आम आदमी पार्टी (AAP) के नेतृत्व वाली दिल्ली नगर निगम (MCD) की स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। ‘दिल्ली में स्वास्थ्य मुद्दों की स्थिति 2024’ नामक इस रिपोर्ट को 28 नवंबर को प्रजा फाउंडेशन द्वारा जारी किया गया। इसमें बताया गया है कि 2023-24 में MCD के अस्पतालों और डिस्पेंसरी में स्वीकृत पदों में से 31% पद खाली रहे, जबकि 2022-23 के स्वास्थ्य बजट का केवल 36% उपयोग किया गया।
दिल्ली सरकार के साल 2022-23 के बाद 2023-24 में स्वास्थ्य बजट में 16% की बढ़ोतरी हुई और 2024-25 में यह 12% और बढ़ाया गया। लेकिन बजट का उपयोग प्रभावी नहीं हो पाया। 2023-24 के बजट के उपयोग का डेटा भी उपलब्ध नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे रिसर्च के दौरान MCD और राज्य सरकार के कई अस्पतालों ने महीनों का डेटा पूरा नहीं दिया। प्रजा फाउंडेशन के शोध प्रबंधक श्रेयस चोरगी ने बताया कि दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए डेटा संग्रह प्रणाली कमजोर है। उन्होंने कहा, “दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं का प्रबंधन केंद्र, राज्य और MCD में विभाजित है, जिससे डेटा संग्रह और विश्लेषण में बाधाएं आती हैं। एक केंद्रीकृत स्वास्थ्य सूचना प्रणाली आवश्यक है।” प्रजा फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, MCD और राज्य सरकार द्वारा संचालित कई अस्पतालों और डिस्पेंसरी ने रिसर्च के दौरान कई महीनों का डेटा ही जमा नहीं किया।
रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में स्वास्थ्य सेवा का प्रबंधन केंद्रीय, राज्य और नगर निगम प्रशासन के बीच बंटा हुआ है, जिससे डेटा संग्रह और विश्लेषण कठिन हो जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्वास्थ्य जानकारी को एक केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म पर एकत्र करना जरूरी है।
रिपोर्ट में 2014 से 2023 तक के स्वास्थ्य डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें संचारी रोगों के चलते 1,59,129 मौतें हुई हैं, तो सांस की बीमारियों के चलते 88,159 मौतें हुई हैं। वहीं, हाइपरटेंशन से 43,487 मौतें तो टीबी से 35,800 लोगों की जान गई है। इस बीच, डेंगू से मौत के मामले में 627% की बढ़ोतरी हुई है, जो 2014 में 74 थी और 2023 में बढ़कर 538 हो गई। हाइपरटेंशन से मौत के मामलों में 109% की बढ़ोतरी हुई है, जो 2014 में 1,962 थी और 2023 में 4,102 तक पहुँच गई। वहीं, हृदय रोग से मौत के मामले 66% बढ़े।
AAP के ‘दिल्ली मॉडल’ के दावों पर सवाल खड़े हो रहे हैं। मरीजों की तकलीफें और बढ़ती बीमारियाँ दिखाती हैं कि बजट और संसाधन पर्याप्त होने के बावजूद स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर नहीं हो पा रही हैं। खाली पदों और बजट का उपयोग न हो पाना दिल्ली के निवासियों के लिए चिंता का विषय है।
थाईलैंड में नौकरी, लाखों में सैलरी और आईटी से जुड़ा हल्का-फुल्का काम। यही वो सपना है, जिसके नाम पर फँस कर हजारों भारतीय म्यांमार, लाओस समेत कई दक्षिण एशियाई देशों में चलने वाले स्कैम कॉल सेंटर तक पहुँच रहे हैं। संसद में दिए गए एक उत्तर में विदेश मंत्रालय ने बताया है कि वह अब तक 2000 से अधिक भारतीयों को इन स्कैम कॉल सेंटर से बचा कर वापस ला चुका है। यह स्कैम सेंटर कैसे काम करते हैं, किसको फँसाते हैं, किस तरह की प्रताड़ना देते हैं और इनसे क्या करवाते हैं, यह जानने से पहले इन स्कैम कॉल सेंटर से जो बच कर लौटे, उनकी कहानी जान सुन लीजिए, जिससे आपको अंदाजा हो कि यह समस्या कितनी बड़ी है।
24 दिन रखा, लगातार करवाया घोटाला: शिवेंद्र
म्यांमार के इन स्कैम कॉल सेंटर के चंगुल में फँसने और बचने का सबसे ताजा मामला कानपुर के शिवेंद्र सिंह का है। शिवेंद्र 19 नवम्बर, 2024 को ही म्यांमार से थाईलैंड के रास्ते भारत लौटे हैं। उन्होंने दैनिक भास्कर से अपनी कहानी बयाँ की है। शिवेंद्र ने बताया कि उसके साथ ही कानपुर के दफ्तर में काम करने वाले एक संदीप नाम के व्यक्ति ने ऑफर दिया कि थाईलैंड के कॉल सेंटर में ₹1 लाख/ महीने की नौकरी है। उसने इसके बाद उनसे ₹2 लाख लिए। उनका वर्क वीजा की जगह टूरिस्ट वीजा बनवाया गया।
कानपुर के शिवेंद्र (फोटो साभार:दैनिक भास्कर)
शिवेंद्र को 31 अक्टूबर, 2024 को दिल्ली बुलाया गया। उन्हें समझाया गया कि थाईलैंड में एक स्टॉक एक्सचेंज कम्पनी के कॉल सेंटर में काम करना होगा। इसके बाद 3 नवम्बर, 2024 को उन्हें एक फ्लाइट में बिठा कर थाईलैंड भेज दिया गया। इसके बाद उन्हें दो चीनी लोग अपने साथ लेकर म्यांमार चले गए। शिवेंद्र ने बताया कि उन्हें म्यांमार में एक ऐसे ही कॉल सेंटर में ले जाया गया। यहाँ 8 घंटे लोगों को ठगने का साइबर क्राइम करवाया जाता। आधे घंटे कुछ खाने को दिए जाते। रात में रिपोर्ट ली जाती कि किसने कितनी ठगी की है।
शिवेंद्र ने वापस जाने की बात कही तो उनसे ₹10 लाख की माँग की गई। शिवेंद्र ने बताया कि जो भी लोग यहाँ ठगों का विरोध करते, उनके हाथ-पैर तोड़ कर जेल में डाल देते। कुछ लोगों को मगरमच्छ के सामने भी डाला जाता। शिवेंद्र ने किसी तरह अपने घर कानपुर में यह जानकारी पहुँचाई। सांसद देवेन्द्र सिंह भोले और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जल्द कार्रवाई को कहा। इसके बाद विदेश मंत्रालय के दखल से शिवेंद्र 25 नवम्बर को छोड़ा गया। शिवेंद्र ने बताया कि हर वक़्त, हर बात की जाँच यह चीनी ठग करते थे। उनका कहना है कि यह 24 दिन उन्हें 24 साल लगे।
सुअर का मांस खिलाते थे, उल्टा लटकाते थे: सौरभ
लखनऊ के रहने वाले सौरभ सिंह की भी कहानी कुछ ऐसी ही है। अप्रैल, 2024 में वापस आए सागर ने जागरण को बताया है कि उन्हें भी नौकरी के बहाने थाईलैंड बुलाया गया और फिर म्यांमार ले जाया गया। सागर ने बताया कि कैद के दौरान उनसे 22 घंटे तक चीन और बाकी देशों में ठगी करवाई जाती थी। जो भी सोने की कोशिश करता था, उसे बिजली के झटके दिए जाते थे। यहाँ तक कि नहाने भी नहीं जाने देते थे। खाने में उन्हें मात्र चावल और सुअर का मांस दिया जाता था।
सौरभ (फोटो साभार: Jagran)
सागर ने बताया कि जो भी ठगी करने से मना करता था, उसे उलटा लटका कर मारते थे, खाने को नहीं देते थे। यातनाएँ दी जाती थीं। इन चीनी ठगों ने सागर के परिवार से ₹8.14 लाख की वसूली करके उन्हें छोड़ा। उनके परिवार ने किसी तरह इस पैसे का इंतजाम किया। पूरा पैसा मिलने के बाद उन्हें थाईलैंड के रास्ते छोड़ा गया। सौरभ किसी तरह वापस भारत पहुँचे। सागर के लौटने के समय उनके दोस्त अजय और राहुल वहीं फंसे हुए थे। राहुल नवम्बर, 2024 में ही लौटे हैं। आगे राहुल की कहानी पढ़िए।
अजय को टॉर्चर करते हैं, झटके देते हैं: राहुल
भारत लौटे राहुल ने बताया कि उनका दोस्त अजय अब भी म्यांमार में फंसा है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि अजय को मलेशिया में एक नौकरी के लिए ऑफर दिया गया था लेकिन असल में म्यांमार ले जाया गया। अजय को म्यांमार की थाईलैंड सीमा के नजदीक एक जगह पर रखा गया।
अजय की हालत (फोटो साभार: TNIE)
अजय को एक जगह अँधेरे कमरे में बंद करके रखा गया है। उसको घंटों तक डंडों और पाइपों से पीटा जाता है। उसके शरीर पर चोट के अनगिनत निशान हैं। अजय को खाना भी नहीं दिया जाता। अजय का परिवार गरीब है, जो फिरौती के पैसे नहीं दे पा रहा। ऐसे में वह फंसे हैं।
12 दिन भूखा रखा, टॉयलेट का पानी पिलाया: विधान
देहरादून के विधान भी इसी से गुजरे हैं। विधान अगस्त, 2024 में वापस भारत लौट पाए हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए गए एक इंटरव्यू में विधान ने बताया कि वह मई, 2024 में थाईलैंड गए थे। यहाँ उन्हें देश के आईटी सेक्टर में एक अच्छी नौकरी का झांसा दिया गया था। हालाँकि, थाईलैंड से उन्हें म्यांमार के म्यावदी ले जाया गया और ठगी के काम में झोंक दिया गया। उन्होंने जब यह करने से मना किया तो उनको 12 दिनों तक भूखा रखा गया। बिजली के झटके दिए गए। उनको टॉयलेट से पानी पिलाया गया। कई-कई घंटों तक लाठियों से उन्हें मारा।
विधान (फोटो साभार: TOI)
उनके परिवार को वीडियो कॉल करके दिखाया जाता कि किस तरह उन्हें यातनाएँ दी जा रही हैं। इसके बाद उनके परिवार से 2000 डॉलर माँगे गए। जब यह पैसे मिल गए तो उन्हें खाना दिया गया। एक दिन म्यांमार की सेना के लोगों ने आकर उन्हें छोड़ने को कहा। इसका कारण भारतीय विदेश मंत्रालय का दबाव बताया गया। विधान, अजय, राहुल, सौरभ और शिवेंद्र के अलावा अभी भी संभवतः हजारों भारतीय म्यांमार में इसी तरह फंसे हैं। सिर्फ भारतीय ही नहीं, म्यांमार के इन कैम्प में पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और यहाँ तक कि लन्दन से भी लोग आकर फंस गए हैं।
अब जानिए कौन लोग भारतीय युवाओं को इस नरक में धकेल रहे हैं, कैसे लोग इस झाँसे में फंसते हैं, इनसे काम क्या करवाया जाता है, म्यांमार ही क्यों ले जाया जाता है और बाकी जरूरी बातें।
कैसे और क्यों लोग फंसते हैं?
जो भी युवा इस दलदल से वापस लौटे हैं, उनकी लगभग एक ही कहानी है, थाईलैंड-मलेशिया-फिलिपीन्स में नौकरी। भारत में बेरोजगारी से परेशान युवा ज्यादा पैसे के लालच में आते हैं। उनको बताया जाता है कि काफी कम पैसे में वह भी विदेश जाकर पैसा कमा सकते हैं। कम पढ़े-लिखे युवा झाँसे में आ जाएँ, इसके लिए कॉल सेंटर की नौकरी बताई जाती है। जो युवा तकनीकी बैकग्राउंड से हैं, उन्हें आईटी में नौकरी का सपना दिखाया जाता है। उन्हें ₹1 लाख से अधिक की सैलरी बताई जाती है। कई बार यह झांसा देने वाले उनके करीबी भी होते हैं।
उन्हें नौकरी का ऑफर देते समय थाईलैंड, मलेशिया या फिलिपीन्स का नाम लिया जाता है, ताकि उन्हें शक ना हो। वीजा के नाम पर भी उनसे ठगी की जाती है। वर्क वीजा की जगह पर उन्हें टूरिस्ट वीजा थमाया जाता है। इसके बाद जब वह चंगुल में आ जाते हैं तो उन्हें भारत से बैंकॉक ले जाया जाता है। एजेंसियाँ भी भारत से बैंकॉक जाने वालों पर शक नहीं करतीं। क्योंकि भारत से हर साल लाखों टूरिस्ट थाईलैंड जाते हैं। ऐसे में यह पता करना कि कौन सा आदमी किस उद्देश्य से जा रहा है, संभव नहीं हो पाता।
म्यांमार कैसे ले जाते हैं?
थाईलैंड में पहुँचने के बाद इन भारतीयों को एयरपोर्ट पर ही रिसीव कर लिया जाता है। इसके बाद इन्हें चीनी गैंगस्टर अपने साथ गाड़ी में बिठा कर कंपनी दिखाने के वादे के साथ ले जाते हैं। एक बार इनके कब्जे में आने के बाद यहाँ आए लोग असहाय हो जाते हैं। थाईलैंड में इन्हें अलग-अलग गाड़ियों से म्यांमार की सीमा तक पहुँचाया जाता है। अगर कोई विरोध करता है या फिर जाने से मना करता है, तो उसको बन्दूक के बल पर डराया जाता है। ज्यादातर लोग यहीं सरेंडर कर देते हैं।
म्यांमार-थाईलैंड के बीच 2400 किलोमीटर से अधिक लम्बी सीमा है। इसमें नदी-नाले, पहाड़ और खेत समेत आबादी वाले इलाके हैं। यह सीमा कई जगहों पर खुली हुई है। यानि एक-दूसरे देश से लोग आवाजाही कर सकते हैं। कई जगह दोनों देशों को नदियाँ बाँटती हैं। इन्हीं नदियों में नाव के जरिए ही थाईलैंड से लाए जाने के बाद भारतीय और बाकी लोगों को म्यांमार में दाखिल करवाया जाता है। यहाँ तक आते-आते लोग समझ जाते हैं कि उनके साथ अब क्या होने वाला है। इसके बाद उन्हें इस स्कैम में झोंक दिया जाता है।
म्यांमार ही क्यों ले जाते हैं?
इसके पीछे भी एक कारण है। म्यांमार 2021 से ही गृह युद्ध में फंसा हुआ है। म्यांमार, ब्रिटेन से आजादी पाने के बाद अधिकांश समय तक सैन्य शासन में रहा है। इसे ‘Junta’ या ‘हुन्ता’ कहते हैं। 2021 में सेना ने आंग सान सू की सरकार को सत्ता से फेंक कर फिर से कब्जा कर लिया था। इसके बाद देश में गृह युद्ध छिड़ गया।
विद्रोही समूहों ने बड़े गठबंधन बना लिए। उन्होंने म्यांमार के दूरदराज इलाकों में हमले करने चालू के दिए। वर्तमान में शान-चिन जैसे देश राज्य तक इन विद्रोहियों के कब्जे में हैं। पूरे देश में अराजकता का माहौल है। इसीलिए यह स्कैम चलाने के लिए सबसे मुफीद जगह म्यांमार ही है।
म्यांमार में थाईलैंड या चीन से सीमा वाले इलाकों में यह स्कैम चलाए जाते हैं। कई जगह इसके लिए पूरे शहर बसाए गए हैं। इनको रोकने वाला कोई नहीं है। यदि सेना या फिर विद्रोही गुट इन पर कार्रवाई करना चाहते हैं तो वह इनको खिला देते हैं। विद्रोही समूहों को भी हथियार के लिए पैसे जरूरत है, इसलिए वह भी इस पर आँख मूँद लेते हैं।
कई मामलों में सेना भी कुछ नहीं बोलती। स्थानीय लोग भी इन सबमें जुड़े हुए हैं। इन इस घोटाले का सबसे बड़ा केंद्र म्यावादी शहर है। यह थाईलैंड सीमा पर स्थित है। इस शहर पर कब्जे के लिए सेना और विद्रोहियों में भारी लड़ाई हो चुकी है। अभी भी कई जगहों पर सेना का नियंत्रण नहीं है। ऐसे में आसानी से यहाँ घोटाला चलाया जा सकता है।
यह शहर थाईलैंड की सीमा पर है, ऐसे में यहाँ लोगों को फंसा कर लाना और बाकी सुविधाएँ प्राप्त करना भी आसान है। जब म्यावदी में कार्रवाई होती भी है, तो यह दूसरी जगह चले जाते हैं। इनके पास इतना पैसा है कि यह स्थानीय लोगों को पैसा देकर सारी सुविधाएँ हासिल कर लेते हैं।
कौन हैं यह स्कैम सेंटर चलाने वाले?
इस काम में ठगी का काम भारतीय, पाकिस्तानियों, अफ्रीकी और बाकी जगहों से तस्करी करके लाए लोगों को दिया जाता है। यह काम उनसे करवाने वाले चीनी हैं। यह चीन के आपराधिक गैंग हैं। कोविड से पहले यह गैंग मकाऊ में जुए का काम करते थे। इसमें भी यह अरबों कमाते थे। कोविड के बाद अब उन्होंने यह धंधा अपना लिया है। चीन से आकर यह म्यांमार में अपना पूरा गैंग बनाते हैं। एयरपोर्ट से लेकर इन शहरों में अपने लोग बिठाते हैं। इसके बाद तस्करी और ठगी का धंधा चालू कर देते हैं। चीन की सरकार भी इनके इतने बड़े ऑपरेशन के आगे फेल है।
कैसा होता है यह स्कैम सेंटर?
एक स्कैम सेंटर में जानवरों की तरह लोग रखे जाते हैं। एक-एक कमरे में 10-12 लोग रखे जाते हैं। उनके खाने-पीने या नहाने-धोने का भी सही इंतजाम नहीं होता। इन्हीं स्कैम सेंटर में हजारों कम्प्यूटर या फोन होते हैं, जिनके जरिए ठगी की जाती है। इसी सेंटर के भीतर ही जेल और टॉर्चर सेंटर बनाए जाते हैं। इनकी सुरक्षा के लिए हथियारबंद गार्ड लगाए जाते हैं। चारों तरफ कंटीली तार भी लगाई होती है ताकि कोई भाग ना सके। इसके अलावा, ठग यहाँ बाकी इंतजाम भी रखते हैं।
केके पार्क, म्यांमार का सबसे बड़ा स्कैम सेंटर (फोटो साभार: DW)
क्या स्कैम करवाते हैं?
इन जगहों पर अभी साइबर स्कैम ही सबसे अधिक चल रहे हैं। यह लोग जो ठगी या स्कैम सबसे अधिक करवाते हैं, उसका नाम ‘पिग बुचरिंग’ है। इसका अर्थ है किसी सुअर को काटना। यानी यह किसी को निशाने पर लेते हैं और उसे आर्थिक तौर पर मारते हैं। इन सेंटर में काम करने वाले लोगों ने बताया है कि उन्हें सुंदर लड़कियों के तौर पर आईडी बनानी होती है।
इसके बाद उन्हें अमेरिका-चीन और यूरोप समेत बाकी विकसित देशों के पुरुषों को निशाना बनाना होता है। ठगी करने वालों को सबसे पहले इन देशों के अकेलापन महसूस करने वाले या सेक्स की तलाश में इन्टरनेट पर मौजूद पुरुषों को खोजना होता है। इसके बाद उन्हें ठगी करने वाले फर्जी प्रोफाइल के आधार पर कोई सुंदर लड़की बना कर सम्पर्क करते हैं।
जब कई दिन तक बात करने के बाद सामने वाले पुरुष को विश्वास हो जाता है कि वह असल में किसी लड़की से बात कर रहा है तो उसे एक निवेश का झाँसा दिया जाता है। उसे ठग अपने विश्वास में लेकर किसी फर्जी एप में एक निवेश करने को कहते है, इसमें उन्हें बड़े फायदे का सपना दिखाया जाता है।
यदि कोई पैसा निवेश करता है, तो उसे इसी फर्जी एप में 100% तक का फायदा भी दिखाया जाता है। इसके बाद उसे कभी-कभार निवेश की आधी रकम भी वापस भेज दी जाती है और बताया जाता है कि यह उसका मुनाफ़ा है। इसके बाद झाँसे में आए लोग पक्के तौर पर मान लेते हैं कि वह सही जगह बात कर रहे हैं।
इसके बाद जितना सम्भव हो, उतना पैसा ठग कर उसे छोड़ दिया जाता है। इसके अलावा और भी कई तरीके हैं, जिनसे ठगी की जाती है। इनमें अचानक फोन करके किसी की अश्लील वीडियो बनाकर धमकाना, पार्ट टाइम नौकरी देकर ठगना और बाकी तरीके भी शामिल हैं।
कितना लूट चुके?
इसका कोई ठीक-ठीक अनुमान नहीं लेकिन एक स्टडी बताती है कि इस ‘पिग बुचरिंग’ जरिए ही 75 बिलियन डॉलर (लगभग ₹6.5 लाख करोड़) की वसूली यह गैंग कर चुके हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से यह ठगी चलती रहती है। एक और रिपोर्ट बताती है कि 2023 में ही ठगी का यह आँकड़ा 64 बिलियन डॉलर (लगभग ₹5 लाख करोड़) पार कर चुका था।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट कहती है कि म्यांमार, लाओस और कम्बोडिया में चलने वाले इन स्कैम सेंटर में 1 लाख से अधिक लोग फंसे हैं जो यही काम कर रहे हैं। इसी से यह अंदाजा लग सकता है कि यह घोटाला कितना बड़ा है और इसमें कितना पैसा यह घोटालेबाज कमाते हैं।
जो बात नहीं मानते, उनका क्या?
इन स्कैम सेंटर में धोखे से पहुँचने वालों में से कई ठगी करने से इनकार भी करते हैं। उनके साथ यहाँ जानवरों से भी बदतर सलूक होता है। किसी को बिजली के झटके दिए जाते हैं तो किसी को बाँध कर घंटों तक मारा जाता है। विरोध करने वालों ने बताया कि यहाँ खाना-पीना नहीं दिया जाता और कई दिनों तक भूखा रखा जाता है। साथ ही हाथ-पैर तक तोड़ दिए जाते हैं। मगरमच्छों के सामने तक फेंकने की बात सामने आई है। कितने लोगों को यहाँ मार दिया गया, इसकी जानकारी नहीं है।
छोड़ने का क्या माँगते हैं?
यहाँ तस्करी कर लाए गए लोगों को छोड़ने की एवज में फिरौती माँगी जाती है। उन्हें बताया जाता है कि वह बेचे गए हैं, ऐसे में उन्हें यह कीमत चुकानी होगी। कई बार यह धनराशि ₹1 लाख से लेकर ₹10 लाख तक होती है। जो पैसा नहीं चुकाते, उनसे काम करवाया जाता है। छोड़ने की एवज में लोगों से और लोगों को तस्करी कर बुलाने और फिर इसी काम में झोंकने की बात भी कही जाती है। डरे-सहमे होने के कारण परिवार भी फिरौती का पैसा इकट्ठा करके दे देते हैं।
भारत सरकार क्या कर रही?
भारत में बीते लगभग 2 वर्षों में यह समस्या तेजी से उभरी है। जल्दी अमीर बनने और विदेश में अच्छी नौकरी के नाम पर युवा झाँसे में आते हैं। इसी के चलते वह घोटाले में फंसते हैं। जिनके परिवार के युवा इन कैम्प में फंसे हैं, वह स्थानीय सांसद-विधायक से मदद माँगते हैं। कई बार वह विदेश मंत्रालय तक पहुँचते हैं। विदेश मंत्रालय अपने स्तर से इन पर काम कर रहा है। विदेश मंत्रालय ने 28 अगस्त, 2024 को राज्यसभा में इस विषय में जानकारी भी दी है।
विदेश मंत्रालय ने बताया कि उसने कम्बोडिया से 1091, लाओस से 770 और म्यांमार से 497 लोगों को वापस लाने में सफलता पाई है। हालाँकि, इन देशों में चलने वाले इन स्कैम कॉल सेंटर में कितने भारतीय अभी फंसे हैं। इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। विदेश मंत्रालय ने लोगों को सचेत भी किया है कि विदेश में नौकरी के नाम पर झाँसे में ना पड़ें।
सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शनों के बीच असम को भारत से अलग करने की बात कहने वाले शरजील इमाम से जुड़ी एक खबर आ रही है। सोशल मीडिया पर सामने आया है कि शरजील जहाँ पिछले 4 साल से जेल में है वहीं उसकी बहन फरहा निशात ने न्यायिक सेवा को पास कर लिया है।
ये जानकारी सोशल मीडिया पर शरजील इमाम के भाई मुजम्मिल इमाम ने साझा की है। मुजम्मिल ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा,
“जिंदगी का यही फलसफा है: एक तरफ भाई ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इंसाफ की लड़ाई लड़ने के खातिर जेल में तो दूसरी तरफ बहन ज़ुल्म के ख़िलाफ़ इंसाफ देने खातिर अब जज की कुर्सी पर बैठेंगी। छोटी बहन फरहा निशात 32वीं बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा में उत्तीर्ण हो कर आज भाई को फ़क्र करने का मौक़ा दिया है। और मुझे उम्मीद है कि अपने कार्यकाल में तुम अपने फैसलों से किसी बेगुनाह के साथ ज़ुल्म नहीं होने दोगी। अल्लाह तुम्हें हिम्मत और ताक़त दें।”
इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर शरजील इमाम के समर्थक इस जानकारी को शेयर कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि शरजील की बहन जज बन गई और अब जुल्म के खिलाफ न्याय करेंगे।
पोस्ट के मुताबिक हमने जब बीपीएससी की वेबसाइट पर इस परीक्षा के नतीजे चेक किए तो लिस्ट में पिछड़े वर्ग की श्रेणी में 124570 रोल नंबर पर फरहा निशात का नाम मिला। यह लड़की शरजील इमाम की ही बहन है इसकी हम आधिकारिक पुष्टि नहीं कर पाए हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर और मीडिया रिपोर्ट में यही दावा है कि यही फरहा निशात शरजील की बहन हैं।
गौरतलब है कि साल 2019-20 में सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शन के दौरान शरजील इमाम पर मुस्लिमों को उकसाने, दंगा भड़काने, और देशद्रोह जैसे गंभीर आरोपों में केस दर्ज हुआ था। बाद में 28 जनवरी 2020 को उसे गिरफ्तार किया गया था और उस पर केस चला था। कुछ समय पहले उसे जामिया हिंसा मामले में बरी किया गया लेकिन बाकी आरोपों में वह अब भी जेल में है।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने गुरुवार (28 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र भेजा। इसमें मुस्लिम बोर्ड ने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि देश की निचली अदालतों को मस्जिदों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई नहीं करने का निर्देश दे। पत्र ऐसे समय लिखा गया है, जब ट्रायल कोर्ट के आदेश पर संभल के जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान इस्लामी भीड़ द्वारा हिंसा की गई।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने पत्र में साल 1991 के उपासना स्थल अधिनियम (प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991) का हवाला दिया है। इसमें वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा का शाही ईदगाह, धार के भोजशाला मस्जिद, लखनऊ की टीले वाली मस्जिद, संभल की शाही जामा मस्जिद और अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह जैसी याचिकाओं पर विचार नहीं करने का अनुरोध किया गया है।
All India Muslim Personal Law Board (AIMPLB) demands Supreme Court to stop lower courts from accepting petitions on claims on mosques and dargahs in various courts across the country. pic.twitter.com/XIwsbCz1Eq
इस इस्लामी संस्था ने अपने पत्र में आगे लिखा है, “डॉक्टर SQR इलियास (AIMPLB के राष्ट्रीय प्रवक्ता) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में तत्काल स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करने और निचली अदालतों को किसी भी अन्य विवाद के लिए दरवाजे खोलने से परहेज करने का निर्देश देने की अपील की है।”
पत्र में चेतावनी देते हुए कहा गया है, “संसद द्वारा पारित इस कानून (उपासना स्थल या धार्मिक स्थल अधिनियम 1991) को सख्ती से लागू करना केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों की जिम्मेदारी है। ऐसा न करने पर पूरे देश में विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार जिम्मेदार होंगे।”
एक तरह से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि अगर निचली अदालतों द्वारा मस्जिदों के सर्वे को मंजूरी दी जाती है तो संभल में हुई हिंसा की तरह दूसरी जगह भी हिंसा भड़क सकती है। हालाँकि, मुस्लिम भीड़ ने तब भी दंगे किए हैं, जब हाई कोर्ट ने इस्लामी मजहबी किताबों से संबंधित याचिकाओं पर विचार किया। साल 1985 का कलकत्ता कुरान याचिका इसका ज्वलंत उदाहरण है।
साल 1985 की कलकत्ता कुरान याचिका
अधिवक्ता चांदमल चोपड़ा और सीतल सिंह ने 29 मार्च 1985 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक आवेदन दायर किया था। इसमें कलकत्ता हाई कोर्ट से सरकार को इस्लाम की मजहबी किताब ‘कुरान’ की हर प्रति को ‘जब्त’ करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। उन्होंने कहा कि कुरान की आयतों में काफिर (गैर-मुस्लिमों) के खिलाफ हिंसा का आह्वान किया गया है।
याचिका में तर्क दिया गया था कि कुरान की प्रत्येक प्रति दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 95 (कुछ प्रकाशनों को जब्त घोषित करने की शक्ति) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धार्मिक आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य) के तहत ‘जब्त करने योग्य’ है।
याचिका में तर्क दिया गया कि मुस्लिम अब तक कानून का दुरुपयोग करके इस्लाम की आलोचना करने वाली किताबों पर प्रतिबंध लगाते रहे हैं। बता दें कि यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सैयद वसीम रिजवी ने भी कुरान की 26 आयतों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए रिजवी पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया था।
खैर, चाँदमल चोपड़ा और सीतल सिंह द्वारा दायर याचिका सुनवाई के लिए शुरू में कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति खस्तगीर जे के समक्ष आया था। हालाँकि, आज की तरह उम्मीद से उलट उस विद्वान न्यायाधीश ने आवेदन को खारिज करने के बजाय उस पर विचार किया। उन्होंने प्रतिवादी पक्षों को नोटिस भी जारी किया। इसके बाद जो हुआ, वह बेहद भयानक है।
इस याचिका के विरोध में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), जमात-ए-इस्लामी और कलकत्ता के केरल मुस्लिम एसोसिएशन ने हथियार उठा लिए। आंदोलन को मजबूत करने के लिए एक ‘कुरान रक्षा समिति’ की स्थापना की गई। CPIM के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार ने दावा किया कि यह याचिका दुर्भावनापूर्ण इरादे से दायर की गई है।
कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने भी वामपंथियों का साथ दिया और याचिका का विरोध किया। बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते जस्टिस खस्तगीर ने इसे अपनी सूची से हटाकर जस्टिस सतीश चंद्रा की अदालत में भेज दिया। राज्य के महाधिवक्ता एसके आचार्य की सलाह पर मामला जस्टिस बिमल चंद्र बसाक की पीठ को सौंप दिया गया और उन्होंने 17 मई 1985 को इसे याचिका खारिज कर दी।
कलकत्ता (अब कोलकाता) में कुरान याचिका को लेकर दंगे
इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपनी किताब ‘द कलकत्ता कुरान पिटीशन‘ की पृष्ठ संख्या 26 और 27 में लिखा है कि याचिका के बारे में जानने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों से लेकर बांग्लादेश तक के मुस्लिमों दंगे किए। बांग्लादेश में दंगों में कई लोग कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी से जुड़े थे। इन चरमपंथियों ने सरकारी संपत्ति को आग लगा दी और मिसाइलें भी फेंकी।
चेपल नवाबगंज शहर में झड़प के दौरान पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। इस गोली-बारी में 12 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक लोग घायल हो गए। इसके एक दिन बाद जमात-ए-इस्लामी की 20,000 की भीड़ ने राजधानी ढाका में हिंसक विरोध प्रदर्शन किया। यहाँ तक कि भारतीय उच्चायोग के कार्यालय पर घात लगाकर हमला करने की भी कोशिश की गई।
कोर्ट केस हुआ कोलकाता में, मुस्लिमों ने दंगा-फसाद किया बांग्लादेश से लेकर राँची-श्रीनगर में (साभार: सीता राम गोयल की किताब, The Calcutta Quran Petition, page 26-27)
भारत के राज्य झारखंड की राजधानी राँची (उस समय बिहार का एक बड़ा शहर था) में मुस्लिमों ने काले झंडे और बैनर लेकर ‘विरोध मार्च’ निकाला। इस दौरान दंगाई भीड़ ने सरकार विरोधी नारे लगाए और दुकानों पर पत्थर फेंके और छोटे व्यापारियों के कारोबार को जबरन बंद करवाया। डरे हुए कारोबारियों ने विरोध प्रदर्शन के अगले दिन भी अपना कारोबार बंद रखा।
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में भी मुस्लिमों की भीड़ ने CPI मुख्यालय में तोड़फोड़ की। एक पुल को आग लगाने का प्रयास किया गया। स्कूल-कॉलेजों, सिनेमाघरों और दुकानों को जबरन बंद करवा दिया गया। आखिरकार, पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी और इसमें एक शख्स की मौत हो गई थी। जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीएम शाह ने तो याचिका पर सुनवाई करने वाले जज के खिलाफ ऐक्शन लेने की माँग कर डाली थी।
कुरान पर कोर्ट में केस कैसे? जम्मू-कश्मीर के CM जज पर ही एक्शन लेने की माँग कर बैठे (साभार: सीता राम गोयल की किताब, The Calcutta Quran Petition, page 29)
सीताराम गोयल ने अपनी किताब में लिखा है, “इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), जो इस्लामी मुद्दों की हिमायती रही है, को मुस्लिम भीड़ ने ‘हिंदू सांप्रदायिकों’ के साथ जोड़ दिया है। भीड़ तो भीड़ ही होती है और जो कुछ भी वह करती है, उसकी जिम्मेदारी उन लोगों पर होती है जो उन्हें अक्सर संगठित करते हैं।”
अब, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) भी अपनी चिट्ठी में इसी तरह का संकेत देने की कोशिश की है कि यदि अदालतें हिंदू मंदिरों के ऊपर बनी मस्जिदों के वास्तविक चरित्र के बारे में सर्वे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखती हैं तो मुस्लिम भीड़ फिर से दंगे कर सकती है। संभल में इसकी बानगी पूरा देश ही नहीं, दुनिया भी देख चुकी है।
दिल्ली में जहाँ प्रदूषण का ये हाल है कि वायु गुणवत्ता सूचकांक कभी-कभी 300-400 तक पार कर जाता है वहीं इसी दिल्ली में एक घर ऐसा भी है जहाँ का वातावरण अत्यंत शुद्ध है और घर का AQI 10-15 तक रहता है। ये घर है सैनिक फार्म्स में पीटर सिंह और नीनो कौर का।
पीटर और नीनो कौर ने अपने इस घर को स्व-संवर्धन तकनीकों से निर्मित किया है। इसमें सीमेंट के बजाय चूने के मोर्टार का उपयोग किया गया है। इस घर में पेंट्स की जगह भी चूना का प्रयोग हुआ है। वहीं छत पर कंक्रीट स्लैब की जगह पत्थर की टाइलें हैं, जो गर्मियों में तापमान को नियंत्रित करने में मदद करती हैं।
इसके अलावा इस घर की खास बात हैं कि यहाँ 15,000 से अधिक पौधे हैं, जो हवा को शुद्ध करने में मदद करते हैं। ये पौधे न केवल बाहरी वायु गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं बल्कि अंदर की हवा को भी साफ रखते हैं। इस प्रकार, घर का AQI हमेशा 15 से नीचे रहता है।
वहीं यदि बिजली आदि की बात करें तो घर पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर निर्भर करता है और ऑफ-ग्रिड चलता है। इस घर में पानी की बर्बादी न हो इसका भी पूरा ध्यान दिया जाता है। यहाँ वर्षा के पानी को एक 15,000-लीटर टैंक में इकट्ठा किया जाता है, जिसका उपयोग बाद में पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता है। पानी का पुनर्चक्रण सुनिश्चित करता है कि कोई भी बूंद बर्बाद न हो।
पीटर और नीनो के इस घर में वो दोनों खुद जैविक खाद्य पदार्थ उगाते हैं। वे फसल अवशेष का उपयोग करके खाद बनाते हैं, जिससे वे मशरूम उगती है। इस तरह उनके घर में ही सारी सब्जियाँ उग जाती हैं और उन्हें बाहर की सब्जियाँ नहीं खरीदनी पड़ती।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीटर और नीनो ने ऐसे घर का निर्माण तब किया जब पता चला कि नीनो ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और उनके फेफड़े दिल्ली की जहरीले हवा झेलने लायक नहीं हैं। डॉक्टरों ने उन लोगों को दिल्ली भी छोड़ने को कहा, लेकिन ये जोड़ा दिल्ली में रहा और अपनी एक ऐसी दुनिया बनाई जो आज दिल्ली में रहने वालों के लिए एक मिसाल है।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने एक महत्पूर्ण फैसले में कहा है कि ‘संपत्ति का अधिकार’ मानव का अधिकार है। इसके साथ ही भारतीय सेना को आदेश दिया कि वह जमीन के मालिक को 46 वर्षों का बकाया किराया दे। यह जमीन सेना के नियंत्रण में साल 1978 से है। अदालत ने कहा कि संपत्ति का अधिकार संवैधानिक ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार के दायरे में आता है।
हाई कोर्ट के जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने कहा, “संपत्ति के अधिकार को अब न केवल संवैधानिक या वैधानिक अधिकार माना जाता है, बल्कि यह मानवाधिकारों के दायरे में आता है। मानवाधिकारों को व्यक्तिगत अधिकारों जैसे कि आश्रय, आजीविका, स्वास्थ्य, रोजगार आदि के दायरे में माना जाता है और पिछले कुछ वर्षों में मानवाधिकारों ने बहुआयामी आयाम हासिल कर लिया है।”
दरअसल, उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में नियंत्रण रेखा के पास स्थित तंगधार के निवासी अब्दुल मजीद लोन ने साल 2014 में एक याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने अपनी जमीन के लिए सेना से किराया दिलाने की माँग की थी। लगभग 1.6 एकड़ की यह जमीन तंगधार गाँव में स्थित है। याचिकाकर्ता लोन का कहना था कि उसे आज तक इस जमीन के लिए कोई किराया नहीं मिला।
हालाँकि, सेना ने दावा किया उसने उस जमीन पर कभी भी कब्जा नहीं किया था। हालाँकि, अदालत ने कहा कि यह दावा ‘कानून की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और खारिज किया जाता है’। कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादियों ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना याचिकाकर्ता की भूमि अधिग्रहित कर ली है, वह भी उसे किराया या मुआवजा दिए बिना। यह याचिकाकर्ता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।”
जस्टिस नरगल ने कुपवाड़ा के डिप्टी कमिश्नर को दो सप्ताह के भीतर संबंधित तहसीलदार की अध्यक्षता में राजस्व अधिकारियों की एक टीम गठित करने का भी निर्देश दिया। यह टीम ‘सेना द्वारा संबंधित भूमि पर कब्जे के संबंध में किराए के आकलन’ के करेगी। कोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर रिपोर्ट प्राप्त होने की तिथि से एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता को किराया दिया जाना चाहिए।
अपने आदेश में जस्टिस वसीम सादिक नरगल ने आगे कहा, “राज्य और उसकी एजेंसियाँ कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही किसी नागरिक को उसकी संपत्ति से बेदखल कर सकती हैं। मुआवजा देने का दायित्व हालाँकि अनुच्छेद 300A में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं है, लेकिन उक्त अनुच्छेद से इसका अनुमान लगाया जा सकता है।”
हैदराबाद में बिजनेस की तरह चल रही ‘शेख मैरिज’ और ‘मुताह निकाह’ कॉन्सेप्ट पर आज (29 नवंबर 2024) फिर आजतक पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। मृदुलिका झा ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट के आखिरी हिस्से में बताया है कि कैसे हैदराबाद में शेख मैरिज का चलन शुरू हुआ और कैसे आज इसे संचालित किया जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, हैदराबाद में शेख मैरिज की नींव निजामों के काल से पड़ी। उस समय निजामों ने अपनी दौलत की रखवाली के लिए यमन से जो सैनिक ( जिन्हें चाऊश कहते थे) बुलाए थे, उन्होंने निजाम की फौज खड़ी करने के लिए हैदराबादी महिलाओं से निकाह करके बच्चे किए, जिनमें से कुछ के वंशज आज मुताह निकाह कराने के ‘ब्रोकर और एजेंट’ है।
बताया जाता है कि चूँकि चाऊशों के अपने मुल्क लौटने के बाद उनके वंशज को अरब देशों में नागरिकता नहीं मिली, इसलिए उन्होंने शेखों से अपनी बेटियों का निकाह करना शुरू कर दिया। शुरू में ये शेख मैरिज शॉर्ट-टर्म नहीं थी, मगर बाद में धीरे-धीरे ये निकाह मजे के लिए किए जाने लगे, और निकाह के साथ तलाक की तारीखें भी पक्की होने लगीं। चाऊश के वंशज खुद अपनी बेटियों के लिए ब्रोकर-एजेंट बनने लगे।
वहीं शेखों को भी पता चल गया कि उनकी जरूरत पूरा करने के लिए हैदराबाद में पूरे इंतजाम हैं। उनके मजहब के हिसाब से सेक्स वर्क के पास जाना हराम था इसलिए उन्होंने भारत में इसका विकल्प खोजा। उन्होंने निकाह करके लड़कियों को अपने साथ रखना शुरू किया। 10-15 दिन जब तक मन न भरे ये निकाह करके उनके साथ रहते, फिर उन्हें छोड़कर चले जाते। इस तरह वो अपने मजहब के मुताबिक कुछ हराम भी नहीं करते थे और उनकी जरूरत भी पूरी हो जाती थी।
मृदुलिका अपनी रिपोर्ट में इस्लामी स्कॉलरों के हवाले से बताती हैं कि चूँकि अरब में लड़की से निकाह के लिए शर्तें अलग हैं और खर्चा भी ज्यादा इसलिए हैदराबाद में अरब देशों के बूढे शेख मेडिकल वीजा पर आते हैं, यहाँ आकर वह सस्ते दामों में लड़कियाँ खरीदते हैं और फिर अपनी जरूरतों को पूरा करते हैं।
इन शेखों का हैदराबाद में कितनी खातिरदारी होती है इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि क्षेत्र में स्थानीय लोग तेलुगु और उर्दू बोलते हैं, लेकिन अस्पतालों में निर्देश अरबी भाषा में लिखे गए हैं ताकि अमीर शेखों को कोई परेशानी न हो।
रिपोर्ट बताती हैं कि रमजान के वक्त हैदराबाद में शेखों का आना-जाना ज्यादा हो जाता है। वो इस महीने में भी जो मन हो वो करते हैं। वो मानते हैं जवान या वर्जिन लड़कियों के साथ संबंध बनाकर उनकी जवानी लौट आएगी। कई शेख को नब्ज देखकर आँकते हैं कि लड़की वर्जिन है या नहीं।
मालूम हो कि मुताह निकाह में लड़की का बालिग होना एक शर्त होती है, मगर बालिग होने का अर्थ 18 साल की उम्र पार करना नहीं बल्कि लड़की को पीरियड का आना है। अब ये उम्र 13 भी हो सकती है और 15 भी।
बता दें कि हैदराबाद में कई घर हैं जो मुताह निकाह के बूते अपना घर पाल रहे हैं। वो लड़कियों को कम उम्र में बेचते हैं और फिर घर चलाते हैं। हैदराबाद के बारकस इलाके को लेकर तो रिपोर्ट कहती है कि वहाँ के 100 घरों में से 33 घर में ये शेख मैरिज हुई और अब भी ये सिलसिला जारी है।
अजीब बात ये हैं कि इस मुताह निकाह को इस्लामी स्कॉलर एक तरह की लिबर्टी मानते हैं। जैसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में शिया थियोलॉजी के एक्सपर्ट डॉ अब्बास कहते हैं कि अगर किसी को स्थायी रिश्ते में जाने से पहले पार्टनर को परखना है तो मुताह एक तरीका हो सकता है। बशर्ते इसमें दोनों की सहमति हो।
गौरतलब है कि इससे पहले मुताह निकाह पर प्रकाशित दो रिपोर्ट में मृदुलिका झा ने पीड़िताओं की आपबीती को बताया था। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने उस बच्ची के दर्द को उजागर किया था जिसे एक शेख प्रेगनेंट करके वापस चला गया था और बाद में उसे बच्ची को जन्म देना पड़ा था। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने बताया था कि कैसे शेखों को हैदराबाद में ब्रोकर 20-25-50 हजार में बच्चियाँ मुहैया करवा देते हैं। परेड करवाकर लड़कियों को चुना जाता है। उनका शरीर नापा जाता है और फिर निकाह कराकर लड़कियाँ उन्हें इस्तेमाल के लिए दे दी जाती हैं। इसके अलावा रिपोर्ट में उन हैदराबादी आंटियों के बारे में भी बताया था जो अरब देशों में रहकर लड़कियों का शोषण करवाने में शेखों की मदद करती हैं या फिर हैदराबाद में रहकर लड़कियों की जानकारी मुहैया कराती हैं।
महाराष्ट्र और हरियाणा में मिली हार के बाद कॉन्ग्रेस ने EVM में गड़बड़ी का अपना पुराना राग अलापना शुरू कर दिया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस का एक गुट अपनी करारी हार के लिए EVM को दोष देने का पक्षधर नहीं है। ये वही दोनों राज्य हैं, जहाँ पाँच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को झटका लगा था। हालाँकि, दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया है।
कॉन्ग्रेस पार्टी में EVM को दोषी ठहराने के सवाल पर उभरे मतभेद स्पष्ट दिखने लगे हैं। कॉन्ग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि महाराष्ट्र में हार से झटका नहीं लगना चाहिए था, क्योंकि विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में कराए गए पार्टी के आंतरिक सर्वे से पता चला कि महाविकास अघाड़ी (MVA) को लोकसभा चुनावों में हासिल की गई बढ़त को बरकरार रखना मुश्किल हो सकता है।
इंडियन एक्सप्रेस को कॉन्ग्रेस के नेताओं ने बताया कि पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षणों से पता चला था कि एकनाथ शिंदे सरकार की ‘लड़की बहिन योजना’ लोकप्रिय हो रही है। सर्वे में 88% लोगों ने कहा था कि उन्हें इस योजना के बारे में जानकारी है। 82% लोगों ने कहा था कि उनके परिवार में इस योजना की लाभार्थी है। वहीं, 17% लोगों ने माना था कि इस योजना के कारण उनका वोट का रूख बदल गया।
Big story in @IndianExpress. Congress’ own Internal survey showed in October itself that Mahayuti was ahead. Muslims were only category where MVA had edge, among all others: General, OBCs, SC, ST, Mahayuti had a lead. Some rue blaming the EVM as a ‘face saver’… pic.twitter.com/EyMCFp7EDC
इस योजना को सफल होता देखकर कॉन्ग्रेस के रणनीतिकारों ने घोषणापत्र को अंतिम रूप देने के लिए आयोजित एक बैठक में महिलाओं को 3000 रुपए मासिक सहायता देने का सुझाव दिया था। हालाँकि, तब महायुति गठबंधन ने ‘लड़की बहन योजना’ के तहत दी जा रही 1,500 रुपए प्रति माह की राशि को बढ़ाकर 2,100 रुपए महीना करने का वादा किया था।
इसके बाद महिला मतदाताओं में महायुति गठबंधन के लिए समर्थन बढ़ गया। मतदान से कुछ दिन पहले कॉन्ग्रेस नेताओं ने सोयाबीन किसानों से संपर्क किया और घोषणा की कि अगर MVA सत्ता में आती है तो सोयाबीन के लिए 7,000 रुपए प्रति क्विंटल और बोनस तय करेगी। हालाँकि, MVA को इसका कोई फायदा नहीं मिला।
दरअसल, कॉन्ग्रेस पार्टी ने 20 नवंबर 2024 को हुए मतदान से चार सप्ताह से भी कम समय पहले अक्टूबर में 103 सीटों पर आंतरिक सर्वेक्षण कराए थे। इस सर्वेक्षणों में पता चला कि महाविकास अघाड़ी की 103 ‘मजबूत सीटों’ में से वह सिर्फ 44 सीटों पर ही आगे थी। वहीं, लोकसभा चुनाव के दौरान 54 सीटों पर MVA आगे थी। यानी मतदान से पहले ही परिणाम को कॉन्ग्रेस भाँप गई थी।
वहीं, उनके सर्वे में यह भी पता चला कि भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति 103 में से 49 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि वह 56 सीटों पर आगे निकल गई। इस सर्वे में यही एक बात MVA के पक्ष में रही कि मुस्लिम ही एकमात्र ऐसा वर्ग था, जहाँ उसे पूर्ण बढ़त हासिल थी। सामान्य, ओबीसी, एसबीसी, एससी, एसईबीसी, एसटी आदि वर्गों में एमवीए से आगे महायुति थी।
पार्टी की आंतरिक सर्वे में 57,309 लोगों से सवाल पूछे गए थे। जिन 103 सीटों पर कॉन्ग्रेस ने आंतरिक सर्वे कराई थी, उनमें से 52 पर कॉन्ग्रेस, 28 पर शिवसेना (यूबीटी), 21 पर एनसीपी शरद पवार और एक-एक सीट पर सीपीएम और समाजवादी पार्टी ने चुनाव लड़ा था। हालाँकि, इस योजना ने प्रदेश में भाजपा की गठबंधन वाली महायुति सरकार की वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ISKCON ने एक बयान जारी करके स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेश में गिरफ्तार किए गए हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास के साथ खड़ा हैं। ISKCON ने कहा है कि उन्होंने किसी भी तरह से चिन्मय कृष्ण दास से खुद को अलग नहीं किया है। उन्होंने साथ ही बांग्लादेश में प्रताड़ना के खिलाफ लड़ रहे सभी हिन्दुओं का समर्थन किया है।
गुरुवार (28 नवम्बर, 2024) को जारी किए गए एक बयान में ISKCON ने कहा, “इस्कॉन ने हिंदुओं और मंदिरों की रक्षा के लिए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने वाले चिन्मय कृष्ण दास के अधिकारों और स्वतंत्रता का समर्थन करने से खुद को दूर नहीं किया है और ना ही करेगा।”
ISKCON ने आगे लिखा, “हम बाकी सभी सनातनी संगठनों के साथ मिलकर हिंदुओं की सुरक्षा तथा बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ शांतिपूर्ण माहौल फिर से स्थापित करने का समर्थन करते हैं। हमारे कई प्रेस बयानों और इंटरव्यू ने इस बात को साफ़ कर दिया है। हमने बस यही कहा है कि चिन्मय कृष्ण दास बांग्लादेश में हमारा अधिकारिक तौर पर प्रतिनिधित्व नहीं करते।”
यह स्पष्टीकरण बांग्लादेश ISKCON के महासचिव चारू चन्द्र दास के एक बयान के बाद आया। उन्होंने यह बयान गुरुवार को ढाका में दिया था। उन्होंने अपने बयान में कहा था, “कई महीने पहले, प्रभातक श्री कृष्ण मंदिर के प्रमुख लीलाराज गौर दास, चटगाँव में श्री श्री पुंडरीक धाम के प्रमुख गौरांग दास और चिन्मय कृष्ण दास को अनुशासनहीनता के चलते इस्कॉन के भीतर उनके पदों और सभी संगठनात्मक गतिविधियों से हटा दिया गया था। यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि उनके कार्य इस्कॉन का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।”
Major development!
ISKCON #Bangladesh dissociates itself from arrested Hindu priest Chinmoy Krishna Das#ISKCON B'desh general secretary Charu Chandra Das today said the organization shall not take any responsibility of the words or actions of Chinmoy Prabhu
चारू चन्द्र दास के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर हिन्दुओं ने गुस्सा जाहिर किया था। हिन्दुओं ने कहा था कि चिन्मय कृष्ण दास पर बांग्लादेश की यूनुस सरकार की चलते ISKCON पीछे हट रहा है। हिन्दुओं ने कहा था कि जब एकता की जरूरत है, ऐसे समय में ISKCON अपने आप को चिन्मय कृष्ण दास से अलग कर रहा है। इसके बाद ISKCON ने यह स्पष्टीकरण दिया।
ISKCON के एक और एक्स (पहले ट्विटर) खाते पर चिन्मय कृष्ण दास के समर्थन में भी एक ट्वीट किया गया है। ISKCON ने लिखा, “ISKCON श्री चिन्मय कृष्ण दास के साथ खड़ा है। हम भगवान कृष्ण से सभी भक्तों की रक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं।”
Iskcon,Inc. stands with Sri Chinmoy Krishna Das. Our prayers to Lord Krishna for the protection of all these devotees.
गौरतलब है कि बांग्लादेश में हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें मंगलवार को भी जमानत नहीं दी गई थी। बांग्लादेश की पुलिस ने हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले चिन्मय दास को कथित देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया है।
वर्तमान में वह जेल में हैं। उनकी रिहाई के लिए हिन्दुओं ने प्रदर्शन किया तो उन पर भी पुलिस ने हमला किया और इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी उन्हें निशाना बनाया। चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद युनुस सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश के कानून के जानकार कह रहे हैं कि चिन्मय कृष्ण दास के मामले में सही प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को भी सही ठहराया। इसमें हाई कोर्ट ने एक ईसाई महिला को अनुसूचित जाति (SC) का सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था। महिला खुद को हिंदू बताते हुए इस सर्टिफिकेट की माँग की थी।
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति आर महादेवन की खंडपीठ ने कहा कि सेल्वारानी नाम की महिला ईसाई धर्म का पालन करती है और नियमित चर्च भी जाती है। इसके बावजूद वह नौकरी के लिए खुद को हिंदू और SC बता रही है। खंडपीठ ने कहा कि जो व्यक्ति ईसाई है और आरक्षण के लिए खुद को हिंदू बताता है, उसे SC दर्जा देना आरक्षण के उद्देश्य के खिलाफ और संविधान के साथ धोखा है।
दरअसल, याचिकाकर्ता सेल्वारानी ने केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी के लिए आवेदन करते समय खुद के हिंदू होने का दावा किया था। सेल्वरानी ने तर्क दिया कि वह जन्म से ही हिंदू हैं और अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के वल्लुवन जाति से ताल्लुक रखती हैं। वह मंदिरों में जाती हैं और देवी-देवताओं की पूजा करती है।
हालाँकि, राज्य सरकार के रिकॉर्ड में पाया गया है कि सेल्वारानी की माँ ईसाई थीं और वल्लुवन जाति से आने वाले उनके पिता ने भी धर्मांतरण करके ईसाई धर्म अपना लिया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि SC/ST आरक्षण में धर्म को आधार बनाने की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। यह मामला भी इससे ही जुड़ा है।
दरअसल, सेल्वारानी मामले ने स्पष्ट कर दिया कि आरक्षण का लाभ लेने के लिए किस तरह से धर्म को छिपाया जा रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में ईसाई एवं मुस्लिम मजहब में धर्मांतरित लोग आरक्षण का लाभ लेने के लिए खुद को हिंदू बता रहे हैं या फिर हिंदू नाम रखकर सरकार को धोखा दे रहे हैं। यह उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक में समान रूप से चल रहा है।
बता दें कि 1950 के राष्ट्रपति के आदेश में कहा गया है कि सिर्फ हिंदुओं (बौद्ध, जैन, सिख सहित) ही SC का दर्जा मिल सकता है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा गठित जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग ने साल 2007 में दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को भी SC वर्ग में आरक्षण देने की सिफारिश की थी। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा 25 सितंबर 1990 से 24 नवंबर 1991 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश थे।
इस धर्मांतरण का असर सिर्फ नौकरी ही नहीं, बल्कि चुनावों में भी दिखता है। जनजातीय समुदाय की बहुलता वाले झारखंड में आज कई इलाकों में डेमोग्राफी बदल चुकी है। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनजातीय समुदाय से धर्मांतरित हुए लोगों ने कई विधायकों को अपना प्रतिनिधि चुना। वहाँ ईसाई विधायकों की संख्या मुस्लिमों से सीधे दोगुनी है।
साल 2011 की जनगणना में कहा गया है कि झारखंड में 15 प्रतिशत मुस्लिम और मात्र चार प्रतिशत ईसाई हैं। जबकि, विधायकों की गिनती तो इस जनसंख्या का असर साफ दिख रहा है। झारखंड में इस बार 8 ईसाई विधायक चुने गए हैं, जबकि 4 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ईसाई में धर्मांतरित लोग अभी भी हिंदू होने का दिखावा कर रहे हैं और हिंदुओं को मिलने वाले सरकारी लाभ ले रहे हैं?
अगर आँकड़े को देखें तो यह बात सच साबित होती है। जैसा कि सेल्वारानी मामले में सेल्वारानी ने खुद के ईसाई होने की बात छुपाते हुए नौकरी पाने के लिए खुद को हिंदू और SC समुदाय का होना बताया था। झारखंड में चुने गए ईसाई एवं मुस्लिम विधायकों की संख्या कान खड़े करने वाले हैं और सरकार को आत्ममंथन के लिए विवश करने वाले हैं कि वह इस पर नीतिगत निर्णय ले।
झारखंड में इस बार कुल 81 सीटों में से 30 पर जनजातीय समाज के विधायक जीते हैं। इनमें से 28 सीटें आरक्षित हैं, जबकि भाजपा के बाबूलाल मरांडी और झारखंड मुक्ति मोर्चा की कल्पना सोरेन सामान्य सीटों से विधायक बने हैं। इन्हीं आरक्षित सीटों में ईसाई समाज के 8 विधायक भी जीते हैं। जाहिर है कि आरक्षित सीटों पर ईसाई समाज कब्जा जमा रहा है। इनमें से एक तिहाई पर उसने कब्जा कर भी लिया।
अगर मुस्लिम विधायकों की बात करें तो जामताड़ा से हराकर इरफान अंसारी ने सीता सोरेने और मधेपुर से हफीजुल हसन ने गंगा नारायण सिंह को हराया है। राजमहल सीट पर मोहम्मद ताजुद्दीन ने अनंत ओझा को हराया है। राजमहल स्वतंत्र सीट बनने के बाद पहली बार कोई मुस्लिम महिला जीती है। इससे पहले यहाँ से ईसाई समुदाय के विधायक जीतते थे। वहीं, पाकुड़ सीट पर पूर्व मंत्री आलमगीर आलम की बीवी निशत आलम जीती हैं।
किसी की जनसंख्या सिर्फ चार प्रतिशत होते हुए, आठ विधायकों को चुनना सामान्य बात नहीं है। जैसे-जैसे झारखंड में धर्मांतरित हो रहे हैं, वहाँ से भाजपा और संघ का प्रभाव भी खत्म होता जा रहा है, जैसा कि इस विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला। ईसाई विधायकों की जीत पर खुश ऑल इंडिया क्रिश्चियन माइनॉरिटी फ्रंट ने INDI गठबंधन को बधाई भी दी।
पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष करिया मुंडा ने पिछले साल माँग की थी कि अनुसूचित जनजाति समाज के जो लोग इस्लाम या ईसाई में धर्मांतरण करते हैं, उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने कहा था कि धर्मांतरित लोग अपना धर्म ही नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पूजा-पाठ के तरीके को त्याग कर दिए हैं।
पूर्व लोकसभा उपाध्यक्ष ने कहा था कि जिस तरह अनुसूचित जाति (SC) समाज के धर्मांतरित लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, उसी तरह से ST समुदायों के लोगों को भी यह लाभ नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने सरकार से माँग की थी कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) पर एक समान कानून लागू होना चाहिए।
दरअसल, संविधान का अनुच्छेद 341 अनुसूचित जाति के उन लोगों को आरक्षण का लाभ देता है, जो हिंदू (बौद्ध, जैन, सिख सहित) हैं। किसी दूसरे धर्म को अपनाने वालों को नहीं। हालाँकि, अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियों के लिए ऐसा प्रावधान नहीं है। इस कारण से धर्मांतरित जनजातीय लोग उन हिंदू जनजातीय लोगों के कोटा का लाभ उठाते हैं, जो अपने धर्म से दूर नहीं गए हैं।
विभिन्न तरह का लाभ लेने के लिए अपने धर्म को छिपाने की प्रवृत्ति जनजातीय समाज में भी देखने को मिल रही है, जबकि उन पर इस तरह का का कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके पीछे ईसाई मिशनरियों की यह मंशा हो है कि वे अपनी वास्तविक आबादी को छुपाए रखें, ताकि उन पर सरकार की नजर ना पड़े या हिंदू संगठनों एवं लोगों का कोपभाजन नहीं बनना पड़े।
भाजपा नेता करिया मुंडा ने कहा था कि देश में जनजातीय आबादी करीब 8.5 करोड़ है, जिनमें से 80 लाख ईसाई और 12 लाख मुस्लिम हैं। उन्होंने साफ तौर पर आशंका जाहिर की थी कि धर्मांतरण करने वाले जनजातीय लोगों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि वे अपने धर्म परिवर्तन के बारे में खुलकर नहीं बोलते हैं।
मुंडा ने यह भी कहा था कि जब जनजातियों को मिलने वाले लाभ की बात आती है तो ये धर्मांतरित लोग सबसे आगे होते हैं। करिया मुंडा का पिछले साल दिया गया बयान इस बार के विधानसभा चुनावों में चुने गए ईसाई एवं मुस्लिम विधायकों की संख्या से भी साफ पता चलती है। इतना ही नहीं, इससे यह भी पता चलता है कि जो लोग धर्मांतरित हो चुके हैं, वे अब भी खुद को ST ही बताते हैं।
सिर्फ झारखंड में ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र आदि जगहों पर जनजातीय समाज की महिलाओं से ईसाई या मुस्लिम समाज के लोग निकाह कर लेते हैं। इसके बाद जनजातीय समाज के लिए आरक्षित सीटों पर उस महिला को चुनाव लड़ाकर परोक्ष रूप से राजनीति को नियंत्रित करते हैं। पंचायत चुनावों में ऐसी कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।
इसके अलावा, जनजातीय समाज की इन महिलाओं के नाम पर जमीनों की खरीद-बिक्री आदि भी की जाती है। इस तरह डेमोग्राफी को बदलने के साथ-साथ प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जनजातीय समाज को मिलने वाले लाभों को हथियाने की कोशिश की जाती है। अब समय आ गया है कि सरकार SC के लिए लागू नियम को ST पर भी लागू करे और धर्मांतरित लोगों को आरक्षण आदि लाभों से वंचित करे।