उत्तर प्रदेश के संभल जिले में 23 नवंबर 2024 को हुई हिंसा के बाद अब हालात सामान्य हो रहे हैं। लेकिन इस बीच कुछ असामाजिक तत्व माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इन्हीं में से एक नाम नसीम रजा जैदी का है, जो खुद को पत्रकार बताता है। पुलिस ने नसीम को शनिवार (7 दिसंबर 2024) को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू की है। नसीम न सिर्फ दंगाइयों का महिमामंडन में जुटा बल्कि मारे गए उपद्रवियों के नाम पर पैसों की उगाही भी कर रहा था।
पुलिस को सूचना मिली थी कि नसीम सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश फैलाकर लोगों को पुलिस के खिलाफ उकसा रहा है। वह दंगाइयों को ‘शहीद’ बताकर उनकी महिमामंडन कर रहा था और पुलिस को हिंसक और हमलावर साबित करने की कोशिश कर रहा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नसीम ने QR कोड जारी कर पैसे जुटाने की भी शुरुआत की थी। वह दावा कर रहा था कि ये पैसे हिंसा में शामिल लोगों की मदद के लिए इस्तेमाल किए जाएँगे।
कहने को पत्रकार,असल में जिहादी,संभल में नसीम ज़ैदी गिरफ़्तार,यही है मीडिया जिहाद !! pic.twitter.com/wNAmlCcvcG
पुलिस ने नसीम को पकड़कर पूछताछ की तो उसने खुद को एक न्यूज संस्थान का पत्रकार बताया। लेकिन जब पुलिस ने संस्थान से जानकारी ली, तो पता चला कि नसीम का दावा झूठा है। उसके पहचान पत्र भी फर्जी निकले। नसीम के इस फर्जीवाड़े के खिलाफ पुलिस ने कोतवाली में FIR दर्ज कर के कार्रवाई शुरू कर दी।
पुलिस अधीक्षक संभल के मुताबिक नसीम के खिलाफ भारतीय नयाय संहिता (BNS) की धारा 318, 338, 336 और 340 के तहत केस दर्ज किया गया है। नसीम रजा जैदी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया है।
अब यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि उसने कितने पैसे कहाँ से जुटाए और उनका इस्तेमाल कहाँ किया। भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने नसीम की करतूत को ‘मीडिया जिहाद’ बताया है। पुलिस मामले की आगे जाँच कर रही है।
विभिन्न राज्यों के वक्फ बोर्डों द्वारा गाँव-के-गाँव और बड़े-बड़े होटलों-कॉलेजों को अपनी संपत्ति बताने के बाद वक्फ बोर्ड के इरादे खुलकर सामने आ गए हैं। इसके बावजूद वह रूकने का नाम नहीं ले रहा है। अब महाराष्ट्र वक्फ बोर्ड ने लातूर के 103 किसानों की जमीनों पर अपना दावा ठोका है। उसने इन जमीन के मालिक किसानों को नोटिस भी जारी किया है।
पीड़ित किसानों का कहना है कि जिन जमीनों पर वे पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं, उसे अब वक्फ हड़पना चाह रहा है। किसानों का आरोप है कि उनकी लगभग 300 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड की नजर पड़ गई और उसे हड़प लिया। इसे खाली करने के लिए 103 किसानों को नोटिस दी गई है। इस मामले में दावा छत्रपति संभाजीनगर के महाराष्ट्र राज्य वक्फ न्यायाधिकरण में वाद दायर किया गया है।
वक्फ बोर्ड की ओर से भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि लातूर के तालेगाँव के किसान इन जमीनों को तुरंत खाली कर दें। नोटिस मिलने से घबराए किसानों ने सरकार और प्रशासन से उनकी जमीनों को बचाने के लिए मदद की गुहार लगाई है। किसानों का कहना है कि ये उनकी अपनी जमीन है, वक्फ बोर्ड का इसमें कोई हिस्सा नहीं है। नोटिस भेजे हुए लगभग दो महीने हो चुके हैं।
वक्फ बोर्ड का कहना है कि ये जमीनें गाँव वालों को उसकी ओर से दी गई हैं और अब ये जमीनें उसे वापस चाहिए। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास इन जमीनों के निजामकालीन दस्तावेज मौजूद हैं। वहीं, एक किसान ने हैदराबाद गजट दिखाया और यह जमीन का दस्तावेज है। उसने बताया कि यह दस्तावेज उसके पास तब से है, जब बीदर एक जिला था। उसी दौरान उसके पूर्वजों ने जमीन खरीदी थी।
वक्फ बोर्ड की दुस्साहस की कई कहानियाँ
बता दें कि यह अकेला मामला नहीं है वक्फ बोर्ड की मनमानी का। उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड ने वाराणसी में स्थित प्रसिद्ध उदय प्रताप कॉलेज (यूपी कॉलेज) पर भी अपना दावा ठोका है। बोर्ड का का कहना है कि यह संपत्ति उसकी है। उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना लगभग 115 साल पहले सन 1909 में भिनगा (बहराइच, उत्तर प्रदेश) के राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने की थी।
साल 2022 में तमिलनाडु के वक्फ बोर्ड ने हिंदुओं के पूरे थिरुचेंदुरई गाँव को वक्फ संपत्ति बताते हुए उस पर अपना दावा ठोक दिया। यहाँ 1500 साल पुराना एक मंदिर है। उसे भी वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति घोषित कर दी। इस तरह वक्फ बोर्ड ने 369 एकड़ भूमि पर अपना दावा ठोका है। हालाँकि, ग्रामीणों का कहना है कि ये जमीनें उनकी पुश्तैनी हैं। उन्होंने बोर्ड के दावे को फर्जी बताया।
कर्नाटक में भी वक्फ बोर्ड ने वहाँ की 1200 एकड़ (लगभग 2000 बीघा) जमीन को शाह अमीनुद्दीन दरगाह का बताकर अपनी संपत्ति बताई है। इसके बाद राज्य के कॉन्ग्रेस सरकार ने किसानों को नोटिस भेजकर उन जमीनों को खाली करने के लिए कहा था। बाद में विजयपुरा जिले के टिकोटा तालुक स्थित होनवाड़ा गाँव के किसानों ने इसकी शिकायत मंत्री एमबी पाटिल से की।
वहीं, बेंगलुरु का ईदगाह मैदान भी एक बड़ा विवाद है। सन 1950 में वक्फ बोर्ड ने इसे वक्फ संपत्ति बताते हुए अपना दावा ठोक दिया था। वक्फ का दावा है कि यह 1850 के दशक से वक्फ की संपत्ति थी, इसलिए यह अब हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति है। हालाँकि, यह विवाद अदालत में है और इस पर अंतिम निर्णय आना बाकी है। इसी तरह बेंगलुरु में आईटीसी विंडसर होटल पर भी वक्फ ने दावा ठोका है।
इसी तरह का मामला अप्रैल 2024 में हैदराबाद से आया था। तेलंगाना वक्फ बोर्ड ने राजधानी के एक नामी 5 स्टार होटल मैरियट को ही अपनी जागीर घोषित कर दिया था। हालाँकि, हाई कोर्ट ने उसके इस मंसूबे को धाराशायी कर दिया था। दरअसल, साल 1964 में अब्दुल गफूर नाम के एक व्यक्ति ने तब वायसराय नाम से चर्चित इस होटल पर अपना हक जताते हुए मुकदमा कर दिया था।
इसी तरह गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर ही दावा ठोक दिया। अब यह वक्फ की संपत्ति है, क्योंकि इस बिल्डिंग से जुड़े किसी भी दस्तावेज को अपडेट नहीं किया गया था। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान सूरत नगर निगम की इमारत एक होटल थी और हज यात्रा के दौरान इस्तेमाल की जाती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान संपत्ति तब ब्रिटिश साम्राज्य की थी।
इसी तरह कोलकाता के टॉलीगंज क्लब और रॉयल कलकत्ता गोल्फ क्लब को भी वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति बताई है। इसके अलावा भी देश के विभिन्न हिस्सों में कई ऐसी संपत्तियाँ हैं, जिन पर वक्फ बोर्ड अपना दावा ठोकता है और उन्हें वक्फ संपत्ति बताता है। ये सारे मामले विवाद के घेरे में हैं। अब इन संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण की माँग होने लगी है।
करीब पाँच साल पहले साल 2019 में वक्फ बोर्ड ने दावा किया था कि केरल में मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल के इलाके की संपत्ति उसकी है। यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, जिनके पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया।
इसी तरह, केरल के वायनाड जिले के तलापुझा गाँव में 28 अक्टूबर 2024 को कुछ परिवारों को अचानक एक गंभीर और चौंकाने वाला नोटिस मिला। इस नोटिस में केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने दावा किया था कि वे ज़मीनें जो इन परिवारों की मानी जा रही थीं, असल में वक्फ बोर्ड की संपत्ति हैं। वक्फ बोर्ड ने इन जमीनों को तुरंत खाली करने के लिए कहा है।
वक्फ बोर्ड भारत सरकार के अंतर्गत आने वाले स्मारकों पर भी दावा करता है। कई स्मारक तो उसके कब्जे में भी हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वक्फ संशोधन बिल को लेकर गठित JPC को ऐसे 120 स्मारकों की सूची दी, जो उसके अधीन है लेकिन वक्फ बोर्ड उन पर दावा करता है। कई संपत्तियाँ तो वक्फ के कब्जे में है। इसका उदाहरण यूपी के संभल का विवादित जामा मस्जिद है, जिसे हिंदू हरिहर मंदिर बताते हैं।
यह संपत्ति ASI के अधीन है, लेकिन उन्हें परिसर में घुसने तक नहीं दिया जाता है। इसका निरीक्षण करने के लिए ASI की टीम को पुलिस-प्रशासन से मदद लेनी पड़ती है। इतना ही नहीं, ASI की जानकारी के बिना ही, इस संरक्षित स्मारक में कई तोड़फोड़ पर निर्माण भी किए गए हैं। यह सारी जानकारी खुद ASI ने संभल मामले में हलफनामा दायर कर कोर्ट को दी है।
वाराणसी के प्रतिष्ठित उदय प्रताप कॉलेज (यूपी कॉलेज) में मस्जिद को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। छात्रों के प्रदर्शन, वक्फ बोर्ड की दावेदारी और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच यह मुद्दा अब राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। इस विवाद की शुरुआत कॉलेज के 115वें स्थापना दिवस पर एक नोटिस के वायरल होने से हुई और अब ये मुद्दा काफी बढ़ चुका है।
एक नोटिस से जुड़ा है सारा विवाद
इस विवाद की जड़ें 2018 से जुड़ी हैं, जब उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कॉलेज प्रबंधन को एक नोटिस भेजकर मस्जिद को वक्फ संपत्ति में पंजीकृत करने की माँग की थी। कॉलेज प्रबंधन ने इस माँग को खारिज करते हुए कहा कि मस्जिद कॉलेज की 8200 स्क्वायर फीट जमीन पर बनी है, जो ट्रस्ट की संपत्ति है। 2021 में वक्फ बोर्ड ने इस दावे को औपचारिक रूप से छोड़ दिया था। हाल ही में, 25 नवंबर 2024 को कॉलेज के 115वें स्थापना दिवस पर 2018 का पुराना पत्र वायरल हुआ। इसके बाद कॉलेज परिसर में छात्रों ने मस्जिद में नमाज के दौरान हनुमान चालीसा पढ़ा, जिससे तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई।
6 दिसंबर 2024 को करीब 300 छात्रों ने कॉलेज गेट के बाहर भगवा झंडे लेकर प्रदर्शन किया और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना था कि मस्जिद अवैध है और इसे हटाया जाना चाहिए। प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया, और बाहरी छात्रों की एंट्री पर रोक लगा दी गई। कॉलेज प्रशासन ने भी छात्रों की माँग का समर्थन करते हुए कहा कि मस्जिद का निर्माण अवैध है। उन्होंने आरोप लगाया कि मस्जिद में बाहरी लोग आकर नमाज पढ़ते हैं, जिससे परिसर की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं।
कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर डी.के. सिंह ने बताया, “यह मस्जिद नहीं, यहाँ 35 साल पहले सिर्फ एक टीला था, बाद में यहाँ मजार बनी थी, और धीरे-धीरे इसे मस्जिद का रूप दे दिया गया। रातों-रात निर्माण सामग्री लाकर अवैध निर्माण किया गया। जब हमने इस पर कार्रवाई की, तो इसे वक्फ संपत्ति घोषित करने की कोशिशें शुरू हुईं।” उन्होंने आगे बताया कि कॉलेज की बिजली लाइन का भी उपयोग मस्जिद के लिए किया जा रहा था, जिसे बाद में कटवा दिया गया।
छात्रों का कहना है कि अगर मस्जिद में नमाज पढ़ी जा सकती है, तो उन्हें हनुमान चालीसा का पाठ करने की अनुमति होनी चाहिए। छात्र नेता विवेकानंद सिंह ने कहा, “यह मस्जिद वक्फ बोर्ड की संपत्ति नहीं है। इसे हटाया जाना चाहिए। अगर नमाज जारी रही, तो हम भी हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे।”
कैसे हुई थी उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना?
वाराणसी का उदय प्रताप कॉलेज, जिसे आमतौर पर यूपी कॉलेज के नाम से जाना जाता है, भारत के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक है। इस कॉलेज की स्थापना 1909 में भिनगा (जिला बहराइच, उत्तर प्रदेश) के राजा राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव ने की थी। उदय प्रताप सिंह एक महान समाज सुधारक और दूरदर्शी शासक थे। वे न केवल अपने राज्य की भलाई के लिए समर्पित थे, बल्कि शिक्षा के प्रसार में भी उनकी गहरी रुचि थी।
राजा उदय प्रताप सिंह का मानना था कि समाज को उन्नति के पथ पर ले जाने के लिए शिक्षा एक प्रभावी साधन हो सकती है। उनकी दृष्टि केवल अकादमिक विकास तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज को नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध करना था। उनके इसी उद्देश्य ने उन्हें वाराणसी में एक ऐसा शिक्षण संस्थान स्थापित करने के लिए प्रेरित किया, जो ग्रामीण और शहरी युवाओं को उच्च शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का ज्ञान प्रदान कर सके।
राजा उदय प्रताप सिंह न केवल एक शासक थे, बल्कि उन्होंने समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी जीवनशैली में सन्यास की झलक मिलती थी। वे एक साधारण और सादगीपूर्ण जीवन जीने में विश्वास रखते थे। शिक्षा को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों का ही परिणाम है कि आज यूपी कॉलेज हजारों विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का एक उत्कृष्ट केंद्र बन गया है।
उदय प्रताप कॉलेज की शुरुआत एक हाई स्कूल के रूप में हुई थी। यह संस्थान वाराणसी के भदऊँ गाँव में स्थापित किया गया था। 500 एकड़ में फैले इस परिसर में समय के साथ शिक्षा के विभिन्न स्तरों के लिए कई संस्थान स्थापित किए गए। इनमें डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज, रानी मुरार बालिका विद्यालय, राजर्षि शिशु विहार और राजर्षि पब्लिक स्कूल शामिल हैं।
आज उदय प्रताप कॉलेज में लगभग 20,000 विद्यार्थी पढ़ते हैं। यह संस्थान केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। इसका विशाल परिसर, शैक्षणिक माहौल और गौरवशाली इतिहास इसे अन्य संस्थानों से अलग पहचान दिलाता है। कॉलेज प्रबंधन का दावा है कि 35 साल पहले यहाँ केवल मिट्टी का टीला था, जहाँ बाद में मजार बनी और फिर मस्जिद का निर्माण हुआ।
स्थानीय प्रशासन ने विवाद को शांत करने के लिए कॉलेज के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी है। पुलिस ने बाहरी छात्रों और असामाजिक तत्वों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। एसीपी एस. चन्नप्पा ने कहा, “हालात तनावपूर्ण थे, लेकिन पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया। मस्जिद के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने वाले सात छात्रों को हिरासत में लिया गया है।”
क्या कहता है कानून?
उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जफर फारूकी ने कहा कि 2018 में जो नोटिस दिया गया था, उसे 2021 में रद्द कर दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मस्जिद पर वक्फ बोर्ड का कोई दावा नहीं है। फारूकी ने यह भी आरोप लगाया कि 2018 का पुराना नोटिस अब वायरल करके विवाद खड़ा किया जा रहा है।
बता दें कि वक्फ अधिनियम 1995 के तहत, किसी संपत्ति को वक्फ में पंजीकृत करने के लिए पर्याप्त सबूत होने चाहिए। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि मस्जिद का कोई रिकॉर्ड खसरा-खतौनी में नहीं है और यह ट्रस्ट की संपत्ति है। फिलहाल, विवाद सुलझने के बजाय गहराता दिख रहा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। पुलिस और प्रशासन ने परिसर में शांति बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। यह मामला न केवल कानूनी पहलुओं को उजागर करता है, बल्कि धार्मिक और सामाजिक तनावों को भी सामने लाता है।
महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में INDI गठबंधन की करारी हार के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस गठबंधन को संभालने की अपनी पुरानी इच्छा फिर से दोहराई है। उन्होंने कहा कि वह INDI गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। हालाँकि, ममता बनर्जी के बयान का कॉन्ग्रेस ने विरोध किया है, जबकि समाजवादी पार्टी और उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना ने इसका समर्थन किया है।
एक इंटरव्यू में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने ने ही INDI गठबंधन को बनाया है। ममता बनर्जी ने कहा कि अगर इस गठबंधन का इसका नेतृत्व करने वाले इसे ठीक से नहीं चला सकते तो उन्हें (ममता को) मौका दें। ममता ने कहा कि वह बंगाल से इस गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। बता दें कि गठबंधन का नेतृत्व फिलहाल कॉन्ग्रेस कर रही है।
ममता बनर्जी के बयान के बाद विपक्षी गठबंधन में एक फिर से विवाद खड़ा हो गया है। इसके साथ ही ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा फिर से जाहिर हो गई है। ममता बनर्जी के बयान का समर्थन करते हुए शिवसेना (UBT) के संजय राउत ने कहा, “हम भी चाहते हैं कि वे विपक्षी INDIA गठबंधन की प्रमुख भागीदार बनें। चाहे वह ममता बनर्जी हों, अरविंद केजरीवाल हों या शिवसेना, हम सभी एक साथ हैं। हम जल्द ही कोलकाता में ममता बनर्जी से बात करने जाएँगे।”
वहीं, समाजवादी पार्टी के नेता उदयवीर सिंह ने भी ममता बनर्जी के बयान का समर्थन किया। उन्होंने शनिवार (7 दिसंबर 2024) को को कहा, “इस बार के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 सीटों में से सपा ने 37 सीटें जीतीं। पश्चिम बंगाल में TMC ने 42 सीटों में से 29 सीटें जीतीं। भाजपा को इन दोनों राज्यों में 35 सीटों का नुकसान हुआ। सभी दल सहमत हों तो सपा ममता बनर्जी का समर्थन करेगी।”
उधर, लेफ्ट ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। वामपंथी नेता डी राजा ने कहा, “कॉन्ग्रेस को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। हालात INDIA ब्लॉक की मीटिंग की माँग करते हैं। कॉन्ग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों में गठबंधन के सहयोगियों को समायोजित नहीं किया। अगर कॉन्ग्रेस ने INIDA ब्लॉक के सहयोगियों की बात सुनी होती तो लोकसभा और हरियाणा-महाराष्ट्र चुनाव नतीजे अलग होते।”
ममता बनर्जी के बयान पर यूपी के सहारनपुर से कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “ममता जी बड़ी नेता हैं, लेकिन राहुल गाँधी के अलावा देश में कोई भी INDIA गठबंधन का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं है।” वहीं, कॉन्ग्रेस की सांसद वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि ममता बनर्जी को ऐसा लगता होगा, लेकिन कॉन्ग्रेस को ऐसा नहीं लगता है। कॉन्ग्रेस के लोग अपनी पार्टी के हिसाब से चलते हैं।
उधर, लालू यादव की पार्टी RJD ने INDI गठबंधन को ममता बनर्जी द्वारा बनाए जाने को खारिज कर दिया। RJD प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, “बीजेपी के खिलाफ विपक्षी गठबंधन के असली आर्किटेक्ट लालू प्रसाद यादव हैं। उनकी पहल पर पटना में गठबंधन की पहली बैठक हुई थी। इसमें ममता बनर्जी भी शामिल हुई थीं। सभी अपने-अपने राज्यों में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।”
INDIA गठबंधन में उठ रहे विरोध के स्वर पर भाजपा ने हमला बोला है। भाजपा ने कहा कि विपक्ष के नेताओं को राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के नेतृत्व पर भरोसा नहीं है। वे अब भी राहुल गाँधी को राजनीति का कच्चा खिलाड़ी समझते हैं। भाजपा ने कहा कि विपक्ष में कई लोग ऐसे हैं, जो राहुल गाँधी को राजनीतिक तौर पर विफल मानते हैं।
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, “इंडी एलायंस में खानदान अनेक औऱ ख्वाहिश एक है। हर इंसान की अपनी ख्वाहिश है। वे गठबंधन के ही मुखिय़ा बनना चाहते है, क्योंकि उनको पता है कि सरकार में तो कभी आने वाले है नहीं हैं।” जदयू नेता नीरज कुमार ने कहा कि भ्रष्टाचार की बुनियाद पर जेल से रहकर सरकार चलाने वाले घटक दलों के बीच असहमति है।
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। महिला निदा जावेद को उसके शौहर एजाजुल आबेदीन ने तीन तलाक इसलिए दे दिया क्योंकि उसने संभल में हुई हिंसा को लेकर पुलिस की कार्रवाई का समर्थन किया। शौहर ने महिला को ‘काफिर’, ‘मुसलमानों की दुश्मन’ कहते हुए घर से निकाल दिया।
निकाह के बाद से ही खफा रहता था आरोपित
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता निदा जावेद ने बताया कि 2012 में उसका पहला निकाह हुआ था, जिससे तीन बच्चे हैं। 2021 में तलाक होने के बाद पड़ोस में रहने वाले एजाजुल आबेदीन से उसका रिश्ता जुड़ा। एजाजुल ने शादी का झांसा देकर गुरुग्राम बुलाया और उसके साथ रहना शुरू कर दिया। दबाव बढ़ने पर और पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उसने निकाह किया। निकाह के बाद से ही एजाजुल उसे दहेज के लिए परेशान करने लगा। निदा ने बताया कि उसका शौहर अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झगड़ता था, लेकिन जब उसने संभल हिंसा में पुलिस की कार्रवाई का समर्थन किया तो मामला बिगड़ गया।
पुलिस कार्रवाई का समर्थन किया, तो दिया तीन तलाक
महिला ने बताया कि एक दिन घर में संभल हिंसा को लेकर बात हो रही थी। निदा ने कहा कि पुलिस ने पत्थरबाजों पर लाठी चलाकर सही किया। यह सुनते ही एजाजुल आग-बबूला हो गया और उसे मुसलमानों की दुश्मन कहते हुए तीन तलाक दे दिया। निदा ने आरोप लगाया कि एजाजुल ने उसे काफिर भी कहा और वीडियो देखने पर आपत्ति जताई। निदा के अनुसार, उसके जेठ ने भी उसके साथ गलत हरकत करने की कोशिश की थी, जिसे लेकर वह पहले ही शिकायत दर्ज करा चुकी है।
पीड़िता ने एसएसपी कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज कराई है। एसएसपी सतपाल अंतिल ने कहा कि महिला की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं और मामले की जाँच जारी है। उन्होंने आश्वासन दिया कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
पीड़ित महिला के अधिवक्ता अभिषेक शर्मा ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत हर नागरिक को अपनी बात कहने का अधिकार है। चाहे वह किसी की आलोचना हो या समर्थन। अगर इस आधार पर किसी महिला को प्रताड़ित किया जाता है, तो यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है।
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए बेहद अहमद टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि गोवंश की तस्करी से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा सकता है। इसलिए यह सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा है। यह मामला गो-तस्करी से जुड़े एक व्यक्ति शकील मोहम्मद का है। कोर्ट ने उसे उसकी हिरासत को बरकरार रखा है और चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मोक्षा खजूरिया काज़मी ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति शकील मोहम्मद की गतिविधियाँ (पशु तस्करी) न केवल कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा करती हैं, बल्कि क्षेत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी खतरा पैदा करेंगी। कोर्ट ने हिरासत में लिए गए शकील मोहम्मद की हिरासत को न्यायसंगत बताया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया, “गोजातीय पशुओं में गाय और बछड़े शामिल हैं और उनकी अवैध तस्करी को हमेशा एक समुदाय द्वारा वध के उद्देश्य से ही देखा जाता है। इसलिए ऐसे समुदाय के लोगों में यह भावना है कि यह गतिविधि उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाती है।” अदालत ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ गोवंशीय पशुओं की अवैध तस्करी के कई एफआईआर दर्ज हैं।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी गतिविधियों से समुदाय के वर्तमान जीवन की गति भी बाधित होने की संभावना है। इससे न केवल कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होगी, बल्कि क्षेत्र में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए भी खतरा पैदा होगा। बता दें कि शकील को मार्च 2024 में जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया था।
शकील मोहम्मद की अम्मी ने विभिन्न आधारों पर उसकी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की थी। शकील की अम्मी ने याचिका में दावा किया है कि शकील को बिना सोचे-समझे हिरासत में लिया गया और प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों का उल्लंघन किया गया। इसमें उसे हिरासत में लिए जाने के खिलाफ अपना पक्ष रखने के उसके अधिकार के बारे में सूचित करना और उसकी अपनी भाषा में पढ़ना शामिल है।
इस मामले में सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि शकील मोहम्मद एक कट्टर और आदतन अपराधी है। वह चाकू घोंपने, दंगा करने और गोवंश की तस्करी समेत कई आपराधिक वारदातों में शामिल रहा है। वकील ने दलील दी कि शकील मोहम्मद शांतिप्रिय लोगों के बीच आतंक फैलाया है और उसकी असामाजिक गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हैं।
उसकी प्रिवेटिव डिटेंशन को लेकर न्यायालय ने आर कलावती बनाम तमिलनाडु राज्य (2006) में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा किया। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना गया था कि प्रासंगिक कारक हिरासत में लिए गए व्यक्ति के कार्यों की प्रकृति नहीं है, बल्कि सामुदायिक जीवन या सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने की उसकी क्षमता प्रासंगिक है।
न्यायालय ने पाया कि शकील की गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने की संभावना थी। इसलिए उसकी निवारक हिरासत को बरकरार रखा। न्यायालय ने याचिका में लगाए गए इस आरोप में भी कोई दम नहीं पाया कि उसे हिरासत में रखने में प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों का उल्लंघन किया गया। कोर्ट ने पाया कि हिरासत आदेश शकील को हिंदी/डोगरी में पढ़कर सुनाया गया था, जिसे वह समझ गया।
अमेरिकी रिटेल कारोबारी कंपनी वॉलमार्ट शुक्रवार (6 दिसंबर 2024) को उस समय विवादों में घिर गई, जब यह पता चला कि वॉलमार्ट ने भगवान गणेश की छवि वाले अंडरवियर और चप्पल जैसे उत्पाद बेचने शुरू किए।
यह मामला तब उजागर हुआ जब ‘तत्वम-असि’ नाम के एक लोकप्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ने इस पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने लिखा, “यह अस्वीकार्य है। आप हमारे हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं कर सकते।”
‘गणेश ब्लेसिंग्स कलेक्शन’ के नाम पर अपमान
तस्वीरों में दिख रहा है कि वॉलमार्ट ने ‘सेलेस्शियल गणेश ब्लेसिंग्स कलेक्शन’ के तहत टॉप्स, पैंट्स, शॉर्ट्स, बिकिनी, चप्पल, मोज़े और अन्य कपड़ों पर भगवान गणेश की छवि का उपयोग किया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वॉलमार्ट कम से कम 70 प्रकार के अंडरवियर, बॉक्सर, थोंग और ब्रा पर भगवान गणेश का चित्र छापकर बेच रहा था।
This is unacceptable. You can’t demean our Hindu Gods.@Walmart should immediately withdraw ‘Celestial Ganesh Blessings collection’ and apologise to Hindus. ?? pic.twitter.com/KGCcqqObXu
भगवान गणेश की छवि का अंडरवियर और चप्पल जैसे उत्पादों पर उपयोग हिंदू समुदाय के लिए अत्यधिक आक्रोश का कारण बना। सोशल मीडिया पर कई उपयोगकर्ताओं ने इसे हिंदू भावनाओं का मजाक उड़ाने वाला कदम बताया।
हिंदू कार्यकर्ता राजन ज़ेड ने वॉलमार्ट से अपील करते हुए कहा, “किसी भी धर्म के प्रतीकों का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह संवेदनशीलता और सम्मान का मामला है।”
ब्रिटेन स्थित हिंदू संगठन ‘इनसाइट यूके’ ने ट्वीट किया, “हिंदू समुदाय इस कृत्य से चिंतित है। यह हिंदू देवी-देवताओं, हमारी भावनाओं और हमारी परंपराओं के प्रति सम्मान की पूर्ण कमी को दर्शाता है।”
Hindus worldwide are outraged at Walmart's negligence on selling products featuring Hindu sacred deity Ganesha.
Lord Ganesha, a highly revered Hindu god, is featured on products like slippers and knickers that @Walmart is selling.
हिंदू संगठनों ने वॉलमार्ट के इस कदम की कड़ी आलोचना की। हिंदू जागृति संगठन ने बयान जारी किया, “श्री गणेश, जो हिंदू धर्म में अत्यधिक पूजनीय हैं, उनकी छवि को अंडरवियर, बॉक्सर, मोजे और चप्पल पर दिखाना न केवल अपमानजनक है बल्कि पूरे विश्व के हिंदुओं के लिए अस्वीकार्य है।”
Depiction of Shri Ganesh, a highly revered Hindu deity, on underwear, boxers, socks, slippers etc. is deeply offensive & disrespectful to Hindus worldwide.
We strongly urge @Walmart to immediately withdraw Celestial Ganesh Blessings collection & issue a formal apology to Hindus. pic.twitter.com/yXHntWIN06
अमेरिका स्थित हिंदू एडवोकेसी फ़ोरम (HAF) ने सीधे वॉलमार्ट प्रबंधन से संपर्क किया और हिंदू छवियों के अनुचित उपयोग को रोकने की माँग की। उन्होंने इसे एक गंभीर मुद्दा बताते हुए वॉलमार्ट से माफ़ी माँगने की भी माँग की।
Dear @walmarthelp: @HinduAmerican has written directly to @Walmart regarding the disrespectful misuse of Hindu imagery on slippers & bathing suits.
Ganesha is a deity worshipped by more than a billion followers of Dharma religions around the world as the remover of obstacles.… pic.twitter.com/WHrpFOYPQU
हिंदू समुदाय और संगठनों के विरोध के बाद, वॉलमार्ट ने अपने ‘सेलेस्शियल गणेश ब्लेसिंग्स कलेक्शन’ को हटा दिया। हालाँकि, स्विमसूट्स जैसे कुछ उत्पाद अब भी उपलब्ध बताए जा रहे हैं।
पहले भी कई कंपनियाँ कर चुकी हैं बदमाशी
यह पहली बार नहीं है जब किसी कंपनी ने हिंदू देवी-देवताओं का इस प्रकार दुरुपयोग किया हो। अप्रैल 2022 में, ‘सहारा रे स्विम’ नामक कपड़ों के ब्रांड ने अपने स्विमवियर कलेक्शन में हिंदू देवी-देवताओं की छवियों का उपयोग कर विवाद खड़ा कर दिया था। यह ब्रांड सहारा रे नामक एक युवा सर्फर और ‘ओनली फैंस’ मॉडल का है।
मई 2019 में, अमेज़न पर हिंदू देवी-देवताओं की छवि वाले फर्श की चटाई और टॉयलेट कवर बेचे जाने की खबर आई थी। इसे लेकर भी हिंदू समुदाय ने कड़ी नाराजगी जताई थी।
अक्टूबर 2018 में, न्यूयॉर्क के ‘हाउस ऑफ यस’ नामक नाइटक्लब में दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों को चिपकाने का मामला सामने आया। भारतवंशी अंकिता मिश्रा ने इस पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था, “दीवारों पर भगवान गणेश, सरस्वती, काली और शिव जैसे हिंदू देवी-देवताओं की छवियाँ लगी हुई थीं। यह चुप्पी की कीमत है। जब तक आवाज़ नहीं उठाई जाएगी, इस प्रकार का कृत्य बार-बार होगा।”
व्यावसायिक लाभ के लिए हिंदुओं की भावनाओं को पहुँचाई जा रही ठेस
वॉलमार्ट द्वारा भगवान गणेश की छवि वाले उत्पाद बेचने की घटना हिंदू समुदाय के लिए गहरी संवेदनाओं को आहत करने वाली है। यह मामला न केवल धार्मिक असंवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि यह दिखाता है कि किस तरह से व्यावसायिक लाभ के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों का अपमान किया जाता है। हिंदू संगठनों के विरोध और वॉलमार्ट द्वारा इन उत्पादों को हटाने के बाद भी, यह घटना धार्मिक भावनाओं के प्रति वैश्विक जागरूकता की कमी को उजागर करती है।
बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों की जारी हिंसा के बीच राजधानी ढाका के नमहट्टा इलाके में स्थित इस्कॉन मंदिर पर हमले का मामला सामने आया है। शुक्रवार (6 दिसंबर 2024) की देर रात इस मंदिर में आग लगा दी गई, जिससे श्री लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति और अन्य धार्मिक वस्त्र पूरी तरह जलकर खाक हो गए।
इस्लामी कट्टरपंथियों ने मंदिर पर हमला कर की आगजनी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना उस समय हुई, जब आधी रात के बाद 2 से 3 बजे के बीच मंदिर के पीछे के टिन के छत को उठाकर पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई। इस मंदिर का संचालन करने वाले इस्कॉन पर बैन की माँग को ढाका हाई कोर्ट ने ठुकरा दिया था, जिसके बाद इस्लामिक कट्टरपंथियों ने इस मंदिर को जबरन बंद करवा दिया था। इस मंदिर पर हमले से पहले भी हिंदू प्रतिष्ठानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जा चुका है।
This temple was being managed by ISKCON Namahatta Mandir. Last night, the temple was attacked, vandalized, and the deities set on fire in Dhaka. Brazen Hindumisia on display and free run for rabid Islamists. So called Human Rights Watchers and keepers of Religious Freedom seem… pic.twitter.com/4DiWVkQlga
इस्कॉन के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा, “श्री लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति और मंदिर की सभी वस्तुएँ पूरी तरह जलकर नष्ट हो गईं। यह हमला बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति को दर्शाता है।” उन्होंने भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
Another ISKCON Namhatta Centre burned down in Bangladesh. The Deities of Sri Sri Laxmi Narayan and all items inside the temple, were burned down completely ?. The center is located in Dhaka. Early morning today, between 2-3 AM, miscreants set fire to the Shri Shri Radha Krishna… pic.twitter.com/kDPilLBWHK
ताजे मामले से पहले इस मंदिर को जबरन बंद करा दिया गया था और अब इसे जला दिया गया। इस्कॉन के कोलकाता शाखा के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने एक वीडियो साझा किया, जिसमें उपद्रवियों को मंदिर का बोर्ड हटाते देखा जा सकता है।
Breaking News: *ISKCON Namhatta center in Shibchar Bangladesh forcefully Closed Down by Muslims*.
The army arrived and took away the ISKCON devotees in a vehicle. A viral video on social media shows extremists removing the board of the ISKCON temple, which features a picture of… pic.twitter.com/qJlka16tmU
हाल ही में ढाका हाई कोर्ट ने इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की माँग को ठुकरा दिया था। अदालत ने कहा कि सरकार की ओर से मामले में उचित कार्रवाई की जा रही है। कट्टरपंथी संगठनों ने इस्कॉन पर ईशनिंदा और देशद्रोह के आरोप लगाकर प्रतिबंध की माँग की थी। इसी कड़ी में इस्कॉन के पुजारी चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद हिंदुओं के खिलाफ हिंसा और बढ़ गई। कट्टरपंथियों ने कई हिंदू घरों और प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। स्थानीय हिंदुओं का आरोप है कि पुलिस और सेना भी कट्टरपंथियों के पक्ष में खड़ी नजर आती है।
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा नई बात नहीं है। कट्टरपंथी ताकतें लगातार धार्मिक स्थलों को निशाना बना रही हैं। सरकार की निष्क्रियता और पुलिस प्रशासन की अनदेखी के कारण स्थिति और भी भयावह हो गई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और भारत सरकार को इन घटनाओं पर ध्यान देना चाहिए और बांग्लादेश सरकार पर दबाव डालकर हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
देश-विदेश में हिंदुओं के खिलाफ घृणा अपराधों की घटनाओं को एकत्र कर उनके दस्तावेजीकरण करने के लिए ‘हिंदूफोबिया ट्रैकर’ लॉन्च किया गया है। हिंदू विरोधी हेट ट्रैकर को ‘गविष्टि फाउंडेशन‘ नामक एक एनजीओ द्वारा लॉन्च किया गया है। इस NGO के प्रमुख राहुल रौशन और नूपुर जे शर्मा हैं। बता दें कि राहुल रौशन ऑपइंडिया के भी CEO हैं, जबकि नुपूर जे शर्मा ऑपइंडिया की प्रधान संपादक हैं।
हिंदूफोबिया ट्रैकर का लक्ष्य हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराधों का दस्तावेजीकरण करना, हिंदुओं के उत्पीड़न के बारे में जागरूकता पैदा करना, शोधपत्र जारी करना और हिंदुओं के मानवाधिकारों की वकालत करना है। इसमें हिंदुओं के खिलाफ घृणा अपराधों को पारदर्शी तरीके से रिकॉर्ड किया जाएगा, ताकि हिंदुओं के उत्पीड़न को प्रभावी ढंग से दर्शाकर जागरूकता बढ़ाई जा सके।
दरअसल, हिंदूफोबिया ट्रैकर ने हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराधों का एक डेटाबेस प्रकाशित किया है। इस डेटाबेस में प्रत्येक मामले के लिए एक स्पष्टीकरण दिया गया है कि किस तरह से संबंधित मामला धार्मिक दुश्मनी से प्रेरित घृणा अपराध है। ट्रैकर ने इन अपराधों को 8 प्राथमिक श्रेणियों में विभाजित किया है।
रिलेशनशिप में रहने वाले महिला के साथ घृणा अपराध एवं यौन अपराध
ऐसा हमला जिसमें मौत नहीं हुई
हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर हमला
हिंदू प्रथाओं पर रोक/प्रतिबंध
हिंदुओं के खिलाफ हेट स्पीच
जबरन धर्मांतरण
गैर-हिंदू महिलाओं के साथ संबंध रखने के कारण हिंदू पुरुषों पर हमला
ऐसे हमले जिनमें मौत हो गई
ऊपर दिए गए इन सभी कैटेगरी को अंतर्राष्ट्रीय नियमों और मानकों तथा निर्धारित मापदंडों का उपयोग करते हुए सावधानीपूर्वक परिभाषित किया गया है। इसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रत्येक श्रेणी के अंतर्गत आने वाले अपराधों का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाएगा, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि मामला धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराध है या नहीं।
हिंदूफोबिया शब्द पिछले कुछ सालों में विकसित हुआ है। इसमें हिंदुओं के खिलाफ उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर नकारात्मक भावनाओं, दृष्टिकोणों और कार्यों की एक विस्तृत श्रृंखला को शामिल करना शामिल है, जिसके कारण हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराध भी हुए हैं। हिंदूफोबिया ट्रैकर ने हिंदूफोबिया शब्द की एक कार्यशील परिभाषा जारी की है।
हिंदूफोबिया कोई भी ऐसी कार्रवाई और/या भाषण, लिखित या मौखिक (शैक्षणिक, संस्थागत, राजनीतिक और/या यादृच्छिक), हिंसा और/या भेदभावपूर्ण कार्रवाई/रवैया है, जो हिंदुओं (सनातन धर्म और/या हिंदुओं के विभिन्न संप्रदायों और/या धार्मिक पंथ के तहत विभिन्न पंथों का पालन करने वाले लोग), व्यक्तियों, लोगों के समूह, उनके विश्वास (हिंदू धर्म), उनकी संस्कृतियों, परंपराओं, पूजा के रूपों और विधियों, धर्मग्रंथों, सिद्धांतों और सभ्यतागत मूल्यों और विश्वासों के खिलाफ नफरत, भय, पूर्वाग्रह, दुश्मनी, शत्रुता और/या पूर्वाग्रह से पैदा होता है।
हिंदूफोबिया व्यक्तियों और/या उनकी संपत्ति के प्रति, समग्र रूप से हिंदू समुदाय के प्रति, हिंदू संस्थाओं, हिंदू धार्मिक सुविधाओं (मंदिरों और अस्थायी धार्मिक संरचनाओं सहित), हिंदू आस्था के प्रतीकों, हिंदुओं की मूल और सभ्यतागत भूमि के प्रति निर्देशित हो सकता है, जिसे धार्मिक पूर्वाग्रह, शत्रुता और घृणा के कारण हो सकता है।
हिंदूफोबिया में भाषण, लेखन या व्यवहार में किसी भी प्रकार का संचार शामिल है जो हिंदुओं, हिंदू धर्म, हिंदुओं की धार्मिक पहचान के तत्वों के संदर्भ में व्यक्तिगत रूप से या धार्मिक, जातीय समूह के रूप में अपमानजनक, भेदभावपूर्ण या हिंसक भाषा का प्रयोग करता है, जो पूर्वाग्रह, पक्षपात और/या धार्मिक और/या सांस्कृतिक दुश्मनी से उपजा है, जो अमानवीयकरण, कलंक, बलि का बकरा बनाने, रूढ़िबद्धता, हिंसा के लिए आह्वान और कई मामलों में हिंसा को जन्म देता है।
हिंदुओं के खिलाफ अभद्र भाषा में अक्सर ऐतिहासिक और/या चल रहे उत्पीड़न का खंडन और/या मजाक उड़ाना, धर्मग्रंथों को तोड़ना, प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष हिंसा को बढ़ावा देना और/या आह्वान करना, लक्षित और निर्देशित हिंसा का समर्थन, वैचारिक व्यंजना का उपयोग करके हिंदुओं के वर्गों के उन्मूलन का आह्वान करना, हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक रूप से लक्षित घृणा अपराधों के अपराधियों का महिमामंडन करना, हिंदुओं के व्यक्तियों या समूहों के खिलाफ डॉग-व्हिसलिंग, धार्मिक पहचान और/या विचारों के आधार पर डोक्सिंग, हिंदुओं के समूहों और/या संप्रदायों का व्यंग्यात्मक चित्रण करना ताकि उनके कलंक/अमानवीयकरण/बड़ी हिंसा को वैध बनाया जा सके, प्रतीकों और/या आस्था के प्रतिनिधियों का मजाक उड़ाना और/या उन्हें बदनाम करनाशामिल हैं।
अपने रिलीज के दौरान हिंदूफोबिया ट्रैकर ने डेटाबेस में 1 जनवरी 2023 से हिंदुओं के खिलाफ धार्मिक रूप से प्रेरित 1,314 घृणा अपराधों को शामिल किया है। ट्रैकर ने 191 ‘अनिर्धारित मामलों’ (ऐसे अपराध जिनके बारे में संदेह है कि वे घृणा अपराध हैं, लेकिन धार्मिक कोण साबित नहीं हुई है) का भी दस्तावेजीकरण किया है। इसके अलावा, 589 मामलों को लंबित समीक्षा के रूप में टैग किया है।
यह डेटाबेस पूर्ण नहीं है और इस पर लगातार काम चल रहा है। इसका उद्देश्य है कि जहाँ तक संभव हो सके इसमें अधिक-से-अधिक धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराधों का दस्तावेजीकरण किया जाए, ताकि यह जमीनी हकीकत का सटीक प्रतिनिधित्व कर सके। यह डेटाबेस सार्वजनिक जाँच के लिए उपलब्ध है, जिसमें लोगों के लिए विवाद उठाने और डेटाबेस में जोड़ने के लिए घृणा अपराध भेजेने का प्रावधान है।
यहाँ बताया गया है कि इस पोर्टल का उपयोग डेटाबेस तक पहुँचने के लिए कैसे किया जा सकता है। इसके साथ ही यह भी बताया गया है कि हिंदुओं के खिलाफ घृणा अपराधों को डेसाबेस में शामिल कराने के लिए यहाँ कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति कोई भी अपराध हेट क्राइम है या नहीं, इसकी भी जाँच के लिए लोग हमारी टीम को भेज सकते हैं।
वेबसाइट के होमपेज पर एक हेट क्राइम मैप है, जहाँ डेटाबेस में दर्ज प्रत्येक अपराध को एक एम्बेडेड गूगल मैप पर अपराध के स्थान पर चिह्नित किया गया है। अपराध की श्रेणी के आधार पर विभिन्न प्रतीकों द्वारा मानचित्र पर हेट क्राइम को दर्शाया गया है। प्रत्येक प्रतीक एक बटन जैसा है, जिसे क्लिक करने पर मानचित्र के बाईं ओर अपराध का सारांश खुलता है। यहाँ अपराध से संबंधित लिंक खुलता है।
मैप पर भारत के नक्शा को फोकस किया गया है, जहाँ घृणा अपराधों को अंजाम दिया गया है। हालाँकि, इस मैप को जूम इन और जूम आउट करने पर दुनिया के अन्य कोनों में हिंदुओं के प्रति हुए घृणा अपराधों को देखा जा सकता है। इसका विवरण जानने के लिए पूर्व की ही भाँति बटन पर क्लिक करना होगा, जहाँ उसका विवरण एवं घटना के से संबंधित डिटेल के बारे में लिंक को देखा जा सकता है।
वेबसाइट के होमपेज को नीचे स्क्रॉल करने पर डेटाबेस में दर्ज किए गए घृणा अपराधों के बारे में बुनियादी आँकड़े देखे जा सकते हैं। इसे चार्ट के रूप में डेटा का विजुअल प्रतिनिधित्व शामिल किया गया है। उसके नीचे होमपेज पर हिंदूफोबिया ट्रैकर और घृणा अपराध डेटाबेस के बारे में विभिन्न महत्वपूर्ण लेखों के लिंक दिए गए हैं।
हिंदूफोबिया डेटाबेस को वेबसाइट के सबसे ऊपर बने नेविगेशन बार पर ‘हेट क्राइम डेटाबेस’ पर क्लिक करके एक्सेस किया जा सकता है। यह विभिन्न श्रेणियों के तहत दर्ज अपराधों की लाइव संख्या प्रदर्शित करता है। इसके अलावा, यहाँ डेटाबेस में दर्ज हर अपराध को सूचीबद्ध करने वाला एक टेबल भी दिखाई देता है।
यूजर ड्रॉप-डाउन लिस्ट में से उस कैटेगरी को सेलेक्ट करके उससे संबंधित हेट क्राइम को देख सकते हैं। पेज पर दिए गए सर्च बॉक्स में कीवर्ड टाइप करके हिंदू विरोधी घृणा अपराधों को भी खोजा जा सकता है। इसके अलावा, किसी विशेष अवधि के दौरान हुए अपराधों को तारीख से भी चुनकर पढ़ा जा सकता है।
नीचे फ़िल्टर करके घृणा अपराधों को को प्रदर्शित करती है। इस टेबल की प्रत्येक पंक्ति पर क्लिक करके किसी विशेष अपराध का पूरा विवरण देखा जा सकता है। यह विवरण ब्राउज़र में एक नए टैब पर खुलता है, जो केस के सारांश को दिखाता है। इसमें यह भी बताया गया रहता है कि इस केस को घृणा अपराध के रूप में क्यों सूचीबद्ध किया गया है।
प्रत्येक पृष्ठ पर एक विकल्प होता है जो यूजर को अपराध से संबंधित अतिरिक्त जानकारी प्रस्तुत करने या उसके बारे में विवाद उठाने की अनुमति देता है। इस उद्देश्य के लिए कोई भी व्यक्ति ‘अतिरिक्त जानकारी सबमिट करें/विवाद उठाएँ’ लिखे बटन पर क्लिक कर सकता है। इसे दबाने पर एक नया पेज खुलता है और वहाँ सहायक दस्तावेजों के साथ आवश्यक जानकारी पेश की जा सकती है।
इस डेटाबेस में मौजूद हर मामले को एक विशिष्ट केस आईडी दी गई है, जो पेज के सबसे ऊपर दिखाई देती है। इसके अलावा, अतिरिक्त जानकारी या विवाद प्रस्तुत करते समय इस केस आईडी को प्रस्तुत करना आवश्यक है। इसके अलावा, मेन पेज के टॉप पर ‘अनडिसाइडेड केसेज’ को क्लिक करने पर घृणा अपराध डेटाबेस जैसा ही एक पेज खुलता है।
अनडिसाइडेड केसेज में दर्ज अपराधों को देखने और अतिरिक्त जानकारी या विवाद प्रस्तुत करने के लिए ठीक वैसा ही विकल्प है, जो पहले बताया जा चुका है। इन मामलों को घृणा अपराध के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है, क्योंकि इससे संबंधित आवश्यक जानकारी- जैसे कि हमलावरों की पहचान, हमले का मकसद आदि उपलब्ध नहीं है।
यूजर सबसे ऊपर दिए गए ‘रिपोर्ट हेट क्राइम’ ऑप्शन पर क्लिक करके हेट क्राइम से जुड़े ऐसे मामलों को हमें भेज सकते हैं, जो हिंदूफोबिया ट्रैकर के डेटाबेस में अब तक शामिल नहीं हुए हैं। इस विकल्प पर क्लिक करने से एक फ़ॉर्म खुलता है, जहाँ अपराध का विवरण प्रस्तुत किया जा सकता है, सहायक दस्तावेज़ अपलोड किए जा सकते हैं और अपराध के लिए प्रासंगिक श्रेणियों का चयन किया जा सकता है।
रिपोर्ट किए जा रहे अपराध के लिए सहायक साक्ष्य के रूप में अख़बार की कतरनें, टीवी न्यूज़ रिपोर्ट की वीडियो क्लिप, एफ़आईआर कॉपी आदि जैसी अधिक जानकारी वाले फोटो, वीडियो या पीडीएफ़ फ़ाइल अपलोड की जा सकती हैं। नए हिंदू हेट क्राइम को भेजते समय यूजर्स को अपना नाम और ईमेल आईडी देना आवश्यक है।
ऐसे मामले सबमिट किए जाने के बाद हिंदूफ़ोबिया ट्रैकर की टीम मामले की समीक्षा करेगी और बताए गए मापदंडों के आधार पर वह हेट क्राइम में शामिल किए जाने योग्य होने पर डेटाबेस में जोड़ेगी। फिलहाल, ट्रैकर जनवरी 2023 या उसके बाद के मामलों का दस्तावेजीकरण कर रहा है। हालाँकि, जल्द ही डेटाबेस का विस्तार किया जाएगा।
असम के श्रीभूमि जिले में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बांग्लादेशी सीमा रक्षक बल (बीजीबी) के जवानों द्वारा एक हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार को रोकने की घटना ने गंभीर विवाद खड़ा कर दिया है। इस घटना ने न केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथ की जड़ें और बांग्लादेशी मानसिकता की हिंदू-विरोधी प्रवृत्ति को भी उजागर किया।
बांग्लादेशियों ने मंदिर को बताया इस्लाम के लिए ‘हराम’
कुशियारा नदी के किनारे स्थित हिंदू समुदाय के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मनसा मंदिर को असम सरकार द्वारा 3 लाख रुपये की धनराशि से पुनर्निर्मित किया जा रहा था। गुरुवार (5 दिसंबर 2024) को बीजीबी के जवान ज़ाकिंगंज सीमा चौकी से तेज़ स्पीडबोट के जरिए भारतीय क्षेत्र में घुस आए और मंदिर निर्माण कार्य को रोकने की धमकी दी। उनका तर्क था कि मंदिर की उपस्थिति बांग्लादेशी मुसलमानों को ‘आहत’ कर सकती है और इससे वहाँ हिंसा भड़क सकती है।
बीजीबी ने कथित तौर पर यह भी कहा कि मस्जिद से नमाज के बाद मंदिर दिखना ‘हराम’ है और उनके मजहब के खिलाफ है। उन्होंने स्थानीय हिंदुओं और मजदूरों को डरा-धमकाकर काम बंद करने को कहा।
बीएसएफ की सख्ती से वापस लौटे बांग्लादेशी फौजी
घटना की जानकारी मिलते ही भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) मौके पर पहुँचा और स्थिति को संभाला। बीएसएफ ने बीजीबी को सख्ती से जवाब देते हुए कहा कि उन्हें भारतीय क्षेत्र में घुसने और भारतीय नागरिकों को धमकाने का कोई अधिकार नहीं है। बीएसएफ ने स्पष्ट किया कि मंदिर का पुनर्निर्माण जारी रहेगा और यह पूरी तरह भारतीय क्षेत्र में हो रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और बीएसएफ की मजबूती के चलते बीजीबी के जवान पीछे हट गए।
बांग्लादेश ने किया अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन
बीजीबी का भारतीय सीमा में प्रवेश और हथियार लेकर धमकी देना अंतरराष्ट्रीय कानूनों और सीमा प्रोटोकॉल का घोर उल्लंघन है। इन प्रोटोकॉल के अनुसार, किसी भी सीमा रक्षक बल को दूसरे देश की सीमा में प्रवेश करने से पहले अनुमति लेनी होती है, और वे हथियार नहीं ले जा सकते।
घटना के बाद स्थानीय हिंदुओं ने विरोध प्रदर्शन किया और ‘बांग्लादेश मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। उन्होंने बीजीबी की इस हरकत को भारतीय आत्मसम्मान और हिंदू संस्कृति पर हमला बताया। बीएसएफ ने मंदिर निर्माण कार्य को सुरक्षा प्रदान की और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया।
इस घटना से साफ हो गया है कि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरता सिर्फ आम जनता तक सीमित नहीं है, बल्कि वहाँ की सरकारी एजेंसियाँ और सुरक्षा बल भी इससे प्रभावित हो चुके हैं। बांग्लादेशी मुस्लिमों की भावनाओं को हिंदू धर्मस्थलों के खिलाफ हथियार बनाना, वहाँ की कट्टर मानसिकता की गंभीरता को दर्शाता है। यह भारत के लिए एक चेतावनी भी है कि सीमा पार से कट्टरपंथी मानसिकता के हमले सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेंगे। भारत को अपने सीमा क्षेत्रों और हिंदू धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।