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उत्तराखंड की जिस सुरंग में फँसे थे 41 श्रमिक, वहाँ अब ‘बाबा बौखनाग’ का मेला: जानिए कौन हैं वे देवता जिनके सामने सिर झुकाने लौटे अंग्रेज वैज्ञानिक भी

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सिल्क्यारा सुरंग में नवम्बर, 2023 में 41 श्रमिक फँस गए थे। यह श्रमिक अंदर काम करने गए थे लेकिन बीच में मलबा आने के कारण यह बाहर नहीं आ सके थे। इसके बाद इनको बचाने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया था। इस पूरे ऑपरेशन में ऑस्ट्रेलियाई रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स की मदद ली गई थी। यहीं पर स्थानीय देवता बाबा बौखनाग का एक मंदिर भी स्थापित किया गया था। श्रमिकों को 18 दिन चले राहत-बचाव ऑपरेशन के बाद सुरक्षित निकाला गया था। अर्नाल्ड डिक्स ने इसे बाबा बौखनाग की कृपा बताया था।

अब इसी सिल्क्यारा सुरंग के बाहर रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा होने के एक वर्ष के बाद मेला लगा है। यह मेला बाबा बौखनाग के स्थान पर ही लगाया गया है। यह कार्यक्रम स्थानीय लोग और उत्तराखंड सरकार मिल कर करवा रही है। यह मेला सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को आयोजित किया जा रहा है। इसे सिल्क्यारा सुरंग के बाहर ही आयोजित किया गया है।

बाबा की अर्चना को लौटे अर्नाल्ड

रेस्क्यू ऑपरेशन के पूरा होने में बड़ा रोल निभाने वाले अर्नाल्ड डिक्स को वापस उत्तराखंड बुलाया गया है। उन्हें बाबा बौखनाग के मेले में विशेष अतिथि बनाया गया है। अर्नाल्ड डिक्स बीते वर्ष रेस्क्यू ऑपरेशन के समय बाबा बौखनाग के मंदिर में पूजा-अर्चना करते दिखे थे।

डिक्स ने रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म होने के बाद मंदिर में बाबा बौखनाग को जाकर धन्यवाद ज्ञापित किया था। अर्नाल्ड डिक्स एक बार फिर बाबा बौखनाग का आशीर्वाद इस मंदिर पहुँचे हैं। वह यहाँ मेले में शामिल हुए हैं और उन्होंने मीडिया से भी बात की है और अपने अनुभव साझा किए हैं।

उन्होंने स्थानीय पत्रकार देव रतूड़ी को बताया, “मुझे यहाँ पर बाबा बौखनाग के बारे में बताया गया था। मैंने बाबा से प्रार्थना की कि यहाँ 41 फँसे लोग हैं वो सुरक्षित बच जाएँ क्योंकि उन्होंने कोई गलत नहीं किया। मैंने हम लोगों के बचने के लिए भी प्रार्थना की क्योंकि हम तो उनकी सहायता कर रहे थे।”

अर्नाल्ड डिक्स ने बीते वर्ष गंगा में नहाने को लेकर अपना अनुभव भी बताया। उन्होंने बताया कि गंगा में नहा कर उन्हें हल्का महसूस हुआ। अर्नाल्ड डिक्स ने भारत से प्रगाढ़ हुए अपने सम्बन्धों को भी इसके बाद बताया। डिक्स ने कहा कि अब उनके पास एक बेटी है जो भारतीय है।

कौन हैं बौखनाग देवता?

सुरंग से श्रमिकों के निकलने को जिन बौखनाग देवता की कृपा बताया गया, वह यहाँ के खेत्रपाल देवता है। खेत्रपाल उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में उस क्षेत्र विशेष की रक्षा करने वाले देवता को कहा जाता है। खेत्रपाल शब्द ‘क्षेत्रपाल’ शब्द का स्थानीय गढ़वाली भाषा में रूपांतरण है, गढ़वाली में ‘क्ष’ अक्षर ‘ख’ बोला जाता है।

बाबा बौखनाग को बासकी नाग का रूप माना जाता है। स्थानीय लोग बताते है कि भगवान श्रीकृष्ण यहाँ पहले पहुँचे थे और फिर सेम मुखेम गए थे। सेम मुखेम में भी नागराजा का एक मंदिर है। यहाँ इससे पहले भी मेला लगता रहा है।

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में हिन्दू देवी-देवताओं से इतर स्थानीय देवी-देवताओं की बड़ी मान्यता है। यहाँ वन की रक्षा करने वाले वन देवता, क्षेत्र की रक्षा करने वाले खेत्रपाल और अन्य स्थानीय देवताओं की पूजा की जाती है। हालाँकि, पूरे देश में क्षेत्र विशेष के देवता होते हैं, जिन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

स्थानीय लोग बताते हैं यह आवश्यक नहीं है कि इन सभी देवताओं का एक निश्चित स्थान पर भव्य मंदिर बना हो। कहीं-कहीं स्थानीय देवता के नाम पर मात्र किसी पत्थर की भी पूजा हो सकती है। जहाँ पर यह सुरंग हादसा हुआ है, वहाँ भी कोई भव्य मंदिर नहीं बना था।

बौखनाग देवता के अलावा इस क्षेत्र में ऐसे कई देवता हैं, जिन्हें नागराजा और अन्य नामों से जाना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नाग शब्द वाले देवताओं का संबंध भगवान विष्णु की शैया के रूप से सेवा देने वाले भगवान शेषनाग से है।

जुमे पर रची गई थी संभल हिंसा की साजिश: सपा MP जियाउर्रहमान बर्क और MLA इकबाल महमूद के बेटे पर FIR, जामा मस्जिद का सर्वे करने आई टीम पर हुआ था हमला

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को हुई हिंसा के बाद पुलिस ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। इस घटना में अब तक 7 FIR दर्ज की जा चुकी हैं। हिंसा में समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क और विधायक नवाब इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल का नाम प्रमुख आरोपितों में शामिल है। पुलिस ने 2 थानाक्षेत्रों-कोतवाली नगर और नक्खासा में केस दर्ज किए हैं।

हिंसा की शुरुआत शुक्रवार (22 नवंबर) को जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इकबाल द्वारा भीड़ जुटाकर दिए गए कथित भड़काऊ बयानों से हुई। कोतवाली नगर इलाके में जामा मस्जिद के पास भीड़ ने हमला किया, जिसमें SDM, DSP, SP के PRO समेत लगभग 2 दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद नक्खासा इलाके में पत्थरबाजी हुई, जिसमें मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। इस दौरान भीड़ ने पुलिस की एक बाइक को आग के हवाले कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के संभल जिले रविवार (24 नवंबर 2024) को भड़की हिंसा के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है। संभल जिले में अब तक पुलिस की तरफ से 2 थानाक्षेत्रों में कुल 7 FIR दर्ज की जा चुकी है। इन केसों में समाजवादी पार्टी का सांसद जियाउर्रहमान बर्क और इसी पार्टी से विधायक नवाब इकबाल महमूद का बेटा सुहैल इक़बाल के नाम प्रमुख हैं। सभी मृतकों को रात में ही दफना दिया गया है। लगभग 2 दर्जन से अधिक आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार आरोपितों में मुस्लिम महिलाएँ भी हैं।

जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इक़बाल के खिलाफ तहरीर चौकी प्रभारी के पद पर तैनात एक सब इंस्पेक्टर ने दी है। अपनी तहरीर में चौकी इंचार्ज ने बताया है कि जियाउर्रहमान बर्क और सुहैल इक़बाल ने शुक्रवार (22 नवंबर 2024) को अनधिकृत तौर पर भीड़ जुटा कर भड़काऊ बयानबाजी की थी। हिंसा 2 थानाक्षेत्रों में भड़की थी। ये थानाक्षेत्र कोतवाली नगर और नक्खासा हैं। पहला हमला कोतवाली नगर इलाके में जामा मस्जिद के आसपास हुआ था। इस हमले में SDM, DSP, SP के PRO सहित लगभग 2 दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए थे।

कोतवाली नगर क्षेत्र में घायल DSP, SDM, और अन्य अधिकारियों की तहरीर पर केस दर्ज किए गए हैं। वहीं, नक्खासा थाने में पुलिस वाहन जलाने और पत्थरबाजी के आरोप में FIR दर्ज हुई है। सभी केसों में सरकारी कार्य में बाधा डालना, हत्या के प्रयास, दंगा भड़काना जैसी गंभीर धाराएँ लगाई गई हैं। पुलिस अधीक्षक के अनुसार, पकड़े गए आरोपितों से पूछताछ जारी है ताकि हिंसा में शामिल अन्य लोगों की पहचान हो सके। पुलिस मामले में सख्ती बरत रही है और जल्द ही और भी गिरफ्तारी होने की उम्मीद है।

इसी दिन दूसरी पत्थरबाजी संभल के नक्खासा इलाके में हुई थी। इस पथराव में मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। पत्थरबाजी के साथ पुलिस की एक बाइक को मुस्लिम भीड़ ने आग के हवाले कर दिया था। नक्खासा वही क्षेत्र है जहाँ FIR में नामजद जियाउर्रहमान बर्क का घर है। संभल के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि हिंसा को जरूरी बल प्रयोग कर के लगभग 1 घंटे के अंदर ही काबू पा लिया गया था। सभी मृतकों के शवों का रात में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया है।

इस हिंसा में अब तक कुल 7 FIR दर्ज हुई हैं। कोतवाली नगर इलाके में यह केस घायल DSP और SDM के साथ 2 चौकी प्रभारियों के साथ SHO की तहरीर पर दर्ज हुए हैं। वहीं नक्खासा थानाक्षेत्र में भी एक FIR पुलिस के वाहन फूँकने और पथराव के आरोप में दर्ज हुई है। इन सभी FIR में सरकारी काम में बाधा डालना, हत्या के प्रयास, दंगा भड़काने सहित कई अन्य गंभीर धाराओं में कार्रवाई की गई है। पकड़े गए आरोपितों से हिंसा में शामिल उनके साथियों के बारे में पूछताछ की जा रही है।

हिन्दू लड़की को खींचकर मुस्लिम युवक ले जा रहे थे जंगल, परिजनों के विरोध पर इस्लामी भीड़ भड़की: मेरठ में पत्थरबाजी, चले धारदार हथियार

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में साम्प्रदायिक तनाव की खबर है। यहाँ एक हिन्दू लड़की को मुस्लिम युवक द्वारा छेड़े जाने के बाद दो पक्ष आमने-सामने आ गए। दोनों तरफ से पत्थरबाजी हुई है जिसे रोकने में पुलिस को काफी मशक्क्त करनी पड़ी। मुस्लिम पक्ष पर फायरिंग करने और धारदार हथियार भी चलाने का आरोप है। कुल 12 लोग घायल हुए हैं जिनका इलाज करवाया जा रहा है। गाँव में फ़ोर्स तैनात कर दी गई है। पुलिस ने एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है जबकि बाकी आरोपितों की तलाश जारी है। घटना रविवार (24 नवंबर 2024) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना मेरठ के थानाक्षेत्र सरधना की है। यहाँ के गाँव मेहरमती गणेशपुर निवासी एक हिन्दू युवक ने रविवार को पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में युवक ने बताया कि रविवार की सुबह उसकी बहन उपले बना रही थी। तभी, वहाँ मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग पहुँच गए जो लड़की से छेड़खानी करने लगे। पीड़िता ने विरोध किया तो आरोपित उसका मुँह दबा कर जंगल की तरफ जाने लगे।

जैसे-तैसे पीड़िता आरोपितों के चंगुल से छूट कर अपने घर पहुँची और परिजनों को सारी बात बताई। इस मामले में गाँव में पंचायत बुलाई गई। पंचायत द्वारा आरोपितों से माफ़ी मँगवा कर मामले को दबा दिया गया। मगर, उसके बाद कुछ ही देर में पीड़िता के घर पर मुस्लिम भीड़ जमा हो गई। इस दौरान भीड़ के हाथों में लाठी-डंडे, धारदार हथियार और अवैध तमंचे थे। इन सभी ने पीड़िता सहित उसके अन्य परिजनों पर हमला बोल दिया।

शिकायतकर्ता के मुताबिक हिंसक भीड़ ने पीड़िता के तमाम पारिवारिक सदस्यों को पीटा। पीड़ित परिवार की चीख पुकार और शोरगुल सुन कर हिन्दू पक्ष के लोग भी जुटने लगे, लेकिन तब मुस्लिम भीड़ ने मदद के लिए आ रहे लोगों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। कुछ ही देर में दोनों पक्षों की तरफ से पथराव होने लगा। पीड़ित पक्ष ने आरोपितों पर धारदार हथियार चलाने और फायरिंग करने का भी आरोप लगया है।

इस बीच मामले की जानकारी पुलिस को मिली। घटनास्थल पर कई थानों की पुलिस पहुँची और विवाद को शांत करवाया। घटना के बाद डिप्टी एसपी भारी फ़ोर्स सहित गाँव में कैम्प कर रहे हैं। इस हिंसा के कुछ वीडियो भी सामने आए हैं जिसमें दोनों पक्षों को एक-दूसरे से उलझते देखा जा सकता है।

मेरठ के एसपी ग्रामीण ने बताया कि पीड़ित परिवार की तहरीर पर एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। कुछ अन्य हमलावर फरार हैं जिनकी तलाश में दबिश दी जा रही है। वहीं हिंसा के वायरल वीडियो के आधार पर अलग से केस दर्ज करके बवाल कर रहे आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। हिन्दू संगठनों ने भी इस मामले में पुलिस से आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

पाकिस्तान में एक-दूसरे को काट रहे शिया-सुन्नी, अब तक 80+ लाशें गिरी: लखनऊ के एक दंगे से जुड़ी हैं जड़ें, जानिए पूरा मामला

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह सूबे में हाल ही में हुई हिंसा में 80 से अधिक लोगों की मौत हो गई। यह हिंसा इस सूबे के कुर्रम इलाके में हुई। हिंसा शिया और सुन्नी मुस्लिमों के कबीलों की इस लड़ाई के कारण बड़ा आर्थिक नुकसान भी हुआ। कई जगह दुकानें जलाई गईं। हिंसा के कारण बड़ी संख्या में परिवार यह इलाका छोड़ रहे हैं। इस इलाके की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है। यहाँ इस लड़ाई में कबीलों के अलावा अलग-अलग लड़ाके भी शामिल हैं। शिया-सुन्नी के बीच इस हिंसा के पीछे कबीलाई लड़ाई के अलावा जमीन का विवाद भी बताया जाता है।

अभी क्या हुआ?

21 नवम्बर, 2024 को खैबर पख्तूनख्वाह के कुर्रम जिले के पारचिनार इलाके में एक जगह पर गाड़ियों के काफिलों पर हमला हुआ। यह काफिले राजधानी पेशावर से पारचिनार और पारचिनार से पेशावर की तरफ जा रहे थे। इन काफिलों में शिया लोग सवार थे। काफिलों में कई सवारी वाली वैन चल रहीं थीं। इनके साथ कुछ सुरक्षाबल के लोग भी थे।

यह काफिले जैसे ही निचले कुर्रम के इलाके में पहुँचे, इन पर आसपास की पहाड़ियों से हमला कर दिया गया। भारी फायरिंग और रॉकेट दागने के कारण इस हमले में कम से कम 43 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। यह हमला सुन्नी लड़ाकों ने किया, ऐसा बताया गया है।

हमले में बड़ी संख्या में लोग घायल भी हैं। शियाओं पर हुए हमले के पीछे 12 अक्टूबर, 2024 को हुआ एक पुराना हमला कारण बताया गया है। इस हमले में 15 सुन्नी लोगों की मौत हुई थी। शियाओं पर इस ताजा हमले के बाद इलाके में हिंसा का दौर चालू हो गया।

हमले से गुस्साए शिया कबीलों ने इसके बाद सुन्नी कबीलों को निशाना बनाना चालू कर दिया। शिया लड़ाकों ने 22 नवम्बर, 2024 को बगान बाजार और कुर्रम के निचले इलाकों को निशाना बनाया। यहाँ एक बाजार में लगभग 200 दुकानें जला दी गईं।

बड़ी संख्या में सुन्नी लोगों को अगवा किया गया। हमले में सुन्नियों की दुकानों और उनके परिवारों को निशाना बनाया गया। यह सिलसिला रविवार तक जारी रहा। इस पूरी हिंसा में 80 से अधिक मारे गए जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। मरने वालों में ज्यादा तादाद शियाओं की है।

4 साल में 1600+ मौतें

पाकिस्तान के कुर्रम इलाके में शिया-सुन्नी की लड़ाई कोई नई बात नहीं है। पारचिनार, पाकिस्तान के उन कुछ इलाकों में है, जहाँ शिया आबादी सुन्नी से अधिक या उनके बराबर है। रिपोर्ट बताती हैं कि यहाँ शियाओं की आबादी लगभग 45% है। इसमें वह कुर्रम के ऊपरी इलाकों में बहुसंख्यक हैं। हालाँकि, निचले इलाकों में सुन्नी मजबूत हैं और यही इलाका इसे बाकी देश से जोड़ता है।

बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट कहती है कि 2007-11 के बीच यहाँ शिया-सुन्नी की लड़ाई के कारण 1600 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। यह आँकड़ा सरकारी है। बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट कहती है कि असल आँकड़ा कहीं ज्यादा है। घायल होने वालों की संख्या 5000 से भी अधिक बताई जाती है।

नवम्बर में हुए इस ताजा हमले से पहले अक्टूबर में यहाँ हिंसा हुई थी। इसमें भी दर्जनों लोग मारे गए थे। उससे पहले सितम्बर में यहाँ 46 लोग मारे गए थे। जुलाई, 2024 में भी यहाँ 30 से अधिक मौतें हुई थीं। यह लड़ाई कई दशकों से जारी है। लड़ाई में शिया-सुन्नी कबीलों के अलावा आतंकी समूहों के शामिल होने की बात भी कही जाती है।

लखनऊ से है इस लड़ाई का कनेक्शन

लड़ाई का मूल कारण 1930 से चली आ रही दुश्मनी बताई जा रही है। 1930 के दशक में तब अविभाजित भारत में लखनऊ में शिया-सुन्नी दंगे हुए थे। लखनऊ में शिया-सुन्नी दंगों का पुराना इतिहास है। इस दंगे के दौरान शिया मौलानाओं की अपील पर पारचिनार इलाके से भी शिया लोग लड़ने के लिए लखनऊ गए थे। इन्हें रोकने के लिए यहाँ के सुन्नी मौलानाओं ने अपील की थी।

इस लड़ाई की जड़ वहीं से पड़ गई थी। इसके अलावा यहाँ रहने वाले शिया और सुन्नी कबीलाई लोग हैं। इन इलाकों में सर के बदले सर का नियम चलता है। बन्दूक रखने को यहाँ सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। कबीलाई लड़ाई में एक और मामला जमीन से जुड़ा हुआ है।

बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट बताती है कि 1890 में अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान यहाँ पर यह कबीले बसाए गए थे। इस इलाके में उसी हिसाब से जमीन भी आवंटित की गई थी। इसी जमीन पर कब्जा शिया का होगा या सुन्नी का, इसी के विवाद में लगातार हिंसा होती है।

जिन जमीनों को लेकर लड़ाई है, उनके कोई भी आधिकारिक दस्तावेज मौजूद नहीं हैं। ऐसे में मालिकाना हक़ को लेकर लड़ाई होती रहती है। जमीन पर लड़ाई इसलिए भी है, क्योंकि यही जमीन इस इलाके में उर्वरा है। यहाँ चावल, फल और बाकी चीजों की खेती होती है।

कबीलाई और दूरस्थ इलाके होने के कारण यहाँ आय के और कोई साधन नहीं है। ऐसे में जमीन की महत्ता और भी बढ़ जाती है। जमीन की यह लड़ाई पारचिनार के कम से कम 10 गाँवों में है। एक शिया परिवार की दूसरे सुन्नी परिवार से लड़ाई भी कबीलाई जंग का रूप ले लेती है। हालाँकि, मसला सिर्फ जमीन को लेकर ही नहीं है।

आपसी मतभेद भी बड़ा मामला

शिया और सुन्नी के बीच लड़ाई का मामला जमीन तक सीमित ना होकर पाकिस्तान की सीमा भी लाँघता है। गौरतलब है कि पाकिस्तान में अधिकांश आबादी सुन्नी है। जिस इलाके में यह लड़ाई हो रही है, वह तीन तरफ से अफगानिस्तान से घिरा है और यह इलाके तालिबान जैसे आतंकी संगठनों का गढ़ हैं। इन आतंकी संगठनों में सुन्नी आतंकी ही शामिल हैं।

अफगानिस्तान में 1979 से चालू हुए जिहाद के बाद इस इलाके में भी सुन्नी आतंकियों की आमद हुई है। शिया कबीलों का आरोप है कि यहाँ के रहने वाले सुन्नी बाहरी आतंकियों को बुला कर उन्हें निशाना बनाते हैं। हमले 1930 के बाद 1960, 1970 और 1990 के दशक में भी हुए हैं।

1971 में यहाँ एक मीनार के निर्माण पर शिया और सुन्नी में लड़ाई हुई थी। 1977 में एक मस्जिद के इमाम की हत्या के बाद भी हिंसा हुई। 2007 में यहाँ चालू हुए दंगों में लगभग 2000 लोग मारे गए थे। इस इलाके के कुछ गाँवों पर अल कायदा और तालिबान ने भी कब्जा करने का प्रयास किया।

अब क्या है स्थिति?

21 नवम्बर से चली आ रही यह लड़ाई 24 नवम्बर को 7 दिनों के लिए शांत हुई। खैबर पख्तूनख्वाह के मुख्य सचिव, कानून मंत्री और पुलिस मुखिया ने यहाँ मौके पर जाकर सुन्नी-शिया कबीलों से बातचीत की और समझौता करवाया। दोनों समूह 7 दिनों के लिए लड़ाई रोकने को राजी हो गए हैं। दोनों समूहों ने एक दूसरे के बंधकों को लौटाने पर भी सहमति दी है। सरकार ने इस मामले में रिपोर्ट भी माँगी है। सरकार के प्रतिनिधियों ने उम्मीद जताई है कि आगे यहाँ हिंसा देखने को नहीं मिलेगी। यह समझौता कितने दिन टिकता है, यह भविष्य के गर्भ में है।

संभल में घरों से निकले हथियार, छतों से पत्थरबाजी करने वाली औरतें भी गिरफ्तार: 2 मृतकों के शरीर में मिली वो गोलियाँ जो पुलिस नहीं करती इस्तेमाल

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को जामा मस्जिद का सर्वे करने गई प्रशासनिक टीम पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया था। इस हमले में अब तक चार लोगों की मौत हो चुकी है। 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं जिसमें से कुछ की हालत गंभीर है। पुलिस ने दबिश दे कर कई उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है जिसमें महिलाएँ भी शामिल हैं। शहर में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। 2 थानों को मिला कर अब तक कुल 5 FIR दर्ज हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ,अब तक संभल में कुल 4 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इसमें 3 मृतकों के नाम नईम, बिलाल और नोमान हैं। इन सभी को पत्थरबाजी में शामिल बताया जा रहा है। मिल रही जानकारी के मुताबिक, इसमें से 2 लोगों को 315 बोर की गोली लगी है। एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस 315 बोर की गोली का इस्तेमाल नहीं करती है। पुलिस की पिस्टल या रायफल में से कोई भी हथियार इस बोर का नहीं होता है।

हिंसा के बाद से पुलिस लगातार दबिश दे रही है। अब तक 20 से अधिक हमलावरों को गिरफ्तार किया गया है जिसमें 2 महिलाएँ भी शामिल हैं। इन हमलावरों के घरों से हथियार भी बरामद हुए है। इसमें एक नए टाइप का भी हथियार है जिसमें दोनों तरफ से धार बनी हुई है। इन सभी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और गैंगस्टर एक्ट में कार्रवाई की जाएगी। हिंसा में शामिल तमाम अन्य लोगों की भी पहचान कर गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।

SP आईपीएस कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया कि जिले की संभल तहसील क्षेत्र में एक दिन के लिए इंटरनेट सेवाएँ बाधित की गईं हैं। जिले में किसी भी बाहरी व्यक्ति अथवा नेता के बिना प्रशासनिक अनुमति के आवागमन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कक्षा 12 तक के स्कूलों को भी सोमवार तक के लिए बंद कर दिया गया है। इस घटना पर मुरादाबाद परिक्षेत्र के कमिश्नर IAS आंजनेय सिंह ने मृतकों के परिजनों से पूछा है कि उनके घर का सदस्य पत्थरबाजी करने क्यों गया था ?

आंजनेय सिंह ने यह भी कहा कि पुलिस पर पत्थर के साथ गोलियाँ भी बरसाई गईं हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस की तरफ से आँसू गैस के गोले छोड़े गए हैं। लगाए जा रहे आरोपों के संबंध में जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आगे बताया कि पूरी रिकार्डिंग पुलिस के पास मौजूद है। उन्होंने कहा कि पत्थरबाज कोई धर्म-पुण्य का काम करने नहीं गए थे। जिले में फ़िलहाल के लिए ईंट और गिट्टी आदि की खरीदारी पर रोक लगा दी गई है।

जिले के सभी निवासियों को साफ़ हिदायत दी गई है कि अगर उनकी छतों पर कोई भी पत्थर और ज्वलनशील पदार्थ मिला तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। नगर पालिका को भी निर्देश मिला है कि सड़क पर बिखरे किसी भी सामान को फ़ौरन जब्त करे। इस हिंसा में लगभग 28 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनका इलाज करवाया जा रहा है। एक घायलों में SP के PRO और DSP अनुज विश्नोई भी शामिल हैं। एक कांस्टेबल के सिर में गंभीर चोट लगी है।

इस पूरे मामले में अब तक कुल 4 FIR दर्ज हुई हैं। इसमें से 3 FIR कोतवाली संभल जबकि एक अन्य नखासा थाने में हुई है। कोतवाली संभल में घायल SDM, SHO और 2 सब इंस्पेक्टरों की तहरीर पर मुकदमे दर्ज किए गए है। वहीं नखासा थाने में भी एक केस पुलिस की तहरीर पर दर्ज हुआ है। यहाँ हमलावरों ने पुलिस पर पत्थर फेंके थे। इसी दौरान पुलिस की एक बाइक को भी जला दिया गया था।

बाप पुलिस का दारोगा, बेटा दिल्ली-UP-बिहार में करता था हथियारों की सप्लाई: STF ने मेरठ में बंदूकों के साथ दबोचा, AK-47 की भी कर चुका है डिलीवरी

उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फ़ोर्स (STF) ने हथियारों की तस्करी के एक बड़े रैकेट का खुलासा किया है। STF ने मेरठ से रोहन नाम के युवक को गिरफ्तार किया है। रोहन हथियारों की तस्करी करने वालेगिरोह का मुखिया बताया जा रहा है। उसके पिता UP पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं और वर्तमान में मथुरा में तैनात हैं। रोहन के पास से 17 बंदूकें और 700 कारतूस बरामद हुए हैं। यह तस्करी पंजाब से की जा रही थी। शनिवार (23 नवंबर 2024) को की गई इस कार्रवाई के बाद अब STF गिरोह के बाकी सदस्यों की तलाश में जुट गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना मेरठ के कांकरखेड़ा थानाक्षेत्र की है। STF के पुलिस अधीक्षक बृजेश सिंह ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए मामले की जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि STF को काफी पहले से पंजाब से अवैध हथियारों की तस्करी के इनपुट मिल रहे थे। यह तस्करी पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में की जाती थी। इसी इनपुट पर STF की टीमें लम्बे समय से तस्करों की तलाश में जुटी थी।

शनिवार की आधी रात STF को एक स्कार्पिओ वाहन में तस्करों के मूवमेंट की सूचना मिली। इस इनपुट पर पुलिस ने घेराबंदी की। सूचना सही पाई गई और वाहन की घेराबंदी कर के एक युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी वाहन में सवार 4 अन्य लोग फरार होने में कामयाब रहे। स्कार्पिओ की तलाशी ली गई तो उसमें 17 बंदूकें और 700 कारतूस मिले। पुलिस ने गाड़ी और हथियारों को जब्त कर लिया।

पूछताछ में पकड़े गए युवक ने अपना नाम रोहन बताया। रोहन बागपत के थानाक्षेत्र बड़ौत का निवासी है। उसके पिता का नाम राकेश सिंह है जो इस समय मथुरा में बतौर सब इंस्पेक्टर तैनात हैं। पूछताछ में रोहन ने अपने द्वारा गिरोह बना कर अवैध हथियारों की तस्करी करना स्वीकार किया। उसने यह भी माना कि वो AK 47 तक की तस्करी कर चुका है। यह AK 47 रोहन के साथ अनिल बालियान से शामली पुलिस ने बरामद की थी। ये हथियार उसे पंजाब से मिलते थे। इन हथियारों को रोहन पूरे UP सहित दिल्ली और बिहार में भी सप्लाई करता था।

रोहन के पास से बरामद बंदूकों में सिंगल बैरल की 5 और 12 दोनाली बंदूकें बरामद हुई हैं। इसी के साथ 12 बोर के 700 कारतूस भी मिले हैं। ये बंदूकें उसने अमृतसर जिले के अटारी रोड स्थित मराठा गन हाउस से खरीदी थीं। गन हाउस का मालिक रोहन के गिरोह को फर्जी रसीदें काट कर 40 से 50 हजार रुपए प्रति बंदूक के हिसाब से बेचा करता था। यह बंदूकें रोहन आगे 80 हजार से 1 लाख रुपए के बीच बेचता था। फर्जी रसीदें अनिल बालियान नाम का व्यक्ति अपने पास रखता था।

अब तक हुई जाँच में पता चला है कि रोहन के गिरोह का नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ है। रोहन का गिरोह मेरठ के शारिक व रिजवान गैंग का भी करीबी माना जाता है। इन दोनों गिरोहों में हथियारों की खरीद-फरोख्त पहले भी हो चुकी है। हथियारों के खरीदारों में बागपत के दीपक भूरा, विपिन और पिंटू दाढी आदि के नाम प्रकाश में आए हैं। गिरफ्तारी के दौरान भी बरामद हुए हथियारों को रोहन किसी को बेचने जा रहा था।

पकड़ा गया रोहन पोस्ट ग्रेजुएट है। उसने लम्बे समय तक अपने पिता की तरह सब इंस्पेक्टर की नौकरी के लिए प्रयास किया। असफल रहने पर वह ठेकेदारी करने लगा। तब उसकी मुलाकत अनिल बालियान उर्फ़ पंजी से हुई। अनिल ने ही रोहन को पैसों का लालच दे कर हथियारों की तस्करी सिखाई। काम में एक्सपर्ट हो जाने के बाद रोहन को ग्राहकों को खोजने और उनसे डील फाइनल करने का टास्क मिला था। फ़िलहाल STF इस गिरोह के फरार चल रहे अन्य सदस्यों की गिरफ्तारी के प्रयास में जुटी हुई है।

60% मुस्लिम, कॉन्ग्रेस के हुसैन परिवार का दबदबा… कुंदरकी जैसी ही है सामागुरी में BJP की जीत भी: असम-मेघालय में NDA का क्लीन स्वीप

बीजेपी की अगुवाई वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) ने असम और मेघालय के उपचुनावों में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए सभी 6 सीटों पर जीत दर्ज की। असम में 5 सीटें बीजेपी, असम गण परिषद (अगप) और यूनाइटेड पीपल्स पार्टी-लिबरल (यूपीपी-लिबरल) ने जीतीं, जबकि मेघालय में एनडीए के घटक दल नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) ने एक सीट अपने नाम की।

असम की सामागुरी सीट पर बीजेपी को मिली जीत खास चर्चा का विषय रही। यह सीट मुस्लिम बहुल क्षेत्र में आती है, और इसे कॉन्ग्रेस का गढ़ माना जाता था। जैसे उत्तर प्रदेश के कुंदरकी में बीजेपी की अप्रत्याशित जीत ने सबको चौंकाया, वैसे ही सामागुरी में बीजेपी की सफलता ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान किया।

दरअसल, सामागुरी सीट नागाँव जिले में आती है। यहाँ के सामागुरी, रुपाही और ढींग जैसे इलाकों में 60 से 92 प्रतिशत तक मुस्लिम वोटर हैं। साल 2011 के जनसंख्या के आँकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। इस सीट पर 1981 से अब तक सिर्फ एक बार (1996) को छोड़कर मुस्लिमों को ही जीत मिली। रकीबुल हुसैन 2001, 2006, 2011, 2016 और 2021 में भी जीत हासिल कर चुके थे, इस साल के लोकसभा चुनाव में रकीबुल ने धुबरी सीट से जीत हासिल की, जिसकी वजह से यहाँ उप-चुनाव हुआ। कॉन्ग्रेस ने रकीबुल के बेटे और NSUI के सचिव-कोषाध्यक्ष तंजिल हुसैन को टिकट दिया था, लेकिन तंजिल को बुरी तरह से हार झेलनी पड़ी।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सामागुरी में बीजेपी की जीत को असम की राजनीति में ‘मील का पत्थर’ करार दिया। बीजेपी के प्रत्याशी दिप्लु रंजन सरमा ने कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार तंजील हुसैन को 24,501 वोटों से हराया। बीजेपी ने इस सीट से अल्पसंख्यक और परिवारवादी राजनीति का गुरूर तोड़ते हुए कॉन्ग्रेस के गढ़ को ध्वस्त कर दिया।

मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि शुरुआत में सामागुरी को ‘मुश्किल’ सीट माना गया था, लेकिन हाल के लोकसभा चुनावों में मुस्लिम बहुल करीमगंज सीट पर बीजेपी की जीत ने यह दिखा दिया कि अल्पसंख्यक समुदाय में भी पार्टी की पैठ बढ़ रही है। उन्होंने कहा, “करीमगंज में हमारी जीत ने यह साबित किया कि हर धर्म के वोट से चुनाव जीता जा सकता है। सामागुरी की जीत उसी कड़ी का हिस्सा है।”

सरमा ने कॉन्ग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी ने ‘किसी का तुष्टिकरण नहीं, बल्कि न्याय सबके लिए’ की नीति अपनाई। उन्होंने बताया कि पार्टी ने जहाँ एक ओर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की, वहीं दूसरी ओर अल्पसंख्यक समुदाय की 25,000 लड़कियों को ‘निजुत मोइना’ योजना का लाभ भी दिया। उन्होंने इसे बीजेपी की ‘संतुलित’ नीति करार दिया।

सामागुरी की जीत के साथ-साथ असम में बीजेपी ने बेहाली और ढोलाई सीटें भी जीतीं। असम गण परिषद ने बोंगाईगाँव और यूपीपी-लिबरल ने सिदली सीट पर जीत दर्ज की। इन चुनावी नतीजों ने असम में बीजेपी और एनडीए की मजबूत स्थिति को और पुख्ता किया है।

सामागुरी और करीमगंज जैसी सीटों पर बीजेपी की जीत दिखाती है कि बीजेपी की रणनीति धीरे-धीरे अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भी असर दिखा रही है। मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “असम की राजनीति अब इसी दिशा में आगे बढ़ेगी। यह साफ है कि आने वाले चुनावों में बीजेपी अपनी ‘न्याय सबके लिए’ नीति के दम पर और मजबूत स्थिति में उभरेगी।”

दिल पर पत्थर रखो या पहाड़ आरफा बीबी, पर सच तो यही है कि मंदिरों पर गढ़ी गई हैं मस्जिदें, तुम्हारे पुरखे भी हैं ‘महादेव’

उत्तर प्रदेश के संभल में हिंसा मामले को इस्लामी पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने नया मोड़ देकर अपनी हिंदू घृणा एक बार फिर खुलकर दिखाई है। उन्होंने बड़ी चालाकी से अपने ट्वीट में मस्जिद में सर्वे करने गई टीम पर हमले की बात को छिपाते हुए सोशल मीडिया पर ये फैलाया है कि ये हिंसा इसलिए हुई क्योंकि ‘संघी’ अब हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजने लगे हैं और अदालतें भी मस्जिदों का सर्वे कराने के लिए आदेश दे रही हैं।

अपने एक ट्वीट में आरफा खानुम शेरवानी ने अयोध्या इस्लामी कट्टरपंथियों को महान दिखाते हुए उनकी पत्थरबाजी और हिंसा को जायज दिखाने का प्रयास किया है। आरफा ने अपने ट्वीट में लिखा, “भारत के मुसलमानों से भारत की सुप्रीम कोर्ट का वादा था अयोध्या सिर्फ़ एक अपवाद होगा। मुसलमानों ने दिल पर पत्थर रखकर अपने देश के अमन-चैन के लिए एक मस्जिद को क़ुर्बान किया। अब संघी अदालतें ‘हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग’ ढूँढने को हरी झंडी दे रही हैं। सुप्रीम कोर्ट का वादा भी झूठा निकला?”

अपने अगले ट्वीट में आरफा खानुम शेरवानी ने पुलिस को विलेन के तौर पर पेश करते हुए ऐसे दिखाया कि पुलिस बेवजह मुस्लिमों पर बंदूक ताने हुए हैं और मुस्लिम नहीं बल्कि हिंदू जय श्रीराम कह कहकर हमला कर रहे हैं। आरफा ने लिखा, “‘चलाओ बे गोली चलाओ’ संघी जज एक घंटे के भीतर सैंकड़ों साल पुरानी मस्जिदों का ‘सर्वे’ करा ले रहे हैं। क़ानून की किताब नहीं जय श्रीराम के नारों के साथ ‘सर्वे टीम’ मस्जिद की ओर कूच कर रही है। संघी पुलिस गोली चला रही है। क्या यही है हिंसा और नाइंसाफ़ी की ज़मीन पर खड़ा विश्वगुरु?”

इस्लामी पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी के इन दोनों ट्वीटों का तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं है, उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक मजहबी भीड़ के उन्माद का बचाव करना है और अपनी कुंठा निकालना है। वो अपने ट्वीट में ये तो बता रही हैं कि पुलिस ने गोली चलाई, लेकिन ये नहीं बता रहीं कि कैसे भीड़ ने छतों से पत्थरबाजी की और पुलिस पर हमले किए।

देख सकते हैं कि एक तरफ वो ट्वीट में वो ये बता रही हैं मुस्लिमों ने अपनी मस्जिद कुर्बान की, जबकि हकीकत यह है कि अयोध्या रामजन्मभूमि को हिंदुओं ने 30 साल की कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद जीता, किसी मुस्लिम ने उस भूमि को देश में अमन-चैन की खातिर हिंदुओं को नहीं दिया। उस भूमि के लिए कारसेवकों ने अपना बलिदान दिया, अपना खून बहाया, तब जाकर उन्हें वापस उसी स्थान पर अपना मंदिर मिल पाया।

गौरतलब है कि संभल मामले में सिर्फ इस्लामी पत्रकार ही नहीं बल्कि इस्लामी नेता भी हिंसा का आरोप हिंदुओं पर मढ़ने से पीछे नहीं हट रहे हैं। पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ये कहा है कि अगर ये लोग हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजेंगे तो देश और समाज में कोई शांति नहीं रह जाएगी। शायद ऐसे पत्रकार और नेताओं के मुताबिक हिंदुओं को आज के समय में अपने कानूनी अधिकारों का प्रयोग करके भी अपने धर्म और धर्मस्थलों के लिए बात नहीं करनी चाहिए और न ही ये बताना चाहिए कि कैसे इस्लामी बर्बरता के चलते हजारों मंदिर ध्वस्त किए गए, उनके मलबे पर मस्जिद खड़े किए गए। इन्हें डर है कि अगर ऐसा होता रहा तो सिर्फ मस्जिदों की दीवारों से हिंदू मंदिर के प्रतीक ही नहीं निकलेंगे बल्कि ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की हकीकत भी सामने आ जाएगी।

UP की जिस सीट पर 64% मुस्लिम, वहाँ BJP के ‘रामवीर’ ने सबकी करवा दी जमानत जब्त: जानिए क्यों है यह जीत खास, क्या है कुंदरकी का वह गणित जिससे खिला कमल

महाराष्ट्र में भाजपा की अगुवाई वाली महायुति गठबंधन के प्रचंड जीत के बीच, अगर किसी विधानसभा सीट की सबसे अधिक चर्चा हो रही है तो वह है उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की कुंदरकी सीट। उत्तर प्रदेश के जिन सात सीटों पर उपचुनाव थे, उनमें से एक सीट यह भी थी। इस सीट की खासियत ये है कि यह मुस्लिम बहुल इलाका है और यहाँ एक हिंदू क्षत्रिय ने चुनाव जीता है। इस सीट की एक और खासियत है। इस सीट पर या या सहसपुर का क्षत्रिय राजपरिवार चुनाव जीता है या फिर मुस्लिमों की तुर्क जाति।

इस बार ठाकुर रामवीर सिंह ने यहाँ जीत का परचम लहराकर भाजपा की 31 साल के वनवास को दूर किया है। इस सीट की खास बात ये है कि यहाँ पर मुस्लिमों की आबादी लगभग 64 प्रतिशत है। वहीं, 36 प्रतिशत में अन्य लोग हैं। मुस्लिमों की इतनी अधिक आबादी होने के बाद ठाकुर रामवीर सिंह को कुल 1,70,371 वोट मिले। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद रिजवान को 1,44,791 वोटों से हराया है। रिजवान को सिर्फ 25,580 वोट ही मिले।

कुंदरकी सीट पर अगर कुल विरोधियों को मिले मत को भी जोड़ दिया जाए तो वो ठाकुर रामवीर सिंह की जीत वाले मत से आधे भी नहीं हैं। यहाँ कुल 11 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े थे। इनके बीच अकेले ठाुकर रामवीर सिंह हिंदू उम्मीदवार थे। अगर इन सभी मुस्लिम उम्मीदवारों के वोट को जोड़ भी दिया जाए तो भी वे 50 हजार के आँकड़े को पूरा नहीं कर पाते। यहाँ तीसरे नंबर पर चंद्रशेखर आजाद की पार्टी आजाद समाज पार्टी के चाँद बाबू थे, जिन्हें 14,201 वोट मिले।

चौथे स्थान पर AIMIM के मोहम्मद वारिस को कुल 8,111 मत मिले। बाकी उम्मीदवार चार दहाई का अंक भी नहीं छू पाए। हाँ, बसपा के रहफतुल्लाह को जरूर 1,099 मत मिले। बाकी लोग तीन अंकों में ही सिमट कर रह गए। अब सवाल ये है कि मुस्लिम बहुल इस सीट पर एक हिंदू उम्मीदवार कैसे जीता, वह भी लगभग डेढ़ लाख वोटों के अंतर से। इसके पीछे ठाकुर रामवीर सिंह की हर समाज में स्वीकार्यता एवं विश्वसनीयता और जातीय समीकरण प्रमुख कारण रहा।

अगर कुंदरकी सीट के इतिहास पर नजर डाले तो यहाँ रहे 13 विधायकों (वर्तमान उपचुनाव को छोड़कर) में 9 तुर्क मुस्लिम विधायक चुने गए। बाकी के चार विधायक सहसपुर बिलारी राजघराने के क्षत्रिय रहे हैं। अगर ठाकुर रामवीर सिंह को छोड़ दें तो इन लोगों के अलावा कुंदरकी सीट से कोई विधायक नहीं बना है। इस सीट पर तुर्क मुस्लिमों का वर्चस्व है। जब भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात आती है तो उसका प्रतिनिधित्व सिर्फ तुर्क मुस्लिम ही करते हैं, दूसरी मुस्लिम जातियों के नहीं।

साल 1974 में सहसपुर राजपरिवार की महारानी इंद्रमोहिनी सिंह यहाँ से चुनाव जीती थीं। साल 1985 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर महारानी इंद्रमोहिनी की बेटी राजकुमारी रीना कुमारी यहाँ से विधायक बनीं। साल 1989 में जनता दल के टिकट पर और साल 1993 में भाजपा के टिकट पर महारानी इंद्रमोहिनी के बेटे महाराजा चंद्रविजय सिंह यहाँ से विधायक बने। इन सभी चुनावों में राजपरिवार ने तुर्क मुस्लिमों को हराया था। बाकी के चुनावों तुर्क मुस्लिम के उम्मीदवार ही जीते।

इस सीट से हाजी अकबर हुसैन जनता पार्टी से साल 1977 में, राजनारायण की पार्टी से साल 1980 में, जनता दल से साल 1991 में और बसपा से साल 1996 एवं 2007 में विधायक बने। अकबर तुर्क जाति से ताल्लुक रखते थे। इसके बाद समाजवादी पार्टी के टिकट पर यहाँ से हाजी मोहम्मद रिजवान साल 2002, साल 2012 और साल 2017 में इस सीट से विधायक बने। ये भी मुस्लिमों की तुर्क जाति से हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहाँ से तुर्क नेता जियाउर्रहमान बर्क जीते।

अगर यहाँ के जातीय समीकरणों की बात करें तो कुंदरकी सीट पर मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 3.84 लाख है। इनमें मुस्लिम वोटरों की संख्या 2.45 लाख है। वहीं, हिंदू वोटरों की संख्या 1.39 लाख है। मुस्लिमों की 2.45 आबादी में 70 हजार तुर्क मुस्लिम हैं। बाकी 1.75 लाख वैसे मुस्लिम हैं, जो हिंदू से धर्मांतरित हुए हैं। इनमें सबसे अधिक 45 हजार राजपूत मुस्लिमों की संख्या है। ऐसे में यहाँ मसला तुर्क मुस्लिम बनाम राजपूत मुस्लिम का था। इसमें राजपूत मुस्लिमों को एक राजपूत नेता का साथ मिल गया और वह आसानी से जीत गया।

भाजपा ने इसी समीकरण को ध्यान में रखकर ठाकुर रामवीर सिंह को टिकट दिया था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ का नारा पूरे देश में गूँज रहा था, तब भी यहाँ सर्वसमाज की बात हो रही थी। ठाकुर रामवीर सिंह राजपूत मुस्लिमों को अपने पालेे में मिलाने में दिन-रात एक कर दी। वे लोगों के साथ गली-गली मुहल्ले-मुहल्ले घूमे। उन्होंने विश्वास दिलाने के लिए नमाजी टोपी और अरबी गमछा तक लिया। इस तरह उन्होंने राजपूत मुस्लिमों में विश्वास दिलाया कि वे उनके लिए सदैव खड़े रहेंगे।

राजपूत मुस्लिम समाज से आने वाले यूपी भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली गाँव-गाँव में बैठकें कीं। उन्होंने नारा दिया- ‘न दूरी है न खाई है, ठाकुर रामवीर सिंह हमारे भाई हैं’। इस नारे का असर भी दिखा और हिंदू समुदाय के साथ-साथ राजपूत मुस्लिमों ने भी ठाकुर रामवीर सिंह के पक्ष में एकतरफा वोटिंग की, जिसका सुखद परिणाम आज 31 साल बाद भाजपा को देखने को मिला।

जातीय समीकरण के अलावा, ठाकुर रामवीर सिंह की छवि ने भी उनकी जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे लगातार दो बार से भाजपा उम्मीदवार के रूप में हार का मुँह देखा है। उन्होंने तीसरी बार में आखिरकार जीत दर्ज की है। जब वे विधायक निर्वाचित नहीं हुए थे, तब वे लोगों की समस्याओं का समाधान निकालने के लिए आगे रहते थे। लोगों के लिए सड़कें, गलियाँ आदि बनवाते थे। किसी तरह की मदद माँगने वाले कोई भी लोग उनके यहाँ से खाली हाथ नहीं जाते थे।

ठाकुर रामवीर सिंह की सहज उपलब्धता और तुर्क बनाम राजपूत मुस्लिम के समीकरण ने इस जीत में बड़ी भूमिका अता की है। यह समीकरण अब भाजपा के लिए बेहद सफल और महत्वपूर्ण हो गया है। बोहरा, पसमांदा और मुस्लिम महिलाओं के एक गुट को अपनी तरफ मिलाने के बाद भाजपा और आरएसएस हिंदू से धर्मांतरित हुए मुस्लिमों को अपनी तरफ मिलाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। देश में मुस्लिम आबादी का सर्वाधिक संख्या धर्मांतरित है। इनमें भी क्षत्रिय समाज की आबादी सबसे अधिक है।

राजपूत मुस्लिम वो लोग हैं, जिन्होंने मजबूरी वश इस्लाम अपना लिया। हालाँकि, अधिकांश लोग अपनी पुरानी पहचान से आज भी जुड़े हैं। वहीं, तुर्क मुस्लिम वो हैं, जिनके पूर्वज आक्रमणकारियों के साथ तुर्की, अरब आदि जगहों से उनके सेवक या सैनिक के रूप में यहाँ आए थे। देश में ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, दलित, पिछड़े, क्षत्रिय आदि लोगों के मुस्लिम मत में धर्मांतरण का बड़ा हिस्सा आज भी मौजूद है, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक में दिख जाता है। तुर्क, शेख या सैयद मुस्लिमों की संख्या बेहद कम है।

अब भाजपा एवं संघ इस समीकरण को पूरे देश में लागू करेगी। संघ के वरिष्ठ नेता ने बताया कि इस समीकरण पर संघ का ध्यान तब गया, जब इस साल लोकसभा चुनावों के दौरान क्षत्रिय समाज अपने राजा-महाराजाओं के अपमान के विरोध में आंदोलन कर रहा था। उस दौरान धर्मांतरित हुए क्षत्रिय समाज के मुस्लिम उनका पूरा सहयोग कर रहे थे। इनमें राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक राजपूत मुस्लिम शामिल थे। वे इस विरोध में क्षत्रिय समाज के साथ कदम से कदम मिलाया। उस नेता का कहना था कि इस नए समीकरण ने भाजपा को रणनीतिक राह दिखाई।

इस सहयोग ने कॉन्ग्रेस के इमरान मसूद को सहारनपुर से लोकसभा सीट जीतने में मदद की थी। इसी समीकरण को ध्यान में रखते हुए सीसामऊ उपचुनाव में नसीम सोलंकी भी जीती हैं। वे पूरे चुनाव मंदिर गई हैं और लोगों को बार-बार याद दिलाया कि उनके पूर्वज हिंदू थे और क्षत्रिय मसाज से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने अपनी मुस्लिम पहचान के बावजूद राजपूत मुस्लिम पहचान को उजागर किया और आखिरकार जीतने में कामयाब रहीं। अब देखना है कि अब नया राजनीतिक समीकरण इस देश में किस तरह का बदलाव लाता है।

वादा अच्छी जिंदगी का, पर भोजन को भी मोहताज: इस्लामी मुल्कों में घुट रही पंजाब की लड़कियों की सिसकियाँ, कुछ ही लौट पाती हैं घर

नौकरी के नाम पर खाड़ी देशों में भेजी गई 9 लड़कियों ने स्वदेश वापस आ कर 28 सितंबर 2024 को राज्यसभा सांसद बलवीर सिंह सींचेवाल से मुलाकात की। इन सभी को वापस लाने में बलवीर सिंह ने काफी मदद की थी। इस दौरान उन्होंने बताया कि खाड़ी देशों में उनको शारीरिक और मानसिक यातना के दौर से गुजरना पड़ा था। इस मुलाकात के बाद यह तथ्य प्रकाश में आया कि पंजाब और उसके आसपास एक रैकेट काफी एक्टिव है जो लड़कियों को विदेशों में नौकरी दिलाने के नाम पर खाड़ी देशों में भेज रहा है।

ओमान, ईराक, सीरिया जैसे देशों से वापस लौटी इन महिलाओं ने बताया कि उनको वहाँ अमानवीय यातनाएँ दी जाती हैं। इन यातनाओं में 20 से 22 घंटों तक काम करवाना, ठीक से खाना-पीना न देना, वापस जाने की माँग पर मारपीट करना और तहखाने में रखना जैसी प्रताड़ना शामिल हैं। इन महिलाओं पर पुरुषों की मालिश और निकाह का दबाव जैसे अनैतिक कामों का दबाव दिया जाता था। लड़कियों को दलदल में धकेल पर उन्हें भेजने वाले दलाल भी मुँह फेर लेते हैं।

आइए जानते हैं कि यह रैकेट कैसे काम करता है किस तरह से भोली-भाली लड़कियाँ इनके चंगुल में फँस जाती हैं।

बरनाला की महिला फँसी ओमान में

दलालों के इस रैकेट की शिकारों में एक महिला पंजाब के बरनाला की भी है। तलाकशुदा व 1 बच्चे की माँ इस महिला के परिजनों ने कर्ज ले कर उसे ओमान भेजा था। महिला अपने बच्चे को मायके में छोड़ कर गई थी। वहाँ जाने के कुछ ही समय बाद महिला के साथ प्रताड़ना का दौर शुरू हो गया था। ओमान में महिला से पैसों की उगाही शुरू कर दी गई। उगाही के लिए ओमान में उसे चोरी के झूठे केस में फँसाने की धमकी भी मिल रही थी।

अक्टूबर 2024 में पीड़िता ने एक रिकॉर्डिंग भेज कर बताया था कि ओमान में हर दिन उसकी पिटाई होती है। कई बार तो पूरे हफ्ते परिजनों से बात भी नहीं करने दी जाती थी। पीड़िता ने खुद को आत्महत्या के लिए मजबूर बताते हुए भारत सरकार से भी मदद की गुहार लगाई थी। महिला की माँ ने बताया कि उनकी बेटी को ओमान भेजने में एक रिश्तेदार ने मध्यस्थता निभाई थी।

दुबई में मनदीप कौर पर फर्जी केस

सितंबर 2024 में भारत दुबई से मनदीप कौर भारत लौटी थीं। वह 5 वर्षों से दुबई में रहती थी। मनदीप कौर मूलतः पंजाब के बरनाला की हैं। उनको दुबई में ड्रग्स के फर्जी केस में फँसा कर प्रताड़ित किया गया। मनदीप कौर के पास पैसे भी खत्म हो गए थे। आख़िरकार राजनैतिक प्रयासों से मनदीप कौर को वापस भारत लाया गया।

ओमान में गीता की बुरी तरह से पिटाई

मनदीप कौर के ही साथ ओमान से गीता को भी नवंबर 2024 में ओमान से भारत लाया गया था। घर की खराब आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए गीता एजेंटों के चक्कर में आ गईं। उनको ओमान भेज दिया गया था। ओमान में गीता को बंधक बना लिया गया। यहाँ गीता की कई बार पिटाई हुई। उनसे लगातर काम करवाया जाता था। गीता को ठीक से खाना-पीना भी नहीं मिलता था।

बताया जॉर्डन, भेज दिया सीरिया

पंजाब के मोगा की रहने वाली एक 32 वर्षीया महिला को जॉर्डन में नौकरी का झाँसा दे कर एजेंटों ने सीरिया भिजवा दिया था। महिला को टूरिस्ट वीजा पर भेजा गया था। एजेंटों ने महिला को अच्छा खाना और बढ़िया सैलरी का झूठा वादा किया था। पीड़िता ने बताया कि एक बहुत बड़े परिवार के लिए उनसे सुबह 4 बजे से रात 12 बजे तक उनसे काम करवाया जाता था। महज एक समय खाना दिया जाता था। जब महिला ने एजेंट से अपनी वापसी की गुहार लगाई तो उस से 2 लाख रुपयों की डिमांड की गई।

2021 में दुबई से वापस आई थीं 8 लड़कियाँ

जनवरी 2021 में दुबई में फँसी 8 लड़कियों को भारत लाया गया था। ये लड़कियाँ पंजाब के अलग-अलग हिस्सों की हैं। इन सभी को अच्छी सैलरी का लालच दे कर एजेंट अपने साथ खाड़ी देश ले गए थे। बाद में सभी को मारा-पीटा जाने लगा। ये सभी लड़कियाँ हिन्दू और सिख धर्म से हैं जो कि नवाँशहर, जालंधर, अमृतसर, लुधियाना, होशियारपुर, कपूरथला और मुक्तसर साहिब की रहने वाली हैं। वापसी के बाद इन लड़कियों ने बताया था कि वहाँ अभी भी भारत के तमाम प्रदेशों की 200 लड़कियाँ फँसी हुई हैं।

शेख ने कराया काम और किया शारीरिक शोषण

अक्टूबर 2022 में पंजाब के मुक्तसर साहिब की एक महिला के ओमान में फँसे होने की जानकारी मिली थी। तब महिला ने अपना वीडियो बना कर खुद को वहाँ से निकालने की गुहार लगाई थी। लगभग 31 वर्षीया इस महिला का आरोप था कि उसे एक शेख के घर काम पर रखा गया है। शेख दिन-रात न सिर्फ जानवरों की तरह उस से काम करवाता था बल्कि अक्सर महिला का यौन शोषण भी करता था।

रात में मालिश का दबाव

जालंधर निवासिनी 35 वर्षीया महिला ने सांसद संत बलवीर सिंह से आपबीती बताई। उसे एक एजेंट ने ओमान के मस्कट भेज दिया था। इस पीड़िता को श्रीलंका और नेपाल सहित कई अन्य देशों की लड़कियों के साथ एक कमरे में बंद कर दिया गया था। यहाँ से पीड़िता को एक परिवार में भेजा गया जिसमें 50 से अधिक सदस्य थे। ये परिवार ऊँट तक खाता था। यही खाना पीड़िता को भी खाने का दबाव बनाया जाता था। हालाँकि महिला इस से इंकार कर देती थी और चावल के साथ नमक खा कर गुजारा कर रही थी।

महिला को हरदम CCTV की नजर में रखा जाता था। जब पीड़िता ने यहाँ काम करने से मना कर दिया तब उसे एजेंट ने अपने ऑफिस में बंधक बना लिया। इस ऑफिस के बॉस ने पीड़िता सहित अन्य लड़कियों पर रात में अपनी मालिश करने का दबाव बनाया। जब पीड़िता ने ऑफिस की एक अन्य महिला स्टा से मदद माँगी तो उसे मालिश करवाने वाले व्यक्ति से निकाह करने की नसीहत दी गई।

ऊपर के कुछ उदाहरण तो महज एक बानगी भर हैं। ऐसी तमाम पीड़िताएँ भी हैं जो अभी खाड़ी देशों में प्रताड़ना झेल रहीं हैं। आइए जानते हैं कि ये महिलाएँ एजेंटों के चक्कर में पड़ कर खाड़ी देशों में कैसे पहुँच जाती हैं।

गरीब और जरूरतमंद महिलाएँ टारगेट पर

मानव तस्करी की तरह संचालित इस नेटवर्क को चलाने वाले एजेंट खासतौर पर गरीब महिलाओं को अपना टारगेट बनाते हैं। इनके निशाने पर कक्षा 10 और 12 पास महिलाएँ ज्यादातर होती हैं। गरीब और अनपढ़ महिलाओं की तलाश में दलालों का नेटवर्क ग्रामीण इलाकों में ज्यादा सक्रिय रहता है। ये लोग न सिर्फ जरूरतमंद महिलाओं बल्कि कैरियर बनाने की इच्छा रखने वाली लड़कियों को भी विदेश में अच्छी नौकरी और वेतन के साथ लक्जरी लाइफ के सपने दिखाते हैं।

पंजाब पुलिस के NRI विंग के ADG प्रवीण कुमार जागरण से बताते हैं कि एजेंटों के चक्कर में आने के बाद महिलाओं के विदेश जाने की जानकारी उन तक नहीं पहुँच पाती। इसी वजह से पुलिस यह तस्दीक नहीं कर पाती कि एजेंट जिस महिला से जो वादा कर के विदेश भेज रहे हैं वो सही है या महज झाँसा। हालाँकि जब इन महिलाओं के विदेश में किसी दिकक्त में फँस जाने की सूचना पुलिस को मिलती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाती है।

विदेश भेजने के नाम पर उगाही

गाँव और शहरों में फैले एजेंट जब किसी महिला को अच्छी नौकरी व बेहतर जिंदगी का भरोसा दे कर अपने झाँसे में ले लेते हैं, तब उनसे उगाही का दौर शुरू हो जाता है। शुरुआती तौर पर पासपोर्ट, वीजा, हवाई जहाज का खर्च आदि बता कर इस महिलाओं से 60 से 70 हजार रुपए ऐंठ लिए जाते हैं। पहले से गरीब महिलाएँ ये पैसे अक्सर अपनी जमीन और गहने आदि बेच कर भरती हैं। उन्हें यह उम्मीद होती है कि विदेश में मिलने वाले अच्छे पैसों से वो जल्द ही अपना कर्ज उतार लेंगी।

सांसद बलवीर सिंह सींचेवाल के मुताबिक जिन कागजी प्रक्रियाओं की लगत अधिकतम 5 हजार है उसे ये एजेंट 60 से 70 हजार रुपये का बता कर कई गुना ज्यादा पैसे ऐंठ रहे हैं। अब तक पीड़िताओं के बयानों के आधार पर पता चला है कि एजेंट उन्हें शॉपिंग मॉल, ब्यूटी पॉर्लर और ऑफिसों में काम दिलाने का झाँसा देते हैं। घरेलू काम भी कई बार बहुत बड़े घरानों के लिए बताया जाता है।

विदेशी पैसों की चकाचौंध से आकर्षण

पंजाब के अलग-अलग शहरों व गाँवों के तमाम लोग विदेशों में बसे हुए हैं। इसमें से अधिकतर कनाडा में शिफ्ट हुए हैं। कईयों ने विदेशों में अपने कारोबार आदि जमा लिए हैं। इस से उनके पूरे परिवार की जीवन शैली में काफी बदलाव आया है। यह बदलाव महंगी गाड़ियों, ऊँची कोठियों आदि के तौर पर दिखाई देता है। यही बदलाव बाकी लोगों को भी विदेश में जा कर पैसे कमाने की दिशा में आगे बढ़ा देता है। एक अनुमान के मुताबिक खाड़ी देशों में फँसी 10 में से महज 3 महिलाएँ ही सही सलामत अपने घरों को वापस लौट पाती हैं।

विदेश में दूतावास ही सहारा

जालंधर में तैनात एक पुलिस अधिकारी ने जागरण को बताया कि वीडियो में फँसी उन्ही लड़कियों की सूचना पुलिस तक आ पाती है जो दूतावास से सम्पर्क करती हैं। दूतावास इन मामलों को आधिकारिक तौर पर भारत में भेजता है जिसके बाद स्थानीय प्रशासन सक्रिय होता है। यहाँ ध्यान रखने योग्य यह है कि जागरूकता की कमी और कई अन्य कारणों से दूसरे देशों में फँसी लड़कियाँ दूतावास तक अपनी शिकायत नहीं पहुँचा पाती हैं। उनकी मदद में विलम्ब इसी वजह से होता है।

पंजाब पुलिस के पास कोई ऐसा डाटा नहीं है जो विदेश में फँसी लड़कियों के सटीक आँकड़े दे सके। हालाँकि विदेश में फंसे लोगों के लिए भारत सरकार ने आधिकारिक ई मेल भी जारी किया है। विदेश में इस तरह की किसी भी मुसीबत में फँसे व्यक्ति के बारे में [email protected] पर मेल कर के मदद माँगी जा सकती है। इसके अलावा टोल फ्री नंबर 110041119051100 पर भी कॉल कर के सहायता माँगी जा सकती है।

पंजाब सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री बलजीत कौर ने मानव तस्करी के बढ़ते इन मामलों का संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा है विदेश में फँसी उन लड़कियों की जानकारी जुटाई जा रही है जो पंजाब से गई हैं। बलजीत कौर ने आगे बताया कि सरकार युवाओं को जागरूक करने के साथ इस मामले में जल्द ही नई पॉलिसी लाने जा रही है। उन परिजनों से भी सम्पर्क करने का प्रयास किया जा रहा है जिनके घर की महिलाएँ विदेश में हैं।

पिछले 2 वर्षों में वापस लौटीं 100 से अधिक महिलाएँ

एक आँकड़े के अनुसार पिछले 2 वर्षों में खाड़ी देशों से लगभग 104 महिलाएँ पंजाब वापस लौटी हैं। इसमें सबसे अधिक संख्या जालंधर से है। यहाँ से 23 महिलाएँ वापस लौट कर आई हैं। दूसरे और तीसरे नंबर पर कपूरथला और फ़िरोज़पुर है। यहाँ से क्रमशः 19 और 14 महिलाएँ लौट कर स्वदेश आई हैं। पंजाब के ही तरनतारन से 10 व मोगा से 8 महिलाएँ वापस लौटी हैं। लुधियाना, अमृतसर, गुरदासपुर और बरनाला से 2-2 महिलाएँ खाड़ी देशों से पंजाब वापस आई हैं।

इसी के साथ धरमकोट, फरीदकोट, रूपनगर, फजिल्का, नवाँशहर और मुक्तसर साहिब से एक-एक महिला वापस लौट कर पंजाब आई है। इन तमाम महिलाओं को सीरिया, ईराक, ओमान और दुबई आदि जगहों पर भेजी गईं थीं। इन सभी ने कहीं न कही खुद को प्रताड़ना का शिकार बताया। इन महिलाओं ने अभी खाड़ी देशों में कई अन्य लड़कियों के फँसे होने का दावा किया है।