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रामगोपाल मिश्रा की हत्या मामले में पुलिस ने अब मारूफ समेत 2 को दबोचा, सरफराज और तालिब पहले से जेल में: बहराइच पुलिस ने बताया- हिंसा केस में अब तक 115 गिरफ्तारियाँ

बहराइच हिंसा के दौरान हुई रामगोपाल मिश्रा की हत्या मामले में नया अपडेट है। पुलिस ने इस दो आरोपितों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान ननकऊ और मारूफ के तौर पर हुई।

ये मालूम हो कि रामगोपाल हत्या मामले में 6 लोगों को नामजद किया गया था। इनमें से सरफराज और तालिब पहले गिरफ्तार किए गए थे जबकि ये मारूफ और ननकऊ दोनों अब हुए हैं और दो आरोपित अब भी पकड़ से फरार चल रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले में थानाध्यक्ष कमलशंकर चतुर्वेदी ने बताया कि आरोपितों को गिरफ्तार करने के बाद जेल भेज दिया गया है। वहीं हिंसा मामले में जहाँ पहले 113 लोग गिरफ्तार करके जेल भेजे गए थे, रविवार को भी सीसीटीवी फुटेज की जाँच के बाद तिवारी पुरवा के बहोरिकापुर निवासी सुशील कुमार द्विवेदी और सिपहिया प्यूली के रहने वाले मन्नू को अरेस्ट किया गया है जिसके बाद हिंसा में गिरफ्तार लोगों की संख्या 115 पहुँच गई है।

बता दें कि 13 अक्तूबर को दुर्गा विसर्जन के जुलूस के दौरान बहराइच के महाराजगंज में पथराव के बाद हिंसा भड़की थी। बाद में खबर आई कि एक रामगोपाल मिश्रा नाम के युवक की निर्मम हत्या कर दी गई है।

शुरुआत में प्रशासन ने सुरक्षा लिहाज से इंटरनेट को बंद रखा लेकिन बाद में जैसे ही इंटरनेट खुला। ऐसी वीडियोज सामने आई जिसमें रामगोपाल को गोली मारते लोग दिखे। बाद में पुलिस ने इनके खिलाफ कार्रवाई करते हुए इन्हें पकड़ा।

ऑपइंडिया इस पूरी हिंसा और हत्या के मामले में ग्राउंड रिपोर्ट की है ताकि सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे झूठ और प्रोपगेंडे की पोल खुल सके। आप इन रिपोर्टों को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

‘जन्नती औरतों की निशानियाँ, जकात के पैसों का उपयोग’: बहराइच में जगह-जगह लगे हैं पोस्टर, लोगों ने कहा- इस्लामी गतिविधियों का केंद्र है महाराजगंज

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में 13 अक्टूबर 2024 को मुस्लिम भीड़ द्वारा हुई रामगोपाल मिश्रा की हत्या के बाद हालात सामान्य हो रहे हैं। पीड़ितों के घरों की तरफ वाले रास्तों पर अभी भी पुलिस का पहरा है। सरकार ने महराजगंज बाजार के कई घरों और दुकानों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का नोटिस चिपका दिया है, जिस पर फिलहाल कोर्ट ने रोक लगा दी है।

ऑपइंडिया की टीम उन दुकानों और मकानों में पहुँची, जहाँ ये नोटिसें लगाई गईं हैं। इन दुकानों के अंदर तमाम मज़हबी बातें लिखी हुई हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय हिन्दुओं ने महराजगंज बाजार को इस्लामी गतिविधियों का सेंटर बताया है। यहाँ अक्सर संदिग्ध बाहरी लोग नजर आते हैं। कुछ मौलाना-मौलवी भी दिखते हैं।

मस्जिद कैम्पस में शेर ए खुदा अली मौला वाली दुकान

प्रशासन की तरफ से जिन दुकानों को नोटिस मिली है, उनमें से कई दुकानें मस्जिद के कैम्पस में बनी हुई हैं। मस्जिद का एक छोटा-सा गेट है, जिसके दाईं और बाईं ओर कई दुकानें हैं। इनमें बाइक रिपेयर, मेडिकल स्टोर और किराने आदि की दुकानें शामिल हैं। इनमें से अधिकतर ऐसी दुकानें हैं, जो खाली हो चुकी हैं।

यहाँ स्थित एक दुकान के अंदर अरबी भाषा में कुछ शब्दों को बब्बर शेर की शक्ल दे दी गई थी। इसी के ऊपर ‘शेर-ए-खुदा अली मौला’ लिखा हुआ है। नीचे अरबी भाषा में कुछ लिखा पन्ना था। हालाँकि, ये क्या लिखा है, ये स्पष्ट नहीं हो पाया है। यह दुकान मुकर्रम अली के बेटे मेराज की है।

मस्जिद कैम्पस में मेराज की दुकान

जन्नती औरत की निशानियाँ

नोटिस मिले एक अन्य मकान में उन औरतों की निशानियाँ लिखी हुईं हैं, जिन्हें इस्लाम के मुताबिक जन्नत में दाखिल होना है। एस आलम के प्रिंटिंग प्रेस में छापे गए कागज के इस पोस्टर में खुर्शीद और जावेद सोनार ने फरमान जारी किया है। इसमें कहा गया है कि जो औरतें इन बातों को मानेंगी, वो जन्नत में किसी दरवाजे से जा सकती हैं।

इस कागज के मुताबिक, वही मुस्लिम महिलाएँ जन्नत यानी स्वर्ग जा सकती हैं जो 5 वक्त की नमाज़ी हो, रमज़ान की रोज़ेदार हो, अपनी इफ्फत (पवित्रता) और इस्मत (शील) की हिफाज़त करती हैं और शौहर का फरमान मानती हैं। नसीहत के तौर पर मुस्नद अहमद की दलील दी गई है।

जन्नती औरत की निशानियाँ
जन्नती औरत की निशानियाँ

इसी कागज में एक शायरी भी लिखी है। शायरी में कहा गया है कि ‘कुदरत को नापसंद हैं सख्ती जबान में। रखती नहीं इसलिए हड्डी जबान में’। इसी मकान में अकरम भाई नाम से किसी उर्स हशमती और रज़वी का भी प्रचार किया गया है। यह उर्स बरेली और पीलीभीत में होना था, जिसके लिए बस निकलने आदि का समय लिखा हुआ है। उर्स की तारीख पिछले साल 9 सितंबर लिखी हुई थी।

सुन्नी, हनफ़ी और बरेलवी मुस्लिमों को नसीहत

नोटिस मिले कुछ घरों में मौलाना राफे मोहम्मद बहराइची का फरमान भी चिपका हुआ है। इस फरमान में उन्होंने देवबंदी विचारधारा वालों को अनदेखा करते हुए बरेलवी, सुन्नी और हनफ़ी मुस्लिमों को नसीहत दी गई है। इस नसीहत को उन्होंने जरूरी एलान का नाम दिया है। जरूरी एलान में बताया गया है कि जकात, फ़ितरह, अतिया और सदका आदि माध्यमों से जुटाए गए पैसों का सही जगह इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

बरेलवी मुस्लिमों को नसीहत

हजरत खानकाह नाम की कोई जगह बताते हुए पोस्टर में अपील की गई है कि जकात आदि के पैसे वहाँ दिए जाएँ। हजरत खानकाह के पते के तौर पर महराजगंज बाजार के ही जलालिया अशरफिया करीमिया रजविया का जिक्र किया गया है। इसी के साथ कई मोबाइल नंबर भी लिखे हुए हैं। पोस्टर में ऊपर LOGO के तौर पर किसी मज़हबी किताब को छापा गया है। इस पोस्टर को छापने वाले प्रिंटिंग प्रेस का नाम नहीं लिखा है।

महराजगंज ही इस्लामी गतिविधियों का सेंटर

ऑपइंडिया ने हिंसा के चश्मदीद मारुति नंदन त्रिपाठी से बात की। मारुति नंदन त्रिपाठी ने कहा कि महराजगंज बाजार आसपास होने वाली तमाम इस्लामी गतिविधियों का सेंटर है। इसी जगह से लगभग 10 किलोमीटर की परिधि में होने वाले जलसे, उर्स, तकरीरें और जुलूस आदि को यहीं से ऑपरेट किया जाता है।

मारुति नंदन त्रिपाठी के अनुसार, किस जुलूस में कितने लोग शामिल होंगे और कहाँ DJ आदि में क्या बजेगा, यह सब महराजगंज से ही तय किया जाता है। कई अन्य पीड़ित हिन्दुओं ने भी यही बताया कि महराजगंज में अक्सर बाहर से मौलवी और मौलाना के रूप में अनजान लोग आते रहते हैं।

नेपाल की सबा खातून बिहार में बन गई मुखिया, अब पद से हटाकर केस दर्ज करने का आदेश: अम्मी भी लड़ चुकी है चुनाव, लोगों का आरोप- इनके पूर्वज बांग्लादेशी

बिहार के दरभंगा जिले में नेपाल की नागरिकता वाली सबा खातून नाम की मुस्लिम महिला पंचायत चुनाव में मुखिया बन गई। उसकी जानकारी सामने आने के बाद उसे पद से हटा दिया गया है। इसके साथ ही उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का भी आदेश जारी किया गया है। सबा खातून के पास नेपाल के साथ-साथ भारत की भी नागरिकता थी।

इस मामले में निर्वाचन आयोग के आदेश पर बुधवार (23 अक्टूबर 2024) को कार्रवाई की गई है। सबा खातून के बारे में शिकायत जितेंद्र प्रसाद नाम के व्यक्ति ने की थी। मामला दरभंगा जिले के केवटी प्रखंड में आने वाले गाँव कोठिया का है। यहाँ के जावेद आलम ने नेपाल की रहने वाली सबा खातून से काफी समय पहले निकाह किया था।

पिछले ग्राम पंचायत चुनावों में जावेद ने अपनी बीवी सबा खातून को मुखिया पद के लिए चुनाव लड़वाया था, जिसमें वह जीतकर मुखिया बनी थी। इसी गाँव के जितेंद्र प्रसाद ने इस निर्वाचन को रद्द करने की माँग की थी। उन्होंने शिकायत देकर सबा खातून पर नेपाल की नागरिक होने का आरोप लगाया था। इसकी जाँच जिला निर्वाचन अधिकारी ने की।

इस जाँच के बाद 9 सितंबर 2024 को बताया गया कि सबा खातून मूल रूप से नेपाल के मधेश प्रदेश में पड़ने वाले सिरहा की रहने वाली है। उसने 3 मार्च 2024 को नेपाल की नागरिकता छोड़ दी थी। हालाँकि, इससे पहले ही वो बिहार के ग्राम पंचायत चुनाव में हिस्सा लेकर मुखिया पद पर निर्वाचित हो चुकी थी।

जिला निर्वाचन अधिकारी ने इस मामले में आगे की कार्रवाई के लिए फ़ाइल उच्चाधिकारियों को भेज दी थी। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयुक्त डॉक्टर दीपक प्रसाद ने 23 अक्टूबर को अपना आदेश जारी किया। इसमें सबा खातून को तथ्यों को छिपाने, झूठा शपथ पत्र देने आदि का दोषी बताया गया है।

सबा खातून को मुखिया पद से हटाकर उसके खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश दिया गया है। अब खाली हुए मुखिया पद पर फिर से नियमानुसार चुनाव करवाया जाएगा। अधीनस्थों को इस आदेश पर तत्काल अमल करके सूचित करने के भी निर्देश मिले हैं। ऑपइंडिया ने पास आदेश की प्रति मौजूद है।

सबा खातून ने आयोग को यह भी बताया कि उसकी माँ मूल रूप से नेपाल की रहने वाली है, जबकि उसके पिता बिहार के रहने वाले हैं। उसने बताया कि उसकी माँ हमदी खातून ने भी साल 2016 में पंचायत चुनाव में भाग लिया था। उनके पास मतदाता पहचान पत्र भी उपलब्ध है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस महिला मुखिया के पूर्वज बांग्लादेश के रहने वाले हैं। इसकी माता के पास भी भारत और नेपाल की नागरिकता है। उनका यह भी कहना है कि सबा खातून ने मुखिया बनने के लिए छह समर्थक लोगों का अवैध पहचान पत्र बनवाया था।  

जिस ईरान को बिना हिजाब के औरत नहीं कबूल, उसके मिसाइल ठिकाने को तबाह करने वाली फाइटरों में महिला भी: सैन्य ही नहीं, महिला शक्ति का भी इजरायल ने कट्टरपंथी मुल्क को कराया एहसास

ईरान के सर्वोच्च कट्टरपंथी नेता अयातोल्लाह अली खामनेई को लेकर कई मीडिया रिपोर्टों में खबर आ रही है कि उनकी हालत गंभीर है और माना जा रहा है कि आने वाले समय में खामनेई की सत्ता को उनके बेटे जवान खामनेई को सौंपा जाएगा। ये खबर ऐसे समय में सामने आई है जब पिछले दिनों खामनेई ने ईरानी सेना को इजरायल के खिलाफ युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश दिया था और इजरायल ने पहले ही उनपर हमला कर दिया।

ये हमला 80 के दशक में इराक के साथ युद्ध समाप्त होने के बाद हुए ईरान पर हुए बड़े हमलों में से एक है। 1980 से 1988 के बीच जब ईरान-इराक युद्ध चला था उस समय ईरान की अर्थव्यवस्था को 600 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ था और 10 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई थी। उस युद्ध ने जिस तरह ईरानी समाज पर गहरा असर डाला था वैसे ही इजरायल हमले के बाद ईरान का हाल हुआ है।

इजरायल हाल में 100 से अधिक फाइटर जेट्स को छोड़ ईरान पर हवाई हमले कराए थे। हमला तीन घंटे तक चला था और इस दौरान ईरान के सैन्य ठिकानों और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ अटैक हुए थे। ये अटैक तीन चरण में अंजाम दिए गए थे –

  • हमले के दौरान में ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए ठोस ईंधन बनाने वाली यूनिट पूरी तरह से नष्ट हो गई थी।
  • इसके अलावा इजरायली सूत्रों से पता चला था कि 12 ‘प्लेनेटरी मिक्सर’ जो ईरान की लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए आवश्यक चीज थी उनको भी इस हमले में ध्वस्त कर दिया गया।
  • ऐसे ही चार एस-300 एयर डिफेंस बैटरियों को भी नष्ट किया गया, जो ईरान की परमाणु और ऊर्जा सुविधाओं की रक्षा कर रही थीं।

ये हमला चूँकि 1 अक्टूबर को ईरान द्वारा किए गए हमले के जवाब में किया गया था इसलिए इजरायल ने इस कार्रवाई को ‘बदले का दिन (Days of Repentance)’ नाम दिया और आज इसकी तस्वीरें भी सामने आई हैं। चौंकने वाली बात ये है कि तस्वीरों में फायटर जेट को चलाने वाली महिलाएँ पायलटों दिख रही हैं।

इन तस्वीरों को जारी करते हुए इजरायल ने सिर्फ ये नहीं बताया कि उनके सैन्य अभियानों में महिला फाइटर्स की बराबर भागीदारी है या फिर उनके देश में लिंग समानता को महत्व दिया जा रहा है बल्कि ये महिला फायटरों के जरिए ईरान पर हमला कराने का संदेश साफ है कि खामनेई के नेतृत्व में ईरान जिन महिलाओं को खुले में घूमने की आजादी तक नहीं देता वो अगर अपने पर आ जाएँ तो क्या कर सकती हैं।

ईरान में हुआ हिजाब प्रदर्शन

याद दिला दें कि यही वो ईरान है जहाँ साल 2022 में एक 22 वर्षीय महिला महसा अमीनी को मोरल पुलिस ने इसलिए पीट-पीटकर मार डाला था क्योंकि उसने हिजाब ढंग से नहीं पहना था। इस एक मौत ने ईरान के सैंकड़ों लोगों को रोष से भर दिया था और महिलाएँ अपनी आजादी की आवाज लेकर सड़कों पर उतर आई थीं। जगह-जगह हिजाब उतारकर महिलाओं ने अपना प्रदर्शन किया था।कट्टरपंथी नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई गई थी। मार्च निकले थे, प्रदर्शन हुए थे।

शुरुआत में ईरान की कट्टरपंथी पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग करके प्रदर्शनकारियों को शांत कराने का प्रयास किया और यथास्थिति दिखाने वाले पत्रकारों को गिरफ्तार करने की कोशिश की। लेकिन जब तमाम अत्याचारों के बाद आवाजें उठना बंद नहीं हुई जब ईरान सरकार को फैसला लेकर मोरैलटी पुलिस को खत्म करना पड़ा जिनका काम महिलाओं पर नजर बनाए रखना था कि वो इस्लामी तौर-तरीकों के हिसाब से रह रही हैं या नहीं।

ईरान में महिलाओं की ‘आजादी’- एक संघर्ष

इस पूरे प्रदर्शन में दो हफ्तों के भीतर 83 के करीब लोगों की मौत हुई थी और कई लोगों को सरकार ने बाद में फाँसी भी दी। तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस प्रदर्शन को रोकने के लिए ईरान सरकार द्वारा दिखाई सख्ती के खिलाफ आवाज उठाई लेकिन फर्क कुछ नहीं पड़ा। आज भी भले मोरैलिटी पुलिस खत्म हो गई है लेकिन महिलाओं को ऐसी आजादी नहीं मिली है कि वो पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें युद्ध में लड़ने की बात तो दूर है। वहाँ कहने को महिलाएँ कानून सैन्य सेवा कर सकती हैं लेकिन ये तो तब होगा न जब उन्हें सेना में भर्ती होने या फिर पदोन्नति का मौका दिया जाएगा। ऐसे देश पर महिलाओं फाइटर पायलटों से हमला कराकर इजरायल ने बड़ा संदेश दिया है।

‘हिजाब से बरसता है नूर, रेप उन्हीं का जो नहीं पहनती बुर्का’: जामिया में पत्रकारिता पढ़ने गई दिव्यांग हिंदू छात्रा, सहपाठी इस्लाम कबूलने का डालने लगे दबाव

दिल्ली स्थित जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में एक दिव्यांग हिन्दू छात्रा को इस्लाम कबूलने का दबाव दिया जा रहा है। इनकार करने पर पीड़िता को रेप की धमकी दी जा रही है। यहाँ से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही पीड़िता को यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। पीड़िता ने शनिवार (19 अक्टूबर 2024) को इब्ने सऊद, प्रोफेसर दानिश इकबाल और मीर कासिम के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी है।

ऑर्गनाइजर के मुताबिक, पीड़िता ने अच्छे नंबरों से प्रवेश परीक्षा पास करके जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता कोर्स में एडमिशन लिया था। कुछ ही दिनों के बाद से पीड़िता यूनीवर्सिटी में गंदे-गंदे कमेंट, और यौन उत्पीड़न का शिकार होने लगी। जब पीड़िता ने उनसे ऐसा नहीं करने की अपील की तो उसको इस्लाम कबूल कर मुस्लिम बन जाने के लिए कहा जाने लगा।

पुलिस को दी गई शिकायत में पीड़िता ने बताया कि जब उसने इस्लाम कबूल करने से मना किया तो उसे जान से मारने और रेप करने की धमकी दी जाने लगीं। उससे कहा गया, “तुम कोलकाता कांड भूल गई क्या? जो भी हिजाब पहनने से मना करेगा, उसका यही अंजाम होगा।” आरोप है कि पीड़िता ने जब से पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है, तब से उसे और ज्यादा धमकियाँ मिल रही हैं।

इन धमकियों के कारण पीड़िता ही नहीं, बल्कि उसके परिजन भी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। पीड़ित छात्रा ने बताया कि 10 जुलाई 2023 को इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत हुई। तब उसे अनजान नम्बरों से कॉल आनी शुरू हुई थी। ये सभी पीड़िता पर अश्लील कमेंट करते थे। बाद में पीड़िता को पता चला कि इब्ने सऊद नाम के एक लड़के ने उसका नंबर पूरे जामिया नगर में बाँट रखा है।

पीड़िता के सामने राम मंदिर और हिंदुत्व को लेकर आपत्तिजनक कमेंट किए जाने लगे। तब पीड़िता को एहसास हो गया कि ये सब कुछ उसके हिंदू होने की वजह से किया जा रहा है। दिव्यांग छात्रा का आरोप है कि दानिश इक़बाल ने कुछ छात्रों के साथ मिलकर उसे अलग-थलग करने की कोशिश की। प्रताड़ना देने वालों में दानिश इकबाल के साथ मीर कासिम नाम का एक और युवक है।

ये सभी आवाज उठाने वाले छात्र और छात्राओं को प्रताड़ित किया करते थे। 14 मई 2024 को उसका पेपर और एक साक्षात्कार साथ रख दिया गया। इसके बाद उसने खुद को दिव्यांग बताते हुए इसे अलग-अलग तारीख पर रखने की गुहार लगाई, लेकिन उसका असर नहीं हुआ। फिर 16 मई 2024 को उस पर अवैध तौर पर अतिरिक्त फीस जमा करने का दबाव बनाया गया।

अपनी तमाम समस्याओं को लिखते हुए पीड़िता ने 10 जून को यूनिवर्सिटी को एक पत्र लिखा। हालाँकि, जामिया प्रशासन ने इसे अनदेखा कर दिया। इसके बाद 26 जुलाई से इब्ने सऊद पीड़िता के आगे-पीछे घूमने लगा। वह अचानक यूनिवर्सिटी की कैंटीन में उसके सामने आ जाता। कभी कॉलेज कैम्पस में सामने आ जाता तो कभी बाइक उसके पीछे लगा दिया करता था।

पर्याप्त अटेंडेंस होने के बावजूद 20 अगस्त 2024 को कम हाजिरी का आरोप लगाते हुए उसके घर एक नोटिस भेज दिया गया। पीड़िता ने इसके पीछे मीर कासिम की साजिश बताई है। इसी महीने दानिश इकबाल ने भरी क्लास में पीड़िता को अपमानजनक शब्द बोले। सितंबर में यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पीड़िता को बुलाकर अपनी शिकायत वापस लेने का दबाव डाला और उसे तमाम तरह की धमकी दी।

हिजाब से आता है चेहरे पर नूर

पीड़िता का आरोप है कि जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अधिकारियों ने सिर्फ उसी पर ही नहीं, बल्कि उसके परिजनों पर भी शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया। इस दौरान पीड़िता को यूनिवर्सिटी प्रशासन से कुछ अधिकारियों ने हिजाब पहनने की हिदायत दी। उन्होंने कहा, “हिजाब पहनने से चेहरे पर नूर बरसता है। उन्हीं लड़कियों का बलात्कार होता है, जो हिजाब नहीं पहनती हैं।”

बकौल पीड़िता, उसके हिन्दू होने की वजह से उसे तंग किया जा रहा था और उसकी हिंदू पहचान खत्म करने की साजिश की जा रही है। इस साजिश के खिलाफ लड़ाई में लड़की ने सभी लोगों की मदद माँगी है। तमाम शिकायतों के बाद पीड़िता की मदद करने के बजाय जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उसे लीगल नोटिस भेजा है और एक तरह से और प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है।

इस नोटिस में साफ कहा गया है कि या तो वो अपनी शिकायत वापस ले, वरना कानूनी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार रहे। यह लीगल नोटिस समाचार चैनल क्राइम तक पर सितंबर 2024 में प्रकाशित हुए पीड़िता के एक इंटरव्यू के आधार पर भेजा गया है। इसी के साथ यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पीड़िता द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों को आधारहीन बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है।

माल चाही रसियन, यही वाला लूँगा… इंडिया गेट पर विदेशी पर्यटकों के साथ ‘नंगई’ कर रहा है इंस्टाग्राम ‘इन्फ्लुएंसर’: नेटिजन्स बोले- भारत का नाम खराब कर रहा, कार्रवाई हो

दिल्ली से शनिवार (26 अक्टूबर 2024) को एक इंस्टाग्राम और फेसबुक इन्फ्लुएंसर, सचिन कुमार (जिसका फेसबुक और इंस्टाग्राम हैंडल ‘सचिन राज वायरल‘ के नाम से है) के वीडियो तेजी से वायरल हुए। इन वीडियो में सचिन को दिल्ली के इंडिया गेट पर विदेशी पर्यटकों को परेशान करते हुए देखा गया। उसके वीडियो सामने आने के बाद से लोगों में काफी गुस्सा है।

इन क्लिप्स में सचिन बार-बार पर्यटकों के साथ डांस करते हुए रील्स बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि पर्यटक उसे अनदेखा करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। इस प्रकार के वीडियो ने ऑनलाइन कम्युनिटी के बीच भारत में विदेशी मेहमानों के साथ व्यवहार और उनकी सुरक्षा पर गंभीर चिंताएँ उठाई हैं, और लोगों ने इसके खिलाफ तुरंत पुलिस कार्रवाई की माँग की है।

वीडियो में दिखाया गया है कि पर्यटक अपने परिवारों के साथ इंडिया गेट घूमने आए हैं और अच्छा समय बिता रहे हैं। अचानक, सचिन वीडियो में आता है और भोजपुरी गानों पर डांस करने लगता है, साथ ही पर्यटकों को भी शामिल करने की कोशिश करता है। पर्यटक असहज महसूस करते हैं और वीडियो में उन्हें दूर हटते हुए देखा जा सकता है, जबकि सचिन बार-बार उन्हें रील्स में शामिल होने के लिए कहता है। एक वीडियो में जो सोशल मीडिया पर सबसे पहले वायरल हुआ, एक विदेशी पर्यटक के पिता ने हस्तक्षेप किया, जिसके बाद सचिन पीछे हट गया।

सचिन के अकाउंट का पता चलने पर ऑपइंडिया ने उसकी प्रोफ़ाइल का विश्लेषण किया और कई परेशान करने वाले वीडियो पाए। गौरतलब है कि सचिन के इंस्टाग्राम पर 1.6 लाख और फेसबुक पर 68,000 फॉलोअर्स हैं, जो बताते हैं कि उसके कई वीडियो सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। इंडिया गेट की घटना के वीडियो में वह अलग-अलग पर्यटकों को परेशान करता हुआ दिखाई देता है।

एक वीडियो में उसने एक पर्यटक के पैर छूने की कोशिश की, जिससे उनके साथ आया व्यक्ति नाराज हो गया। एक अन्य वीडियो में उसने रूसी ग्रुप को बार-बार डांस में शामिल होने के लिए परेशान किया। एक अन्य वीडियो में उसने एक विदेशी जोड़े के चारों ओर नाचना शुरू किया, जिन्हें पहले से ही एक अन्य व्लॉगर परेशान कर रहा था।

सचिन के इन वायरल वीडियो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर गुस्से की लहर पैदा कर दी है। कई लोगों ने उसके व्यवहार पर शर्म और निराशा जताई। नेटिज़न्स ने दिल्ली पुलिस और पर्यटन मंत्रालय को टैग करते हुए सचिन के खिलाफ त्वरित कार्रवाई और पर्यटन स्थलों पर नियमों के सख्त पालन की माँग की है। नेटिज़न्स की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट होता है कि “रील” बनाने की प्रवृत्ति, दूसरों की निजता और सम्मान को नजरअंदाज कर, कई लोगों को असहज कर रही है, खासकर तब जब पर्यटक इसका शिकार बनते हैं।

सबसे पहले यह वीडियो सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मैक्सटर्न ने साझा किया। उन्होंने लिखा, “दिल्ली पुलिस से अनुरोध है कि यह व्यक्ति सचिन राज विदेशी महिलाओं को परेशान कर रहा है ताकि वायरल हो सके और भारत का नाम खराब कर रहा है। कृपया त्वरित कार्रवाई करें।”

उनके जवाब में X के लोकप्रिय हैंडल ‘द प्लाकार्ड गाई’ ने लिखा, “इस बंदे की पूरी फीड लोगों को कंटेंट क्रिएशन के नाम पर परेशान करने से भरी हुई है। इस पर और इसके जैसे लोगों पर कब कार्रवाई होगी?”

X यूजर कुमार राव ने लिखा, “दिल्ली पुलिस से अनुरोध है कि यह व्यक्ति सचिन राज विदेशी महिलाओं को परेशान कर रहा है ताकि वायरल हो सके और भारत का नाम खराब कर रहा है।”

एक अन्य X यूजर श्रीकृष्ण सेना ने लिखा, “बिहार पुलिस से अनुरोध है कि यह व्यक्ति सचिन राज विदेशी महिलाओं को परेशान कर रहा है ताकि वायरल हो सके और भारत का नाम खराब कर रहा है।”

भारत की संस्कृति में “अतिथि देवो भव:” का सिद्धांत सदियों से प्रमुख रहा है, जिसका अर्थ है कि अतिथि ईश्वर के समान होता है। हर साल लाखों पर्यटक भारत की संस्कृति, धरोहर और मेहमानवाजी का अनुभव करने आते हैं। अधिकांश के लिए यह अनुभव गर्मजोशी और स्वागत से भरा होता है। लेकिन, रील कल्चर का बेकाबू बढ़ता चलन और “वायरल” होने की चाह में बेतुका कंटेंट बनाना हाल के वर्षों में बढ़ा है।

सोशल मीडिया यूजर्स, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान किए बिना, सनसनीखेज कंटेंट बनाकर मशहूर होने की कोशिश करते हैं, जो एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। ऐसी घटनाओं से भारत की छवि खराब होती है और विदेशी पर्यटकों के लिए यह एक नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

उस ओसामा के फिर से माई-बाप बने लालू यादव, जिसका अब्बा दूसरों के बेटों को तेजाब से नहला कर मार डालता था: बिहार में RJD के जंगलराज वाले कुनबों का ‘मिलन’

1990 से 2005 का बिहार। लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल वाला बिहार। वो बिहार जो बना जंगलराज का पर्याय। जंगलराज के इसी दौर में सीवान में एक गुंडा समानांतर सरकार चलाता था। नाम था- मोहम्मद शहाबुद्दीन।

आम आदमी से लेकर पुलिस वाले तक जो भी इस गुंडे का हुक्म बजाने से इनकार करते उन्हें वह सजा देता। वह खुद की कोर्ट लगाकर फरमान जारी करता था। इसी गुंडे ने रंगदारी देने से इनकार करने पर चंदा बाबू के दो बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाला था। इस घटना के गवाह रहे उनके तीसरे बेटे की भी कोर्ट जाते समय हत्या कर दी गई थी।

इस गुंडे का कनेक्शन पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई से थे। उसके घर से पाकिस्तान में बने हथियार मिले। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर को गोलियों से छलनी करने के उस पर आरोप लगे।

इन सबके बावजूद वह विधायक बना। सांसद बना। ‘कृपा’ रही लालू प्रसाद यादव की। इस ‘कृपा’ के बदले वह सुनिश्चित करता था कि मुस्लिमों का वोट लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को ही मिले। बिहार में लालू प्रसाद के राजपाट पर ‘ग्रहण’ न लगे।

वैसे तो बिहार में सुशासन की आमद के साथ ही इस गुंडे का कानून के राज से साक्षात्कार हो गया था। बिहार की जनता ने इस गुंडे और उसके राजनीतिक माई-बाप की एक साथ हनक निकाल दी थी। 2021 में यह गुंडा कोरोना की मौत मर गया। खुद को उसका राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित करने के लिए उसकी बेवा हिना शहाब और बेटा ओसामा शहाब हाथ-पैर मारते रहे। कभी राजद के साथ तो कभी राजद को आँखें दिखाकर। लेकिन न तो इन्हें फिर से सीवान में राजनीतिक जमीन मिली, न राजद का शीर्ष परिवार बिहार का माई-बाप बन सका।

इन्हीं राजनीतिक मजबूरियों के बीच ​शहाबुद्दीन के परिवार ने फिर से अपने पुराने राजनीतिक माई-बाप लालू यादव की सदारत कबूल कर ली है। लालू और शहाबुद्दीन के परिवार के बीच यह इकरार ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। जब राजद प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के हाथों अपना मुस्लिम वोट बैंक छिनने से भयाक्रांत है। 2020 के चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी किशनगंज जैसे इलाकों में लालटेन की रोशनी छीन ली थी।

ऐसे में हिना और ओसामा की वापसी को भले छपरा, सीवान और गोपालगंज में मुस्लिम वोटों के बिखराव रोकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन यह एक तरह से उन कुनबों का ‘मिलन’ है जो जंगलराज के केंद्र में रहे हैं। इस ‘मिलन का उत्साह’ ही है कि दोनों के पार्टी में शामिल होने की तस्वीरें सोशल मीडिया में साझा करते हुए पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने लिखा है- जीत रहे हैं हम…

यह मिलन, यह उत्साह बिहार के लिए निश्चित तौर पर चिंता के सबब होने चाहिए। यह उन तमाम चंदा बाबू से उनके पुत्र फिर से छीन सकता है जो किसी गुंडे का हुक्म मानने से इनकार कर देते हैं। वैसे भी सुशासन की हल्की बयार के बाद नीतीश कुमार ने जिस तरह राजनीतिक पलटियाँ ली है, विफलताओं को छिपाने के लिए जिस तरह ‘सुधारक’ की छवि ओढ़ने की कोशिश की है, उससे यह यकीनी तौर पर कहा भी नहीं जा सकता है बिहार जंगलराज के उस स्याह काल को काफी पीछे छोड़ आया है।

भगवा कुर्ता, शिखा… पैसे लेकर बना देता है IPS: मिथिलेश मांझी की जिस कहानी को बिहार पुलिस ने पाया फर्जी, उस पर बनी फिल्म में विलेन ‘चोटीवाला’

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक मिथलेश मांझी नाम के लड़के के फर्जी आईपीएस बनकर घूमने का मामला का खूब वायरल हुआ था। मिथलेश मांझी आईपीएस की वर्दी पहन जगह-जगह घूमता था। जब एक दिन उसे पुलिस ने पकड़ा तो उसने थाने में बताया कि किसी ने उससे 2.5 लाख रुपए लिए थे और उसे ये कह दिया था कि वो अब आईपीएस बन गया है। शुरू में लोगों को उस लड़के पर दया आई कि किस तरह कोई गाँव के एक लड़के ठग सकता है। हालाँकि बाद में जब पुलिस ने इस मामले की छानबीन की तो पता चला कि मिथलेश मांझी ने पूरी कहानी फर्जी गढ़ी थी और वो खुद ही पुलिस की यूनिफॉर्म सिलवाकर घूमता था।

फर्जी आईपीएस की फर्जी कहानी पर छपी थी रिपोर्टें

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तमाम तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिलीं। पहले जहाँ लोग उसपर तरस खा रहे थे वहीं हकीकत सामने आने बाद में उसका मजाक उड़ने लगा। कायदे से मामला पूरी तरह फर्जीवाड़े का था जिसमें मिथलेश को पुलिस ने फटकार भी लगाई थी कि 420 करने के आरोप में अंदर डाल सकते हैं… उस समय शायद पुलिस से छूटने के लिए मिथलेश ने माफी भी माँगी हो या दोबारा ऐसा न करने की कसम भी खाई हो। लेकिन पुलिस से छूटने के बाद ही मिथलेश सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाने वालों के लिए कंटेंट बन गया और उसके झूठ को मेकर्स ने खूब भुनाना शुरू कर दिया।

पुलिस की वर्दी पहन झूठी कहानी गढ़ने वाले मिथलेश को देखते ही देखते हीरो बना दिया गया। मिथलेश ने अपना यूट्यूब चैनल खोल लिया ‘Viral IPS Mithlesh’ के नाम से। इसके बाद पहले भोजपुरी इंडस्ट्री ने उसे ‘हीरो’ बनाते हुए उसपर गाना बनाया और फिर अब पता चला है कि उस लड़के की कहानी को यूट्यूब पर बाकायदा फिल्म बनाकर रिलीज किया जाने वाला है। फिल्म का टीजर भी आ गया है, जो इस समय खासी चर्चा में है। इसे विशाल म्यूजिक नाम के यूट्यूब चैनल रिलीज किया गया है।

अब आम दर्शकों को शायद लगे कि भोजपुरी गाने की तरह ये फिल्म सिर्फ मनोरंजन और पैसे के लिहाज से बनाई गई है, लेकिन हकीकत तो ये है इस फिल्म में चुपके से हिंदू घृणा फैलाने का भी काम हुआ है। कहाँ? आइए बताएँ…

दरअसल, शुरुआत में मिथलेश ने जो फर्जी कहानी सुनाई थी उसमें एक कैरेक्टर था जिसने उसे ठगा। पुलिस जाँच के बाद भले ही सामने आ गया कि ऐसा कोई व्यक्ति असल में था ही नहीं। मगर, फिल्म बनाने वावों ने इस फिल्म में वो किरदार जोड़ा है और इसे किसी ठग की वेशभूषा पहने नहीं दिखाया गया बल्कि इसे भगवा रंग के कुर्ते में और शिखा के साथ दिखाया गया है।

नीचे तस्वीर में आप फिल्म का दृश्य का स्क्रीनशॉट देख सकते हैं।

भगवा रंग और शिखा को फोकस में रखकर दिखाया गया है। मेकर्स ने ऐसा किस मंशा से किया इसका जवाब छिपा नहीं है। हिंदू घृणा से सनी मानसिकता के अलावा यूट्यूब के छोटे-छोटे कलाकार उस बॉलीवुड की कॉपी करने की पूरी कोशिश करते हैं जो साधु-संतों से जुड़ी इस वेशभूषा का मजाक दशकों से बनाता आया है।

बॉलीवुड फिल्मों में सनातन को किया गया बदनाम

आपको याद है पुरानी फिल्मों में किस तरह से फिल्मों में जब विलेन बनाए जाते थे तो उनकी माथे पर तिलक लगा दिया जाता था। धीरे-धीरे हिंदू धर्म का, हिंदू देवी-देवताओं का, धर्म के प्रतीकों का बॉलीवुड में मजाक बनने लगा और सब चुप रहे। किसी को समझ तक नहीं आता था कि इसका प्रभाव समाज पर क्या हो रहा है।

आमिर खान की ‘पीके’ फिल्म में हमने साफ तौर पर हिंदू देवी-देवताओं का मखौल उड़ते देखा, फिर अक्षय कुमार की भूल भुलैया फिल्म में छोटे पंडित के किरदार में ब्राह्मणों की ‘शिखा’ का मजाक उड़ाया गया… जहाँ मजाक उड़ाना संभव नहीं हुआ, वहाँ घृणा फैलाई गई। हिंदू संतों को धोखेबाज, ठग, अत्याचारी, दुराचारी और बलात्कारी तक दिखाया गया।

हिंदू संतों को मीट माँस खाते दिखाकर ऐसा चित्र गढ़ा गया कि एक लोगों के मन में छवि बैठ जाए कि संत बाहरी दुनिया में कुछ और निजी जीवन में कुछ होते हैं। ‘काली’ जैसी सीरिज में देवी को सिगरेट पीते दिखाया गया, अन्नापूर्णा माता के नाम पर बनाई गई फिल्म में लड़की को बिरयानी बनाते और नमाज पढ़ते दिखाया गया। सोशल मीडिया पर स्वास्तिक के निशान को नाजी का निशान बताया जाने लगा।

यहाँ तक क्रिएटिविटी के नाम पर हिंदू घृणा से सने विज्ञापन तैयार हो गए। ‘कन्यादान’ जैसी रीति को बदलने का प्रयास हुआ। बेलगामी में हिंदू संतों को बिरयानी का शौकीन दिखाया गया। कुंभ के मेले को ऐसी जगह दिखाई गई जहाँ बच्चे अपने माता-पिता को छोड़ चले जाते हैं। चाय से लेकर सर्फ बेचने के नाम पर ऐसे एड बनाए गए जिसमें हिंदुओं को असहिष्णु और मुस्लिमों को सौहार्द बनाए रखने वाला दिखाया गया।

इतना ही नहीं जिन फिल्मों में हिंदुओं को पॉजिटिव रूप में दिखाया गया उसमें जरा सा इस्लामी सोच का छौंक जरूर लगा दिया गया ताकि अगर कोई हिंदुत्व को लेकर अपनी सोच निर्मित करे तो किसी और समुदाय को कम न समझे…बजरंगी भाईजान, तानाजी, चक दे इंडिया जैसी फिल्मों में दिखाए गए किरदार इसके उदाहरण हैं।

बॉलीवुड के असर आम लोगों पर

बॉलीवुड की ऐसी हरकतों का असर आम लोगों पर क्या हुआ इसे सोच भी नहीं सकता। आम जीवन से लेकर राजनीति तक में इसका घटिया प्रभाव है। 2021 में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को चोटीवाला राक्षस कहा था। आपको क्या लगता है कि ये ‘चोटीवाला राक्षस’ शब्द ने अचानक जन्म लिया होगा।

नहीं। बॉलीवुड के परोसे गंद का असर था कि ब्राह्मणों की शिखा का इस्तेमाल एक ठग को दिखाने के लिए किया गया।। अब इसी शिखा को लेकर मजाक सोशल मीडिया पर बनने लगा है। एक मनगढ़ंत विलेन को पर्दे पर दिखाने के लिए भगवा कुर्ते का प्रयोग किया जा रहा है। ऐसी रील बनाई जाती हैं जहाँ जनेऊधारी, तिलक धारी हँसी का पात्र बना दिए जाएँ या फिर समाज के लिए खतरा। वहीं दूसरे पक्ष को समाज के रक्षक के तौर पर पेश किया जाता है।

मुस्लिम भाइयों ने राम मंदिर में घुसकर पढ़ी नमाज, पुजारी बोले- रोका फिर भी मटके में रखे पानी से धोए हाथ-पैर, 20 मिनट तक परिसर में रहे: पुलिस ने नोटिस देकर छोड़ा

शाजापुर, मध्य प्रदेश: भगवान राम के मंदिर में तीन मुस्लिम व्यक्तियों द्वारा जबरन नमाज़ पढ़ने का मामला सामने आया है। आरोपितों के नाम रुस्तम, अकबर और बाबू खाँ हैं, जो आपस में सगे भाई हैं और जिनकी उम्र 65 से 85 वर्ष के बीच है। पुलिस ने इन तीनों के खिलाफ FIR दर्ज कर उन्हें हिरासत में लिया, हालाँकि बाद में नोटिस देकर छोड़ दिया गया। यह घटना शनिवार (26 अक्टूबर 2024) की है। स्थानीय हिंदू समुदाय ने इस कृत्य को अपनी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बताते हुए कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना शाजापुर के सलसलाई थाना क्षेत्र के गाँव किलोदा में हुई, जहाँ भगवान राम का मंदिर क्षेत्रीय हिंदुओं के लिए आस्था का मुख्य केंद्र है। मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश शर्मा ने पुलिस में तहरीर दी, जिसमें बताया गया कि शाम करीब 5:45 बजे 85 वर्षीय अकबर, 65 वर्षीय रुस्तम और 70 वर्षीय बाबू खाँ मंदिर आए थे। तहरीर में पुजारी ने बताया कि तीनों ने मंदिर में रखे मटके के पानी से हाथ-पैर धोए और मंदिर परिसर में बैठकर नमाज़ पढ़ने लगे।

ओमप्रकाश ने आगे बताया कि रुस्तम, अकबर और बाबू ने मंदिर में रखे मटके के पानी से हाथ पैर धोए। इसके बाद ये तीनों मंदिर परिसर में ही बैठ कर नमाज़ पढ़ने लगे। पुजारी के विरोध के बावजूद तीनों आरोपित लगभग 20 मिनट तक मंदिर परिसर में रुके और बाद में वहाँ से चले गए। पुलिस के मुताबिक तीनों भाई बैंक में कुछ काम कर के लौट रहे थे। तभी नमाज़ का समय हो गया और ये तीनों मंदिर परिसर में ही नमाज़ पढ़ने लगे।

घटना के बाद स्थानीय निवासियों में रोष व्याप्त हो गया। पुजारी ने अपनी तहरीर में आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने तुरंत मामले में केस दर्ज कर बाबू, रुस्तम और अकबर को हिरासत में लिया, और पूछताछ के दौरान आरोपितों ने अपनी गलती स्वीकार की। पुलिस ने FIR दर्ज कर इनका चालान किया, लेकिन 7 साल से कम की सजा का मामला होने के कारण इन्हें नोटिस देकर छोड़ दिया गया। मामले की जाँच और कानूनी कार्रवाई जारी है, और आगे इस पर कोर्ट में ट्रायल चलेगा।

गुजरात सरकार के पास ही रहेगी वह जमीन जिसे बुलडोजर से किया समतल, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं मानी औलिया-ए-दीन की दलील: गिर-सोमनाथ में ढाह दिए थे अवैध मस्जिद-दरगाह

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 अक्टूबर 2024) को गुजरात में चल रहे ध्वस्तीकरण अभियान पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देने से इनकार कर दिया। वहीं, गुजरात सरकार ने कोर्ट कोर्ट को आश्वस्त किया कि ये जमीनें सरकार के पास रहेंगी, किसी तीसरे पक्ष को आवंटित नहीं की जाएगी। दरअसल, प्रशासन ने गिर सोमनाथ जिले में अवैध रूप से बनाए गए इस्लामी ढाँचों और मुस्लिमों के घरों को ध्वस्त किया था।

गुजरात सरकार की ओर से यह आश्वासन राज्य सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ को दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “इस मामले को देखते हुए हम कोई अंतरिम आदेश पारित करना आवश्यक नहीं समझते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट औलिया-ए-दीन समिति की अपील पर सुनवाई कर रहा था। इसमें गुजरात हाई कोर्ट के 3 अक्टूबर के फैसले और अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई थी। गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले महीने सोमनाथ मंदिर के पास प्रभास पाटन गाँव में ध्वस्तीकरण पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश देने से इनकार कर दिया गया था।

औलिया-ए-दीन समिति ने अपनी याचिका कहा है कि ध्वस्तीकरण अभियान में मुस्लिमों के लगभग 9 मजहबी स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया है। इसके साथ ही कई कब्रों और दरगाहों एवं मस्जिदों को भी गिरा दिया गया है। ये सभी अवैध रूप से बनाए गए हैं। हालाँकि, मुस्लिम संस्था का कहना है कि ये सभी संरचनाएँ एक सदी से भी अधिक समय से वहाँ मौजूद थीं।

समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दावा किया कि अधिकारियों ने भूमि पर स्थित मंदिरों को छोड़ दिया और केवल इस्लामी संरचनाओं को निशाना बनाया। उन्होंने तर्क दिया, “विध्वंस का कारण यह बताया गया कि वे अरब सागर के पास हैं, जो कि एक जल निकाय के पास स्थित है। इन संरक्षित स्मारकों को जमीन पर गिरा दिया गया। क्या आप कल्पना कर सकते हैं?”

इस भूमि को किसी तीसरे पक्ष को हस्तांतरित करने का अंदेशा जताते हुए सिब्बल ने जिला कलेक्टर के साल 2015 के आदेश का हवाला दिया। उस आदेश में कहा गया था कि जिस भूमि पर ध्वस्तीकरण अभियान चलाया गया था, उसका उपयोग केवल सरकारी उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने कहा कि उनके पास साल 1903 के भूमि आवंटन के दस्तावेज हैं और वह पंजीकृत वक्फ स्मारक को ध्वस्त कर दिया गया। उन्होंने कहा, “उन्होंने (अधिकारियों ने) मनमानी की है। अगर आवंटन या कब्जे में बदलाव होता है… तो इसे वापस पाना मुश्किल हो जाएगा।”

विरोधी पक्ष के दावों का विरोध करते हुए एसजी मेहता ने दस्तावेज पेश करते हुए कहा कि यह भूमि सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के कब्जे में थी। उन्होंने कहा कि केवल उन संरचनाओं को हटाया गया, जो सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण कर रही थीं। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि प्रशासन केवल सिब्बल द्वारा संदर्भित जिला कलेक्टर के आदेश के अनुसार ही कार्य करेगा।

इसके बाद जस्टिस गवई ने कहा, “अगली तारीख तक कब्ज़ा सरकार के पास ही रहने दिया जाए”। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर को करेगा। इसके अलावा समस्त पटनी मुस्लिम जमात ट्रस्ट द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर भी सुनवाई होगी। दोनों याचिकाओं में कहा गया है कि ध्वस्तीकरण अभियान सुप्रीम कोर्ट के 17 अक्टूबर को दिए गए आदेश का उल्लंघन है।