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महिला शिक्षकों का बनाता था अश्लील वीडियो, पूछता था मेरे साथ सेक्स कब करोगी: कर्नाटक कॉन्ग्रेस के महासचिव पर अपने ही स्कूल में यौन शोषण करने को लेकर FIR

कर्नाटक प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (KPCC) के महासचिव बी गुरप्पा नायडू के खिलाफ यौन शोषण का मामला दर्ज हुआ है। यह एफआईआर उसी स्कूल की एक पूर्व शिक्षिका ने कराई है जिसका संचालन नायडू खुद करता है। शिक्षिका का दावा है कि कॉन्ग्रेस नेता ने स्कूल की कई शिक्षिकाओं का रेप किया है। उनके अश्लील वीडियो बनाए हैं। उनको ब्लैकमेल करता है। नायडू इस स्कूल का चेयरमैन है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक 38 वर्षीय शिक्षिका ने इस मामले में 26 नवम्बर, 2023 को FIR दर्ज करवाई है। उसने बताया है कि 2021 से 2023 के बीच इस स्कूल में वह पढ़ाती थी। शिक्षिका ने बताया कि नायडू लगातार अपने अपने चैम्बर में बुलाता था। नायडू शिक्षिका से पूछता था कि कब वह उससे संबंध बनाने को तैयार होंगी।

FIR में शिक्षिका ने बताया कि एक दिन 2023 में एक दिन इन सबकी अति हो गई। एक दिन नायडू ने शिक्षिका को अपने चैम्बर में बुलाया और जबरदस्ती करने की कोशिश की। जब शिक्षिका ने इसका विरोध किया तो उनके साथ छेड़छाड़ की और उनको अभद्र शब्द कहे।

नायडू ने शिक्षिका को गालियाँ दी और कहा कि अगर वह उसकी बात नहीं मानती तो इसके बुरे परिणाम होंगे। शिक्षिका ने किसी तरह भाग कर खुद को बचाया। वह रोते हुए घर लौटी। इसके बाद उसने अपनी पूरी कहानी अपनी माँ को बताई और नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

शिक्षिका ने FIR में कहा, “स्कूल का चेयरमैन गुरप्पा नायडू एक मनचला है, जिसने कई शिक्षिकाओं का यौन शोषण किया है। उसने इस शोषण का वीडियो बनाया है और जब चाहे तब उनसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए ब्लैकमेल करता है। सभी शिक्षिकाएँ उससे डरती हैं। पहले भी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की गई है, लेकिन परिणाम के डर से लोग पीछे हट गए हैं।”

शिक्षिका ने बताया है कि स्कूल में काम करने वाली महिलाएँ गरीब घरों की हैं, इसलिए वह बोलने से डरती हैं। शिक्षिका शिकायत के बाद बेंगलुरु की CK अचुकट्टू पुलिस ने FIR दर्ज कर मामले की जाँच चालू कर दी है। नायडू ने अपने खिलाफ लगे सभी आरोपों को नकारा है। उन्होंने इसे आधारहीन और साजिश बताया है।

संभल जामा मस्जिद हिंसा के बाद पहला जुमा: 70 मजिस्ट्रेट, 10 जिलों की पुलिस, PAC-RAF की 17 कंपनियाँ, 20 CCTV और ड्रोन – तैयार है UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के संभल में हुई हिंसा के बाद 29 नवंबर को पहला जुमा है। ऐसे में पूरे इलाके में पुलिस प्रशासन अलर्ट पर है। हालातों को देखते हुए जुमे की नमाज न करवाए जाने का फैसला लिया गया था। हालाँकि बाद में कहा गया कि लोग अपने घर के पास ही नमाज को पढ़ सकते हैं। फिलहाल, जामा मस्जिद में भी बिन कड़ी सुरक्षा चेकिंग के किसी को भी भीतर नहीं जाने दिया जा रहा। लगातार मौलानाओं से कहकर शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील हो रही है। चप्पे-चप्पे पर हर स्थिति को संभालने के लिए पुलिस बल तैनात है और ड्रोन से निगरानी भी की जा रही है।

सामने आई जानकारी के मुताबिक, संभल में सुरक्षा लिहाज से इलाके में त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई है। पुलिस प्रशासन ने 15 कंपनियाँ पीएसी (पुलिस अर्धसैनिक बल) और 2 कंपनियाँ आरएएफ (रैपिड एक्शन फोर्स) की तैनाती की है। इसके अलावा, पूरे शहर में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 10 जिलों की पुलिस भी सक्रिय रूप से काम कर रही है। संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जहाँ दंगा निरोधी दस्ते और महिला पुलिस बल भी तैनात हैं।

प्रशासन इस बात पर भी ध्यान दे रहा है कि कहीं कोई भड़काऊ भाषण या पोस्ट डालकर माहौल न बिगाड़ा जाए। इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट ने पहले ही जनपद में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 की निषेधाज्ञा को लागू किया है। जुमे की नामज को लेकर जिला मजिस्ट्रेट ने तकरीबन 70 मजिस्ट्रेट की तैनाती की है ताकि हालातों पर कड़ी नजर बनी रहें।

मामले में मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर आंजनेय कुमार ने बताया कि जामा मस्जिद और उसके आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाई गई है। इसके अलावा, अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी पुलिस की तैनाती की गई है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से निपटा जा सके। अभी तक संभल में स्थानीयों ने प्रशासन को भरोसा दिया है कि वे शांति बनाए रखने में मदद करेंगे।

मस्जिद प्रबंधन समिति ने यह सुनिश्चित किया है कि नमाज के दौरान कोई भी अव्यवस्था न हो। सुरक्षा लिहाज से, जामा मस्जिद क्षेत्र में 20 नए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इसके साथ ही, ड्रोन कैमरों का उपयोग करके पूरे इलाके की निगरानी की जाएगी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई अप्रिय घटना न हो, पुलिसकर्मी छतों पर भी तैनात रहेंगे।

गौरतलब है कि संभल में 24 नवंबर हिंसा हुई थी, उस समय मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद के पास इकट्ठा होकर सर्वे करने गई टीम पर हमला किया था जिसके बाद पुलिस को आँसू गैस छोड़ने पड़े थे और गोली चलानी पड़ी थी। झड़प में पाँच लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल भी हुए थे। पुलिस ने बताया कि इस दौरान पत्थरबाजी और आगजनी की घटनाएँ भी हुईं, जिसमें 20 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए।

ISKCON को बांग्लादेश के इस्लामी पार्टी बता रहे ‘मिलिटेंट संगठन’, चिन्मय कृष्ण दास को खाना देने गए 2 साथी गिरफ्तार: शेख हसीना ने यूनुस सरकार को लताड़ते हुए कहा- हिन्दू संत को करो रिहा

बांग्लादेश के चटगाँव में गिरफ्तार किए गए हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास के 2 और सहायकों को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यह दोनों चिन्मय कृष्ण दास को खाना देने गए थे। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी पर यूनुस सरकार को लताड़ा है। वहीं इस बीच ISKCON को बैन करवाने के लिए बांग्लादेश की इस्लामी पार्टियों ने जोर लगाया हुआ है। उन्होंने ISKCON को एक ‘कट्टरपंथी संगठन’ करार दिया है।

रिपब्लिक की एक खबर के अनुसार, देशद्रोह के कथित मामले में जेल भेजे गए हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को जेल के भीतर खाना देने गए उनके दो सहायकों को गुरुवार (29 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया गया। इन दोनों को किस आधार गिरफ्तार किया गया है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

चिन्मय कृष्ण दास को मंगलवार को जज काजी नजरुल इस्लाम ने जेल भेज दिया था। उन्हें जमानत भी नहीं दी गई थी। उनके खिलाफ की गई इस कार्रवाई को बांग्लादेशी वकीलों ने गैरकानूनी करार दिया है। चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी की आलोचना तख्तापलट के कारण बांग्लादेश सत्ता से बाहर हुईं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने की है।

शेख हसीना ने कहा है कि चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी अवैध है और उन्हें तुरंत ही छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने यूनुस सरकार पर प्रश्न उठाए। शेख हसीना ने कहा, “सनातन धर्म के एक बड़े नेता को गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।”

चेख हसीना ने आगे कहा, “चटगाँव में एक मंदिर को जला दिया गया है। इससे पहले अहमदिया समुदाय की मस्जिदों, दरगाहों, चर्चों, मठों और घरों पर हमला किया गया, तोड़फोड़ की गई, लूटपाट की गई और आग लगा दी गई।” शेख हसीना ने यूनुस सरकार को सत्ता हथियाने वाला बताया है।

वहीं इस बीच बांग्लादेश ISKCON के खिलाफ षड्यंत्र तेज हो गया है। बांग्लादेश हाई कोर्ट ने हाल ही में ISKCON पर बैन लगाने की माँग करने वाली याचिका को ठुकरा दिया था। इसके बाद अब बांग्लादेश की इस्लामी पार्टियों ने ऐसी ही माँग उठाई है। जमीयत उलेमा ए बांग्लादेश के अब्दुल युसूफ ने ISKCON को ‘कट्टरपंथी संगठन’ बताया है।

इस्लामी पार्टियों ने कहा है कि यूनुस सरकार बिना देरी के ISKCON को बैन कर दे। उन्होंने ISKCON के साधु संतों को ‘हथियारबंद लड़ाके’ करार दिया है। इस्लामी पार्टियों ने यह सारी बातें एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही हैं। यह पार्टियाँ बांग्लादेश में कड़े इस्लामी कानून चाहती हैं।

क्या बोल्ला काली मंदिर में बंद हो जाएगा बलि प्रदान? कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा- इसे प्रोत्साहित न करें, लोगों को इससे दूर रहने को मनाएँ

कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से कहा है कि वह सुनिश्चित करे कि बोल्ला काली पूजा के अवसर पर मंदिर समिति पशुओं की सामूहिक बलि को प्रोत्साहित ना करे। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक उद्देश्यों के लिए पशुओं की दी जाने वाली बलि की वैधता पर बाद में विचार किया जाएगा। इससे पहले हाई कोर्ट की समन्वय बेंच ने बलि पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

दरअसल, कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम और न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य की खंडपीठ ‘रिफॉर्म्स सोशल वेलफेयर फाउंडेशन’ नाम के एक एनजीओ की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में मंदिर में पशुओं की बलि देने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई थी।

याचिका पर सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि याचिका पर पूजा के उत्सव से एक दिन पहले सुनवाई हो रही है, इसलिए पशुओं के वध पर कोई सीधा प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। हाई कोर्ट की पीठ ने आगे कहा कि पूजा समिति पशुओं के सामूहिक बलि को प्रोत्साहित नहीं करेगी और श्रद्धालुओं को भी ऐसा करने से रोकेगी।

कोर्ट ने कहा, “चूँकि यह त्योहार 22 नवंबर 2024 को शुरू होना है। इसलिए हम पूजा समिति को निर्देश देते हैं कि वे उप-विभागीय अधिकारी, बालुरघाट सदर द्वारा दिनांक 6.11.2024 को हुई बैठक में जो सहमति बनी थी, उसका सख्ती से पालन करे। यह भी सुनिश्चित करे कि सामूहिक बलि न दी जाए। यदि बलि दी भी जाए तो वह लाइसेंस प्राप्त परिसर में ही की जाए, किसी अन्य क्षेत्र में नहीं।”

कोर्ट ने कहा कि राज्य का प्राधिकारी यह भी सुनिश्चित करेगा कि पूजा समिति सामूहिक बलि को प्रोत्साहित न करे और लोगों को इस तरह की सामूहिक बलि से दूर रहने के लिए भी मनाए। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि धार्मिक उद्देश्यों के लिए पशुओं की दी जाने वाली बलि की वैधता पर बाद में विस्तृत विचार किया जाएगा।

वहीं, याचिकाकर्ता संगठन ने दावा किया कि कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन 2023 और 2024 में किया गया है। कहा गया है कि 2023 में पूजा समिति का गठन करने वाले उन्हीं पदाधिकारियों ने 2024 में भी समिति का गठन किया है और कोर्ट के कई निर्देशों का पालन नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यदि पूजा समिति आदेश में उल्लेखित शर्त का उल्लंघन करती है तो उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है।

इससे पहले अक्टूबर में ‘अखिल भारतीय कृषि गो सेवक संघ’ द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विश्वजीत बसु और अजय कुमार गुप्ता की कलकत्ता हाई कोर्ट की अवकाश पीठ ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। याचिकाकर्ता ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को राज्य के विभिन्न मंदिरों में ‘वीभत्स और बर्बर तरीके से की जाने वाली पशु बलि’ को रोक लगाने के लिए निर्देश देने की माँग की थी।

हालाँकि, हाई कोर्ट की पीठ ने कहा था कि माना कि पशु बलि एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है, लेकिन उत्तर भारत और पूर्वी भारत में आवश्यक प्रथा क्या है, इसमें बहुत अंतर है। पीठ ने टिप्पणी की थी, “यह विवाद का विषय है कि पौराणिक पात्र वास्तव में शाकाहारी थे या मांसाहारी।” पीठ ने यह भी कहा था, “यदि भारत के पूर्वी भाग को शाकाहारी बनाने का लक्ष्य है तो यह नहीं हो सकता है।”

दरअसल, जस्टिस बसु जिस धारा का उल्लेख कर रहे थे उसमें कहा गया है, “इस अधिनियम में निहित कोई भी बात किसी भी समुदाय के धर्म द्वारा अपेक्षित तरीके से किसी भी पशु को मारना अपराध नहीं बनाएगी।” इसके बाद हाई कोर्ट की पीठ ने राहत देने से इनकार करते हुए आगे की सुनवाई के लिए मामले को सूचीबद्ध कर दिया।

पिछले साल मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ से भी इस संगठन ने ‘बोल्ला काली पूजा’ के अवसर पर 10,000 बकरियों और भैंसों के वध पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। पीठ ने पशु बलि को रोकने के लिए अंतरिम राहत से इनकार कर दिया था। हालाँकि, पीठ पश्चिम बंगाल में पशु बलि की वैधता के बड़े सवाल पर विचार करने के लिए सहमत हुई।

बोल्ला गाँव बालुरघाट शहर से 20 किलोमीटर दूर बालुरघाट-मालदा राजमार्ग पर स्थित है। इस गाँव में एक ऐतिहासिक मंदिर है, जहाँ श्रद्धालु माँ काली की पूजा करते हैं। मुख्य काली पूजा रास पूर्णिमा के बाद शुक्रवार को होती है। दक्षिण दिनाजपुर जिले के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा के दौरान मंदिर में इकट्ठा होते हैं और प्रार्थना करते हैं। इस दौरन तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है।

हिंदू संत को बांग्लादेश ने क्यों किया गिरफ्तार, क्या बदले की कार्रवाई कर रही मोहम्मद यूनुस सरकार: क्या कहता है कानून, चिन्मय कृष्ण दास से जुड़े मामले में जानिए सब कुछ

बांग्लादेश में हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें मंगलवार को भी जमानत नहीं दी गई। बांग्लादेश की पुलिस ने हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले चिन्मय दास को कथित देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया है। वर्तमान में वह जेल में हैं। उनकी रिहाई के लिए हिन्दुओं ने प्रदर्शन किया तो उन पर भी पुलिस ने हमला किया और इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी उन्हें निशाना बनाया।

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद युनुस सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश के कानून के जानकार कह रहे हैं कि चिन्मय कृष्ण दास के मामले में सही प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है। कुछ का कहना है कि जिस आधार पर चिन्मय दास पर कार्रवाई हुई है, वैसे ही कार्रवाई बाकी पर होने लगे तो हजारों लोग देशद्रोह के दोषी हो जाएँगे।

किस मामले में गिरफ्तार हुए चिन्मय कृष्ण दास?

25 अक्टूबर, 2024 को बांग्लादेश के चटगाँव में हिन्दुओं ने एक रैली आयोजित की। इस रैली का नेतृत्व चिन्मय कृष्ण दास कर रहे थे। यह रैली चटगाँव में ऐतिहासिक लाल दीघी मैदान में आयोजित की गई थी। इसमें हजारों हिन्दू शामिल हुए थे। चटगाँव में यह रैली हिंदुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों के विरोध में आयोजित की गई थी।

इस रैली के दौरान हिन्दुओं ने भगवा झंडे लहराए और सरकार से कार्रवाई की माँग की। चटगाँव में हुई इस रैली के कारण इस्लामी कट्टरपंथी बिदक गए। उन्होंने इस रैली में एक जगह पर एक भगवा झंडा, बांग्लादेश के झंडे से ऊँचा लहराता हुआ देख लिया।

इसी के आधार पर फिरोज खान नाम के एक शख्स ने चटगाँव में ही चिन्मय कृष्ण दास समेत 19 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करवाई। फिरोज खान ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश का झंडा नीचे करके लहराया जा रहा था जो इसका अपमान है और यह देशद्रोह का कार्य है। फिरोज ने आरोप लगाया कि इससे चिन्मय कृष्ण दास देश में अशांति लाना चाहते हैं।

इसके बाद चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें चटगाँव की अदालत में पेश किया गया। यहाँ मजिस्ट्रेट काजी नजरुल इस्लाम ने उन्हें देशद्रोह का आरोपित मानते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया और जेल भेज दिया।

क्या कहता है कानून?

यह बात सही है कि बांग्लादेश के कानून के अनुसार, राष्ट्रीय झंडे से ऊपर कोई झंडा नहीं फहराया जा सकता। बांग्लादेश झंडा कानून, 1972 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता पाया जाता है तो उसे 1 साल तक की सजा या फिर 5000 टका का जुर्माना हो सकता है। उस पर कोर्ट दोनों भी लगा सकती है।

इसके अलावा झंडे का अपमान करने पर बांग्लादेश की दंड संहिता की धारा 124 भी लग सकती है। इसका संबंध देशद्रोह से है। यदि झंडे के अपमान में या साबित होता है कि उस व्यक्ति ने देशद्रोह भी किया है, तो उसे आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

वकीलों ने क्या बताया?

ढाका ट्रिब्यून की एक खबर के अनुसार, बांग्लादेश के बड़े वकीलों ने कहा कि यदि किसी ने झंडे का अपमान किया भी है, तो इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वह देशद्रोही है। उन्होंने बताया कि अगर ऐसा होता तो जिन फैन्स ने अपनी फेवरेट टीम का झंडा, बांग्लादेश के झंडे से ऊपर फुटबॉल मैच के दौरान दिखाया, वह भी देशद्रोह के आरोपित बन जाते।

वकीलों ने बताया कि अगर किसी को लगता है कि किसी दूसरे व्यक्ति के झंडा फहराने के कारण उसकी देशभक्ति की भावना आहत हुई है तो वह मामला दर्ज करवा सकता है। ऐसी स्थिति में पहले कोर्ट मामले की जाँच करेगा और तय करेगा कि देशद्रोह का आरोप बनता भी है या नहीं।

चिन्मय कृष्ण दास के मामले में उन्हें बिना कोई राहत दिए हुए और मामले की जाँच किए बगैर ही देशद्रोही करार दिया जा रहा है। उन्हें कानूनी सहायता भी नहीं मिल रही है। बांग्लादेश के बड़े वकील ZI खान पन्ना ने बताया कि अगर किसी पर धारा 121 और 124 के आधार पर देशद्रोह का मामला दर्ज करना है तो इसके लिए पहले गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है।

पन्ना ने इस बात पर हैरानी जताई है कि एक पुलिस थाने ने अपने ही मन से यह मामला दायर कर दिया। उन्होंने यूनुस सरकार पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कल को अगर मोहम्मद यूनुस सत्ता से बाहर होंगे तो उन पर भी ऐसे ही देशद्रोह का मुकदमा लादा जाएगा। उन्होंने इस मामले में पूर्वाग्रह की बात कही है।

क्या चिन्मय कृष्ण दास के साथ हो रहा भेदभाव?

चिन्मय कृष्ण दास बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वह बांग्लादेश में हिन्दू अधिकारों के लिए बोलने वाला एक बड़ा नाम बन कर उभरे हैं। उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण उनको समर्थन भी अच्छा-ख़ासा है।

जिस दिन उन्हें यूनुस सरकार ने गिरफ्तार किया, तब भी वह ढाका से चटगाँव हिन्दुओं के लिए ही प्रदर्शन में जा रहे थे। इससे पहले कि वह चटगाँव पहुँचते, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें जमानत भी नहीं दी गई। चिन्मय कृष्ण दास के समर्थकों पर भी लाठी-डंडे चले।

मोहम्मद यूनुस की सरकार आने के बाद बांग्लादेश के न्यायालय एक के बाद एक मामले मसे देश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को बरी करते जा रहे हैं। उनके अलावा देश भर में कई ऐसे मौलाना हैं जो भड़काऊ बयानबाजी करते हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। यूनुस सरकार ने सत्ता में आते ही अल कायदा से जुड़े आतंकी संगठन के एक आतंकी को छोड़ दिया था।

ऐसे में शांति और सद्भाव का सन्देश देने वाले हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार करना और फिर उन्हें जमानत नहीं दिए जाने का कारण सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथी सोच को ही माना जा सकता है। बांग्लादेश की सरकार में शामिल दो एडवाइजर ISKCON को प्रतिबंधित करने की माँग कर चुके हैं। यह कथित छात्र नेता हैं।

पहली बार हुआ सर्वे तो जामा मस्जिद में जबरन घुस भीड़ ने डराया, दूसरी बार किया दंगा: संभल में कॉल कर बुलाए गए थे उपद्रवी, 250+ पत्थरबाजों की तस्वीर जारी

संभल में विवादित जामा मस्जिद के सर्वे के पहले ही दिन मुस्लिमों ने बवाल काटा था। मुस्लिम भीड़ जबरदस्ती मस्जिद के परिसर के भीतर घुस गई थी। उसने कोर्ट के आदेश का पालन कर रही टीम को सर्वे नहीं करने दिया था। दूसरी बार जब सर्वे हुआ तो सीधा मुस्लिम दंगाई सड़कों पर उतर गए और पत्थरबाजी कर दी। इसके लिए फोन करके भीड़ इकट्ठा की गई। इसकी कॉल रिकॉर्डिंग भी सामने आई हैं। संभल पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई के सिलसिले में 250 से अधिक का पोस्टर जारी किया है।

19 नवंबर को ही काट दिया था बवाल

संभल मस्जिद में हिन्दू पक्ष के हरिहर मंदिर होने के दावे के आधार पर कोर्ट कमिश्नर के सर्वे का आदेश जिला अदालत ने 19 नवम्बर को ही दिया था। इसी दिन रात में 10 बजे के आसपास सर्वे चालू हुआ था। सर्वे से पहले मस्जिद कमिटी के सदर जफर खां और मस्जिद कमिटी के बाकी सदस्यों से सहमति ले ली गई थी।

इसके बाद ही कोर्ट कमिश्नर रमेश राघव अपनी टीम के साथ मस्जिद के भीतर दाखिल हुए थे। उनके साथ जिले डीएम-एसपी और मस्जिद कमिटी के कुछ लोग थे। बाकी किसी को भी अंदर आने की इजाजत नहीं दी गई थी। यहन तक कि डीएम और एसपी ने अपने सुरक्षाकर्मी भी बाहर छोड़ दिए थे।

टीम ने अपना सर्वे कुछ ही देर किया होगा कि 150-200 लोग मस्जिद के बाहर आकर हंगामा करने लगे। उन्होंने बाहर तैनात पुलिस से धक्कामुक्की की और मस्जिद के बंद गेट को खुलवा कर घुस गए। उन्होंने सर्वे के काम कमे खलल डालना चालू कर दिया और आपत्ति जताने लगे।

मस्जिद के अंदर आई भीड़ कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा लाई गई थी, ऐसा मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है। इस भीड़ के चक्कर में सर्वे पूरा नहीं हो सकता। इसके बाद इसे स्थगित अर्ना पड़ा और आगे किसी दिन करने की योजना बनाई गई। हालाँकि, उसी सप्ताह यूपी उपचुनाव परिणाम और जुमे की नमाज के चलते 24 तारीख चुनी गई। इस दिन दंगा ही हो गया।

दंगे में फोन कर बुलाए लोग

संभल दंगे में हो रही जाँच में और भी खुलासे हो रहे हैं। अब सामने आया है कि दंगाइयों ने मस्जिद के पास के इलाके में और लोगों को फोन करके इकट्ठा किया था और इसने ‘सामान’ लाने को कहा था। ‘सामान’ इस क्षेत्र में तमंचे या हथियार को कहा जाता है।

ऐसी ही एक कॉल रिकॉर्डिंग में एक युवक बोलता है, “सामान लेकर आ मस्जिद के पास, मेरे भाई का घर है।” इस कॉल रिकॉर्डिंग के सामने आने के बाद पुलिस ने तीन और युवकों को पकड़ा है। कॉल से पहचाने जाने वालों के नाम आमिर पठान, मोहम्मद अली और फैजान अब्बासी के तौर पर हुई है।

पुलिस अब इनसे पूछताछ कर यह जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है कि आखिर कहाँ-कहाँ से दंगाई आए और अब वह कहाँ हैं। पुलिस को इन दंगाइयों ने 49 और दंगाइयों के नाम बताए हैं। इनको पकड़ने का पुलिस प्रयास कर रही है। दंगाइयों के पास से मिले सबूतों की अभी पुलिस जाँच कर रही है।

पोस्टर भी जारी, 250 की तलाश

संभल में हुई हिंसा में 5 लोगों की मौत हो गई थी। इस दौरान कई पुलिसकर्मी घायल भी हुए थे। एक पुलिस अफसर के गोली लगी थी। कई पुलिसवालों के हथियार भी मुस्लिम दंगाई भीड़ ने छीन लिए थे। अब इस मामले में यूपी पुलिस कार्रवाई कर रही है। पुलिस ने 7 FIR दर्ज की हैं। कुल 27 लोग भी गिरफ्तार किए गए हैं।

दंगाइयों के फोटो: साभार- जागरण

गिरफ्तार किए जाने वालों में 2 महिलाएँ भी हैं। बाकी दंगाइयों और उन्हें भड़काने वालों की गिरफ्तारी के लिए पोस्टर भी निकलवाए हैं। यूपी पुलिस ने 250 दंगाइयों के पोस्टर संभल छपवाए हैं। इन्हें संभल के प्रमुख स्थानों समेत सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जाएगा। पुलिस ने इनमें दंगाइयों की तस्वीरें CCTV के मदद से निकाली हैं। उनके नाम की भी डिटेल लिखी गई हैं।

गौरतलब है कि 24 नवम्बर, 2024 को शाही मस्जिद में वकील विष्णु शंकर जैन समेत बाकी टीम सर्वे के लिए पहुँची थी। इसी दौरान बड़ी भीड़ मस्जिद के पास इकट्ठा हो गई और उन्होंने पत्थर बरसाए। इस दंगे में 5 लोगों की मौत हो गई थी। वर्तमान में संभल में शांति है लेकिन भारी पुलिस बल तैनात है।

इस्कॉन पर बैन से ढाका हाई कोर्ट का इनकार, कट्टरपंथियों ने जबरन बंद करवाया सेंटर: बांग्लादेशी हिंदुओं पर बोलीं ममता बनर्जी- मैं मोदी सरकार के साथ

बांग्लादेश में ISKON पर बैन लगाने की माँग को ढाका हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने बांग्लादेश में चल रहे हालातों के मद्देनजर कहा कि वो फिलहाल इस्कॉन पर प्रतिबंध नहीं लगा रहे हैं और ईशनिंदा, देशद्रोह मामले में अंतरिम सरकार जो कर रही है, वो उस कार्रवाई से संतुष्ट हैं।

बांग्लादेश में चिन्मॉय कृष्णा दास ब्रह्मचारी की गिरफ्तारी

बता दें कि इस्कॉन, बांग्लादेश में पहले से ही इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर था। कई संगठन इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की माँगे करते थे। लेकिन, इन कट्टरपंथी ताकतों को बल तब मिला, जब 25 नवंबर को हिंदुओं की रैली के दौरान हिंदू नेता चिन्मॉय कृष्णा दास ब्रह्मचारी पर राष्ट्रीय ध्वज का अपमान लगाकर उन्हें देशद्रोह के मुकदमे में गिरफ्तार किया गया।

इस गिरफ्तारी के बाद ही उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किए, जो हिंसा में बदल गए। इन प्रदर्शनों के दौरान चटगांव में एक वकील, सैफुल इस्लाम की हत्या हो गई और कट्टरपंथियों को हिंदुओं को दोबारा से निशाना बनाने का मौका मिल गया।

कोर्ट में दाखिल हुई याचिका

27 नवंबर को इन्हीं घटनाओं को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील मोनिरुज्जमां ने जस्टिस फराह महबूब और जस्टिस देबाशीष रॉय चौधरी की पीठ के सामने इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने की माँग वाली अर्जी दाखिल की। साथ ही चटगांव और रंगपुर में आपातकाल घोषित करने की भी अपील की थी।

इसी याचिका पर सुनवाई करते कोर्ट ने सरकार द्वारा की गई कार्रवाई की सारी जानकारी माँगी और पाया कि इस मामले पर युनूस सरकार सख्त हैं। तीन केस दर्ज हो चुके हैं। एक 13 लोग, एक में 14 लोग और एक में 49 लोगों को आरोपित बनाया गया है जबकि गिरफ्तारी 33 लोगों की हुई है। पुलिस सीसीटी के जरिए भी लोगों की पहचान कर रही है।

इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर इस्कॉन

गौरतलब है कि कोर्ट ने भले ही इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने से मना किया है लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी लगातार इसे अपने निशाने पर लिए हुए हैं। बुधवार को खबर आई कि शिबचर बांग्लादेश में इस्कॉन नमहट्टा केंद्र को मुसलमानों ने जबरन बंद कर दिया। वहीं बांग्लादेशी सेना इस्कॉन भक्तों को अपने साथ गाड़ी में ले गई। एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें कट्टरपंथियों को इस्कॉन मंदिर का बोर्ड हटाते भी देखा गया। इस वीडियो को इस्कॉन के राधारमण दास ने साझा कर दिखाया है कि बांग्लादेश में हिंदुओं के क्या हालात हो रखे हैं।

ममता बनर्जी ने कहा- बांग्लादेश मुद्दे पर मोदी सरकार के साथ हूँ

मालूम हो कि पड़ोसी मुल्क में अल्पसंख्यकों पर होते अत्याचार और चिन्मॉय कृष्णा दास ब्रह्मचारी की गिरफ्तारी के मुद्दे पर भारत भी गंभीर है। इस बीच बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बयान सामने आया है। उन्होंने साफ कहा है कि जब दूसरे देशों की बात आएगी तो हम केंद्र सरकार के साथ खड़े रहेंगे। अगर किसी भी धर्म के लोगों पर अत्याचार होता है तो हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं। अगर बांग्लादेश में किसी भी धर्म के लोगों पर अत्याचार होता है तो हम इसका समर्थन नहीं करते हैं।

पत्थरबाजी-आगजनी करने वाले मुस्लिम, लेकिन संभल हिंसा के ‘दोषी’ वकील विष्णु शंकर जैन और जामा मस्जिद का सर्वे करने आई टीम: ‘जय श्रीराम’ पर चल रहे प्रोपेगेंडा का जानिए सच

उत्तर प्रदेश के संभल स्थित जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हुई हिंसा की जिम्मेदारी इस्लामी-वामपंथी तंत्र वकील विष्णु शंकर जैन पर डालने की पूरी कोशिश कर रहा है। इस्लामी-वामपंथी तंत्र और समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा एक वीडियो वायरल किया जा रहा है। इसमें जैन और सर्वे दल पर विवादित मस्जिद में सर्वेक्षण के लिए जाने के दौरान ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाकर दंगे भड़काने का आरोप लगाया गया है।

कुख्यात इस्लामवादी समीउल्लाह खान ने भी ऐसा ही एक वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में दिख रहा है कि पुलिस के साथ एडवोकेट विष्णु शंकर जैन और सर्वे टीम के लोग चल रहे हैं। इस दौरान कुछ लोग ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे हैं। वीडियो शेयर करते हुए समीउल्लाह खान ने दावा किया है कि संभल में हिंसा की शुरुआत यहीं से हुई थी।

24 नवंबर सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर वीडियो के साथ किए गए पोस्ट में समीउल्लाह ने दावा किया है, “संभल में हिंसा की शुरुआत… हिंदुत्व के वकील विष्णु शंकर जैन ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने वाली टीम के साथ मस्जिद का सर्वे करने पहुँचे। क्या न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने का यही तरीका है?”

समीउल्लाह खान ने अपने पोस्ट में आगे लिखा, “वकील विष्णु शंकर जैन हमेशा मस्जिदों में मंदिर क्यों खोजते हैं, जिससे अशांति, अराजकता और तनाव पैदा होता है? उन्हें मस्जिदों के खिलाफ इतनी आसानी से आदेश कैसे मिल रहे हैं? वे मथुरा मस्जिद के खिलाफ भी सक्रिय थे? यह सब करने के लिए इस हिंदुत्ववादी वकील की गुप्त रूप से समर्थन कौन कर रहा है?”

इसी तरह ‘द मुस्लिम’ नाम के एक अन्य इस्लामवादी एक्स हैंडल ने उस वीडियो को शेयर किया। इसके साथ ही इस X हैंडल ने लिखा, “सर्वेक्षण दल ने धार्मिक नारे लगाते हुए मस्जिद में प्रवेश किया। कोर्ट द्वारा नियुक्त सर्वेक्षण दल ने पथराव और झड़पों के बीच मस्जिद में प्रवेश किया।”

सदफ आफरीन नामक एक अन्य मुस्लिम शख्स ने इस वीडियो को सोशल मीडिया साइट एक्स पर शेयर करते हुए लिखा, “सर्वे टीम है ये, मस्जिद का सर्वेक्षण करने आए हैं दोबारा! ‘JSR’ (जय श्रीराम) के नारे लगाते हुए पहुँचे हैं ये काली कोट वाले सर्वे टीम! आजकल हर एक संस्था में धर्म घुस चुका है! और ये देश के लिए घातक है!”

चाँदनी नाम वाली एक अन्य इस्लामवादी X हैंडल ने लिखा, “UP के संभल जामा मस्जिद के सर्वे टीम धार्मिक नारा लगाते हुए मस्जिद में दाखिल हुई… जय श्री राम का नारा इसलिए लगा रहे हैं कि स्थानीय मुसलमानों को भड़काया जाए।”

इसी तरह, डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी के नेता सलमान निज़ामी ने भी संभल में हुई इस्लामी हिंसा के लिए विष्णु शंकर जैन और यहाँ तक कि अदालत को भी दोषी ठहराया। निजामी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “संभल हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 5 हो गई है। इस खून-खराबे के लिए जज और याचिकाकर्ता ज़िम्मेदार हैं।”

निजामी ने आगे कहा, “दूसरे पक्ष को सुने बिना सर्वे का आदेश देना और सर्वे दल का मस्जिद में ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाते हुए घुसना जानबूझकर उकसाने जैसा था। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर पानी की बौछार या आँसू गैस का इस्तेमाल करने के बजाय फायरिंग करना अल्पसंख्यकों में डर फैलाने और सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देने की मंशा को दर्शाता है। ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा मिलनी चाहिए!”

राजनीतिक लाभ के लिए दंगाई भीड़ को उचित ठहराने का प्रयास

इस्लामवादी सोशल मीडिया हैंडलों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क ने भी मुस्लिम भीड़ के हमले एवं हिंसा के लिए ‘जय श्रीराम’ के नारे को जिम्मेदार ठहराया। बता दें कि पुलिस ने संभल से सांसद जियाउर रहमान बर्क पर भी हिंसा के लिए मुस्लिमों को उकसाने का मामला दर्ज किया है।

जियाउर रहमान बर्क की तरह ही समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के चाचा एवं सपा सांसद राम गोपाल यादव ने भी मस्जिद के बाहर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने को दंगे भड़काने के लिए जिम्मेदार ठहराया है। हालाँकि, जिस वीडियो को शेयर करके ये सभी नारे एवं एडवोकेट जैन पर आरोप लगा रहे हैं, वह मस्जिद में सर्वे के लिए जाने के दौरान का है ही नहीं। इससे उनके झूठ का पता चल जाता है।

दरअसल, रविवार को न्यायालय के निर्देशों के बाद अधिवक्ता कमिश्नर और अधिवक्ता जैन की एक टीम सुबह 7:30 बजे सर्वे के लिए मस्जिद गई। जब टीम ने विवादित मस्जिद में प्रवेश किया, तब शूट किए गए वीडियो में स्थिति बिल्कुल शांतिपूर्ण थी और इस दौरान किसी भी समय ‘जय श्रीराम’ के नारे नहीं लगे और ना ही किसी अन्य समुदाय के लोगों का मजाक उड़ाया गया।

उस समय तक कोई भी विजयोन्माद नहीं था और ना ही हिंदू पक्ष एवं सर्वे टीम ने मुस्लिमों को भड़काने का कोई प्रयास नहीं किया। हालाँकि, इस्लामी-वामपंथी पारिस्थितिकी तंत्र लगातार अधिवक्ता जैन पर निशाना साधकर उनकी जान को खतरे में डाल रहा है। बता दें कि जैन काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी विवाद में भी हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें कट्टरपंथियों से जान से मारने की धमकियाँ मिलती रही हैं।

इन तमाम विवादों को लेकर अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने एक्स लिखा कि जब वे सर्वे टीम के साथ रविवार को विवादित मस्जिद में दाखिल हुए तो प्रशासन ने इलाके की घेराबंदी कर दी थी। उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए सही तथ्यों की जाँच किए बिना ‘गैर-जिम्मेदाराना’ बयान देने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की है।

इससे पहले जैन ने भ्रामक दावों का खंडन किया था। जैन ने कहा, “सोशल मीडिया पर जो वीडियो प्रसारित हो रहा है, वह रात 11 बजे सर्वेक्षण पूरा होने के बाद विवादित क्षेत्र से मेरे जाने के दौरान का है। यह मेरे सर्वे स्थल पर जाने का वीडियो नहीं है। मैं मस्जिद कमेटी, सीजी और एसजी के वकीलों के साथ जिला प्रशासन के साथ सर्वेक्षण स्थल पर गया था। झूठी जानकारी फैलाई जा रही है।”

इससे साफ हो जाता है कि इस्लामवादी और उनके समर्थक विष्णु शंकर जैन की जान को खतरे में डालने के लिए झूठ फैला रहे हैं और उन्हें तथा पवित्र ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष को दोषी ठहरा रहे हैं। यदि इस तर्क को मान भी लिया जाए कि ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए गए थे तो इससे इस्लामी भीड़ की हिंसा सही कैसे साबित हो जाती है? ‘ला मैं तेरी गीता पढ़ लूँ, तू मेरी कुरान’ का क्या हुआ?

मंदिरों के अंदर नमाज पढ़ने को ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘भाईचारे’ का प्रतीक मानने वाला ये इस्लामी-वामपंथी मस्जिद में हिंदुओं द्वारा कथित तौर पर ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने पर नाराज क्यों हो जाते हैं? यह पवित्र हिंदू नारा हिंसा का आधार कैसे हो सकता है? ये वही लोग हैं, जब जिहादी ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाकर बम विस्फोट और सिर कलम करते हैं, तब भी कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।

हालाँकि, यही लोग इस्लामवादी भीड़ की हिंसा को उचित ठहराने के लिए ‘जय श्रीराम’ के नारे को सुविधाजनक रूप से दोषी ठहराते हैं। जब इस्लामवादी किसी मंदिर के बाहर ईद या मुहर्रम का जुलूस निकालते हैं और ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाते हैं तो क्या हिंदुओं को इस्लामवादियों पर हमला करना चाहिए?

इससे पहले वामपंथी प्रोपेगेंडा आउटलेट ‘द वायर’ की आरफा खानम शेरवानी ने इस्लामी हिंसा को सही ठहराने के लिए विवादित जामा मस्जिद में सर्वे का आदेश देने के लिए अदालत को ‘संघी’ बताते हुए उसे दोषी ठहराया था। अब इस्लामी तंत्र दंगाई भीड़ की हिंसा को सही ठहराने के लिए विष्णु शंकर जैन और ‘जय श्रीराम’ को दोषी ठहरा रहा है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

पीरियड आते ही ‘शेख चच्चा’ ने बना लिया बेगम, 15 दिन भोगा, प्रेग्नेंट कर चला गया अपने मुलुक… हैदराबाद में एक नहीं कई शबाना, ‘मुताह निकाह’ के नाम पर अरब के बुड्ढे करते हैं बच्चियों का शोषण

पीरियड आते ही निकाह होना इस्लाम में नया नहीं है, लेकिन हैदराबाद में इस रिवायत के चलते एक अलग दुनिया चल रही है जहाँ अरब मुल्क के अमीर शेख आते हैं, रकम देकर छोटी लड़कियों (वर्जिन) से कुछ समय के लिए निकाह करते हैं और फिर उनके साथ कुछ दिन गुजारकर चले जाते हैं।

हाल में आजतक की मृदुलिका झा ने इस पर ग्राउंड रिपोर्ट की है। रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि कैसे ‘मुताह निकाह, शेख मैरिज’ के चलन ने लड़कियों की जिंदगियाँ बर्बाद की हुई है और परिवार वालों को इन सबसे कोई आपत्ति भी नहीं है। इस निकाह को हैदराबाद में एक बिजनेस की तरह आगे बढ़ाया जा रहा है और इसे कराने के लिए बकायदा ब्रोकर और एजेंट हैं।

रिपोर्ट में एक शबाना (बदला नाम) नाम की लड़की का जिक्र पढ़ने को मिलता है। शबाना की आपबीती किसी आम लड़की के लिए रूह कंपाने वाली है। जिस समय शबाना को पीरियड हुए ही थे तभी उसका निकाह एक शेख से हो गया था। शबाना के लिए तो वो ‘शेख अंकल’ थे, लेकिन अंकल की नजर उसपर कैसी थी ये उसे नहीं पता था।

शेख अंकल उसके घर आते, उसे गोद में बिठाते, उसके गुदगुदी करते और फिर उसे घूर-घूरकर चले जाते… ये सिलसिला कई दिन चला और फिर एक दिन दोनों का निकाह हो गया। शबाना की बिदाई लंबी गाड़ी में हुई और उसे होटल लेकर जाया गया। यहाँ वही शेख अंकल उसके साथ 15 दिन रहे।

शुरू में शबाना ने रो-रोकर अपना विरोध जताया, मगर फिर जब अम्मी-अब्बू-फुफ्फू किसी ने उसकी नहीं सुनी तो वो भी शेख के साथ 15 दिन कमरे में रही। जब लौटी तो हालत खराब थी। पेट में दर्द और उल्टियाँ रुकती नहीं थीं। शुरू में लगा पेट गड़बड़ है मगर फिर अम्मी-खाला को ज्यादा समय नहीं लगा समझने में कि शबाना पेट से हो है।

खबर लगते ही गर्भ गिराने की कोशिशें हुईं लेकिन स्थिति तब तक हाथ से निकल गई थीं। गर्भपात करवाने पर शबाना की जान को भी खतरा था इसलिए घरवाले उसे लेकर लौटे और एक कमरे में बंद कर दिया। उसे धमकी दी गई कि अबसे वो न स्कूल जाएगी-न बाहर।

शबाना ने इसके बाद एक बच्ची को जन्म दिया। घरवालों ने सोचा कि वो इस बच्ची को यतीमखाने भेजें। हालाँकि शबाना के भाई-भाभी ने इससे मना कर दिया और वो बच्ची गोद लेली। अब वो बच्ची शबाना को ‘बाजी’ कहती है। शबाना चाहकर भी उसे अपनी बेटी नहीं कह पाती क्योंकि अब्बू मजहबी किस्म के हैं और वो नहीं चाहते कि किसी को इस बारे में पता हो।

इसी प्रकार खबर में एक ऐसी महिला का भी जिक्र है जिसने अपनी बड़ी बेटी को शेख के हाथ बेचा और बाद में खुद पाँच मंजिला घर में आराम से रहती मिली। उनका मकसद अब आगे छोटी बेटी का निकाह भी इसी तरह से करवाने का है।

वहीं एक ऐसी लड़की का भी जिक्र खबर में मिलता है जिसे एक शेख से निकाह करने के नाम पर ठगा गया और केवल उसका शारीरिक शोषण नहीं हुआ, उसे नौकरानी बनाकर रखा गया। बाद में जब शेख अमेरिका गया तो शेख के बेटे उसका शोषण करने लगे। लड़की जान बचाने के चक्कर में तीसरी मंजिल से जमीन पर गिरी और अब उसके पाँव में रॉड डली हुई है, शरीर में बड़ा गड्ढा है।

हैदराबाद में मुताह निकाह आम

अजीब बात ये है कि ‘मुताह निकाह’ हैदराबाद के कई इलाकों (शाहीन नगर, हसन नगर, याकूब पुरी, बारकास, चारमीनार और वट्टापल्ली) में अब आम हो चुका है, लेकिन लोगों को ये गुनाह नहीं लगता। स्थानीय महिलाएँ, होटल के लोग, ब्रोकर-एजेंट सब मिलकर बड़े ही शातिर ढंग से इस कारोबार को संचालित कर रहे हैं। ब्रोकर 20-25-50 हजार रुपए में लड़कियों का सौदा करते हैं और शेखों को बेचते हैं। ये एजेंट पहले से ही जानते हैं कि कौन से परिवार की लड़कियाँ इस प्रकार के निकाह के लिए उपलब्ध हैं और किसे अधिक पैसे की आवश्यकता है।

इसके बाद ये गल्फ मुल्कों के शेखों से संपर्क में आते हैं, उन्हें मेडिकल वीजा पर भारत बुलाया जाता है, लड़कियों की ब्यूटी पार्लर या घर में परेड होती है और फिर शेख अपने लिए लड़की चुनता है और बाद में निकाह कराया जाता है। बताया जाता है कि इस तरह के निकाह करने पहले केवल अरब के अमीर शेखों के आने का चलन था, मगर अब सूडान और सोमालिया से भी मुस्लिम नागरिक आते हैं जो कम पैसों में ही इस तरह कॉन्ट्रैक्ट निकाह करते हैं।

मृदुलिका झा की रिपोर्ट पढ़कर भी समझ सकते हैं कि कैसे एजेंट खुलकर बताते हैं कि वो कितनी लड़कियों के निकाह कराते हैं। कैसे उनका वर्जिनिटी सर्टिफिकेट शेखों को उपलब्ध कराते हैं। कैसे एक लड़की को बार-बार वर्जिन बताकर कई बार शेखों को दिया जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि एक शेख के आगे खुद को परोसने के लिए लड़कियाँ भीतर फिटकरी रखती हैं और कई बार डॉक्टर के पास जाकर बार-बार सर्जरी भी करवाती हैं।

मुताह निकाह की शर्तें

मौजूदा जानकारी के अनुसार, मुताह निकाह इस्लाम में अस्थायी संबंध को कहते हैं जो कुछ समय के लिए बनाया जाता है। इस निकाह की कुछ अनिवार्य शर्तें और नियम हैं। जैसे,

  • दोनों पक्षों की आयु 15 वर्ष से अधिक होनी चाहिए।
  • बीवियों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
  • निकाहनामा में रॉयल्टी और दहेज की अवधि का उल्लेख किया जाना चाहिए।
  • दोनों पक्षों के बीच शारीरिक संबंध बन सकता है।
    मुताह निकाह में बीवी व्यक्तिगत कानून के तहत रखरखाव का दावा नहीं कर सकती है।
    • इसी तरह मुताह निकाह में तलाक मान्यता प्राप्त नहीं होता।

ऑनलाइन होता है निकाह

इस मुताह निकाह का चलन हैदराबाद में इतना हो चला है कि अब इन्हें करने के लिए किसी स्थान की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि इसे व्हॉट्सएप पर ही करवा दिया जाता है। टाइम्स की एक रिपोर्ट में ब्रोकर ने तो ये भी बताया कि ऐसे 20-30 निकाह हर महीने होते हैं। इसके बाद दुल्हनों को टूरिस्ट वीजा पर उनके शौहरों के पास भेज दिया जाता है। फिर वहाँ न केवल लड़कियों का शोषण होता है, बल्कि उन्हें मारा पीटा जाता है, उन्हें नौकर बनाकर भी रखा जाता है।

सालों से हो रही लड़कियाँ मुताह निकाह की शिकार

बता दें कि हैदराबाद में मुताह निकाह की रिवायत आज से नहीं है। तमामों लड़कियाँ इसकी शिकार हो चुकी हैं। कुछ को इस्तेमाल करके छोड़ दिया गया तो कुछ को गल्फ मुल्कों में ले जाकर जिंदगी बर्बाद कर दी गई। कभी वो सेक्स स्लेव बनकर जीवन गुजारती हैं तो कभी खदीमा के तौर पर काम करती हैं। लड़कियों का कोई निश्चित ठिकाना नहीं रह जाता। उनका केवल गुलामों की तरह इस्तेमाल होता है और साथ में ध्यान रखा जाता है कि शेखों के साथ हुए निकाह से बच्चे न हों क्योंकि ऐसा होने पर खर्चा ज्यादा होता है।

अजमेर में जहाँ आज दरगाह, वहाँ कभी शिव मंदिर में हर सुबह महादेव का अभिषेक करते थे ब्राह्मण दंपती… किताब में लिखकर गए हैं जस्टिस शारदा, जानिए क्या हैं हिंदू पक्ष के दावे के 3 आधार

राजस्थान के अजमेर सिविल कोर्ट ने मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में संकटमोचन महादेव मंदिर होने का दावा करने वाली याचिका स्वीकार कर ली है। अब इस पर अगली सुनवाई 20 दिसंबर को होगी। कोर्ट ने अल्पसंख्यक मंत्रालय, दरगाह कमेटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) को नोटिस जारी करके उससे पहले जवाब माँगा है। याचिका में दरगाह की जगह हिंदू मंदिर होने के तीन आधार बताए गए हैं।

इस याचिका को हिंदू सेना के प्रमुख विष्णु गुप्ता ने दायर किया है। गुप्ता का दावा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में लगे दरवाजों की बनवाट और नक्काशी इसके हिंदू मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। दरगाह में मौजूद बुलंद दरवाजे की बनावट हिन्दू मंदिरों के दरवाजे की तरह है। इन नक्काशी को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ हिन्दू मंदिर रहा होगा।

हरबिलास की किताब, जिसे आधार बनाया गया (साभार: भास्कर)

गुप्ता ने जो दूसरा आधार दिया है, वह दरगाह की ऊपरी संरचना। दरगाह के ऊपरी संरचना में भी हिन्दू मंदिरों के अवशेष जैसी चीजें दिखाई देती हैं। गुप्ता ने अपनी याचिका में कहा है कि इसके गुंबदों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह पूर्व में कोई मंदिर रहा होगा और उसे तोड़कर ही उसके अवशेष पर दरगाह का निर्माण करवाया गया है।

अपने दावे का तीसरा आधार उन्होंने पानी और झरने को दिया है। गुप्ता का कहना है कि जहाँ शिव मंदिर होता है, वहाँ पानी और झरने जरूर होते हैं। इस दरगाह में भी ऐसा ही है। इसलिए यहाँ हिंदू मंदिर होने के दावे को नकारा नहीं जा सकता है। इसके अलावा, उन्होंने अपनी याचिका में हरबिलास शारदा की किताब ‘अजमेर: हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव’ का भी संदर्भ दिया है।

किताब में दावा (साभार: भास्कर)

गुप्ता का दावा है कि इस किताब में कहा गया है कि जिस जगह पर मोइनुद्दीन की दरगाह है, वहाँ कभी हिंदू मंदिर हुआ करता था। किताब में यह भी दावा किया गया है कि यहाँ एक हिंदू दंपति रहते थे और दरगाह स्थल पर बने महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना करते थे। वे सुबह चंदन से महादेव का तिलक और जलाभिषेक करते थे। शारदा ने यह किताब 1911 में लिखी थी।

हरबिलास शारदा ब्रिटिश भारत में जज थे। सन 1892 में उन्होंने अजमेर के न्यायिक विभाग में सब जज के रूप में काम करना शुरू किया था। सन 1894 में वे अजमेर नगरपालिका के नगर आयुक्त बनाए गए। इसके बाद 1902 में उन्होंने अजमेर-मेरवाड़ा में उन्होंने सत्र न्यायाधीश के रूप में काम किया। सन 1925 में शारदा जोधपुर हाई कोर्ट के सीनियर जज बने थे।

विष्णु गुप्ता के वकील रामस्वरूप बिश्नोई ने बताया कि सिविल जज मनमोहन चंदेल की बेंच ने मामले की सुनवाई की स्वीकृति दी है। यह मामला भगवान श्री संकटमोचन महादेव विराजमान बनाम दरगाह कमिटी के बीच है। बिश्नोई ने कहा कि इसमें पहले 750 पेजों का वाद पेश किया गया था। इसे संशोधित करके 38 पेजों का किया गया है।