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अब केजरीवाल गौतम को भेजेंगे मानहानि नोटिस, कहा: ‘भाजपा को महिलाओं की उपलब्धि बर्दाश्त नहीं’

आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी के लिए आपत्तिजनक बातों वाले पर्चे बँटवाने के मामले में अरविंद केजरीवाल ने पलटवार करते हुए गौतम गंभीर को मानहानि नोटिस भेजने का फैसला किया है। केजरीवाल के मुताबिक गंभीर ने उनका अपमान करने के बाद उन्हीं के ख़िलाफ़ मानहानि का मामला दर्ज कराया है। अब वे भी गौतम गंभीर को मानहानि का नोटिस भेजने जा रहे हैं। केजरीवाल का कहना है कि वो इस मामले को नहीं छोड़ेंगे।

एएनआई से हुई बातचीत में केजरीवाल ने कहा, “आतिशी (AAP की पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार) एक उच्च शिक्षित और एक कुशल महिला हैं। दिल्ली में उनका काम शिक्षा के क्षेत्र में बहुत अच्छा रहा है जिसकी दुनिया भर में चर्चा हो रही है। मुझे समझ नहीं आता कि भाजपा महिलाओं द्वारा की गई उपलब्धियों को क्यों बर्दाश्त नहीं कर सकती।”

गौरतलब है कि पूर्वी दिल्ली से भाजपा के उम्मीदवार गौतम गंभीर पर आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी ने उनके ख़िलाफ़ ‘अभद्र टिप्पणी’ वाले पर्चे बँटवाने के संगीन आरोप लगाए थे। इस पर गंभीर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आप प्रत्याशी आतिशी को मानहानि का नोटिस भेजा और कहा कि वे बिना शर्त, माफ़ी माँगे और अपना झूठा बयान वापस लें, नहीं तो मानहानि का केस किया जाएगा।

बता दें गौतम गंभीर ट्विटर पर लगातार केजरीवाल और आतिशी को चैलेंज दे रहे हैं। सुबह उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों पर ट्वीट करते हुए लिखा था, “मैं घोषणा करता हूँ कि केजरीवाल और आतिशी अगर साबित कर दें कि मैंने कुछ गलत किया है तो मैं अभी अपनी उम्मीदवारी वापस ले लूँगा, लेकिन वह अगर ऐसा न कर पाए तो क्या वे राजनीति छोड़ देंगे?”

इसके बाद अभी कुछ समय पहले गौतम गंभीर ने ट्वीट किया ”केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को मैं तीसरी चुनौती दे रहा हूँ। यदि वह (केजरीवाल) यह सिद्ध कर पाए कि ऐसे आपत्तिजनक पर्चों का मुझसे कोई लेना-देना है तो फिर मैं जनता के सामने खुद को फाँसी पर चढ़ा लूँगा, वरना क्या केजरीवाल जी राजनीति से सन्यास लेंगे? मंजूर है?”

‘आरोप साबित हुए तो फाँसी लगा लूँगा, नहीं तो केजरीवाल राजनीति छोड़ें’: गौतम गंभीर

पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से आम आदमी पार्टी (AAP) प्रत्याशी आतिशी ने बीजेपी प्रत्याशी गौतम गंभीर पर आरोप लगाया था कि गौतम गंभीर ने इस लोकसभा क्षेत्र में उनके खिलाफ आपत्तिजनक पर्चे बँटवाए हैं। गौतम गंभीर ने आतिशी और आम आदमी पार्टी के आरोपों को खारिज कर दिया था और कहा था कि अगर ये आरोप सही साबित हो गए, तो वो अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे।

अब एक बार फिर से गौतम गंभीर ने ट्वीट कर दिल्ली के CM अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को चुनौती दी है। गंभीर ने लिखा है, “अगर वो ये साबित कर देते हैं कि उस पर्चे से मेरा कोई लेना-देना है, तो मैं जनता के बीच अपने आप को फाँसी लगा लूँगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अरविंद केजरीवाल को राजनीति से संन्यास लेना होगा। क्या यह चुनौती स्वीकार है?”

गंभीर ने भेजा मानहानि नोटिस

आम आदमी पार्टी के आरोपों पर गौतम गंभीर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आतिशी मार्लेना के खिलाफ मानहानि का नोटिस भेजा है। इससे पहले उन्होंने आरोपों के जवाब में कहा था कि अगर उनके खिलाफ इस मामले में आरोप साबित होते हैं, तो वे अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो केजरीवाल और अतिशी राजनीति से संन्यास लें।

‘मुझे महिलाओं की इज्जत करना सिखाया गया’

गौतम गंभीर ने कहा, ‘‘जो भी हुआ, मैं उसकी निंदा करता हूँ। मैं उस परिवार से आता हूँ, जहाँ मुझे महिलाओं की इज्जत करना सिखाया गया है। मुझे नहीं पता था कि अरविंद केजरीवाल इतने नीचे चले जाएँगे। इसलिए मैंने मानहानि का केस किया है। हम इस हद तक कभी नहीं गिर सकते, जहाँ तक AAP नेता जा रहे हैं।’’

हाउसिंग सोसाइटियों में बंटवाए गए पर्चे

आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि पूर्वी दिल्ली की हाउसिंग सोसाइटियों में अखबारों में रखकर बँटवाए गए पर्चे में आतिशी के बारे में काफी आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं। इसमें आतिशी को ‘प्रॉस्टिट्यूट’, ‘बीफ इटर’, ‘मिक्स ब्रीड का सबसे अच्छा उदाहरण’ बताया गया है।

‘अगर मोदी सच में OBC होते तो RSS उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने देता’: मायावती

नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए मायावती ने उनकी जाति पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने दावा किया है कि RSS उन्हें प्रधानमंत्री कतई न बनने देता अगर वे सच में पिछड़ी जाति के होते। मायावती ने प्रधानमंत्री पर जातिगत हमला जारी रखते हुए यह भी कहा वह जन्मजात पिछड़े नहीं हैं और उन्होंने ‘असली जातिवाद’ नहीं झेला है।

अखिलेश ‘असली’ पिछड़े क्योंकि ‘ऑन-पेपर’ पिछड़े

मायावती ने अपनी प्रेस-कांफ्रेंस में पिछड़े की अनूठी परिभाषा सामने रखी। उनके अनुसार चूँकि मोदी के जन्म और बचपन के समय उनकी जाति मोद-घाँची गुजरात में ओबीसी में नहीं गिनी जाती थी इसलिए मोदी को उनका दर्द नहीं पता होगा। इसके उलट अखिलेश यादव ‘ऑन-पेपर’ पिछड़े’ हैं इसलिए उनका पिछड़ापन ‘असली’ है।

हालाँकि यह बयान देते समय वह एक-दो बातें भूल गईं। पहली कि गरीब चायवाले के परिवार में पैदा होने और किशोरावस्था में ही सन्यासी हो जाने के कारण नरेंद्र मोदी का प्रारंभिक जीवन भौतिक सुख-सुविधाओं से बहुत दूर रहा, वहीं मायावती के गठबंधन-मित्र अखिलेश यादव के पिता मुलायम अखिलेश के जन्म से 4 साल पहले ही विधायक बन चुके थे; यानि सत्ता की मलाई कटने लगी थी। अखिलेश जब महज़ चार साल के थे तब मुलायम राज्य सरकार के मंत्री भी बन गए थे।

17 साल की उम्र में जहाँ मोदी हायर सेकेंडरी पास कर घर छोड़ने और देश के दूसरे ध्रुवीय कोने में स्थित कोलकाता के बेलूर मठ जाने की तैयारी कर रहे थे, वहीं उसी उम्र में मायावती के गठबंधन-मित्र अखिलेश अपने पिता के मुख्यमंत्रित्व से परिवार को मिलने वाले का आनंद उठा रहे थे।

दूसरी बात जो मायावती मोदी का राजनीतिक विरोध करते-करते भूल गईं वह यह कि अनुसूचित जाति/दलितों के उलट पिछड़ी जातियों के पिछड़ेपन के विमर्श में आर्थिक फैक्टर महत्वपूर्ण हो जाता है। अतः चाहे मोदी जन्म के समय मोद-घाँची पिछड़े रहें हों या ना रहे हों, अमीरी में पैदा हुए और पले-बढ़े अखिलेश के मुकाबले वह कहीं ज्यादा पिछड़े माने जाएँगे।

मोदी ने नहीं कराया था अपनी जाति को पिछड़ों में शामिल  

नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द हो रहे राजनीतिक विमर्श को जाति तक समेटने की जल्दी में मायावती ने भूतकाल में झूठ बोलने से भी गुरेज नहीं किया है। गत 27 अप्रैल को ही उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अपनी जाति को ओबीसी में शामिल अपने मुख्यमंत्री रहते करा दिया था। इसका ऑपइंडिया ने फैक्ट-चेक किया था तो पाया था कि मोद-घाँचियों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल 2001-14 में नहीं बल्कि 1994 में ही कर दिया गया था। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री कॉन्ग्रेस के छबीलादास मेहता थे और मोदी तो राजनीति से ही अल्प-विराम लेकर अहमदाबाद में एक स्कूल की स्थापना में लगे थे।

‘टाइम’ का रेसिस्ट पत्रकार, हिंदू-घृणा जताने में ‘वायर’ के लेख चोरी कर कल्पना परोस रहा है

‘टाइम’ एक मैगजीन है जो अमेरिका से छपती है। एक समय था जब इनकी एलिटिज्म इतनी ऊँची हुआ करती थी कि इन मैग्जीनों के कवर पर पहुँचने के लिए नेता, उद्योगपति, सितारे आदि एड़ी-चोटी का जोर लगाकर लॉबीइंग किया करते थे। अब वो टाइम नहीं रहा। वो टाइम इसलिए नहीं रहा क्योंकि अमेरिका में ट्रम्प को चुन लिया गया, और इस राष्ट्र की एलीट मायनोरिटी को वो कभी पसंद नहीं आया। परिणाम यह हुआ कि ‘द इकनॉमिस्ट’ और ‘टाइम’ जैसे उच्चस्तरीय मीडिया संस्थान चिरकुटों वाली हरकत पर उतर आए और खुल्लमखुल्ला राजनीति में उतर आए। जबकि इनका काम राजनीतिक पार्टियों की कैम्पेनिंग नहीं है।

इसी एलीट मायनोरिटी का एक हिस्सा अमेरिकी लेट नाइट टॉक शोज़ हैं जहाँ आप हर रात लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए नेता के हर ट्वीट, हर नीति, हर बात का मजाक उड़ाते देख सकते हैं। पूरा का पूरा ईकोसिस्टम एक व्यक्ति पर केन्द्रित है क्योंकि वो इनकी भाषा नहीं बोलता, वो ओबामा और बुश की तरह दूसरे देशों में नरसंहार नहीं करना चाहता, वो उनकी तरह शब्दों को चाशनी में डुबो कर नहीं कहता। लेकिन इनका दुर्भाग्य कि अमेरिकी जनता को वही पसंद है।

अमेरिका मूलतः एक रेसिस्ट समाज है। यूँ तो एक नैरेटिव यह भी है कि वहाँ यूरोप के चोर, लुटेरों और बलात्कारियों को डीपोर्ट किया जाता था, और उन लोगों ने यहाँ के जनजातियों को न सिर्फ भगाया बल्कि उन्हें ग़ुलामों की तरह रखने का भी गुनाह किया। यह नैरेटिव कितना सही है, वो अलग चर्चा का विषय है, हालाँकि यह मानना कोई गलत नहीं है कि इन लोगों के भीतर ‘व्हाइट सुप्रीमेसिज्म’ अत्यधिक मात्रा में भरा हुआ है।

ख़ैर, मुद्दा यह है कि कई बार कुछ लोगों या संस्थानों को यह ग़लतफ़हमी हो जाती है कि उनके ऊपर पूरे विश्व का भार है। वो अपने काम से मतलब नहीं रख पाते। वो अपने समाज, राष्ट्र या स्वयं के भीतर की समस्याओं को ताक पर रख कर भारत के लोगों को बताते हैं कि भारतीय लोग कितना भेदभाव रखने वाले हैं, कितने मूर्ख हैं कि भैंस पालते हैं और मंगलयान छोड़ते हैं, कैसे लोग हैं जो मोदी जैसों को सत्ता दे देते हैं।

ऐसे विचार रखना सबसे पहले आपको महामूर्ख बनाता है कि लोकतंत्र में जनता जिसे सत्ता देती है, उस जनता के विचारों का आपको सम्मान करना चाहिए न कि आप उस जनता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाने लगें क्योंकि आपके मतलब के लोग सत्ता में नहीं हैं। ‘टाइम’ की इस कवर स्टोरी के लेखक आतिश तासीर हैं जो कि एक पाकिस्तानी मुस्लिम की औलाद हैं, ऐसा उन्होंने खुद बताकर पढ़ने वालों पर कृपा की है। चूँकि लेखक मुस्लिम है, तो मैं इस पर बिलकुल फ़ैसला नहीं सुनाने वाला कि उसने इसी कारण से इतना लम्बा लेख लिख दिया है। वो काम मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ।

अभी कुछ दिन पहले ‘द वायर’ नाम के प्रोपेगेंडा पोर्टल पर किसी बकलोल इंटरनेट ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी ने ऐसा ही आर्टिकल लिखा था। आतिश तासीर का दुर्भाग्य कि मैंने वो आर्टिकल भी पढ़ा, और ‘टाइम’ मैग्जीन की कवर स्टोरी भी। दोनों को पढ़ते हुए मैंने पाया कि पुत्र आतिश ने स्वाति के आर्टिकल के कई हिस्से चोरी किए हैं। उनके पूरे आर्टिकल में ‘द वायर’ के आर्टिकल के कई शब्द (dog whistle, tacit support of state, cow lynching, silence on Godhra, anti-Muslim) से लेकर पूरे के पूरे आर्गुमेंट उसी आर्टिकल को पढ़ कर लिखे गए हैं। आतिश के आर्टिकल को पढ़ते हुए लगा कि स्वाति के लेख के ग़ुब्बारे में खूब हवा भर दी गई, और उसे दस गुना बड़ा कर दिया गया है। हालाँकि, यह बात और है कि आतिश ने भारत के लेफ़्ट और कॉन्ग्रेस पर ठीक-ठाक लिखा है जो ‘द वायर’ वाले आर्टिकल में कहीं नहीं था।

‘टाइम’ के कवर पर मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ़’ कहा गया है। इसका सरल शब्दों में अर्थ होता है ‘समाज को बाँटने में सबसे आगे रहने वाला’। ये कवर पेज पर लिखे कुछ शब्द मात्र नहीं हैं, ये एक घृणाजनित सोच की कुत्सित अभिव्यक्ति है जिसे ‘टाइम’ छुपा नहीं सका। ये एक भीतर से मुस्लिम, हिन्दू-विरोधी, साम्प्रदायिक घृणा से ग्रस्त लेखक की घटिया भाषा है, जो बताती है कि अगर वो अपने पिता का धर्म नहीं भी लिखता तो यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि वो कहाँ से आया है, और क्या है।

इस कवर स्टोरी की हेडलाइन है ‘Can the World’s Largest Democracy Endure Another Five Years of a Modi Government?’ इसको सहज शब्दों में अनुवाद करने पर हमें यह प्राप्त होता है कि ‘क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मोदी सरकार के दूसरे पाँच साल को बर्दाश्त कर सकता है?’ मैग्जीन के कवर के शब्दों और आर्टिकल के शीर्षक से पता चल जाता है कि यह लेख दुर्भावना से ग्रसित और मानसिक अवसाद में सना हुआ है। वरना, अमेरिका में बैठ कर भारतीय समाज के लोकतांत्रिक चुनाव को पूरी तरह से ख़ारिज कर देना, किसी संयमित सोच का नतीजा तो नहीं ही हो सकती।

आखिर ऐसा क्या हुआ है, या नहीं हुआ है कि अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित मैग्जीन को ऐसी नकारात्मक और अधपकी सोच के साथ बिकने पर मजबूर होना पड़ रहा है? क्या न्यूज चैनलों के डिबेटों की सनसनी अब मैग्जीन में भी पहुँच गई क्योंकि बात अब सर्वाइवल पर आ गई है। क्या अब ‘टाइम’ भी ‘शॉकिंग’ हेडलाइनों से खुद को बाज़ार में उतारेगा?

कल्पनाओं को तथ्य की तरह रखना

लेखक ने शुरुआत से ही साबित कर दिया है कि वो कहाँ जाने वाला है। वस्तुतः वह एक जगह पर पहुँच चुका है, उसके बाद वो अपनी यात्रा शुरु कर रहा है। यही कारण है कि वो भारतीय समाज को धार्मिक राष्ट्रवाद, मुस्लिम-विरोधी भाव और जातिगत कट्टरता से सना हुआ बताता है। भारतीय समाज में जातिवाद है, और वो कहाँ से इस कुत्सित रूप में पहुँचा, यह हम सब जानते हैं, लेकिन उसे इस समाज की पहचान बता देना अल्पज्ञान ही है।

आतिश ने लिखा है कि मोदी को सत्ता दे देना बताता है कि भारतीय समाज उदारवादी नहीं, कट्टरपंथी है। लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए नेता को चुनने वाली जनता के विवेक पर सवाल करना एक असहिष्णुता है जो कि दो-चार अक्षर पढ़-लिख लेने वाले लोगों में आम है, खासकर जो अंग्रेज़ी जानता हो और अपने पाकिस्तानी मुस्लिम पिता को ‘अंग्रेजी बोलने वाले एलीट का हिस्सा’ बता कर अपनी ऑथेन्टिसिटी घुसाना चाहता है। भारतीय समाज में विविधता है, और यह समाज मुस्लिम आक्रांताओं से लेकर मुस्लिम आतंकियों तक, ब्रिटिश लुटेरों से लेकर यूरोपीय-अमेरिकी व्हाइट सुप्रीमेसिज्म तक, आज भी इन समाजों से कम अपराध दर, कम घृणा से चलायमान है। इसलिए, इन मुद्दों पर ज्ञान ऐसे लोग और संस्थान न दें, तो बेहतर है।

अधिकतर लोगों के साथ यह समस्या है कि उनकी आसमानी किताब प्रकट होती है, और वही अंतिम सत्य होता है, और राम ‘हिन्दू एपिक’ के हीरो भर रह जाते हैं। लेखक ने बार-बार यह जताया है कि वो ‘टाइम’ का पत्रकार नहीं, वस्तुतः खुन्नस खाया वही कट्टरपंथी है जो बाबर जैसे लुटेरे और आतंकी को अपना बाप-दादा मानते हुए, उसके द्वारा राम मंदिर ध्वस्त कर बनाई मस्जिद को एक अंतिम सत्य मानता है, जिसके गिरा दिए जाने का दुःख उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी होता रहेगा। हालाँकि, मुस्लिम आक्रांताओं के अत्याचारों को ये सेलिब्रेट करने में नहीं सकुचाते, या उस पर चर्चा ही नहीं करते।

अत्याचारों के उस दौर को ‘इस्लामी शासन’ कह कर इस लेखक ने भी ऐसे जस्टिफाय किया है जैसे भारत के लोगों ने उन्हें बुलाया था कि ‘आओ, हमारे मंदिर तोड़ो, हमारी लड़कियों का बलात्कार करो, हमें काट डालो, और जो तुम्हारा मज़हब स्वीकार लें उन पर राज करो’। ऐसा किसी ने नहीं कहा था। कुछ लुटेरे आए और अपनी हिंसा के बल पर बसे और उन्होंने हमारे समाज को इतना तबाह किया यहाँ शादियाँ रात में होने लगीं, लड़कियाँ पर्दा और घूँघट करने लगीं, लोगों को ग़ुलामों की तरह रखा जाने लगा। इसलिए आतिश तासीर जैसे लोग इन बातों तक दो लाइन भी नहीं लिख पाते।

रेटरिक, रेटरिक, रेटरिक… ब्ला, ब्ला, ब्ला…

आगे जो लिखा है, वो वही लिखा है, जो भारत का लेफ़्ट-छद्मलिबरल गिरोह और पाक अकुपाइड पत्रकारों का समुदाय विशेष पिछले पाँच सालों से लिखता आ रहा है: मोदी गोधरा पर चुप रहा, मोदी समाज को मजहबों में बाँट रहा है, मोदी ने समुदाय विशेष की मौत पर अफ़सोस नहीं जताया, गौरक्षकों का आतंक फैल गया है, योगी को सीएम बना दिया, प्रज्ञा को प्रत्याशी बना दिया, मोदी सरकार हर फ़्रंट पर नाकाम रही है, मोदी सरकार में अल्पसंख्यकों में डर फैल रहा है, मोदी सरकार हिन्दू साम्प्रदायिक ताक़तों को हवा दे रही है…

ये सारी बातें इतनी बार कही गई हैं, और एक ही नक्कारखाने से बजती रही हैं, कि अब इन पर ध्यान देना भी इन लोगों को नाहक ही भाव देने जैसा है। फिर भी ‘टाइम’ मैग्जीन ने यह दुष्कृत्य किया है तो एक-एक लाइन में इन सारे खोखले तर्कों को हवा करना आवश्यक हो जाता है।

मोदी गोधरा पर कभी चुप नहीं रहा, उसने बार-बार कहा है कि उसकी नौ घंटे पूछताछ हुई, और उसने सारी बातें बता दी हैं जो पब्लिक डोमेन में हैं। अगर ‘चुप्पी’ से मतलब यह है कि मोदी ने समुदाय विशेष से माफ़ी नहीं माँगी, तो वो मुग़ालते में हैं। मोदी को क़ायदे से हिन्दुओं से माफ़ी माँगनी चाहिए जिन्हें बंद ट्रेन की बॉगी में जला दिया गया। मायनोरिटी जब ऐसे आतंक मचाएगी, तो बहुसंख्यक समाज आत्मरक्षा में जवाब देगा ही। हिंसा हर रूप में गलत है, लेकिन हिंसा शुरु करने वाले को आप छोड़ देते हैं, और चूँकि आपके मतलब की बात दूसरे पक्ष में दिखती है तो आपको माफ़ी चाहिए।

क्यों? कोई माफ़ी नहीं मिलेगी क्योंकि आज तक इसी समाज ने हिन्दुओं से कभी माफ़ी नहीं माँगी जिनके चार हजार मंदिर ज़मींदोज़ हुए, जिनके गाँव और विश्वविद्यालय जलाए गए, जिनके परिवारों का ज़बरन मत-परिवर्तन कराया गया। जब दो समुदाय दंगा करते हैं, तो दोनों दोषी होते हैं। माफ़ी दोनों ओर से आनी चाहिए। चूँकि एक दंगे में मारे गए लोग समुदाय विशेष से थे, तो हर हिन्दू उसकी माफ़ी माँगता फिरे, यह सोच गलत और वाहियात है।

मोदी ने जितना मजहब विशेष के लिए किया है, उस पर टाइम मैग्जीन वालों को कवर स्टोरी में झूठ और प्रपंच का पुलिंदा छापने से पहले एक सर्वे करा लेना चाहिए था। मोदी पहला प्रधानमंत्री है जो तुष्टिकरण से परे, हर योजना में जाति, मज़हब, धर्म, राज्य आदि देखे बिना, सौ प्रतिशत कवरेज चाहता है। उसकी चाहत भारत के हर घर में बिजली की थी, जो पूरी हुई। उसकी चाहत हर गरीब के घर में शौचालय की थी, जो पूरी हुई। उसकी चाहत हर गरीब के सर पर छत की है, जो बेहतरीन रफ़्तार से आगे बढ़ रही है। इसमें मजहब कौनसा है कौनसा नहीं। यहाँ नागरिक हैं, और सबको लाभ मिल रहा है। अगर आँकड़ों की ही बात करें तो उत्तर प्रदेश में 17% मुस्लिम आबादी है, जबकि सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों में एक तिहाई भागीदारी मजहब विशेष की है। तो यह प्रपंच कि हिन्दू-मुस्लिम हो रहा है, ध्वस्त हो जाता है।

फिर फ़ेवरेट टॉपिक आता है गौरक्षकों का जो कि वैसी ही बकवास बात है जैसी जुनैद वाली लिंचिंग थी। आपके “टैसिट सपोर्ट” लिख देने से सराकरों की भागीदारी उनमें नहीं हो जाती। कुछ लोगों के सामाजिक अपराध को राजनैतिक रंग आप दे रहे हैं, न कि मोदी। ‘समुदाय विशेष को लिंच कर दिया गया’ से ज़्यादा भार इस बात पर होना चाहिए कि गौतस्करों और गौरक्षकों के दो समूहों में झड़प हुई और कुछ लोग मारे गए, कुछ घायल हुए। ये आतिश जैसे चम्पक पत्रकार यह भूल जाते हैं कि इन्हीं गाय चोरों ने कई बार पुलिस के ऊपर ट्रक चढ़ाए हैं भागने की कोशिश में। सीधी सी बात है कि गाय चुराना, गाय काटना अपराध है। उसमें कोई मनमानी करेगा तो सरकार और पुलिस अपना काम करेगी। जहाँ तक गौरक्षकों का सवाल है, टाइम मैग्जीन ने यह पता करने की कोशिश की होती कि क्या उन हत्याओं पर मुक़दमों नहीं चल रहे, तो सच्चाई सामने आ जाती। लेकिन डिजिटल ऐज में इतनी मेहनत कौन करता है!

उसके बाद आज कल का घिसा हुआ राग छेड़ा गया कि योगी को सीएम बना दिया, आतंक आरोपित प्रज्ञा को प्रत्याशी बना दिया। यहाँ पर ये लोग अपने आप को बाबा मान लेते हैं। इनको लगता है कि भीमराव अंबेडकर की आत्मा इनमें आ गई है और भारत का संविधान से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक यही लम्पटाधीश हैं। अगर योगी पर, या साध्वी प्रज्ञा पर, संविधान या कोर्ट को आपत्ति होती तो हमारे यहाँ के छद्म लिबरल गिरोह के सदस्य अपराध साबित करा चुके होते क्योंकि यहाँ चार बजे भोर में आतंकवादियों के लिए कोर्ट खुलती है।

‘अल्पसंख्यकों में डर फैल रहा है’ की नौटंकी तो अब बंद हो जानी चाहिए। पहली बात तो यही है कि भारत की दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी को अल्पसंख्यक कहना बंद किया जाए। दूसरी बात, ये किसने सर्वे कराया है? जब आप यही सवाल हिन्दुओं से पूछेंगे तो वो भी कहेगा कि वो दूसरे ख़ास समुदाय से डर कर रहता है। ‘टाइम’ मैग्जीन को यह सर्वे कराना चाहिए। जब जवाब आएगा कि हिन्दुओं ने माना है कि उन्हें डर लगता है, तो उन हिन्दुओं को ‘बिगट’, ‘कम्यूनल’, ‘इस्लामोफोबिक’ कहा जाएगा।

लेकिन समुदाय विशेष में वैसे हिन्दुओं से डर, जिन्होंने दीवाली, शादी और क्रिकेट मैचों को छोड़ कर कभी पटाखे तक न फोड़े हों, यह बताता है कि बहुसंख्यक जनता इनको डराती है! किस बात का डर है? क्या तुम्हारे लाउडस्पीकर उतार लिए गए? क्या तुम्हारे पैगम्बरों के बारे में बोलने वाले लोग जेलों में नहीं हैं? क्या समुदाय विशेष के लोग हँसी-खुशी हिन्दू देवी-देवताओं का उपहास नहीं करते? ये तर्क इतना खोला है कि इस पर कुछ भी कहना बेकार है। लेकिन कहना पड़ता है क्योंकि ये लाइन किसी ने कह दी है, हम इसे सत्य मान कर चल रहे हैं।

मोदी सरकार के आने के बाद कितने बड़े दंगे हुए हैं, इस पर टाइम मैग्जीन के चम्पक लेखक ने कुछ नहीं लिखा। योगी के उत्तर प्रदेश में कितने दंगे हुए हैं, इस पर चिंटू पत्रकार ने नहीं लिखा, ‘हिन्दू टेरर’ का नैरेटिव किसने गढ़ा था, इस पर चमन जर्नलिस्ट ने प्रकाश नहीं डाला। मोदी और योगी सरकार के आने के बाद इस देश के राज्यों और दिलों में जो शांति दिखी है, वो पहले कभी नहीं थी। कॉन्ग्रेस और तथाकथित सेकुलर पार्टियों ने दंगे स्पॉन्सर किए हैं ताकि साम्प्रदायिकता का खेल चलता रहे। दंगे आयोजित कराए गए ताकि एक समुदाय को लगे कि फ़लाँ सरकार ही उसकी रक्षक बन सकती है।

चूँकि, यह बात फैला दी गई कि भाजपा साम्प्रदायिक है, तो भाजपा साम्प्रदायिक नहीं हो जाती। देश के तमाम बड़े दंगे, या तो कट्टरपंथियों ने शुरु किए, या फिर वो कॉन्ग्रेस (और समर्थित पार्टियों) के कार्यकाल में हुए हैं। दंगे रोकना राज्य सरकारों का काम है, और हर ऐसे दंगे पर नैरेटिव यह दिया जाता है कि मोदी के आने के बाद हिन्दुओं में कानून का ख़ौफ़ कम हो गया है, वो दंगे कर रहे हैं। अरे भाई, तो पकड़ो और जेल में डालो ऐसे मनचलों को। क्या मोदी ने सपा की पुलिस के हाथ बाँध रखे थे कि दंगाइयों पर कार्रवाई मत करो? पूरा इतिहास पड़ा है दंगों का और उस समय की सरकारों का। इसलिए ये बकवास नैरेटिव रखो अपने पास!

मोदी सरकार हर फ़्रंट पर नाकाम रही है

ये वैसे ही बेमतलब की बात है जैसे बिहार में चलने वाली बसों के पीछे ‘दुल्हन ही दहेज है’ वाला नारा। हमारे भाई-बंधु दुल्हन भी लेते हैं, दहेज भी। लेकिन कहा खूब जा रहा है। मोदी सरकार पर भी यही कहा जाता है। जीडीपी बेहतर हो रही हो, तो कहते हैं कि लोग गरीब हैं। रॉकेट छोड़ दो तो कहते हैं कि लोग भूखे हैं। सड़कें बना दो तो कहते हैं कि बैलगाड़ी वालों का रोजगार चला गया। पुल बना दो कहेंगे कि नाविक अब क्या करेंगे। रोजगार के मौक़े जो तो कहेंगे कि सबको सरकारी नौकरी क्यों नहीं मिल रही।

भारत विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी इकॉनमी बनने वाली है, और सरकार हर फ़्रंट पर फेल है! विश्व का सबसे बड़ा वित्तीय समावेशन हर गरीब को बैंक खाता और डायरेक्ट बेनेफिट टार्न्सफर के ज़रिए हुआ, लेकिन सरकार बेकार है। सबसे ज्यादा घरों में बिजली पहुँची, सबसे ज्यादा गति से शौचालय बने, सबसे तेज गति से सड़कें और रेलमार्ग बने, करोड़ों लोग आज सरकारी मदद से बने पक्के मकानों में रह रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार हर फ़्रंट पर फेल है।

पिछले पाँच सालों में, अलग-अलग सर्वेक्षणों से, लगभग सात से दस करोड़ लोगों को रोजगार के अवसर मिले, लेकिन ये चम्पक लोग यही कहते हैं कि रोजगार को मुद्दों पर सरकार नाकाम रही है। इन्फ्लेशन कंट्रोल में है, वैश्विक सूचकांकों में भारत ने बेहतरी ही की है, व्यवसाय करने में सुलभता आई है, लेकिन सरकार तो नाकाम है।

सरकार नाकाम इसलिए है क्योंकि ये सरकार इनके हिसाब की नहीं है। सरकार नाकाम इसलिए हो जाती है क्योंकि ये ऐसा मानते हैं। ये हर उस आँकड़े को झूठा बता देंगे जिसके बल पर पाँच साल पहले ये छाती ठोका करते थे। ये वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ़, यूएन से लेकर आर्थिक रेटिंग एजेंसियों को संघी बता देंगे क्योंकि उन्होंने कहा है कि भारतीय अर्थ व्यवस्था बेहतरी कर रही है। ये दम्भ है जो एक लिमिटेड सोच रखने वाले गिरोह के लोगों में व्याप्त है। इसलिए, आप चाहे इनके दाँतों पर सोना मढ़वा दीजिए, ये कहेंगे कि मेरे लिप्स का क्या।

अभिजात्य घमंड में हमारी पीढ़ी पर हमला

एलीट माइंडसेट, या अभिजात्य मानसिकता, एक उन्माद की अवस्था होती है। इसमें आदमी लगभग पागल हो चुका होता है क्योंकि उसे लगता है कि वो जो मानता है, वही सही है। ‘टाइम’ मैग्जीन को अमेरिकी होने का, और इस चम्पक आतिश तासीर को ‘टाइम’ में लिख पाने का घमंड है। यही घमंड इसे यह लिखने को मजबूर करता है कि आज की भारतीय पीढ़ी जो लिख रही है, जो न्यूयॉर्क टाइम्स के कार्टूनों पर उन्हें घेर रही है, वो मूर्ख है।

नहीं लल्लू लाल, तुम्हें भले ही अमेरिकियों से डर लगता हो कि तुम्हें कहीं भगा न दे, लेकिन भारतीय आबादी के साथ ऐसा डर नहीं है। वो इस्लामी आतंकियों और अत्याचारियों के शासनकाल या ब्रिटिश ग़ुलामी में मजबूर रह कर जीने वाली आबादी नहीं है। सत्य यह है कि उसी ब्रिटेन का सबसे बड़ा रोजगारदाता आज भारत का टाटा है। सत्य यह है कि उसी ब्रिटेन को आने वाले कुछ ही सप्ताह में हम पीछे छोड़कर उससे बड़ी इकॉनमी बन जाएँगे।

हमें गर्व है कि इस्लामी लुटेरे आतंकियों और ब्रिटिश हुकूमत के आने से पहले हम दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थे, और हम दोबारा उसी तरफ बढ़ रहे हैं। इस बात का गर्व हमें ट्विटर और फेसबुक पर न्यू यॉर्क टाइम्स के नस्लवाद पर उसे घेरने की हिम्मत देता है। तुम अपने श्वेत मालिकों की ग़ुलामी करो, भारत की आज की युवा पीढ़ी उनसे परे एक नए गौरव के साथ आगे बढ़ रही है। हम उन्हें बताएँगे कि हम गाय भी पालते हैं, और रॉकेट छोड़ने से पहले देवताओं का आह्वान भी करते हैं, और आधी आबादी की गरीबी (जो इस्लामी आक्रांताओं और ब्रिटिश चोरों की लूट के बाद वैसी हुई) के बावजूद पहली ही बार में मंगलयान छोड़ देते हैं।

इन्हें दुःख है कि आज का भारतीय युवा ‘सिकुलर’, ‘लिब्टार्ड’ आदि लिखता है। इन्हें दुःख है कि आज का हिन्दू यह मानने लगा है कि एक नैरेटिव में हिन्दू प्रतीकों का अपमान उनमें व्याप्त ‘हिन्दूफोबिया’ के कारण है। मतलब, अब ‘फोबिया’ भी सिर्फ एक मजहब विशेष में हो? तुम्हारा गिरोह हर हिन्दू परम्परा को अपने अज्ञान में रेग्रेसिव कहे, देवी-देवता की पूजा के ढकोसला कहे, एक अपराध को धर्म से जोड़ दे, और यहाँ का हिन्दू युवा वर्ग उसे ‘हिन्दूफोबिया’ भी न कहे!

जब तुम जैसों को जवाब मिलने लगे, तो ‘टाइम’ जैसे श्वेत संस्थाओं को लगता है कि ‘अरे! ये तो हमारे ग़ुलाम थे… ये डार्क स्किन वाले हिन्दू! ये हमें जवाब कैसे देने लगे!’ जवाब तो मिलेगा ही, वो भी तुम्हारे ज़हरीले सवाल से दोगुना इंटेसिटी में। क्योंकि बोलना तो हमें इतना आता है कि हमारे यहाँ कितनी भाषाएँ खो गईं, उसकी भी गिनती हमने नहीं की। बोलना, लिखना और परफ़ॉर्म करना तो हमारे गाँवों की परम्परा है। तुम्हारे बाप-दादाओं ने उसे खूब बर्बाद किया, हमारे बाप-दादाओं ने हमें भूलने नहीं दिया।

इसलिए, जब हम कहते हैं कि हमें प्लास्टिक सर्जरी आती है तो हम महर्षि सुश्रुत को याद करते हैं जिन्होंने दो सौ से ज्यादा सर्जिकल टूल्स उस समय बनाए थे जब तुम्हारे श्वेत दादाओं के दादाओं ने बोलना भी नहीं सीखा था, और भाले-तलवारों और पत्थरों से लड़ा करते थे। जब हम कहते हैं कि हमारा इतिहास गौरवशाली रहा है तो हम तुम्हें यह बताते हैं कि फिबोनाची सिक्वेंस फिबोनाची से बहुत पहले हमने ढूँढ रखा था, पायथागोरस का प्रमेय हमारी देन है।

ध्यान रहे श्वेत चमड़ी को धारण करने वाले अभिजात्य घमंड में चूर संस्था के पूर्वग्रह से ग्रस्त पत्रकार, तुम्हारा इतिहास भले ही रेनेसाँ के बाद शुरु हुआ हो, जिसके बाद तुमने दुनिया भर में आतंक मचाया। लेकिन हमारी सभ्यता तुमसे पहले भी थी, और तुम्हारे व्हाइट मेन्स बर्डन का शिकार हुए करोड़ों लोगों को हिंसा से तुमने ज़रूर दबाया हो, पर वो उठ रहे हैं।

इसलिए, मोदी को भारत दोबारा बर्दाश्त करेगी या नहीं, ये अमेरिका के नस्लभेदी लोग चिंता का विषय न बनाएँ। तुम ट्रम्प को देखो, और खूब लेख छापो। मोदी को चुनने या नकारने की क्षमता यहाँ का चुनाव आयोग हर भारतीय को देता है। तुम डरो मत, हिन्दू किसी पर हमला नहीं करता। हिन्दुओं ने हर तरह के हमले झेले हैं, ‘टाइम’ का यह प्रपंच भी झेल लेंगे।

कारगिल की लड़ाई के दौरान नरेंद्र मोदी टाइगर हिल क्यों गए थे?

कारगिल युद्ध में हिस्सा ले चुके एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने बृहस्पतिवार (मई 10, 2019) को दावा किया कि टाइगर हिल पर फिर से कब्जा करने के दूसरे दिन ही सेना का मनोबल बढ़ाने के लिये नरेंद्र मोदी वहाँ पहुँचे थे।

कारगिल युद्ध में शामिल रहे रिटायर्ड ब्रिगेडियर कुशाल ठाकुर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक बयान दिया है। सेना में रहकर देश की सेवा करने वाले ब्रिगेडियर ठाकुर ने कहा, “टाइगर हिल पर फिर से कब्जे के एक दिन बाद नरेंद्र मोदी ने वहाँ की यात्रा की थी। किसी पद पर न होने के बावजूद यह काम उन्होंने सिर्फ सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए किया था।” इसके साथ ही ब्रिगेडियर कुशाल ठाकुर ने कहा कि किसी पद पर नहीं रहने के बावजूद मोदी का वह दौरा बताता है कि वे देश की सुरक्षा को लेकर कितने संवेदनशील हैं। ठाकुर ने सेना में हिमाचल रेजिमेंट के गठन पर भी बल दिया।

भाजपा नेता एवं ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) कुशाल ठाकुर ने कहा कि मोदी का टाइगर हिल का दौरा करना राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर उस वक्त की उनकी चिंता को दर्शाता है, जब वह किसी भी आधिकारिक पद पर नहीं थे। ब्रिगेडियर ठाकुर ने मीडिया से कहा कि मोदी न तो उस वक्त प्रधानमंत्री थे और न ही गुजरात के मुख्यमंत्री, जब वह जुलाई 05, 1999 को टाइगर हिल आए थे।

उस समय हिमाचल प्रदेश भाजपा के प्रभारी थे नरेंद्र मोदी

ठाकुर उस समय 18 ग्रेनेडियर्स यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर थे, जिसने रणनीतिक चोटियों को वापस कब्जे में लिया था। ठाकुर ने बताया कि उस समय मोदी हिमाचल प्रदेश भाजपा के प्रभारी थे। साथ ही, राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर पीएम मोदी की नीतियों की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि देश ने मोदी के 5 साल के कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति में काफी बदलाव देखा। उन्होंने कहा कि दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति के कारण मोदी सरकार की आतंकवाद के खिलाफ ‘बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करने’ की नीति सर्जिकल स्ट्राइक और हवाई हमलों के माध्यम से कारगार साबित हुई।

बिग्रेडियर कुशाल ठाकुर के मुताबिक 1990 में पाकिस्तान की ओर से प्रॉक्सी वॉर शुरू किया गया था। उस वक्त कई आतंकवादी घटनाएँ हुईं और हम उन्हें मारने के लिए तब तक इंतजार करते थे, जब वो एलओसी के अंदर नहीं आ जाते थे। लेकिन, पहली बार एलओसी से बाहर निकलकर आतंकियों को घुसकर मारा गया है।

‘कॉन्ग्रेस का घोषणा पत्र सेना का मनोबल गिराने वाला’

शिमला में ब्रिगेडियर कुशाल ठाकुर ने कॉन्ग्रेस को कई मुद्दों पर घेरा। मंडी, हिमाचल प्रदेश से बीजेपी के टिकट के दावेदार रहे कुशाल ठाकुर ने कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र को पूरी तरह से नकारते हुए कहा कि यह घोषणा पत्र सेना का मनोबल गिराने वाला है। अगर जम्मू कश्मीर में आर्म्ड फोर्स स्पेशल पॉवर्स एक्ट में बदलाव किया गया, तो यह आत्मघाती कदम होगा।

उन्होंने बताया कि करगिल युद्ध के दौरान हिमाचल प्रदेश के 52 सैनिकों ने अपने प्राण न्योछावर किए और 2 को देश के सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार परमवीर चक्र से भी नवाजा गया।

सरकारी स्कूलों में CCTV कैमरे लगवाए जाने के फ़ैसले पर SC का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के सभी सरकारी स्कूलों को नोटिस जारी करते हुए स्कूलों में CCTV कैमरे लगाने की याचिका पर 6 सप्ताह के भीतर जवाब माँगा है। याचिका में कहा गया था कि कक्षा में डेढ़ लाख कैमरे लगवाए जाने से और उसकी लाइव स्ट्रीमिंग करवाए जाने से बच्चों पर मानसिक दबाव पड़ेगा।

दरअसल, सरकारी स्कूलों में CCTV कैमरे के माध्यम से कक्षा की लाइव स्ट्रीमिंग के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। इस याचिका में यह कहा गया था कि लाइव स्ट्रीमिंग से वहाँ पढ़ने वाले छात्रों पर मानसिक रूप से दबाव पड़ने के साथ-साथ इसका उन पर बुरा असर पड़ेगा।

दरअसल, मई 2017 में दिल्ली के सभी सरकारी स्कूलों में CCTV कैमरे लगाए जाने का निर्णय लिया गया था। इस निर्णय के मुताबिक़ क़रीब 1,028 सरकारी स्कूलों में 1,46,800 कैमरे लगाने के प्रस्ताव को एक्सपेंडिचर फाइनेंस कमिटी ने मंज़ूरी दे दी थी। बता दें कि इस पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग 597.51 करोड़ रुपए खर्च होने की ख़बर थी। सभी सरकारी स्कूलों में दो तरह के कैमरे लगाए जाने की स्वीकृति मिली थी, एक तो बुलेट (1,44,414) और दूसरा पीटीजेड (2,383)। कॉरिडोर में बुलेट कैमरे और ओपन एरिया में पीटीजेड कैमरे लगाने का प्रस्ताव था, और कक्षाओं में ड्रोन कैमरे लगाए जाना तय हुआ था।

दिल्ली सरकार के इसी प्रस्ताव पर दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी जिस पर सितंबर 2018 में हाईकोर्ट में सुनवाई हुई थी। इस सुनवाई में सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में लगने वाले CCTV कैमरे को कोर्ट ने ग़लत नहीं ठहराया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने उन दावों को ख़ारिज कर दिया था, जिसके अनुसार यह कहा गया था कि CCTV लगने से बच्चों की निजता के अधिकार प्रभावित होंगे।

ख़बर के अनुसार, जस्टिस राजेन्द्र मेनन और जस्टिस वी के राव की बेंच ने कहा था कि कक्षाओं में CCTV कैमरे लगने से निजता का कोई प्रश्न नहीं उठता क्योंकि स्कूलों में कुछ भी निजी काम नहीं किया जाता। इसके अलावा बेंच ने यह भी कहा था कि ऐसा कई बार होता है जब अभिभावक, शिक्षकों पर नहीं पढ़ाए जाने का आरोप लगाते हैं, CCTV  कैमरे लग जाने के बाद अभिभावकों की इस तरह की शिकायतों पर विराम लगेगा और सही तस्वीर से वे अवगत हो सकेंगे।

इस्लामिक स्टेट जम्मू कश्मीर का कमांडर इशफाक अहमद सोफी एनकाउंटर में ढेर

जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ में सुरक्षा बलों ने आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ़ जम्मू कश्मीर (आईएसजेके) के कमांडर इशफाक अहमद सोफी को एनकाउंटर में मार गिराया है। इशफाक अहमद सोफी जाकिर मूसा का बेहद करीबी था। घाटी में उसकी संलिप्तता कई आतंकी वारदातों में थी। इस्लामिक स्टेट की कश्मीर में सक्रियता का सूत्रधार जाकिर मूसा और सहयोगी कमांडर इशफाक अहमद सोफी ही था।

जाकिर मूसा के अलावा इशफाक अहमद सोफी कश्मीर में आईएसजेके का बड़ा कमांडर था। जाकिर मूसा अभी भी सेना की पकड़ से दूर है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आतंकी कमांडर के मारे जाने के बाद भी सुरक्षा बलों का ऑपरेशन जारी है। पूरे इलाके को घेरे में ले लिया गया है। सघन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है।

कश्मीर से इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों का खात्मा करने के लिए जाकिर मूसा को मौत के घाट उतारना सुरक्षा बलों के लिए ज़रूरी हो गया है जिसके लिए घाटी में लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं।

राजधानी, दुरंतो और शताब्दी ट्रेन में महिला और दिव्यांगों के लिए होगा अलग से कोच

भारतीय रेलवे ने महिलाओं और दिव्यांगों की सुरक्षा और सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए बड़ा फैसला किया है। जल्द ही राजधानी, दुरंतो और शताब्दी जैसी प्रीमियम ट्रेनों में महिलाओं और दिव्यांगों के लिए अलग से कोच लगाया जाएगा। वर्तमान में महिलाओं के लिए इन प्रीमियम ट्रेनों में स्पेशल कोच की व्यवस्था नहीं थी। हालाँकि, पैसेंजर ट्रेन में महिलाओं के लिए एक बोगी आरक्षित होती है। इस बोगी में पुरुष यात्री सवार नहीं हो सकते हैं। सिर्फ 12 साल से कम के बच्चे, महिला बोगी में सवार हो सकते हैं। खबर है कि रेलवे प्रशासन इन ट्रेनों के पावर कार को अपग्रेड करने की तैयारी कर रही हैं।

इससे पहले इन ट्रेनों में पहले से एलएचबी कोच लगे हुए हैं। अभी तक इन ट्रेनों में दो एलएचबी पावर कोच होते हैं जो पूरे ट्रेन में बिजली की सप्लाई करने के साथ ही एसी को भी पावर देते हैं।

प्रीमियम ट्रेनों अब एक ही पावर कोच होगा

अपग्रेडेड पावर कार के बाद एक ही कोच इन कामों के लिए पर्याप्त होगा। रिपोर्ट के अनुसार रेलवे अधिकारियों का कहना है कि जब एक ही पावर कोच होगा, तो ऐसे में एक अतिरिक्त कोच की जगह बनती है। ये अतिरिक्त कोच ही महिलाओं और दिव्यांग लोगों के लिए आरक्षित होगा।

अधिकारियों ने कहा कि एक नॉन-एसी कोच पूरी तरह एसी कोच वाली ट्रेन के साथ अटैच होगा। इससे इसका किराया कम होगा। अधिकारियों का कहना है कि इंटीग्रल कोच फैक्ट्री, जो रेलवे के लिए रेक का निर्माण करती है, ने पावर कार के दो प्रोटोटाइप रेक तैयार किए हैं।

लेडिज कोच को बीच में लगाने का फैसला

इससे पहले रेलवे ने पिछले साल ट्रेनों में महिला कोचों को ट्रेन के बीच में लगाने का फैसला किया था। इससे पहले ट्रेनों में महिला कोच को सबसे पीछे या कई ट्रेनों में सबसे आगे लगाया जाता था। रेलवे की तरफ से यह फैसला सुरक्षा की दृष्टि से उठाया गया था।

इसके अतिरिक्त महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे को अलग रंग देने का भी निर्णय लिया गया था। साथ ही, महिलाओं के लिए आरक्षित इन कोच में सीटीटीवी कैमरे के साथ की खिड़कियों पर जाली लगाने की भी बात कही गई थी। रेलवे ने साल 2018 को महिला सुरक्षा वर्ष के रूप में भी मनाया था।

वर्तमान में भी महिलाओं के लिए रेलवे की तरफ से कई सुविधाएँ दी जा रही हैं। जैसे कि, 45 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं को महिला कोटा के तहत प्राथमिकता दी जाती है। इसमें 3 साल तक का बच्चा भी शामिल है। यह सुविधा स्लीपर और एसी दोनों क्लास में उपलब्ध है।

राजस्थान: ताबड़तोड़ फायरिंग में बजरंग दल के नेता सुरेंद्र जड़िया की गोली मार कर हत्या

राजस्थान के चुरू जिले के सादुलपुर कस्बे में गुरूवार (मई 9, 2019) को थाने से महज 300 मीटर की दूरी पर बाइक पर आए तीन नकाबपोश बदमाशों ने बजरंग दल के प्रखंड संयोजक और ट्रांसपोर्ट कंपनी के संचालक सुरेंद्र जड़िया की गोली मारकर हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने के बाद तीनों बदमाश वहाँ से फरार हो गए। सूचना मिलते ही वहाँ पर पुलिस आ गई। चौतरफा नाकाबंदी के बाद भी हत्यारों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है। घटनास्थल पर गोली के खाली खोखे व एक लोडेड मैगजीन मिली है।

खबर के मुताबिक, तीनों बदमाशों की सुरेंद्र के साथ कोई आपसी दुश्मनी थी, जिसका बदला लेने के लिए उन्होंने सुरेंद्र पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाकर उनकी हत्या कर दी। वो लोग सुरेंद्र को मारने की नीयत से उनके ऑफिस के बाहर पहले से ही मौजूद थे और जैसे ही वो ऑफिस के बाहर निकले, बदमाशों ने उन पर लगातार 10 फायरिंग की, जिसमें से 3 गोलियाँ सुरेंद्र को लगी और वो वहीं जमीन पर गिर पड़े और तीनों बदमाश बाइक पर बैठकर वहाँ से फरार हो गए।

सुरेंद्र को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी था। सुरेंद्र की मौत हो चुकी थी। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। मामले की जाँच कर रही पुलिस को सीसीटीवी फुटेज में 3 संदिग्ध नजर आए हैं। जिसके बाद अब पुलिस उनकी तलाश करने में जुट गई है।

‘राहुल की NYAY, मुफ्त में पैसे बाँटने की योजना है’: RJD नेता रघुवंश प्रसाद सिंह

बिहार में कॉन्ग्रेस के सहयोगी दल आरजेडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने कॉन्ग्रेस द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम आय गारंटी को मुफ्त में पैसे देने वाली योजना करार दिया है।

रघुवंश ने इकोनॉमिक्स टाइम्स से हुई बातचीत में बताया कि न्याय योजना मनरेगा (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) से बिलकुल अलग है। मनरेगा में जहाँ 100 दिन का रोजगार देने की बात है वहीं न्याय योजना में लोगों को बिना कुछ काम किए पैसा मिलेगा।

बातचीत में रघुवंश ने बताया कि जब मनरेगा को लागू किया गया था तब वह यूपीए सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री थे। उनके मुताबिक अगर वह दोबारा से सत्ता में आए तो इस योजना का विस्तार किया जाएगा।

रघुवंश प्रसाद ने कहा कि एक मशहूर अर्थशास्त्री ने कहा है कि लोगों को कुछ भी फ्री में नहीं देना चाहिए। मनरेगा ने लोगों में काम करने की आदत डाली। फ्री में पैसे बाँटना किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा हुआ को फिर अन्य दल भी ऐसा करेंगे। जबकि मनरेगा ने देश में बहुत हद तक रोजगार की समस्या को दूर किया था।