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फडणवीस ही ‘चाणक्य’, फडणवीस ही ‘चंद्रगुप्त’ भी: जिसके हाथ में पूरी चुनावी कमान, जिसे देख लोगों ने किया मतदान, जरूरी था उनका मुख्यमंत्री बनना

23 नवंबर 2024 को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद एकनाथ शिंदे के रूठने-मानने के जो दिन शुरू हुए थे, उस पर अब पूर्ण विराम लग गया है। तय हो गया है कि बीजेपी नेता देवेंद्र सरिता गंगाधर राव फडणवीस (Devendra Fadnavis) 5 दिसंबर 2019 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर एक बार फिर शपथ लेंगे। पिछले 10 साल में यह तीसरा मौका होगा जब फडणवीस मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे।

मुंबई से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘महानगर’ के संपादक आदित्य दुबे का कहना है कि फडणवीस आज महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े रणनीतिकार हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “शरद पवार अब तक महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी माने जाते थे। सब उन्हें बड़ा रणनीतिकार मानते थे। लेकिन अब सबसे बड़े खिलाड़ी देवेंद्र फडणवीस हैं।”

खुद को ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ के तौर पर फडणवीस ने 10 साल के भीतर ही स्थापित किया है। 2014 से पहले महाराष्ट्र के बाहर कम ही लोग उनका नाम जानते थे। हालाँकि वे विधायक 2009 में ही बन गए थे। उससे पहले उस नागपुर के मेयर भी रह चुके थे, जहाँ बीजेपी की वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी है।

प्रमोद महाजन की हत्या के बाद बीजेपी में महाराष्ट्र के जिन नेताओं का जलवा रहा उनमें एक नागपुर से ही आने वाले नितिन गडकरी हैं। दूसरे गोपीनाथ मुंडे थे जिनकी 2014 में केंद्र में पार्टी की सरकार बनने के बाद सड़क हादसे में मृत्यु हो गई।

2014 के आम चुनावों से पहले मैं पत्रकारिता करने के लिए इंदौर से मुंबई पहुँचा था। पहली बार फडणवीस का नाम मैंने भी तभी सुना। हालाँकि इस नाम की धमक मुझे लोकसभा चुनावों के बाद महसूस हुई। 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले एक नारा चला था,

केंद्र में नरेंद्र, महाराष्ट्र में देवेंद्र

शुरुआत में मुंबई में भी कोई इस नारे को गंभीरता से नहीं ले रहा था। इसे फडणवीस के कुछ उत्साही समर्थकों का कैंपेन बताकर खारिज किया जा रहा था। इसका कारण यह था कि तब बाल ठाकरे की पार्टी दो फाड़ नहीं हुई थी। बीजेपी से उसका गठबंधन नहीं टूटा था। महाराष्ट्र में एनडीए के चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री पद शिवसेना को मिलना तय माना जा रहा था।

लेकिन आश्चर्यजनक तौर पर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सीटों के बँटवारे पर मतभेद हुआ और 25 साल पुराना शिवसेना-बीजेपी का गठबंधन टूट गया। अचानक से यह नारा राजनीति का केंद्र बन गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद उस चुनाव में बीजेपी का जो चेहरा सबसे अधिक नजर आ रहा था, वह देवेंद्र फडणवीस का ही था।

नतीजे आए तो बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। लेकिन सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल नहीं कर सकी। चुनाव के करीब तीन महीने बाद शिवसेना ने महाराष्ट्र में पहली बार बीजेपी की सदारत कबूल कर ली और देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में एनडीए की उस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा भी किया। फडणवीस की बतौर रणनीतिकार यह चुनाव पहली परीक्षा थी। इस परीक्षा में वे केवल पास ही नहीं हुए, शिवसेना को ‘छोटा भाई’ बनाकर उन्होंने खुद को स्थापित भी किया।

2019 के विधानसभा चुनावों के बाद उद्धव ठाकरे के मन में दबी आकांक्षाएँ जिस तरीके से प्रस्फुटित हुई, उसे पूरा करने के लिए जिस तरह उन्होंने कॉन्ग्रेस की गोद में भी बैठने से संकोच नहीं किया, जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने उस हिंदुत्व की विचारधारा तक की तिलांजलि दे दी जो बाल ठाकरे और शिवसेना की पूँजी थी, उससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि फडणवीस का राजनीतिक-रणनीतिक कौशल किस आला दर्जे का होगा कि शिवसेना उनके पहले कार्यकाल में पिछलग्गू बनकर चलती रही।

बावजूद फडणवीस को वह श्रेय नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। महाराष्ट्र की सारी सफलताएँ उसी तरीके से नरेंद्र मोदी के मुकुट में जोड़ दी गईं, जैसे देश के अन्य हिस्सों में बीजेपी के उद्भव को जोड़ा गया। 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद जब अजित पवार के साथ रातोंरात सरकार बनाने का दाँव फेल हो गया, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में एनसीपी-कॉन्ग्रेस वाली महाअघाड़ी ने सरकार बना ली तो फडणवीस के इस कौशल का खूब मजाक भी बना।

इतना ही नहीं कई मौकों पर उनको उनकी पत्नी की रील के लिए भी ट्रोल किया गया। पर फडणवीस इन बाधाओं से टूटे नहीं। वे एक-एक रणनीतिक चाल चलते रहे। फिर आया जून 2022 का वह महीना जब ​उद्धव की शिवसेना टूट गई। एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने। उस समय भी जब देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री बनकर उनकी कैबिनेट में शामिल होना पड़ा तो बीजेपी का भी एक धड़ा उनके राजनीतिक अवसान की कहानियाँ गढ़ने लगा।

पर 2024 का नवंबर बीतते-बीतते फडणवीस ने ऐसी सारी कहानियों को अकेले दम पर ढाह दिया। अपनी उस भविष्यवाणी को सही साबित कर दिखाया जिसमें उन्होंने अपने इस्तीफे के बाद कहा था;

मेरा पानी उतरता देख, मेरे किनारे पर घर मत बसा लेना, मैं समंदर हूँ, लौटकर वापस आऊँगा

2024 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने महाराष्ट्र ने अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की है। पार्टी जिन 149 सीटों पर लड़ी, उनमें से 132 पर वह जीती। 89 प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से। वह भी उस लोकसभा चुनाव के करीब 4 महीने बाद ही, जिसमें महाराष्ट्र में महायुति का आधार तक खिसक चुका था।

विधानसभा चुनाव के नतीजों का संदेश भले यह था कि बहुमत से 13 सीट दूर खड़ी बीजेपी ही अगली सरकार का नेतृत्व करें। लेकिन कुछ दुविधा भी थी। मसलन, 2024 के लोकसभा चुनाव का जो गणित है उससे सहयोगी दलों को साथ लेकर चलना बीजेपी की मजबूरी है। शायद इसी मजबूरी के कारण शिंदे कई दिन तक फैसले को लटकाने में कामयाब रहे।

दूसरा करीब-करीब इसी स्ट्राइक रेट से 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने सफलता हासिल की थी, लेकिन आज भी वह बिहार में नीतीश कुमार की छाया से बाहर नहीं निकल सकी है। तीसरी, पिछले ही साल मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीत के बाद भी शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे को बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने मौका नहीं दिया, ऐसी ही अटकलें कुछ लोग देवेंद्र फडणवीस को लेकर भी लगा रहे थे। यहाँ तक कि वर्तमान राजनीतिक हालातों का हवाला देकर कुछ लोग फडणवीस की जाति (ब्राह्मण) को भी उनके मुख्यमंत्री चुने जाने की राह की बाधा के तौर पर प्रचारित कर रहे थे।

4 दिसंबर को जब बीजेपी विधायक दल ने अपना नेता चुना तो इसने साबित कर दिया कि जितने भी कारण विरोध में गिनाए जा रहे थे, सबको फडणवीस ने अपने रणनीतिक कौशल से अपना पक्ष बना लिया। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को यह मानना पड़ा कि महाराष्ट्र की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में फडणवीस ही ‘चाणक्य’ हैं।

ऑपइंडिया से बातचीत में दुबे भी इसकी पुष्टि करते हैं। उन्होंने कहा, “भले विधानसभा चुनाव महायुति ने जीता है। लेकिन वोट लोगों ने बीजेपी को देखकर दिया है। देवेंद्र फडणवीस को देखकर दिया है, जिन्होंने राज्य में सबसे ज्यादा रैलियाँ की। पूरी चुनावी कमान उनके ही हाथों में थी। ऐसे में मतदाताओं की भावनाओं के सम्मान के लिए उनको मुख्यमंत्री बनाना जरूरी था।”

उन्होंने बताया कि गठबंधन सरकार होने के कारण भी बीजेपी के लिए एक ऐसा चेहरा चुनना जरूरी था जो एकनाथ शिंदे और अजीत पवार दोनों के साथ समन्वय स्थापित कर चल सके। किसी नए चेहरे के लिए इन दोनों के साथ समीकरण बैठाना आसान नहीं होता। इसके अतिरिक्त लोकसभा चुनाव में हार के बाद जिस तरह से उन्होंने राज्य में पार्टी को फिर से खड़ा किया, जिस तरह से संघ पूरी ताकत के साथ जुटा, यह भी फडणवीस के पक्ष में गया है।

समर्थकों के बीच ‘देवा भाऊ’ के नाम से मशहूर फडणवीस ने पार्टी के प्रति जिस तरीके से समर्पण दिखाया, जैसे एक-एक आदेश (मसलन शिंदे का डिप्टी बनना) का कार्यकर्ता के तौर पर पालन किया है, उसने भी मुंबई से दिल्ली तक पार्टी के भीतर विरोधियों के मौजूद रहने के बाद भी फडणवीस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भरोसेमंद बनाया है।

इसके अलावा बिहार की उस सीख ने भी बीजेपी के नेतृत्व को फडणवीस को चुनने की प्रेरणा दी होगी जिसे वह आज भी भोग रही है। बिहार में भी कभी बीजेपी ने खुद से स्टीयरिंग नीतीश कुमार को थमाई थी। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों का एक निहितार्थ यह भी था कि भले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार हैं, लेकिन मतदाताओं का मानना था कि राज्य में जो बेहतर बदलाव हुए हैं उसके पीछे की फोर्स बीजेपी ही है।

यह सत्य का है कि 90 प्रतिशत के स्ट्राइक रेट से सीटें जीतने के बाद भी बीजेपी 2010 में बिहार की सबसे बड़ी पार्टी नहीं थी। लेकिन उस जनादेश के निहितार्थ को नहीं पढ़ने की कोशिश के कारण ही उसके बाद के चुनावों में बीजेपी बिहार में उस स्ट्राइक रेट वाला प्रदर्शन नहीं कर पाई। 2020 में सबसे बड़ी पार्टी होकर भी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चलने को मजबूर हुई। इसके कारण नीतीश के राजनैतिक (कु) प्रयोग का दोष उसके भी मत्थे गया। भले पिछले ढाई दशक में बीजेपी ज्यादातर समय बिहार की सत्ता में रही है, लेकिन उसके पास प्रदेश स्तर पर कोई भी ऐसा नेता नहीं जो अपने दम पर पार्टी को चुनाव जीता सके। यदि आज बीजेपी महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस को नहीं चुनने या एकनाथ शिंदे का पिछलग्गू बने रहने का ही भूल करती तो आने वाले वर्षों में उसे महाराष्ट्र में भी इसी तरह के संकट से जूझना पड़ सकता था।

अब बीजेपी ने तय कर दिया है कि जब भी उसकी दूसरी पीढ़ी के नेताओं की गिनती होगी तो वह योगी आदित्यनाथ, हिमंता बिस्वा सरमा के साथ-साथ देवेंद्र फडणवीस का नाम लेने के बाद ही पूर्ण होगी।

AAP विधायक नरेश बालियान को गिरफ्तार करेगी दिल्ली पुलिस: गैंगस्टर से बातचीत का आरोप, संगठित अपराध कानून में लगा है MACOCA

गैंगस्टर के साथ मिलकर वसूली गैंग चलाने के मामले में गिरफ्तार दिल्ली के उत्तम नगर से आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश बालियान को क्राइम ब्रांच ने बुधवार (4 दिसंबर 2024) को पेश किया। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया कि नरेश बालियान को महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MACOCA) के तहत दर्ज एक मामले में वह गिरफ्तार करेगी।

विशेष लोक अभियोजक अखंड प्रताप सिंह ने दिल्ली राऊज एवेन्यू कोर्ट के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट पारस दलाल की अदालत के समक्ष अपनी दलील रखी। उन्होंने कहा, “हम नरेश बालियान को एक अलग मकोका एफआईआर में गिरफ्तार करेंगे। हम उन्हें अभी गिरफ्तार करेंगे।” कोर्ट ने मंगलवार (3 दिसंबर) को नरेश बालियान की पुलिस हिरासत को एक दिन के लिए बढ़ा दिया था।

इसके बाद नरेश बालियान ने उसी दिन जबरन वसूली के मामले में जमानत याचिका दायर की थी। पुलिस ने AAP विधायक की न्यायिक हिरासत की माँग की है, ताकि संगठित अपराध को लेकर उनसे पूछताछ की जा सके। इतना ही, नरेश बालियान का वॉइस सैंपल लेकर सामने आए ऑडियो क्लिप में उनके आवाज से उसका मिलान कराया जा सके।

दरअसल, शनिवार (30 नवंबर) को भाजपा ने लंदन में बैठे कुख्यात गैंगस्टर कपिल सांगवान उर्फ नंदू के साथ नरेश बालियान की बातचीत का ऑडियो जारी किया था। भाजपा ने आरोप लगाया था कि AAP नेता अपराधियों के साथ मिलकर वसूली गैंग चला रहे हैं। इसके बाद उसी शाम को दिल्ली पुलिस ने बालियान को गिरफ्तार कर लिया था। उन पर MACOCA भी लगाया है।

बालियान पर आरोप लगाते हुए भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा था, “AAP के नरेश बालियान या एक्टॉर्शनिस्ट MLA एक गैंगेस्टर से बात कर रहे हैं। इनका व्यवहार ऐसा है, जैसे एक माता से 2 भाई हों। ऑडियो में कहा जा रहा है कि बिल्डर को धमकाकर उससे मिले पैसे को हवाला का फैसला बाँट लेंगे। जनता ने इन्हें इसलिए नहीं चुना कि आप कभी मदिरा घोटाला करें या एक्सटॉर्शन रैकेट चलाएँ।”

भाजपा ने ऑडियो क्लिप जारी करते हुए लिखा था, “ये हैं आप के ‘कट्टर ईमानदार’… आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश बालियान एक गैंगस्टर से बातचीत कर रहे हैं। गैंगस्टर पूछता है कि आप नेता ने उसके खिलाफ शिकायत क्यों दर्ज कराई है। बालियान जवाब देते हैं कि गैंगस्टर और उसके गुंडे उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। गैंगस्टर जवाब देता है कि वह बालियान की कोई रिकॉर्डिंग वायरल कर देगा।”

भविष्य में अवैध/गैर-कानूनी काम किए जाएँगे… फिर भी इसके लिए धन जुटाना PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग नहीं: PFI के 3 लोगों को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार (4 दिसंबर 2024) को कहा कि प्रतिबंधित इस्लामी संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के पदाधिकारियों द्वारा जुटाए गए चंदा को PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग ने कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इसलिए चंदा के जरिए इस धन को जुटाने वाले लोगों के खिलाफ धन शोधन (Money Laundering) का अपराध नहीं दर्ज किया जा सकता है।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश जसमीत सिंह ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) केवल ‘अपराध की आय’ वाले मामले में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 3 को लागू कर सकता है। इसका ये अर्थ हुआ कि ये आपराधिक गतिविधि के प्राप्त धन होगा। इसके विपरीत, PFI के नेताओं के मामले में अदालत ने कहा कि आरोप यह था कि उन्होंने अपराध करने के लिए धन एकत्र किया था।

कोर्ट ने कहा, “ED द्वारा स्थापित मामला कि याचिकाकर्ता जो धन जुटा रहे थे, उसका उपयोग अनुसूचित अपराध करने के लिए किया गया था। यह PMLA के तहत अपराध की आय नहीं है। धन एकत्र करके किया गया अपराध अनुसूचित अपराध सहित किसी भी कानून के तहत अपराध हो सकता है, लेकिन पीएमएलए की धारा 3 को लागू करने के लिए इसे अपराध की आय नहीं कहा जा सकता है।”

इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने PFI की दिल्ली इकाई के तीन पदाधिकारियों – परवेज अहमद (अध्यक्ष), मोहम्मद इलियास (महासचिव) और अब्दुल मुकीत (कार्यालय सचिव) को जमानत दे दी। इन सभी पर साल 2020 में हुए CAA-NRC विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने और PFI के लिए धन एकत्र करने का आरोप लगाया गया था। PFI को साल 2022 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने प्रतिबंधित कर दिया है।

न्यायाध जसमीत सिंह ने कहा कि धन जुटाने का काम साल 2020 के दिल्ली दंगों से पहले ही शुरू हो गया था। उन्होंने कहा कि PMLA में कहा गया है कि अपराध की आय आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप उत्पन्न होनी चाहिए। हालाँकि, न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि आरोपितों ने अपराध से धन अर्जित किया भी हो तो भी उस पर उनका नियंत्रण नहीं था, क्योंकि धन पीएफआई के पास जमा था।

इसको देखते हुए न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपितों ने पीएमएलए की धारा 45 के तहत जमानत के लिए दो शर्तें पूरी की हैं। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी कहा कि तीनों आरोपियों ने दो साल से अधिक की अवधि तक जेल की सजा काट ली है और निकट भविष्य में मुकदमे के समाप्त होने की संभावना नहीं है। इस आधार पर तीनों आरोपितों को जमानत दे दी गई।

न्यायालय ने इस संदर्भ में यह भी कहा कि विशेष अधिनियमों के तहत जमानत के लिए कड़े नियम संविधान की अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को नहीं छीन सकते। न्यायालय ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष के कुल 185 गवाह और 456 दस्तावेज हैं। इसके अलावा, डिजिटल साक्ष्य लाखों पृष्ठों में हैं।

ISIS को आतंकी न कहा जाए: सुप्रीम कोर्ट में याचिका, दायर करने वाला खुद है आतंकवादी, मुंबई बम धमाकों का है दोषी

मुंबई में साल 2002-3 के सीरियल बम विस्फोटों के सूत्रधार साकिब नाचन ने कुख्यात आतंकी संगठन ISIS (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) को आतंकी संगठन घोषित करने के खिलाने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। ISIS का भारत प्रमुख रहा नाचन ने इस्लामिक स्टेट और अन्य समूहों को आतंकवादी संगठन घोषित करने वाली सरकारी अधिसूचना को रद्द करने की माँग की है।

सु्प्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत और उज्जल भुयान की पीठ ने उसकी याचिका पर सुनवाई की। तिहाड़ जेल में बंद नाचन कोर्ट में वर्चुअली उपस्थित हुआ। पीठ ने कहा, “हमने आपको पहले भी सलाह दी थी कि आप एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) के जरिए अपनी बात रखिए। आप सुनवाई में मौजूद रह सकते हैं और जहाँ जरूरी लगे, वहाँ बोल भी सकते हैं।”

बता दें कि पिछले साल दिसंबर में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने देश में संचालित ISIS के मॉड्यूल का खुलासा किया था। इस मामले में जाँच एजेंसी ने साकिब नाचन सहित कई लोगों को गिरफ्तार करते हुए नाचन को मुख्य आरोपित बनाया था। नाचन देश में ISIS के मॉड्यूल का संचालन करता था और युवाओं को इसमें शामिल होने के लिए बहकाता था और ISIS के प्रति निष्ठा की कसम खिलाता था।

आरोपितों ने महाराष्ट्र के ठाणे के एक गाँव को ‘अल शाम’ यानी इस्लामिक शासन वाला आजाद क्षेत्र घोषित कर दिया था। ये भारत में शरिया के तहत इस्लाम का शासन स्थापित और आतंकी हमलों को अंजाम देने की योजना बना रहे थे। NIA ने नाचन के अलावा हसीब जुबेर मुल्ला, काशिफ अब्दुल सत्तार बालेरे, सैफ अतीक नचन, रेहान अशफाक सुस, शगफ साफीक दिवकर, फिरोज दास्तगीर कुआरी को पकड़ा था।

ISIS का इंडिया प्रमुख बनने से पहले साकित प्रतिबंधित आतंकी संगठन ‘स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI)‘ का पदाधिकारी था। वह मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन विले पार्ले और मुलुंड बम धमाकों के मामलों में सजायाफ्ता रह चुका है। यह सजा उसे साल 2016 में सुनाई गई थी। वह दो साल से भी कम समय तक जेल में रहा। उसे जेल में अनुशासित रहने के कारण नवंबर 2017 में रिहा कर दिया गया।

जेल से बाहर आते ही वह एक बार फिर आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट से जुड़ गया। उसे भारत मॉड्यूल का मुखिया बनाया गया था। नाचन साल 1991 से ही आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त रहा है। उस पर अफगान में जिहाद के दौरान मुजाहिद्दीनों के साथ लड़ने और भारतीय मुस्लिमों को पाकिस्तान में आतंकवादी प्रशिक्षण के लिए भेजने का भी आरोप है।

‘मेरे भाई की मौत हो गई है… 1 घंटे से जाम में फँसा हूँ’: गाजीपुर बॉर्डर पर लगे ‘राहुल गाँधी मुर्दाबाद’ के नारे, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को पब्लिक ने पीटा

संभल में मुस्लिम भीड़ की हिंसा के बाद हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। प्रशासन ने बाहरी लोगों के प्रवेश पर पांबदी लगा रखी है। बावजूद कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने 4 दिसंबर 2024 को संभल जाने की कोशिश की। प्रशासन ने रास्ते से ही उनके काफिले को लौटा दिया। इसके कारण दिल्ली-उत्तर प्रदेश के गाजीपुर बॉर्डर पर भारी जाम लग गई। कई किलोमीटर तक वाहन फँसे रहे।

राहुल गाँधी के इस सियासी ड्रामे से आम लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ी। कुछ मजबूर होकर रोने लगे। एसपी त्यागी नाम के 80 साल के बुजुर्ग ने न्यूज 18 को बताया, “मेरे भाई की मौत हो गई है। मुझे अंतिम संस्‍कार में जाना है। यहाँ एक घंटे से जाम लगा हुआ है। मैं फँसा हूँ।” इन्हीं मजबूरियों और परेशानियों के कारण आखिर में लोगों का सब्र जवाब दे गया और उन्होंने कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की पिटाई भी कर दी। राहुल गाँधी मुर्दाबाद के लगाए नारे।

आज तक ने अपनी रिपोर्ट में एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताया है जिसे अपने पिता के अंतिम संस्कार में जाना था। लेकिन जाम के कारण वह अंत्येष्टि में शामिल नहीं हो सका। वहीं नरेंद्र सिंह ने बताया कि वह अपनी बेटी को परीक्षा दिलाने के लिए मेरठ लेकर जा रहे थे, लेकिन जाम में फँस गए। उन्होंने पूछा कि सड़कों पर लोगों को परेशान क्यों किया जा रहा है?

एयरपोर्ट से घर लौट रहे ओमप्रकाश भी घंटों जाम में फँसे रहे। उन्होंने पूछा कि राहुल गाँधी के कारण सड़क को क्यों जाम किया गया? वहीं कैलाश नाम शख्स ने कहा, “हम जाम में फँसे हुए हैं। इनको अपनी राजनीति की रोटी सेंकनी है। इनकी राजनीति की वजह से जनता परेशान होती है।” लंबे जाम के कारण परेशानी झेलने वालों में छात्र और कर्मचारी भी थे जो समय से अपने काम पर नहीं पहुँच पाए।

संभल जाने में असफल रहे राहुल गाँधी ने एक्स/ट्विटर पर एक पोस्ट में कहा है, “पुलिस ने हमें संभल जाने से रोक दिया। विपक्ष के नेता होने के नाते यह मेरा अधिकार और कर्तव्य है कि मैं वहाँ जाऊँ। फिर भी मुझे रोका गया। मैं अकेला जाने को भी तैयार हूँ, लेकिन वे इसके लिए भी नहीं माने। यह संविधान के खिलाफ है।”

वहीं संभल के एसपी केके बिश्नोई ने बताया है कि जिले में अब स्थिति शांतिपूर्ण है। प्रशासन हालात सामान्य बनाए रखने का हरसंभव प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि 10 दिसंबर तक बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा हुआ है। हम सभी जन प्रतिनिधियों से सहयोग की अपील करते हैं। साथ ही बताया कि 10 दिसंबर के बाद हालात को देखते हुए इस संबंध में आगे फैसला लिया जाएगा।

केरल के जिस मंदिर में नहीं कोई गर्भ गृह या मूर्ति, उसके संरक्षण के लिए चिंतित हुआ सुप्रीम कोर्ट: कहा- ये अद्वितीय, इन्हें बचाना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट में CJI संजीव खन्ना की बेंच ने कहा है कि मंदिरों और उनसे जुड़ी संपत्तियों का सावधानी से संरक्षण करना जरूरी है। उन्होंने यह टिप्पणी केरल के एक मंदिर में प्रबन्धन को लेकर चल रहे विवाद की सुनवाई के दौरान दी। CJI संजीव खन्ना की बेंच ने मंदिर के कुशल प्रशासन और चुनाव के लिए एक रिटायर्ड जज की प्रशासक के तौर पर नियुक्ति भी कर दी।

मंगलवार (3 दिसम्बर, 2024) को इस मामले की सुनवाई CJI संजीव खन्ना, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस संजय कुमार वाली बेंच ने की। सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रबन्धन करने वाली कमिटी के चुनाव के लिए केरल हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज को प्रशासक नियुक्त किया।

सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के पुराने और अद्वितीय होने के तथ्य को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा, “मंदिर और उसकी संपत्तियों को अत्यंत सावधानी से संरक्षित और सुरक्षित करना जरूरी है।” सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में 4 माह के भीतर चुनाव करवाने को भी कहा है।

क्या है मामला?

यह पूरा मामला केरल के ओअचिरा मंदिर से जुड़ा हुआ है। यह मंदिर केरल के कोल्लम जिले में स्थित है। यह देश में अकेला अपनी तरह का मंदिर है। इसमें ना ही कोई गर्भगृह है और ना ही कोई मूर्ति। इस मंदिर में परमब्रह्म की पूजा होती है। मंदिर के अंतर्गत कई अस्पताल और कॉलेज चलते हैं।

इसी मंदिर के प्रबन्धन को लेकर विवाद है। मंदिर के नियमों के तहत इसे तीन स्तर पर अलग-अलग कमेटियाँ नियंत्रित करती हैं। मंदिर के प्रबन्धन को लकर 2006 में निचली अदालत में एक केस दायर किया गया था। निचली अदालत ने कहा था कि सभी पक्ष मंदिर प्रबन्धन के लिए एक योजना प्रस्तुत करें और जब तक ऐसा ना हो तब पुराने नियम से मंदिर चले।

निचली अदालत के इस फैसले के विरुद्ध मंदिर के वंशानुगत सदस्य हाई कोर्ट पहुँच गए। उन्होंने हाई कोर्ट से माँग की कि उनके रोल और अधिकार तय किए जाएँ। इसके बाद हाई कोर्ट ने 2010 में एक प्रशासक की नियुक्ति कर दी थी, हालाँकि उसे कोई अधिकार नहीं दिए गए थे।

हाई कोर्ट ने इसके बाद निचली अदालत को मंदिर प्रबन्धन के लिए योजना बनाने का आदेश दिया था और केरल हाई कोर्ट के ही एक रिटायर्ड जज को मंदिर के प्रशासक के तौर पर नियुक्त कर दिया था। मंदिर की तीनों समितियों को उनकी अनुमति से ही काम करना था।

इसके बाद 2017 में इस मंदिर का रोजमर्रा का काम संभालने वाली समिति का चुनाव हुआ था। इस समिति को हाई कोर्ट ने ही एक आदेश के जरिए 2022 में भंग कर दिया था और दूसरी समिति बना दी थी। इसके लिए चुनाव प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ था। इसके खिलाफ चुने हुए दो प्रतिनिधि सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए।

सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद पूरा मामला सुना है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त प्रशासक और कथित कार्यकारी समिति द्वारा मंदिर और उससे जुड़े संस्थानों के प्रशासन और प्रबंधन पर गंभीर विवाद है।” सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के अद्वितीय होने को देखते हुए केरल हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज K रामाकृष्णन को नया प्रशासक नियुक्त कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि प्रशासक रामाकृष्णन 4 महीने के भीतर चुनाव करवाएँगे और मंदिर का प्रशासन निष्पक्ष तरीके से करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 2 लोगों की नियुक्ति देने का भी अधिकार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि मंदिर से जुड़े सभी लोग नए प्रशासक की सहायता करें।

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह ढाँचा केस में गलत रिपोर्टिंग ‘कोर्ट की अवमानना’: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मीडिया को दी सख्त चेतावनी, कहा- कोर्ट की पवित्रता बनाए रखें

उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि एवं शाही ईदगाह ढाँचा विवाद मामले में सुनवाई कर रहे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया को चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि अदालती कार्यवाही की गैर-जिम्मेदाराना या किसी भी तरह की गलत रिपोर्टिंग कोर्ट की अवमानना है। कोर्ट ने मामले की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया से संयम बरतने के लिए कहा।

मामले की सुनवाई कर रहे जज राममनोहर नारायण मिश्रा ने कहा कि इस मामले में किसी भी आदेश या कार्यवाही की कोई भी गैर-जिम्मेदाराना या गलत रिपोर्टिंग न्यायालय की अवमानना ​​मानी जाएगी। जज मिश्रा ने कहा, “न्यायालय उम्मीद करता है कि मीडियाकर्मी इस मामले की कार्यवाही की रिपोर्टिंग करते समय उचित संयम बरतेंगे और इस संबंध में न्यायालय के आदेशों की गरिमा और पवित्रता बनाए रखेंगे।”

दरअसल, केस नंबर 18 से जुड़े एक वकील ने कोर्ट में आवेदन देकर इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया द्वारा गलत रिपोर्टिंग का आरोप लगाया था। इसके साथ ही कोर्ट से इसको निर्देश देने की माँग की गई थी। अन्य पक्षों ने भी इस मामले पर चिंता जताई थी। बता दें कि इस केस से जुड़े कई मामलों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

इससे संबंधित मूल मुकदमे में मथुरा स्थित शाही ईदगाह मस्जिद को हटाकर इसकी जमीन को श्रीकृष्ण जन्मभूमि भूमि को लौटाने की माँग की गई है। मूल मुकदमे में कहा गया है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर उस जमीन पर शाही ईदगाह मस्जिद को बनाया गया है। यह मामला मथुरा के सिविल कोर्ट में लंबित था, लेकिन साल मई 2023 में हाई कोर्ट ने इस मामले को अपने हाथों में ले लिया।

इस साल जनवरी में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले से जुड़े 15 मुकदमों को एक साथ जोड़कर उनकी सुनवाई शुरू की थी। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने इन सभी मुकदमों को एक साथ सुनवाई करने का विरोध किया था। इस साल अक्टूबर में हाई कोर्ट ने मुकदमों को एकीकृत करने के अपने निर्देश को वापस लेने से इनकार कर दिया था।

रात का शो नहीं, 3डी के लिए इंतजार, सेंसर बोर्ड ने कई सीन उड़ाए… फिर भी रिलीज से पहले ही फायर है ‘पुष्पा 2’, एडवांस बुकिंग से एक शेयर की भी मौज

पुष्पा नाम सुनकर फ्लावर समझा क्या, फ्लावर नहीं फायर है मैं…

साल 2021 में आई ‘पुष्पा’ फिल्म के इस डायलॉग का खुमार आज भी दर्शकों के जेहन से नहीं उतरा है। अब ‘पुष्पा 2’ रिलीज से पहले ही कमाई की सुनामी आने के संकेत दे रही है।

रिपोर्टों के अनुसार फिल्म की एडवांस बुकिंग का आँकड़ा 125 करोड़ के करीब पहुँच चुका है। करीब 23 लाख टिकटों की बिक्री हो चुकी है। पहले ही दिन वर्ल्डवाइड 250 से 275 करोड़ रुपए के कलेक्शन का अनुमान है। इस फिल्म का बजट करीब 500 करोड़ है। इस तरह से देखें तो पहले ही दिन यह फिल्म अपनी आधी लागत से अधिक निकाल लेगी।

अल्लू अर्जुन और रश्मिका मंदाना की ‘पुष्पा 2’ यदि अनुमानों के हिसाब से पहले दिन कमाई करती है तो यह नया रिकॉर्ड होगा। इससे पहले एसएस राजामौली की 2022 में रिलीज हुई ‘RRR’ ने पहले दिन वर्ल्डवाइड 223 करोड़ रुपए कमाए थे।

‘पुष्पा 2’ 5 दिसंबर 2024 को रिलीज होनी है। उससे एक दिन पहले यानी 4 दिसंबर को अमेरिका में इसका प्रीमियर हुआ है। 5 भाषाओं में यह फिल्म रिलीज की जाएगी। ये हैं- तेलुगु, हिंदी, तमिल, कन्नड़, बंगाली और मलयालम।

‘पुष्पा 2: द रूल’ को लेकर रिलीज से पहले यह दीवानगी तब दिख रही है जब फिल्म बनने के दौरान अल्लू अर्जुन और निर्देशक के बीच मतभेदों की खबर आई थी। इतना ही नहीं मेकर्स ने इस फिल्म के शुरुआती दिनों में नाइट शो भी रद्द कर दिया है। फिल्म के 3डी वर्जन के लिए प्रशंसकों को इंतजार करना होगा। फिलहाल फिल्म 2डी में रिलीज होगी।

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने कुछ बदलावों के साथ इस फिल्म के हिंदी वर्जन को भी पास कर दिया है। मसलन ‘रामावतार’ शब्द को ‘भगवान’ से बदल दिया गया है। जिस सीन में कटे हुए पैर को उड़ते दिखाया गया था, उसे हटा दिया गया है। धूम्रपान के सीन के साथ इससे जुड़ी चेतावनी जोड़ने को कहा गया है। फिल्म के तेलुगु संस्करण को 28 नवंबर को ही पास कर दिया गया था। इस संस्करण में भी मेकर्स को कुछ बदलाव करने पड़े हैं।

एडवांस बुकिंग से साफ है कि यह फिल्म पहले दिन ही 300 करोड़ी क्लब में शामिल हो सकती है। 2021 में पुष्पा ने 267 करोड़ रुपए की कमाई की थी। इस फिल्म के लिए अल्लू अर्जुन को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था।

‘पुष्पा 2’ की बंपर एडवांस बुकिंग का असर पीवीआर के शेयर पर भी दिख रहा है। पिछले 5 दिनों से इसमें तेजी है और यह 1600 रुपए के स्तर पर कारोबार कर रहा है। ब्रोकरेज हाउस यूबीएस की माने तो इस फिल्म के कारण स्टॉक का भाव 2000 रुपए के लेवल को छू सकता है।

दिल्ली की जामा मस्जिद का भी हो सर्वे: सीढ़ियों में दबे हैं सैकड़ों मंदिरों के अवशेष एवं मूर्तियाँ, हिंदू संगठन ने ASI के डायरेक्टर जनरल को लिखी चिट्ठी

दिल्ली स्थित जामा मस्जिद की सर्वे कराने की माँग करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के डायरेक्टर जनरल को चिट्ठी लिखी गई है। इसमें कहा गया है कि मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने जोधपुर और उदयपुर के कृष्ण मंदिर को तोड़कर उसके देव प्रतिमा को दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में लगवाए थे। इसके पीछे औरंगजेब पर साकी मुस्तक खान की पुस्तक मसीर-ई-आलमगीरी को आधार बनाया गया है।

ASI के डायरेक्टर को चिट्ठी हिंदू सेना के प्रमुख विष्णु गुप्त ने लिखी है। इससे पहले हिंदू सेना प्रमुख ने राजस्थान के अजमेर स्थित मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को संकटमोचन महादेव मंदिर बताते हुए कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय, ASI और दरगाह कमिटी को नोटिस देकर 20 दिसंबर तक जवाब माँगा है।

विष्णु गुप्ता ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि जोधपुर और उदयपुर के सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर औरंगजेब ने हिंदुओं को अपमानित करने के लिए उनके अवशेषों को दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर लगवा दिया। जामा मस्जिद ASI के नियंत्रण में है और वह इसके पीछे की सच्चाई पता लगाने के लिए उसका सर्वे कराए। मस्जिदों की सीढ़ियों के नीचे दबे मंदिरों के अवशेषों से हिंदुओं की भावना आहत होती है।

विष्णु गुप्ता ने कहा कि मसीर-ई-आलमगीरी में लिखा है कि 24-25 मई 1689 को रविवार का दिन था। उस दिन खान जहाँ बहादुर जोधपुर से मंदिरों को तबाह करके लौटा। खान जहाँ बहादुर द्वारा मंदिरों को लूटने, प्रतिमाओं को खंडित करने और फिर उन्हें ध्वस्त कर के बाद बैल गाड़ियों से टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष को दिल्ली रवाना कर दिया। इससे औरंगजेब बहुत खुश हुआ था।

विष्णु गुप्ता का कहना है कि हिंदू सेना चाहती है कि दिल्ली स्थित जामा मस्जिद का ASI सर्वे कराए और उन मूर्तियों को बाहर निकाल कर फिर से मंदिरों में स्थापित किया जाए। इस सर्वे से मुगल आक्रांता औरंगजेब की क्रूरता और मंदिर तोड़ने की सच्चाई भी दुनिया के सामने आ सकेगी। विष्णु गुप्ता द्वारा ASI को लिखी गई चिट्ठी की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

बता दें कि अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का सर्वे कराने की माँग को लेकर भी उन्होंने एक याचिका दी है। इसके बाद कोर्ट ने अल्पसंख्यक मंत्रालय और ASI से जवाब माँगा है। इस याचिका के बाद विष्णु गुप्ता को जान से मारने की धमकी भी मिली है। तीन दिन पहले उन्हें कनाडा से के एक नंबर से धमकी भरा कॉल आया था।

विष्णु गुप्ता को फोन करने वाले कॉल करने वाले कॉलर ने उन्हें ‘सर तन से जुदा’ करने की धमकी दी थी। विष्णु गुप्ता ने बताया था कि धमकी देने वाले ने कहा था, “तेरा सिर कलम कर दिया जाएगा, गर्दन काट दी जाएगी। तुमने अजमेर दरगाह का केस फाइल करके बहुत बड़ी गलती कर दी है। अब तू नहीं बचेगा।”

इधर सचिन का हाथ नहीं छोड़ रहे थे कांबली, उधर 22 साल की उम्र में ही संन्यास लेने वाले एक क्रिकेटर की कमाई में हाथ नहीं पकड़ सकते तेंदुलकर: ‘महाराजा’ अजय जाडेजा भी औकात में नहीं टिकते

सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल है। इसमें बीते जमाने के दो ऐसे क्रिकेटर दिख रहे हैं जो कभी गहरे दोस्त थे। एक ही गुरु (रमाकांत आचरेकर) के शिष्य थे। दोनों को भारतीय क्रिकेट टीम में जगह भी मिली। फेम भी। लेकिन दोनों की यात्रा की कहानी अलग-अलग है।

एक (सचिन तेंदुलकर) ने क्रिकेट को अपने तरीके से परिभाषित किया और ‘मास्टर ब्लास्टर’ और ‘गॉड ऑफ क्रिकेट’ जैसा तमगे हासिल किए। दूसरे (विनोद कांबली) की यात्रा बताती है कि एक खिलाड़ी को अपने जीवन में क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

वायरल वीडियो उसी शिवाजी पार्क का है जहाँ कभी सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली घंटों पसीने बहा कर अपने क्रिकेटिंग कौशल को निखारते थे। कार्यक्रम उसी कोच आचरेकर के स्मारक के अनावरण का था जो इन दोनों को तराश रहे थे। वीडियो में आप देख सकते हैं कि सचिन मंच पर बैठने के लिए आगे बढ़ने से पहले विनोद कांबली से मिलते हैं। दोनों में कुछ देर बातचीत होती है। फिर सचिन आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन कांबली उनका हाथ नहीं छोड़ते। इधर मंच उद्घोषक बार-बार सचिन से अपनी जगह पर बैठने की अपील करते रहते है। इसी इवेंट के एक और वायरल वीडियो में कांबली को सचिन का सिर सहलाते देखा जा सकता है।

कांबली को एक ऐसे क्रिकेटर के तौर पर याद किया जाता है जो अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाए। मैदान में वो सफलता हासिल नहीं कर पाए जो उन्हें करना चाहिए था। इसके लिए विलेन भी खुद कांबली ही माने जाते हैं। शायद यही कारण है कि बाद के सालों में सचिन के साथ उनकी दोस्ती में भी पुरानी गर्मजोशी नहीं रही। ऐसे में यह वीडियो ऐसा है जिसमें मानव जीवन के हर भाव एक साथ स्पष्ट नजर आते हैं। खुशी, दर्द, पाश्चाताप… यही इस वीडियो की यूएसपी भी है और सबक भी।

क्रिकेट के मैदान पर सचिन तेंदुलकर ने जो सफलता, जो सम्मान हासिल किया है, उसका दूसरा उदाहरण विरले ही मिलता है। जब उन्होंने खेल के मैदान को छोड़ने का फैसला किया तो बल्लेबाजी के ज्यादातर रिकॉर्ड उनके ही नाम थे। इनमें से बहुतेरे के करीब आज भी कोई नहीं पहुँच पाया है।

लेकिन एक रिकॉर्ड ऐसा भी है जिसमें 22 साल की उम्र में ही संन्यास लेने वाले एक क्रिकेटर के आगे सचिन कहीं नहीं टिकते। विराट कोहली और महेंद्र सिंह धोनी भी नहीं। जामनगर के ‘महाराजा’ बनने के बाद भी पूर्व क्रिकेटर अजय जाडेजा इस मामले में पीछे ही हैं।

हम बात कर रहे हैं कमाई की और 22 साल की उम्र में ही संन्यास लेकर सबको चौंका देने वाले क्रिकेटर आर्यमान बिड़ला की। कभी आईपीएल की राजस्थान रॉयल्स टीम का हिस्सा रहे बिड़ला भारत के सबसे अमीर क्रिकेटर हैं। उनकी कुल संपत्ति 70 हजार करोड़ रुपए के करीब है। 2017-18 में मध्य प्रदेश की तरफ से उन्होंने रणजी ट्रॉफी में पर्दापण किया था। 2018 में राजस्थान रॉयल्स ने उन्हें ₹30 लाख में खरीदा था।

राजस्थान रॉयल्स के साथ दो सीजन बिताने के बाद भी उन्हें आईपीएल में कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिला। ईएसपीएन क्रिक इन्फो पर उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि आर्यमान बिड़ला ने प्रथम श्रेणी के 9 मैच खेले हैं। इनमें कुल 414 रन बनाए। इसमें एक शतक और एक अर्धशतक शामिल है। घरेलू मैचों में अच्छी शुरुआत के बावजूद आर्यमान बिड़ला ने निजी कारणों से 2019 में पेशवर क्रिकेट को अलविदा कह दिया।

जाहिर है कि आर्यमान ने इतनी अकूत संपत्ति क्रिकेट के जरिए हासिल नहीं की है। दरअसल वे कुमार मंगलम बिड़ला के बेटे हैं। कुमार मंगलम भारत के प्रमुख औद्योगिक घरानों में से एक आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन हैं।

वहीं ​सचिन तेंदुलकर का नेटवर्थ 1250 करोड़ रुपए है। महेंद्र सिंह धोनी की 1040 करोड़ रुपए और विराट कोहली की 1020 करोड़ रुपए की है। जामनगर का महाराजा बनने के बाद इस मोर्चे पर अजय जाडेजा भी आगे निकल गए हैं। पहले उनकी कुल संपत्ति करीब 140 करोड़ रुपए की थी। लेकिन ‘महाराजा’ बनते ही विरासत में जो संपत्ति मिली है, उससे उनका नेटवर्थ बढ़कर करीब 1450 करोड़ रुपए हो गया है।