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6 हुड़दंगी किसान घायल, हरियाणा पुलिस ने दागे आँसू गैस के 21 गोले, चलाई प्लास्टिक की गोलियाँ भी: शंभू बॉर्डर पर उत्पात मचाते किसानों से पुलिस की झड़प

पंजाब-हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर किसानों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। शुक्रवार (6 दिसंबर 2024) को दिल्ली कूच के लिए निकले किसानों का पहला जत्था पुलिस द्वारा रोके जाने पर आक्रोशित हो उठा। किसानों ने बैरिकेड तोड़ते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की, जिसके जवाब में हरियाणा पुलिस ने आँसू गैस के 21 गोले दागे। इसके अलावा प्लास्टिक की गोलियों का भी इस्तेमाल किया गया, जिसमें छह किसान घायल हो गए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, फरवरी से शंभू बॉर्डर पर धरने पर बैठे किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी और अन्य माँगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। किसानों ने ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन के तहत पैदल मार्च की घोषणा की थी। इस बार 101 किसानों का पहला जत्था बिना ट्रैक्टर-ट्रॉली के दिल्ली की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा था। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरिकेड्स, कंटीले तार और लोहे की कीलें लगाई थीं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोपहर करीब एक बजे किसान आगे बढ़ने लगे और बैरिकेड्स को तोड़ दिया। इस पर पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े और प्लास्टिक की गोलियाँ दागी। पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना पड़ा। मौके पर तैनात अर्धसैनिक बल और ड्रोन से स्थिति पर नजर रखी जा रही है।

अब तक छह किसान घायल हुए हैं, जिनमें दो को आँसू गैस के गोले और चार को प्लास्टिक की गोलियों से चोटें आई हैं। एक प्रदर्शनकारी को पुलिस ने हिरासत में लिया है। शंभू बॉर्डर और आसपास के इलाकों में इंटरनेट सेवाएँ 9 दिसंबर तक के लिए बंद कर दी गई हैं। प्रशासन का कहना है कि इससे अफवाहों पर लगाम लगेगी और कानून-व्यवस्था बनाए रखना आसान होगा।

किसान नेताओं ने इसे शांतिपूर्ण मार्च बताया और हरियाणा प्रशासन द्वारा उन्हें रोकने की निंदा की। किसान नेता सरवन सिंह पंधेर ने कहा, “हम अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह आंदोलन शांतिपूर्ण है, लेकिन हमें जानबूझकर भड़काने की कोशिश की जा रही है।”

वहीं, हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने कहा, “किसानों को दिल्ली जाने की अनुमति नहीं दी गई है। बिना अनुमति के उन्हें आगे बढ़ने देना कानून का उल्लंघन है।” अंबाला प्रशासन ने धारा 144 लागू कर पाँच से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी है।

ये हैं माँगें…

किसान अन्य माँगों के अलावा फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी के लिए दबाव बना रहे हैं। उनकी माँगों की सूची में बिजली दरों में बढ़ोतरी पर रोक, 2021 लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय और किसानों और मजदूरों की आजीविका में सुधार के लिए अतिरिक्त सुधार भी शामिल हैं। किसान संगठन 2021 की लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय, भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 को बहाल करने और 2020-21 में पिछले आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों को मुआवजा दिए जाने की भी माँग कर रहे हैं।

राज्यसभा में कृषि मंत्री का बड़ा ऐलान

दूसरी तरफ केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बड़ा ऐलान कर दिया है। शुक्रवार को राज्यसभा में कहा कि पीएम मोदी सरकार सभी कृषि उपजों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदेगी। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री चौहान ने प्रश्नकाल के दौरान किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के मुद्दे पर पूरक प्रश्नों का उत्तर देते हुए यह आश्वासन दिया है। इसके पहले शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि ढाई गुना और 3 गुना एमएसपी बढ़ाया है तो नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने बढ़ाया है और जब उधर (विपक्ष) की सरकार थी तो ये खरीदते नहीं थे, केवल एमएसपी घोषित करते थे।

इस बीच, कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने कहा, “किसानों के लिए अपने मुद्दों पर बातचीत करने के लिए दरवाजे खुले हैं। मैं भी उनका भाई हूँ और अगर वे आना चाहते हैं तो दरवाजे खुले हैं, अगर वे चाहते हैं कि हम उनके पास जाएँ तो हम उनके बीच जाकर बातचीत करेंगे।”

शंभू बॉर्डर पर स्थिति तनावपूर्ण

शंभू बॉर्डर पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। पुलिस लगातार वीडियोग्राफी कर रही है और किसानों को शांत रहने की अपील कर रही है। हालाँकि, किसान पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अंबाला के कई इलाकों में स्कूल बंद कर दिए गए हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर यातायात बाधित है। किसान नेताओं का कहना है कि यह आंदोलन लंबा चलेगा और वे अपनी माँगें पूरी करवाकर ही वापस लौटेंगे। किसानों का आंदोलन और दिल्ली कूच की कोशिश ने शंभू बॉर्डर पर हालात को जटिल बना दिया है।

184 साल पहले आए अमेरिकी पादरी, नागा ‘संस्कृति’ को बताया पाप… अब नागालैंड में ‘चावल वाली बियर (जो है वहाँ की संस्कृति)’ पर चर्चों ने मचा रखा है बवाल

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य नागालैंड के मशहूर पारंपरिक ‘हॉर्नबिल महोत्सव’ के 25वें संस्करण की शुरुआत हो चुकी है। ये उत्सव न केवल नागालैंड की अद्वितीय संस्कृति का अनुभव देता है बल्कि इसके जरिए नागालैंड की विभिन्न जनजातियों के रीति-रिवाजों, भोजन, गीतों और नृत्यों के बारे में भी लोगों को जानने का मौका मिलता है।

10+ दिवसीय चलने वाले इस महोत्सव में देश-विदेश से लाखों लोग पहुँचते हैं और यह राज्य का सबसे बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम भी माना जाता है। पूरे प्रदेश में इस महोत्सव को लेकर उत्साह रहता है लेकिन इस बार ये आयोजन कुछ ईसाई ताकतों के कारण काफी विवादों में हैं। ऐसा क्यों आइए बताएँ…

नागा संस्कृति में राइस बियर का महत्व

दरअसल, नागालैंड की संस्कृति में और हॉर्नबिल महोत्सव में ‘राइस बियर’ एक महत्वपूर्ण पेय पदार्थ माना जाता है। इसे नागालैंड के लोग पारंपरिक शराब के रूप में समारोहों में वितरित करते हैं। ये समारोह फिर चाहे सामाजिक हो या सांस्कृतिक, हर जगह ‘राइस बियर’ का महत्व होता है। कहीं इसे बांस से बने ग्लास में दिया जाता है तो कहीं किसी व्यंजन के साथ मिश्रित करके इसका सेवन होता है।

नागालैंड की जनजातियों में और यहाँ बाहर से आने वाले लोगों में चूँकि इस पेय पदार्थ का क्रेज सबसे अधिक है। इसकी महत्वता को देखते हुए नागालैंड सरकार ने इस पर निर्णय लिया कि वो राज्य में पूर्ण रूप से प्रतिबंधित शराब के सख्त कानूनों में थोड़ी रियायत देंगे और इस महोत्सव में भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) की बिक्री की अनुमति होगी। इस संबंध में पर्यटन मंत्री तेम्जेन इम्ना अलोंग ने भी बयान दिया कि यह कदम पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए उठाया गया है।

अब ये भली-भाँति जानते हुए कि राज्य में ये छूट केवल राजस्व बढ़ाने के लिए नहीं दी गई बल्कि जनजातीयों की संस्कृति को देखते हुए दी गई है, चर्चों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने इस पूरी छूट को इस एंगल से बयान दिया कि सुनने वालों को लगे कि सरकार तो राज्य में शराब को बढ़ावा दे रही है। जबकि हकीकत यह है कि राइस बियर जैसे चीजें नागा संस्कृति का हिस्सा रही है इसलिए इसपर विचार किया जा रहा है और वहीं चर्च इस पर आपत्ति इसलिए जता रहा है क्योंकि उनके मुताबिक जनजातीयों का पारंपरिक पेय जल का सेवन सामाजिक और नैतिक रूप से गलत है।

रिपोर्ट्स के अनुसार नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (NBCC) ने कहा कि पर्यटक नागालैंड आने का मुख्य कारण उसकी संस्कृति और विरासत का अनुभव करना है, न कि शराब पीना। NBCC ने जनजातीय समुदाय के इस महोत्सव में पारंपरिक शराब का विरोध करने के क्रम में ये कहकर भी डराया है कि यदि राज्य में शराब की बिक्री को बढ़ावा दिया गया तो इसके दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं।

नागा संस्कृति पर हावी ईसाई आबादी और उनके नियम

गौरतलब है कि नागालैंड में बहुसंख्य आबादी ईसाइयों की इसलिए ईसाई ताकतें चाहती हैं कि हर नियम उनके अनुसार बनें और अन्य जातियाँ भी उन्हीं के बनाए नियमों के अनुरूप रहें। इन्हीं ईसाई ताकतों के दबावों में करीबन 35 साल पहले राज्य में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था और आज भी वो ताकतें किसी तरह के बदलावों के लिए तैयार नहीं है। नागालैंड में चर्चों का आज भी यही सोचना है कि अन्य जनजातियाँ उनके हिसाब से चलें। भले ही इस दबाव में उनकी अपनी संस्कृति हमेशा के लिए खत्म कर दें मगर सुनें उनकी हीं।

184 साल पहले आए अमेरिका से हुई थी बैप्टिस्टों की नागालैंड में एंट्री

केवल जानकारी के लिए बता दें कि भले ही चर्चा और महिला संगठनों के दबाव में आधिकारिक तौर पर राज्य में पूर्ण शराबबंदी 1989 में की गई थी। लेकिन नागालैंड में ईसाई ताकतों की घुसपैठ 1870 से शुरू हो गई थी। रिपोर्ट बनाती हैं कि 1870 में जब नागालैंड में अमेरिकी बैप्टिस्ट आए तो उन्होंने शराब को पाप बताया और धर्म परिवर्तन करने वालों के लिए सख्त दंड का प्रवाधान किया। इसके बाद जो कोई भी ऐसा करता वहाँ पकड़ा जाता था उसे समुदाय से निकालकर सजा दी जाती थी। आज उसी प्रभाव का नतीजा है कि राज्य की आबादी 87% ईसाई है।

वाराणसी के यूपी कॉलेज में अवैध मस्जिद को लेकर छात्र गुस्साए, जुमे की नमाज के खिलाफ प्रदर्शन: कहा- हम पढ़ेंगे हनुमान चालीसा

वाराणसी में स्थित उदय प्रताप कॉलेज के बाहर छात्रों के बड़े समूह ने अवैध रूप से मस्जिद के खिलाफ प्रदर्शन किया है। यूपी कॉलेज की जमीन पर बनी इस मस्जिद पर वक्फ बोर्ड अपना दावा ठोंक रहा था। कॉलेज कैम्पस के बाहर छात्र इसके खिलाफ जुटे और वह मस्जिद को हटाए जाने की माँग कर रहे हैं।

शुक्रवार (6 दिसम्बर, 2024) को सैकड़ों छात्रों ने यूपी कॉलेज के बाहर भगवा झंडे लेकर प्रदर्शन किया। इन्होने माँग की कि यहाँ जुमे की नमाज अदा करने के लिए इकट्ठा हुआ नमाजियों को रोका जाए। छात्रों ने कहा कि अगर नमाजी यहाँ पर नमाज अदा करेंगे तो वह भी हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे।

इन छात्रो में बड़े छात्र नेता भी शामिल हैं। उन्होंने भगवा झंडों के साथ यूपी कॉलेज के बाहर प्रदर्शन किया। छात्रों ने कहा कि मस्जिद कमिटी के पास यूपी कॉलेज की जमीन का कोई भी मालिकाना हक़ नहीं है, इसके बाद भी वह यहाँ नमाज पढ़ने पर अड़े हुए हैं। गुस्साए छात्रों ने इस कॉलेज के बाहर लगाई गई पुलिस की बैरीकेडिंग तोड़ दी।

इससे पहले भी मंगलवार (3 दिसम्बर, 2024) को भी यूपी कॉलेज के भीतर छात्रों ने हनुमान चालीसा का पाठ किया था। तब भी छात्रों की पुलिस से झड़प हुई थी। कई छात्रों को इस दौरान पुलिस हिरासत में लिया था। वहीं पुलिस ने मस्जिद को लेकर भड़काऊ बयान पर मुख्तार अहमद, गुलाम रसूल समेत 12 लोगों पर FIR दर्ज की है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड ने यूपी कॉलेज की जमीन पर अपना दावा ठोंका था। यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के सहायक सचिव आले अतीक ने वक्फ एक्ट 1995 के तहत 2018 में कॉलेज प्रबंधक को नोटिस भेजा।

नोटिस में वसीम अहमद निवासी भोजूबीर तहसील सदर, वाराणसी ने कहा है कि ग्राम छोटी मस्जिद नवाब टोक मजारात हुजरा उदय प्रताप कॉलेज भाेजूबीर की संपत्ति कॉलेज के नियंत्रण में है। इसे सुन्नी बोर्ड कार्यालय में पंजीकृत कराया जाए। नोटिस में आगे कहा गया कि 15 दिनों में जवाब दें। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन की बात नहीं सुनी जाएगी।

इसका जवाब देते हुए उदय प्रताप शिक्षा समिति के तत्कालीन सचिव यूएन सिन्हा ने कहा था कि यूपी कॉलेज की स्थापना 1909 में हुई है। कॉलेज की जमीन इंडाउमेंट ट्रस्ट की है और चैरिटेबल इंडाउमेंट एक्ट के तहत आधार वर्ष के बाद ट्रस्ट की जमीन पर किसी का मालिकाना हक खुद समाप्त हो जाता है। हालाँकि, वक्फ बोर्ड ने इस सम्पत्ति पर से अपना दावा छोड़ दिया है।

राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने 115 साल पहले किया था स्थापित

यूपी कॉलेज करीब 500 एकड़ में फैला है। इसके द्वारा प्रदेश में डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज, रानी मुरार बालिका स्कूल, राजर्षि शिशु विहार, राजर्षि पब्लिक स्कूल संचालित किया जाता है। इन सबमें करीब 20,000 विद्यार्थी पढ़ाई करते हैं। उदय प्रताप कॉलेज की स्थापना लगभग 115 साल पहले सन 1909 में भिनगा (बहराइच, उत्तर प्रदेश) के राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव ने की थी।

प्रिंसिपल के रूप में 1 नवंबर,2001 को कार्यभार सँभालने वाले डॉक्टर डीके सिंह ने कहा कि इस मामले का उन्होंने संज्ञान लिया था। उन्होंने कहा, “कार्यभार सँभालने के बाद हमारे छात्रों ने बताया किया कि कुछ लोग मस्जिद में निर्माण कार्य कर रहे है। वे लोग निर्माण करने के लिए रात में बालू और सीमेंट जबरदस्ती ला रहे थे। हालाँकि, सुरक्षाकर्मियों ने इसका विरोध किया था।”

प्रिंसिपल ने आगे बताया कि उन्होंने इसकी सूचना तुरंत पुलिस-प्रशासन को दी और निर्माण सामग्री को मस्जिद से बाहर निकाला गया। उन्होंने बताया कि इसके कुछ दिनों के बाद सूचना मिली कि कॉलेज की बिजली लाइन से मस्जिद में बिजली का इस्तेमाल हो रहा है। इसका बिजली बिल कॉलेज को देना पड़ता था।

प्रिंसिपल ने बताया, “लगभग एक साल पहले हमने मस्जिद का बिजली कनेक्शन कटवा दिया।” रिपोर्ट के मुताबिक, उदय प्रताप कॉलेज परिसर में मस्जिद और मज़ार का निर्माण समाजवादी पार्टी की पिछली सरकार की शह पर किया गया था। कॉलेज प्रशासन का कहना है कि ये निर्माण पूरी तरह अवैध है।

मुंबई पुलिस पर ईरानी गैंग का हमला, तीन अधिकारी घायल: पहले भी ईरानियों के इलाके में हो चुके हैं वर्दी पर हमले

मुंबई में बुधवार (5 दिसंबर 2024) की रात ईरानी गैंग के करीब 20 लोगों ने पत्थरबाजी कर पुलिस पर जानलेवा हमला कर दिया। इस हमले में तीन पुलिसकर्मी – सहायक पुलिस निरीक्षक यशवंत पावले, हनुमंत पुजारी और सुनील लोखंडे गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना अंबिवली रेलवे स्टेशन के पास हुई, जब पुलिस ने एक 20 वर्षीय चेन स्नैचर को गिरफ्तार किया था।

चेन स्नैचरों को छुड़ाने के लिए पुलिस पर हमला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने चेन स्नैचिंग के एक मामले में आरोपित ओनु लाला ईरानी को गिरफ्तार किया था। आरोपित ओनु लाला ईरानी को अंबिवली रेलवे स्टेशन लाया जा रहा था, तभी ईरानी गैंग के सदस्य अचानक वहाँ इकट्ठा हो गए। उन्होंने रेलवे ट्रैक से पत्थर उठाकर पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया। इस हमले के दौरान तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए, जिन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया।

हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें गैंग के सदस्य ट्रैक से पत्थर उठाकर पुलिस पर फेंकते दिख रहे हैं। हमले के दौरान, आरोपित ओनु लाला ईरानी पुलिस की गिरफ्त से फरार हो गया। गैंग के सदस्यों ने रेलवे कार्यालय को भी नुकसान पहुँचाया।

मुंबई पुलिस ने अब तक चार आरोपितों को हिरासत में लिया है और पाँच नाबालिगों की भी पहचान की है। कल्याण रेलवे पुलिस के वरिष्ठ निरीक्षक पंधारी कांडे ने बताया कि 15-20 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। इन पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं और रेलवे अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने बीएनएस और रेलवे एक्ट के तहत धारा 109(1), 132, 121(1), 189(2), (3), (5), 262, 263, 352, 351(1) और 3(5) में मामला दर्ज किया है।

ईरानी बस्ती में पुलिस पर पहले भी हुए हैं हमले

  • अगस्त 2022: डीएन नगर पुलिस स्टेशन की टीम को इतिहासशीटर फिरोज फैयाज़ खान को गिरफ्तार करने के दौरान हमला झेलना पड़ा।
  • 2019: चार चोरों को पकड़ने गई पुलिस टीम पर पत्थर और बोतलों से हमला किया गया।
  • अप्रैल 2017: एक चेन स्नैचर को पकड़ने के दौरान 25 लोगों की भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया और एक पुलिसकर्मी पर केरोसिन डालकर जलाने की कोशिश की।

सहायक पुलिस निरीक्षक यशवंत पावले ने बताया कि 1 नवंबर को दर्ज मामले में सीसीटीवी और तकनीकी जानकारी से आरोपित की पहचान हुई थी। उसे गिरफ्तार करने के लिए ईरानी बस्ती में ऑपरेशन चलाया गया था। पुलिस अब गैंग के अन्य सदस्यों की गिरफ्तारी के लिए सघन तलाशी अभियान चला रही है।

मंदिर की माँग करने वाला हिंदू ‘तानाशाह-अत्याचारी’, हिंदू हमेशा कानून के खिलाफ: सुप्रीम कोर्ट से रिटायर जज सुप्रीम कोर्ट के ही राम मंदिर फैसले पर रोए

सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवम्बर, 2019 को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का पटाक्षेप कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने लगभग एक दशक तक सुनवाई करने के बाद इस दिन हिन्दू पक्ष में फैसला दिया था। इसको लेकर लम्बे समय तक देश के बुद्धिजीवी और कट्टरपंथी वर्ग ने रोना-धोना किया था। इसके बाद मंदिर भी बन गया और लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं ने दर्शन भी कर लिए। लेकिन जिस तरह पुरवाई हवा चलने पर पुराना दर्द उठ पड़ता है, उसी तरह अब भी कभी-कभार लिबरल जमात के मन में यह हूक उठती ही रहती है।

राम मंदिर के फैसले को लेकर विलाप करने वालों में नया नाम उसी बिरादरी से है, जिसने उसे बनाने का फैसला दिया था। कॉन्ग्रेस सरकार में देश के सॉलिसिटर जनरल रहे और बाद में सुप्रीम कोर्ट में जज बने रोहिंटन नरीमन ने एक लेक्चर के दौरान राम मंदिर पर दिए गए फैसले की आलोचना की है। उन्होंने इसे ‘न्याय का मजाक’, सेक्युलरिज्म का उल्लंघन करने वाला फैसला करार दिया, हिन्दुओं को कानून के खिलाफ रहने वाला बताया, मस्जिदों के खिलाफ याचिका डालने को दैत्य के सर की तरह बताया।

रोहिंटन नरीमन ने यह टिप्पणियाँ जस्टिस AM अहमदी मेमोरियल लेक्चर में की हैं। ये अहमदी फाउंडेशन ने आयोजित करवाया था। इसका विषय ‘धर्मनिरपेक्षता और भारतीय संविधान’ था। इसमें रोहिंटन नरीमन समेत तमाम जजों को बुलाया गया था। नरीमन ने यहाँ इस कार्यक्रम का पहला लेक्चर दिया। उनके लेक्चर की गाड़ी संविधान के अलग-अलग प्रावधानों, सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और AM अहमदी की बात करते हुए राम मंदिर मामले और लिबरल रोने-धोने की तरफ मुड़ गई।

रोहिंटन नरीमन ने कहा कि यह पूरा मसला 1984 में विश्व हिन्दू परिषद की राम मंदिर बनाने की माँग को ‘तानाशाही’ और ‘अत्याचारी’ माँग से चालू हुआ था। यानि अपने आराध्य देव के पूजास्थल की माँग करना नरीमन के लिए तानाशाही की बात है। वह इस दौरान यह भी भूल गए कि VHP ने सिर्फ अपनी माँग कानूनी रूप से उठाई थी, यह अत्याचार कैसे हो सकता है। अत्याचार तो मंदिर का विध्वंस था। मंदिर के लिए लड़ाई सदियों पहले से चल रही थी।

उनके लिए शायद यह सब कहना बहुत आसान है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह जिस समुदाय से आते हैं, उसके खिलाफ भारत में कभी कोई अन्याय नहीं हुआ। लेकिन हाँ, उन्हें ये जरूर याद करना चाहिए कि उनके पुरखे पर्शिया से क्यों भागे थे। उनको ना याद हो, मैं बता देता हूँ। यहाँ इस्लाम का कानून नाफ़िज हो गया था, इसलिए पारसी भारत आ गए थे और सैकड़ों सालों से अपने धर्म को स्वतंत्रतापूर्वक मान रहे हैं। उन्हें शरण भी इन्हीं ‘अत्याचारी’ और ‘तानाशाह’ VHP वालों के पुरखों ने ही दी थी।

इसके बाद नरीमन ने राम मंदिर के मामले में हिन्दू पक्ष को हमेशा कानून के खिलाफ रहने वाला भी करार दिया। जबकि असल बात ये है कि यदि हिन्दू पक्ष कानून के खिलाफ रहता तो बाबरी 6 दिसम्बर, 1992 तक खड़ी ही ना रह पाती और मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी, 2024 को ना होती। हिन्दू पक्ष ने तो इस मामले में अंग्रेज न्यायाधीशों से लेकर जिला अदालत, हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी। वो तो कानून से मंदिर मांगते रहे और इसी कानून के अनुसार मंदिर बनाया। इस बीच उनके आराध्य को ‘काल्पनिक’ तक बताया गया।

अगर हिन्दू कानून के खिलाफ होते तो आज देश में बहुसंख्यक होने के बाद भी वह कश्मीर से भाग नहीं रहे होते। अगर हिन्दू कानून के खिलाफ होते तो काशी मथुरा का मामला कोर्ट में अटका नहीं होता। खैर पीढ़ी दर पीढ़ी वकालत का पेशा अपनाने वाले नरीमन साहब को यह सब कैसे पता होगा। वह तो जन्म से लेकर अब तक उस ‘बबल’ में रहते होंगे जिसका नाम ‘लिबरल जमात’ है। नरीमन ने हिन्दुओं को कानून के खिलाफ तो पाया ही इस बात पर भी बड़ी निराशा जताई कि बाबरी गिराने के एवज में उसी राम जन्मभूमि के सीने पर मस्जिद दुबारा क्यों नहीं खड़ी की गई।

मस्जिद ना तामीर किए जाने को नरीमन ने ‘न्याय के साथ भद्दा मजाक‘ बताया और कहा कि यह भरपाई होती। शायद नरीमन साहब को यह नहीं पता कि असल भरपाई तो राम मंदिर का निर्माण ही है। उन्हें एक ढाँचे के गिराए जाने की भरपाई याद है लेकिन जो अन्याय हिन्दुओं के साथ सैकड़ों साल तक हुआ है उसकी भरपाई की उन्हें चिंता नहीं है। नरीमन का कहना है कि फैसले में ‘सेक्युलरिज्म’ का ध्यान नहीं रखा गया। यानी सेक्युलरिज्म का ध्यान तब होता जब हिन्दू अपना दावा छोड़ कर चुप चाप बैठ जाते।

माफ़ करिए नरीमन साहब। आप पारसी समुदाय के पादरी हैं। आपको आपके पिता ने छोटी उम्र से आपके धर्म के बारे में सिखाना चालू कर दिया था। आपसे कोई आपके धार्मिक स्थल छोड़ने को कहे तो कैसे लगेगा। तब आप सेक्युलरिज्म की दुहाई देंगे? नहीं देंगे! इसलिए हम भी सेक्युलरिज्म की खातिर अपने धर्म को नहीं छोड़ेंगे। लेक्चर के दौरान रोहिंटन नरीमन के दुख का स्तर इसके बाद धीमे-धीमे बढ़ता ही गया।

उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा समेत भाजपा और VHP के नेताओं को बरी किए जाने पर दुख जताया और उस जज को लानतें भेजी, जिसने यह फैसला सुनाया था। उन्होंने कहा कि उस जज को यूपी में एक पद दिया गया, जिसने इन नेताओं को बरी किया था। अरे नरीमन साहब! एक निचली अदालत के जज को कहीं नियुक्त किए जाने पर इतनी समस्या? आपके पिता जी सरकारी वकील रहे, आप भी रहे, जज बने फिर एक जज से इतनी समस्या।

और शायद ही ऐसा कोई दिन होता हो जब हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अपने यहाँ के रिटायर्ड जज को किसी कमिटी और मध्यस्थता में नहीं शामिल करते हों। इस कानूनी रोजगार गारंटी योजना पर हजारों सवाल खड़े हुए हैं। लेकिन आपने कभी उस पर प्रश्न उठाए। कभी आपने उस कॉन्ग्रेस से सवाल पूछा जिसका एक नेता बहरुल इस्लाम पहले राज्य सभा का सदस्य बना फिर गुवाहाटी हाई कोर्ट में जज बना दिया गया, कुछ ही महीने में यहाँ का चीफ जस्टिस बन गया और यहाँ से भी रिटायर हुआ तो उसे सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया गया।

पहली बात तो निचली अदालत के जज को उपलोकायुक्त बनाए जाने में कोई दिक्कत नहीं थी। फिर अगर आपको नैतिकता का मसला लगता है तो आखिर क्यों आप बाकियों पर सवाल नहीं उठाते। शायद ये जज आपके निशाने पर इसलिए था क्योंकि उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी समेत बाकी हिन्दुओं के लिए बात करने वाले नेताओं को जेल में नहीं डाला। तो समझिए महाराज! ये इमरजेंसी का दौर नहीं है। आपका इगो ना हर्ट हो, सिर्फ इसके लिए कोई जेल नहीं भेजा जाएगा।

घंटों तक पानी पी-पी कर बोलने के बाद रोहिंटन नरीमन का असल दुख बाहर आ गया। वह इस बात पर वह खासे फ्रस्टेटेड नजर आए कि आखिर अब कोर्ट में उन मस्जिदों के खिलाफ याचिकाएँ क्यों पड़ रही हैं, जो संभवतः मंदिरों को तोड़ कर बनाई गई हैं। उन्होंने इन याचिकाओं को ‘हाईड्रा हेड्स’ करार दिया। हाईड्रा ग्रीक मान्यता में एक ऐसा समुद्री दैत्य था जिसके कई सर थे। यानी अपने अधिकार के लिए लड़ने वाले हिन्दुओं को रोहिंटन नरीमन ने दैत्य करार दिया है।

नरीमन का कहना है कि अब 1991 का कानून सख्ती से लागू कर दिया जाए, जिसके तहत कोई भी हिन्दू इतिहास में अपने धार्मिक स्थल के साथ हुई बर्बरता के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटा सकता है। उन्होंने कहा कि तभी हम सहिष्णु हो पाएँगे। भाईसाहब! आपको सहिष्णु होना है, हो जाइए। संविधान में अधिकार है। लेकिन हम अपने मंदिरों की कीमत पर सहिष्णु कहलाने का टैग नहीं खरीदेंगे। आपका सहिष्णुपना आपको मुबारक हो।

रोहिंटन नरीमन की राम मंदिर के खिलाफ फैसले पर खीझ क्यों है, यह उनके पिता और देश के बड़े वकीलों में शुमार रहे फली एस नरीमन की बातों से भी समझ आता है। फली एस नरीमन को इस बात से दिक्कत थी कि एक हिन्दू संत को यूपी का मुख्यमंत्री क्यों बनाया गया। खुद रोहिंटन नरीमन ने भी ऋग्वेद का उद्धरण देते हुए सनातन परंपरा में महिलाओं की प्रतिष्ठा के संबंध में विवादास्पद टिप्पणी की थी। एक बार किसी दूसरे मजहब की किताब पर ऐसी टिप्पणी करके उन्हें देखना था, सारी सहिष्णुता सामने आ जाती।

₹3146337 करोड़ की कंपनी का CEO, गोली मार कर हत्या… लड़की से बतियाने के चक्कर में फँस गया हत्यारा

अमेरिका की सबसे बड़ी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी यूनाइटेड हेल्थकेयर के सीईओ ब्रायन थॉम्पसन की 4 दिसंबर को मिडटाउन मैनहट्टन में गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह हमला हिल्टन होटल के बाहर हुआ, जहाँ सुबह करीब 6:40 बजे एक अज्ञात बंदूकधारी ने बेहद नजदीक से गोली चलाई। थॉम्पसन को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

पुलिस के अनुसार, हत्या सुनियोजित थी। संदिग्ध ने गोली मारने के बाद ई-बाइक पर घटनास्थल से भागने की कोशिश की। गोलीबारी के दौरान उसकी बंदूक जाम हो गई थी, लेकिन उसने बंदूक को तुरंत ठीक किया और फिर से फायर किया। इसका मतलब है कि हत्यारा पूरी तरह से ट्रेंड था और वो शांत दिमाग से काम कर रहा था। अपना काम करने के बाद वह मौके पर घबराए बिना बच निकला। सुराग के लिए जाँच अधिकारियों ने कई सीसीटीवी फुटेज खंगाले।

पता चला कि संदिग्ध ने अपर वेस्ट साइड के एक हॉस्टल में नकली ड्राइवर लाइसेंस का उपयोग कर चेक-इन किया था। घटना से पहले उसे स्टारबक्स में भी देखा गया, जहाँ उसने कॉफी का ऑर्डर दिया और फिर क्राइम सीन की ओर बढ़ गया।

फ्लर्टिंग की वजह से सामने आ गया चेहरा

हत्यारा भले ही प्लानिंग कर अपने काम को अंजाम देने में माहिर था, लेकिन फ्लर्टिंग ने उसकी पहचान उजागर कर दी। होटल में ही काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने पुलिस को बताया कि संदिग्ध ने मास्क पहन रखा था। बातचीत के दौरान महिला ने छेड़छाड़ भरे लहजे में उसे मास्क उतारने को कहा। महिला के साथ हंसी-मजाक में उसने मास्क नीचे कर लिया, जिससे उसका चेहरा कैमरे में कैद हो गया।

पुलिस ने इस तस्वीर को सार्वजनिक कर दिया और जनता से जानकारी माँगी है। न्यूयॉर्क पुलिस डिपार्टमेंट (NYPD) ने कहा, “यह हमला रैंडम नहीं था बल्कि यह एक टारगेटेड मर्डर था। संदिग्ध के बारे में जानकारी देने पर $10,000 का इनाम घोषित किया गया है।” भारतीय रुपये में इसकी कीमत 8.47 लाख रूपये होती है। पुलिस ने बताया कि संदिग्ध ने हमले से पहले इलाके की रेकी की थी। उसके बैग और जैकेट का विवरण भी जारी किया गया है। हालाँकि, वह अब तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर है।

अप्रैल 2021 से थे सीईओ थॉम्पसन

ब्रायन थॉम्पसन ने अप्रैल 2021 में यूनाइटेड हेल्थकेयर के सीईओ का पद संभाला था। वे 2004 से कंपनी से जुड़े हुए थे और उनकी नेतृत्व क्षमता को काफी सराहा गया था। मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ज़ ने उनकी मौत पर दुख जताते हुए इसे हेल्थकेयर इंडस्ट्री के लिए ‘अपूर्णीय क्षति’ बताया। बता दें कि यूनाइटेड हेल्थकेयर का रेवेन्यू साल 2023 में $371.6 बिलियन (3146337 करोड़ रुपये) था।

थॉम्पसन की हत्या ने अमेरिका के हेल्थकेयर क्षेत्र और हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों की सुरक्षा पर बहस छेड़ दी है। वहीं, ‘फ्लर्टिंग’ जैसी छोटी घटना से संदिग्ध की पहचान उजागर होना दिखाता है कि अपराधी कितनी भी तैयारी कर ले, लेकिन इंसानी कमजोरियाँ उसका पर्दाफाश कर सकती हैं।

मोहम्मद साहब ने 12 साल की बच्ची का महीने भर किया रेप, खुद है 2 बच्चों का अब्बा: बिहार से किडनैप कर कलकत्ता-विशाखापटनम-राँची में की हैवानियत, देता था नशे का डोज

बिहार के नवादा में पाँचवी कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा के साथ रेप का मामला सामने आया है। आरोपित की पहचान मोहम्मद साहब के तौर पर हुई है। वह पीड़िता के घर के पड़ोस में रहता था और खुद दो बच्चों का अब्बा भी है।

आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, इसी साल अक्तूबर माह में मोहम्मद साहब ने भदौनी राजा नगर मोहल्ले से 12 साल की बच्ची को किडनैप किया, उसके बाद उसे कलकत्ता, विशाखापटनम और राँची ले जाकर उसका महीने भर रेप करता रहा।

इस दौरान बच्ची को बेसुध रखने के लिए उसने उसे कई बार नशीले पदार्थ दिए और आखिर में 3 दिसंबर को बच्ची को सद्भावना चौक पर छोड़ फरार हो गया।

पीड़िता के पिता ने अब इस घटना की शिकायत पुलिस में दी है। उन्होंने बताया कि 12 साल की बेटी 27 अक्तूबर की देर शाम राशन की दुकान से कुछ खरीदने गई थी। जब काफी समय तक वह वापस नहीं लौटी तो खूब खोजबीन हुई और आखिर में नगर थाना में सूचना दी गई।

महीने भर बाद बच्ची 3 दिसंबर को घर लौटी। उसकी स्थिति ऐसी थी कि हर कोई हैरान रह गया। पूछताछ करने पर पता चला कि पड़ोस में रहने वाले मोहम्मद साहब ने उसके साथ हैवानियत की और किसी को कुछ बताने पर जान से मारने की धमकी दी गई।

इस पूरे मामले में उक्त मीडिया रिपोर्ट बताती है कि अभी आरोपित को गिरफ्तार नहीं किया गया है। पीड़ित परिवार न्याय की माँग को लेकर एसपी डीएम से गुहार लगा रहा है।

गौरतलब है कि इसी साल जुलाई में बिहार के नवादा में तीन साल की बच्ची से रेप की घटना प्रकाश में आई थी। घटना नारदीगंज थाना की थी। पुलिस की जाँच में सामने आया था कि आरोपित बच्ची को रात में सोते समय उठाकर ले गया था और उसके बाद उसने दुष्कर्म करके उसे खून से लथपथ अवस्था में फेंक दिया था।

भाजपा छोड़ो… वरना मौत: नक्सलियों ने की 2 पूर्व सरपंचों की हत्या, पत्नी के सामने उठा ले गए, बेटी ने की जिंदा छोड़ने की अपील… फिर भी नहीं पिघले

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलियों की बर्बरता एक बार फिर सामने आई है। बीजेपी से जुड़े होने के आरोप में नक्सलियों ने दो पूर्व सरपंचों की हत्या कर दी। भैरमगढ़ थाना क्षेत्र के बिर्याभूमि गाँव से सुकलु फरसा और नैमेड़ थाना क्षेत्र के मुरगा बाजार से सुखराम अवलम का अपहरण कर उन्हें मौत के घाट उतारा गया।

धमकी भरे पर्चे में बीजेपी समर्थकों को चेतावनी

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुकलु फरसा के शव के पास नक्सलियों द्वारा छोड़े गए पर्चे में साफ लिखा था कि उन्होंने कई बार बीजेपी से दूरी बनाने की चेतावनी दी थी, लेकिन फरसा ने इसे नजरअंदाज कर दिया। नक्सलियों ने फरसा पर बीजेपी के समर्थन का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें पार्टी से अलग रहने के लिए तीन बार चेताया गया था। पर्चे में साफ संदेश दिया गया कि बीजेपी से जुड़े लोग या तो पार्टी छोड़ दें या मरने के लिए तैयार रहें।

अंतिम संस्कार से लौटते समय पत्नी के सामने किया था अगवा

माओवादियों ने बिरयाभूमि गाँव के पूर्व सरपंच सुकलु फरसा का अपहरण नक्सलियों ने बीते 3 दिसंबर को उनके भतीजी के अंतिम संस्कार से लौटते वक्त आदवाड़ा इलाके से उनकी पत्नी के सामने किया था। वहीं, गडेर ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच सुखराम का नक्सलियों ने मुर्गा बाजार से अपहरण किया था। दोनों ही पूर्व सरपंच की हत्या की जिम्मेदारी नक्सलियों के भैरमगढ़ एरिया कमेटी ने ली है।

परिजनों की अपील के बाद भी ले ली जान

अपहरण के बाद सुकलु फरसा की बेटी यामिनी ने सोशल मीडिया पर भावुक अपील करते हुए अपने पिता की रिहाई की गुहार लगाई। लेकिन नक्सलियों ने न सिर्फ इस अपील को अनसुना किया, बल्कि फरसा की हत्या कर शव को गाँव के पास फेंक दिया। घटनास्थल पर गंगालूर एरिया कमेटी के नाम से पर्चा बरामद हुआ।

नक्सलियों द्वारा फेंका गया पर्चा (फोटो साभार: ETV Bharat)

बीते 3 सालों में बीजेपी से जुड़े 10 लोगों की हत्याएँ

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीते तीन सालों में अब तक 10 ऐसी हत्याएँ नक्सली कर चुके हैं, जिसमें उन्होंने मरने वालों पर बीजेपी से जुड़े होने के आरोप लगाए थे। इन ताजी हत्याओं के बाद से इलाके में डर और आक्रोश का माहौल है, और लोग माओवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। वहीं, बीजापुर जिले के एडिशनल एसपी चंद्रकांत गवर्ना ने घटना की पुष्टि की और बताया कि पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर जाँच शुरू कर दी है।

जिन ‘बंगबंधु’ ने बांग्लादेश बनाया, उनको ही नोटों से यूनुस सरकार ने हटाया: पहले राष्ट्रपति के दफ्तर से हटाई थी फोटो, कैंसिल कर दी थी उनके नाम की छुट्टियाँ

बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट कर्ट करके आई मोहम्मद यूनुस सरकार राष्ट्रपिता मुजीबुर रहमान की निशानियों को मिटाने में जुटी हुई है। इस्लामी कट्टरपंथ और पाकिस्तान की विचारधारा पर चलते हुए अब यूनुस सरकार ने बांग्लादेश की करेंसी पर से भी बंगबंधु की फोटो हटाने का फैसला कर लिया है। उनकी जगह पर जुलाई में हुए तख्तापलट की तस्वीरें नोटों पर छापी जाएँगी। इससे पहले मुजीबुर रहमान का इतिहास मिटाने के लिए और कई कारस्तानियाँ यूनुस सरकार कर चुकी है।

बांग्लादेशी मीडिया के अनुसार, देश की सेंट्रल बैंक ने नए नोटों की छपाई चालू कर दी है। सेंट्रल बैंक 100, 200, 500 और 1000 टका के नोटों की छपाई कर रही है। इनकी छपाई बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के आदेश पर हो रही है।

इन नोटों पर मुजीबुर रहमान की फोटो नहीं होगी। इनसे यह हटा दी गई है। इनकी जगह पर जुलाई-अगस्त में हुए इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रदर्शन की तस्वीरों को इन नोटों पर लगाई जाएँगी। इसके अलावा इन नोटों पर बांग्लादेश की मस्जिदों और बाकी धार्मिक स्थलों की फोटो इन पर छापी जाएगी।

यह नोट अगले 6 महीने के भीतर बाजार में आएँगे। पहले बड़े नोटों पर मुजीबुर रहमान की फोटो हटाई जा रही है, इसके बाद सभी प्रकार की करेंसी नोट पर यही नीति लागू की जाएगी। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने 29 सितम्बर, 2024 को इन नोटों की डिजाइन बदलने को लेकर सेंट्रल बैंक को कहा था, जिनकी डिजाइन अब फाइनल हो गई है।

हालाँकि, यह पहला मौका नहीं है जब बांग्लादेश की यूनुस सरकार ने मुजीबुर रहमान की स्मृतियाँ मिटाने का प्रयास किया है। इससे पहले यूनुस सरकार के एक मंत्री (एडवाइजर) महफूज आलम ने राष्ट्रपति के दफ्तर बांग्ला भवन के दरबार हॉल से मुजीबुर रहमान की फोटो हटा दी थी।

बांग्लादेश की यूनुस सरकार ने सत्ता में आते ही 8 छुट्टियों को भी रद्द कर दिया था। यह छुट्टियाँ बंगबंधु की हत्या की तारीख और बाकी घटनाओं से जुड़ी हुई थीं। यहाँ तक कि बांग्लादेश मुक्ति युद्ध से जुड़ी फोटो भी हटा दी गईं थी। यूनुस सरकार में शामिल एडवाइजर मुजीबुर रहमान को ‘फासिस्ट’ बता चुके हैं।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में मुजीबुर रहमान के साथ वही बर्ताव किया जा रहा है जो पाकिस्तान में किया जाता रहा है। पाकिस्तानी मुजीबुर रहमान से घृणा करते आए हैं, वह उन्हें पाकिस्तान तोड़ने का दोषी मानते हैं। बांग्लादेश में अब तक मुजीबुर रहमान को करोड़ों बंगालियों को मुक्ति दिलाने वाले नायक माना जाता रहा है। इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के सहारे सत्ता में आई यूनुस की अंतरिम सरकार इन सब चीजों को मिटाना चाहती है।

बोला था न उलटा-सीधा सवाल नहीं करेंगे… अवध ओझा ने बीच में छोड़ा BBC का इंटरव्यू, AAP पदाधिकारियों ने बंद करवाया कैमरा: सर सर… करता ही रह गया रिपोर्टर

मीडिया की एक वामपंथी दुकान है ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन, यानी की BBC। एक मास्टर साहब हैं अवध ओझा, जो संघ लोक सेवा आयोग यानी की UPSC की प्रतियोगी परीक्षा की कोचिंग देते हैं। एक राजनीतिक दल है आम आदमी पार्टी, यानी की AAP। वैसे हैं तो तीनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे पर कभी-कभी ‘हित’ देख एक-दूसरे की दुकान बंद कराने की भी कोशिश कर लेते हैं।

ऐसी ही एक ताजा कोशिश में AAP के पदाधिकारियों ने BBC का इंटरव्यू बीच में ही रुकवा दिया। कैमरा बंद करवा दिया। रिपोर्टर सर सर… कर अवध ओझा की मनुहार करता रह गया पर सर यह कहकर इंटरव्यू छोड़ गए कि पार्टी लाइन डिसाइड करेगी।

अवध ओझा ताजा-ताजा आपिए बने हैं। दिल्ली की ‘शिक्षा क्रांति’ से प्रभावित होकर पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की मौजूदगी में AAP का पट्टा पहना है। आप में शामिल होने से पहले UPSC की तैयारी करने वाले छात्रों के ‘ओझा सर’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैन हुआ करते थे। कहते हैं कि बीजेपी से टिकट न मिलने पर उनका मन राहुल गाँधी के लिए भी डोला। कथित तौर पर बीएसपी ने उनको टिकट भी दे दिया था। पर आखिरकार राजनीति की पाठशाला में उन्हें ठौर AAP में आकर मिला है।

इसके बाद से वे लगातार इंटरव्यू देकर अपने पुराने बयानों पर सफाई दे रहे हैं। बता रहे हैं कि क्यों वे आम आदमी पार्टी में शामिल हुए हैं। वगैरह, वगैरह। इसी क्रम में उनका एक इंटरव्यू बीबीसी के लिए अंशुल सिंह ने लिया है। बीबीसी न्यूज हिंदी के यूट्यूब पर जारी किया गया यह इंटरव्यू 8 मिनट का 31 सेकेंड का है।

शुरुआत में इंटरव्यू सही चल रहा है। अरविंद केजरीवाल को श्रीकृष्ण बताने से लेकर दिल्ली विधानसभा चुनावों में AAP की फिर से जीत की भविष्यवाणी तक अवध ओझा करते हैं। अचानक से 7 मिनट 45 सेकेंड पर पीछे से कुछ आवाज सुनाई पड़ती है। बीबीसी का रिपोर्टर पीछे मुड़ता है। एक शख्स यह कहते हुए वीडियो में सुनाई पड़ता है कि आपको मैंने बोला था न कि उलटा सीधा सवाल नहीं करने के लिए। जवाब में बीबीसी का रिपोर्टर भी हाँ कहता है।

इसके बाद बीबीसी का रिपोर्टर कहता है- नहीं सर से नॉर्मल सवाल ही कर रहे हैं। वह अवध ओझा से भी पूछता है कि सर ऐसा कोई आब्जेक्शनल सवाल आपसे क्या किया? इस पूरी बातचीत के दौरान मुंडी हिलाते रहे अवध ओझा अचानक से कहते हैं कि देखो पार्टी लाइन डिसाइड करेगी, ये तो ये लोग डिसाइड करेंगे। इतना कहकर वे माइक निकाल देते हैं और बीबीसी का कैमरा बंद हो जाता है।

इसके बाद बीबीसी ने यूट्यूब चैनल पर जो वीडियो जारी किया है उस पर लिखा आता है आम आदमी पार्टी के पदाधिकारियों ने इसके बाद यह इंटरव्यू जारी नहीं रहने दिया और रिकॉर्डिंग रुकवा दी। इसका स्क्रीनशॉट आप नीचे देख सकते हैं।

इस इंटरव्यू में बीबीसी का रिपोर्टर सबसे पहले अवध ओझा से पूछता है कि कोचिंग देते-देते वे राजनीति में कैसे आ गए? दूसरे सवाल में पूछा जाता है कि आपकी विचारधारा क्या है? फिर पूछा जाता है कि आपने AAP ही क्यों चुनी, जबकि आप बीजेपी और कॉन्ग्रेस से टिकट माँग रहे थे। दावा है कि बीएसपी ने आपको टिकट दे भी दिया था? इसके बाद अवध ओझा से उनके उस वीडियो को लेकर सवाल किया जाता है जिसमें उन्होंने सिसोदिया और केजरीवाल के शराब घोटाले में जेल जाने को लेकर टिप्पणी की थी? फिर ओझा को केजरीवाल के उस पुराने बयान के बारे में पूछा जाता है जिसमें वह आरोप लगने पर इस्तीफे की माँग करते थे।

इसके बाद बीबीसी का रिपोर्टर पूछता है कि पहले आप मोदी और राहुल गाँधी की तारीफ करते थे। आप में शामिल होने के बाद भी क्या आप इसे जारी रखेंगे? यही वो सवाल है जिसका जवाब अवध ओझा दे रहे थे जब पीछे से आकर किसी व्यक्ति ने इस इंटरव्यू को बंद करवा दिया।

बीबीसी द्वारा जारी किए गए इंटरव्यू में उस व्यक्ति का चेहरा नहीं दिखता जो पीछे से रिपोर्टर को हड़का रहा है और आगे इंटरव्यू नहीं होने देता है। लेकिन इस पूरे इंटरव्यू से यह तो साफ है कि आम आदमी पार्टी के नेता जो इंटरव्यू देते हैं वह असल में ‘फिक्स’ रहता है। रिपोर्टरों को पहले ही बता दिया जाता है कि वे किस तरह का सवाल करेंगे। किस तरह के सवाल नहीं करने हैं।