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लोकतंत्र का इतिहास, जूलियस सीज़र और केजरीवाल की कम्बल कुटाई

अभी दुनिया में सिर्फ सऊदी अरब, ओमान, यूएई, ब्रूनेई और वैटिकन ऐसे देश हैं जो खुल्लमखुल्ला कहते हैं कि वो लोकतान्त्रिक नहीं है। बाकी सारे देश खुद को लोकतान्त्रिक ही बताते हैं। कोई थोड़ा कम है, और कोई थोड़ा ज्यादा, मगर लोकतान्त्रिक, यानि डेमोक्रेटिक सभी है। वैसे तो लोकतंत्र का विकास भारत में भी हुआ था, मगर अंग्रेजी में जो लोकतंत्र के लिए शब्द होता है, उस ‘डेमोक्रेसी’ का भी अपना इतिहास है। ग्रीक राजनैतिक और दार्शनिक विचारों का शब्द ‘डेमोक्रेसी’ दो शब्दों से बना है, जिसमें ‘डेमोस’ का मतलब ‘आम आदमी’ और ‘क्रेटोस’ का मतलब शक्ति है।

अक्सर राजाओं के दौर में लोग अराजकता से तंग आकर लोकतान्त्रिक तरीके से अपना शासक चुनते थे। जैसे बिहार राजाओं के काल वाले भारत में एक राजा थे गोपाल। ये पाल वंश के संस्थापक थे, 750 के आस पास इन्होंने शासन संभाला और 20 वर्ष के लगभग शासन किया था। ये बौद्ध थे, मगर उतने अहिंसक नहीं थे। किम्वादंतियों के मुताबिक इनसे पहले के राजाओं को एक नाग रानी (या नागिन), चुने जाने के दिन ही मार डालती थी। मत्स्य न्याय से परेशान लोगों ने अंततः गोपाल को राजा चुना और उन्होंने नागिन (या नाग रानी) को मार डाला था।

जैसे अराजकता जैसी स्थिति ने गोपाल प्रथम को चुनकर राजा बनाया, करीब करीब वैसी ही स्थितियों में रोम में भी एक प्रसिद्ध राजा हुए थे। ईसा से करीब सौ साल पूर्व वहाँ जुलिअस सीजर थे। उन्हें भी गैल्लिक युद्धों में लगातार सफलता के बाद काफी प्रसिद्धि मिली थी। युद्ध से परेशान रोमन लोग जहाँ सीजर को विजयी के रूप में पसंद कर रहे थे, वहं सिनेट की योजना कुछ और थी। उन्होंने सीजर से सेना प्रमुख का पद छोड़ने को कहा। सीजर उल्टा अपनी सेना के साथ गृह युद्ध जैसी स्थिति तैयार कर बैठे! इस लड़ाई में जीतने के बाद वो राजा हुए और उन्होंने कई प्रशासनिक सुधार करवाये।

जुलियन कैलेन्डर जो हम आज इस्तेमाल करते हैं वो उन्हीं की देन है। जो लोग पुराने जमाने के तरीके से अप्रैल में नया साल मनाते उन बेचारे यहूदियों का मजाक उड़ाने की ‘अप्रैल फूल’ की परंपरा भी उसी दौर में शुरू हुई। जमीन के मालिकाना हक़ के नियमों में सुधारों को लेकर उनसे कई जमींदार नाराज हो गए और उन्होंने सीजर की हत्या कर देने की योजना बनाई। ऐसा माना जाता है कि इस हत्याकांड में करीब 60 लोग शामिल हुए थे और सीजर को 23 बार छुरा लगा था। इसी पर शेक्सपियर ने अपना प्रसिद्ध नाटक लिखा था, जिसकी वजह से ब्रूटस के लिए सीजर का डायलॉग ‘एट टू ब्रूटस’ (तुम भी ब्रूटस?) प्रसिद्ध हुआ।

विदेशों की कुछ अवधारणाओं में मानते हैं कि ‘शैतान’ कोई ईश्वर की सत्ता से बाहर की चीज है। हिन्दुओं में ऐसा नहीं मानते, वो मानते हैं कि हिन्दुओं की प्रवृत्तियाँ ही उसे मनुष्य या राक्षस बनाती हैं। संभवतः यही वजह होगी कि वो ये भी कहते हैं कि शैतान से लड़ते-लड़ते, मनुष्य के खुद शैतान हो जाने की संभावना रहती है। अक्सर लोकतान्त्रिक ढंग से जो शासक, अराजकता से निपटने के लिए चुने जाते हैं, वो खुद ही अराजक या तानाशाह हो जाते हैं। कुछ वैसे ही जैसे हाल ही में चीन के शासक ने खुद को आजीवन चुनाव लड़ने के झंझट से अलग कर लिया है।

भारत की राजधानी में हाल में जब लोगों ने मुख्यमंत्री चुना था तो लोकतंत्र और उससे जुड़ी अराजकता वाली स्थितियों की भी याद आई ही थी। सुधारों के नाम पर तुगलकी फरमानों से भी सीजर की याद आई। चाहे योगेन्द्र ‘सलीम’ यादव हों, प्रशांत भूषण या दूसरे साथी, जरा सी असहमति दिखाते ही उनकी जिस हिंसक तरीके से विदाई हुई, उससे भी लोकतान्त्रिक ढंग से चुने लोगों का तानाशाह बनना ही याद आया था। चूँकि सीजर की हत्या में 60 लोग शामिल थे, और आआपा के करीब इतने ही विधायक चुनकर आये थे, इसलिए भी बातें मिलती जुलती सी लगने लगी थी।

अब दबी जबान में चर्चा हो रही है कि बंद कमरे में कुछ लोगों ने मफ़लर वाले के साथ वो कर दिया है जो कम्बल ओढ़ा कर किया जाता है। कविराज विष-वास सोशल मीडिया पर इसपर कटाक्ष भी करते दिखे। यकीन नहीं होता, इतिहास खुद को दोहराता है, ऐसा सुना था, मगर इतनी समानताएँ?

250 km लंबी दुर्गम लेह-काराकोरम रोड तैयार, 2012 में बनी कॉन्ग्रेस वाली सड़क नदी में बह गई थी

लद्दाख क्षेत्र में उत्तर-पूर्वी इलाके को जोड़ने के लिए सामरिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मार्ग लेह-काराकोरम रोड बनकर तैयार हो चुकी है। इसे वर्तमान मोदी सरकार की एक बहुत बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखी जा रहा है। इस रोड के बन जाने से साल में बारहों महीने ये इलाका बाकी क्षेत्र के संपर्क में रहेगा। अक्टूबर 2017 को रक्षामंत्री सीतारमण ने अपनी सियाचिन यात्रा के दौरान सीमावर्ती क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की और लेह को कराकोरम से जोड़ने वाले इस पुल के निर्माण कार्य का उद्घाटन किया था। यह पुल सामरिक रूप से महत्वपूर्ण दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी परिक्षेत्र में सैन्य परिवहन के लिए कनेक्टिविटी उपलब्ध कराएगा।

255 km लंबे दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी [Darbuk-Shayok-Daulat Beg Oldie (DS-DBO)] सेक्शन में 37 ब्रिज बनाए गए हैं। 20 अप्रैल को इस रोड पर पहली बार एक एक्पीडिशन मोटरसाइकिल काफिले ने लेह से सफर शुरू कर काराकोरम दर्रा पहुँचकर फिर लेह वापसी करते हुए अपना सफर पूरा किया। दारबुक से ऊपर काराकोरम पहाड़ी श्रंखला के बीच ये रोड 14,000 फीट की ऊँचाई का सफर तय करती है।

आजादी से पहले चीन और भारत के बीच महत्वपूर्ण ट्रेड रूट था ये मार्ग

इन दिनों ये मार्ग व्यावसायिक मामलों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता है। लेकिन आजादी से दो दशक पहले तक इस रोड को लद्दाख और चीन के काशगर प्रांत के बीच ट्रेड के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसे ज्यादातर पंजाबी मर्चेंट्स इस्तेमाल करते थे।

कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान असफल हुआ था इस रोड-निर्माण का प्रयास

वर्ष 2000 से 2012 में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान यहाँ पर ₹320 करोड़ की लागत से DS-DBO section पर रोड तैयार की गई थी। उस समय यह खराब डिज़ाइनिंग के चलते श्योक नदी के बहाव में बह गया था। लेकिन इस बार 160 km लंबा हिस्सा दोबारा बेहतर डिजाइन के साथ तैयार किया गया और सफलतापूर्वक तैयार कर लिया जा चुका है।

अब मिलिट्री रसद पहुँचाने में नहीं होगी मुश्किल

पास के आखिरी 235 km के हिस्से में श्योक से काराकोरम पास के बीच कोई आबादी नहीं बसती है। सिर्फ श्योक में करीब 25 परिवार रहते हैं। इससे आगे सिविलियन आबादी को रहने की इजाजत नहीं है। इस रोड के बनने से चीन अधिकृत जम्मू कश्मीर और भारत के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर भारत का नियंत्रण और बेहतर हो पाएगा। इसी क्षेत्र में भारत और चीन की सेनाओं के बीच 2013 और 2014 में एलएसी के हद को लेकर आपस में तनाव हो चुका है। रोड बनने से पहले इस क्षेत्र में तैनात भारतीय सेना के लिए भारी रसद पहुँचाना संभव नहीं हो पाता था, लेकिन अब ये इलाका वर्षभर सम्पर्क में बना रहेगा। ऐसे में जाहिर है, ये भारत की सामरिक शक्ति के लिए बड़ी उपबल्धि है।

चोरी करने में बीवी ने नहीं दिया साथ तो… 3 बच्चों सहित पत्नी की हत्या में सनसनीखेज खुलासा

यूपी के गाजियाबाद के इंदिरापुरम में अपने तीन बच्चों और पत्नी की हत्या करने वाला आरोपित सुमित गिरफ्तार कर लिया गया है। इंदिरापुरम पुलिस ने उसे कर्नाटक से गिरफ्तार किया है। दरअसल, पूरा मामला शनिवार (अप्रैल 20, 2019) का है। सुमित नाम के इस आरोपित ने शनिवार की रात को गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में ज्ञान खंड 4 में अपने परिवार की हत्या कर दी थी।

सुमित की गिरफ्तारी के बाद जो बात सामने आई है, वो हैरान कर देने वाली है। पुलिस की मानें तो सुमित अपनी बेरोजगारी से काफी मानसिक तनाव में था। उसे नौकरी नहीं मिल रही थी, आर्थिक तंगी ने घेर लिया था। ऐसे में उसने चोरी करने की योजना बनाई। चोरी के बारे में उसने अपनी पत्नी से बात की। लेकिन पत्नी अंशुबाला ने ऐसी किसी हरकत में उसका साथ देने से इनकार कर दिया था। बेरोजगारी और पत्नी की मनाही शायद परिवार और बच्चों के लिए काल बन गई।

शनिवार की रात को सुमित ने कोल्ड ड्रिंक में नींद की गोलियाँ देकर पत्नी व तीनों बच्चों को सुला दिया था और फिर सभी के सो जाने के बाद सुमित ने पत्नी और तीनों बच्चों की चाकू से हत्या कर दी। हालाँकि सुमित की पत्नी अंशुबाला ने बच्चों और खुद को बचाने की काफी कोशिश की लेकिन सुमित काफी नशे में था और उसके ऊपर खून सवार था। इस दौरान सुमित ने अंशुबाला पर चाकू से 15 वार किए। बता दें कि सुमित के बड़े बेटे की उम्र 7 साल थी। जबकि बाकी दो जुड़वा बच्चों की उम्र 4 साल। हत्या करने के बाद आरोपित सुमित फरार हो गया था।

हत्या के कई घंटों बाद उसने अपने पत्नी अंशुबाला के भाई पंकज से वीडियो शेयर किया था, जिसमें कहा था कि उसने परिवार की हत्या कर दी है, जाओ शव उठा लो। पुलिस का कहना था कि उसने यह वीडियो ट्रेन के शौचालय में बनाया था। साथ ही उसने वीडियो में ये भी कहा था कि पोटैशियम सायनाइड खाकर वह भी आत्महत्या करने जा रहा है। सुमित सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और बंगलुरू में आईटी कंपनी में नौकरी करता था। तीन माह पहले ही उसकी नौकरी छूटी थी इसलिए घर में आर्थिक तंगी जैसे हालात थे।

जानकारी के मुताबिक, सुमित काफी पहले से ही इस साजिश की योजना बना रहा था। पुलिस को मंगलवार (अप्रैल 23,2019) को पता चला कि सुमित ने एक ऑनलाइन शॉपिंग साइट से 5 चाकुओं का सेट खरीदा था, जिसे बेंगलुरु के एक दोस्त की लॉग-इन आईडी से ऑर्डर किया था और फिर इसी चाकू से इस वारदात को अंजाम दिया।

VIDEO: अपना जूता भी ख़ुद नहीं उतारते ‘शॉटगन’, सोशल मीडिया पर ‘लताड़’ से हुए ‘खामोश’

शत्रुघ्न सिन्हा का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में उनकी रईसी साफ़-साफ़ झलक रही है। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि शत्रुघ्न सिन्हा किसी मंदिर में जा रहे हैं। मंदिर में जाने से पहले जूता उतारने के लिए भी वो ख़ुद मेहनत नहीं करते। उनका सहयोगी जूता उतारता है और फिर वह मंदिर में घुसते हैं। इस पर लोगों ने चुटकी लेते हुए कहा कि अगर एक राजनेता ख़ुद अपना जूता नहीं उतार सकता तो जनता की सेवा क्या करेगा? शत्रुघ्न सिन्हा पटना से सांसद हैं और इस बार उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी भाजपा छोड़ कॉन्ग्रेस का दामन थामा है। पटना में उनका मुक़ाबला केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से होने वाला है। दोनों ही कायस्थ समुदाय से आते हैं और स्थानीय हैं। ऐसे में, यहाँ दिलचस्प मुक़ाबला होने की उम्मीद है।

ऊपर के वीडियो में देख सकते हैं कैसे शत्रुघ्न सिन्हा का जूता कोई और व्यक्ति उतार रहा है ताकि वो मंदिर में जाकर पूजा कर सकें। पटना साहिब क्षेत्र से पिछली बार रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीते शत्रुघ्न सिन्हा बॉलीवुड के जाने-माने अभिनेता रहे हैं। विलेन के तौर पर अपना करियर शुरू करने के बाद उन्होंने सैंकड़ों फ़िल्मों में अभिनय किया। शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा लखनऊ से समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं और हाल ही में सिन्हा उनके चनाव प्रचार के लिए भी वहाँ पहुँचे थे। हालाँकि यूपी में सपा के साथ कॉन्ग्रेस गठबंधन में नहीं है तब भी सिन्हा ने अपनी पत्नी के लिए अपनी ही पार्टी के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार किया।

पटना साहिब क्षेत्र के लोगों का कहना है कि शत्रुघ्न सिन्हा जीतने के बाद सीधा मुंबई चले जाते हैं और अपने क्षेत्र का दौरा भी नहीं करते। चुनाव आते ही उन्हें फिर क्षेत्र की याद सताती है। शत्रुघ्न सिन्हा के उपर्युक्त वीडियो को देखने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि जो व्यक्ति अपना जूता खोलने तक के लिए नहीं झुक सकता, वो समाज और देश की सेवा करने की बात न ही करे तो बेहतर है।

बुर्के पर लग सकता है बैन, श्री लंका आतंकी हमलों में नक़ाबपोश महिलाओं के शामिल होने के मिले संकेत

ईस्टर के दौरान हुए आतंकी हमलों से बुरी तरह दहले श्री लंका ने बुर्के पर प्रतिबंध की योजना पर अमल करना शुरू कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही इस बारे में आदेश जारी कर सकती है। दरअसल, जाँच के दौरान प्राप्त सबूतों से हमले में बड़ी संख्या में संदिग्ध बुर्का पहनी महिलाओं के शामिल होने के संकेत मिले हैं। जिसकी वजह से बुर्के पर बैन लगाने पर विचार किया जा रहा है। रविवार (अप्रैल 21, 2019) को हुए इन हमलों में अब तक लगभग 359 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि तकरीबन 500 लोग घायल हुए हैं। आतंकवादी समूह इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने मंगलवार (अप्रैल 23, 2019) को इन हमलों की जिम्मेदारी ली थी। अब तक 58 संदिग्धों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

जानकारी के मुताबिक, सरकार मस्जिद अधिकारियों से विचार-विमर्श करके इस कदम को लागू करने की योजना बना रही है और सोमवार (अप्रैल 22, 2019) को कई मंत्रियों ने इस मामले पर राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना से बात की। यूएनपी सांसद आशु मारासिंघे ने कहा, “राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए श्रीलंका में बुर्के पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक निजी सदस्य विधेयक लाने की योजना बना रहे हैं।” गौरतलब है कि 1990 की शुरुआत में खाड़ी युद्ध तक श्रीलंका में मुस्लिम महिलाओं की पारंपरिक वेशभूषा में बुर्का और नकाब कभी शामिल नहीं था, मगर खाड़ी युद्ध के समय चरमपंथी तत्वों ने मुस्लिम महिलाओं के लिए पर्दा शुरू किया। रक्षा सूत्रों ने बताया कि डेमाटागोडा में घटनाओं में शामिल रही कई महिलाएँ भी बुर्का पहनकर भागी थी। 

यूएनपी के सांसद मुजीबुर रहमान ने कहा है कि वह बुर्का बैन करने के प्रस्ताव का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी बुर्का नहीं पहनती है और वो अपने बच्चों को भी बुर्का नहीं पहनने देंगे। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में मुस्लिम धार्मिक समूह इस पर अपना वक्तव्य देंगे।

अब अगर श्रीलंका ने बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया तो वह एशिया, अफ्रीका और यूरोप में उन देशों के समूह में शामिल हो जाएगा, जहाँ पहले से ही बुर्के पर बैन है। इन देशों ने आतंकवादियों को पुलिस से बचने या विस्फोटकों को छिपाने के लिए बुर्का का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए अपने यहाँ बुर्के पर बैन लगाया है। आपको बता दें कि चाड, कैमरून, गाबोन, मोरक्को, ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, डेनमार्क, फ्रांस, बेल्जियम और उत्तर पश्चिम चीन के मुस्लिम बहुल प्रांत शिनजियांग में बुर्का पहनने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

कंटाप पड़ने के बाद केजरीवाल पहुँचे मोहल्ला क्लिनिक, जुगाली कर रही गायों ने किया इलाज से इनकार

नई वाली राजनीति फेम दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल का न चाहते हुए भी चर्चा में आ जाना कोई नई बात नहीं है। मीडिया द्वारा तैयार किए गए राजनीति के इस ‘खड़गसिंह’ ने जितने कीर्तिमान अब तक हासिल कर लिए हैं, इतने शायद ही आजादी के इतने वर्षों बाद किसी अन्य समकालीन नेता के पास हों। अरविन्द केजरीवाल का हाल ही में एक प्रकरण सामने आया है। हालाँकि, यह प्रकरण निंदनीय और दुखद है, लेकिन इसके बाद केजरीवाल एक बार फिर चर्चा का विषय बन गए हैं।

आम आदमी पार्टी (AAP) के बगावती विधायक कपिल मिश्रा ने दावा किया है कि कुछ दिन पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का AAP के ही कुछ विधायकों ने मार-मार के मोर बना दिया।

इसके बाद से ही सोशल मीडिया पर एक खबर वायरल हुई। इसमें बताया जा रहा है कि घूँसे, कंटाप, रैपट और मुक्कों से पड़े नीले निशानों के इलाज के लिए जब अरविन्द केजरीवाल अपनी मसाज-मालिश करवाने मोहल्ला क्लिनिक गए, तो वहाँ पर पहले से मौजूद जुगाली कर रहे गाय-बछड़ों ने उनका इलाज करने से मना कर दिया।

केजरीवाल विदेश से लेना चाहते थे स्वास्थ्य लाभ, ‘AAP अध्यक्ष’ ने की अर्जी रिजेक्ट

सूत्रों के अनुसार, आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल ने पहले किसी विदेशी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ लेने की इच्छा जाहिर की थी। लेकिन, अरविन्द केजरीवाल की लीडरशिप में बने मोहल्ला क्लीनिक की क्षमता को नजरअंदाज होता देख गुस्से में पार्टी अध्यक्ष (स्वयं केजरीवाल जी) ने ही अपनी इस अर्जी को गुस्से में फाड़ कर फेंक दिया। अरविन्द केजरीवाल की अर्जी को फाड़ते समय पार्टी अध्यक्ष केजरीवाल ने तिलमिलाते हुए कहा कि बच्चों की कसम और गिड़गिड़ाने के अलावा मोहल्ला क्लिनिक ही तो उनकी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसी दलील पर उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को भी मोहल्ला क्लिनिक्स की क्षमता को अंडरएस्टिमेट ना करने की सलाह दी। इसके आगे उन्होंने कहा कि अगर पार्टी उनकी इस बात पर विचार नहीं करेगी, तो धरने पर बैठने का विकल्प उनके पास हमेशा उपलब्ध रहेगा।

मोहल्ला क्लिनिक में गाय कर रही थी परिवार के साथ जुगाली

कंटाप, घूँसे और मुक्के पड़ने के बाद जब अरविन्द केजरीवाल मोहल्ला क्लिनिक पहुँचे तो उनकी स्थिति और बिगड़ गई। मोहल्ला क्लिनिक के अंदर प्रवेश करते ही जब अपने बछड़ों के साथ जुगाली करती गाय पर केजरीवाल की नजर पड़ी तो उनके पैरों तले जमीन ही खिसक गई। केजरीवाल का कहना है कि पहले उन्हें लगा कि मोहल्ला क्लिनिक की जिस तरह से मार्केटिंग की गई हैं, हो सकता है कि गाय भी वहाँ अपना इलाज करवाने गई हों। लेकिन, यह जान कर केजरीवाल को सांत्वना मिली की वहाँ पर रहने वाली गाय अब खुद डाक्टरी सीख कर इंसानों का मुफ्त चेकअप करने लगी हैं।

अरविन्द केजरीवाल को इस खबर पर पहले विश्वास नहीं हुआ, लेकिन उनके द्वारा किराए पर उपलब्ध फैक्ट चेकर्स के समूह फॉल्ट न्यूज़ ने उन्हें यकीन दिलाने में मदद करते हुए बताया कि मोहल्ला क्लिनिक को उन्होंने ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से सफलतापूर्वक उच्चस्तरीय सुविधा से लेस घोषित कर दिया है और अब UNESCO ने भी उसे सर्वश्रेष्ठ मोहल्ला क्लिनिक घोषित किया है।

केजरीवाल से पहले विधायकों ने कुमार विश्वास को दिया था घूँसा खाने का ऑफर

घूँसा खाने के बाद केजरीवाल जी की लोकप्रियता और TRP में रातों-रात उछाल आने के बाद एक दूसरी बड़ी खबर सामने आई है। हिंदी के मशहूर कवि और अरविन्द केजरीवाल को आत्ममुग्ध बौना बताने वाले कुमार विश्वास ने दावा किया है कि विधायकों ने घूँसा खाने का ऑफर पहले उन्हें दिया था। मीडिया के अनुसार, आम आदमी पार्टी विधायकों ने कुमार विश्वास से छीनकर यह अवसर केजरीवाल को ये कहकर सौंपा गया कि पार्टी की सदस्यता वाले दस्तावेजों में हर सनसनी पर पहला अधिकार केजरीवाल का बताया गया है। हालाँकि, कुमार विश्वास के इस दावे की सत्यता की पुष्टि अभी फॉल्ट न्यूज़ द्वारा होनी बाकी है।

अपनी आँखों से मोहल्ला क्लिनिक में गाय को अपने परिवार के साथ जुगाली करता साक्षात् देखकर अरविन्द केजरीवाल ने मीडिया को बताया कि मोहल्ला क्लिनिक की यह वास्तविक तस्वीर मीडिया द्वारा दिखाई गई तस्वीरों से कहीं अधिक सुंदर है।

रिपोर्ट्स लिखे जाने तक केजरीवाल जी के घावों पर नमक पानी की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी। उन्होंने बताया कि गायों द्वारा उनके उपचार की सिफारिश नकारने से वो नाराज नहीं हैं। उन्होंने इस बात की तसल्ली जताई है कि गायों ने आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री गोभक्त कमलनाथ से ज्यादा तरक्की हासिल कर डाली है।

रोहित हत्याकांड ख़ुलासा: अपूर्वा ने क़बूला जुर्म, जानिए अब हुई किन नए किरदारों की एंट्री?

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के बेटे रोहित शेखर की मौत से पर्दा उठ गया है। पुलिस और क्राइम ब्रांच ने मिलकर इस मामले को सुलझा लिया है। ताज़ा सूचना के अनुसार, गिरफ़्तारी के बाद हुई पूछताछ में उनकी पत्नी अपूर्वा शुक्ला ने सारे राज़ खोल दिए। बार-बार बयान बदलने के कारण पुलिस की शक की सूई पहले से ही अपूर्वा पर घूम रही थी। पुलिस द्वारा सख्ती से की गई पूछताछ में अपूर्वा ने सब कुछ उगल दिया। झगड़े का कारण यह था कि रोहित ने एक महिला के साथ शराब पी थी और अपूर्वा को यह बात नागवार गुज़री। इस बात को लेकर दोनों के बीच हाथापाई हुई और इसमें रोहित का गला दबा दिया गया। घर का सीसीटीवी भी ख़राब था। इससे पुलिस को पता चल गया कि इसमें घर के ही किसी व्यक्ति का हाथ है। एक और चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि अपूर्वा ने हत्या के बाद अपने मोबाइल फोन को फॉर्मेट किया था।

वारदात के दौरान घर में 6 लोग थे। न कोई अंदर आया और न कोई बाहर गया। इसका सीधा अर्थ यही था कि घर के ही किसी व्यक्ति ने हत्या की है। एक और ध्यान देने वाली बात यह है कि वही सीसीटीवी कैमरे ख़राब मिले जिनसे मौत का राज़ खुल सकता था। इन दोनों कैमरे में रोहित का बेडरूम और दरवाजा देखा जा सकता था लेकिन यही दोनों बंद मिले। मौत के बाद रोहित के मोबाइल से कॉल करने की कोशिश की गई थी। अपूर्वा अंतिम व्यक्ति थी, जो रोहित के कमरे में गई थी। पुलिस इस बात की खोज करने में लगी है कि घर के नौकरों व अन्य काम करने वाले लोगों की इस क़त्ल में कोई भूमिका है या नहीं। जाँच में यह बात भी सामने आई है कि यह हत्या योजना बनाकर नहीं की गई, अचानक किसी बात को लेकर की गई।

जाँच अभी 2 दिन और चलेगी। वैज्ञानिक व फॉरेंसिक कड़ियों को जोड़कर सारी बातें सामने लाई जाएगी। जहाँ अपूर्वा को शक है कि अन्य महिला के साथ रोहित के सम्बन्ध थे, रोहित की माँ ने अपूर्वा के विवाह पूर्व किसी अन्य व्यक्ति से सम्बन्ध होने की बात कही थी। रोहित की माँ तिलक लेन स्थित अपने सरकारी आवास में रहती हैं। रोहित ने जिस महिला के साथ शराब पी, उसका नाम कुमकुम है। कहा जा रहा है कि अपूर्वा ने एक हाथ से रोहित का गला दबाया और एक हाथ से उसका मुँह दबाया, जिससे उसकी मौत हो गई। यानी रोहित की हत्या सोते वक़्त नहीं बल्कि जागते वक़्त की गई। हत्या के बाद रोहित के फोन से कुमकुम को ही कॉल किया गया था। अपूर्वा के नाख़ून और बालों के सैम्पल को जाँच के लिए भेजा गया है।

इससे पहले हमने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि किसी नौकर ने देखा कि रोहित की नाक से ख़ून निकल रहा था। इसकी जानकारी उनकी माँ और मैक्स अस्पताल को दी गई। पुलिस का सीधा सवाल है कि एक व्यक्ति 16 घंटे तक सोया रहता है और घर में कोई उसकी सुध भी नहीं लेता, क्यों? एक अन्य ख़बर में हमने जिक्र किया था कि कैसे सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, रात 1:30 बजे अपूर्वा नीचे से पहली मंजिल पर स्थित रोहित के कमरे में जाते हुए दिखाई देती हैं। इसके ठीक एक घंटे बाद रात 2.30 बजे वह पहली मंजिल से भूतल पर आते दिख रही हैं। अपूर्वा बार-बार अपना बयान बदल रही थी और रोहित की माँ उज्ज्वला ने अपनी बहू पर कई आरोप लगाए थे, ये भी हमने एक अलग ख़बर में बताया था।

गुरदासपुर: BJP द्वारा सनी देओल पर भरोसा जताने के पीछे हैं ये 5 कारण, कॉन्ग्रेस खेमे में खलबली

जैसा कि सर्वविदित है, अस्सी और नब्बे के दशक में सुपरस्टार का रुतबा रखने वाले सनी देओल को भाजपा ने गुरदासपुर से टिकट दिया है। उनके भाजपा में शामिल होने के बाद ही यह तय हो गया था कि विनोद खन्ना की विरासत संभालने की ज़िम्मेदारी उन्हें दी जा सकती है। सनी देओल ने भाजपा में शामिल होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी के साथ अपने पिता और गुज़रे ज़माने के सुपरस्टार धर्मेंद्र के संबंधों का ज़िक्र किया। विकास को अपनी प्राथमिकता बताते हुए सनी ने अगले पाँच साल के लिए पीएम मोदी की ज़रूरत पर प्रकाश डाला। सनी देओल ने सुलझे हुए अंदाज़ में अपनी बातें रखीं। भले ही परदे पर वो चिल्लाने के लिए मशहूर हैं लेकिन असल ज़िंदगी या मीडिया में शायद ही हमने उन्हें किसी पर चिल्लाते देखा हो। वो शांति से बोलते हैं, मुस्कराहट के साथ अपनी बात रखते हैं और फ़िल्मी दर्शकों के एक बड़े वर्ग में अभी भी उतने ही लोकप्रिय हैं।

सनी देओल के सिनेमाई सफर के बारे में सभी को पता है और उनकी फ़िल्मों के डायलॉग्स अभी भी ख़ासे प्रसिद्ध हैं। उनकी स्क्रीन प्रजेंस सबसे ज्यादा दमदार होती आई है, यही कारण है कि दामिनी में उनके गेस्ट रोल को भी बढ़ाना पड़ा और उन्होंने फ़िल्म में जान डाल दी। भाजपा सनी देओल की इमेज को अब पंजाब में भुनाएगी। यहाँ सनी देओल के मैदान में उतरने से न सिर्फ़ गुरदासपुर बल्कि पूरे पंजाब में पार्टी उनके चेहरे का प्रयोग करेगी। सनी देओल की सबसे हिट फ़िल्म ग़दर में उन्होंने एक पंजाबी का ही किरदार अदा किया था। फ़िल्म पंजाब में इतनी लोकप्रिय हुई थी कि सिनेमाघरों को सुबह से ही इसे चलाना पड़ता था। अब ग़दर के 19 वर्षों बाद सनी देओल फिर से लोगों के बीच उसी अंदाज़ में लौटे हैं लेकिन माध्यम अब सिनेमा नहीं है, राजनीति है।

कॉन्ग्रेस गुरदासपुर में सनी देओल का काट ढूँढने में लग गई है। मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ख़ुद घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए हैं। पार्टी की पंजाब में माँग है कि गुरदासपुर में प्रियंका चोपड़ा या प्रीति ज़िंटा को चुनाव प्रचार के लिए बुलाया जाए। प्रियंका ने सनी की फ़िल्म से ही बॉलीवुड में क़दम रखा था और प्रीति के साथ भी उनके अच्छे सम्बन्ध हैं, ऐसे में असमंजस में पड़ी कॉन्ग्रेस शायद ही ऐसा कोई सेलिब्रिटी ढूँढ पाए जो उनके लिए सनी के ख़िलाफ़ प्रचार करे। पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे सुनील कुमार जाखड़ ने इस सीट को उपचुनाव में जीत तो लिया था लेकिन स्थानीय स्तर पर बड़ा क़द होने के बावजूद सनी देओल की उम्मीदवारी से उनके कैडर में बेचैनी है। आइए सबसे पहले देखते हैं भाजपा द्वारा सनी देओल को इस क्षेत्र से उतारने के पीछे रहे 5 कारण।

आतंक से पीड़ित रहे बॉर्डर इलाके में सनी की राष्ट्रवादी छवि

गुरदासपुर क्षेत्र भारत और पाकिस्तान की सीमा पर स्थित है। यहाँ अक्सर आतंकी हमले होते रहे हैं। भले ही नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद भारत के अंदरूनी शहरों में कोई आतंकी वारदात न हुई हो लकिन सीमावर्ती क्षेत्रों में हालात अभी भी बहुत अच्छे नहीं हैं। 2015 में दीनानगर पुलिस स्टेशन पर हमला हुआ था। इस हमले में 4 पुलिस के जवान व 3 नागरिकों की जान चली गई थी। 3 आतंकियों को भी मार गिराया गया था। इसी तरह 2016 में पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर हमला हुआ। पुलवामा में हुए आतंकी हमले में गुरदासपुर के 1 जवान के वीरगति को प्राप्त हो जाने के बाद क्षेत्र के लोगों में आतंकियों व पाकिस्तान के प्रति ख़ासा रोष है। शहर के विभिन्न सामाजिक संगठनों ने पीएम मोदी के नाम खुला पत्र लिखकर आतंकियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की थी।

भारत द्वारा पाकिस्तान स्थित आतंकी कैम्पों पर एयर स्ट्राइक के बाद आमजनों के मन में रोष कम हुआ और वर्तमान सरकार में भरोसा भी जगा। इसके बाद लोगों में एक उम्मीद बँधी कि अगर कुछ ऐसा-वैसा होता है तो सरकार के पास जवाब देने के लिए इच्छाशक्ति है। गुरदासपुर के लोगों के बीच सनी देओल देओल को अपनी राष्ट्रवादी इमेज का फ़ायदा मिलेगा। ग़दर, इंडियन और द हीरो जैसी फ़िल्मों के कारण सनी की छवि एक राष्ट्रवादी की है जो भाजपा की विचारधारा से भी मेल खाती है। पाकिस्तान से सटे सीमा क्षेत्र में सनी की मौजूदगी से वहाँ की जनता ख़ुश होगी। भारत-पाकिस्तान (पाकिस्तान की हरकतों के कारण) तनाव के माहौल में गुरदासपुर में सनी की उपस्थिति से भाजपा को भी फ़ायदा होगा।

विनोद खन्ना की अच्छी छवि और उनकी विरासत

विनोद खन्ना ने 1998, 1999 और 2004 में जीत दर्ज कर इस सीट पर हैट्रिक बनाई थी। विनोद खन्ना गुरदासपुर के राजनीतिक पटल पर 20 वर्षों तक सक्रिय रहे। पहली बार 1998 में 1 लाख से भी अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज करने वाले खन्ना ने 2014 में वही करिश्मा दुहराया। बीच में वो केवल 2009 में हारे लेकिन उनकी जीत का अंतर हमेशा कम ही रहा। लेकिन, यहाँ एक बात जानने लायक है कि विनोद खन्ना की गुरदासपुर में अच्छी छवि 2009 में उनके हारने के बाद बनी। हार के बावजूद उन्होंने क्षेत्र को नहीं छोड़ा, जैसा कि अन्य सेलिब्रिटी करते हैं। पटना में शत्रुघ्न सिन्हा से इसी चीज को लेकर लोगों की नाराज़गी है। ऐसा कई क्षेत्रों में हुआ है जब जीतने या हारने के बाद सेलेब्रिटीज इलाके में कभी गए ही नहीं। इससे वहाँ की जनता के बीच सेलेब्रिटीज को लेकर नेगेटिव छवि बनी। लेकिन, गुरदासपुर में मामला अलग है।

2009 में हारने के बावजूद विनोद खन्ना ने क्षेत्र के लिए कई बड़े कार्य किए और पुलों का निर्माण करवाया। उन्होंने जनता से संवाद बनाए रखा। यही कारण था कि जिस प्रताप सिंह बाजवा ने उन्हें 2009 में मात दी थी, उसी बाजवा को 2014 में उन्होंने परास्त किया। इसमें कोई शक नहीं कि बीमारी के कारण अगर उनकी असमय मृत्यु नहीं होती तो अभी गुरदासपुर से वे ही भाजपा उम्मीदवार होते। एक सेलिब्रिटी के प्रति गुरदासपुर की जनता के बीच बनी इस छवि का सनी देओल को फ़ायदा मिल सकता है। विनोद खन्ना वाला कनेक्शन यहाँ काम कर सकता है। लोगों को ये उम्मीद होगी कि सनी देओल जीतने के बाद विनोद खन्ना की तरह ही यहाँ बने रहेंगे, बाकी मुम्बइया सेलेब्रिटीज की तरह नहीं करेंगे।

जाट और दलितों को एक साथ साधने की कोशिश

सनी देओल पंजाबी जाट परिवार से आते हैं और क्षेत्र में जाट और गुज्जर, ये दोनों ही समुदायों के लोग विभिन्न धर्मों में बँटे हुए हैं। ये हिन्दू भी हैं, मुस्लिम भी हैं और सिख भी हैं। कॉन्ग्रेस ने जाखड़ से पहले 27 वर्षों तक यहाँ से सिख उम्मीदवार ही उतारा था। सनी देओल के पंजाबी या सिख जाट परिवार से होने के कारण ग्रामीण इलाकों में उन्हें फायदा मिल सकता है। ऐसी ख़बरें आ रही थीं कि पंजाब में अकाली दल के साथ रहने वाला जाट-सिख वोट अब बिखर रहा है और इसे साधने की भाजपा लगातार कोशिश कर रही है। विनोद खन्ना की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में मिली हार ने भाजपा की आँखें खोल दी हैं और उसने ऐसा चेहरा लाकर रख दिया है जिसके सामने जाति और समुदाय की बातें शायद गौण हो जाएँगी।

गुरदासपुर में दलितों की अच्छी-ख़ासी जनसंख्या है। उपचुनाव में भाजपा को इनका साथ नहीं मिला था। कैप्टेन के धुआँधार प्रचार के कारण जाखड़ 1.99 लाख वोटों से जीतने में सफल रहे। लेकिन सनी देओल की फ़िल्मों की लोकप्रियता ग्रामीण इलाकों व निचले मध्यम वर्ग और ग़रीबों में अधिक रही है। इसी को देखते हुए भाजपा ने उन्हें उतारा है। उनके एक्शन स्टार की छवि यहाँ स्थानीय उम्मीदवारों पर भारी पड़ सकती है।

फेल हो गया भाजपा का स्थानीय उम्मीदवार वाला दाँव

ऐसा नहीं है कि भाजपा ने यहाँ से स्थानीय उम्मीदवार उतारने पर विचार नहीं किया। विनोद खन्ना की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में उसने स्वर्ण सलारिया पर भरोसा जताया था जो स्थानीय उद्योगपति और नेता हैं। भाजपा ने उन पर भरोसा जताया लेकिन उन्हें इतनी बुरी हार मिली कि पार्टी सन्न रह गई। स्वर्ण सलारिया स्थानीय स्तर पर सक्रिय होने के कारण भी जाखड़ को टक्कर नहीं दे पाए। पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष जाखड़ के सामने इस बार भाजपा ने स्थानीय उम्मीदवार के बदले क़द पर ध्यान दिया है और फलस्वरूप सनी देओल मैदान में हैं। वैसे सनी देओल के लिए यह क्षेत्र नया होगा और उन्हें यहाँ आकर सब कुछ नए सिरे से समझना पड़ेगा लेकिन जनता के बीच लोकप्रिय होने के कारण भाजपा को उम्मीद है कि सब कुछ युद्ध स्तर पर हो जाएगा।

दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना की पत्नी कविता खन्ना भी टिकट की दावेदार थी लेकिन भाजपा को यहाँ चेहरा चाहिए था क्योंकि केवल सहानुभूति लहर के सहारे प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष को टक्कर देना शायद संभव नहीं हो पाता। जाखड़ अनुभवी हैं और अनुभव के समाने सिर्फ़ सहानुभूति लहर के बलबूते लड़ने से शायद ही पार्टी के कैडर में नए सिरे से सक्रियता आती।

अब निकले कार्यकर्ता अपने घरों से

अंतिम और सबसे अहम कारण जो सनी देओल को गुरदासपुर से लड़ाने के पीछे है, वो है कार्यकर्ताओं की सक्रियता को फिर से जीवित करना। विनोद खन्ना की मृत्यु, प्रदेश में भाजपा-अकाली गठबंधन की बुरी हार और फिर उपचुनाव में मिली मात के बाद यहाँ भाजपा कार्यकर्ता घरों में बैठ गए थे। उन्हें लामबंद करना इतना आसान भी नहीं था। भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधे और इसका असर भी दिखने लगा। सनी देओल की एंट्री की ख़बर सुनते ही गुरदासपुर के कार्यकर्तागण अपने-अपने घरों से निकले और उन्होंने आपस में मिठाई बाँट कर खुशियाँ मनाईं। कॉन्ग्रेस को यह चिंता खाए जा रही है कि सनी देओल जब चुनाव प्रचार के लिए क्षेत्र में उतरेंगे तो आसपास की सीटों पर भी इसका पार्टी पर बुरा असर पड़ेगा।

गुरदासपुर के माहौल की बात करें तो भाजपा के स्थानीय दफ़्तर में फिर से जान लौट आई है, कार्यकर्ता उत्साह में हैं और पार्टी कैडर एक बार फिर से काम में लग गया है। कैप्टेन और जाखड़ के संयुक्त करिश्मा को भाजपा ने काटने की कोशिश की है और वो सफल होती भी दिख रही है। अब देखना यह है कि सनी देओल गुरदासपुर में कब लैंड करते हैं।

3 जजों की पीठ करेगी CJI गोगोई के मामले की जाँच, बड़ी कॉर्पोरेट साजिश की भी आशंका

सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के विरुद्ध उठे यौन प्रताड़ना मामले की जाँच के लिए न्यायमूर्ति बोबडे की अध्यक्षता में तीन सुप्रीम कोर्ट जजों का विशेष जाँच पैनल बनाने का निर्णय लिया है। यह आरोप एक बर्खास्त महिला कनिष्ठ कोर्ट असिस्टेंट ने लगाए हैं और गोगोई ने आरोपों में जरा भी सच्चाई होने से साफ इंकार किया है। जस्टिस गोगोई ने यह भी शंका जताई कि इन आरोपों के पीछे कोई बड़ी ताकतें हैं

सभी 27 जजों ने किया पैनल का समर्थन, कोई अंतिम तिथि नहीं

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठता में दूसरे क्रमांक के जस्टिस बोबडे के अलावा पैनल में जस्टिस एनवी रमण और इंदिरा बनर्जी भी शामिल हैं। मंगलवार को इस पैनल ने आरोप लगाने वाली महिला और सुप्रीम कोर्ट के महासचिव संजीव कालगाओंकर को नोटिस जारी की और शुक्रवार को मामले की पहली सुनवाई के लिए अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने पैनल के गठन का समर्थन किया है और एकमत से मामले की तस्वीर साफ करने पर जोर दिया है। उस पैनल को कोई अंतिम तिथि नहीं दी गई है, यानि कि पैनल को मामले की तह तक जाने के लिए जितना भी समय चाहिए, उसके पास होगा।

वकीलों ने किया था जाँच का अनुरोध,  पैनल ने अभियोगी के रिकॉर्ड भी मँगाए

गत 20 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने जस्टिस बोबडे को ही इस मामले से जुड़े निर्णय लेने का जिम्मा सौंपा था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर के अनुसार माना जा रहा है उन्होंने ऐसा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन की अंदरूनी जाँच सुप्रीम कोर्ट के जजों के पैनल से कराए जाने की माँग के जवाब में किया था। जस्टिस बोबडे और रमण ने मामले पर कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया है

पैनल ने सुप्रीम कोर्ट के महासचिव कालगाओंकर को अपने साथ कोर्ट से बर्खास्त अभियोगी कर्मचारी महिला के सभी रिकॉर्ड लाने का निर्देश दिया है, जिनमें उनके 4 साल के सुप्रीम कोर्ट कार्यकाल के दौरान की सभी नियुक्तियों की जगहों के अभिलेख भी होंगे।

अधिवक्ता बैंस को मुहैया कराई सुरक्षा, साजिश के साक्ष्यों को माना गंभीर

इसके अलावा न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता उत्सव बैंस को भी सुना। बैंस ने हलफनामा दे कर दावा किया था कि जस्टिस रंजन गोगोई को फँसाने के लिए एक बहुत बड़ी कॉर्पोरेट साजिश की जा रही है, जिसमें शामिल होने के लिए उन्हें भी बड़ी रकम की पेशकश की गई थी। उन्होंने दावा किया था कि उनके पास इसके सबूत भी हैं।

आज बैंस खंडपीठ के सामने अपने सबूत सीलबंद लिफाफे में लेकर प्रस्तुत हुए। पीठ ने उनके द्वारा पेश सबूतों को गंभीर माना और उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने को लेकर भी निर्देश जारी किए। इसके अलावा कोर्ट ने एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) बनाने की भी बात की, जिसकी निगरानी वह स्वयं करेगा। जागरण की विशेष संवाददाता माला दीक्षित ने यह भी ट्वीट किया कि अदालत ने सीबीआई डायरेक्टर, दिल्ली पुलिस आयुक्त और डायरेक्टर आईबी को 12.30 पर चैम्बर में बुलाया है।

TCS, INFOSYS सहित IT सेक्टर कम्पनियों में बढ़ी 350 फीसदी भर्तियाँ

विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियों की तलाश की खबरों के बीच आईटी सेक्टर से अच्छी खबर आई है। विपक्षी पार्टी लगातार मोदी सरकार को रोजगार को लेकर घेरती रहती है, मगर ये खबर मोदी सरकार की एक और बड़ी उपलब्धि को दर्शाता है और साथ ही विरोधियों को जवाब भी देता है, जो रोजगार को लेकर सरकार को निशाना बनाती रही है। फॉर्च्यून द्वारा इसी हफ्ते जारी किए गए रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2018-19 में प्रमुख आईटी कंपनियों टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) और इन्फोसिस ने इसके पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 42,000 अधिक तकनीकी वर्करों को नौकरियों पर रखा है। दोनों कंपनियों की नई भर्तियों में 350 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई है। अभी फिलहाल टीसीएस के कुल कर्मचारियों की संख्या 4.24 लाख और इंफोसिस का 2.28 लाख है।

मुंबई स्थित मुख्यालय वाली टीसीएस में 31 मार्च को समाप्त वित्त वर्ष में 29,287 कर्मचारियों की भर्तियाँ की गई, जबकि बेंगलुरू की इंफोसिस ने 24,016 सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स को जॉब पर रखा। वित्त वर्ष 2018-19 में इन दोनों कंपनियों ने 53,303 नए कर्मचारियों को जोड़ा था, जबकि वित्त वर्ष 2017-18 में दोनों कंपनियों ने लगभग 11,500 नए कर्मचारियों की भर्तियाँ की थी। पिछले वित्त वर्ष में टीसीएस ने कुल 7,775 कर्मचारियों को जॉब पर रखा था, तो वहींं इंफोसिस ने कुल 3,743 कर्मचारियों की भर्तियाँ की थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, 2019 में आईटी कंपनियाँ डेटा साइंस, डेटा एनालिसिस, सोल्यूशन आर्किटेक्ट्स, प्रोडक्ट मैनेजमेंट, डिजिटल मार्केटिंग, मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), ब्लॉकचेन और साइबर सिक्युरिटी में विशेषज्ञता रखने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी। टीमलीज सर्विसेज की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल भारतीय आईटी उद्योग में करीब 2.5 लाख नई नौकरियाँ पैदा होने की संभावना है।

आईटी क्षेत्र के बड़े कंपनियों में शुमार टीसीएस, इंफोसिस और विप्रो अपने कर्मचारियों के भविष्य को बेहतर बनाने की तैयारी में है। इन कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कई आंतरिक प्रशिक्षण (इंटर्नल ट्रेनिंग) भी शुरू किए हैं।