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मायावती PM मोदी की चिंता छोड़ें, खुद करें शादी: रामदास अठावले

एनडीए की सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और मोदी सरकार में केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री रामदास अठावले ने गुरुवार (मई 15, 2019) को पीएम नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमला कर रही बसपा सुप्रीमो मायावती को जवाब दिया। पीएम मोदी के लिए चुनाव प्रचार करने वाराणसी पहुँचे रामदास ने मायावती पर तंज कसते हुए कहा कि मायावती को पीएम मोदी की पत्नी की चिंता छोड़कर खुद शादी कर लेनी चाहिए।

दरअसल, मायावती ने जनसभा के दौरान पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि जो पत्नी की रक्षा नहीं कर सकता, वो दूसरे की बहन बेटियों की क्या रक्षा करेगा। मायावती के इस बयान का जवाब देते हुए अठावले ने ‘बहन जी’ को शादी करने की नसीहत दी और साथ ही कहा कि ये पीएम मोदी की व्यक्तिगत बातें हैं। उनकी पत्नी ने कभी कोई शिकायत नहीं की, वो एक शिक्षिका हैं और उन पर व्यक्तिगत हमले करना सही नहीं है।

मायावती के साथ-साथ अठावले ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को भी निशाने पर लिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब उनसे अखिलेश यादव के देश को नया प्रधानमंत्री मिलने वाले बयान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अखिलेश और मायावती को ये दिखाई नहीं देगा, पूरा देश देखेगा कि पीएम मोदी फिर से पीएम बनेंगे। अठावले ने महागठबंधन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि ये महामिलावट है, जो अपने स्वार्थ के लिए साथ में खड़े हो गए हैं, इनका उद्देश्य देश का विकास नहीं, बल्कि मोदी को हटाना है।

रामदास अठावले इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने मायावती के द्वारा भाजपा को मनुवादी बोलने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि भाजपा मनुवादी थी तो उन्होंने पार्टी का समर्थन लेकर सरकार क्यों बनाई? उस समय उन्हें सत्ता सुख चाहिए था, तो भाजपा मनुवादी नहीं थी। 2014 में जब लोकसभा चुनाव में वो जीरो पर आ गईं, तब भाजपा पर हमलावर हो गई हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा कभी मनुवादी पार्टी नहीं थी, वह सबका साथ सबका विकास पर विश्वास करने वाली है। बंगाल के हालात पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि ममता घबरा गई हैं, वो गुंडागर्दी कर रही हैं। अगर केंद्र में एनडीए की सरकार आती है, तो वहाँ की सरकार को बर्खास्त कर देना चाहिए। गौरतलब है कि, पिछले दिनों रामदास अठावले ने यूपी और महाराष्ट्र में एनडीए के सीट की संख्या कम होने की बात कही थी, लेकिन साथ ही उन्होंने केंद्र में एनडीए की सरकार बनने का भी दावा किया था।

असम से 29 साल बाद हटेगा AFSPA, हालात हो रहे हैं सामान्य

केंद्र सरकार ने असम से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर ऐक्ट (AFSPA) को हटाने का फैसला किया है। ये निर्णय कानून लागू होने के 29 साल बाद लिया गया है। इसके साथ ही खबरों के मुताबिक सेना को वापसी के लिए तैयारियाँ शुरू करने के निर्देश भी दे दिए गए हैं।

बता दें कि असम में उल्फा संगठन द्वारा (ULFA) उग्रवाद के चरम पर होने के कारण 27 नवंबर 1990 को वहाँ AFSPA लागू किया गया था। उस समय पूरे राज्य को अशांत क्षेत्र घोषित करने के बाद इस कानून को लागू किया गया था। इस कानून के तहत सशस्त्र बलों को विशेष अधिकार दिए गए थे। हालाँकि कुछ सालों में स्थिति सुधरने के बाद क्षेत्र के कई जिलों से सेना को धीरे-धीरे हटा दिया गया था।

इसके बाद पिछले वर्ष सितंबर में केंद्र ने राज्य को यह अधिकार सौंपा था कि वह AFSPA लागू रहने की समय सीमा को प्रदेश में हटा या बढ़ा सकती है। प्रदेश सरकार ने नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) की प्रक्रिया का हवाला देते हुए 2 बार इस कानून को आगे बढ़ाया।

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक सुरक्षाबलों के अधिकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार एनआरसी की प्रक्रिया 30 जुलाई तक पूरी हो जाएगी। इस बीच उन्हें अनौपचारिक रूप से प्लान करके बताना है कि राज्य से जाने के बाद सेना को कहाँ पर तैनात किया जाएगा।

AFSPA हटाए जाने के फैसले पर कॉन्ग्रेस के दिग्गज़ नेता पी चिदंबरम ने भी ट्वीट किया है। उन्होंने नरेंद्र मोदी से सवाल किया है कि आखिर चुनाव प्रचार के दौरान AFSPA को त्रिपुरा, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के हिस्सों से क्यों हटाया गया है?

चिदंबरम ने कहा है कि भाजपा ने उनके मेनिफेस्टों का विरोध किया था जिसमें उन्होंने AFSPA में संशोधन की बात कही थी। ऐसे में मोदी सरकार को पूर्ण रूप से ही AFSPA को असम से हटा रही है। लेकिन चिदंबरम भूल गए हैं कि AFSPA वहाँ लगाया जाता है जहाँ हालात सामान्य नहीं होते। जैसे ही हालात सामान्य होते जाते हैं अफ्स्पा हटा लिया जाता है।

दिग्विजय ने ‘नेपाली लड़का’ कह जिनका उपहास किया था, उन्हें UN करेगा सम्मानित

पतंजलि योगपीठ के नाम एक और उपलब्धि जुड़ गई है। स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान के लिए पतंजलि संस्थान के चेयरमैन आचार्य बालकृष्ण को संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनाइटेड नेशंस सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (यूएनएसडीजी) ने विश्व के 10 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया है। आचार्य बालकृष्ण को संयुक्त राष्ट्र ने 25 मई को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में आयोजित होने वाली यूएनएसडीजी हेल्थ समिट में स्पीकर के रूप में आमंत्रित किया है। इसी कार्यक्रम के दौरान बालकृष्ण को यूनिवर्सल हेल्थ केयर अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा। इस समारोह में दुनियाभर के 50 देशों के 500 से ज्यादा प्रतिभागियों के शामिल होने की उम्मीद है।

स्वामी रामदेव ने कल (मई 15, 2019) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बारे में बात करते हुए कहा कि यह पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है कि पतंजलि आयुर्वेद और उसके प्रतिनिधि बालकृष्ण को संयुक्त राष्ट्र द्वारा सम्मानित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य किसी सूची में स्थान प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज और मानवता की सेवा करना है। इस दौरान उन्होंने पतंजलि की उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पतंजलि के माध्यम से भारतीय चिकित्सा पद्धति में योग व आयुर्वेद को सम्पूर्ण विश्व में पुनः स्थापित किया गया। इससे करोड़ों साध्य-असाध्य रोगों से पीड़ित रोगियों को स्वास्थ्य लाभ मिला है।

वहीं, यूएन से सम्मान मिलने की बात पर आचार्य बालकृष्ण का कहना है कि यूएन ने भी मान लिया है कि योग और आयुर्वेद, स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। उन्होंने इस बात को भी माना है कि पतंजलि द्वारा जो कार्य किया जा रहा है, वह प्रभावशाली है। यह सम्मान योग और आयुर्वेद के लिए गर्व करने की बात है। संपूर्ण देशवासी, जो भारतीय संस्कृति और भारतीय परंपरा पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने बताया कि यह आयोजन वर्ल्ड हेल्थ फोरम द्वारा किया जा रहा है, और इसका लक्ष्य वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य और विकास को मंच प्रदान करना है, जिससे प्राइमरी हेल्थ केयर, नाॅन कम्युनिकेबल डिजीज कंट्रोल और डिजिटल हेल्थ को बढावा मिल सके।

बता दें कि, इस सम्मान के लिए पतंजलि योगपीठ हरिद्वार के चेयरमैन आचार्य बालकृष्ण के अलावा दुनिया की प्रतिष्ठित संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टेड्रोस एडहानॉम और यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक हेनरीटा फोर को भी चुना गया है।

J&K: श्रीनगर और अवंतीपोरा हाई अलर्ट पर, आतंकियों के निशाने पर हैं एयरबेस

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर और अवंतीपोरा में आतंकी हमले का अलर्ट जारी किया गया है। एएनआई ने ट्वीट किया है कि सरकारी सूत्रों के अनुसार श्रीनगर और अवंतीपोरा एयरबेस को आतंकी अपना निशाना बना सकते हैं। इंटेलिजेंस एजेंसियों ने इस खतरे की आशंका जताई है। सूचना मिलने के बाद से ही सुरक्षा एजेंसियाँ हाइ अलर्ट पर हैं और एयरबेस की सुरक्षा को बढ़ा दिया गया है।

गौरतलब है इसी बीच जम्मू-कश्मीर के पुलवामा और शोपियाँ से खबरें आ रही हैं कि गुरुवार (मई 16, 2019) को शुरू हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने 6 आतंकियों को ढेर कर दिया है। इस दौरान एक जवान भी वीरगति को प्राप्त हुआ जबकि दो अन्य के जख्मी होने की खबर हैं। आतंकियों और जवानों में हुई क्रॉस फायरिंग में एक स्थानीय युवक की भी मौत हुई है।

बता दें कि इससे पहले रविवार को शोपियाँ में सुरक्षाबलों ने 2 आतंकियों को ढेर किया था। इन आतंकियों के हिंद सीतापुर इलाके में छिपे होने की खबर मिली थी। इसके बाद इलाके की घेराबंदी की गई थी और सर्च ऑपरेशन शुरू हुए थे। इस दौरान आतंकियों ने गोलियाँ चलाईं और सेना की जवाबी कार्रवाई में मारे गए।

मनमोहन सिंह के लिए अगली बार RS के दरवाजे बंद, राज्यों में कॉन्ग्रेस की हालत पतली

पाँच बार उच्च सदन के सदस्य रह चुके पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मौजूदा 6 साल का कार्यकाल 14 जून को पूरा हो रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 2 सीटों को भरने के लिए 7 जून को प्रदेश में चुनाव की घोषणा की है, लेकिन इस बार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सदस्य के रूप में राज्यसभा में वापसी की संभावना बहुत कम है।

दरअसल, असम में भाजपा की सरकार सत्ता में हैं। इसके कारण कॉन्ग्रेस पार्टी के पास उन्हें फिर से उच्च सदन में भेजने के लिए विधानसभा में अपेक्षित संख्याबल नहीं है। कॉन्ग्रेस के पास 126 सदस्यीय असम विधानसभा में केवल 25 विधायक हैं, जबकि सीट हासिल करने के लिए उनको कम से कम 43 वोटों की आवश्यकता है। हालाँकि पार्टी को सदन में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के 13 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, लेकिन फिर भी ये संख्या 38 ही हो पाती है।

कॉन्ग्रेस पार्टी मनमोहन सिंह को कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सीटों के जरिए भी राज्यसभा नहीं भेज सकती है क्योंकि इस समय इन राज्यों में भी पद रिक्त नहीं हैं। हालाँकि पार्टी के पास पूर्व प्रधानमंत्री को तमिलनाडु के माध्यम से उच्च सदन में भेजने का विकल्प है जहाँ जुलाई में रिक्तियाँ होंगी क्योंकि राजसभा के 6 सदस्य 24 जुलाई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

अब ऐसे में अगर मनमोहन सिंह को तमिलनाडु से जुलाई में मैदान में नहीं उतारा जाता है, तो राजयसभा तक पहुँचने के लिए उन्हें अप्रैल 2020 तक इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि तब कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों से 55 सदस्य रिटायर हो जाएँगे। देखना है कि कॉन्ग्रेस पार्टी पूर्व प्रधानमंत्री को उच्च सदन में पहुँचाने के लिए क्या फैसला लेती है।

फिलहाल मीडिया खबरों के मुताबिक असम सीट पर ऐसी अटकलें हैं कि भाजपा खाली होने वाली 2 सीटों में से एक सीट की पेशकश केंद्रीय मंत्री और लोजपा नेता रामविलास पासवान को कर सकती है। 

Fact Check: क्या शीला दीक्षित ने कहा कि केजरीवाल वोटों के लिए अपनी माँ को भी बेच सकता है?

सोशल मीडिया पर अरविन्द केजरीवाल की छवि ख़राब करने के लिए एक अखबार के कटिंग को वायरल किया जा रहा है। वायरल हो रही इस पोस्ट में दावा किया गया है कि केजरीवाल वोट हासिल करने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। इसमें यह सन्देश दिया जा रहा है कि दिल्ली कॉन्ग्रेस कमेटी की अध्यक्ष शीला दीक्षित ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बारे में कथित रूप से ये कहा है कि ‘केजरीवाल वोट के लिए अपनी माँ तक को बेच सकते हैं’। देखते हैं कि इस कटिंग की सच्चाई क्या है।

क्या है अफवाह?

सोशल मीडिया पर शीला दीक्षित की तस्वीर के साथ समाचार पत्र का एक कथित क्लिप शेयर किया गया है, जिसमें अरविंद केजरीवाल के बारे में उनके कथित बयान का जिक्र किया गया है।

सोशल मीडिया पर हो रही है वायरल
sheila dikshit fake quote
वायरल किया जा रहा फर्जी पोस्ट

क्या है सच्चाई?

इस फेक न्यूज़ पेपर कटिंग की छानबीन करने पर पता चलता है कि इसी तरह की एक रिपोर्ट ‘आजतक’ की वेबसाइट पर लिखी गई है। आजतक की रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ करके उसे वायरल कर दिया गया है। वायरल पोस्ट ने हिंदी न्यूज़ वेबसाइट ‘आजतक’ की रिपोर्ट को शब्दशः उठाकर फेक न्यूज़ की तरह फैलाया गया है।

आजतक में प्रकाशित मूल कहानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आतंकवाद से निपटने पर दीक्षित की टिप्पणी के बारे में थी। दिलचस्प बात यह है कि वायरल रिपोर्ट में लीड पैराग्राफ को छोड़कर अरविंद केजरीवाल के नाम का जिक्र कहीं भी नहीं आता है। अखबार की इस फर्जी कटिंग को ध्यान से देखने पर ही पता चलता है कि केजरीवाल वाली लाइन और शेष कहानी के फ़ॉन्ट्स में भारी अंतर है।

different fonts of sheila dikshits fake quote
फर्जी एडिटिंग द्वारा लोगों को उल्लू बना रहे हैं

फर्जी कटिंग वाले वायरल पोस्ट और आजतक के रिपोर्ट की तुलना करने पर दोनों में काफी गलतियाँ मिलती हैं। इस वायरल फर्जी तस्वीर में ‘आजतक’ की रिपोर्ट में शीला दीक्षित को दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर सम्बोधित किया गया है। मूल और फर्जी कटिंग, दोनों रिपोर्ट्स ने शिला दीक्षित को दिल्ली की मुख्यमंत्री बताया है।

इस तस्वीर में सामान्य ज्ञान की कमी ढूँढिए

मार्च 15, 2019 को लिखी गई मूल रिपोर्ट में कहा गया है, “दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा कि मनमोहन सिंह की तुलना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की।” हालाँकि, वायरल पोस्ट में उनके बयान को बदल दिया गया है और कहा गया है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा की केजरीवाल वोट के लिए अपनी माँ को भी बेच सकता है।

रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आप यह देख सकते हैं कि वायरल पोस्ट में इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से का ही इस्तेमाल किया गया। यह रिपोर्ट शीला दीक्षित के इंटरव्यू से संबंधित हैं, जिसमें उन्होंने कहीं भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का जिक्र नहीं किया है। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का यह इंटरव्यू टीवी एंकर वीर सांघवी ने किया था। वहीं, पेपर की क्लिप में जिस खबर को इस्तेमाल किया गया है, उसे एक हिंदी न्यूज चैनल की साइट से हूबहू उठाया गया है।

निष्कर्ष: खबर को एडिट कर वायरल किया जा रहा है, शीला दीक्षित ने कभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया

सत्ता से दूर बेचैन सोनिया सारे पैंतरे आजमा रही है, लग चुकी है 272 जुटाने में

लोकसभा चुनाव 2019 की चुनावी प्रक्रिया में अब केवल एक चरण बाक़ी रह गया है। 23 मई को चुनावी नतीजे घोषित होने हैं, इस बीच कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी गठबंधन के लिए कुछ विचलित नज़र आ रही हैं।

राजनीतिक गलियारे से ख़बर आ रही है कि सोनिया गाँधी दिल्ली में एक रणनीति बैठक के लिए 21, 22 और 23 मई नेताओं की उपस्थिति को लेकर सभी विपक्षी पार्टियों के नेताओं के पास पहुँच रही हैं। डीएमके ने पुष्टि की है कि उनके अध्यक्ष एमके स्टालिन को उक्त तिथियों पर राष्ट्रीय राजधानी में उपस्थित रहने को कहा गया है। मतलब साफ है कि उन्हें बैठक में शामिल होने का न्यौता दिया गया है। जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी देवगौड़ा ने भी इस बात की पुष्टि की है कि वह सोनिया गाँधी के साथ बैठक के लिए 23 मई की दोपहर को दिल्ली पहुँचेंगे।

ख़बर के अनुसार, पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए सोनिया न केवल सहयोगी दलों बल्कि बीजेडी और टीआरएस जैसी अन्य पार्टियों के साथ मिलकर अपनी चुनावी रणनीति को दिशा देने का काम कर रही हैं।

बता दें कि सोनिया गाँधी द्वारा 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान इसी तरह की रणनीति अपनाई गई थी, जिसके बाद यूपीए अस्तित्व में आया था। यह देखना दिलचस्प है कि सोनिया गाँधी का अनुसरण करते हुए वर्तमान कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी उन्हीं प्रयासों को एक बार फिर से हवा दे रहे हैं। देखना होगा कि उनके ये प्रयास कितने कारगर साबित होते हैं।

जानकारी के मुताबिक़, सोनिया की इस क़वायद का मक़सद 23 मई को आने वाले चुनावी नतीजों से पहले विपक्षी दलों के बीच आपसी समझ विकसित कर लेना है, ताकि वो जनादेश हासिल करने के लिए राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से सरकार बनाने का पहला न्यौता पाने की स्थिति में ख़ुद को सक्षम साबित कर सकें। बिगड़े स्वास्थ्य के कारण, सोनिया गाँधी ने लोकसभा चुनाव अभियान में सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया। इसलिए, उन्होंने औंधे मुँह गिरती कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए विपक्ष को एकजुट करने का बीड़ा उठाया है।

CBI ने सुबह किया जाँच को आगे बढ़ाने से इनकार, शाम को कहा बोफोर्स से है ‘प्यार’

केंद्रीय जाँच एजेंसी सीबीआई ने सुबह दिल्ली की एक कोर्ट को सूचित किया था कि वो बोफोर्स दलाली केस में चल रही जाँच को आगे बढ़ाने वाली अर्ज़ी को वापस लेना चाहते हैं। लेकिन ताजा समाचार मिला है कि सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष 64 करोड़ की बोफोर्स तोप दलाली वाली जाँच जारी रखने की अर्जी पुनः दायर की है।

दरअसल सुबह खबर आई थी कि देश की शीर्ष जाँच एजेंसी सीबीआई ने आज (मई 16, 2019) दिल्ली में चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट नवीन कुमार कश्यप की अदालत में बोफोर्स तोप दलाली जाँच को आगे बढ़ाने वाली याचिका वापस ले ली है जिसके बाद कयास लगाए जा रहे थे कि बोफोर्स दलाली कांड की जाँच बंद हो जाएगी। प्राइवेट पिटीशनर अजय अग्रवाल ने भी जाँच को आगे बढ़ाने वाली याचिका वापस ले ली थी।

परंतु शाम होते-होते खबर आई कि सीबीआई ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में जाँच को आगे बढ़ाने के लिए फिर से याचिका दायर की है। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई स्वतंत्र जाँच एजेंसी है और उसे जाँच के लिए पूछने की आवश्यकता नहीं है। सीबीआई को केवल कोर्ट को सूचित करना होता है कि वह जाँच को आगे बढ़ाएगी या नहीं।

बोफोर्स तोप दलाली केस देश का बहुचर्चित भ्रष्टाचार का मामला है जिसमें प्रधानमंत्री राजीव का नाम आया था।

मस्जिदों से किया गया ग़ैर-मुस्लिमों की हत्या का आह्वान, हिन्दुओं के पलायन का वीडियो वायरल

लोकसभा चुनाव 2019 शुरू होने के बाद से ही पश्चिम बंगाल हिंसात्मक गतिविधियों के लिए लगातार सुर्ख़ियों में बना हुआ है। मंगलवार (14 मई) को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों द्वारा उन पर हमला बोले जाने की ख़बर सामने आई थी। इस दौरान जो हिंसा हुई उसके लिए बीजेपी और तृणमूल कॉन्ग्रेस ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए और साथ ही प्रसिद्ध दार्शनिक ईश्वरचंद विद्यासागर की मूर्ति भी तोड़ दी गई।

13 मई को एक ख़बर सामने आई थी कि शुक्रवार (10 मई) से डायमंड हार्बर में सतगाचिया विधानसभा क्षेत्र में हिंसा भड़क गई थी, जिसे नियंत्रित करने में अधिकारी जन बुरी तरह से विफल रहे। ख़बरों के अनुसार, तृणमूल के गुंडों द्वारा कथित तौर पर हिन्दुओं के घरों और दुकानों में जमकर तोड़फोड़ की गई। वहीं, दुर्भाग्य इस बात का है कि इस हिंसा को साम्प्रदायिक हिंसा का नाम देकर इसे राजनीतिक हिंसा का नाम दिया गया।

राज्य सचिवालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पीटीआई को बताया, “शुक्रवार रात शुरू हुई झड़पों के दौरान कई घरों, दुकानों और वाहनों में तोड़फोड़ की गई जो कि तीन दिनों तक जारी रही। किसी के हताहत होने की सूचना नहीं मिली।” वहीं, आईएएस अधिकारी ने मंगलवार को बताया, “यह एक राजनीतिक टकराव है, साम्प्रदायिक नहीं। हमने इस पर ज़िला प्रशासन से रिपोर्ट माँगी है।”

ऐसा दावा किया जाता है कि तृणमूल के एक नेता ने क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति बनाने के लिए लगभग 200 गुंडों का इस्तेमाल किया। इसके अलावा आसपास के इलाक़ों में भी हिंसा की जानकारी मिली है। हालात इतने गंभीर थे कि पहले तो पुलिस इसमें घुसने से कन्नी काटती दिखी, आख़िरकार रैपिड एक्शन फ़ोर्स के ज़रिए काफ़ी संघर्ष के बाद अशांत माहौल पर क़ाबू पाया गया। हालाँकि, इस दौरान कुछ लोग घायल भी हुए।

आईएएस अधिकारी द्वारा किए गए दावों के विपरीत, कुछ ख़बरों के अनुसार, यह हिंसा एक साम्प्रदायिक रूप लिए हुई थी, जिसे नज़रअंदाज़ करने का भरसक प्रयास किया जा रहा था। ख़बर के अनुसार, इस हिंसात्मक हमले के अपराधी समुदाय विशेष से थे और पीड़ित वर्ग हिन्दुओं से संबंधित था।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो के अनुसार, ग़ैर-मुस्लिमों को मारने के लिए मस्जिदों से आह्वान किया गया था, जिसके बाद हिन्दु परिवारों में अपनी जान बचाने के लिए अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया।

हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में बड़े स्तर पर कई साम्प्रदायिक हिंसाएँ देखने को मिली हैं। इन हमलों में TMC की छत्रछाया में फलते-फूलते कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं पर हिंसात्मक हमले किए गए। मालदा और बशीरहाट में ऐसी घटनाएँ सामने आईं जहाँ कट्टरपंथी, हिन्दुओं के ख़िलाफ़ काफ़ी उग्र होते नज़र आए, जबकि इन्हीं हिंसात्मक हमलों में हिन्दुओं को बचाने की कोशिश में पुलिस महकमा पूरी तरह से विफल रहा। डायमंड हार्बर की हिंसात्मक घटना भी उसी तर्ज पर जान पड़ती है, जहाँ तृणमूल से जुड़े लोगों ने राजनीतिक आवरण के नाम पर हिन्दुओं के ख़िलाफ़ जमकर हिंसात्मक हमले किए, इस वजह से क्षेत्र के हिन्दुओं को वहाँ से पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा।

इन घटनाओं से ममता बनर्जी के वो सभी दावे खोखले साबित होते हैं जिसमें वो अक्सर यह कहते हुए पाई जाती हैं कि वो भाजपा की तरह हिन्दू हैं। जबकि सच्चाई का इस दावे कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि उनके राज में समुदा को संरक्षण प्राप्त है, जिससे वो हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम देते रहें हैं और हिन्दुओं से उनका नाता इस बात से ही स्पष्ट हो जाता है कि वो (ममता बनर्जी) उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में एक बार नहीं हर बार नाकाम रहीं।

सिद्धू की पत्नी का टिकट कटने पर अमरिंदर सिंह ने कहा ये सब बकवास है

भाजपा छोड़कर कॉन्ग्रेस में आए नवजोत सिंह सिद्धू के तल्ख़ तेवर तो जगज़ाहिर हैं, लेकिन सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर भी पिछले कुछ दिनों से सुर्ख़ियों में छाईं हुई हैं। हाल ही में उन्होंने अपने पति के पक्ष में उनके प्रचार को लेकर बड़ा बयान दिया था जिसकी मुख्य वजह उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को बताया था। उन्होंने सीधे तौर पर कहा था कि उनके पति को प्रचार के लिए इसलिए अवसर नहीं दिया जा रहा है क्योंकि पंजाब के मुख्यमंत्री ख़ुद नहीं चाहते कि उनके पति (नवजोत सिंह सिद्धू) प्रचार करें। इसके अलावा सिद्धू की पत्नी ने ख़ुद टिकट न दिए जाने पर भी मुख्यमंत्री को ही दोषी ठहराते हुए कहा था कि उन्होंने जानबूझकर उन्हें टिकट नहीं दिया।

नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी द्वारा लगातार किए जा रहे हमलों पर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने चुप्पी तोड़ते हुए नवजोत कौर के सभी आरोपों का खंडन किया और कहा, “कौर को दो जगह अमृतसर और भटिंडा से टिकट का ऑफ़र दिया गया था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। वो चंडीगढ़ से चुनाव लड़ना चाहती थीं, जबकि पार्टी ने फ़ैसला किया कि वो इस सीट के लिए फिट उम्मीदवार नहीं हैं।” आपको बता दें कि नवजोत कौर ने आरोप लगाया था कि आशा कुमारी की वजह से उन्हें टिकट नहीं दिया गया था। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पर निशाना साधते हुए नवजोत कौर ने कहा था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को लग रहा है कि वो 13 की 13 सीटें जीत रहे हैं और इसलिए पजाब में नवजोत सिंह की ज़रूरत नहीं है और इसीलिए उनके पति केवल उन्हीं जगहों पर प्रचार कर रहे हैं जहाँ उनकी ज़रूरत है।

इससे पहले भी कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच कई मुद्दों पर मतभेद की ख़बरें सामने आ चुकी हैं। आए दिन कॉन्ग्रेसी खेमे से उथल-पुथल की ख़बरें पार्टी में बढ़ते रोष की सच्ची तस्वीरों को बयाँ करती हैं। प्रतीत तो यही होता है कि नवजोत सिंंह सिद्धू के अट्टहास भरे अंदाज़ वाली टीका-टिप्पणियाँ भी कॉन्ग्रेस का मन नहीं बहला पा रही हैं। ख़ुद को टिकट न दिए जाने और पति के पक्ष में नवजोत कौर का यूँ खुलकर सामने आना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं कॉन्ग्रेस पार्टी सदस्यों में बढ़ता असंतोष अपने पैर पसारता दिख रहा है जिसके नतीजे जल्द सामने होंगे।