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जिस महमूद फारूकी पर लगा था अमेरिकी महिला से रेप का आरोप, उसे IIT बॉम्बे ने दीपावली पर ‘महाभारत’ का मंचन करने बुलाया: विरोध के बाद रद्द करना पड़ा कार्यक्रम

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे ने दिवाली के अवसर पर ‘महाभारत’ पर आधारित कार्यक्रम के लिए फिल्म निर्देशक महमूद फारूकी को आमंत्रित किया, जिसका तीखा विरोध छात्रों ने किया। यह कार्यक्रम ‘दास्तान-ए-कर्ण – एज़ महाभारत’ के नाम से 26 अक्टूबर की शाम को आयोजित होने वाला था।

हालाँकि एक अमेरिकी महिला के रेप के मामले में दोषी करार देने के बाद बरी किए गए महमूद फारूकी की मौजूदगी का छात्रों ने इतना तीखा विरोध किया, कि कार्यक्रम को ही रद्द करना पड़ा। छात्रों का कहना है कि रेप का आरोपित कोई व्यक्ति आईआईटी के मंच पर प्रस्तुति दे, ये आईआईटी का भी अपमान है।

IIT बॉम्बे में एक छात्र वालंटियर ग्रुप ‘IIT B फॉर भारत’ ने सबसे पहले इस आयोजन पर आपत्ति जताई। उन्होंने अपने बयान में कहा, “फारूकी को IIT बॉम्बे में बुलाने से संस्थान के सुरक्षा, सम्मान, और गरिमा के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े होते हैं। यौन उत्पीड़न से बचने वाले और उनके समर्थकों के लिए उनकी उपस्थिति एक असुविधाजनक और असुरक्षित माहौल बना सकती है।”

वालंटियर समूह ने आगे कहा कि IIT बॉम्बे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ज़िम्मेदारी है कि वह एक ऐसा माहौल बनाए, जो सभी के प्रति सम्मान, व्यक्तिगत सीमाओं का आदर और नैतिक व्यवहार को बढ़ावा दे। इसके साथ ही, उन्होंने आयोजन को कैंसिल करने का भी अनुरोध किया। दिलचस्प बात यह है कि फारूकी को IIT परिसर के स्कूल और जूनियर कॉलेज में मुख्य अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया गया था, जिसने विवाद को और बढ़ा दिया।

फारूकी का नाम पहले भी विवादों में आ चुका है। उसने मुंबई हमलों में शामिल आतंकवादी अजमल कसाब के लिए दया याचिका पर हस्ताक्षर भी किए थे, जो 26/11 के हमलों में दोषी था। सोशल मीडिया पर विरोध बढ़ने के बाद, IIT बॉम्बे के प्रशासन ने इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया।

महमूद फारूकी ने किया था अमेरिका महिला से रेप, सजा मिली, फिर बरी हो गया

आमिर खान के होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘पीपली लाइव’ के सह निर्देशक महमूद फारूकी पर एक अमेरिकी शोधकर्ता ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। यह घटना 28 मार्च 2015 की है, जब पीड़िता फारूकी के बुलावे पर उनके घर गई थी। पीड़िता का कहना था कि जब वह वहाँ पहुँची, तो उसने फारूकी को नशे की हालत में पाया। पीड़िता के अनुसार, फारूकी ने उसके साथ जबरदस्ती की और उसकी इच्छा के खिलाफ उसके साथ ओरल सेक्स किया।

पीड़िता ने अदालत में अपनी गवाही में कहा, “उस समय उसने मुझे चूमने की कोशिश की, और मैंने ना कहा। मैंने उसे दूर धकेला, लेकिन वह नहीं रुका। उसने मेरे कपड़े उतारने की कोशिश की, और मैं उसे रोकने की कोशिश करती रही, लेकिन वह मुझसे शारीरिक रूप से अधिक ताकतवर था। मुझे समझ नहीं आया कि वह इतना ताकतवर कैसे था। उस समय मुझे निर्भया मामले की एक डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा याद आया, जहाँ अपराधी ने कहा था कि अगर पीड़िता ने विरोध नहीं किया होता तो वह जिंदा होती। मैं उस स्थिति से बाहर निकलने की सोच रही थी, इसलिए मैंने उसका विरोध बंद कर दिया ताकि मैं बच सकूँ।”

घटना के बाद पीड़िता अपने घर लौटी और अपने एक दोस्त को फोन कर पूरी घटना बताई। इसके बाद उसने फारूकी को ईमेल भेजकर उसके अपराध के बारे में बताया। फारूकी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ‘मेरी सच्ची माफी’ लिखकर माफी माँगने का दिखावा किया था। ये पूरा मामला कोर्ट में गया और 4 अगस्त 2016 को दिल्ली की निचली अदालत ने फारूकी को दोषी करार देते हुए 7 साल की सजा सुनाई।

इस सजा के करीब एक साल बाद, दिल्ली हाई कोर्ट ने फारूकी को ‘शंका का लाभ‘ देते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। इस फैसले में एकल जज ने कहा कि फारूकी को यह नहीं समझ में आया कि पीड़िता की सहमति नहीं थी। कोर्ट ने सहमति की संकीर्ण परिभाषा दी और फारूकी का बैकग्राउंड देखते हुए कहा कि वह ऐसा अपराध करने में सक्षम नहीं हो सकते। जनवरी 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा और कहा कि यह निर्णय ‘अच्छी तरह से सोचा-समझा’ था।

IIT बॉम्बे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में महमूद फारूकी को बुलाने को लेकर उठे इस विवाद ने कई सवाल खड़े कर दिए। वालंटियर ग्रुप ‘IIT B फॉर भारत’ जैसे समूहों ने कहा कि फारूकी की उपस्थिति से संस्थान के मानकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और इससे कैंपस में असुरक्षा का माहौल बन सकता है।

चंदोला झील को कचरे से भरकर बस गए बांग्लादेशी, हिंदू पहचान का कर रहे थे इस्तेमाल: गुजरात पुलिस का शिकंजा कसते ही 70% घुसपैठिए घर छोड़ भागे, नर्मदा का पानी भी रोका

गुजरात के अहमदाबाद में पकड़ाए अवैध बांग्लादेशी चंदोला झील को कचरे से भरकर अपने लिए घर बना रहे थे। अपनी जाँच में सिटी क्राइम ब्रांच ने इसका खुलासा किया है। बता दें कि शुक्रवार (25 अक्टूबर 2024) को अहमदाबाद पुलिस क्राइम ब्रांच ने 51 अवैध बांग्लादेशी अप्रवासियों को गिरफ्तार किया था। अब उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा। कार्रवाई के दौरान 250 व्यक्तियों से पूछताछ की गई थी।

इन अवैध बांग्लादेशियों ने झील को भरने के लिए ना सिर्फ उसमें कचरे डाल रहे थे, बल्कि झील में किसी तरह पानी ना पहुँचे इसका भी उन्होंने पूरा बंदोबस्त कर रखा था। घुसपैठियों ने झील में पानी ना जाए, इसके लिए पिराना डंपिंग साइट से कचरे लाकर नर्मदा पाइपलाइन को ब्लॉक कर दिया था। इसकी पुष्टि तब हुई जब क्राइम ब्रांच ने 1985, 2011 और 2024 की सैटेलाइट तस्वीरों की समीक्षा की।

देश गुजरात की रिपोर्ट के अनुसार, इन घुसपैठियों ने चंदोला झील के कुछ हिस्सों को भरकर उन पर अवैध घर भी बना लिए हैं। हालाँकि, चार महीनों की पुलिस कार्रवाई में इनमें से 60 से 70% घर खाली हो गए हैं। इनमें रहने वाले अधिकांश घुसपैठिए या तो भाग गए हैं या फिर पकड़े गए हैं। ये लोग नकली हिंदू नामों का इस्तेमाल करके यहाँ रह रहे थे और उस नाम से फर्जी दस्तावेज भी बना लिए थे।

पुलिस के सामने यह सबसे बड़ी समस्या ये पता लगाना है कि यहाँ से भागे आखिर कहाँ गए। क्या वे गुजरात के अन्य हिस्सों में चले या देश के अन्य हिस्सों में चले गए या फिर वापस अपने देश बांग्लादेश चले गए। पुलिस दूसरे राज्यों के साथ खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रही है और इसके बारे में उन्हें सूचित कर रही है। हालाँकि, भागे हुए बांग्लादेशियों के बारे में पता लगाना आसान नहीं है।

दरअसल, कुछ हफ्ते पहले फर्जी पहचान कागजात बनाने और बांग्लादेश से मानव तस्करी के जरिए महिलाओं को भारत लाने का मामला सामने आया था। इन महिलाओं से यहाँ वेश्यावृत्ति कराई जाती थी। सहायक पुलिस आयुक्त भरत पटेल ने बताया कि इन दो मामलों में 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इन लोगों के बयान पर ही पुलिस ने कार्रवाई की और 51 बांग्लादेशियों को पकड़ा।

पटेल ने बताया कि प्राथमिक जाँच में सामने आया कि ये लोग स्थानीय पहचान पत्र बनवा कर कारखानों में दिहाड़ी मजदूरी, बाँस से बनने वाले सामान बनाते और कुछ लोग भीम माँगने का काम करते थे। उन्होंने बताया कि कुछ लोग बांग्लादेश से विवाह करके युवतियों को यहाँ लाते हैं, और उनसे देह व्यापार कराते हैं। बड़े पैमाने पर राशि को हवाला से बांग्लादेश भेजने का भी पता चला है।

इससे पहले त्रिपुरा की राजधानी अगरतला रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा एजेंसियों ने 22 अक्टूबर 2024 की सुबह तीन रोहिंग्या मुस्लिम और दो बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया था। राजकीय रेलवे पुलिस (GRP) के प्रभारी अधिकारी तपस दास ने कहा कि उन्हें सूचना मिली कि कुछ रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिक त्रिपुरा से बाहर जाने के लिए अगरतला रेलवे स्टेशन पर आएँगे।

तपस दास ने आगे बताया कि पूछताछ में पता चला कि रोहिंग्या नागरिक हैदराबाद जाने वाले थे, जबकि बांग्लादेशी नागरिक मुंबई जाने की योजना बना रहे थे। उन्होंने कहा, “हमने उनके पास से बांग्लादेशी मुद्रा, दस्तावेज और कुछ मोबाइल फोन जब्त किए हैं।” इससे पहले पुणे से भी 21 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया गया था।

महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने भी खुफिया सूचना के आधार पर रजनगाँव में 21 अक्टूबर 2024 को सर्च ऑपरेशन चलाकर 21 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया था। पुलिस अधीक्षक पंकज देशमुख ने कहा था, “उनमें से नौ के पास फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड थे और उनमें से एक के पास वोटर आईडी कार्ड भी था। बांग्लादेशी नागरिक के पास वोटर आईडी कार्ड था, उसने इसे गुजरात से हासिल किया था।”

एसपी ने कहा कि ये सभी या तो पैदल चलकर सीमा पार करते हुए पश्चिम बंगाल में यहाँ आए या फिर नावों से समुद्री मार्ग से अवैध रूप से यहाँ पहुँचे। उन्होंने कहा, “इनमें से कुछ के बच्चे भी हैं, जिनकी उम्र तीन साल से पाँच साल के बीच है। भारत में घुसने के बाद ये गुजरात और मुंबई चले गए। कुछ दिन पहले ये पुणे आए हैं।” लंबे समय रह रहे इन लोगों के पास से फर्जी भारतीय पहचान पत्र आदि भी बरामद किए गए थे।

बता दें कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भारत-बांग्लादेश सीमा पर मानव तस्करों का एक बड़ा गिरोह काम कर रहा है, जो सिर्फ कुछ हजार रुपए में बांग्लादेशी लोगों को भारत में घुसपैठ कराता है। घुसपैठ करने वालों में बांग्लादेशी के साथ-साथ रोहिंग्या मुस्लिम भी शामिल हैं। इसके बाद घुसपैठियों को फर्जी पहचान देकर जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बसाया जाता है।

हरियाणा का बदला UP में, UP का बदला महाराष्ट्र में… INDI गठबंधन में चल रहा एक-दूसरे को निपटाने का खेल: जो सीटें माँग रही सपा उन पर MVA ने उतारे उम्मीदवार, बोले अखिलेश यादव- कुर्बानी नहीं दूँगा

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, लेकिन महाविकास अघाड़ी (एमवीए) में सीट बंटवारे पर असहमति बढ़ती जा रही है। कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले इस गठबंधन में समाजवादी पार्टी (सपा) की माँगों को नजरअंदाज कर उसे ठेंगा दिखाया जा रहा है। सपा ने एमवीए से पाँच सीटों – धुले सिटी, भिवंडी पूर्व, भिवंडी पश्चिम, मालेगांव सेंट्रल और मानखुर्द – की माँग की थी।

हालाँकि, 26 अक्टूबर 2024 को एमवीए के प्रमुख दलों ने इन सीटों पर सपा की जगह अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी, जिससे सपा नेतृत्व में नाराजगी फैल गई है। वैसे, इंडी गठबंधन में अखिलेश यादव को हरियाणा से लेकर मध्य प्रदेश तक कॉन्ग्रेस ने ठेंगा ही दिखाया है। ऐसे में अखिलेश यादव ने भी बयान दिया है कि वो कोई राजनीतिक बलिदान नहीं देने वाले। सहमति बनी तो ठीक, वर्ना अपने संगठन वाले इलाकों में सपा अकेले चुनाव लड़ेगी।

सपा की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष अबू आसिम आजमी ने एमवीए को पहले ही अल्टीमेटम दिया था कि अगर उनकी माँग नहीं मानी गई, तो सपा 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। एमवीए के नेताओं से बातचीत के बाद भी जब सीटों पर सहमति नहीं बन पाई, तो आजमी ने अपना गुस्सा जाहिर किया और एमवीए पर “विश्वासघात” का आरोप लगाया। अब सवाल उठता है कि सपा का यह कड़ा रुख गठबंधन को कितना प्रभावित करेगा और क्या इससे महाविकास अघाड़ी के चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं।

सपा ने एमवीए में अनदेखी के बाद बढ़ाया दबाव

एमवीए में शिवसेना (यूबीटी), कॉन्ग्रेस और एनसीपी (शरद पवार गुट) जैसी तीन बड़ी पार्टियाँ शामिल हैं, जिन्होंने महाराष्ट्र चुनाव के लिए 85-85 सीटों पर लड़ने का निर्णय लिया है, जबकि सहयोगी दलों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी हैं। सपा ने इस आरक्षित कोटे में से अपनी हिस्सेदारी की माँग की, लेकिन इस पर अब तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया है। एमवीए के शीर्ष नेताओं के साथ हुई बैठक में भी सपा को कोई आश्वासन नहीं दिया गया, जिसके बाद आजमी ने एमवीए से अलग चुनाव लड़ने का इरादा जाहिर किया।

अबू आजमी ने मीडिया से कहा, “हमने शरद पवार जी से बात की थी और अपनी माँग उनके सामने रखी थी। उन्होंने कहा था कि आज (26 अक्टूबर 2024) इस पर निर्णय लेंगे, लेकिन मुझे आज कोई फोन नहीं आया। एमवीए के सहयोगियों द्वारा हमारे माँग वाली सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा हो गई है। ऐसा लगता है कि एमवीए में शामिल दल सपा को सीटें नहीं देना चाहते।”

अखिलेश यादव बोले- गठबंधन हुआ तो ठीक, वर्ना ‘राजनीति में कोई बलिदान नहीं’

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “महाराष्ट्र में सपा का प्रदेश अध्यक्ष ही निर्णय करेगा – पहले हम गठबंधन में बने रहने की कोशिश करेंगे। लेकिन, अगर महाविकास अघाड़ी हमें गठबंधन में नहीं रखना चाहती, तो हम उन सीटों पर लड़ेंगे, जहाँ हमारा संगठन मजबूत है या हमें वोट मिल सकते हैं। हम उन सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, जिनसे गठबंधन को नुकसान न हो। पर राजनीति में बलिदान की कोई जगह नहीं है।”

यादव के इस बयान से सपा की रणनीति साफ हो गई है। पार्टी पहले एमवीए का हिस्सा बने रहना चाहती है, परंतु सीटों की अनदेखी होने पर अपने दम पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है। बता दें कि महाराष्ट्र में 20 नवंबर को वोटिंग होने वाली है, जिसमें अब बहुत कम समय बचा है। अधिकतर दलों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।

क्या एमवीए की चुनावी समीकरणों पर असर होगा?

अगर सपा एमवीए से अलग होकर अपने उम्मीदवार उतारती है, तो इससे गठबंधन के वोट बैंक पर असर पड़ सकता है। सपा का प्रभाव खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में है, जहाँ उसकी मजबूत पकड़ है। इसके अलावा, सपा का एमवीए से अलग होकर चुनाव लड़ना मुस्लिम वोटों के विभाजन का कारण बन सकता है, जिसका सीधा फायदा महायुति (बीजेपी और सहयोगी दलों) को हो सकता है। इससे महाविकास अघाड़ी के लिए चुनौती बढ़ सकती है, जो पहले से ही महायुति के खिलाफ संघर्ष में है।

एमवीए का नेतृत्व, विशेषकर कॉन्ग्रेस, अभी तक सपा की माँगों को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है, जो सपा के लिए निराशाजनक है। वहीं, एमवीए के शीर्ष नेताओं के बीच भी इस मामले को लेकर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं बन पाई है। अगर गठबंधन में यह असहमति बढ़ती है, तो एमवीए को इस चुनाव में कई जगहों पर नुकसान झेलना पड़ सकता है। अखिलेश यादव और अबू आजमी का कड़ा रुख और अपने दम पर चुनाव लड़ने की चेतावनी इस बात का संकेत है कि सपा अब इस मुद्दे पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।

50 दुर्गा प्रतिमाओं का होता था विसर्जन, इस बार 20 ही आईं, क्योंकि इस्लामी कट्टरंपथियों ने राम गोपाल मिश्रा को मार डाला: पुजारी ने बताया- किसी मूर्ति के हाथ थे टूटे तो किसी के पैर

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में 13 अक्टूबर को माँ दुर्गा की प्रतिमा विसर्जित करने जा रहे श्रद्धालुओं पर मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था। इसमें रामगोपाल मिश्रा नाम के शख्स की हत्या कर दी गई थी। यह विसर्जन यात्रा पारम्परिक थी, जो दशकों से चली आ रही थी। यात्रा गौरिया घाट पर जाकर समाप्त होना था, जो आसपास के हिन्दुओं के लिए पौराणिक काल से आस्था का केंद्र है।

ऑपइंडिया की टीम इस गौरिया घाट पर पहुँची और यहाँ के पुजारी कृष्ण कुमार मिश्रा से बात की। उन्होंने हमें बताया कि हर साल के मुकाबले इस बार का विसर्जन न सिर्फ फीका, बल्कि निराशाजनक रहा। जिस महराजगंज बाज़ार में मुस्लिम भीड़ ने बवाल काटा था, वहाँ से गौरिया घाट की दूरी लगभग डेढ़ किलोमीटर है। आसपास के लगभग 18 गाँवों व कस्बों का मूर्ति विसर्जन यहीं होता है।

इस जगह पर सरयू नदी से फूटी एक जलधारा है, जिसके पास एक मंदिर बना है। इस मंदिर का नाम नागेश्वरनाथ बालाजी मंदिर है। प्रतिमा विसर्जन के बाद श्रद्धालु यहाँ स्नान करके मंदिर में दर्शन करते हैं और फिर अपने-अपने घर की ओर लौट जाते हैं। जब ऑपइंडिया की टीम यहाँ पहुँची तो देखा कि रास्ते के दोनों तरफ पुलिस तैनात है। हमें रोक कर पूछताछ भी की गई।

विसर्जन के दिन सूना रहा घाट

नागेश्वरनाथ बालाजी मंदिर के पुजारी कृष्ण कुमार मिश्रा ने हमें बताया कि सामान्य तौर पर हर साल यहाँ लगभग 50 मूर्तियाँ विसर्जित होती हैं। लेकिन, इस साल विसर्जन की तय तिथि 13 अक्टूबर को एक भी मूर्ति घाट पर नहीं आई। विसर्जन देखने के लिए आसपास के गाँवों के लोग भी जमा होते हैं। वो भी काफी देर तक इंतजार किए। इस बीच पता चला कि महराजगंज बाजार में हमला हो गया है तो सभी लोग अपने घरों को वापस लौट गए।

किसी मूर्ति का हाथ टूटा था तो किसी का सिर

पुजारी कृष्ण कुमार मिश्रा हमें बताते हैं कि तय तिथि के एक दिन बाद 14 अक्टूबर को माँ दुर्गा की मूर्तियाँ विसर्जित होने के लिए घाटों पर आईं। इस बार विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं की संख्या 20-25 ही थी। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कई प्रतिमाएँ क्षतिग्रस्त थीं। कुछ के हाथ टूटे हुए थे तो किसी के पैर। पुजारी ने कहा, “लोगों (हमलावरों) ने वहाँ (महराजगंज बाजार) में तोड़ा था।”

सुबह 5 बजे विसर्जित हुईं इन मूर्तियों के साथ बड़ी संख्या में पुलिस बल भी चल रहा था और श्रद्धालुओं की संख्या न के बराबर थी। विधि-विधान पूरा करने के लिए कुछ पुजारी जरूर आए थे। 55 वर्षीय पुजारी मिश्रा ने आगे बताया कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में इतना नीरस विसर्जन कभी नहीं देखा था। उन्होंने कहा, “कोई उत्साह नहीं था। बस एक प्रक्रिया और औपचारिकता पूरी की गई।”

सात्विक खान-पान वाले हिन्दू पर उग्रता का आरोप निराधार

बहराइच में हुई हिंसा को वामपंथी व इस्लामी मीडिया संस्थानों द्वारा हिन्दुओं की उग्रता का परिणाम बताया। इन आरोपों को पुजारी मिश्रा ने निराधार बताया। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं का खानपान सात्विक है। वो वो उग्र कैसे हो सकता है? बकौल पुजारी, कट्टरता दूसरे पक्ष द्वारा शुरू की गई जिसकी वजह से हिंसा भड़की। उन्होंने बुलडोजर की कार्रवाई का समर्थन किया।

पुजारी मिश्रा ने हमलावरों के खिलाफ और कठोर कदम उठाने की माँग की। अपने मंदिर के आसपास तैनात पुलिस फ़ोर्स को पुजारी ने प्रशासन द्वारा एहतियातन किया गया सुरक्षा प्रबंध बताया। जिस गौरिया घाट पर माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन होना था, वहीं पर भगवान गणेश की भी मूर्तियाँ विसर्जित होती हैं। हर साल यहाँ मेला लगता है, जिसमें तमाम गाँवों के हिन्दू हिस्सा लेते हैं।

पुजारी कृष्ण कुमार बताते हैं कि साल 1992 में भी मुस्लिम पक्ष द्वारा विसर्जन यात्रा में खलल डालने की साजिश रची गई थी। हालाँकि, तब किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई थी। ऑपइंडिया से बातचीत में कुछ घायल बुजुर्ग श्रद्धालुओं ने भी साल 1992 में मुस्लिम पक्ष द्वारा तनाव फैलाने का आरोप लगाया गया। इस बार भी उन्होंने मुस्लिम पक्ष को ही जिम्मेवार माना।

जो वकील मुस्लिमों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने का पैरोकार, उस पर लगा जुर्माना सुप्रीम कोर्ट ने रोका: हाई कोर्ट ने ‘व्यवहार’ में पाया था खोट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 अक्टूबर 2024) को अधिवक्ता महमूद प्राचा के खिलाफ दिए गए इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर रोक लगा दी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महमूद प्राचा पर फोरम शॉपिंग करने और व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ता होने के बावजूद वकील की पोशाक और बैंड पहनकर इस मामले पर बहस करने पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया था।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयाँ की खंडपीठ ने कहा, “सीमित उद्देश्य के लिए नोटिस जारी करें कि याचिकाकर्ता के खिलाफ उच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों को क्यों न हटा दिया जाए और जुर्माना लगाने वाले आदेश को क्यों न रद्द कर दिया जाए। इस पर 09.12.2024 को जवाब दिया जाना चाहिए। इस बीच, जुर्माना लगाने की दिनांक 10.09.2024 के विवादित आदेश पर रोक रहेगी।”

दरअसल, प्राचा ने रामपुर लोकसभा सीट की पूरी चुनावी प्रक्रिया के वीडियो के सत्यापन की माँग करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया था। उन्होंने साल 2024 के आम चुनावों के दौरान एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष उनकी याचिका के आधार पर भारत के चुनाव आयोग द्वारा उन्हें ये वीडियो उपलब्ध कराए गए थे।

इस मामले पर 10 सितम्बर 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने प्राचा की एक याचिका पर सुनवाई की। हाई कोर्ट ने कहा था कि इसी मामले प्राचा दो याचिकाएँ दिल्ली हाई कोर्ट में पहले ही डाल चुके हैं और वहाँ उनकी इच्छा के अनुसार निर्देश भी कोर्ट दे चुका है। प्राचा ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णयों से संतुष्टि भी जताई थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि इसके बावजूद प्राचा ने फिर इसी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका ठोंक दी। हाई कोर्ट ने कहा था कि जब उनकी समस्या दिल्ली हाई कोर्ट से हल हो चुकी है तो आखिर वह इलाहाबाद में वैसी ही याचिका लेकर क्यों आए। कोर्ट ने कहा कि वह इसके पीछे का कारण समझ नहीं पा रहा कि एक ही विषय पर दो अलग अलग हाई कोर्ट में याचिका क्यों डाली गई।

कोर्ट ने कहा था, “यह अदालत याचिकाकर्ता द्वारा किए जा रहे इस बदलाव को समझ नहीं पा रही, जब याचिकाकर्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड में कहा था कि उसकी चिंता का समाधान हो चुका है। याचिकाकर्ता बीच रास्ते में कूद नहीं सकता नहीं ही अपना मन बदल सकता है, वह अपने मन से अपनी पसंद का मंच नहीं चुन सकता। अगर उन्हें समस्या थी तो वह एक बार फिर दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते थे क्योंकि मामला तो वही है।”

हाई कोर्ट ने समय खराब करने के अलावा प्राचा के व्यवहार पर भी सवाल उठाए। हाई कोर्ट ने कहा कि उसे फैसला सुनाने के बाद पता चला कि प्राचा खुद ही इस मामले में पेश हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अपने एक वकील के माध्यम से यह याचिका दायर की थी, ऐसे में वह खुद इस मामले में बहस नहीं कर सकते थे। इसके लिए उन्हें अपने वकील का नाम हटाना पड़ता, लेकिन उन्होंने ऐसा किए बिना ही बहस करना चालू कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा था कि प्राचा ने अपना कोट पर पहने जाने वाला बैंड बिना हटाए बहस की, जो सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें डेकोरम बना कर रखना चाहिए था। हाई कोर्ट ने प्राचा की याचिका इस सुनवाई के बाद खारिज कर दी और उन पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगा दिया। प्राचा को आगे उनके व्यवहार के लिए चेतावनी भी दी गई है।

कौन है महमूद प्राचा?

महमूद प्राचा दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है। दिल्ली दंगों में ये आरोपित मुस्लिम दंगाइयों का वकील है।

NDA के सत्ता में आने से पहले महमूद प्राचा की ऐसी तूती बोलती थी कि वो राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन और भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक (FSSAI) जैसी सरकारी संस्थाओं के लिए कोर्ट में पेश को चुका है। वो सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा का एडिशनल अधिवक्ता रहा है। साथ ही AIIMS दिल्ली का स्टैंडिंग काउंसल और दिल्ली लॉ स्कूल के छात्र संघ का अध्यक्ष रहा है।

जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

उसने 2004 में जम्मू कश्मीर के मसले में अमेरिका की मध्यस्तथा की माँग की थी, जबकि ये भारत का आंतरिक मामला है। महमूद प्राचा ‘भीम आर्मी’ से तो जुड़ा ही हुआ है, साथ ही ‘रावण’ को दरियागंज में हुई हिंसा के मामले में कोर्ट में डिफेंड भी कर चुका है। उसने मेवात के मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर भड़काऊ भाषण दिया था और CAA विरोधी आंदोलन को हवा दी थी। उसने तब खुलासा किया था कि पूरे बिहार में 1500 शाहीन बाग़ चल रहे हैं और इसमें मुस्लिम महिलाओं का सबसे ज्यादा योगदान है।

दिल्ली हाईकोर्ट में कपिल मिश्रा सहित अन्य भाजपा व संघ नेताओं के खिलाफ केस करने में उसका सबसे बड़ा हाथ था। साथ ही उसे NPR के खिलाफ भी मुस्लिमों को भड़काया था। उसने दावा किया कि असम में ‘बाहरी’ मारवाड़ियों ने पूरे व्यापार पर कब्जा कर रखा था, इसीलिए NRC लाई गई। उसने बड़े उद्योगपतियों पर RSS को लोन देने का आरोप लगाया और यहाँ तक दावा कर बैठा कि जिनका नाम NRC में नहीं आएगा, उनके बैंक एकाउंट्स के रुपए सरकार खा जाएगी।

उसने मुस्लिम बहुल इलाकों में घूम-घूम कर लाइसेंसी हथियारों की खरीद-बिक्री करने की सलाह दी थी और उन्हें ‘आत्मरक्षा’ के लिए हथियार रखने को कहा था। उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें।

महमूद प्राचा ने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। उसने मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।

अब भी टीम इंडिया नंबर 1, पर टेस्ट में 1 और हार बदल देगा गणित: जानिए न्यूजीलैंड की लगातार 2 जीत से कितना बदला WTC पॉइंट्स टेबल, फाइनल में कैसे पहुँचेगा भारत

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) के 2023-25 सत्र में भारतीय टीम की उम्मीदों को लगातार दूसरे टेस्ट में मिली हार ने बड़ा झटका दिया है। भारतीय टीम ने न्यूज़ीलैंड के खिलाफ पुणे में हुए दूसरे टेस्ट मैच में 113 रनों से हार का सामना किया, जो टीम के लिए इस सीरीज में दूसरी हार थी। न्यूज़ीलैंड के ऑलराउंडर मिचेल सैंटनर ने इस मुकाबले में कुल 13 विकेट लेकर भारतीय बल्लेबाजों को परेशानी में डाल दिया। न्यूज़ीलैंड से लगातार दो हार के बाद अब भारत के लिए फाइनल में पहुँचना मुश्किल हो सकता है, और टीम को अब बचे हुए मैचों में जीत दर्ज करनी होगी।

अंक तालिका में भारत की स्थिति और आगे का रास्ता

मौजूदा समय में भारत WTC पॉइंट्स टेबल में 62.82 प्रतिशत अंकों (PCT%) के साथ पहले स्थान पर है, जबकि ऑस्ट्रेलिया 62.50% के साथ दूसरे स्थान पर है। हालाँकि भारत अभी टॉप पर बना हुआ है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के साथ अब उसका अंतर काफी कम हो गया है। भारत को फाइनल में अपनी जगह पक्की करने के लिए शेष छह में से चार टेस्ट मैच जीतने होंगे।

भारत के पास न्यूज़ीलैंड के खिलाफ एक घरेलू मैच और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पाँच विदेशी मैच बचे हैं। टीम को अगर फाइनल में पहुँचना है, तो उसे न्यूज़ीलैंड के खिलाफ अंतिम मैच जीतना ही होगा और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कम से कम 3-2 का जीत हासिल करनी होगी। इससे भारत का PCT% बढ़कर लगभग 64.04% हो सकता है, जिससे उसकी स्थिति फाइनल में पहुँचने के लिए मजबूत हो जाएगी। लेकिन अगर भारत न्यूज़ीलैंड के खिलाफ अंतिम मैच हारता है तो स्थिति और कठिन हो सकती है।

अन्य टीमों की स्थिति जानिए

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुँचने की दौड़ में पाँच टीमें शामिल हैं, जिनमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका प्रमुख हैं।

ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया अभी दूसरे स्थान पर है। अब ऑस्ट्रेलिया अगर श्रीलंका के खिलाफ अपने बचे हुए दो मैचों में 2-0 से जीतता है, तो उसका PCT% 60.53% तक पहुँच सकता है। अगर वह भारत को 3-2 से हरा दे, तो भी भारत को फाइनल में पहुँचने के लिए अन्य मैचों में अच्छा प्रदर्शन करना होगा।

न्यूज़ीलैंड: अगर न्यूज़ीलैंड भारत के खिलाफ अंतिम मैच हार जाता है और इंग्लैंड के खिलाफ 3-0 से जीत दर्ज करता है, तो उसका PCT% 57.14% तक जा सकता है। ऐसे में भारत के लिए न्यूज़ीलैंड के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण होगा।

दक्षिण अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका इस समय पाँचवें स्थान पर है और उसे अपने शेष पाँच मैच जीतने होंगे ताकि उसका PCT% 61.11% तक पहुँच सके। अगर वह ऐसा करने में सफल होता है, तो वह भारत को चुनौती दे सकता है।

श्रीलंका: श्रीलंका भी अपनी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और उसके पास 55.56% PCT% है। हालाँकि, उसे भी कई जीतें दर्ज करनी होंगी ताकि वह फाइनल की दौड़ में बना रह सके।

फाइनल में पहुँचने के लिए भारत को क्या करना होगा?

भारत को न्यूज़ीलैंड के खिलाफ आखिरी टेस्ट जीतना अनिवार्य होगा। इसके बाद, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया में होने वाली टेस्ट सीरीज में भी कम से कम 3-2 से जीत दर्ज करनी होगी। यदि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत को 2-2 का परिणाम मिलता है, तो उसका PCT% 60.53% रहेगा, जो ऑस्ट्रेलिया के संभावित 62.28% से कम होगा।

हालाँकि, अगर अन्य टीमों के प्रदर्शन में कमी आती है, तो भारत के पास थोड़ी राहत मिल सकती है। उदाहरण के लिए, यदि न्यूज़ीलैंड इंग्लैंड के खिलाफ 2-0 से हारता है या दक्षिण अफ्रीका अपने बचे हुए मैचों में से एक मैच हारता है, तो भारत की फाइनल में पहुँचने की संभावना बढ़ जाएगी।

भारत के लिए वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में पहुँचने की राह अब कठिन होती दिख रही है। टीम को अब अगले मैचों में लगातार जीत हासिल करनी होगी और अन्य टीमों के प्रदर्शन पर भी नजर रखनी होगी।

‘जाति-भाषा का भेद करेंगे तो हम कटेंगे’: CM योगी के ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ को RSS का समर्थन, कहा- लव जिहाद से बच्चियों को बचाना होगा, वक्फ संशोधन पर सरकार के साथ

उत्तर प्रदेश के मथुरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की वार्षिक बैठक शनिवार (26 अक्टूबर 2024) को समाप्त हो गई। इस दौरान संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लगभग 30 घंटे तक औपचारिक मुलाकात की और कुंभ सहित कई मुद्दों पर चर्चा की। RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसकी जानकारी दी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ वाले बयान का समर्थन किया। दत्तात्रेय होसबोले ने कहा, “कटेंगे तो बँटेंगे का मतलब है कि हिंदू समाज में एकता नहीं रहेगा तो… इतिहास कहता है कि ‘हिन्दू भाव को जब-जब भूले आई विपदा महान, भाई छूटे धरती खोई मिटे धर्म संस्थान’। आजकल की भाषा में कटेंगे तो बँटेंगे हो सकता है।”

उन्होंने कहा, “हम जाति, भाषा और प्रांत का भेद करेंगे तो हम कटेंगे। इसलिए एकता आवश्यक है किसी भी राष्ट्र के लिए। राष्ट्रीय एकता अगर सिर्फ उपदेश रहता तो हो जाता, लेकिन इसके लिए प्रयत्न करना पड़ता है। आज लोग इसकी आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। हिंदू एकता लोक कल्याण के लिए है। खुद को बचाए रखने और दुनिया के मंगल के लिए हम हिंदू एकता चाहते है। इसमें कोई दो राय नहीं है।”

RSS के वरिष्ठ नेता होसबोले ने कहा कि हाल के दिनों में गणेश पूजा के दौरान हिंदू समाज पर हमले भी हुए। ऐसे हिंदू समाज को खुद की रक्षा भी करनी चाहिए और समाज एवं पुरुषार्थ से संगठित होकर रहना चाहिए। विश्व कल्याण के लिए कार्य के लिए आसपास शांति रहनी चाहिए। संघ ऐसे भी काम में लगा हुआ है। समाज के समाने आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए हमने उपायों पर हमने विचार किया है।

उन्होंने जाति की राजनीति करने वाले राजनेताओं पर भी बना नाम लिए कटाक्ष किया। दत्तात्रेय होसबोले ने कहा, “हिंदुओं को तोड़ने के लिए शक्तियाँ काम कर रही हैं। वो कई प्रकार की शक्तियाँ हैं। वो हिंदुओं की जाति के नाम तोड़ेंगे। विचारधारा के नाम पर तोड़ेंगे। प्रांत के नाम पर तोड़ेंगे। भाषा के नाम पर तोड़ेंगे। किसी और नाम पर तोड़ेंगे। उसके लिए सावधानी रखनी जरूरी है।”

सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ सीएम योगी के मुलाकात पर होसबोले ने कहा, “माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी भी यहाँ आए थे। पूजनीय सरसंघचाक जी के साथ 20-25 मिनट तक बैठक भी हुई। अखिल पदाधिकारी सब के साथ बैठे। इस दौरान आने वाले कुंभ मेले के आयोजन को लेकर चर्चा हुई। पिछले कुंभ की बहुत प्रशंसा भी हुई थी।”

होसबोले ने आगे कहा, “माननीय मुख्यमंत्री जी ने कहा कि उस वर्ष कुंभ आयोजन के दौरान हमें एक साल ही हुए थे सत्ता में आए हुए। अब तो प्रशासन का अनुभव भी हो गया है। इसलिए इस कुंभ को पिछले से भी अधिक सार्थक और यशस्वी बनाने के लिए हमने कई योजनाएँ बनाई हैं। उन्होंने प्रस्तावित योजनाओं को बारे में बात की, जिसमें गंगा को लेकर बात थी।”

वक्फ संशोधन विधेयक पर RSS

वक्फ संशोदन बिल को लेकर कहा कि आने वाले सत्र में सरकार अपना काम करेगी। पत्रकार के सवाल को संबोधित करते हुए होसबोले ने कहा, “जैसा कि आपने कहा कि कर्नाटक में पूरे गाँव को वक्फ भूमि घोषित किया गया है तो यह साल 2013 तक इसमें विशेष समस्या नहीं थी। 1991 के बाद साल 2013 में इसमें संशोधन किए गए। उसको (वक्फ) को असीमित अधिकार दे दिए। डीएम भी कुछ नहीं कर सकता। भारत जैसे स्वतंत्र देश के अंदर एक स्वतंत्र ईकाई हो गई, जो वह कहेगा वही होगा।”

यूपीए सरकार की नीति का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि टारगेटेड वॉयलेंस के बारे में उस समय के यूपीए सरकार की NAC की सलाह पर एक बिल लाया गया था। उसमें क्या था? ये सारे कुछ एक विशेष साजिश के तहत एक के बाद एक करके ये सारे विचार लाने का प्रयत्न हुआ था। ऐसा नहीं है कि अचानक कुछ हुआ। इसे तो ठीक करना ही पड़ेगा।”

होसबोले ने कहा कि वक्फ संशोधन बिल का हिंदू-मुस्लिम से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा, “यहाँ बात हिंदू-मुस्लिम का नहीं है। मुस्लिमों के कई समुदाय वक्फ की ज्यादती और अन्याय से पीड़ित हैं। इसलिए वो भी इसमें सुधार की माँग कर रहे हैं। तो देश की भावना के अनुसार इसमें संशोधन या जो कुछ जरूरी हुआ वो करना ही पड़ेगा।”

लव जिहाद और धर्मांतरण पर संघ का साथ

देश में बढ़ रही लव जिहाद और धर्मांतरण की घटनाओं से जुड़े सवाल पर भी उन्होंने जवाब दिया। सरकार्यवाह ने कहा, “लव जिहाद को लेकर संघ पिछले 25 साल से काम कर रहा है। संघ के स्वयंसेवक विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के माध्यम से अपना काम कर रहे हैं। संघ सीधा इसमें शामिल नहीं होता। वह स्वयंसेवक का निर्माण करता है। लेकिन, अगर जिहाद हो रहा है तो समाज के लिए समस्या हो रही है।”

इस मामले में समाज को जागरूक करने की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा, “हमें अपने बच्चियों, लड़कियों, किशोरियों, युवतियों को बचाना है। केरल में लगभग 200 युवतियों को बचाने का काम हुआ। कई युवतियाँ चली भी गई थीं, लेकिन वो वापस आईं। उनका पुनर्वास करने वाली एक संस्था को संघ ने अपना पूरा समर्थन दिया। इन युवतियों ने अन्य युवतियों को सावधान करने के लिए काम करना शुरू किया है।”

उन्होंने कहा, “धर्मांतरण को लेकर विभिन्न हिंदू संगठन के लोग अपना काम कर रहे हैं। इसमें संघ का सहयोग है। मतांतरण असल में राष्ट्रांतरण है। मतांतरित लोगों की घरवापसी का काम चल रहा है। इसमें विभिन्न संगठन और स्वयंसेवक लगे हुए हैं। हम अपने समाज के लोगों के साथ भेदभाव ना करें। अभावग्रस्त लोगों को बताना पड़ता है कि समाज आपके साथ है, आपको मत परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है।”

बांग्लादेश के हिंदुओं को संघ का समर्थन

दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की रक्षा होनी चाहिए, उनके सम्मान की रक्षा होनी चाहिए। संघ से जुड़े विभिन्न संगठनों एवं स्वयंसेवकों ने इस मुद्दे को यूरोप से लेकर अमेरिका तक में उठाया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के लोग भी वहाँ के अभावग्रस्त हिंदुओं के लिए आगे आ रहे हैं। इसमें संघ भी अपनी भूमिका निभा रहा है।

बांग्लादेश को हिंदुओं की भी भूमि बताते हुए होसबोले ने कहा कि हिंदू समाज को वहाँ से पलायन नहीं करना चाहिए। उन्हें वहीं डटे रहना चाहिए। वे बांग्लावासी हैं। ये उनकी भूमि है। भारत का 1947 में विभाजन हो गया। पाकिस्तान से अलग होकर 1971 में वो अलग देश भी बना। उन्होंने कहा, “वहाँ हमारा शक्तिपीठ है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उस हिस्से का बड़ा योगदान है। इसलिए हिंदू को वहीं रहना चाहिए।”

संघ में नंबर दो की हैसियत रखने वाले दत्तात्रेय ने संघ की देश भर में हो रहे विस्तार की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि इस साल विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश किया है। वह 99 वर्ष पूरे कर चुका है। अगले विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 पूरे होने पर देश भर में कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे।

देश भर में शाखाओं के विस्तार को लेकर उन्होंने कहा, “इस वर्ष देश भर में 3,626 जगहों पर शाखाएँ बढ़ी हैं। 6,645 शाखाएँ इस साल बढ़ी हैं। इस समय देश भर के 4,5411 जगहों पर 72,354 शाखाएँ लग रही हैं।” उन्होंने बताया कि आगे अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का फोकस समाज में समरसता और भाईचारा बढ़ाने पर रहेगा।

‘ये वामपंथी प्रोपेगेंडा प्लेटफॉर्म बन गया है, डोनेशन न दें’: एलन मस्क ने विकिपीडिया को घेरा, इजरायल-भारत विरोधी प्रचार में था शामिल

टेक इंडस्ट्री के दिग्गज और एक्स (पूर्व में ट्विटर) के मालिक एलन मस्क ने एक बार फिर विकिपीडिया पर हमला बोला है। मस्क का आरोप है कि विकिपीडिया अब कट्टर वामपंथियों के प्रभाव में है, जिससे यह एक स्वतंत्र जानकारी के मंच के बजाय एक प्रोपेगेंडा प्लेटफार्म बन गया है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि लोग इसे डोनेशन देना बंद करें।

यह विवाद तब और बढ़ गया, जब ‘पाइरेट वायर्स’ की एक रिपोर्ट ने दावा किया कि विकिपीडिया के लगभग 40 संपादकों ने ‘प्रो-हमास’ विचारधारा का समर्थन करने वाले अभियान को आगे बढ़ाया और इजरायल को ‘अवैध’ दिखाने का प्रयास किया। मस्क के इस बयान के बाद बहुत सारे लोगों ने सोशल मीडिया पर उनका समर्थन किया। कुछ लोगों ने मस्क का समर्थन करते हुए कहा कि विकिपीडिया का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर बढ़ रहा है।

यह पहली बार नहीं है जब मस्क ने विकिपीडिया पर हमला बोला है। पिछले साल भी मस्क ने इसके संस्थापक जिमी वेल्स से तकरार के समय हुए इसे ‘डिकिपीडिया’ नाम देकर तंज भी कसा और कहा कि अगर वो नाम बदल देते हैं, तो वो विकिपीडिया को 1 अरब डॉलर का दान देंगे।

विकिपीडिया के भारतीय संदर्भ में भी विवाद बढ़ रहे हैं, खासकर जब दिल्ली हाई कोर्ट ने इसे भारतीय कानूनों का पालन न करने पर चेतावनी दी है। हाई कोर्ट का कहना था कि अगर विकिपीडिया भारत में अपनी नीतियों का पालन नहीं कर सकता, तो उसे यहाँ अपना संचालन बंद कर देना चाहिए।

ऑपइंडिया की एक स्पेशल रिपोर्ट में भी विकिपीडिया पर ‘कट्टर वामपंथी’ पूर्वाग्रह का आरोप साबित हुआ है। इस रिपोर्ट के अनुसार, विकिपीडिया का कंटेंट भारत और हिंदू विरोधी रुझानों को बढ़ावा दे रहा है और इसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से वित्तीय सहायता मिलती है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट में 186 पन्नों का डोजियर भी शामिल है, जिसमें दावा किया गया है कि विकिपीडिया का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर है, जो भारत के हितों के खिलाफ काम करता है।

इस डोजियर में पाया गया है कि विकिपीडिया के कई संपादक और प्रशासक वामपंथी संगठनों से जुड़े हैं। वे अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए दक्षिणपंथी स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करते हैं और भारत के विरुद्ध पूर्वाग्रह से ग्रसित सामग्री को प्रमोट करते हैं। विकिपीडिया के सह-संस्थापक लैरी सेंगर ने भी इस पर अपनी चिंताओं को व्यक्त करते हुए कहा है कि विकिपीडिया में वामपंथी पूर्वाग्रह है। विकिमीडिया फाउंडेशन को Open Society Foundation और Rockefeller Foundation जैसी संस्थाओं से वित्तीय सहायता मिलती है, जो वामपंथी एजेंडे को बढ़ावा देते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि फेसबुक भी ऑपइंडिया के इस डोजियर को साझा करने से रोक रहा है। ऑपइंडिया के पाठकों ने शिकायत की है कि जब वे फेसबुक पर लिंक शेयर करते हैं, तो उसे हटा दिया जाता है। ऑपइंडिया का कहना है कि फेसबुक इस रिपोर्ट को साझा करने की अनुमति नहीं दे रहा है क्योंकि यह वामपंथी प्रभावों के खिलाफ सबूत पेश करती है। ऐसे में ये साफ है कि फेसबुक और विकिपीडिया जैसे प्लेटफार्म वामपंथी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं।

बहरहाल, भारत में चल रहे कोर्ट केसों के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत में विकिपीडिया और इसके संपादकों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है और क्या इसे भारतीय कानूनों का पालन करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

3 साल की उम्र से जिसे पढ़ाता था अब्दुल हाफिज, उसी से बनाने लगा यौन संबंध: गर्भवती होने पर निकाह से मुकरा, पीड़िता से बोला- किसी को कुछ बताया तो कुरान भूल जाओगी

बिहार के सुपौल में 16 साल की नाबालिग को गाँव के ही इमाम ने 6 माह की गर्भवती कर दिया। लड़की 3 साल की उम्र से उसके पास पढ़ने के लिए जाती थी, लेकिन वो पिछले कई महीनों से उसका यौन शोषण करने लगा था। आरोपित इमाम का नाम अब्दुल हाफिज है। उसने लड़की से निकाह का वादा भी किया था, लेकिन गर्भवती होने के बाद मुकर गया। यही नहीं, वो लड़की को डराया था कि अगर उसने ये बात किसी को बताई, तो वो कुरान भूल जाएगी। अब उसकी सास साजदा खातून और साला मोहम्मद शाहिद पीड़िता और उसके परिवार को धमका रहे हैं कि वो निकाह की बात भूल ही जाए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज थाना क्षेत्र की इस घटना में पीड़िता की माँ ने थाने में शिकायत दर्ज कराई। पीड़िता 3 साल की उम्र से ही आरोपित इमाम अब्दुल हाफीज के पास पढ़ती रही है। वो घर भी आता-जाता रहा है। 19 अप्रैल 2024 को अब्दुल हाफिज ने पीड़िता को उसके ही घर में बहला-फुसला कर संबंध बनाया। उसे परीक्षा पास कराने का भी लाचत दिया। इसके बाद से वो लगातार पीड़िता के साथ संबंध बनाने लगा। अब पीड़िता 6 माह की गर्भवती है।

गर्भवती होने पर खुला मामला

इस पूरे घटनाक्रम के बाद पीड़िता के गर्भवती होने की बात सामने आई, जिससे परिवार को पता चला कि उनकी बच्ची के साथ लगातार अन्याय हो रहा है। आरोपित इमाम पहले से शादीशुदा है और उसके दो बच्चे भी हैं। पीड़िता की माँ ने कहा कि अब्दुल हाफिज उनकी बेटी को निकाह का झांसा देता रहा, लेकिन गर्भवती होने के बाद उसने निकाह करने से मना कर दिया।

किसी को बताया तो भूल जाओगी कुरान, होगी बदनामी

पीड़िता के पिता ने बताया कि इमाम अब्दुल हाफिज ने निकाह का झांसा देने के साथ ही लड़की को बदनामी से बचने के लिए किसी को भी घटना की जानकारी नहीं देने का दवाब बनाया। साथ ही कहा कि अगर वह इसके बारे में किसी को भी जानकारी देती है तो कुरान भूल जाएगी। पिता ने आशंका जताई है कि आरोपित इमाम उसके परिवार के साथ कभी भी किसी अप्रिय घटना को अंजाम दे सकता है।

साला और सास भी दे रहे अंजाम भुगतने की धमकी

पीड़िता की माँ का आरोप है कि इमाम का साला मोहम्मद शाहिद और सास साजदा खातून बदमाश प्रवृत्ति के हैं। दोनों खुलेआम धमकी दे रहे हैं कि अगर इमाम पर पीड़िता से शादी का दवाब बनाया तो इसका अंजाम भुगतना होगा। पीड़िता के माता-पिता ने मामले की जाँच और कड़ी कार्रवाई की माँग की है। इस मामले में एफआईआर 431/24 दर्ज जाँच की जा रही है।

त्रिवेणीगंज के थानाध्यक्ष रामसेवक रावत ने कहा कि पीड़िता की माँ की शिकायत के आधार पर केस दर्ज कर लिया गया है। पुलिस ने पीड़िता का मेडिकल जाँच करवाया और उसका बयान भी कोर्ट में दर्ज कराया है। घटना की जानकारी मिलने के बाद इमाम अब्दुल हाफिज फरार हो गया और अब पुलिस उसकी तलाश में जुटी हुई है।

‘कु#त्ते जैसी है मीडिया’: CPM नेता कृष्णदास के विवादित बयान पर मचा बवाल, विपक्षियों ने घेरा, अपनी पार्टी के नेता भी झाड़ रहे पल्ला

सीपीएम के केरल राज्य समिति के सदस्य एनएन कृष्णदास ने मीडिया को लेकर विवादास्पद टिप्पणी की है। उन्होंने पत्रकारों की तुलना कुत्ते और गिद्धों से की। कृष्णदास ने कहा कि मीडिया वाले ऐसे घूम रहे हैं, जैसे कसाई की दुकान के बाहर कुत्ते घूमते हैं। वे गिद्धों की तरह माइक लेकर आते हैं। इसको लेकर उनकी तीखी आलोचना हो रही है। हालाँकि, उन्होंने माफी माँगने से इनकार कर दिया।

कृष्णदास ने कहा, “मीडिया सुबह से ही कसाई की दुकान के बाहर घूमने वाले कुत्तों की तरह घूम रहा है। अगर वे गिद्धों की तरह माइक लेकर आएँ तो मैं जवाब नहीं दे सकता।” उनके इस बयान पर विपक्ष से लेकर मीडिया तक में उनकी आलोचना हो रही है। हालाँकि, तमाम आलोचना के बावजूद कृष्णदास अपनी बात पर अड़े हैं और कहा कि उन्होंने जो भी कहा, वो सोच-समझकर कहा।

अपने बचाव में कृष्णदास ने कहा, “मैंने सोच-समझकर और अच्छे इरादे से बात की। (अब्दुल) शुक्कूर के घर पर बड़ी भीड़ जमा हो गई थी, जिससे असुविधा हो रही थी। मीडिया का उद्देश्य रिपोर्ट करना नहीं था, बल्कि कहानी को दक्षिणपंथी पक्ष की ओर मोड़ना था। मैं अच्छे इरादे से कही गई अपनी बात पर कायम हूँ।” मीडिया को दक्षिणपंथी बताते हुए उन्होंने माफी माँगने से इनकार कर दिया।

वहीं, सीपीएम पोलित ब्यूरो के सदस्य ए विजयराघवन ने कहा कि पार्टी को मीडिया से कोई शिकायत नहीं है। उन्होंने कहा कि मीडिया समाज में एक लोकतांत्रिक संस्था के रूप में कार्य करता है। हालाँकि, बचाव में उन्होंने यह भी कहा कि वामपंथ की आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन जब गलतियाँ सामने आती हैं तो प्रतिक्रिया देना भी स्वाभाविक है।

वहीं, कृष्णदास के बयान के बाद सीपीएम बैकफुट पर आती दिख रही है। इस विवाद के बाद सीपीएम के राज्य सचिव एमवी गोविंदन ने कहा कि रचनात्मक आलोचना उचित भाषा का इस्तेमाल करके की जानी चाहिए। गोविंदन ने कहा कि कड़ी आलोचना को भी अच्छी भाषा में ही व्यक्त किया जाना चाहिए।

केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल के लिए कृष्णदास की आलोचना की। कॉन्ग्रेस नेता सतीशन ने कहा, “कृष्णदास की टिप्पणी सीपीएम की भाषा को दर्शाती है। मीडिया केवल अपना काम कर रहा था।” पलक्कड़ यूडीएफ उम्मीदवार राहुल ममकूटथिल ने कहा कि पत्रकारों की तुलना कसाई के दुकानों के बाहर घूमने वाले कुत्तों से करना ठीक नहीं है।

दरअसल, केरल के पलक्कड़ के पूर्व क्षेत्र समिति सदस्य अब्दुल शुक्कूर ने सीपीएम छोड़ने की घोषणा की थी। इसके बाद मीडिया उनके बयान को लेकर उनके बयान दर्ज करना चाहती थी। इस बीच शुक्कूर सीपीएम राज्य समिति के सदस्य एनएन कृष्णदास के साथ एलडीएफ सम्मेलन स्थल पर आए और मीडिया को लेकर उन्होंने यह बयान दे दिया।