतर व्यवहार हो रहा है। उन्होंने बताया कि कोई भी सवारी उनकी गाड़ियों में नहीं बैठती थी और जो बैठती भी थी वह पैसा नहीं देती थी।
पैसा माँगने पर मारपीट की जाती थी। पुलिस भी उनकी नहीं सुनती थी। उनके ऊपर गलत काम करने के आरोप लगाए जाते थे। शंकर चंद सरकार ने बताया है कि उन्होंने अपनी अधिकांश सम्पत्ति नुकसान झेल कर बेच दी। बांग्लादेश में हिन्दुओं से सम्पत्ति खरीदने को भी लोग राजी नहीं हो रहे।
उन्होंने बताया कि बांग्लादेश छोड़ना उनके लिए मजबूरी बन गया था। शंकर चंद सरकार ने बताया कि उनके बच्चों की सुरक्षा भी एक बड़ा मसला बनती जा रही थी। उन्होंने बताया है कि इलाके में बाक़ी हिन्दू परिवार भी भाग कर भारत आना चाहते हैं लेकिन नौकरी-धंधे के चक्कर में ऐसा नहीं कर पा रहे।
पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद शंकर सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेश वापस नहीं जाएँगे। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, “हमने शांति पाने के लिए सीमा पार की, और भले ही हमें जेल हो जाए, हम वापस जाने के बजाय जेल में मरना पसंद करेंगे।”
पुलिस ने बताया है कि उसने मुखबिर की सूचना के आधार पर यह कार्रवाई की है और आगे उन्हें कोर्ट में पेश करेगी। गौरतलब है कि बांग्लादेश में यूनुस सरकार आने के बाद से हिन्दुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। कहीं मंदिर तोड़े जा रहे तो कहीं हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं।
पश्चिम एशियाई देश सीरिया में असद सरकार का पतन हो गया है। रविवार (8 दिसम्बर, 2024) की सुबह विद्रोही गुटों के लड़ाके राजधानी दमिश्क में घुस गए हैं। सीरियाई सेना से उन्हें कोई ख़ास चुनौती नहीं मिल रही है। राष्ट्रपति बशर अल असद के देश छोड़ने की आशंका जताई गई है। बीते लगभग 5 दशक से चल रहे सीरिया में असद परिवार के शासन का अंत लगभग तय हो गया है। इस बीच सीरिया में जिन विद्रोहियों ने कब्जा किया है, उनके आतंकी लिंक को लेकर चिंताएँ जताई गईं हैं।
अभी सीरिया में क्या हो रहा?
सीरिया में बीते लगभग 15 दिनों में हालात तेजी से बदले हैं। सीरिया के विद्रोही गुटों हयात उल शम्स अल तहरीर (HTS) और फ्री सीरियन आर्मी अथवा सीरियन नेशनल आर्मी (SNA) ने बीते लगभग एक सप्ताह में तेजी से देश के बड़े-बड़े शहरों पर कब्जा किया है। इसमें सबसे प्रमुख अलेप्पो शहर रहा है। यह सीरिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इसके बाद यह तेजी से दमिश्क की तरफ बढ़े हैं। यदि उनकी यही रफ़्तार रही तो वह अगले कुछ दिनों में दमिश्क पर पूरी तरह कब्जा जमा सकते हैं।
सीरियाई सेना इन विद्रोहियों के सामने लड़ने से कहीं-कहीं पीछे हट चुकी है। कई जगह पर उनकी लड़ाई इन गुटों के खिलाफ काफी कमजोर है। सीरिया में कुछ उसी तरह से परिस्थितियाँ बन रही हैं, जिस तरह से अगस्त, 2021 में अफगानिस्तान में बनी थीं। तब भी तालिबान के लड़ाके एक के बाद एक शहर पर कब्जा जमाते चले गए थे। सीरियाई राष्ट्रपति बसर अल असद के देश छोड़ने की भी इस बीच आशंका जताई गई है। विद्रोही गुटों ने ऐलान किया है कि बशर अल असद इस बीच अपने परिवार के साथ सीरिया छोड़ चुके हैं।
राष्ट्रपति असद के सीरिया छोड़ने सम्बन्धी पुष्टि अभी सरकार की तरफ से नहीं हुई है। बशर अल असद सीरिया छोड़ कर कहाँ गए हैं, अभी इसकी जानकारी नहीं है। सीरिया में असद सरकार का विरोध करने वाले गुट सड़कों पर आकर जश्न मना रहे हैं। वहीं दमिश्क पर लगभग कब्जा कर चुके गुट HTS ने कहा है कि वह ‘सामाजिक एकता’ बनाए रखेंगे। HTS ने जश्न में फायरिंग करने और सरकारी संस्थानों पर बलपूर्वक कब्जा करने से भी लड़ाकों को रोक दिया है। इस लड़ाई में शुरू में शामिल रहे ईरान और रूस की तरफ से अभी प्रतिक्रिया आना बाकी है।
कौन हैं सीरिया पर कब्जा जमाने वाले नए लड़ाके?
सीरिया में असद सरकार का तख्तापलट करने वाले प्रमुख विद्रोही समूह HTS और SNA ही हैं। यह दोनों विद्रोही गुट 2011 में अरब स्प्रिंग के बाद सामने आए थे। इनमें से HTS का नाम अल नुसरा फ्रंट था। इसने 2011 में असद सरकार के खिलाफ चालू हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बाद जंग छेड़ दी थी। 2012 में HTS ने खुद को अल कायदा से जुड़ा हुआ बताया था। इसके ISIS से भी लिंक रहे हैं। 2016 तक इसने असद सरकार के खिलाफ भीषण लड़ाई लड़ी थी।
2016 में HTS के मुखिया अबू मोहम्मद अल जवालानी ने खुद को अल कायदा और ISIS से अलग बताया। उसने अल नुसरा को भंग कर दिया और इसे HTS नाम दिया। हालाँकि, इसके अधिकांश लड़ाके वही हैं जो पहले आतंकी थे। इस संगठन को वर्तमान में तुर्की का पूरा समर्थन हासिल है। वर्तमान में इसी के लड़ाके दमिश्क में घुस रहे हैं। यह संगठन 2016 के बाद से ही सीरिया का इदलिब प्रांत नियंत्रित कर रहा है। इस बार भी इसने लड़ाई यहीं से चालू की थी।
HTS पर मानवाधिकार उल्लंघन और बेगुनाहों के मारने के सैकड़ों आरोप हैं। भले ही इसने अपना नाम बदल लिया हो, इस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबन्ध अब भी लगे हुए हैं। यह कुर्दों के खिलाफ अब भी लड़ रहे हैं और उन पर अत्याचार कर रहे हैं। इस बीच HTS के मुखिया जुलानी ने अपने आतंकी संगठन की छवि बदलने और अपने आप को एक विद्रोही नेता दिखाने के पूरे प्रयास किए हैं। इस प्रयास में उसे पश्चिमी देशों की मीडिया का भी साथ मिल रहा है। जुलानी को 2013 में वैश्विक आतंकी घोषित किया गया था। उस पर करोड़ों का इनाम भी रखा गया था।
वहीं दूसरा गुट सीरियन नेशनल आर्मी है। जहाँ HTS एक संगठन की तरह है, SNA में कई सारे अलग-अलग विद्रोही गुट शामिल हैं। इसका गठन 2017 में हुआ था। इसका काम असद सरकार के खिलाफ लड़ने वालों को एक साथ लाना था। इसे भी तुर्की का पूरा समर्थन हासिल है। पहले इसका नाम फ्री सीरियन आर्मी हुआ करता था। इसमें भी अलग-अलग गुट शामिल थे। वर्तमान में इसमें लगभग 50,000 से अधिक लड़ाके शामिल बताए जाते हैं। SNA की HTS के साथ भी लड़ाई बताई जाती है।
क्यों गिर गई असद सरकार?
राष्ट्रपति बशर अल असद का परिवार बीते 5 दशकों से अधिक समय से सीरिया की सत्ता में रहा है। बशर अल असद के पिता हाफिज अल असद ने यहाँ सत्ता पर कब्जा जमाया था। वह 1971 में सीरिया के राष्ट्रपति बन गए थे। इसके बाद 2000 में बशर अल असद ने सत्ता संभाली। बशर अल असद को सबसे बड़ी चुनौती का सामना 2011 में करना पड़ा जब ट्यूनीशिया से सरकार विरोधी आंदोलन चालू हो गए। इसके बाद एक-एक करके अरब और अफ़्रीकी देशों में सरकारें गिरने लगीं।
बशर अल असद की सरकार इ खिलाफ भी हथियारबंद विद्रोह चालू हो गया। 2015 तक आते-आते उनकी स्थिति काफी कमजोर हो गई थी लेकिन रूस और ईरान के समर्थन से उनकी सरकार बच पाई। ईरान ने जहाँ सीरिया के भीतर हिजबुल्लाह के लड़ाके भेजे तो वहीं रूस ने भाड़े के लड़ाके भेजे। रूस ने विद्रोहियों, ISIS और बाकी लड़ाका समूहों के खिलाफ हवाई हमले किए। 2020 आते-आते असद ने सीरिया के अधिकांश हिस्सों पर अपना कब्जा जमा लिया था। हालाँकि, इदलिब जैसे कुछ प्रांत तब भी उनके शासन से बाहर रहे थे।
2024 में यह लड़ाई अक्टूबर माह में दोबारा छिड़ गई। हालाँकि, इस बार ईरान और रूस असद की सहायता नहीं कर पाए। जहाँ ईरान, इजरायल के साथ अपने संघर्ष को लेकर फंसा हुआ है, वहीं रूस यूक्रेन में उलझा हुआ है। ऐसे में बिना लड़ाकों और हवाई हमलों के HTS और SNA जैसे विद्रोही गुट बिना किसी प्रतिरोध के आगे बढ़ते गए।
भारत और अमेरिका समेत बाकी ने क्या कहा?
भारत हमेशा से ही सीरिया में चल रहे विवाद को लेकर बातचीत के समर्थन में रहा है। हाल ही में भारत ने अपने नागरिकों से कहा था कि वह जल्द से जल्द से सीरिया छोड़ दें। वहीं अमेरिका ने कहा है कि इस पूरे विवाद से उसका कोई लेना-देना नहीं है। हालाँकि, अमेरिका असद सरकार का विरोध ही करते आया है। फ्रांस और अमेरिका जैसे देश परोक्ष रूप से HTS और SNA के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं। वहीं तुर्की खुले तौर पर विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है।