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₹30,000 करोड़ का गणित चिदंबरम और सुरजेवाला से पूछो: राहुल गाँधी का इंडियन एक्सप्रेस को इंटरव्यू

17वीं लोकसभा का निर्वाचन जैसे-जैसे अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ताबड़तोड़ इंटरव्यू दिए जा रहे हैं। एनडीटीवी और इंडिया टुडे के बाद इंडियन एक्सप्रेस से भी उन्होंने बात की और बताया कि कैसे उन पर परिवारवाद का आरोप राजनीतिक प्रोपेगंडा है, मनमोहन सिंह सरकार का अध्यादेश फाड़ तत्कालीन प्रधानमंत्री का अपमान करना उनकी गलती थी, और कैसे वह अनिल अंबानी और मेहुल चोकसी को एक जैसा ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ मानते हैं। पेश है हर मुद्दे पर उनकी विस्तृत राय और उनके दावे:

जनता का नारा है ‘चौकीदार चोर है’

राहुल गाँधी ने दावा किया कि ‘चौकीदार चोर है’ का नारा उनकी ईजाद नहीं, छत्तीसगढ़ की एक जनसभा में स्वःस्फूर्त उत्पन्न हुआ जनता का उद्गार है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके कॉन्ग्रेस अध्यक्ष होकर इसे उठा लेने से खाली इस नारे की जनता में ‘धमक’ (amplification) बढ़ गई है।

हालाँकि जब इंडियन एक्सप्रेस के साक्षात्कारकर्ता ने सवाल उठाया कि खुद राहुल गाँधी और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के अलावा किसी वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता को इसका प्रयोग करते नहीं सुना गया है तो वह पहले इसे नकारते नज़र आए और बाद में आक्रामक हो साक्षात्कारकर्ता से ही पूछने लगे कि इस सवाल को उठाने से मंतव्य क्या है। इसके अलावा उन्होंने यह भी दावा किया कि शायद उनकी पार्टी के नेता प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आगे जाकर इसका ‘बदला लिए जाने’ से डर रहे हैं, पर वह (मोदी) राहुल को नहीं डरा सकते।

₹30,000 करोड़ का गणित चिदंबरम और सुरजेवाला से पूछो

राहुल हर रैली में आजकल यह दोहरा रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मित्र’ अनिल अंबानी को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए वायुसेना के ₹30,000 करोड़ उनके ‘खाते में डाल दिए’। इस राशि पर वह कैसे पहुँचे, इसका सीधा जवाब देने से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बचते नजर आए। पहले तो जब साक्षात्कारकर्ता ने यह पूछा कि पूरा राफ़ेल सौदा ही ₹60,000 करोड़ का है तो इसकी 50% राशि आखिर किसी एक बिजनेसमैन को कैसे मिल गई तो उन्होंने ‘पर्याप्त दस्तावेज हैं’ का गोलमोल उत्तर दे टालने की कोशिश की।

जब साक्षात्कारकर्ता टस-से-मस नहीं हुआ तो उन्होंने सौदे में ‘प्रक्रियागत गड़बड़ियों’, द हिन्दू के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, जेपीसी जाँच की माँग, अनिल अंबानी की तथाकथित रक्षा उत्पादन अनुभवहीनता, उनकी आर्थिक देनदारियों आदि का हवाला देकर मामला घुमाने की कोशिश की। पर जब साक्षात्कारकर्ता ने याद दिलाया कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने खुद 2-जी घोटाले में बार-बार ₹2 लाख करोड़ के गणित का मूल पूछा था तो अंत में उन्होंने माना कि उन्हें आकलन बताया गया है। यह कैसे आया इसका हिसाब पूर्व वित्तमंत्री और कॉन्ग्रेस के आर्थिक दिमाग पी चिदंबरम व प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के ही पास है। उन्होंने एक बार फिर प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर सार्वजनिक बहस के लिए ललकारा।

वरिष्ठ नेताओं को एक हार के लिए निकाल नहीं सकता, अनुभव का सदुपयोग किया  

जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से पूछा गया कि 2014 में पार्टी इतिहास की सबसे बड़ी हार के बाद भी संगठन में कोई बड़ी तब्दीली नहीं हुई तो राहुल एके एंटनी, अशोक गहलोत जैसे वरिष्ठ नेताओं का बचाव करते नजर आए। उन्होंने विस्तृत अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे कद्दावर और अनुभवी नेताओं को एक हार का ठीकरा उनके सर फोड़कर निकालना अनुचित होता। उसकी बजाय पार्टी ने उनके अनुभव का उपयोग दूसरी नेताओं की पंक्ति को मजबूत करने के लिए किया। उन्होंने मोदी के अपराजेय होने का मिथक तोड़ने का श्रेय भी कॉन्ग्रेस को दिया, और याद दिलाया कि कैसे केवल 44 लोकसभा सदस्यों वाली कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल का रास्ता रोक लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उस वाकये पर गर्व महसूस होता है।

अकेले मोदी ही जिम्मेदार, इसलिए विचारधारा की बजाय उनपर हमला   

राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही निशाना साधे रखते हुए उन्हें देश की उस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया जिसे वह ‘बदहाल’ कहते हैं। उन्होंने कहा कि इसीलिए वह अपने निशाने पर पूरी भाजपा की बजाय केवल नरेंद्र मोदी को रखे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री रहते हुए अपनी ही सरकार में किसी की नहीं सुनी। उन्होंने प्रधानमंत्री की नोटबंदी को देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ रिजर्व बैंक की स्वायत्ता को भी नुकसान पहुँचाने वाला बताया। उन्होंने राफ़ेल के तथाकथित ‘घोटाले’ को भी ‘मोदी की मनमर्जी’ का ही दुष्परिणाम बताया।

मोदी के एक हम ही वैचारिक विरोधी, हम से है संघ को खतरा

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी ही संघ की इकलौती वैचारिक विरोधी है, और इसीलिए प्रधानमंत्री ने ‘कॉन्ग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा दे रखा है। वह किसी और पार्टी को देश से खत्म नहीं करना चाहते; केवल कॉन्ग्रेस को समाप्त करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2014 के बाद कॉन्ग्रेस ने आत्म-चिंतन किया और उसके परिणामस्वरूप न केवल जमीन से नए नेताओं की पूरी पौध को लेकर आगे आई बल्कि इन नेताओं ने और इनका नेतृत्व कर रहे राहुल ने 5 साल तक भाजपा के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। राहुल गाँधी ने यह भी जोड़ा कि यह उनकी लड़ाई का ही परिणाम है कि 2 वर्ष पहले तक मोदी सरकार को दस साल का न्यूनतम कार्यकाल देने वाले आज मोदी को पूर्ण बहुमत को लेकर भी आश्वस्त नहीं हैं।

कॉन्ग्रेस में नहीं है परिवारवाद, शाह भाजपा अध्यक्ष बने मोदी के बल पर

राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस पर लगने वाले शायद सबसे पुराने आरोप परिवारवाद का भी बचाव किया। उन्होंने राजीव साटव (गुजरात कॉन्ग्रेस प्रभारी, यूथ कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और महाराष्ट्र सांसद), जोतिमणि सेन्नीमलै (करूर लोकसभा प्रत्याशी, कॉन्ग्रेस मीडिया पैनलिस्ट), माणिक टैगोर (विरुधुनगर प्रत्याशी और इसी सीट से 2009 के लोकसभा सदस्य) समेत कई कॉन्ग्रेस सदस्यों का उदाहरण देते हुए परिवारवाद के आरोप को नकारा। इसके अलावा उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (मुलायम सिंह यादव के बेटे) और भाजपा सांसद पंकज सिंह (गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे) का उदाहरण दिया कि हर पार्टी में कुछ नेताओं की संतानें अपने परिवार की राजनीतिक परंपरा में भागीदार होतीं हैं।

जब साक्षात्कारकर्ता ने राहुल गाँधी से सीधे-सीधे पूछा कि उन्हें 5 साल पहले भी पता था कि कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष वही बनेंगे जबकि भाजपा में कभी यह ‘फिक्स’ नहीं होता तो राहुल गाँधी ने इसे भी चुनौती दी। उन्होंने भाजपा में अमित शाह के अध्यक्ष पद पर चुनाव को भी ‘फिक्स्ड’ बताते हुए यह आरोप लगाया कि उन्हें यह पद मोदी की जी-हुजूरी करने से और यही करने के लिए मिला है। उन्होंने अपने खिलाफ वंशवाद के आरोप को प्रपोगंडा बताते हुए सवाल किया कि क्या उनके पिछले 5 साल के संघर्ष को उनके ‘वंश की देन’ बताकर नकारा जा सकता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा नहीं, बहाना है; हम भय नहीं फैलाते   

राहुल गाँधी ने राष्ट्रीय सुरक्षा को निर्वाचन की राजनीति में मुद्दा मानने से मना करते हुए साफ़ किया कि कॉन्ग्रेस इसे केवल अर्थव्यवस्था, राफेल और बेरोजगारी पर कॉन्ग्रेस के आरोपों का सामना करने से बचने का प्रधानमंत्री का बहाना मानती है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जनता के बीच खराब अर्थव्यवस्था, किसानों के खराब हालात और बेरोजगारी के मुद्दे पर है और मोदी उनके सवालों से बचने के लिए राष्ट्रवाद की आड़ लेना चाहते हैं। लोगों में “भाजपा आएगी तो…” का भय फैलाने के आरोप के जवाब में उन्होंने आरोप दोहराए कि भाजपा आई तो संविधान पुनर्लिखित कर दिया जाएगा, प्रधानमंत्री भ्रष्ट हैं और संस्थाओं में ‘एक खास विचारधारा’ (संघ की विचारधारा) के लोगों को भरकर संस्थाएँ बर्बाद कर रहे हैं।

उन्होंने मोदी के किए ‘नुकसान’ की भरपाई के लिए अपनी पार्टी के उपाय भी गिनाए। बकौल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष, उनकी पार्टी एक सरल जीएसटी लाएगी। इसके अलावा उन्होंने अपनी विवादास्पद ‘न्याय स्कीम’ को नोटबंदी से हुए तथाकथित नुकसान की भरपाई बताया।

प्रज्ञा ठाकुर, सच्चर पर सवाल टाले

भाजपा की भोपाल प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से प्रचार करने के सवाल पर राहुल गाँधी बचते नजर आए। उन्होंने कहा कि ‘हालाँकि’ उन्हें भोपाल में प्रचार करने से कोई परहेज नहीं है, लेकिन प्रज्ञा सिंह वैसे ही भारी अंतर से मुकाबला हार रहीं हैं। इसके अलावा सच्चर समिति की रिपोर्ट का जिक्र अपनी पार्टी के पिछले दो लोकसभा घोषणापत्रों में होने और इस बार गायब होने के बारे में भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने कोई सीधी टिप्पणी नहीं की। उन्होंने केवल यह दोहराया कि कॉन्ग्रेस भारत को “सभी का” मानती है और यहाँ तक कि भाजपा को लेकर भी वह “भाजपा मुक्त भारत” जैसी बातें नहीं करते।

मनमोहन केवल सम्मानित नहीं, प्रेम भी करता हूँ  

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में राहुल गाँधी ने कहा कि वह उनका (डॉ. सिंह का) केवल सम्मान ही नहीं करते बल्कि उन्हें दिल से चाहते भी हैं। उन्होंने मनमोहन सरकार के अध्यादेश को सार्वजानिक रूप से फाड़ने को गलती मानते हुए अफ़सोस जताया। साथ में यह भी जोड़ा कि उन्होंने यह लगता है कि मनमोहन सिंह जिस ऊँचे ‘कद’ के व्यक्तित्व हैं, वैसे व्यक्ति का राहुल गाँधी कुछ भी कर लें, असम्मान हो ही नहीं सकता। पर उन्होंने यह भी माना कि उनकी पार्टी ने यह स्वीकारना बंद कर दिया था कि 2012 आते-आते उनकी नीतियाँ स्पष्ट रूप से काम करना बंद कर चुकीं थीं, इसीलिए जनता ने उन्हें दण्डित किया।

हम न राईट, न लेफ़्ट; अनिल अंबानी-मेहुल चोकसी क्रोनी कैपिटलिस्ट   

अपनी पार्टी के चरम-वामपंथी हो जाने के आरोप को भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने सिरे से नकार दिया। उन्होंने 1990 के दशक की शुरुआत में नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण के कदम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस लोगों की बातें लगातार सुनती रहती है और किसी भी परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त निर्णय लेती है।

कॉर्पोरेट बिजनेसमैनों को नाम लेकर अपमानित करने के मुद्दे पर राहुल गाँधी रक्षात्मक नजर आए। उन्होंने भारतीय कॉर्पोरेट जगत को ईमानदार, मेहनती संस्था बताते हुए अनिल अंबानी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या, नीरव मोदी को इनसे अलग ‘क्रोनी कैपिटलिस्ट’ बताया। उन्होंने कहा कि ईमानदार कॉर्पोरेट वालों का वह पूर्ण समर्थन करते हैं।

मतभेद कॉन्ग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र; राहुल गाँधी को सबको सुनने वाले के रूप में जानें

पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग लाने के मामले में निर्णय की जिम्मेदारी लेने से भी राहुल गाँधी बचते नजर आए। उन्होंने मोदी-शाह पर संवैधानिक संस्थाओं को दबाने का आरोप दोहराया। साथ में वह भी जोड़ा कि महाभोयोग का निर्णय पिछले साल की शुरुआत में की गई चार जजों की प्रेस वार्ता में दीपक मिश्र पर लगे आरोपों के द्वारा जनित सार्वजनिक मत के चलते उठाया। गौरतलब है कि उन चार जजों में से एक रंजन गोगोई इस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) हैं।

इस निर्णय के खिलाफ कॉन्ग्रेस में ही उठी आवाजों के बारे में उन्होंने सफाई दी कि यह उनकी पार्टी में जीवंत लोकतंत्र और असहमति की संस्कृति का प्रतीक है। साथ ही यह पूछे जाने पर कि उनमें ऐसी कौन-सी खूबी है जो लोगों को नरेंद्र मोदी की बजाय उन्हें चुनें, उन्होंने कहा कि वह सबकी सुनते हैं, उनके दिल में करुणा है, और वह सचमुच देश के लोगों की मदद करना चाहते हैं

क्या डिंपल बाबा के चेहरे से नक़ाब उतर गया है? सोचिएगा ज़रूर!

अंग्रेजी फिल्म ‘प्राइमल फियर’ को थ्रिलर की श्रेणी में रखा जाता है और ये विलियम डैल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। यह एक वकील की कहानी है जो हमेशा ऐसे मामले अपने हाथ में लेने के चक्कर में होता है, जिसमें उसे अपना ज्यादा से ज्यादा प्रचार मिल सके। शिकागो के इस वकील मार्टिन के हाथ एक आरोन स्टैम्पलर का मुकदमा आता है। एक लोकप्रिय आर्चबिशप के क़त्ल का इल्जाम उसी के चर्च में काम करने वाले आल्टर बॉय स्टैम्पलर पर आया हुआ होता है।

जब मार्टिन इस मुवक्किल स्टैम्पलर से मिलता है तो उसे लगता है ये उन्नीस साल का हकलाने वाला लड़का तो सीधा-सादा सा है! इससे भला किसी की ऐसी जघन्य हत्या कैसे होगी? मार्टिन इस चर्चित मुक़दमे को अपने हाथ में लेता है और स्टैम्पलर को बचाने की कोशिशों में जुट जाता है। मार्टिन की पूर्व प्रेमिका उसके खिलाफ लड़ने वाली वकील होती है और वो बताने की कोशिश करती है कि ये हकलाने वाला, निरीह सा दिखता लड़का ही असल में अपराधी है। मार्टिन से ये बात हजम नहीं होती और वो अपनी तहकीकात में जुटा रहता है।

थोड़े ही दिन में उसे पता चलता है कि आर्चबिशप ने हाल ही में ऐसे फैसले लिए थे जिससे शिकागो के कई बड़े लोगों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ होगा। वो मान लेता है कि जरूर इन भ्रष्ट अधिकारियों ने नैतिकता दिखा रहे आर्चबिशप को मरवाया होगा। थोड़ी और तहकीकात में उसे एक विडियो मिलता है जिसमें दिखता है कि उसके मुवक्किल से जबरन किसी किशोरी से सम्भोग करवाया जा रहा है। बलात्कार जैसी स्थिति के इस सबूत के हाथ लगने पर वकील मार्टिन सोच में पड़ जाता है।

पहले तो स्टैम्पलर के पास हत्या की कोई वजह नहीं थी, लेकिन अगर वो ये सबूत अदालत में रखता तो साबित हो जाता कि स्टैम्पलर इस वजह से आर्चबिशप से दुश्मनी पाले बैठा था। वो इस सबूत के साथ जब स्टैम्पलर के पास पहुँचता है तो अचानक उसमें एक परिवर्तन होता है। सीधा-सादा हकलाता सा लड़का स्टैम्पलर अचानक बदल कर किसी और ही व्यक्तित्व में सामने आता है। वो खुद को ‘रॉय’ बुलाने लगता है और स्वीकारता है कि आर्चबिशप की नृशंस तरीके से हत्या उसी ने की है क्योंकि स्टैम्पलर तो सीधा सादा सा है!

अदालती कार्रवाई में ‘मल्टीप्ल पर्सनालिटी डिसऑर्डर’ नामक मनोरोग सिद्ध हो जाता है और स्टैम्पलर मनोरोगी होने के कारण सजा से बच जाता है। आखरी दृश्य में जब स्टैम्पलर पूछता है कि मिस वनाबेल का गला तो ठीक है न? तब मार्टिन को समझ आता है कि स्टैम्पलर तो कभी मनोरोगी था ही नहीं! उसने नाटक करके मार्टिन को बुरी तरह ठगा और खुद को हत्या की सजा से साफ़ बचा लिया था। मार्टिन पूछता है कि क्या कभी ‘रॉय’ जैसा कोई हत्यारा सचमुच था भी या स्टैम्पलर लगातार नाटक कर रहा था? स्टैम्पलर चिढ़ाते हुए कहता है, स्टैम्पलर जैसा कोई नहीं था, हमेशा से ‘रॉय’ ही था!

कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी की कार में किसी महिला को जज बनाने के प्रस्ताव के बारे में एक दौर में काफी चर्चाएँ रही थीं। कांग्रेसी एन डी तिवारी के जिस सुपुत्र की हाल में ही हत्या हुई, उसने तो बरसों मुकदमा लड़कर अपने लिए पिता का नाम हासिल किया था। कांग्रेस के शशि थरूर पर भी ऐसे ही मामलों के मुक़दमे जारी हैं। कभी सोचा है कि ऐसे लोगों का सरगना कैसा होगा? क्या सच में वो स्वीट से डिंपल वाले गालों वाला मासूम लगता बच्चा सा ही कोई होगा? या फिर हकीकत कुछ और है?

‘इंडिया टुडे’ ने जिस इंटरव्यू को प्रसारित नहीं किया उसके बीच से ही शायद ये तस्वीरें निकल कर आई हैं। इनमें जो भंगिमा है वो किसी खलनायक के ‘आओ कभी हवेली पर’ वाले रूप की ही याद दिलाती हैं। सोचिये कि कभी कोई मासूम, क्यूट, थोड़े कम दुनियावी समझदारी वाले ‘डिम्पल बाबा’ थे भी, या असली विद्रूपता से सिर्फ नकाब उतर गया है? सोचियेगा जरूर, क्योंकि फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी नहीं लगता।

गहन शोध के बाद अखिलेश का ख़ुलासा: भाजपा चाहती है कि रिफाइंड तेल में ही बनें पकौड़े

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पकौड़ों पर रिसर्च करने के बाद कुछ नए ख़ुलासे किए हैं। उन्होंने भाजपा सरकार पर कुछ नए आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री जानबूझ कर पकौड़ों की बात कर रहे हैं ताकि सरसों तेल को बर्बाद किया जा सके। एक इंटरव्यू के दौरान अपने ‘पकौड़ा ज्ञान’ को जनता तक पहुँचाते हुए सपा अध्यक्ष ने कहा:

“मैने बहुत अध्ययन किया और उसके बाद पता लगा कि पकौड़ा क्यों कहा प्रधानमंत्री जी ने? भाजपा ने इसीलिए कहा कि पकौड़े तलो क्योंकि वो चाहते हैं कि रिफाइन ऑइल (Edible Oil) जो आजकल आया है, उसका कारोबार बढ़ जाए, पकौड़े उसी में अच्छे बनते हैं जब उन्हें रिफाइंड तेल (Palm Oil) में तला जाए। ये भाजपा के लोग नहीं चाहते हैं कि पकौड़े सरसो के तेल में बनें। ये चाहते हैं कि पकौड़े पाम ऑइल में बनें। अगर पाम ऑइल का प्रयोग बढ़ेगा, तो भाजपा के कारोबारी मित्रों का व्यापार बढ़ेगा।”

अखिलेश यादव का ‘पकौड़ा ज्ञान’

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे पकौड़ों के माध्यम से अपने कारोबारी मित्रों को फ़ायदा पहुँचाना चाहते हैं। बता दें कि कुछ महीनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े रोजगार के माध्यमों का उदाहरण देते हुए कहा था कि पकौड़े तलना भी एक व्यवसाय ही है, रोज़गार ही है। उनके इस बयान के बाद विपक्ष ने हंगामा बरपाते हुए पीएम पर बेरोज़गारों से पकौड़े तलवाने का आरोप लगाया था। विपक्ष का कहना था कि प्रधानमंत्री बेरोज़गारों को पकौड़े तलने की सलाह दे रहे हैं।

‘जो लोग हमें टोंटी-टोंटी कह रहे हैं, वही हैं चिलम वाले’: अखिलेश यादव के बिगड़े बोल

जहाँ एक तरफ लोकसभा चुनाव का महासंग्राम जारी है वहीं दूसरी तरफ नेताओं का बड़बोड़ापन भी अपने चरम पर है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने यूपी के गोंडा में बीजेपी पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री पर वार किया है। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) और उनके कुछ अधिकारियों ने प्रधानमंत्री मोदी जी को भी चिलम सिखा दिया।” इसके आगे उन्होंने कहा, “जो लोग हमें टोंटी-टोंटी कह रहे हैं, वही हैं चिलम वाले।”

ख़बर के अनुसार, प्रतापगढ़ के जीआईसी ग्राउंड में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने अखिलेश और मायावती पर जमकर निशाना साधा था। इस दौरान उन्होंने कहा था कि प्रदेश में बसपा के शासन में ताजमहल तक सुरक्षित नहीं था और अखिलेश राज में टोंटी असुरक्षित थी। इसके अलावा उन्होंने गठबंधन की पिछली सरकारों को घेरते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस और उसके साथी राज्य को स्थिर सरकार नहीं दे सकते।

ऐसा पहली बार नहीं है जब अखिलेश ने पीएम मोदी के ख़िलाफ़ हमलावर रुख़ अपनाया हो। टोंटी चिलम वाले बयान के बाद उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी 180 डिग्री के पीएम हैं, वो जो भी कहते हैं, ठीक उसका उलटा ही करते हैं। वे केवल 1% आबादी के ही प्रधानमंत्री हैं।

इससे पहले उन्होंने कहा था कि पीएम की भाषा बदल गई है क्योंकि पिछले चरणों में जो भी चुनाव हुए हैं उनमें बीजेपी को एहसास हो गया है कि वो पिछड़ रही है। वे विकास, किसानों की आय के बारे बात नहीं कर रहे हैं। पीएम सिर्फ़ लोगों को गुमराह करना चाहते हैं। एसपी-बीएसपी और आरएलडी ही फ़ैसला करेगी कि कौन अगली सरकार बनाने जा रहा है और देश का अगला प्रधानमंत्री होगा।


अब ‘जय श्री राम’ बोलने पर ममता की पुलिस आपको जेल में करेगी बंद, सत्य घटना, मजाक नहीं

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के काफिले के सामने ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने की वजह से तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। दरअसल, ममता बनर्जी शनिवार (मई 4, 2019) को पश्चिम बंगाल के चंद्रकोण की आरामबाग सीट पर चुनाव प्रचार के लिए एक रैली करने जा रही थीं। इस दौरान जब ममता बनर्जी का काफिला चंद्रकोण के करीब पहुँंचा तो कुछ लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने लगे। जिसे सुनकर ममता भड़क गई और काफिले को वहीं पर रुकवाकर गाड़ी से उतरी और उन लोगों पर बरस पड़ी। गुस्से से आगबबूला ममता बनर्जी ने वहाँ मौजूद लोगों पर गाली देने का आरोप लगाया। ममता ने इसके लिए सीधे तौर पर भाजपा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि भाजपा जानबूझकर ऐसे लोगों को हमारे साथ गलत व्यवहार करने के लिए भेजती है।

इसके बाद ममता ने चंद्रकोण और घाटल में रैलियों के दौरान ये मुद्दा उठाते हुए कहा, “जो लोग इस तरह से नारेबाजी कर रहे हैं, होशियार रहें क्योंकि 23 मई को चुनाव का नतीजा आने के बाद उन्हें इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा।” इसके साथ ही ममता ने जय श्री राम बोलने वालों को चेतावनी देते हुए कहा कि जो लोग इस तरह की नारेबाजी कर रहे हैं, उन्हें ये याद रखना चाहिए कि चुनाव के बाद भी उन्हें यहीं रहना है।

ममता बनर्जी का ये वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। भाजपा की बंगाल यूनिट ने भी इस वीडियो को ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा कि ‘दीदी’ जय श्री राम के नारों से इतना नाराज क्यों हैं और इन नारों को गाली क्यों बता रही हैं? हालाँकि, पश्चिम बंगाल पुलिस का कहना है कि इसके संबंध में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, तीन लोगों को सीएम की सुरक्षा को लेकर जाँच की गई थी, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया।

बता दें कि, पश्चिम बंगाल के चंद्रकोण की आरामबाग लोकसभा सीट पर 6 मई को मतदान होने वाला है। मिदनापुर के अंतर्गत आने वाला यह इलाका तृणमूल कॉन्ग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यहाँ से भाजपा के तपन कुमार रेय, कॉन्ग्रेस की ज्योति कुमारी दास और टीएमसी की आपरूप पोद्दार उम्मीदवार हैं।

हिंदू लड़की, मुस्लिम लड़का: शादी तभी करूँगी जब दुल्हा हिंदू धर्म अपनाए और शाकाहारी बने

‘मैं तेरे प्यार में क्या-क्या न बना दिलबर… जाने ये मौसम… जाने ये मौसम…’ फ़िल्म, ज़िद्दी का यह गीत प्यार के उस आलम को बयाँ करने में काफ़ी है जिसमें प्रेम करने वाले अपनी चाहत के लिए किसी भी हद से गुज़र जाने को तैयार रहते हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है जो गुजरात के सूरत का है। यहाँ एक लड़की ने अपने प्रेमी से शादी करने पर दो ऐसी शर्तें रख दीं जिस पर हैरानी होना लाज़मी था।

ख़बर के अनुसार, सूरत में एक लड़की को मुस्लिम लड़के से प्यार हो जाता है, बात जब दोनों के घर तक पहुँचती है तो काफ़ी हो-हल्ला मच जाता है, जिससे बात बिगड़ जाती है। लेकिन, शायद एक सच यह भी है कि इश्क़ पर भला किसका ज़ोर होता है, इसलिए दोनों लिव इन रिलेशनशिप में रहना चाहते थे, लेकिन परिवार वालों को ये बात भी मंज़ूर नहीं थी। कोई रास्ता सूझता न देख दोनों घर से भाग गए। लड़की के लापता होने पर उसके परिजनों ने पुलिस थाने में शिक़ायत दर्ज की, जिसके बाद पुलिस ने तीन दिनों तक खोजबीन करके दोनों को ढूँढ़ निकाला।

पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद भी दोनों एक-दूसरे के साथ शादी करना चाहते थे। लेकिन लड़की ने नज़दीकी थाने में हलफनामा दायर किया जिसके अनुसार वो अपने मुस्लिम प्रेमी से शादी तभी करेगी जब वो हिन्दू धर्म को स्वीकार करने के अलावा शाकाहारी भी बनेगा। इस शर्त को पढ़कर पुलिस भी हैरान थी, क्योंकि आज तक ऐसा मामला उनके समक्ष पहले कभी नहीं आया था।

इसके अलावा लड़की के हलफ़नामे में एक एग्रीमेंट का भी उल्लेख किया गया था जिसके अनुसार मुस्लिम लड़के को अपने घरवालों की मौजूदगी में हिंदू धर्म अपनाना होगा। साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि भविष्य में वो फिर कभी मुस्लिम नहीं बनेगा।

SC में केंद्र सरकार ने कहा: PMO द्वारा राफेल सौदे की निगरानी करना सही था

राफेल डील को लेकर दाखिल पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकार ने शनिवार (मई 4, 2019) को सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल किया। केन्द्र सरकार ने हलफनामे में कहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा राफेल सौदे की निगरानी को किसी भी तरह से हस्तक्षेप के रूप में नहीं देखा जा सकता है। इसे पैरलल निगोशियेशन या दखल नहीं कहा जा सकता है। केंद्र ने हलफनामे में कहा है कि पुनर्विचार याचिकाओं पर आगे की सुनवाई का कोई आधार नहीं हैं। ऐसे में सभी याचिकाएँ खारिज की जानी चाहिए। सरकार ने कहा है कि सुरक्षा संबंधी गोपनीय दस्तावेजों के इस तरह सार्वजनिक खुलासे से देश के अस्तित्व और संप्रभुता पर खतरा है। इस मामले पर अगली सुनवाई 6 मई को होगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर 2018 को दिए गए अपने आदेश में राफेल डील को तय प्रक्रिया के तहत होना बताया था और सरकार को क्लीन चिट दी थी। अदालत ने इस फैसले में फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के सौदे को चुनौती देने वाली सारी याचिकाएँ खारिज कर दी थीं। कोर्ट ने कहा था कि इस रक्षा सौदे में अदालत के दखल या जाँच की जरूरत नहीं है।

इसके बाद यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण ने 2 जनवरी 2019 को अखबार में छपे आर्टिकल के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल की थीं। हालाँकि, केंद्र सरकार ने लीक हुए गोपनीय दस्तावेज को पिटिशन के साथ पेश किए जाने पर ऐतराज जताया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 10 अप्रैल को उसे खारिज करते हुए कहा था कि वह लीक दस्तावेज के आधार पर रिव्यू पिटिशन सुनेगा।

कश्मीर में भाजपा नेता की हत्या, महबूबा करती रह गईं रमजान में शांति की अपील

दक्षिण कश्मीर के नौगाम में आतंकवादियों ने भाजपा के जिला उपाध्यक्ष गुल मोहम्मद मीर की गोली मारकर हत्या कर दी। शनिवार (4 मई) को हुए इस हत्याकांड को उन्हीं के घर में अंजाम दिया गया। सीने और पेट में गोलियाँ लगने के बाद मीर को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। यह हत्याकांड ठीक उसी समय हुआ है जब कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने दहशतगर्दों से रमजान के महीने में दहशतगर्दी और हिंसा न करने की अपील की थी।

दो बार के चुनावी उम्मीदवार भी थे मीर

मीर ने भाजपा के टिकट पर 2008 और 2014 के विधानसभा चुनाव भी लड़े थे। गौरतलब है कि देश की अन्य विधानसभाओं के 5-वर्षीय कार्यकाल से अलग कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। राज्य भाजपा के प्रवक्ता अतलाफ ठाकुर ने कहा कि दहशतगर्दों से खतरा होने के बावजूद सरकार ने मीर की सुरक्षा हटा दी थी।

महबूबा के बयान की तीखी आलोचना  

इस बीच महबूबा मुफ़्ती के बयान की सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हो रही है। इसे केवल रमजान में शांति बनाए रखने और बाकी समय हिंसा जारी रखने को उनका अव्यक्त समर्थन माना जा रहा है। एक ट्विटर यूजर ने लिखा:

एक अन्य ने भी सवाल खड़े करते हुए प्रतिक्रिया दी:

महबूबा ने सरकार से भी रमजान के महीने में दहशतगर्दों के खिलाफ अभियान रोक देने और सर्च ऑपरेशन न करने की अपील की है। उनके मुताबिक इससे कश्मीर के लोग कम-से-कम के महीने सुकून से रह सकेंगे। महबूबा की अपील के परिप्रेक्ष्य में यह याद कर लेना जरूरी है कि 2017 में रमजान के कुछ ही दिन बाद दहशतगर्दों ने अमरनाथ यात्रा पर जा रहे हिन्दू श्रद्धालुओं के काफिले पर हमला कर 7 श्रद्धालुओं की हत्या कर दी थी

जानिए कैसे भारत की मुस्तैदी के कारण बची 11 लाख लोगों की जान: UN ने भी की तारीफ

ओडिशा ने शुक्रवार (मई 3, 2019) को आए भीषण चक्रवाती तूफान फोनी के प्रकोप का सामना किया। लेकिन जानमाल की बहुत ज्यादा हानि नहीं हुई। भारत ने आपदा प्रबंधन और बेहतर बचाव की तैयारी से जानमाल के संभावित नुकसान को न्यूनतम स्तर पर रख कर समूचे विश्व को चौंका दिया। चक्रवात फोनी दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में भारी नुकसान करने वाले तूफानों जैसा ही था, मगर बेहतर प्लानिंग की वजह से भारत में बहुत कम नुकसान देखने को मिला।

केन्द्र सरकार और राज्य सरकार ने अपनी बेहतर प्लानिंग से जन हानि को कई गुना कम करके पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि विनाशकारी चक्रवाती तूफानों से कैसे निपटा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र ने भी भारत के प्रयासों की जमकर तारीफ की है। फोनी जैसा भीषण तूफान सैकड़ों लोगों की जान ले सकता था। इससे पहले 1999 में ओडिशा में आए सुपर साइक्लोन से 10 हजार से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। लेकिन इस बार मौत का आँकड़ा 12 तक ही सिमट गया।

चक्रवात के खतरों से निपटने के लिए भारत सरकार की zero-casualty नीति की प्रशंसा करते हुए UNISDR के एक प्रवक्ता डेनिस मैकक्लेन ने कहा कि भारतीय मौसम विभाग की प्रारंभिक चेतावनियों की सटीक जानकारी की वजह से सुरक्षा अधिकारियों ने इस तूफान से निपटने में सक्षम हो पाए और जान-माल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया। इस मामले में आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष प्रतिनिधि मामी मिजुतोरी ने कहा कि अत्यंत प्रतिकूल हालात में भारत में हताहतों की तादाद बेहद कम है जिसके लिए सरकारी मौसम और आपदा प्रबंधन विभाग बधाई के पात्र हैं।

जानकारी के मुताबिक, इस चक्रवाती तूफान का पता मौसम वैज्ञानिकों ने तकरीबन एक हफ्ते पहले ही लगा लिया था, जब उन्होंने दक्षिणी हिंद महासागर में निम्न दवाब की स्थिति को देखा था। जिसके बाद 5 भारतीय सैटेलाइट ने उस क्षेत्र पर लगातार नजर बनाए रखी थी, जो फोनी चक्रवात का रूप ले रहा था। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) द्वारा भेजे गए सैटेलाइट हर 15 मिनट पर ग्राउंड स्टेशन पर इससे संबंधित डेटा भेज रहे थे, जिससे फोनी को ट्रैक करने और उसके मूवमेंट के बारे में सही-सही पूर्वानुमान लगाया जा सके। और इसी जानकारी की मदद से हजारों ज़िंदगियाँ बचाने में मदद मिली।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार फोनी की तीव्रता, लोकेशन और उसके आसपास के बादलों के अध्ययन के लिए Insat-3D, Insat-3DR, Scatsat-1, Oceansat-2 और मेघा ट्रॉपिक्स सैटलाइटों द्वारा भेजे गए डेटा का इस्तेमाल किया गया। फोनी के केंद्र के 1,000 किलोमीटर के दायरे में बादल छाए हुए थे, लेकिन बारिश वाले बादल सिर्फ 100 से 200 किलोमीटर के दायरे में थे। बाकी बादल करीब 10 हजार फीट की ऊँचाई पर थे। IMD के डायरेक्टर जनरल के. जे. रमेश ने बताया कि तूफान या चक्रवात के दौरान सैटलाइटों का पूर्वानुमान में महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि सैटेलाइटों द्वारा भेजे गए डेटा से उन्हें आने वाले चक्रवाते के लिए सटीक पूर्वानुमान जारी करने में मदद मिलती है।

सैटलाइटों के द्वारा दिए गए डेटा के आधार पर IMD ने इस बात का सटीक पूर्वानुमान लगाया कि फोनी किस जगह पर लैंडफॉल करेगा और इसी वजह से ओडिशा, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में समय रहते 11.5 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचा दिया गया। बता दें कि, इस दौरान Scatsat-1 से भेजे गए डेटा से चक्रवाती तूफान के केंद्र पर नजर रखी गई, तो वहीं Oceansat-2 समुद्री सतह, हवा की गति और दिशा के बारे में डेटा भेज रहा था।

जब-जब केजरीवाल पर ‘थप्‍पड़’ पड़ा, आम आदमी पार्टी का चंदा बढ़ा, कहीं ये पब्लिसिटी स्टंट तो नहीं?

आज मोतीनगर में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को रोड शो के दौरान किसी आक्रोशित नवयुवक ने थप्पड़ जड़ दिया। गौरतलब है कि इससे कुछ महीने पहले उनके ऊपर दिल्ली सचिवालय में लाल मिर्च पावडर फेंके जाने की खबर भी सामने आई थी। जिसमे बाद में मीडिया में खबर आई की केजरीवाल ने खुद ही अपने ऊपर फेंकवाया था।

इस तरह की घटनाएँ निंदनीय है। फिर भी आए दिन जनता अपना आक्रोश इस रूप में क्यों निकाल रही है। लोगों को हैरत में डाल रही है। सोचने वाली बात ये भी है कि अक्सर आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद भी इस तरह की शारीरिक हिंसा के शिकार क्यों हो जाते हैं?


ऐसी घटनाओं के बीच, चौकाने वाली बात ये भी है कि अरविन्द केजरीवाल पर जब-जब हमला हुआ, आम आदमी पार्टी का फंड बढ़ा है। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि क्या हर हमले के बाद चंदे देने वाले और मेहरबान हो जाते हैं? हालाँकि, दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी और आप के ही निष्काशित विधायक कपिल मिश्रा समेत कई नेताओं का कहना है कि केजरीवाल का थप्पड़ स्टंट उनके ही प्रचार तंत्र का हिस्सा है। इसके बावजूद मनोज तिवारी ने ऐसी घटनाओं की कड़ी निंदा की है।

अगर देखा जाए तो अब तक केजरीवाल पर करीब 8-10 थप्पड़ या इंक फेंकने की घटनाएँ हो चुकीं हैं। संख्‍या घट बढ़ सकती है पर इससे जुड़े आँकड़े चौकाने वाले हैं। इस तरह की घटनाएँ केजरीवाल को फिर से चर्चा में ला देतीं हैं, जिससे पार्टी को मिलने वाले चंदों में भी काफी बढ़ोतरी देखी गई है।

अगर आँकड़ों पर नज़र डालें तो आम आदमी पार्टी को दिसंबर 2012 से अप्रैल 2014 तक 111 देशों से 86,649 लोगों ने महज 24.53 करोड़ रुपए चंदे के रूप में दिए थे। जबकि लोकसभा चुनाव 2014 में आम आदमी पार्टी ने 100 करोड़ रुपए चंदा इकठ्ठा करने का टारगेट रखा था। कमाल की बात है कि 28 मार्च 2014 को केजरीवाल को हरियाणा के रोहतक में गर्दन पर हमला हुआ था। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दिन पार्टी को 42 लाख रुपए चंदे में मिले।

साउथ दिल्ली के दक्षिणपुरी में 4 अप्रैल 2014 को केजरीवाल को घूसे और लप्पड़ पड़े। उस दिन आम आदमी पार्टी को ऑनलाइन 1.35 करोड़ रुपए का चंदा मिला।  

दक्षिणपुरी की घटना के ठीक चार दिन बाद, कहते हैं पार्टी ने प्रयोग दोहराया। दिल्ली के सुल्तानपुरी इलाके में अपने रोड शो के दौरान केजरीवाल पर एक बार फिर से हमला हुआ। इस बार एक ऑटो चालक लाली ने उसे माला पहनाकर दो थप्पड़ रसीद कर दिए। बता दें कि उस बार भी उस बार भी पार्टी को मिलने वाली चंदे की रकम में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई।

कहते हैं, हमले के बाद चंदे में बढ़ोतरी का ट्रेंड एक दिन अपवाद रहा फिर जब कम हुआ तो केजरीवाल पर अहमदाबाद में फिर से हमला हुआ। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका बल्कि तब से अनवरत जारी है। जब -जब केजरीवाल चर्चा से बाहर होने लगते हैं तब ऐसी घटनाएँ होती नज़र आती हैं।

2016 में भावना अरोरा नाम की एक महिला ने दिल्ली में सीएनजी घोटाले का आरोप लगाते हुए केजरीवाल पर हमला किया। जो कि दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद से केजरीवाल पर यह पहला हमला था।

वैसे पिछले काफी समय से केजरीवाल लोकसभा-2019 चुनाव के लिए चंदे का रोना रो रहे थे ऐसे में ये कयास लगाना गलत नहीं होगा कि क्या मोतीनगर में फिर से अपना वही प्रयोग दोहराना केजरीवाल का चंदा बढ़ाने वाला पेट नुस्खा तो नहीं? यहाँ तक कि उनके अपने विधायक कपिल मिश्रा ने आरोप लगाया है कि पूरे दिल्ली को पता था कि केजरीवाल फिर से खुद को थप्पड़ मरवाने वाले हैं।

खैर, कारण जो भी हो पर, लोकतंत्र में जनता अपने नेता से कितनी भी नाराज क्यों न हो, फिर भी इस तरह से शारीरिक हिंसा पर उतर आना घोर निंदनीय है। अगर कोई पार्टी वास्तव में इसे पब्लिसिटी या चंदे का साधन बना कर प्रयोग कर रही है तो ये भी लोकतान्त्रिक व्यस्था का मजाक बनाना ही है। इस तरह की घटनाओं को किसी भी हाल में जायज नहीं ठहराया जा सकता है। आपइंडिया ऐसी हरकतों की कड़ी निंदा करता है।