वक्फ बोर्ड संशोधन बिल पर बनाई गई संयुक्त संसदीय कमिटी (JPC) की बैठक में एक बार फिर बवाल हो गया। नई दिल्ली में मंगलवार (22 अक्टूबर, 2024) को आयोजित इस बैठक में TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने गुस्से में काँच की बोतल पटक खुद को ही घायल कर लिया। कल्याण बनर्जी को इस बर्ताव के चलते JPC की अगली बैठक से निलंबित कर दिया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार को भाजपा सांसद जगदम्बिका पाल की अध्यक्षता वाली JPC बैठक कर रही थी। यह बैठक पूर्व जजों और वकीलों का वक्फ संशोधन अधिनियम पर पक्ष जानने को लेकर हो रही थी। JPC की इस बैठक में विपक्ष और पक्ष, दोनों के सांसद शामिल थे।
Scuffle broke out during the Waqf JPC meeting in Parliament. According to eyewitnesses to the incident, TMC MP Kalyan Banerjee picked up a glass water bottle kept there and hit it on the table and hurt himself by accident: Sources
इसी बैठक के दौरान TMC सांसद कल्याण बनर्जी की भाजपा सांसद और पूर्व जज अभिजीत गंगोपाध्याय से किसी मुद्दे को लेकर तीखी बहस हो गई। इसके बाद कल्याण बनर्जी ने अपना आपा खो दिया और मेज पर मुक्का दे मारा। इसके बाद भी जब उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उन्होंने सामने रखी काँच की बोतल तोड़ दी।
यह बोतल तोड़ने के चक्कर में वह घायल हो गए और अपने बाएँ हाथ की छोटी उंगली और अँगूठे को चोटिल कर लिया। काँच लगने के कारण उनके हाथ में खून निकलने लगा। इसके बाद उन्हें मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया। बताया गया है कि उन्हें 4 टाँके लगे हैं। कल्याण बनर्जी को इसके बाद साथी सांसद बैठक से बाहर लेकर चले गए।
JPC की बैठक में पूर्व जजों और वकीलों को बुलाए जाने समेत बाकी कई मुद्दों पर पक्ष और विपक्ष के सांसदों के बीच बहस हुई। रिपोर्ट्स में कहा गया कि विपक्षी सांसदों ने इस बात पर ऐतराज जताया कि वक्फ बिल के लिए आखिर जज और वकील क्यों बुलाए जा रहे हैं। बैठक में AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी से भी नोकझोंक की बात कही जा रही है।
कल्याण बनर्जी के खुद को चोट को लगाने के बाद यह बैठक रोक दी गई। कल्याण बनर्जी को बाहर इलाज के लिए लाया गया है। कल्याण बनर्जी इससे पहले देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की नक़ल करते हुए मजाक उड़ाने को लेकर विवादों में आए थे।
वक्फ पर बनाई गई JPC की बैठक में विपक्षी सांसदों का बवाल करने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले हुई मीटिंग में कर्नाटक अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन द्वारा कौन्र्गेस अध्य्स्ख मल्लिकार्जुन खरगे के वक्फ की जमीन पर कब्जा करने की बात को लेकर भी बवाल हो गया था। विपक्षी सांसदों ने तब मीटिंग का बहिष्कार कर दिया था।
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के संजौली इलाके में बनी अवैध संजौली मस्जिद को तोड़ने का काम चालू कर दिया गया है। संजौली मस्जिद को तोड़ने का काम मस्जिद की कमिटी ही कर रही है। इसी मस्जिद को लेकर शिमला में बीते लगभग 2 माह से बवाल हो रहा है। इस मस्जिद को नगर निगम के आदेश के बाद तोड़ा जा रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, संजौली मस्जिद को सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) को तोड़ना चालू किया। इसको तोड़ने के लिए मस्जिद कमिटी ने हिमाचल प्रदेश वक्फ बोर्ड से अनुमति भी माँगी थी। मस्जिद कमिटी को सोमवार सुबह को ही यह आदेश मिला। बोर्ड ने कमिटी को 3 मंजिले तोड़ने का आदेश दिया है।
मस्जिद कमिटी के मुखिया मोहम्मद लतीफ़ अपनी देखरेख में यह निर्माण तुड़वा रहे हैं। सबसे पहले मस्जिद की छत हटाई जा रही है। मोहम्मद लतीफ़ का कहना है कि इस निर्माण को सिरे से हटाने में काफी समय लगेगा क्योंकि जल्दी गिराने के कमिटी के पास पैसे नहीं है।
दूसरी तरफ मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने कहा है कि यदि कमिटी को मस्जिद तोड़ने में कोई दिक्कत आ रही है तो वह नगर निगम को पत्र लिख कर सहायता माँग सकते हैं। संजौली मस्जिद को नगर निगम शिमला ने 5 अक्टूबर, 2024 को तोड़ने का आदेश दिया था।
यह आदेश मस्जिद कमिटी के आवेदन पर ही दिया था। इस अवैध मस्जिद का निर्माण 2010 से हो रहा था। तब से लगातार नगर निगम शिमला इसे नोटिस भेज रहा था लेकिन इसका निर्माण नहीं रोका गया और पाँच मंजिले खड़ी कर दी गईं। सितम्बर, 2024 में मस्जिद को लेकर विवाद चालू होने से पहले तक इस मस्जिद को 38 नोटिस भेजे जा चुके थे।
जब सितम्बर, 2024 में एक स्थानीय युवक के साथ मारपीट की खबर के बाद संजौली मस्जिद के विरुद्ध प्रदर्शन चालू हुए तो सब पिटारा बाहर आया। इसके बाद मस्जिद कमिटी ने विरोध प्रदर्शन बढ़ता देख इसे गिराने की बात कह दी। इसको लेकर उन्होंने खुद ही आवेदन दिया।
संजौली मस्जिद को जल्दी गिराए जाने को लेकर मुस्लिमों में दो फाड़ भी हो चुका है। 9 अक्टूबर, 2024 को मुस्लिमों के एक संगठन ने बैठक कर मस्जिद गिराए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट जाने की बात कही थी। हालाँकि, संजौली मस्जिद कमिटी ने ऐसी किसी बात से इनकार किया था।
वहीं इस मामले में जल्द कार्रवाई के लिए स्थानीय नागरिक भी हाई कोर्ट पहुँचे थे। हाई कोर्ट ने नगर निगम आयुक्त कोर्ट को इस मामले में 8 सप्ताह के भीतर फैसला लेने को कहा है। संजौली मस्जिद के अलावा मंडी मस्जिद को भी गिराए जाने का आदेश दिया गया है। हालाँकि, इस पर कार्रवाई अभी चालू नहीं हुई है।
उत्तर प्रदेश में “साइबर फ्रॉड” से जुड़ा नया मामला सामने आया है, जिसे ‘सिम जिहाद’ कहा जा रहा है। इसमें मुस्लिम समुदाय के अपराधी हिंदुओं के नाम से बैंक खाते खोल रहे हैं, सिम कार्ड एक्टिवेट कर रहे हैं, और फिर उन्हें नूहँ और मेवात के साइबर ठगों को बेच रहे हैं। इन सिमों का इस्तेमाल साइबर अपराधों के लिए किया जा रहा है, जिससे धोखाधड़ी के कई मामले सामने आ रहे हैं। इस ‘सिम जिहाद’ का खुलासा शाहरुख नाम के अपराधी के पकड़े जाने के बाद हुआ, जिसमें उसके पास से हिंदुओं की आईडी का इस्तेमाल कर निकलवाए गए सिम, बैंक खातों की जानकारियाँ और एटीएम कार्ड बरामद हुए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपी एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) ने इस नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए शाहरुख खान को गिरफ्तार किया है। यूपी एसटीएफ की आगरा यूनिट ने सूचना के आधार पर बुधवार (16 अक्टूबर 2024) रात को केंद्रीय हिंदी संस्थान रोड, खंदारी इलाके से एक कार रोकी, जिसमें दो लोग सवार थे। टोकने पर एक व्यक्ति फरार हो गया, जबकि दूसरे को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार व्यक्ति की पहचान शाहरुख खान के रूप में हुई, जो अछनेरा का निवासी है। पुलिस ने उसके पास से 10 एक्टिवेटेड सिम कार्ड और 14 बैंक खातों के एटीएम कार्ड बरामद किए।
शाहरुख कबाड़ का काम करता है, लेकिन साइबर क्रिमिनल गैंग के संपर्क में आकर उसने सिम और बैंक खाते उपलब्ध कराना शुरू कर दिया था। उसके दिल्ली में रहने वाले भाई एमके और मेवात, हरियाणा में रिश्तेदारों की वजह से उसने इस गैंग के साथ अपराधों में शामिल होना शुरू किया। शाहरुख अपने साथी मथुरा निवासी तेजवीर के साथ मिलकर आगरा और मथुरा के ग्रामीण इलाकों से मजदूर वर्ग के लोगों को पैसे का लालच देकर उनके नाम पर सिम और बैंक खाते खुलवाता था। इन बैंक खातों और सिमों का इस्तेमाल साइबर अपराधी यूपीआई आईडी और व्हाट्सएप कॉल के जरिए ठगी के लिए करते थे।
शाहरुख और उसके साथी ग्रामीण इलाकों के कम पढ़े-लिखे और मजदूर वर्ग के लोगों को लालच देकर उनके नाम पर सिम और बैंक खाते खुलवाते थे। ये लोग 2 से 5 हजार रुपये की मामूली रकम लेकर अपनी आईडी पर सिम और खाते खुलवाने के लिए तैयार हो जाते थे। शाहरुख और उसके साथी इन खातों, सिमों को 50 हजार रुपए में साइबर ठगों को बेचा करते थे। इन सिमों को साइबर अपराधी ठगी के लिए इस्तेमाल करते थे। खासतौर पर इन सिम कार्डों को यूपीआई पेमेंट धोखाधड़ी और फर्जी व्हाट्सएप कॉल्स के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। साइबर अपराधी इन खातों में ठगी की रकम ट्रांसफर कराते थे, जिसे बाद में एटीएम या ऑनलाइन बैंकिंग के जरिए निकाल लिया जाता था।
इस मामले में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई, जब एसटीएफ ने व्हाट्सएप चैट्स की जाँच की। यह पता चला कि साइबर अपराधी विशेष रूप से एक धर्म (हिंदुओं) के लोगों की आईडी पर सिम और खाते खरीद रहे थे। उनका उद्देश्य था कि अगर पुलिस जाँच करे, तो उनके मजहब के लोगों पर कोई कार्रवाई न हो और सारी मुसीबतें दूसरे धर्म (हिंदू) के लोगों पर आएँ। शाहरुख के मोबाइल से मिले संदेशों में यह बात सामने आई कि साइबर अपराधी खासतौर पर ऐसे सिम और खाते माँगते थे जो दूसरे धर्म के लोगों के नाम पर हों, ताकि खुद को बचाया जा सके।
एसटीएफ आगरा यूनिट के इंस्पेक्टर यतेंद्र शर्मा ने बताया कि दिल्ली और मेवात में सक्रिय साइबर अपराधियों को आगरा से सिम कार्ड सप्लाई किए जा रहे थे। पुलिस को सूचना मिली थी कि सिम कार्ड फर्जी आईडी पर खरीदे जा रहे हैं और इन्हें ठगी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शाहरुख खान और उसके साथी तेजवीर इस साजिश में शामिल थे और कम पढ़े-लिखे लोगों को लालच देकर उनके नाम से सिम और बैंक खाते खुलवा रहे थे।
इस नेटवर्क के कारण आगरा में कई लोग साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं। एक शिक्षिका की साइबर ठगों की धमकी के बाद मौत हो गई, जबकि दूसरी शिक्षिका से लाखों रुपये की ठगी हो चुकी है। यह मामला साइबर अपराधों की गंभीरता को दर्शाता है, जिसमें निर्दोष लोग फंस रहे हैं। पुलिस अब शाहरुख के फरार साथी तेजवीर की तलाश में जुटी है, जो इस अपराध में शामिल था और सिम सप्लाई करता था। मथुरा में पुलिस ने तेजवीर के ठिकानों पर छापे भी मारे, लेकिन वह अब तक फरार है।
आगरा और इसके आसपास के इलाकों में साइबर अपराध पहले भी सामने आ चुके हैं। दिल्ली के जगदीशपुरा इलाके के तीन युवक पहले भी साइबर क्राइम में पकड़े गए थे, जो विदेशों में सिम सप्लाई करने वाले गिरोह से जुड़े थे। अछनेरा इलाके में भी कई अपराधी साइबर ठगी के लिए पकड़े गए हैं, जिनमें से कई परिवारों की रिश्तेदारी राजस्थान के भरतपुर और अलवर जिलों में है। इन इलाकों में साइबर अपराध के कई गिरोह सक्रिय हैं, जो युवाओं को अपने साथ जोड़ते हैं।
भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त किए हुए 77 वर्ष पूरे कर लिए हैं, लेकिन इस स्वतंत्रता के बावजूद घुमंतू विमुक्त जनजातियों की दुर्दशा जस की तस बनी हुई है। यह अत्यंत खेदजनक है कि जिस देश की सनातन संस्कृति पूरे विश्व को ‘सर्व भूत हिते रतः’ का संदेश देती है, उसी देश में इन जनजातियों का आज भी अपमानजनक और नारकीय जीवन जीना हमारी सामूहिक विफलता है।
ब्रिटिश शासन के दौरान 1871 में लागू किया गया ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ इन जनजातियों की दयनीय स्थिति के पीछे का मुख्य कारण है। इस कानून के तहत 193 जनजातियों को ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया गया। यह कानून 1857 के विद्रोह के बाद लाया गया, जिसमें इन जनजातियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया था। अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबाने और इन जनजातियों को नियंत्रित करने के लिए एक कड़ा कानून बनाया, जो उनके लिए एक स्थायी कलंक बन गया। इस कानून के माध्यम से इन जनजातियों को न केवल अपराधी घोषित किया गया, बल्कि उन्हें समाज में अलग-थलग कर दिया गया।
इन जनजातियों को उनके घरों में कैद कर दिया गया और 50 बस्तियों का निर्माण किया गया, जहाँ इन्हें जेल जैसी परिस्थितियों में रखा गया। कानपुर में ऐसी एक बस्ती 159 एकड़ भूमि में स्थापित की गई थी। इन बस्तियों में 24 घंटे पुलिस का पहरा होता था, और इन जनजातियों को प्रतिदिन पुलिस चौकी पर हाजिरी देनी पड़ती थी। उनका जीवन हर तरीके से नियंत्रित किया जाता था, और वे स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित थे।
भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद भी इन जनजातियों के लिए वास्तविक आजादी नहीं आई। 31 अगस्त 1951 को ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ को समाप्त किया गया, और इसके साथ ही इन जनजातियों को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। लेकिन यह स्वतंत्रता केवल कानूनी थी। सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से इन जनजातियों की स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। 1951 के बाद से 31 अगस्त को विमुक्त दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन यह दिन एक प्रतीकात्मक आयोजन से अधिक कुछ नहीं है।
आज भी समाज और प्रशासन में इन जनजातियों के प्रति गहरे पूर्वाग्रह हैं। पुलिस के रंगरूटों को यह सिखाया जाता है कि ये जनजातियाँ पारंपरिक रूप से अपराध करती हैं, और इस प्रकार उन्हें एक संदिग्ध दृष्टिकोण से देखा जाता है। इन जनजातियों के खिलाफ अत्याचार और भेदभाव आज भी जारी हैं।
स्वतंत्रता के 77 वर्षों बाद भी घुमंतू और विमुक्त जनजातियाँ सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक दृष्टिकोण से अत्यंत पिछड़ी हुई हैं। इन जनजातियों के अधिकांश लोग आज भी बिना स्थायी आवास के जीवन व्यतीत करते हैं। वे सड़कों के किनारे, जंगलों या दूरदराज के क्षेत्रों में अस्थायी झोपड़ियों में रहते हैं। इनकी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच बहुत सीमित है।
शिक्षा की कमी और सामाजिक भेदभाव के कारण इन जनजातियों के लिए रोजगार के अवसर भी अत्यंत सीमित हैं। इनके बच्चे अक्सर शिक्षा से वंचित रह जाते हैं क्योंकि परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय होती है कि बच्चे भी काम करने पर मजबूर होते हैं। गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी की समस्याओं से जूझती ये जनजातियाँ अपराध की ओर धकेली जाती हैं।
यह हमारे समाज और शासन दोनों के लिए गहन चिंतन का विषय है। स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी अगर एक बड़ा समुदाय अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित है, तो यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असफलता है। भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार देता है, लेकिन घुमंतू और विमुक्त जनजातियाँ आज भी इन अधिकारों से वंचित हैं।
सरकार ने समय-समय पर घुमंतू और विमुक्त जनजातियों के उत्थान के लिए कई योजनाएँ बनाई हैं, लेकिन ये योजनाएँ कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं। इन योजनाओं का वास्तविक लाभ इन जनजातियों तक नहीं पहुँच पाता, क्योंकि योजनाओं का क्रियान्वयन ढंग से नहीं हो पाता है। इसके अलावा, इन जनजातियों को समाज में मुख्यधारा से जोड़ने के लिए भी पर्याप्त प्रयास नहीं किए जाते हैं।
हमारे समाज में अभी भी इन जनजातियों के प्रति गहरे भेदभाव और पूर्वाग्रह बने हुए हैं। इन्हें समाज में अपराधी या अज्ञानी के रूप में देखा जाता है, और इनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है। यह स्थिति न केवल समाज की मानसिकता को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि हमारे प्रशासन और कानून-व्यवस्था में इन जनजातियों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव है।
घुमंतू और विमुक्त जनजातियों के उत्थान के लिए सबसे पहले आवश्यक है कि समाज में इनके प्रति फैली भ्रांतियों और पूर्वाग्रहों को दूर किया जाए। इसके लिए शिक्षा और जागरूकता अभियानों की आवश्यकता है, जिनके माध्यम से लोगों को इन जनजातियों की वास्तविक स्थिति, उनके संघर्षों और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा सके।
इसके साथ ही, इन जनजातियों के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए ठोस और प्रभावी योजनाओं की जरूरत है। इन जनजातियों को स्थायी रोजगार, आवास और शिक्षा की सुविधाएँ उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। पुलिस और प्रशासन को इन जनजातियों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता है, ताकि वे इनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार न करें।
इन जनजातियों के ऐतिहासिक योगदान को भी हमें याद करना चाहिए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इन जनजातियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनका साहस और बलिदान हमें यह सिखाता है कि वे देश के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश, उनके इस योगदान को भुला दिया गया और उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया।
अब समय आ गया है कि हम इन जनजातियों को उनका उचित स्थान और सम्मान दिलाने के लिए ठोस कदम उठाएँ। यह केवल एक सामाजिक सुधार का कार्य नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की संस्कृति, इतिहास और मानवाधिकारों की रक्षा का भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की स्थिति को सुधारने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार, समाज और गैर-सरकारी संगठनों के बीच समन्वय हो। हमें एक साथ मिलकर काम करना होगा ताकि इन जनजातियों को न्याय, सम्मान और समानता प्राप्त हो सके।
भारत ने स्वतंत्रता के 77 वर्ष पूरे कर लिए हैं, लेकिन आज भी कई ऐतिहासिक अन्याय और ब्रिटिश शासनकाल के कलंक हमारे समाज पर मौजूद हैं। घुमंतू और विमुक्त जनजातियों का नारकीय जीवन इसका एक जीवंत उदाहरण है। हालांकि, वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संवेदनशील नेतृत्व देश में कई ऐसे ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने का कार्य कर रहा है, जिनसे लाखों लोगों के जीवन में नया सवेरा आया है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर से लेकर अन्य राज्यों तक ऐसे लाखों लोगों को नागरिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिन्हें विभाजन के बाद यह अधिकार नहीं मिले थे। इन लोगों को अब देश के नागरिक होने का गर्व प्राप्त हुआ है। जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी बनाना, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लागू करना, और अयोध्या में भगवान श्री रामलला के भव्य मंदिर निर्माण जैसे निर्णय इस सरकार की संवेदनशीलता और दूरदर्शिता को दर्शाते हैं।
इसी कड़ी में “वन नेशन, वन इलेक्शन” की दिशा में भी तेजी से कार्य किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बनटांगिया लोगों को नागरिक अधिकार प्रदान कर उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन लाया है। ऐसे संवेदनशील नेतृत्व के कार्यकाल में यह निश्चित है कि ब्रिटिश शासन के दौरान उत्पीड़ित घुमंतू और विमुक्त जनजातियों को भी सामाजिक सुरक्षा, राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड, आधार कार्ड, प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य सामाजिक योजनाओं का लाभ देकर सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिल सकता है।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत विमुक्त जनजातियों के लिए आवासीय विद्यालयों में बच्चों की शिक्षा, और स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से भाषा संबंधित समस्याओं को हल करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। अनुसूचित जाति/जनजाति और ओबीसी में इन जनजातियों का निर्धारण कर उनका प्रमाणपत्र प्रदान करने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है। यह सरकार के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है कि वह इन विमुक्त जनजातियों को सम्मान और सुरक्षा प्रदान कर समाज में उनका सही स्थान दिला सके।
विमुक्त जातियों में जो जातियाँ अब तक संवैधानिक अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें जितनी जल्दी संवैधानिक अधिकार प्रदान किए जाएँगे, उतना ही शीघ्र इस वंचित समूह के साथ सदियों से हुए अन्याय का प्रतिकार कर सरकार एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक निर्णय करेगी।
इतिहास गवाह है कि ये जनजातियाँ ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे पहले खड़ी हुईं थीं, लेकिन बाद में उनके खिलाफ ‘जन्मजात अपराधी’ होने का कलंक मढ़ दिया गया। अब, इस अन्याय को समाप्त करने और इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का एक बड़ा अवसर है। इस दिशा में सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक स्तर पर व्यापक कार्य करने की आवश्यकता होगी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की लगभग दो दर्जन से अधिक संस्थाएँ घुमंतू विमुक्त समाज के संरक्षण और संवर्धन के लिए कार्य कर रही हैं। अवध और गोरखपुर प्रांत में राजेश और उनके सहयोगी, जो इस दिशा में कार्य कर रहे हैं, उनके प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं। राजेश ने अपने नाम के साथ ‘घुमंतू’ शब्द जोड़कर एक संदेश दिया है कि जिस समाज का गौरवशाली और शौर्यपूर्ण इतिहास रहा है, वह समाज अब अपमान सहने के लिए नहीं बना है।
हालांकि, इन प्रयासों के साथ-साथ सरकार को भी बड़े निर्णय लेने होंगे, ताकि इन घुमंतू और विमुक्त जनजातियों को सामाजिक सम्मान और आर्थिक सुरक्षा मिल सके। ऐसा करके सरकार ब्रिटिश शासन के समय लगाए गए इस बड़े कलंक को मिटा सकती है और इन करोड़ों लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल कर सकती है।
इस दिशा में व्यापक जागरूकता फैलाने और विमुक्त जनजातियों के उत्थान के लिए किए जा रहे प्रयासों को मजबूत करना जरूरी है। समाज और सरकार के बीच तालमेल स्थापित कर इन जनजातियों को उनका सही स्थान दिलाने का यह सही समय है। केवल तभी हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र पूर्ण हो सकते हैं, जब हर नागरिक को समान अवसर और अधिकार प्राप्त हो।
गुरपतवंत सिंह पन्नू खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) का सरगना है। आए दिन भारत पर हमले की धमकी देता है। रोज भारत तोड़ने की बात करता है। लेकिन प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ इस खालिस्तान आतंकी के नाम के पहले टेरेरिस्ट (आतंकवादी) नहीं लिख पाता है। कभी उसे ‘एक्टिविस्ट’ तो कभी ‘अमेरिकन सिटीजन (अमेरिकी नागरिक)’ बताता है।
सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) को ‘चिंता की कोई बात नहीं, मैं सुरक्षित हूँ: विकास यादव ने अमेरिकी मुकदमे के बाद परिवार से बताया’ शीर्षक के साथ प्रकाशित खबर में भी वायर ने पन्नू को खालिस्तान समर्थक ‘एक्टिविस्ट’ लिखा। हालाँकि सोशल मीडिया में इसको लेकर आलोचना होने के बाद ‘द वायर’ ने चुपचाप इसे ‘सिख सेपरेटिस्ट (सिख अलगाववादी)’ में बदल दिया है। लेकिन आतंकवादी कहने का साहस द वायर नहीं जुटा पाया है।
US terrorist Gurpatwant Singh Pannu warned passengers against flying on Air India flights from November 1st to 19th.
Like Pakistan, the US and its allies back terrorists for their interests, while @thewire_in furthers their agenda by labeling them as activists. pic.twitter.com/zHqmQVDqDP
So, according to the Wire, terrorist Pannun is an ‘activist.’
You must not be surprised because Siddharth Varadrajan, the owner of this propaganda website, is a US citizen, and her mother-in-law, Puspa Sunder, was an officer with the CIA-affiliated Ford Foundation. pic.twitter.com/MM4MQ0oPKJ
आतंकियों और देश विरोधियों को विशिष्ट और विद्वानों जैसा प्रदर्शित करना द वायर जैसे संस्थानों की पुरानी आदत रही है। पन्नू को भी ‘एक्टिविस्ट’ बताने का यह कोई पहला मौक़ा नहीं है। इससे पहले 19 अक्टूबर, 2024 को विकास यादव के प्रत्यर्पण से जुड़ी एक खबर में भी पन्नू को द वायर ने ‘प्रो खालिस्तान एक्टिविस्ट’ (खालिस्तान समर्थक) बताया।
यहाँ भी उसे आतंकी लिखने की जहमत नहीं उठाई गई। यही शब्दावली 18 अक्टूबर, 2024 को उपयोग की गई। 15 अक्टूबर, 2024 को एक खबर में पन्नू को अमेरिकी नागरिक बता कर इति श्री कर ली गई। द वायर ने अपने संपादकीय दिवालिएपन का उदाहरण 17 जून, 2024 को भी देखने को मिला। इस दिन पन्नू मामले में गिरफ्तार निखिल गुप्ता पर एक खबर में द वायर ने पन्नू को ‘सिख वकील’ बता डाला।
पन्नू वायर के लिए ‘सिख लॉयर’
द वायर में यह मूर्खता और चालाकी कोई अदना सा कॉपी राइटर करता हो, यह भी बात नहीं है। असल में इसके शीर्ष में बैठे लोग ही पन्नू को आतंकी नहीं मानते। 1 मई, 2024 को द वायर के फाउंडर और वामपंथी पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने एक संपादकीय कॉपी में पन्नू को ‘खालिस्तानी प्रचारक’ बताया था।
द वायर केवल पन्नू ही नहीं बल्कि जून, 2023 में कनाडा में मारे गए आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को लेकर भी बड़ा सम्मान रखता है। द वायर अलग-अलग समय पर निज्जर को कभी कनाडाई नागरिक तो कभी मात्र खालिस्तानी एक्टिविस्ट बताता आया है।
निज्जर को बताया ‘खालिस्तानी एक्टिविस्ट’
निज्जर को भी आतंकी लिखने में द वायर को ज्वर आता है जबकि उसकी सोशल मीडिया में बंदूकों के साथ फोटो तैरती हैं। निज्जर खालिस्तान टाइगर फ़ोर्स (KTF) का मुखिया था, यह संगठन हिंसा के जरिए खालिस्तान बनाना चाहता है। इन सबके बाद भी द वायर उसे आतंकी नहीं लिख पाता।
जिस पन्नू को ‘सिख वकील’ बताता है वायर, वह असल में कितना खतरनाक?
द वायर जिस पन्नू का नाम बड़ी इज्जत से लेता है और आतंकी बताने में डरता है, वह असल में एक आतंकी है और भारत का भगोड़ा अपराधी है। पन्नू के खिलाफ देश की जाँच एजेंसी NIA ने दिल्ली में मुकदमा दर्ज किया हुआ है। वह इस मामले NIA द्वारा भगोड़ा घोषित किया गया है। पन्नू की सम्पत्तियाँ भी सरकार अटैच कर चुकी है। यह वही पन्नू है जो आए दिन पीएम मोदी को मारने, भारतीय राजनयिकों को मारने और भारत तोड़ने की बात करता है।
द वायर के लिए केवल एक ‘अमेरिकी वकील’ पन्नू कनाडा और अमेरिका में ‘सिख रेफरेंडम’ आयोजित करता है। इसका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि कैसे कुछ सिख अलग ‘खालिस्तान’ चाहते है। हाल ही में उसने एयर इंडिया के विमानों को उड़ाने की धमकी दी है। रोज-रोज वीडियो के माध्यम से पन्नू धमकियाँ देता रहता है लेकिन द वायर के लिए वह एक सामान्य आदमी है।
भारतीय राजनयिकों पर हमले की मांग करता पन्नू
जब यह बात स्पष्ट है कि पन्नू आतंकी है और निज्जर आतंकी था, तो आखिर द वायर इन्हें यह क्यों नहीं लिख पाता। वह कभी इन्हें एक्टिविस्ट तो कभी ‘वकील’ और ज्यादा बवाल होने पर ‘अलगाववादी’ बता कर अपना पल्ला झाड़ लेता है। दरअसल, द वायर उसी प्रोपेगेंडा जमात का हिस्सा है जो इस्लामी आतंकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ बताती है।
यह वही जमात है जो आज भी कश्मीर के इस्लामी आतंकियों को ‘मिलिटेंट’ (लड़ाका) कहती है। यह वही जमात है जो हमेशा दंगाइयों के पक्ष में खड़ी होती है। इसे दुर्गा पूजा पर होने वाले हमले भले ना दिखें, लेकिन उसके बाद होने वाली करवाई जरूर दिखती है। इसे जवानों के घर आते ताबूत भले ही ना दिखें, लेकिन आतंकियों के जनाजे जरूर दिखते हैं।
शैलबाला मार्टिन, मध्य प्रदेश की एक प्रमोटी आईएएस अधिकारी, पिछले कुछ समय से अपने ट्वीट्स और बयानों के कारण चर्चा में रही हैं। उन्हें मंदिर पर लगे लाउडस्पीकर ध्वनि प्रदूषण की वजह लगते हैं। मंदिर पर आवाज उठाने वाली शैलबाला मार्टिन ने क्या कभी मस्जिद के लाउडस्पीकर या चर्च में होने वाली गतिविधियों पर सवाल उठाए हैं? आइए, इस रिपोर्ट में हम उनके बयानों और सार्वजनिक जीवन पर एक नजर डालते हैं।
शैलबाला मार्टिन के हिंदू विरोधी बयान
शैलबाला मार्टिन अपने ट्वीट्स और सार्वजनिक बयानों के कारण कई बार विवादों में आ चुकी हैं। विशेषकर, हिंदू त्योहारों और मंदिरों के खिलाफ उनके ट्वीट्स पर लोगों में गुस्सा भर रहा है। हाल ही में उन्होंने मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकरों को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाला बता दिया। शैलबाला ने लिखा, “मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकर, जो कई कई गलियों में दूर तक स्पीकर्स के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं, जो आधी-आधी रात तक बजते हैं, उनसे किसी को डिस्टर्बेंस नहीं होता?”
और मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकर, जो कई कई गलियों में दूर तक स्पीकर्स के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं, जो आधी आधी रात तक बजते हैं उनसे किसी को डिस्टरबेंस नहीं होता? https://t.co/rQ8axYQkre
धार्मिक संवेदनशीलता के इस मुद्दे को लेकर कई लोग मानते हैं कि शैलबाला ने हिंदू मंदिरों में लाउडस्पीकर के उपयोग को निशाना बनाया, जबकि उन्होंने ईसाई प्रार्थनाओं और धार्मिक अनुष्ठानों पर कभी सवाल नहीं उठाया।
शैलबाला के इस ट्वीट पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। विष्णु झा ने लिखा, “ईसाई मिशनरियों के टुकड़े पे पली बढ़ी औरत से क्या उम्मीद की जानी चाहिए। क्या ये औरत इस्लाम की कुरीतियों पे बोल सकती है। हिंदू धर्म को टारगेट करना सबसे आसान काम लगता है। इस मिशनरी औरत से हिजाब, हलाला, मुस्लिम बहुविवाह, ट्रिपल तलाक पे तो आज तक बोलते नहीं दिखा। ऐसी मिशनरी औरत तो…”
ईसाई मिशनरियों के टुकड़े पे पली बढ़ी औरत से क्या उम्मीद की जानी चाहिए। क्या ये औरत इस्लाम की कुरीतियों पे बोल सकती है। हिंदू धर्म को टारगेट करना सबसे आसान काम लगता है। इस मिशनरी औरत से हिजाब, हलाला, मुस्लिम बहुविवाह, ट्रिपल तलाक पे तो आज तक बोलते नहीं दिखा। ऐसी मिशनरी औरत तो…
विष्णु झा के तीखे हमले को शैलबाला बर्दाश्त नहीं कर पाई और तुरंत ही मिशनरियों के बचाव में उतर गई। उसे अपनी परवरिश से जोड़ते हुए शैलबाला ने लिखा, “कम से कम मेरे माता पिता और मिशनरियों ने मुझे सभ्य भाषा का इस्तेमाल करना और निष्पक्ष रूप से बोलना तो सिखाया है। इसका मुझे गर्व है। अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। इसलिए आपको बाइज़्ज़त यहाँ से रवाना किया जा रहा है।”
कम से कम मेरे माता पिता और मिशनरियों ने मुझे सभ्य भाषा का इस्तेमाल करना और निष्पक्ष रूप से बोलना तो सिखाया है। इसका मुझे गर्व है।
अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है।
यही नहीं, ईसाई मिशनरियों का गुणगान करने वाली शैलबाला मौका मिलते ही हिंदुओं पर हमला बोलना शुरू कर देती है, संदर्भ चाहे कितना भी अलग क्यों न हो। राजस्थान के सीकर में बलात्कार के मामले को सदफ अफरीन नाम की मुस्लिम आईडी से एक्स पर शेयर किया गया, तुरंत ही शैलबाला ने उस पर तंज कस दिया। शैलबाला ने तंज कसते हुए लिखा, “भेष देख मत भूलये, बुझि लीजिये ज्ञान। बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान।।” उनका तंज सीधे-सीधे भगवा वस्त्रों और हिंदू संतों की तरफ था।
भेष देख मत भूलये, बुझि लीजिये ज्ञान। बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान।। https://t.co/Zi2XefADpS
हालाँकि बाबा बालकनाथ गिरफ्तार हो चुका है और उसका हिंदुओं ने जमकर विरोध किया है, लेकिन शैलबाला को सिर्फ हिंदुओं पर उंगली उठानी थी, तो उठा लिया और ईसाई मिशनरियों के कुकृत्यों पर चुप्पी साध ली। वो अलग बात है कि शैलबाला हिंदुओं पर तंज कसती हैं, तो उन्हीं के राज्य एमपी में कुछ समय पहले ही क्रिश्चियन मिशनरी के खेल बेनकाब हो रहे थे। ये मामला डिंडोरी जिले के समनापुर थाना क्षेत्र के जुनवानी गाँव का था, जहाँ रोमन कैथोलिक समुदाय के एक स्कूल की 8 छात्राओं से स्कूल के प्रिंसिपल, गेस्ट टीचर समेत कई लोगों पर छेड़छाड़ व अश्लीलता का आरोप लगा था।
स्कूल जबलपुर डायोकेसन एजुकेशन सोसाइटी (जेडीईएस) द्वारा चलाया जाता है। इस पूरे मामले का राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने भी संज्ञान लिया था, लेकिन शैलबाला मार्टिन के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला था। भले ही वो अप्रैल 2022 से एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सक्रिय हैं, लेकिन ईसाई स्कूलों में रेप, धर्मांतरण जैसे मामलों पर वो खामोशी की चादर ओढ़ लेती हैं।
ईसाई मिशनरियों के मतांतरण का करती हैं बचाव
शैलबाला मार्टिन अपने ईसाई धर्म पर गर्व व्यक्त करती रही हैं और इस संबंध में उन्होंने कई विवादित बयान दिए हैं। उनका मानना है कि ईसाई मिशनरियाँ केवल शिक्षा और सेवा कार्यों के लिए जानी जाती हैं और उनके ऊपर लगे धर्मांतरण के आरोप निराधार हैं।
उन्होंने एक ट्वीट में लिखा, “अगर क्रिश्चियन स्कूलों में धर्मांतरण करवाया जाता तो आज हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा क्रिश्चियन होता। क्रिश्चियन आबादी की यह वृद्धि आँकड़ों में परिलक्षित नहीं होती है।”
अगर क्रिश्चियन स्कूलों में धर्मांतरण करवाया जाता तो आज हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा क्रिश्चियन होता। क्रिश्चियन आबादी की यह वृद्धि आंकड़ों में परिलक्षित नहीं होती है। कई बड़े नेता,मंत्री,उद्योगपति आदि इन्हीं स्कूलों में शिक्षित हुए हैं लेकिन, क्या वे धर्मांतरण कर ईसाई हो गए हैं? https://t.co/LZG0kqmY43
— Shailbala Martin (@MartinShailbala) July 6, 2023
यह बयान मिशनरियों के बारे में फैले मिथकों और पूर्वाग्रहों का विरोध करने का उनका प्रयास था। ये अलग बात है कि क्रिश्चियर मिशनरी स्कूलों में शिक्षा देने के नाम पर मतांतरण की साजिशों के जाल गहरे तक फैले हैं। अभी हाल ही में मथुरा से एक मामला सामने आया, जिसमें मिशनरी स्कूल के लोग बड़े पैमाने पर मतांतरण करा रहे थे, खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिजनों और परिवार के। ऐसे अनगिनत मामले खंडवा से लेकर जबलपुर तक सामने आते रहे हैं।
ऑपइंडिया ने अपनी स्पेशल रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मध्य प्रदेश के कोरबा में क्रिश्चियन मिशनरी और कॉन्ग्रेसी नेताओं की मिलीभगत से पूरा इलाका ही लैंड जिहाद का शिकार हो गया।
मतांतरण का बचाव करने वाली शैलबाला ने यूपी की एक घटना को लेकर फिर से मिशनरी स्कूलों को सही ठहराने की कोशिश की। ये घटना स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा बच्ची के यौन शोषण से जुड़ी थी, जिस पर शैलबाला ने लिखा, “यही घटना अगर किसी कॉन्वेंट में हो गई होती तो नंगा नाच शुरू हो जाता।”
— Shailbala Martin (@MartinShailbala) June 7, 2024
शैलबाला ने जिस ट्वीट को कोट करते हुए मिशनरी स्कूलों को क्लीनचिट दी, वो मामला दूसरे राज्य का था। (फोटो साभार: X)
शैलबाला मार्टिन ने मिशनरी स्कूलों को क्लीनचिट तो दे दी, साथ ही हिंदुओं पर निशाना भी साध लिया। लेकिन वो इस बात पर चुप्पी साधे रखी कि मिशनरी स्कूलों में खुलेआम यौन शोषण, पैसों का लालच देकर मतांतरण जैसे अनेकों मामले सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में साल 2022 में 15 ऐसे मामलों को सामने रखा था, जहाँ बच्चों को दबाव में ईसाई बनाया गया और उनका यौन शोषण भी किया गया।
ऐसा ही मामला दमोह से भी सामने आया, जहाँ क्रिश्चियन मिशनरी द्वारा संचालित स्कूल में मतांतरण के लिए दबाव डाले जाने की रिपोर्ट्स आई।
ये वही आईएएस हैं, जिन्हें मंदिर के लाउडस्पीकर से ध्वनि प्रदूषण की समस्या होती है, लेकिन शैक्षणिक संस्थान में जहाँ बच्चे पढ़ाई करते हैं, उसे शैलबाला मार्टिन जायज मानती हैं। उन्हें इसाई मिशनरियों की गाथा गाने से ही शायद फुरसत नहीं मिली, इसलिए इतनी बड़ी घटनाओं का ये कहकर बचाव करती रही, कि क्रिश्चियन प्रार्थना अपराध नहीं है। हालाँकि दोनों ही मामलों का संदर्भ अलग था, लेकिन ये शैलबाला की हिप्पोक्रेसी को जानने के लिए काफी है।
— Shailbala Martin (@MartinShailbala) July 6, 2023
सरकारी सेवा में रहकर राजनीतिक बयानबाजी की भी आदत
यही नहीं, सरकारी सेवा में रहते हुए भी शैलबाला मार्टिन न सिर्फ सरकार की, बल्कि देश के बलिदानी अमर जवानों के बलिदान का भी मजाक उड़ाती रही हैं। पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत के बलिदान को लेकर किए गए ट्वीट पर जवाब देते हुए शैलबाला ने लिखा, “वैसे भी आदरणीय मिश्राजी शहीद तो अरबी भाषा का शब्द है। ये लोग इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं?” यह टिप्पणी एक ऐसे संदर्भ में आई थी जब सीडीएस बिपिन रावत के बलिदान पर चर्चा हो रही थी।
वैसे भी आदरणीय मिश्राजी शहीद तो अरबी भाषा का शब्द है। ये लोग इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं? https://t.co/3MP3yxHqgo
शैलबाला मार्टिन के ट्वीट्स और उनके विचारों ने उन्हें एक विशेष धार्मिक विचारधारा का समर्थक दिखाया है। खासकर सोशल मीडिया पर उनके कुछ पोस्ट्स को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे एक सरकारी अधिकारी होते हुए भी अपने धर्म के प्रति अत्यधिक लगाव और अन्य धर्मों के प्रति विरोधाभासी दृष्टिकोण रखती हैं। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब वे अपने ईसाई धर्म का बचाव करती हैं और ईशू के विचारों को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर शेयर भी करती हैं।
यीशु ने कहा, बालकों को मेरे पास आने दो: और उन्हें मना न करो, क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है। मत्ती 19:14
— Shailbala Martin (@MartinShailbala) July 3, 2024
कौन हैं शैलबाला मार्टिन?
शैलबाला मार्टिन का जन्म 9 अप्रैल 1965 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक ईसाई परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता धार्मिक और सामाजिक सेवाओं से जुड़े रहे, जिससे उनकी परवरिश में धार्मिक शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। शैलबाला ने अपनी शिक्षा इंदौर के होल्कर साइंस कॉलेज से प्राप्त की, जहाँ उन्होंने मास्टर ऑफ आर्ट्स (एम.ए.) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2009 में मध्य प्रदेश राज्य सेवा में प्रवेश किया, जहाँ से 2017 में वे प्रमोट होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शामिल हुईं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग में कार्यरत हैं।
इस मुद्दे पर संस्कृति बचाव मंच के अध्यक्ष पंडित चंद्रशेखर तिवारी ने शैलबाला मार्टिन पर सवाल उठाते हुए कहा कि मंदिरों में सुरीली आवाज में आरती और मंत्रों का उच्चारण होता है ना कि दिन में 5 बार लाउडस्पीकर पर अजान की तरह बोला जाता है। मेरा शैलबाला मार्टिन जी से सवाल है कि उन्होंने कब किसी मोहर्रम के जुलूस पर पथराव होते हुए देखा? जबकि हिन्दुओं के जुलूस पर पथराव हो रहा है और इसलिए मार्टिन मैडम आपको हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई अधिकार नहीं है।
‘पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाते हुए रील बनाने वाला फैजल निसार उर्फ फैजान का मंगलवार (22 अक्टूबर, 2024) को भारत माता के जयकारे लगाता वीडियो सामने आया है। इसमें वह जबलपुर के पुलिस स्टेशन में पहुँचकर तिरंगे को सलामी देता भी दिख रहा है।
पिछले दिनों मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ₹50 हजार के निजी मुचलके पर उसे जमानत देते हुए तिरंगे को सलामी देने और भारत माता के जयकारे लगाने की शर्त लगाई थी। इसके अनुसार उसे हर महीने के पहले और चौथे मंगलवार को थाने पहुँच 21 बार तिरंगे को सलामी देनी है और ‘भारत माता की जय’ भी कहना है। यह शर्त तब तक लागू रहेगी जब तक इस मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती।
इसी शर्त का पालन करने के लिए 22 अक्टूबर को फैजान पहली बार थाने पहुँचा। उसने मीडिया से बात करते हुए कहा, “भारत माता की जय। मैं अपनी गलती कबूल करता हूँ। मैं हाईकोर्ट के आदेश का पालन करूँगा। मैं फिर से ऐसी गलती नहीं करूँगा।”
#WATCH | Madhya Pradesh: An accused man, Faizal Nisar alias Faizan salutes the Tiranga and raises Bharat Mata ki Jai slogans at Jabalpur Police Station, as part of his bail conditions. He was purportedly seen shouting the slogan "Pakistan Zindabad India Murdabad" in a video.
थाना प्रभारी मनीष राज भदौरिया ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया, “तय शर्तों के अनुसार यह पहला मंगलवार था, इसलिए फैजान थाने आया था। शर्त के अनुसार उसने 21 बार राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी और ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाया। शर्तों के अनुसार उसे हर महीने के पहले और आखिरी मंगलवार को सुबह 10 से दोपहर 12 बजे के बीच यहाँ आना होगा।”
गौरतलब है कि पाकिस्तान जिंदाबाद वाला वीडियो वायरल होने के बाद फैजान को गिरफ्तार किया गया था। पहले उसने इसे फर्जी मामला बताते हुए जमानत की गुहार लगाई थी। लेकिन सुनवाई के दौरान उसका झूठ पकड़ा गया। इसके बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस दिनेश कुमार पालीवाल ने उसे सर्शत जमानत देते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य उसके मन उस देश के प्रति सम्मान जगाना है जहाँ वो पैदा हुआ और रह रहा है।
बता दें कि इस मामले में 17 मई 2024 को भोपाल के मिसरौद पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। जाँच के बाद ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट दायर की गई थी। इस दौरान वीडियो क्लिप को आधार बनाया गया जिसमें आरोपित स्पष्ट रूप से नारेबाजी कर रहा था। जाँच में पुलिस ने पाया कि आरोपित पर पहले से 14 आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं।
इजरायल सुरक्षाबलों ने हिजबुल्लाह की आतंकी गतिविधियों को फंडिंग करने वाले एक बैंक पर बमबारी की है। इस बैंक की कई शाखाओं पर लेबनान के भीतर बमबारी हुई है। इजरायल ने यह खुलासा भी किया है कि हिजबुल्लाह ने एक अस्पताल के नीचे सोना और करोड़ों डॉलर छुपा रखे हैं।
इजरायल ने सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) को बेरूत के भीतर अल कर्द अल हसन नाम के एक वित्तीय संसथान की शाखाओं पर बमबारी की। यह एक इस्लामी बैंकिंग संस्थान है, यानी यह ब्याज पर काम नहीं करता। इस संस्थान पर आरोप है कि इसके जरिए हिजबुल्लाह अपनी वित्तीय गतिविधियाँ चलाता है।
इस संस्थान को अमेरिका ने 2007 में बैन कर दिया था। हिजबुल्लाह लेबनान के लोगों को यह संस्थान उपयोग करने के लिए बढ़ावा देता रहा है। एक बार जब इस बैंक का सर्वर हैक हुआ था तब इसमें खाता रखने वालों का नाम खुलासा हुआ था। इसमें हिजबुल्लाह के लोगों के नाम भी थे।
?Continuous ??strikes on #Beirut’s Souther suburb,13 so far, targeting Alqard Alhassan Foundation buildings. This org represents the illegal banking and funding system for #Hezbollah together with other orgs that operate in the West as charities. Alqard Alhassan keeps gold… pic.twitter.com/cnPLUzRvY9
हिजबुल्लाह के पूर्व मुखिया नसरुल्लाह ने इस संस्थान में हिजबुल्लाह समर्थकों से अपना एक-एक पैसा इसमें जमा कर दें। यह हिजबुल्लाह की फर्जी कम्पनियों को चलाने में भी मदद करता है। इजरायल ने हिजबुल्लाह की आर्थिक रूप से कमर तोड़ने को बेरूत में इसकी शाखाओं को निशाना बनाया। बेरूत में इस संस्थान की 15 शाखाएँ हैं।
दूसरी तरफ इजरायली सुरक्षा बलों (IDF) के प्रवक्ता डैनिएल हगारी ने भी इसको लेकर बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि लेबनान के लोगों का पैसा लेकर हिजबुल्लाह अपनी आतंकी गतिविधियाँ चला रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान से आया पैसा और लेबनान के लोगों को पैसा हिजबुल्लाह को फंड किया जा रहा है।
इजरायल ने खुलासा किया कि ‘4400 यूनिट’ हिजबुल्लाह की वित्तीय गतिविधियाँ चलाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान से पैसा और सोना हिजबुल्लाह के लिए आता है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि लेबनान से हिजबुल्लाह डॉलर चुराता है, इस कारण से लेबनान की अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई है।
“Tonight, I am going to declassify intelligence on a site that we did not strike—where Hezbollah has millions of dollars in gold and cash—in Hassan Nasrallah’s bunker. Where is the bunker located? Directly under Al-Sahel Hospital in the heart of Beirut.”
इजरायल ने एक और बड़ा खुलासा इस दौरान किया। डेनियल हगारी ने बताया, “आज मैं वह सूचना सार्वजनिक कर रहा हूँ जहाँ पर हमने बमबारी नहीं की। यह हिजबुल्लाह के पूर्व मुखिया नसरुल्लाह का बंकर है। यह बंकर अल सालेह अस्पताल के ठीक नीचे स्थित है। इसके नीचे बड़ी सुरंग बनाई है और इसमें घुसने और निकलने के रास्ते भी पास की इमारतों में हैं।”
उन्होंने आगे बताया, “यह एक बड़ा बंकर है, यहाँ बेडरूम हैं और लम्बे समय तक लड़ने और छुपने की भी व्यवस्था है। यहाँ करोड़ों डॉलर नगद में रखे हुए हैं और सोना भी रखा हुआ है। यह पैसा और सोना अब भी रखा हुआ है। हम लेबनान की सरकार और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने माँग करते हैं कि इस पैसे का इस्तेमाल आतंक के लिए ना हो।” हगारी ने बताया है कि हिजबुल्लाह ने यहाँ 500 मिलियन डॉलर (लगभग ₹4200 करोड़) छुपाए हैं।
गौरलतब है कि इजरायल लगातार लेबनान के भीतर हिजबुल्लाह को निशाना बना रहा है। उसने हाल ही में हिजबुल्लाह के मुखिया नसरुल्लाह और उसके उत्तराधिकारी को मार गिराया था। इजरायल गाजा में भी आतंकियों को ठिकाने लगा रहा है।
उन्नाव के बीघापुर कोतवाली क्षेत्र में मंदिर की छत ढालने वाले विवाद में नया घटनाक्रम सामने आया है। अब रानीपुर गाँव में मंदिर की छत ढलाई के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं ने मोर्चा खोल दिया है। मुस्लिम बाहुल्य वाले गाँव रानीपुर में 130 घर मुस्लिमों के हैं और हिंदुओं के बामुश्किल 30 घर, ऐसे में बहुसंख्यक मुस्लिम वर्ग की महिलाओं ने मंदिर निर्माण के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए कहा है कि ‘मंदिर की घंटियों से उन्हें परेशानी होगी,’ इसलिए वो मंदिर नहीं बनने देंगे। वहीं, जिस परिवार ने मंदिर निर्माण का संकल्प लिया था, वो दबाव की वजह से उन्नाव से लखनऊ चला गया है।
समाचार पत्र दैनिक जागरण ने फॉलोअप रिपोर्ट में ये जानकारी दी है। बताया जा रहा है कि रानीपुर गाँव की मुस्लिम महिलाओं ने मंदिर निर्माण का खुलेआम विरोध करते हुए भड़काऊँ बयानबाजी भी की है। भड़काऊ बयान के वीडियो सोशल मीडिया पर भी प्रसारित हो रहे हैं। मंदिर का विरोध करने वाली मुस्लिम महिलाओं का कहना है कि मंदिर की घंटी बजने से उन्हें दिक्कत होगी।
इस बीच, मंदिर निर्माण का संकल्प लेने वाला परिवार उत्पीड़न से परेशान होकर पयालन को मजबूर हो गया है और वो राजधानी लखनऊ शिफ्ट हो गया है। हालाँकि ये पलायन स्थाई है या अस्थाई, इस बात की जानकारी नहीं मिल पाई है।
वहीं, इस पूरे मामले में प्रशासन का रवैया पहले की तरह ही डिफेंसिव है। प्रशासन मामले को शांत कराने की कोशिश कर रहा है। एसडीएम सदर क्षितिज द्विवेदी का बयान भी आया है। उन्होंने जमीन को लेकर किसी समस्या की बात से इन्कार किया है। एसडीएम ने बताया कि विवादित जमीन पैमाइश में आबादी की जमीन निकली है। चबूतरा आबादी की जमीन पर है, तो कोई समस्या नहीं है। हालाँकि मंदिर की छत न ढलने देने को लेकर कोई शिकायत नहीं मिली है।
इस विवाद में दैनिक जागरण ने एएसपी अखिलेश सिंह का भी पक्ष छापा है। एएसपी ने बताया कि मंदिर की छत ढालने को लेकर कोई अनुमति नहीं ली गई है। यदि अनुमति मांगी जाती है तो मंदिर बनने से कोई रोक नहीं सकेगा। भड़काऊ बयान देने से जुड़ी जानकारियाँ पुलिस के पास नहीं है। पूरे मामले पर पुलिस की नजर है।
डिनायल मोड में क्यों है प्रशासन?
ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से पुलिस और प्रशासन मामले को दबाते दिख रहे हैं। बीघापुर कोतवाली के SHO ने ऑपइंडिया से बातचीत में किसी तनाव से ही इनकार कर दिया था, लेकिन हमने जब सीओ के बयान को लेकर मामले को उठाया, तो उन्होंने स्वीकार किया था कि मामला 7-8 अक्टूबर 2024 का है। 32 लोगों की पाबंदी की गई है, जिसमें 26 मुस्लिम और 6 हिंदू है।
हालाँकि उन्नाव पुलिस ने ऑपइंडिया की रिपोर्ट के जबाव में बताया कि ये मामला 15 दिन पुराना है। मामला पुलिस के संज्ञान में है।
ये पूरा घटनाक्रम बताता है कि पुलिस और प्रशासन कैसे मामले को जान-बूझकर अनदेखा कर रहे हैं। एसडीएम बयान देते हैं कि मंदिर निर्माण के लिए अनुमति माँगने ही कोई नहीं आया, लेकिन जमीन की पैमाइश की बात करते हैं। अगर शिकायत ही नहीं हुई, तो पैमाइश कैसी? वहीं, एएसपी कहते हैं कि मंदिर निर्माण की अनुमति माँगी गई, तो अनुमति मिलने के बाद मंदिर का निर्माण कोई रोक नहीं पाएगा।
बता दें कि गाँव में एक शिव मंदिर है, जो 70 वर्ष से भी अधिक पुराना है। इस मंदिर के चबूतरे पर हिंदू परिवार अपने धार्मिक कार्य जैसे मुंडन, छेदन और शादी-विवाह संपन्न करते हैं। मंदिर के चबूतरे पर चारों ओर दीवारें और खंभे खड़े हैं, लेकिन छत डालने का कार्य अभी लंबित है, क्योंकि गाँव के निहाल, अनीस खान, असगर खान, शोएब, सलीम, यूनुस, अच्छे, रईस जैसे बहुसंख्यक इस्लामी कट्टरपंथियों को ये पसंद नहीं है। इस्लामी कट्टरपंथियों का कहना है मंदिर से सिर्फ 100 मीटर दूर मस्जिद है। मंदिर बन जाने से उनकी नमाज में दिक्कत आएगी।
खैर, ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि मंदिर बनता है या इस्लामी कट्टरपंथी अपनी एकजुटता के दम पर मंदिर निर्माण को रोक देता है। फिलहाल, यहाँ सबसे पहले जरूरत है उत्पीड़ित परिवार की सुरक्षा की, जिसे पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा है।
बहराइच जिले में 13 अक्टूबर 2024 को हुई हिंसा के मामले में बीजेपी विधायक सुरेश्वर सिंह को लोगों का तीखा विरोध झेलना पड़ा, जब वो मृतक राम गोपाल मिश्रा के शव को मोर्चरी की ओर ले जाते समय प्रसाशनिक अधिकारियों के साथ खड़े दिखे। अब इस मामले में विधायक ने 7 नामजद और सैकड़ों अज्ञात लोगों (भीड़) के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया है।
यह घटना तब हुई, जब अगले दिन बहराइच मेडिकल कॉलेज के गेट पर राम गोपाल मिश्रा के शव के साथ भीड़ प्रदर्शन कर रही थी। सुरेश्वर सिंह ने कहा कि हिंसा में मारे गए राम गोपाल मिश्रा के शव को मोर्चरी की ओर ले जाते समय उन पर हमला हुआ। विधायक सुरेश्वर सिंह के अनुसार, वह शव के पास पहुँचने के बाद जिलाधिकारी से बातचीत कर रहे थे कि तभी कुछ उपद्रवियों ने उन पर हमला कर दिया।
आरोपितों में अर्पित श्रीवास्तव, अनुज सिंह रैकवार, शुभम मिश्रा, मनीष चंद्र शुक्ला, कुशमेन्द्र चौधरी, पंडुरीक पांडेय, सुधांशु सिंह राणा और सैकड़ों लोगों की भीड़ को शामिल किया गया है। सुरेश्वर सिंह ने शिकायत में कहा है कि उनके खिलाफ नारेबाजी के साथ गाली-गलौज की और मारपीट की कोशिश की गई। विधायक ने आरोप लगाया कि भीड़ ने उनके बेटे अखंड प्रताप सिंह पर भी हमला किया, लेकिन वह किसी तरह बच निकले।
Sureshwar Singh, #BJP MLA from Mahsi in Bahraich, filed a case against 8 men his own party under serious charges- inciting riots, stone-pelting, and attempted murder. MLA alleges, after death of Ramgopal Mishra amid #Bahraich violence, he was attacked with stones and fired upon. https://t.co/pvA4zI9jR2pic.twitter.com/eXMBWm1IoQ
— Arvind Chauhan, very allergic to 'ya ya'. (@Arv_Ind_Chauhan) October 21, 2024
मामले की शुरुआत रामगोपाल मिश्रा की मौत से हुई थी, जिसके बाद लोग आक्रोशित होकर मेडिकल कॉलेज के सामने प्रदर्शन कर रहे थे। स्थिति तब बिगड़ी जब शव को मठरी गाँव ले जाने के दौरान कुछ उपद्रवियों ने भीड़ को भड़काया और पथराव शुरू कर दिया। सुरेश्वर सिंह का दावा है कि उन पर और उनके बेटे पर जानलेवा हमला करने की भी कोशिश की गई, जिसमें कई उपद्रवी शामिल थे। विधायक ने इस घटना की पूरी रिपोर्ट दर्ज कराई है और यह माँग की है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित भाजपा नेता अर्पित श्रीवास्तव ने इन आरोपों को झूठा करार देते हुए कहा कि विधायक ने राजनीतिक फायदे के लिए यह मामला दर्ज कराया है और उनके बेटे ने ही भीड़ के साथ गाली-गलौज की, जिसके चलते विवाद बढ़ा। अर्पित ने कहा, “विधायक सुरेश्वर सिंह ने झूठा मुकदमा दर्ज कराया है। विधायक का बेटा गोलू लोगों को गाली दे रहा था। जिसका लोगों ने विरोध किया था। फायरिंग की बात भी गलत है।”
फिलहाल, पुलिस ने इस पूरे मामले की जाँच शुरू कर दी है और एफआईआर में दर्ज आरोपों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा रही है।