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मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह ढाँचा केस में गलत रिपोर्टिंग ‘कोर्ट की अवमानना’: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मीडिया को दी सख्त चेतावनी, कहा- कोर्ट की पवित्रता बनाए रखें

उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि एवं शाही ईदगाह ढाँचा विवाद मामले में सुनवाई कर रहे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया को चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि अदालती कार्यवाही की गैर-जिम्मेदाराना या किसी भी तरह की गलत रिपोर्टिंग कोर्ट की अवमानना है। कोर्ट ने मामले की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया से संयम बरतने के लिए कहा।

मामले की सुनवाई कर रहे जज राममनोहर नारायण मिश्रा ने कहा कि इस मामले में किसी भी आदेश या कार्यवाही की कोई भी गैर-जिम्मेदाराना या गलत रिपोर्टिंग न्यायालय की अवमानना ​​मानी जाएगी। जज मिश्रा ने कहा, “न्यायालय उम्मीद करता है कि मीडियाकर्मी इस मामले की कार्यवाही की रिपोर्टिंग करते समय उचित संयम बरतेंगे और इस संबंध में न्यायालय के आदेशों की गरिमा और पवित्रता बनाए रखेंगे।”

दरअसल, केस नंबर 18 से जुड़े एक वकील ने कोर्ट में आवेदन देकर इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया द्वारा गलत रिपोर्टिंग का आरोप लगाया था। इसके साथ ही कोर्ट से इसको निर्देश देने की माँग की गई थी। अन्य पक्षों ने भी इस मामले पर चिंता जताई थी। बता दें कि इस केस से जुड़े कई मामलों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

इससे संबंधित मूल मुकदमे में मथुरा स्थित शाही ईदगाह मस्जिद को हटाकर इसकी जमीन को श्रीकृष्ण जन्मभूमि भूमि को लौटाने की माँग की गई है। मूल मुकदमे में कहा गया है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर उस जमीन पर शाही ईदगाह मस्जिद को बनाया गया है। यह मामला मथुरा के सिविल कोर्ट में लंबित था, लेकिन साल मई 2023 में हाई कोर्ट ने इस मामले को अपने हाथों में ले लिया।

इस साल जनवरी में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले से जुड़े 15 मुकदमों को एक साथ जोड़कर उनकी सुनवाई शुरू की थी। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने इन सभी मुकदमों को एक साथ सुनवाई करने का विरोध किया था। इस साल अक्टूबर में हाई कोर्ट ने मुकदमों को एकीकृत करने के अपने निर्देश को वापस लेने से इनकार कर दिया था।

रात का शो नहीं, 3डी के लिए इंतजार, सेंसर बोर्ड ने कई सीन उड़ाए… फिर भी रिलीज से पहले ही फायर है ‘पुष्पा 2’, एडवांस बुकिंग से एक शेयर की भी मौज

पुष्पा नाम सुनकर फ्लावर समझा क्या, फ्लावर नहीं फायर है मैं…

साल 2021 में आई ‘पुष्पा’ फिल्म के इस डायलॉग का खुमार आज भी दर्शकों के जेहन से नहीं उतरा है। अब ‘पुष्पा 2’ रिलीज से पहले ही कमाई की सुनामी आने के संकेत दे रही है।

रिपोर्टों के अनुसार फिल्म की एडवांस बुकिंग का आँकड़ा 125 करोड़ के करीब पहुँच चुका है। करीब 23 लाख टिकटों की बिक्री हो चुकी है। पहले ही दिन वर्ल्डवाइड 250 से 275 करोड़ रुपए के कलेक्शन का अनुमान है। इस फिल्म का बजट करीब 500 करोड़ है। इस तरह से देखें तो पहले ही दिन यह फिल्म अपनी आधी लागत से अधिक निकाल लेगी।

अल्लू अर्जुन और रश्मिका मंदाना की ‘पुष्पा 2’ यदि अनुमानों के हिसाब से पहले दिन कमाई करती है तो यह नया रिकॉर्ड होगा। इससे पहले एसएस राजामौली की 2022 में रिलीज हुई ‘RRR’ ने पहले दिन वर्ल्डवाइड 223 करोड़ रुपए कमाए थे।

‘पुष्पा 2’ 5 दिसंबर 2024 को रिलीज होनी है। उससे एक दिन पहले यानी 4 दिसंबर को अमेरिका में इसका प्रीमियर हुआ है। 5 भाषाओं में यह फिल्म रिलीज की जाएगी। ये हैं- तेलुगु, हिंदी, तमिल, कन्नड़, बंगाली और मलयालम।

‘पुष्पा 2: द रूल’ को लेकर रिलीज से पहले यह दीवानगी तब दिख रही है जब फिल्म बनने के दौरान अल्लू अर्जुन और निर्देशक के बीच मतभेदों की खबर आई थी। इतना ही नहीं मेकर्स ने इस फिल्म के शुरुआती दिनों में नाइट शो भी रद्द कर दिया है। फिल्म के 3डी वर्जन के लिए प्रशंसकों को इंतजार करना होगा। फिलहाल फिल्म 2डी में रिलीज होगी।

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने कुछ बदलावों के साथ इस फिल्म के हिंदी वर्जन को भी पास कर दिया है। मसलन ‘रामावतार’ शब्द को ‘भगवान’ से बदल दिया गया है। जिस सीन में कटे हुए पैर को उड़ते दिखाया गया था, उसे हटा दिया गया है। धूम्रपान के सीन के साथ इससे जुड़ी चेतावनी जोड़ने को कहा गया है। फिल्म के तेलुगु संस्करण को 28 नवंबर को ही पास कर दिया गया था। इस संस्करण में भी मेकर्स को कुछ बदलाव करने पड़े हैं।

एडवांस बुकिंग से साफ है कि यह फिल्म पहले दिन ही 300 करोड़ी क्लब में शामिल हो सकती है। 2021 में पुष्पा ने 267 करोड़ रुपए की कमाई की थी। इस फिल्म के लिए अल्लू अर्जुन को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था।

‘पुष्पा 2’ की बंपर एडवांस बुकिंग का असर पीवीआर के शेयर पर भी दिख रहा है। पिछले 5 दिनों से इसमें तेजी है और यह 1600 रुपए के स्तर पर कारोबार कर रहा है। ब्रोकरेज हाउस यूबीएस की माने तो इस फिल्म के कारण स्टॉक का भाव 2000 रुपए के लेवल को छू सकता है।

दिल्ली की जामा मस्जिद का भी हो सर्वे: सीढ़ियों में दबे हैं सैकड़ों मंदिरों के अवशेष एवं मूर्तियाँ, हिंदू संगठन ने ASI के डायरेक्टर जनरल को लिखी चिट्ठी

दिल्ली स्थित जामा मस्जिद की सर्वे कराने की माँग करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के डायरेक्टर जनरल को चिट्ठी लिखी गई है। इसमें कहा गया है कि मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने जोधपुर और उदयपुर के कृष्ण मंदिर को तोड़कर उसके देव प्रतिमा को दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में लगवाए थे। इसके पीछे औरंगजेब पर साकी मुस्तक खान की पुस्तक मसीर-ई-आलमगीरी को आधार बनाया गया है।

ASI के डायरेक्टर को चिट्ठी हिंदू सेना के प्रमुख विष्णु गुप्त ने लिखी है। इससे पहले हिंदू सेना प्रमुख ने राजस्थान के अजमेर स्थित मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को संकटमोचन महादेव मंदिर बताते हुए कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय, ASI और दरगाह कमिटी को नोटिस देकर 20 दिसंबर तक जवाब माँगा है।

विष्णु गुप्ता ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि जोधपुर और उदयपुर के सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर औरंगजेब ने हिंदुओं को अपमानित करने के लिए उनके अवशेषों को दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर लगवा दिया। जामा मस्जिद ASI के नियंत्रण में है और वह इसके पीछे की सच्चाई पता लगाने के लिए उसका सर्वे कराए। मस्जिदों की सीढ़ियों के नीचे दबे मंदिरों के अवशेषों से हिंदुओं की भावना आहत होती है।

विष्णु गुप्ता ने कहा कि मसीर-ई-आलमगीरी में लिखा है कि 24-25 मई 1689 को रविवार का दिन था। उस दिन खान जहाँ बहादुर जोधपुर से मंदिरों को तबाह करके लौटा। खान जहाँ बहादुर द्वारा मंदिरों को लूटने, प्रतिमाओं को खंडित करने और फिर उन्हें ध्वस्त कर के बाद बैल गाड़ियों से टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष को दिल्ली रवाना कर दिया। इससे औरंगजेब बहुत खुश हुआ था।

विष्णु गुप्ता का कहना है कि हिंदू सेना चाहती है कि दिल्ली स्थित जामा मस्जिद का ASI सर्वे कराए और उन मूर्तियों को बाहर निकाल कर फिर से मंदिरों में स्थापित किया जाए। इस सर्वे से मुगल आक्रांता औरंगजेब की क्रूरता और मंदिर तोड़ने की सच्चाई भी दुनिया के सामने आ सकेगी। विष्णु गुप्ता द्वारा ASI को लिखी गई चिट्ठी की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

बता दें कि अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का सर्वे कराने की माँग को लेकर भी उन्होंने एक याचिका दी है। इसके बाद कोर्ट ने अल्पसंख्यक मंत्रालय और ASI से जवाब माँगा है। इस याचिका के बाद विष्णु गुप्ता को जान से मारने की धमकी भी मिली है। तीन दिन पहले उन्हें कनाडा से के एक नंबर से धमकी भरा कॉल आया था।

विष्णु गुप्ता को फोन करने वाले कॉल करने वाले कॉलर ने उन्हें ‘सर तन से जुदा’ करने की धमकी दी थी। विष्णु गुप्ता ने बताया था कि धमकी देने वाले ने कहा था, “तेरा सिर कलम कर दिया जाएगा, गर्दन काट दी जाएगी। तुमने अजमेर दरगाह का केस फाइल करके बहुत बड़ी गलती कर दी है। अब तू नहीं बचेगा।”

इधर सचिन का हाथ नहीं छोड़ रहे थे कांबली, उधर 22 साल की उम्र में ही संन्यास लेने वाले एक क्रिकेटर की कमाई में हाथ नहीं पकड़ सकते तेंदुलकर: ‘महाराजा’ अजय जाडेजा भी औकात में नहीं टिकते

सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल है। इसमें बीते जमाने के दो ऐसे क्रिकेटर दिख रहे हैं जो कभी गहरे दोस्त थे। एक ही गुरु (रमाकांत आचरेकर) के शिष्य थे। दोनों को भारतीय क्रिकेट टीम में जगह भी मिली। फेम भी। लेकिन दोनों की यात्रा की कहानी अलग-अलग है।

एक (सचिन तेंदुलकर) ने क्रिकेट को अपने तरीके से परिभाषित किया और ‘मास्टर ब्लास्टर’ और ‘गॉड ऑफ क्रिकेट’ जैसा तमगे हासिल किए। दूसरे (विनोद कांबली) की यात्रा बताती है कि एक खिलाड़ी को अपने जीवन में क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

वायरल वीडियो उसी शिवाजी पार्क का है जहाँ कभी सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली घंटों पसीने बहा कर अपने क्रिकेटिंग कौशल को निखारते थे। कार्यक्रम उसी कोच आचरेकर के स्मारक के अनावरण का था जो इन दोनों को तराश रहे थे। वीडियो में आप देख सकते हैं कि सचिन मंच पर बैठने के लिए आगे बढ़ने से पहले विनोद कांबली से मिलते हैं। दोनों में कुछ देर बातचीत होती है। फिर सचिन आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन कांबली उनका हाथ नहीं छोड़ते। इधर मंच उद्घोषक बार-बार सचिन से अपनी जगह पर बैठने की अपील करते रहते है। इसी इवेंट के एक और वायरल वीडियो में कांबली को सचिन का सिर सहलाते देखा जा सकता है।

कांबली को एक ऐसे क्रिकेटर के तौर पर याद किया जाता है जो अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाए। मैदान में वो सफलता हासिल नहीं कर पाए जो उन्हें करना चाहिए था। इसके लिए विलेन भी खुद कांबली ही माने जाते हैं। शायद यही कारण है कि बाद के सालों में सचिन के साथ उनकी दोस्ती में भी पुरानी गर्मजोशी नहीं रही। ऐसे में यह वीडियो ऐसा है जिसमें मानव जीवन के हर भाव एक साथ स्पष्ट नजर आते हैं। खुशी, दर्द, पाश्चाताप… यही इस वीडियो की यूएसपी भी है और सबक भी।

क्रिकेट के मैदान पर सचिन तेंदुलकर ने जो सफलता, जो सम्मान हासिल किया है, उसका दूसरा उदाहरण विरले ही मिलता है। जब उन्होंने खेल के मैदान को छोड़ने का फैसला किया तो बल्लेबाजी के ज्यादातर रिकॉर्ड उनके ही नाम थे। इनमें से बहुतेरे के करीब आज भी कोई नहीं पहुँच पाया है।

लेकिन एक रिकॉर्ड ऐसा भी है जिसमें 22 साल की उम्र में ही संन्यास लेने वाले एक क्रिकेटर के आगे सचिन कहीं नहीं टिकते। विराट कोहली और महेंद्र सिंह धोनी भी नहीं। जामनगर के ‘महाराजा’ बनने के बाद भी पूर्व क्रिकेटर अजय जाडेजा इस मामले में पीछे ही हैं।

हम बात कर रहे हैं कमाई की और 22 साल की उम्र में ही संन्यास लेकर सबको चौंका देने वाले क्रिकेटर आर्यमान बिड़ला की। कभी आईपीएल की राजस्थान रॉयल्स टीम का हिस्सा रहे बिड़ला भारत के सबसे अमीर क्रिकेटर हैं। उनकी कुल संपत्ति 70 हजार करोड़ रुपए के करीब है। 2017-18 में मध्य प्रदेश की तरफ से उन्होंने रणजी ट्रॉफी में पर्दापण किया था। 2018 में राजस्थान रॉयल्स ने उन्हें ₹30 लाख में खरीदा था।

राजस्थान रॉयल्स के साथ दो सीजन बिताने के बाद भी उन्हें आईपीएल में कोई मैच खेलने का मौका नहीं मिला। ईएसपीएन क्रिक इन्फो पर उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि आर्यमान बिड़ला ने प्रथम श्रेणी के 9 मैच खेले हैं। इनमें कुल 414 रन बनाए। इसमें एक शतक और एक अर्धशतक शामिल है। घरेलू मैचों में अच्छी शुरुआत के बावजूद आर्यमान बिड़ला ने निजी कारणों से 2019 में पेशवर क्रिकेट को अलविदा कह दिया।

जाहिर है कि आर्यमान ने इतनी अकूत संपत्ति क्रिकेट के जरिए हासिल नहीं की है। दरअसल वे कुमार मंगलम बिड़ला के बेटे हैं। कुमार मंगलम भारत के प्रमुख औद्योगिक घरानों में से एक आदित्य बिड़ला ग्रुप के चेयरमैन हैं।

वहीं ​सचिन तेंदुलकर का नेटवर्थ 1250 करोड़ रुपए है। महेंद्र सिंह धोनी की 1040 करोड़ रुपए और विराट कोहली की 1020 करोड़ रुपए की है। जामनगर का महाराजा बनने के बाद इस मोर्चे पर अजय जाडेजा भी आगे निकल गए हैं। पहले उनकी कुल संपत्ति करीब 140 करोड़ रुपए की थी। लेकिन ‘महाराजा’ बनते ही विरासत में जो संपत्ति मिली है, उससे उनका नेटवर्थ बढ़कर करीब 1450 करोड़ रुपए हो गया है।

अजमेर दरगाह नहीं, हिंदू मंदिर: वो परिवार, जिनके यहाँ से जाता था चंदन का लेप, 113 साल पहले जज की किताब में भी ब्राह्मण दंपती और पूजा-पाठ का जिक्र

राजस्थान के अजमेर स्थित मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के शिव मंदिर होने का दावा करते हुए एक हिंदू संगठन ने सर्वे कराने की माँग अदालत से की है। हिंदू सेना के प्रमुख विष्णु गुप्ता ने अपनी याचिका में पूर्व जज हरबिलास शारदा की किताब में दिए गए तथ्यों को आधार बनाकर दावा किया है। कोर्ट ने केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय एवं ASI के साथ दरगाह कमिटि से 20 दिसंबर तक जवाब माँगा है।

अल्पसंख्यक मंत्रालय के संयुक्त सचिव और कार्यवाहक नाजिम नदीम अहमद और ASI मुख्यालय इसका जवाब तैयार कर रहा है। हिंदू पक्ष द्वारा दायर वाद में मोइनुद्दीन चिश्ती की मौजूदा दरगाह परिसर में शिव मंदिर, पूजा-अर्चना स्थल और जैन मंदिर होना बताया गया है। इसके साथ ही पूर्व जज हरबिलास शारदा की किताब पर दावा किया गया है कि यहाँ पर एक ब्राह्मण दंपती पूजा-पाठ करता था।

जज रहे हरबिलास शारदा ने साल 1911 में ‘अजमेर: हिस्टॉरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव’ नाम की एक किताब लिखी है। इस किताब के पेज नंबर 97 पर कहा गया है कि अजमेर दरगाह के नीचे एक तहखाना है और उस तहखाने के अंदर मंदिर में महादेव की छवि है। इस पर हर दिन एक ब्राह्मण परिवार चंदन चढ़ाता था और पूजा करता था। इस जगह को अब दरगाह के घड़ियाली (घंटी बजाने वाला) के रूप में जाना जाता है।

जिस परिवार का जिक्र शारदा ने अपनी किताब में की है, उसे खोज निकालने का दावा मीडिया संस्थान भास्कर ने किया है। मीडिया हाउस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि परिवार का कहना है कि उसके यहाँ से चंदन का लेप जाता था। हालाँकि, परिवार का यह भी दावा है कि यह लेप मंदिर नहीं, दरगाह की मजार पर होता था। करीब 52 साल से परिवार ने वहाँ चंदन नहीं भेजवाया है।

अजमेर दरगाह से सटे होली धड़ा एरिया में कभी शहर के नामचीन वकील रहे केशरीमल बीजावत की ‘कल्याण भवन’ हवेली है। इन्हीं के परिवार से यह चंदन जाता था। केशरीमल बीजावत के बेटे सुशील विजयवर्गीय ने बताया कि उनके घर से चंदन जाता था। उन्होंने बताया कि इसका मासिक भुगतान भी उनके परिवार को मिलता था, लेकिन साल 1972 के बाद से उनका परिवार चंदन नहीं भेजता है।

सुशील ने बताया कि उनके पिताजी इस काम को इसलिए करते थे, क्योंकि ये पीढ़ियों से चला आ रहा था। उन्होंने कहा, “हमारे घर से तैयार होकर चंदन दिन में करीब एक डेढ़ बजे के आसपास दरगाह पर भेजा जाता था। इसके बाद शायद दोपहर की नमाज के बाद चंदन का लेप होता था।” उन्होंने कहा कि उन्हें यही जानकारी है कि वो चंदन मजार लेप किया जाता था।

अजमेर दरगाह के प्रमुख जैनुअल आबेदीन के बेटे सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने भी स्वीकार किया कि हिंदू परिवार से यह चंदन आता था। उन्होंने कहा कि आजादी से पहले तक दरगाह में हिंदू परिवार के घर से चंदन आता था। सन 1947 से पहले एक परिवार था, जो चंदन भेजा करता था। उन्होंने कहा, “हम सबने पढ़ा है। गरीब नवाज की दरगाह में आज भी सुबह-शाम चंदन पेश होता है।”

इस तरह, जज हरबिलास शारदा की किताब में लिखा यह तथ्य कि ब्राह्मण परिवार यहाँ पूजा-अर्चना करता था, सत्य साबित होता है। आमतौर पर दरगाह या मजार पर चंदन का लेप नहीं होता है। वहाँ पर इत्र (बनाया हुआ सुगंधित द्रव्य) और लोहबान (धूप की तरह का सामान) ही जलाया जाता है। चंदन का लेप आमतौर पर मंदिरों एवं देव-देवताओं के विग्रह पर ही होता है।

हरबिलास शारदा ने 168 पन्नों की अपनी किताब में ‘दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती’ नाम से एक पूरा चैप्टर लिखा है। इसके पेज नंबर 93 पर लिखा है कि दरगाह के ‘बुलंद दरवाजे’ की उत्तरी तरफ तीसरी मंजिल पर छतरी है। वह किसी हिंदू इमारत के हिस्से से बनी है। दरवाजे पर बनी छतरी की सतह पर खूबसूरत नक्काशी को चूने और रंग पुताई से भर दिया गया।

इसी चैप्टर के पेज नंबर 94 पर लिखा है कि छतरी में लगा लाल रंग का बलुआ पत्थर, वह किसी जैन मंदिर का है। पेज नंबर 96 पर लिखा है कि बुलंद दरवाजे और अंदर के आँगन के नीचे पुराने हिंदू मंदिर के तहखाने हैं। इसी किताब के पेज नंबर 97 पर लिखा है कि तहखाने में हिंदू परंपरा के मुताबिक मंदिर में महादेव की छवि है।

किताब में दावा है कि इस पर हर दिन एक ब्राह्मण परिवार चंदन चढ़ाता था। इस जगह को अब दरगाह के घड़ियाली (घंटी बजाने वाला) के रूप में जाना जाता है। इस दरगाह के तहखाने में कई कमरे अभी भी वैसे ही हैं। किताब में दावा किया गया है कि इन सब बनावट को देखकर लगता है कि मुस्लिम शासकों ने किसी पुराने मंदिर की जगह पर दरगाह बनाया है।

सुखबीर सिंह बादल पर गोली चलाने वाला खालिस्तानी आतंकी नारायण सिंह: पाकिस्तान में लिया ट्रेनिंग, CM बेअंत सिंह के हत्यारों को जेल से भगाया, पुलिस पर ही ठोकता है मुकदमा

अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में तनखैया की सजा काट रहे अकाली दल के नेता और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर हमला हुआ। इस फायरिंग में बादल बाल-बाल बचे। फायरिंग करने वाले शख्स नारायण सिंह चौरा को बदल के साथ मौजूद लोगों ने पकड़ लिया।

इस पूरी घटना का एक वीडियो भी सामने आया है। वहीं हमलावर नारायण सिंह चौरा के बारे में पता चला है कि वह एक खालिस्तानी आतंकी है और जेल से आतंकियों को भगाने समेत हथियारों की सप्लाई तक के मामले में जुड़ा रहा है।

नारायण सिंह चौरा ने यह हमला तब किया जब सुखबीर सिंह बादल स्वर्ण मंदिर के गेट पर पहरेदार की ड्यूटी कर रहे थे। यह सेवा उन्हें अकाल तख़्त ने करने का आदेश दिया है। अकाल तख़्त ने सुखबीर बादल को ‘तनखैया’ (धार्मिक मामलों में लापरवाही का दोषी) पाया है। उनके साथ ही पंजाब में अकाली सरकार में मंत्री रहे सभी लोगों को सजाएँ दी गई हैं।

नारायण सिंह चौरा ने इसी ड्यूटी के दौरान कमर से अपनी अपनी पिस्टल निकाली और बदल पर फायरिंग करने की कोशिश की। हालाँकि, उसे यहाँ मौजूद लोगों ने पकड़ लिया और पुलिस को सौंप दिया। हमलावर नारायण सिंह चौरा पुराना आतंकी है।

वह 1984 में पाकिस्तान ट्रेनिंग के लिए जा चुका है। वह बब्बर खालसा इंटरनेशनल से जुड़ा रहा है। वह हथियारों की तस्करी में भी जुड़ा था। उसने एक किताब भी लिखी है। वह 2004 में बुडैल जेल से CM बेअंत सिंह के हत्यारे खालिस्तानी आतंकियों को भगाने का आरोपित भी है।

उस पर आरोप है कि उसने बुडैल जेल की बिजली सप्लाई बाधित कर जगतार सिंह तारा, परमजीत सिंह भ्योरा और जगतार सिंह हवारा को भगाया था। इनके साथ एक और आतंकी देवी सिंह भी भाग गया था। नारायण सिंह इन आतंकियों से जेल में आकर मिलता भी था और और उन्हें खाना, कपड़े और पगड़ी समेत तमाम चीजें दे जाता था।

बाद में वह जेल से भागने की प्लानिंग में शामिल हो गया। बताया गया कि परमजीत सिंह के कहने पर उसने जेल के पीछे के हिस्से में पहुँच कर कंटीली तारों पर एक चेन डाली जिससे बिजली गुल हो गई और मौके का फायदा उठा कर यह चारों आतंकी एक गुफा के सहारे जेल से भाग गए।

पंजाब पुलिस ने इस मामले में उसे 2013 में गिरफ्तार किया था। इससे पहले उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया था। चौरा को 2018 में जमानत मिली थी। नारायण सिंह चौरा के खिलाफ UAPA का केस दर्ज किया गया था। उसने इसके खिलाफ पुलिस पर ही मुकदमा दायर कर दिया था।

उसने कहा था कि पुलिस द्वारा उसके फर्जी हस्ताक्षर बनाए गए। उसने 2015 में एक पत्र भी लिखा था, जिसे सिखों के एक आयोजन में पढ़ा गया था। इसमें खालिस्तान की बात की गई थी। नारायण सिंह चौरा सुखबीर सिंह बादल पर हमले के बाद अब पंजाब पुलिस की गिरफ्त में है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री होंगे BJP के देवेंद्र फडणवीस, कुछ शर्तों के साथ एकनाथ शिंदे डिप्टी सीएम के लिए हुए तैयार: 5 दिसंबर को मुंबई के आजाद मैदान में होगा शपथ ग्रहण समारोह

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद को लेकर जारी गतिरोध लगभग खत्म हो गया है। नई सरकार का शपथ ग्रहण गुरुवार (5 दिसंबर 2024) को होगा। भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार (3 दिसंबर 2024) को राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री एवं शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे से मुलाकात की। इसके बाद शिंदे उपमुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार हो गए हैं। फडणवीस मुख्यमंत्री होंगे।

मुख्यमंत्री ने नाम का ऐलान करने के लिए बुधवार (4 दिसंबर 2024) को भाजपा नेतृत्व वाली महायुति गबठबंधन के विधायक दलों की बैठक होगी। इसमें मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा की जाएगी। देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाने की बात सामने आ रही है। दक्षिण मुंबई के आजाद मैदान में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में लगभग 30 विधायक भी कैबिनेट मंत्री की शपथ लेेंगे।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, विभागों के बँटवारा सरकार बनने के बाद किया जाएगा। महायुति में शामिल के कोटे से मुख्यमंत्री होगा और शिवसेना और नेशनलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) से एक-एक उपमुख्यमंत्री बनाए जाएँगे। एकनाथ शिंदे शिवसेना और अजित पवार एनसीपी कोटे से डिप्टी सीएम बनाए जाएँगे। इसको लेकर वरिष्ठ स्तर पर बातचीत जारी है।

कहा जा रहा है कि डिप्टी सीएम पद के बनने के लिए एकनाथ शिंदे ने गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और विधानसभा अध्यक्ष पद की माँग की है। इसके अलावा भी कुछ महत्वपूर्ण विभागों पर शिवसेना ने दावा किया है। हालाँकि, विधानसभा अध्यक्ष और गृहमंत्रालय भाजपा अपने पास रखना चाहती है और इसको लेकर आगे बातचीत जारी रह सकती है।

भाजपा ने संकेत दिया है कि शिवसेना के 11-12 मंत्री बनाए जा सकते हैं, जबकि एनसीपी के 9-10 मंत्री बनाए जा सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि एनसीपी ने 7 कैबिनेट मंत्री और 4 राज्यमंत्री पद की माँग की है। इसके अलावा, केंद्र सरकार में एक कैबिनेट मंत्री और एक राज्यपाल पद की भी माँग की है। हालाँकि, इसको लेकर अभी पुष्टिकरण सामने नहीं आया है।

दरअसल, भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री पद अपने पास रखने की खबरों के बीच एकनाथ शिंदे अपने गाँव चले गए थे। दो दिन बाद वे वहाँ लौटे गले में संक्रमण की बात कहकर अस्पताल में चले गए। वे बैठक से दूर रहे। इसके बाद मंगलवार को देवेंद्र फडणवीस उनके आवास पर जाकर मुलाकात की। यह मुलाकात लगभग 30 मिनट तक चली। इसके बाद सहमति बनती नजर आई है।

बता दें कि 23 नवंबर को आए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों में महायुति गठबंधन को भारी बहुमत मिला है। विधानसभा की कुल 288 सीटों में भाजपा को सबसे अधिक 132 सीटें मिली हैं। वहीं, शिवसेना के 57 और एनसीपी ने 41 विधायक बने हैं। भाजपा ने इस बार चुनाव में कुल 149 उम्मीदवार उतारे थे। वहीं, शिवसेना ने 81 और एनसीपी ने 59 प्रत्याशियों को टिकट दिया था।

संभल में मिले पाकिस्तान-अमेरिका में बने कारतूस, विदेशी फंडिंग का भी शक: मस्जिद सर्वे को रोकने के लिए क्या विदेशों से आए थे हथियार?

उत्तर प्रदेश के संभल में पुलिस को मस्जिद सर्वे के दौरान हुई हिंसा की जाँच में पाकिस्तान और अमेरिका में बनी हुई कारतूस मिली हैं। इन्हें एक जगह नाली के पास से बरामद किया गया है। पुलिस को आशंका है कि इस पूरी हिंसा में विदेशी फंडिंग का लिंक भी हो सकता है। मामले में अब NIA की भी मदद लिए जाने के कयास लगाए गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार (3 दिसम्बर, 2024) को संभल में जाँच करने पहुँची पुलिस की SIT और फॉरेंसिक की टीम को कुल 6 कारतूसों के खोखे मिले हैं। इनमें से 5 फायर हो चुके थे जबकि एक फायर नहीं हो पाया था। इनमें से एक पर ‘POF’ यानि पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्ट्री लिखा हुआ था।

यह कारतूस 9 MM का था। वहीं एक कारतूस पर मेड इन USA लिखा हुआ था। यह कारतूस .32 कैलिबर का था। एक और कारतूस पर ‘FN-STAR’ लिखा हुआ था। यह सारे कारतूस फॉरेंसिक की टीम को एक नाली के पास मिट्टी में दबे हुए मिले। यहाँ फॉरेंसिक टीम 24 नवंबर को हुई हिंसा की जाँच के लिए मेटल डिटेक्टर समेत तमाम साजोसामान के साथ पहुँची थी।

विदेशी कारतूसों के अलावा बाक़ी तीन कारतूस में से दो 12 बोर जबकि एक .32 कैलिबर है। इनके विषय में पुलिस ने बताया है कि इनमें से किसी भी कारतूस का इस्तेमाल पुलिस नहीं करती। संभल के एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई ने इसे गंभीर करार दिया है। उन्होंने कहा है कि इस पूरे मामले की जाँच में अब यह एंगल भी जोड़ा जाएगा।

कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया है कि जहाँ पर 24 नवम्बर, 2024 को हिंसा हुई थी, उस इलाके के कई CCTV कैमरा को भी तोड़ दिया गया है। उन्होंने कहा है कि जो भी कैमरे और DVR बचे हैं उनकी जाँच कर सबूत जुटाए जाएँगे। उन्होंने विदेशी खोखे मिलने के बाद कहा है कि अब दूसरी एजेंसियों की मदद भी ली जाएगी।

NIA की मदद भी इस मामले में विदेशी लिंक खोजने के लिए ली जा सकती है। कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया है कि विदेशी खोखों की जाँच करने के लिए उन्हें फॉरेंसिक एजेंसी के पास भेजा जाएगा और मामले में बैलिस्टिक एक्सपर्ट की राय माँगी जाएगी।

गौरतलब है कि 19 नवम्बर, 2024 को संभल में कोर्ट जिला अदालत ने जामा मस्जिद में सर्वे का आदेश दिया था। यह आदेश हिन्दू पक्ष की याचिका के बाद दिया गया था। हिन्दू पक्ष ने कहा था कि जहाँ आज जामा मस्जिद है, वहाँ पर कभी हरिहर मंदिर हुआ करता था, जिसे मुग़ल आक्रान्ताओं ने तोड़ दिया था।

19 नवम्बर को यह सर्वे पूरा नहीं हो पाया था, इसमें मुस्लिम भीड़ ने व्यवधान डाल दिया था। इसके बाद 24 नवम्बर को सर्वे के लिए टीम दोबारा पहुँची थी। इसी दौरान जामा मस्जिद के आसपास इलाकों में इकट्ठा हुई मुस्लिम भीड़ ने हिंसा चालू कर दी। इसमें कई पुलिस वाले घायल हुए और एक पुलिस अफसर अनुज चौधरी के गोली भी लगी।

हिंसा के दौरान हुई फायरिंग में 5 मुस्लिम मारे गए। शुरूआती जाँच में बताया गया है कि उसकी फायरिंग में कोई मौत नहीं हुई बल्कि यह आपसी लड़ाई का मसला हो सकता है। इस हिंसा की जाँच 2 SIT टीम कर रही हैं। पूरी घटना की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग भी गठित किया गया है।

अयोध्या जीता, मथुरा-काशी शेष… संभल-बदायूँ या अजमेर में ही हिंदू मंदिरों पर ढाँचा बना देने का नहीं है दावा, जानिए कोर्ट में किन-किन विवादित मस्जिदों का मामला चल रहा

9 नवम्बर, 2019, दिल्ली में स्थित सुप्रीम कोर्ट का खचाखच भरा हुआ एक कमरा। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई समेत 5 जज हिन्दुओं के 500 वर्षों के संघर्ष की परिणिति तय कर देते हैं। अयोध्या में जहाँ पर हिन्दुओं के आराध्य रामलला का मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई गई थी, वह जगह वापस हिन्दुओं को मिलती है। हिन्दू भव्य मंदिर का निर्माण करते हैं। लेकिन यह सिर्फ एक धार्मिक स्थल की बात है। कर्नाटक में भाजपा सरकार में गृह मंत्री रहे KS ईश्वरप्पा ने 2022 में कहा था कि देश में कम से कम 36000 जगह पर मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई गई है।

ऐसी 1800 जगह की सूची ऑपइंडिया ने भी प्रकाशित की थी। अयोध्या के साथ ही काशी और मथुरा में भी मंदिरों पर इस्लामी आक्रमण में की किए गए अत्याचार के खिलाफ लड़ाई आजादी के बाद ही चालू हुई थी। लेकिन अभी यहाँ परिणाम नहीं आ सका है। संभल-बदायूँ पर हाल में हुए हल्ले के बाद ऐसे कई स्थल चर्चा में हैं जहाँ संघर्ष जारी है। ऐसे ही 10 मामलों पर एक नजर डाली जानी चाहिए जिनके लिए अब भी कोर्ट में लड़ाई जारी है।

कमाल मौला मजार बनाम भोजशाला

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला विवाद बहुत पुराना विवाद है। हिंदू पक्ष का मत है कि ये माता सरस्वती का मंदिर है जहाँ देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक आज भी लिखे हुए हैं। सदियों पहले मुसलमानों ने इसकी पवित्रता भंग करते हुए यहाँ मौलाना कमालुद्दीन की मजार बना दी थी जिसके बाद यहाँ मुस्लिमों का आना जाना शुरू हो गया और अब इसे नमाज के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इस मामले में हिन्दू कोर्ट पहुँचे थे। हिन्दू पक्ष की याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मार्च, 2024 में ASI सर्वे का आदेश दिया था।

ASI यहाँ सर्वे कर चुकी है। रिपोर्ट में ASI ने कहा है कि भोजशाला का वर्तमान परिसर यहाँ पहले मौजूद मंदिर के अवशेषों से बनाया गया था। ASI ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में बताया था, “खंभों और की सजावट और उन पर बने भित्तिचित्रों की वास्तुकला से यह कहा जा सकता है कि वह पहले मंदिर का हिस्सा थे। बेसाल्ट के ऊँचे परिसर पर मस्जिद के स्तम्भ बनाते समय इनका दोबारा इस्तेमाल हुआ है। एक स्तम्भ, जिसमे चारों दिशाओं में खाने बने हुए हैं, उसमे देवताओं की नष्ट की हुईं छवियाँ भी हैं।”

अटाला मस्जिद बनाम अटाला देवी

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में बनी अटाला मस्जिद को लेकर भी हिन्दू कोर्ट पहुँचे हैं। मई 2024 में इस संबंध में एक वकील अजय प्रताप सिंह ने याचिका दायर की थी। उन्होंने अपने दावे में कई पुस्तकों में उल्लेखित संदर्भों का हवाला दिया है। साथ ही पुरातत्व विभाग के निदेशक की रिपोर्ट का भी जिक्र किया है।

माना जाता है कि अटाला माता मंदिर का निर्माण कन्नौज के राजा जयचंद्र राठौर ने करवाया था। अजय प्रताप सिंह ने कहा है कि इस मंदिर को तोड़ने का पहला हुक्म फिरोज शाह ने दिया था। बाद में इब्राहिम शाह ने इस पर कब्जा कर मस्जिद बना दिया। वकील अजय प्रताप सिंह की यह याचिका अभी कोर्ट में लंबित है।

टीले वाली मस्जिद बनाम शेषनाग मंदिर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में टीले वाली मस्जिद के खिलाफ भी हिन्दू कोर्ट पहुँचे हैं। साल 2013 में लखनऊ स्थित भगवान शेषनाग टीलेश्वर महादेव विराजमान, लक्ष्मण टीला शेषनाग तीर्थ भूमि और अन्य ने निचली दीवानी कोर्ट में एक सिविल क्लेम किया था, जिसमें कहा गया था कि मुगल आक्रान्ता औरंगजेब के शासनकाल में मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ दिया गया था।

हिंदू याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि संपत्ति के एक हिस्से पर जहाँ मस्जिद है, यह उनका है और इसे उन्हें सौंपा जाना चाहिए। इस मामले में मुस्लिम पक्ष ने हिन्दू पक्ष की याचिका के खिलाफ कोर्ट में अपील भी डाली थी लेकिन उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। वर्तमान में यह मामला कोर्ट के सामने लंबित है।

अजमेर दरगाह बनाम शिव मंदिर

हिन्दू पक्ष की याचिका में यह भी कहा गया है कि यहाँ भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक भी होता था। हिन्दू पक्ष ने अपनी माँग के समर्थन में 1911 में लिखी एक किताब का जिक्र किया है। साथ ही उन्होंने दरगाह में मौजूद ढांचों को भी पुराने मंदिर का हिस्सा बताया है।

हिन्दू पक्ष ने कहा है कि अजमेर के तहखाने में गर्भगृह है। याचिका विष्णु गुप्ता ने दायर की है। विष्णु गुप्ता ने अब इस जगह की सही स्थिति जानने के लिए एक सर्वे की माँग की है। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इसके साथ ही दरगाह के ही निकट अढ़ाई दिन का झोपड़ा मस्जिद को भी मंदिर तोड़ कर बनाया गया है।

संभल जामा मस्जिद बनाम हरि हर मंदिर

संभल के जिला न्यायालय में एक याचिका लगाई गई है। याचिका में कहा गया है कि संभल में स्थित जामा मस्जिद का निर्माण सदियों पुराने श्री हरि हर मंदिर पर किया गया था, जो भगवान कल्कि को समर्पित था और जिसे बाबर ने नष्ट कर दिया था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि यह स्थल हिंदुओं के लिए धार्मिक महत्व रखता है और इसे मुगल काल के दौरान इसे जबरन मस्जिद में बदल दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान में यह संरक्षित स्मारक है। इसको लेकर कोर्ट ने 19 नवम्बर को सर्वे का आदेश दिया था। इसके बाद 24 नवम्बर को भी सर्वे होना था लेकिन इस दिन मुस्लिम भीड़ ने दंगा कर दिया।

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील और एडवोकेट विष्णु शंकर जैन के पिता हरि शंकर जैन, नोएडा के पार्थ यादव साथ अन्य याचिकार्ताओं ने लगाई है। याचिका लगाने वालों में और भी लोग शामिल हैं। उन्होंने कोर्ट से कहा है कि भगवान विष्णु और भगवान शिव के भक्त होने के नाते, उन्हें पूजा-अर्चना के लिए मंदिर में जाने का अधिकार है।

बदायूँ जामा मस्जिद बनाम नीलकंठ महादेव

यूपी के बदायूँ में स्थित शाही जामा मस्जिद पर हिंदू पक्ष ने दावा किया है। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि बदायूँ की जामा मस्जिद असल में पौराणिक नीलकंठ महादेव मंदिर है। इसको लेकर हिंदू पक्ष ने जिला अदालत में याचिका दायर की है। इस मामले की अगली सुनवाई 10 दिसम्बर, 2024 को है।

हिंदू पक्ष की तरफ से वादी मुकेश पटेल ने साल 2022 में अदालत में सबूत पेश करते हुए दावा किया था कि यह मस्जिद पहले नीलकंठ महादेव मंदिर थी। उनकी याचिका में जामा मस्जिद के अंदर हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने की माँग की गई है। मुस्लिम इस याचिका को खारिज करने की माँग कर रहे हैं।

फतेहपुर की जामा मस्जिद बनाम कामाख्या मंदिर

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी में स्थित सलीम चिश्ती की दरगाह के खिलाफ भी हिन्दुओं ने कोर्ट में याचिका दायर की है। हिन्दुओं ने कहा है कि जहाँ आज फतेहपुर में जामा मस्जिद बनी हुई है, वहाँ कभी माँ कामाख्या का मंदिर हुआ करता था। हिन्दू पक्ष यहाँ बनी जामा मस्जिद के भी हिन्दू मंदिर के परिसर में होने की बात कही है।

हिन्दू पक्ष की तरफ से यह याचिका वकील अजय प्रताप सिंह ने दायर की है। उन्होंने ASI के एक अधिकारी की एक पुस्तक का भी जिक्र अपनी याचिका में किया है। उन्होंने कहा है कि इस पुस्तक के अनुसार, यहाँ मस्जिद में हिन्दू और जैन मंदिर के अवशेष से निर्माण किया गया है।

शाही ईदगाह बनाम कृष्ण जन्मस्थान

मथुरा में स्थित शाही ईदगाह वर्तमान में विवादित है और इसको लेकर न्यायालयों में कई याचिकाएँ पड़ी हुई हैं। हिन्दू पक्ष का कहना है कि मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के बराबर में बनी शाही ईदगाह वाला ढाँचा जबरन वही बना दिया गया जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस जगह पर कब्जा करके ढाँचा बनाया गया है। यहाँ अभी भी कई ऐसे सबूत हैं जो कि यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ पहले एक मंदिर हुआ करता था।

हिन्दू पक्ष का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म राजा कंस के कारागार में हुआ था और यह जन्मस्थान शाही ईदगाह के वर्तमान ढाँचे के ठीक नीचे है। सन् 1670 में मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने मथुरा पर हमला कर दिया था और केशवदेव मंदिर को ध्वस्त करके उसके ऊपर शाही ईदगाह ढाँचा बनवा दिया था और इसे मस्जिद कहने लगे। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए हिन्दू यहाँ से शाही ईदगाह ढाँचे को हटाने की माँग करते रहे हैं। इस मामले में सर्वे का आदेश निचली अदालत द्वारा दिया गया था लेकिन उस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है।

ज्ञानवापी मस्जिद बनाम काशी विश्वनाथ

वाराणसी में काशी विश्वनाथ के बराबर में स्थित विवादित ज्ञानवापी मस्जिद में हिन्दू पक्ष को शुरूआती सफलता भी मिली है। इस मामले में हिन्दू पक्ष ने ASI सर्वे की माँग की थी। कोर्ट ने यहन ASI को सर्वे का आदेश भी दिया था। ASI की रिपोर्ट में बताया गया है कि ढाँचे के भीतर मंदिर का अस्तित्व प्रमाणित करने वाली कई कृतियों को जानबूझकर छुपाकर रखा गया था। ये सभी कृतियाँ (मूर्तियाँ, शिलाएँ, शिलालेख) उन तहखानों की जाँच में मिले हैं, जिन्हें जानबूझकर दीवालों और मलबों के सहारे बंद कर दिया गया था।

31 जनवरी, 2024 को एक आदेश में कहा गया था कि ज्ञानवापी परिसर के भीतर व्यास जी के तहखाने में हिन्दू पूजा अर्चना कर सकते हैं, उन्हें झरोखा दर्शन की अनुमति भी दी गई थी। यह निर्णय आने के बाद प्रशासन ने रात में ही पूजा और आरती चालू करवा दी थी। मस्जिद कमिटी इसके खिलाफ पहले सुप्रीम कोर्ट भी गई थी जहाँ कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया था।

कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद बनाम हिन्दू-जैन मंदिर

2020 में दिल्ली की एक अदालत में क़ुतुब मीनार के भीतर मंदिर होने की बात कहते हुए वहाँ हिन्दुओं को पूजा का अधिकार दिलाने हेतु याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में दावा किया गया है कि क़ुतुब मीनार के भीतर ही हिन्दू और जैन मंदिर परिसर स्थित है।

याचिका में कहा गया है कि अंदर 27 मंदिर हुआ करते थे, जिनमें मुख्य रूप से जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के अलावा भगवान विष्णु प्रमुख रूप से स्थापित हैं। और इन्हीं मंदिरों को तोड़ कर ही मस्जिद का निर्माण किया गया। इस मामले में को निचली अदालत ने खारिज कर दिया था, जिसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई है।

पैर पर प्लास्टर, गले में तख्ती, हाथ में भाला… व्हील चेयर पर बैठ ‘पहरेदार’ बने सुखबीर सिंह बादल: जानिए किन गलतियों की मिली है सजा, क्यों शौचालय की सफाई से मिली माफी

पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री और अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर यानी श्री हरमंदिर साहिब में सजा के तौर पर सेवा की। मंगलवार (3 दिसंबर 2024) को सुखबीर बादल व्हीलचेयर पर गुरुद्वारे पहुँचे। उनके गले में ‘दोषी’ लिखी तख्ती लटकी हुई थी और उन्होंने सेवादार की पोशाक पहनी हुई थी। हाथ में भाला लिए सुखबीर ने गुरुद्वारे के मुख्य द्वार पर पहरेदारी की सेवा निभाई।

सुखबीर सिंह बादल के साथ अकाली दल के अन्य नेता भी धार्मिक सजा का पालन करते नजर आए। सुखबीर सिंह के पैर में प्लास्टर लगा होने के कारण उन्हें शौचालय की सफाई से छूट दी गई, लेकिन उन्होंने सामुदायिक रसोई में बर्तन साफ किए और पहरेदारी की।

बादल और उनकी कैबिनेट को क्यों सुनाई गई सजा?

सिख समुदाय के सर्वोच्च धार्मिक संस्था, श्री अकाल तख्त साहिब, ने सुखबीर बादल और उनकी सरकार के कई नेताओं को 2007 से 2017 तक धार्मिक गलतियों के लिए दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। इसमें प्रमुख आरोप हैं:

डेरा सच्चा सौदा मामले में माफी दिलवाना: साल 2007 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पर सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी की परंपरा का अपमान करने का आरोप था। इस पर पुलिस में मामला दर्ज किया गया, लेकिन सुखबीर बादल ने डेरा प्रमुख को माफी दिलाने में अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर कार्रवाई न करना: 2015 में फरीदकोट के बरगाड़ी और बुर्ज जवाहर सिंह वाला में गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र बीड़ चोरी और अंग फाड़ने की घटनाएं हुईं। इसके बाद बड़े विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन सुखबीर बादल की सरकार दोषियों को सजा दिलाने में नाकाम रही।

राजनीतिक विज्ञापन के लिए संगत के धन का इस्तेमाल: अकाल तख्त ने आरोप लगाया कि बादल सरकार ने गुरुद्वारों की संगत के पैसे का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिए किया।

डीजीपी सुमेध सैनी की नियुक्ति: बादल सरकार ने एक विवादित अधिकारी सुमेध सैनी को पंजाब पुलिस का डीजीपी नियुक्त किया, जिन्हें कथित तौर पर सिख युवाओं के फर्जी एनकाउंटर के लिए जाना जाता है। इसके अलावा साल 2012 के चुनाव में पंजाब के विवादित डीजीपी रहे इजहार आलम की बीवी को अकाली दल से टिकट देकर विधायक बनाया था। इजहार ने खालिस्तानी आतंकवाद को खत्म करने के लिए कथित तौर पर प्राइवेट मिलिशिया ‘आलम सेना’ का गठन किया था।

धर्म विरुद्ध आचरण: धार्मिक गलतियों के चलते सुखबीर बादल और उनके पिता प्रकाश सिंह बादल को “फख्र-ए-कौम” का खिताब भी वापस ले लिया गया।

कौन-कौन सजा भुगत रहे हैं?

सुखबीर बादल के साथ अन्य अकाली नेताओं को भी धार्मिक दंड दिया गया। इन नेताओं में सुखदेव सिंह ढींडसा, बिक्रम सिंह मजीठिया, दलजीत सिंह चीमा, बीबी जागीर कौर और महेशिंदर सिंह ग्रेवाल शामिल हैं।

सुखबीर बादल: व्हीलचेयर पर गले में पट्टिका लटकाए और भाला लेकर पहरेदारी की। उन्हें टॉयलेट साफ करने से छूट दी गई।

सुखदेव सिंह ढींडसा: गुरुद्वारे के मुख्य द्वार पर पहरेदारी की और सामुदायिक रसोई में बर्तन साफ किए।

बिक्रम मजीठिया और अन्य नेता: सामुदायिक शौचालय साफ किए और लंगर हॉल में सेवा की।

अकाल तख्त द्वारा घोषित सजा के मुताबिक, नेताओं ने किए ये काम..

  • एक घंटे तक बाथरूम की सफाई
  • सामुदायिक रसोई में बर्तन धोने और जूते साफ करने की सेवा
  • श्री सुखमनी साहिब का पाठ और कीर्तन सुनने का आदेश
  • सार्वजनिक मंच पर बोलने की मनाही

यह धार्मिक सजा सिख धर्म में ‘तनखैया’ घोषित व्यक्तियों को सुधारने का तरीका है। सुखबीर बादल और अन्य अकाली नेताओं ने अपने कृत्यों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगते हुए सेवा करना स्वीकार किया। यह कदम धार्मिक और राजनीतिक दोनों नजरिए से ऐतिहासिक है।