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बहराइच में BJP MLA सुरेश्वर सिंह और उनके बेटे पर फूटा पब्लिक का गुस्सा: राम गोपाल मिश्रा की हत्या के बाद उग्र थी भीड़, 8 पर FIR

बहराइच जिले में 13 अक्टूबर 2024 को हुई हिंसा के मामले में बीजेपी विधायक सुरेश्वर सिंह को लोगों का तीखा विरोध झेलना पड़ा, जब वो मृतक राम गोपाल मिश्रा के शव को मोर्चरी की ओर ले जाते समय प्रसाशनिक अधिकारियों के साथ खड़े दिखे। अब इस मामले में विधायक ने 7 नामजद और सैकड़ों अज्ञात लोगों (भीड़) के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया है।

यह घटना तब हुई, जब अगले दिन बहराइच मेडिकल कॉलेज के गेट पर राम गोपाल मिश्रा के शव के साथ भीड़ प्रदर्शन कर रही थी। सुरेश्वर सिंह ने कहा कि हिंसा में मारे गए राम गोपाल मिश्रा के शव को मोर्चरी की ओर ले जाते समय उन पर हमला हुआ। विधायक सुरेश्वर सिंह के अनुसार, वह शव के पास पहुँचने के बाद जिलाधिकारी से बातचीत कर रहे थे कि तभी कुछ उपद्रवियों ने उन पर हमला कर दिया।

आरोपितों में अर्पित श्रीवास्तव, अनुज सिंह रैकवार, शुभम मिश्रा, मनीष चंद्र शुक्ला, कुशमेन्द्र चौधरी, पंडुरीक पांडेय, सुधांशु सिंह राणा और सैकड़ों लोगों की भीड़ को शामिल किया गया है। सुरेश्वर सिंह ने शिकायत में कहा है कि उनके खिलाफ नारेबाजी के साथ गाली-गलौज की और मारपीट की कोशिश की गई। विधायक ने आरोप लगाया कि भीड़ ने उनके बेटे अखंड प्रताप सिंह पर भी हमला किया, लेकिन वह किसी तरह बच निकले।

मामले की शुरुआत रामगोपाल मिश्रा की मौत से हुई थी, जिसके बाद लोग आक्रोशित होकर मेडिकल कॉलेज के सामने प्रदर्शन कर रहे थे। स्थिति तब बिगड़ी जब शव को मठरी गाँव ले जाने के दौरान कुछ उपद्रवियों ने भीड़ को भड़काया और पथराव शुरू कर दिया। सुरेश्वर सिंह का दावा है कि उन पर और उनके बेटे पर जानलेवा हमला करने की भी कोशिश की गई, जिसमें कई उपद्रवी शामिल थे। विधायक ने इस घटना की पूरी रिपोर्ट दर्ज कराई है और यह माँग की है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित भाजपा नेता अर्पित श्रीवास्तव ने इन आरोपों को झूठा करार देते हुए कहा कि विधायक ने राजनीतिक फायदे के लिए यह मामला दर्ज कराया है और उनके बेटे ने ही भीड़ के साथ गाली-गलौज की, जिसके चलते विवाद बढ़ा। अर्पित ने कहा, “विधायक सुरेश्वर सिंह ने झूठा मुकदमा दर्ज कराया है। विधायक का बेटा गोलू लोगों को गाली दे रहा था। जिसका लोगों ने विरोध किया था। फायरिंग की बात भी गलत है।”

फिलहाल, पुलिस ने इस पूरे मामले की जाँच शुरू कर दी है और एफआईआर में दर्ज आरोपों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा रही है।

‘पीएम मोदी 10 साल से मूर्ख…’: मुस्लिम शिक्षिका सुल्ताना खातून ने ट्रांसलेशन के बहाने बच्चों के मन में भरी नफरत, गुस्से में बिहार के अभिभावक

बिहार के गोपालगंज जिले में एक स्कूल में मुस्लिम महिला शिक्षिका सुल्ताना खातून द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक बातें पढ़ाने का मामला सामने आया है, जिससे लोगों में भारी आक्रोश फैल गया है। शिक्षिका पर आरोप है कि वह अंग्रेजी अनुवाद सिखाने के नाम पर बच्चों के कोमल मन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत भर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना जिले के भोरे प्रखंड के डीह जैतपुरा स्थित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 5 अक्टूबर को हुई, जब शिक्षिका सुल्ताना खातून ने बच्चों को एक अंग्रेजी अनुवाद के लिए वाक्य दिया जिसमें लिखा था, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 वर्षों से लोगों को मूर्ख बना रहे हैं।”

यह मामला तब सामने आया जब स्कूल से घर लौटे बच्चों ने अभिभावकों को बताया कि शिक्षिका ने उनसे ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 वर्षों से लोगों को मूर्ख बना रहे हैं’ वाक्य का अंग्रेजी में अनुवाद करने को कहा। बच्चों के मासूम मन को इस तरह की राजनीतिक और आपत्तिजनक बातें पढ़ाकर गुमराह करने की कोशिश ने अभिभावकों को चिंतित कर दिया।

घटना की जानकारी मिलते ही अभिभावक शिकायत लेकर स्कूल और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के पास पहुँचे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चों को ऐसी शिक्षा देना, जिसमें प्रधानमंत्री के प्रति नफरत भरी जा रही हो, पूरी तरह गलत है। उन्होंने शिक्षिका के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

स्कूल के हेडमास्टर रमेश सिंह ने बताया कि शिक्षिका सुल्ताना खातून अंग्रेजी पढ़ाती हैं और उनके खिलाफ पहले भी बच्चों और अभिभावकों से शिकायतें मिल चुकी थीं कि वह छात्रों को राजनीतिक और विवादित बातें पढ़ा रही थीं। हेडमास्टर ने उन्हें पहले समझाया भी था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यह विवादित वाक्य पढ़ाया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।

स्थानीय लोगों और अभिभावकों ने भी यह बात जोर देकर कही कि ऐसा पहली बार नहीं है जब इस शिक्षिका ने बच्चों को इस तरह की आपत्तिजनक बातें पढ़ाई हों। अभिभावकों का आरोप है कि सुल्ताना खातून ने पहले भी राजनीतिक मुद्दों पर बच्चों को प्रभावित करने की कोशिश की है। उनके अनुसार, बच्चों के मन में जानबूझकर प्रधानमंत्री के प्रति नफरत और गलतफहमी फैलाने का प्रयास किया जा रहा है।

यह मामला सामने आने के बाद से स्थानीय लोग गुस्से में हैं। वे इस बात से नाराज हैं कि बच्चों को राजनीति में घसीटकर उनके मासूम मन को गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने शिक्षिका को तुरंत हटाने की माँग की है और कहा है कि बच्चों को सही और नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए, न कि राजनीतिक एजेंडे के तहत किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नफरत सिखाई जानी चाहिए।

ये पूरा मामला और भी संवेदनशील इसलिए बन गया है क्योंकि यह विद्यालय बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार के विधानसभा क्षेत्र में आता है। लोगों का कहना है कि जिस क्षेत्र के शिक्षा मंत्री स्वयं हों, वहाँ इस तरह की घटना गंभीर चिंता का विषय है। बच्चों को राजनीति से दूर रखते हुए सही दिशा में मार्गदर्शन मिलना चाहिए, लेकिन यहां प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नफरत फैलाने की कोशिश हो रही है।

जिला शिक्षा पदाधिकारी योगेश कुमार ने कहा, “प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी बातें सिखाना पूरी तरह अनुचित है। बच्चों के भविष्य के साथ इस तरह खेलना गलत है, और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, प्रखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) लखींद्र दास ने तुरंत कार्रवाई करते हुए शिक्षिका सुल्ताना खातून से स्पष्टीकरण माँगा। बीईओ ने कहा, “प्रधानमंत्री के खिलाफ इस तरह की अभद्र टिप्पणी एक लोक सेवक को शोभा नहीं देती। शिक्षिका से जवाब माँगा गया है और उचित कार्रवाई की जाएगी।” बहरहाल, शिक्षिका सुल्ताना खातून से जवाब तलब किया गया है। हालाँकि इस पूरे मामले में अभी तक शिक्षिका सुल्ताना खातून की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है और शिक्षा विभाग की जाँच रिपोर्ट का इंतजार है।

इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा के प्रति लोगों की सोच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि स्कूलों में बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है? बच्चों के मासूम मन में इस तरह की नफरत और गलतफहमियाँ डालना न केवल उनके भविष्य के लिए खतरा है, बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक है।

कारगिल आसानी से पहुँच पाएगी सेना, घंटों का सफर मिनटों में होगा… जानें जिस Z-Morh प्रोजेक्ट में काम कर रहे वर्करों को आतंकियों ने बनाया निशाना, वो ‘सुरंग’ विकास के लिए क्यों महत्वपूर्ण

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले में आतंकियों ने जिस जेड मोड़ सुरंग (Z-morh Tunnel) में काम कर रहे वर्करों की हत्या करके दहशत फैलाने का काम किया है, मालूम हो कि वो जेड मोड़ सुरंग केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा परियोजना है। इस सुरंग के बन जाने से न केवल वहाँ की जनता को फायदा मिलेगा बल्कि देश की सुरक्षा दृष्टि से भी ये सुरंग बहुत काम आएगी, शायद इसलिए आतंकियों को ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने इसमें जुटे वर्करों में डर भरने के लिए ये हरकत की।

जेड मोड़ सुरंग की जरूरत क्यों

जानकारी के मुताबिक, जेड-मोड़ सुरंग एक 6.4 किलोमीटर लंबी सुरंग है जो सोनमार्ग हेल्थ रिसॉर्ट को मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के कंगन शहर से जोड़ती है। यह सुरंग दो लेन वाली है और इसका निर्माण कार्य लगभग पूरा होने को है। बता दें कि इस परियोजना का उद्देश्य श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर स्थित सोनमार्ग क्षेत्र में साल भर सुगम यातायात सुनिश्चित करना है। बताया जा रहा है कि यहाँ क्षेत्र की ऊँचाई 8,500 फीट से अधिक है और सड़के पहाड़ियों पर है। ऐसे में जब भूस्खलन और बर्फबारी घाटी में होती है तो रास्ते बंद हो जाते हैं। अगर ये निर्माण पूरा होता है तो आवागमन आसान हो जाएगा। लोग अभी जिस सफर को घंटों में पूरा करते हैं वो मिनटों में निपटेगा।

इसके अलावा इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू ये भी है कि ये श्रीनगर और कारगिल के बीच बिना रुकावट यात्रा को सुनिश्चित करेगा और सेना के जवानों को लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों तक पहुँचा देगा। प्रदेश के विकास के नजरिए से इस सुरंग का निर्माण बहुत जरूरी है। खास बात ये है कि इस प्रोजेक्ट में इंटेलिजेंट ट्रैफिक प्रबंधन प्रणाली और आपातकालीन स्थिति के लिए एस्केप टनल जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। ये सुविधाएँ यातायात को बेहतर तरीके से नियंत्रित करेंगी और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी।

आतंकी हमला

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल के गगनगीर इलाके में रविवार को आतंकी हमला हुआ था। इस दौरान आतंकियों ने वर्करों के कैंप पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाई थी। हमले में 7 लोगों की मौत हुई थी। इन 7 लोगों में 6 सुरंग में काम करने वाले लोग और 1 डॉक्टर शामिल थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आतंकियों की गोली का शिकार होने वालों में मध्य प्रदेश से आए अनिल शुक्ला, बिहार के फहीम, नासिर, मोहम्मद हारिफ, कलीम, पंजाब के गुरमीत और जम्मू कश्मीर के रहने वाले शशि अब्रोल और डॉ शहनवाज शामिल थे।

वामपंथी मास्टरनी ने अपने लाल-सलाम कामरेडों सहित कई लोगों से ठगे करोड़ों रुपए: इंटरव्यू लेटर, सोना गिरवी रखने की कहानी से फँसाती थी जाल में

केरल के कासरगोड की एक वामपंथी नेत्री संचिता राय ने कई लोगों से करोड़ों की ठगी की। यह ठगी नौकरी देने के नाम पर की गई। नौकरी के नाम पर ठगे जाने वाले लोग नेत्री के दोस्त-रिश्तेदार और परिचित ही हैं। इस ठगी के लिए इंटरव्यू के फर्जी पोस्टकार्ड और सोना गिरवी रखने की फर्जी बातें तक की गईं। लोगों के साथ धोखाधड़ी करने वाली यह नेत्री शिक्षक भी थी।

फर्जी इंटरव्यू का लेटर

केस 1: संचिता ने जिन लोगों से नौकरी के नाम पर पैसे लिए, उन्हें इंटरव्यू के फर्जी लेटर भी भेजे। उसने यह लेटर खुद लिखे थे लेकिन दावा किया कि यह दिल्ली से आए हैं। ऐसे ही एक मामले में 22 फरवरी, 2024 को रामिसाथ के नाम के एक व्यक्ति के पास लेटर आया। इसमें केन्द्रीय विद्यालय के लिए इंटरव्यू की बात लिखी थी। इस व्यक्ति ने भी संचिता को नौकरी के लिए ₹5 लाख दिए थे। हालाँकि, मामला तब बिगड़ा जब उन्होंने पाया कि इस पत्र में इंटरव्यू के लिए लिखी तारीख पहले ही निकल चुकी थी।

जब संचिता को यह बात रामिसथ ने बताई तो उसने वादा किया कि वह दोबारा इंटरव्यू करवाएगी। संचिता ने कहा कि इस इंटरव्यू में दिल्ली से पत्र भेजने में गड़बड़ी हुई है। हालाँकि, दूसरा इंटरव्यू कभी करवाया ही नहीं गया और रामिसाथ के ₹5 लाख डूब गए।

केस 2: कुछ ऐसा ही मामला अक्षय के साथ हुआ। कासरगोड के ही रहने वाले अक्षय को 23 फरवरी, 2024 को इंटरव्यू का एक लेटर मिला। इसमें केंद्र सरकार के CPCRI में क्लर्क की नौकरी इंटरव्यू की तारीख 22 फरवरी लिखी हुई थी जो पहले ही निकल चुकी थी। ऊपर से इस इंटरव्यू की जगह भी कर्नाटक हुबली में बताई गई थी। अक्षय ने भी संचिता को इस गड़बड़ी की जानकारी दी तो उसने फिर वही बहाना बना दिया। संचिता ने अक्षय से भी दूसरे इंटरव्यू का वादा किया लेकिन यह वादा कभी पूरा नहीं हुआ।

जिससे लिए ₹15 लाख, उसको लेटर तक ना भेजा

ऑनमनोरमा की रिपोर्ट के अनुसार, संचिता ने इस ठगी का शिकार कई लोगों को बनाया। ऐसी ही एक पीड़िता अमिता ने संचिता को केंद्र सरकार के विभाग CPCRI में नौकरी के नाम पर ₹15 लाख दिए थे। यह नौकरी केन्द्रीय विद्यालय की बताई गई थी। अमिता को इस संबंध में कोई इंटरव्यू का लेटर नहीं मिला। इस बीच संचिता उन्हें बताती रही कि यह दिल्ली से भेजा जा चुका है। हालाँकि, यह झूठ था। अमिता ने इसके बाद लेटर को लेकर डाक विभाग में शिकायत भी दर्ज करवाई। यहाँ तक कि मामला डाक मंत्रालय तक आया।

जाँच के बाद पता चला कि कभी कोई लेटर भेजा नहीं गया। इससे संचिता की पोल खुल गई। संचिता पर इसके बाद भी उन्होंने शक नहीं किया। अमिता को संचिता लम्बे समय से जानती थी। वह दोनों साथ में पढ़ी भी हुई थी। इसके अलावा संचिता का अमिता के परिवार से भी अच्छा परिचय था। इसके बाद भी संचिता ने उनसे ठगी की। अमिता को बाद में इस विषय में सच्चाई का पता चला। इसके बाद उन्होंने भी FIR करवाई।

सोना गिरवी रखने की फर्जी बातें

संचिता ने लोगों को अत्यधिक दयालुता दिखा कर भी ठगा। उसने अपनी परिचित नादिया फातिमा को भी केंद्रीय विद्यालय में नौकरी का ऑफर दिया। संचिता ने बताया कि अगर नादिया को यह नौकरी मिली तो उसकी जिन्दगी बदल जाएगी। नादिया ने इस बात को लेकर मना कर दिया क्योंकि उसके पास पैसे नहीं थे।

संचिता ने इसके बाद नादिया को बताया कि वह अपने गहने गिरवी रख कर उसके लिए पैसे का इंतजाम करेगी। संचिता ने ऐसा करने की ₹1 लाख की एक रसीद भी भेजी। इसके बाद नादिया ने भी लगबग ₹1.5 लाख भेजे। हालाँकि नादिया को भी नौकरी नहीं मिली।

इसके अलावा संचिता ने किसी से ₹1 कर्नाटक सरकार में लाख तो किसी से ₹13 लाख भारतीय स्टेट बैंक में सरकार में नौकरी के नाम पर लिए। जिन लोगों से ठगी हुई, उनमें उसके साथी कम्युनिस्ट नेता भी थे। उसने अपने साथ पढ़ने वाले कम से कम 40 लोगों से ठगी करने की कोशिश की। उसके झाँसे में 7-8 लोग आ भी गए।

खुद ही लिखे थे पत्र

संचिता ने जिन लोगों को ठगा था जब उन्होंने इस बारे में खोजबीन की तो पता चला कि यह सब एक फर्जीवाडा था और वह ठगे जा चुके हैं। इसके बाद इन लोगों ने वह इंटरव्यू लेटर देखे जो कथित तौर पर दिल्ली से भेजे गए थे। इनको ध्यान से देखने पर पता चला कि यह सभी संचिता ने खुद लिखे थे और यह कासरगोड से भेजे गए थे ना कि दिल्ली से। उन्होंने इस बारे में और जाँच की तो उन्हें CCTV फुटेज भी मिला। इसके बाद जब इन्होने संचिता से पैसे माँगे तो वह बहाने बनाने लगी। उसने खुद को भी पीड़ित बताया।

8 FIR हुईं, अब भी गिरफ्तारी नहीं

संचिता के खिलाफ अब तक 8 अलग-अलग मामलों में FIR दर्ज करवाई जा चुकी हैं। सबमें यही कहानी है कि संचिता ने उसने नौकरी का वादा किया और लाखों रूपए लिए। इसके बाद नौकरी को लेकर कभी वादा नहीं पूरा हुआ। इस बीच संचिता का कहना है कि वह स्वयं ठगी गई है और उसे चंद्रशेखर नाम के एक आदमी ने ठगा है। पुलिस इस मामले में की जाँच कर रही है। उसका कहना है कि उसे अब तक ₹2 करोड़ की ठगी का पता चला है।

संचिता वर्तमान में कासरगोड के ही एक स्कूल में शिक्षक है। वामपंथी छात्र संगठन DYFI ने संचिता के खिलाफ FIR दर्ज किए जाने के बाद उसे निकाल दिया था। DYFI ने इसके अलावा और कोई कार्रवाई नहीं की है। वामपंथी नेताओं को इसमें भाजपा की साजिश लग रही है। दूसरी तरफ पुलिस ने भी अभी संचिता को पूछताछ तक के लिए नहीं बुलाया है। पुलिस का कहना है कि संचिता कोर्ट से अग्रिम जमानत माँग रही है और ऐसे में जब उस पर फैसला हो जाएगा तो वह उससे पूछताछ करेंगे।

संचिता और उसके पिता कासरगोड में भाजपा और RSS की आलोचना करने के लिए विख्यात हैं। उन्हें वामपंथी कार्यक्रमों में इसी काम के लिए बुलाया जाता है। संचिता का यह घोटाला खुलने के बाद वह खुद को भी पीड़ित बता कर बचने का प्रयास कर रही है।

LAC पर भारत-चीन के बीच बनी सहमति, पेट्रोलिंग फिर से होगी बहाल: ब्रिक्स बैठक से पहले महत्वपूर्ण बदलाव, जानिए विदेश मंत्रालय ने क्या बताया

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चल रहे तनाव को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण सहमति बनी है। इस नई सहमति के तहत दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में देपसांग और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाकों में पेट्रोलिंग फिर से शुरू करने और सैनिकों को पीछे हटाने (डिसइंगेजमेंट) पर सहमति जताई है। इस समझौते का उद्देश्य 2020 से जारी सीमा विवाद और तनाव को कम करना है, जब दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने थे।

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने सोमवार (21 अक्टूबर 2024) को इस घटनाक्रम की जानकारी दी और कहा कि पिछले कई हफ्तों से भारत और चीन के बीच राजनयिक और सैन्य स्तर पर चर्चा हो रही थी, जिसके परिणामस्वरूप यह सहमति बनी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्तमान में जो सहमति बनी है, उसके तहत दोनों देशों के बीच LAC पर पेट्रोलिंग की व्यवस्था को फिर से स्थापित किया जाएगा। देपसांग और डेमचोक जैसे संवेदनशील इलाकों में पहले से ही पेट्रोलिंग शुरू हो चुकी है, और जल्द ही दोनों पक्ष अपने सैनिकों को पीछे हटाना शुरू करेंगे। इसे सैन्य भाषा में डिसइंगेजमेंट कहा जाता है, जिसका मतलब है कि दोनों देशों के सैनिक विवादित क्षेत्रों से पीछे हट जाएँगे और स्थिति सामान्य करने की दिशा में कदम उठाए जाएँगे।

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा, “पिछले कई हफ्तों से भारत और चीन के बीच चल रही चर्चाओं के परिणामस्वरूप पेट्रोलिंग को लेकर एक समझौता हुआ है। यह समझौता दोनों देशों के सैनिकों की वापसी और स्थिति के समाधान की दिशा में अहम कदम है।”

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले महत्वपूर्ण सहमति

यह सहमति ऐसे समय में आई है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस में 22-23 अक्टूबर को होने वाले 16वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं। इस सम्मेलन से इतर, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पीएम मोदी के बीच द्विपक्षीय वार्ता की संभावनाएँ भी जताई जा रही हैं। विक्रम मिस्री ने कहा कि दोनों नेताओं के बीच बैठक को लेकर अब भी समय और अन्य व्यस्तताओं के अनुरूप काम किया जा रहा है।

गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच LAC को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। हालाँकि, 2020 में यह तनाव तब और बढ़ गया जब पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई। 15-16 जून 2020 को हुई इस झड़प में 20 भारतीय सैनिक बलिदान हो गए थे और कई चीनी सैनिक भी मारे गए थे। यह घटना दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सैन्य टकरावों में से एक थी, जिसने भारत-चीन संबंधों में गहरा असर डाला। इसके बाद दोनों देशों ने सीमा पर अतिरिक्त सैनिक तैनात कर दिए थे और कई महीनों तक तनाव की स्थिति बनी रही।

करवा चौथ के व्रत से बिगड़ेंगे हॉर्मोन, रोजे रखने के फायदे ही फायदे: इस ‘पत्रकारिता’ की पुड़िया बना अपने स्थान विशेष में डाल लो इंडियन एक्सप्रेस वालो

हिंदुओं के त्योहारों को बदनाम करने के कुत्सित प्रयास हर वामपंथी मीडिया का पसंदीदा काम है। अभी कल करवा चौथ बीता है। ऐसे में इंडियन एक्सप्रेस पर एक जानकारी से ओत-प्रोत लेख छपा। इस लेख में बताया गया कि कैसे महिलाओं के व्रत रखने पर सारा असर उनके शरीर पर पड़ता है। दिलचस्प बात ये है कि यही इंडियन एक्सप्रेस मार्च में अपनी साइट पर ये बता रहा था कि कैसे रमजान में किए जाने व्रत किसी को वेट लॉस, बीपी और कॉलेस्ट्रॉल कंट्रोल में मदद कर सकते हैं।

दिलचस्प बात ये है कि ये दोनों ही लेख 2024 में पब्लिश हुए हैं। करवा चौथ का लेख कल यानी 20 अक्तूबर को प्रकाशित किया गया और रमजान पर ज्ञान 11 मार्च को दिया गया। करवा चौथ वाले लेख में बताया गया कि लंबे व्रत से महिलाओं के हॉरमोन पर फर्क पड़ सकता है और मासिक धर्म आने में भी देरी हो सकती है।

करवा चौथ पर इंडियन एक्सप्रेस की हेडलाइन

इसके अलावा ज्यादा देर फास्ट रखने से तनाव पैदा करने वाले हॉर्मोन उत्पन्न हो सकते हैं और शुगर कम हो सकता है, बीपी गिर सकता है। साथ ही एनर्जी में कमी के साथ मूड स्विंग आदि भी हो सकते हैं और तो और प्रजनन क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

करवा चौथ पर इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित कंटेंट

करवा चौथ में क्योंकि रात में चाँद को अर्घ्य देने के बाद पानी पीने की परंपरा है इसलिए इंडियन एक्सप्रेस ने डॉक्टर के हवाले से ये भी बताया कि कैसे महिलाओं को पूरे दिन पानी पिए पीन नहीं रहना चाहिए। प्रोटीन युक्त डाइट लेनी चाहिए ताकि न स्ट्रेस और न तनाव हो।

करवा चौथ पर इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित कंटेंट

आप सोच रहे होंगे इंडियन एक्प्रेस ने जो बातें कहीं वो गलत कहाँ हैं? स्वास्थ्य के हिसाब से तो सब तार्किक बातें लिखीं है। बिलकुल तार्किक हो सकती हैं इन सवालों के लिए कि अगर कोई व्यक्ति भूखा रहे तो उससे उसके शरीर पर क्या असर होता है? मगर, यहाँ विवाद ये नहीं है कि उन्होंने महिलाओं के भूखे पेट रहने के तमाम नुकसान बताए। यहाँ मुद्दा ये है कि जो इंडियन एक्सप्रेस एक तरफ करवा चौथ की फास्टिंग को स्त्रियों के लिए नुकसानदायक बता रहा है वही इंडियन एक्प्रेस रमजान की फास्टिंग के अनगिनत फायदे बता चुका है।

रमजान पर इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित हेडलाइन

ऊपर जैसे देखा कि करवा चौथ वाले लेख में तो सीधे ऐसे दिखाया कि व्रत रखने के नुकसान इतने हैं कि अगर महिलाएँ इसे रखेंगी तो बीमार होना तय है मगर वहीं रमजान पर ये समाचार पोर्टल बताता है कि कैसे फास्टिंग के दौरान होने वाली समस्याओं से बचा जा सकता है। जैसे सहरी में जमकर कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फल, सब्जी खा लेने चाहिए ताकि बॉडी में किसी चीज की कमी न हो, इसी तरह जरूरत भर पानी भी पीना चाहिए ताकि शरीर में डिहाइड्रेशन न हो जाए। इस रिपोर्ट में तो ये भी बताया गया है कि रोजा रखते समय कसरत भी हो सकती है या नहीं। इसके साथ ये भी बताया है कि कैसे उन लोगों को फायदा होता है जिनका वजन कम होता है जिनके लिए मोटापा बड़ी समस्या है।

रमजान पर इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित कंटेंट

आप समझ सकते हैं कि दोनों लेखों में कैसे ‘नजरिए’ का फर्क पता चलता है। करवा चौथ से पहले छपे लेख में साफ तौर पर सिर्फ नकारात्मक पहलू बताए गए। अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे समझाया गया कि अगर शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ रहना है तो व्रत न करना बेहतर है। वहीं दूसरी ओर रमजान के रोजों के समय ये बताया गया कि कैसे रोजाधारियों को इसका फायदा होगा। और जो नुकसान भी होंगे उनसे के लिए क्या किया जा सकता है। यानी अगर कोई ये सोचे भी कि उसका स्वास्थ्य इतने समय तक रोजे रखने से न जाने ठीक रहे या नहीं तो इंडियन एक्सप्रेस का ये लेख उनके लिए हर समाधान दे रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की हिपोक्रेसी
इंडियन एक्सप्रेस की हिपोक्रेसी

हैरानी की बात ये है कि इतना दोहरा रवैया तब दिखाया गया जब करवा चौथ एक दिन का त्योहार है और रोजे पूरे महीने रखे जाते हैं। अगर रोजे रखने वालों के लिए इंडियन एक्सप्रेस इतनी मेहनत करके अपनी रिपोर्ट कर सकता है तो फिर करवा चौथ पर इतने नकारात्मकता फैलाने की आवश्यकता क्या है। अगर इन लेखों को पढ़कर इंडियन एक्सप्रेस पर हिंदू त्योहारों से घृणा करने वाला न कहा जाए तो क्या कहा जाए।

मालूम हो कि करवा चौथ की परंपरा का खत्म करने का प्रयास अकेला इंडियन एक्सप्रेस नहीं करता। तमाम वामपंथी और तथाकथित फेमिनिस्ट पति-पत्नी के इस त्योहार का मजाक बनाते हर साल दिखते हैं। सैंकड़ों सालों से चली आ रही इस रीत ये टुच्ची मानसिकता के लोग इस त्योहार को फिल्मों से शुरू हुई परंपरा बताते हैं। वहीं कुछ इसे अनपढ़ महिलाओं का त्योहार कहकर खुश होते दिखते हैं।

न मदरसों की मान्यता रद्द होगी, न सरकारी स्कूलों में बच्चे होंगे ट्रांसफर: NCPCR के निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, जमीयत उलमा-ए-हिंद ने किया था विरोध

उन मदरसों की मान्यता रद्द नहीं होगी जो शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 का पालन नहीं कर रहे। न ही गैर मान्यता प्राप्त मदरसों से गैर मुस्लिम छात्रों को सरकारी स्कूलों में ट्रांसफर किया जाएगा। इस संबंध में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। जमीयत-उलमा-ए-हिंद की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने अंतरिम आदेश जारी किया है। केंद्र और राज्य सरकारों को NCPCR के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई नहीं करने को कहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह अंतरिम आदेश एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। NCPCR के निर्देशों को चुनौती देते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसमें कहा गया कि यह अल्पसंख्यकों के अनुच्छेद 30 के तहत शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।

NCPCR ने सरकार को मदरसों को लेकर दिए थे ये निर्देश

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने 7 जून 2024 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया था कि जो मदरसे RTE अधिनियम के प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं, उनकी मान्यता वापस ली जाए। इसके बाद 25 जून 2024 को NCPCR ने शिक्षा और साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार को निर्देश दिया कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मौजूद मदरसों का निरीक्षण किया जाए और जो मदरसे RTE के मानदंडों का पालन नहीं कर रहे हैं, उनकी मान्यता और UDISE कोड तुरंत प्रभाव से वापस लिया जाए।

NCPCR ने यह भी सुझाव दिया कि मदरसों के लिए एक अलग श्रेणी का यूनिफ़ाइड डिस्ट्रिक्ट इंफ़ॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन (UDISE) कोड बनाया जाए, ताकि मान्यता प्राप्त, गैर-मान्यता प्राप्त और अवैध मदरसों की जानकारी एकत्र की जा सके।

इसके बाद, 26 जून 2024 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे राज्य में सरकारी अनुदान प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों का विस्तृत जाँच-पड़ताल करें, जो गैर-मुस्लिम बच्चों को प्रवेश दे रहे हैं, और सुनिश्चित करें कि सभी बच्चों को स्कूलों में तुरंत दाखिला दिया जाए। इसी प्रकार का निर्देश त्रिपुरा सरकार द्वारा 28 अगस्त 2024 को भी जारी किया गया था। 10 जुलाई 2024 को केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को NCPCR के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई करने का आदेश दिया।

इन निर्देशों को मजहबी अल्पसंख्यकों के शिक्षा देने के अधिकार (अनुच्छेद 30) के उल्लंघन के रूप में देखते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अनुच्छेद 30 भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार देता है। इस मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR के 7 जून 2024 और 25 जून 2024 के निर्देशों और उत्तर प्रदेश सरकार के 26 जून 2024 के आदेश और केंद्र सरकार के 10 जुलाई 2024 के निर्देशों पर रोक लगा दी। इसी तरह त्रिपुरा सरकार के 28 अगस्त 2024 के निर्देशों पर भी रोक लगाई गई।

इंदिरा जयसिंह ने जमीयत का रखा पक्ष

जमीयत उलमा-ए-हिंद की ओर से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने इस मामले में मौखिक रूप से यह अनुरोध किया कि याचिका में सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को पक्षकार बनाया जाए। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को अनुमति दी कि वे सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इस याचिका में पक्षकार बनाएँ। इस रिट याचिका को अधिवक्ता फ़ुज़ैल अहमद अय्यूबी द्वारा दायर किया गया था। जमीयत उलमा-ए-हिंद बनाम राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और अन्य के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि फिलहाल NCPCR और विभिन्न राज्यों द्वारा जारी निर्देशों के आधार पर किसी भी मदरसे के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 का उद्देश्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है। इस अधिनियम के तहत निजी और सरकारी स्कूलों को निर्धारित मानकों का पालन करना होता है। NCPCR का यह निर्देश इसी अधिनियम के तहत उन मदरसों पर लागू होता है जो मान्यता प्राप्त हैं या जिनकी शिक्षा प्रणाली UDISE (Unified District Information System for Education) कोड से जुड़ी है।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि NCPCR और सरकार के इन आदेशों से मजहबी अल्पसंख्यकों के शिक्षा संस्थानों की स्वतंत्रता का उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि इस प्रकार के आदेश न केवल मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन करते हैं, बल्कि यह भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत है, जो सभी नागरिकों को मजहबी स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार की गारंटी देता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलों को सुना और यह अंतरिम आदेश पारित किया कि अगली सुनवाई तक कोई भी राज्य या केंद्र सरकार NCPCR के निर्देशों पर कार्रवाई नहीं करेगी। इस मामले में कोर्ट द्वारा जारी अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल उन मदरसों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी जो RTE अधिनियम का पालन नहीं कर रहे हैं।

पराली का 93% प्रदूषण पंजाब से, पर जहरीली हवा के लिए हरियाणा-UP को जिम्मेदार ठहरा रही दिल्ली सरकार: ब्लेम गेम से दम घोंट रही AAP, जानिए सच्चाई

ठंड का मौसम आते ही दिल्ली में प्रदूषण और हवा के जहरीले होने का मुद्दा उठने लगा है। दिल्ली की हवा भी फिर से एक बार दूषित होने के संकेत दिखा रही है। कभी दिवाली का बहाना लेकर प्रदूषण को हिन्दू त्योहारों के मत्थे मढ़ने वाला लिबरल गैंग भी अब कुछ नहीं बोल पा रहा। पंजाब में धान कटाई का सीजन चालू होते ही पराली भी जलने लगी है। इन सबके बीच लगभग एक दशक से दिल्ली की सत्ता में काबिज आम आदमी पार्टी (AAP) ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए हरियाणा और उत्तर प्रदेश को जिम्मेदार बताना चालू कर दिया है।

क्या है दिल्ली का हाल?

अक्टूबर का महीना शुरू होने के बाद से लगातार दिल्ली की हवा में प्रदूषण की मात्रा बढ़ रही है। सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) को दिल्ली के आनंद विहार, पटपडगंज, नेहरू नगर और विवेक विहार समेत अधिकांश इलाकों में AQI का स्तर 300 के ऊपर है। कुछ एक इलाकों में यह आँकड़ा 400+ है। दिल्ली में स्मॉग की वापसी भी हो चुकी है। सड़कों पर विजिबिलिटी कम हो गई है। राजधानी दिल्ली में मास्क लगाए लोग दिखने लगे हैं। इस बीच यहाँ से गुजरने वाली यमुना में भी सफ़ेद जहरीला झाग तैर रहा है।

AAP सरकार का ‘ब्लेम गेम’ चालू

दिल्ली की हवा बिगड़ने के साथ ही AAP सरकार ने अपना पुराना ‘ब्लेम गेम’ चालू कर दिया है। 2022 से पहले AAP पंजाब में विपक्ष में थी तब वह दिल्ली के प्रदूषण के लिए पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान को दोषी बताते थे। हालाँकि, भगवंत मान की सरकार बनने के बाद अब इस लिस्ट से पंजाब को बाहर कर दिया गया है। अब सारा दोष भाजपा शासित हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश का है। प्रदूषण रोकने के लिए कोई कदम ना उठाने वाली AAP सरकार अब जल्दीबाजी में हास्यास्पद बातें कर रही है।

मुख्यमंत्री आतिशी ने हाल ही में दावा किया कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा से आने वाली बसें दिल्ली में प्रदूषण फैला रही हैं। उनका यह भी दावा है कि दिल्ली की गंदी हवा हरियाणा और यूपी से आती है। AAP ने इस हवा का जिक्र करते हुए हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मत्थे पूरा दोष मढ़ दिया लेकिन पंजाब का नाम नहीं लिया। प्रदूषण को राजनीतिक तराजू पर तोलने वाली AAP बाकी प्रदेशों को छोड़ दे तो उसने भी पिछले एक दशक में कोई ख़ास काम नहीं किया।

यह ब्लेम गेम आप के लिए कोई नई बात नहीं है। प्रदूषण का मुद्दा छोड़ भी दिया जाए तो दिल्ली में पानी की कमी से लेकर जल जमाव और कोरोना के ऑक्सीजन तक पर AAP ने यही ब्लेम गेम खेला है। दिल्ली की किसी भी समस्या का समाधान करने वाली AAP यह कार्ड पच्चीसों पर बार खेल चुकी है।

AAP सरकार पूरी तरह फेल

प्रदूषण कम करने के लिए AAP सरकार ऑड-ईवन नीति लेकर आई थी। वह भी फ्लॉप हो गई। इसके बाद दी दिल्ली में स्मॉग टॉवर पर AAP ने खूब हल्ला मचाया। इनकी संख्या 2-4 से ऊपर नहीं बढ़ी और जो बने भी हैं, वह आज के समय में एक इमारत के सिवा कुछ नहीं। AAP सरकार ने 2020 दिल्ली विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि वह प्रदूषण का स्तर अपनी सरकार आने के बाद तिहाई स्तर पर ले आएँगे, यह भी होता नहीं दिख रहा।

यहाँ तक कि दिल्ली के प्रदूषण से निपटने का सबसे आसान तरीका था कि वह अपनी सरकारी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक में बदले और इसकी शुरुआत बसों से करे। इसमें भी आप फिसड्डी है। दिल्ली में अभी लगभग 10000 बसों में 2000 बसें ही इलेक्ट्रिक हैं। यह भी केंद्र सरकार के सहयोग से आई हैं। दिल्ली में मेट्रो और RRTS नेटवर्क बढ़ाने पर भी AAP सरकार फिसड्डी रही है। दिल्ली में 2014 के बाद से 2022 तक कई बार एक्शन प्लान का शिगूफा छोड़ा जा चुका है, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ।

दिल्ली में प्रदूषण खत्म करने का एक नायाब तरीका AAP सरकार को दिल्ली के पटाखे बैन करना लगता है। उसने एक बार फिर दिल्ली में दिवाली से लेकर नए साल तक पटाखों पर बैन लगा दिया है। वह बात अलग है कि हाल ही में दिल्ली में केजरीवाल की रिहाई हुई थी, तब AAP कार्यकर्ताओं ने जम कर पटाखे फोड़े थे।

पंजाब की विफलता, दिल्ली पर भारी

भले ही अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते AAP सारा दोष हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान समेत बाकी संसार को दे लेकिन सच्चाई यह है कि दिल्ली के प्रदूषण में बड़ा रोल पंजाब का है। और दूसरा सत्य यह है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार इसमें फेल है। यह बात आँकड़ों से भी साबित होती है। यदि इस साल की बात की जाए तो अभी धान की कटाई सही शुरू भी नहीं हुई है और पंजाब में पराली जलाने का आँकड़ा 1400 के पार पहुँच गया है। यह आँकड़ा खुद भगवंत मान की सरकार का है।

इसके अलावा बीते सालों की बात की जाए तो 2023 में पराली जलाने की 93% से अधिक घटनाएँ पंजाब में हुई। पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में दिल्ली NCR, पंजाब और हरियाणा में मिलाकर पराली जलाने की कुल 39186 घटनाएँ हुई। इनमें से 36663 घटनाएँ अकेले पंजाब में हुई। पंजाब के मुकाबले हरियाणा में मात्र 2303 घटनाएँ दर्ज की गईं। यह आँकड़ा दिखाता है कि पंजाब की भगवंत मान की अगुवाई वाली AAP सरकार अपनी ही पार्टी की दिल्ली सरकार का सहयोग नहीं कर रही और इसका नुकसान नागरिक उठा रहे हैं।

देखना होगा कि दिल्ली में प्रदूषण का यह सालाना जलसा इस बार भी बिना किसी पक्के नतीजे के चले जाता है या फिर आतिशी की सरकार इसे रोकने के लिए क्कुह देर राजनीति छोड़ती है और अपने नागरिकों का साफ़ हवा में सांस लेने का अधिकार दे पाती है।

भारत में इस्लामी आतंक फैलाने के लिए सिंगापुर-खाड़ी देशों में 13000 लोगों का नेटवर्क, बना रहे थे जिहादी फौज: PFI पर ED डोजियर की डिटेल

ईडी ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर एक रिपोर्ट जारी उसके खतरनाक मंसूबों को बेनकाब किया है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) एक कट्टरपंथी संगठन है जिस पर भारत में आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने, साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने और एक इस्लामी जिहाद की योजना बनाने का आरोप है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) द्वारा की गई जाँचों से यह साफ़ हुआ है कि PFI ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी अपने नेटवर्क का विस्तार किया है।

इसका उद्देश्य समाज में अस्थिरता फैलाकर साम्प्रदायिक दंगों को भड़काना, सरकार के खिलाफ विद्रोह करना और हिंसा को उकसाना था। इस रिपोर्ट में PFI के वित्तीय नेटवर्क, विदेशी फंडिंग, और उसकी गतिविधियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है।

क्या है पीएफआई?

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की स्थापना 2006 में केरल में हुई थी। यह संगठन पहले एक ‘सामाजिक सुधारक’ संगठन के रूप में सामने आया, लेकिन धीरे-धीरे इसके असली उद्देश्य सामने आए। संगठन ने जल्दी ही भारत के विभिन्न राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, और अन्य राज्यों में विस्तार किया। इसके अलावा, PFI का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी खाड़ी देशों और सिंगापुर तक फैला हुआ है।

PFI का संचालन इसके शीर्ष नेताओं और महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। ये सदस्य संगठन के विभिन्न आयामों को संचालित करने, फंडिंग का प्रबंधन करने, और संगठन की रणनीति बनाने में शामिल हैं। पीएफआई के महत्वपूर्ण पदाधिकारियों में सिर्फ देश में बैठे कट्टरपंथी ही नहीं हैं, बल्कि विदेश में बैठे इस्लामी कट्टरपंथी भी हैं, जिनमें से देश में बैठे अधिकांश कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ को आप भी जान लीजिए..

KA रऊफ शरीफ, पद: नेशनल जनरल सेक्रेटरी, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI)

भूमिका: संगठन के यूथ विंग के संचालन की जिम्मेदारी थी। इनके नेतृत्व में युवाओं को संगठन में शामिल किया गया और विभिन्न स्थानों पर हिंसक गतिविधियों के लिए प्रेरित किया गया।

अब्दुल रज़ाक BP, पद: डिविजनल प्रेसिडेंट, केरल

भूमिका: स्थानीय स्तर पर संगठन का विस्तार और विभिन्न अभियानों का नेतृत्व किया।

अशरफ MK, पद: राज्य कार्यकारी परिषद (SEC) सदस्य, PFI केरल यूनिट

भूमिका: राज्य स्तर पर फंडिंग, कार्यक्रमों की योजना और सामरिक निर्णय लेने में शामिल थे।

शफीक़ पायथ, पद: PFI सदस्य, कतर

भूमिका: कतर से संगठन के लिए धन इकट्ठा करने और उसे भारत भेजने का कार्य किया।

परवेज़ अहमद, पद: दिल्ली स्टेट PFI के अध्यक्ष

भूमिका: दिल्ली में PFI की गतिविधियों का नेतृत्व और साम्प्रदायिक दंगे भड़काने में शामिल रहे।

साहुल हमीद, पद: PFI सदस्य, सिंगापुर

भूमिका: सिंगापुर से हवाला के जरिए धन इकट्ठा कर भारत में भेजने का कार्य किया।

KS एम. इब्राहिम उर्फ असगर, पद: अरिवगम मदरसा का सचिव

भूमिका: मदरसों का इस्तेमाल धार्मिक रूपांतरण के लिए किया और जिहादी प्रशिक्षण में शामिल रहे।

ओ. एम. ए. सलाम, पद: PFI के अध्यक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद (NEC) सदस्य

भूमिका: संगठन के मुख्य रणनीतिकार थे और राष्ट्रीय स्तर पर अभियानों का नेतृत्व किया।

अनिस अहमद, पद: NEC सदस्य

भूमिका: PFI के राष्ट्रीय अभियानों में प्रमुख भागीदारी।

ए. मोहम्मद युसुफ, पद: NEC सदस्य

भूमिका: संगठन के आतंकी एजेंडे को लागू करने में शामिल थे।

अब्दुल खाडर पुत्तूर, पद: शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षक

भूमिका: सदस्यों को हथियारों का प्रशिक्षण देने का कार्य करते थे।

PFI का नेटवर्क और फंडिंग

PFI का वित्तीय नेटवर्क अत्यंत जटिल और वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है। जाँच में पाया गया कि संगठन ने विभिन्न स्रोतों से कुल 94 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि जमा की थी। यह राशि हवाला, डमी दानदाताओं, और विदेशों से बैंकिंग चैनलों के माध्यम से प्राप्त की गई थी।

PFI ने देशभर में 29 बैंक खातों का उपयोग किया, जो कि केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में स्थित थे। यह धनराशि विभिन्न परियोजनाओं और अभियानों के लिए उपयोग की जाती थी, जिनमें हिंसक गतिविधियाँ और साम्प्रदायिक तनाव भड़काने के प्रयास शामिल थे​।

PFI का विदेशी नेटवर्क विशेष रूप से खाड़ी देशों में फैला हुआ था, जहाँ इसके 13,000 से अधिक सक्रिय सदस्य थे। संगठन ने सिंगापुर, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, ओमान और UAE में ज़िला कार्यकारी समितियाँ (District Executive Committees) बनाई थीं। हर समिति को करोड़ों रुपये जुटाने का लक्ष्य दिया गया था, और यह धन हवाला और अन्य गुप्त चैनलों के माध्यम से भारत में भेजा जाता था​।

पीएफआई खड़ा कर रही थी जिहादी फौज

PFI के सदस्यों को हिंसक अभियानों के लिए तैयार करने के लिए विशेष हथियार प्रशिक्षण दिया जाता था। केरल के कन्नूर जिले में स्थित नारथ कैम्प में 2013 में ऐसा ही एक प्रशिक्षण कैंप चल रहा था, जहाँ सदस्यों को विस्फोटक और हथियारों का उपयोग सिखाया जा रहा था। इन प्रशिक्षण शिविरों को ‘शारीरिक शिक्षा’ के नाम पर आयोजित किया जाता था, जबकि असल में यहाँ आक्रामक युद्धाभ्यास की तैयारी की जाती थी​।

PFI के सदस्यों ने फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में भाग लिया था, जिसमें उन्होंने हिंसा भड़काने का काम किया था। इसके अलावा, हाथरस (उत्तर प्रदेश) में संगठन के सदस्यों ने साम्प्रदायिक तनाव भड़काने का प्रयास किया। PFI का लक्ष्य था कि वह समाज में अस्थिरता फैलाकर सरकार और कानून-व्यवस्था को चुनौती दे सके​।

ED ने PFI और इसके सहयोगी संगठनों की 56.56 करोड़ रुपये की 35 संपत्तियाँ जब्त की हैं। इन संपत्तियों में कई ट्रस्टों और व्यक्तियों के नाम पर खरीदी गई जमीनें और इमारतें शामिल हैं। ये संपत्तियाँ धार्मिक संस्थानों और शैक्षिक ट्रस्टों के रूप में चलाई जा रही थीं, लेकिन इनका उपयोग संगठन की आतंकी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।

जाँच में पाया गया कि PFI ने नकली दानदाताओं के नाम पर फंडिंग इकट्ठा की थी और इसे विभिन्न संपत्तियों और खातों में छुपा रखा था। ED ने अब तक PFI से जुड़े 26 सदस्यों को गिरफ्तार किया है और 9 शिकायतें दर्ज की हैं​।

PFI की गतिविधियों की जाँच से साफ़ है कि यह संगठन केवल एक सामाजिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक संगठित आतंकवादी नेटवर्क था। इसके विदेशी फंडिंग, हवाला तंत्र, और देशभर में हिंसक गतिविधियों में संलिप्तता ने इसे भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बना दिया है। ED और NIA की जाँच में संगठन की गहरी जड़ें उजागर हो चुकी हैं, और इसके प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हालाँकि PFI का नेटवर्क अभी भी सक्रिय है और इसे पूरी तरह से समाप्त करने के लिए सुरक्षा एजेंसियाँ और भी कठोर कदम उठा रही हैं।

‘आस्था हो तो भगवान निकाल देते हैं रास्ता’: CJI चंद्रचूड़ ने बताया रामजन्मभूमि विवाद के समय कैसे खोजा समाधान, बोले- मैं रोज करता हूँ पूजा

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि अयोध्या राम जन्मभूमि पर चले मुकदमे में रास्ता निकालने के लिए उन्होंने भगवान का सहारा लिया। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर किसी को आस्था है भगवान रास्ता निकाल ही देते हैं। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ उस बेंच में शामिल थे, जिसने अयोध्या के रामजन्मभूमि विवाद पर फैसला दिया था।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “कई बार हमारे पास निर्णय के लिए मामले होते हैं, लेकिन हम समाधान पर नहीं पहुँच पाते। अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ, यह मामला तीन महीने तक हमारे सामने रहा। इसके बाद मैं भगवान के सामने बैठा और उनसे कहा कि उन्हें ही अब इसका समाधान खोजना होगा।”

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि वह रोज पूजा करते हैं। उन्होंने बताया, “मेरा विश्वास करें, अगर आपमें आस्था है, तो भगवान हमेशा कोई ना कोई रास्ता निकाल देंगे।” यह सारी बातें जस्टिस चंद्रचूड़ ने महाराष्ट्र के कन्हेरसर गाँव में कहीं। यह उनका पैतृक गाँव है, यहाँ वह अपने लोगों से बात कर रहे थे।

जस्टिस चंद्रचूड़ उस बेंच का हिस्सा थे जिसने रामजन्मभूमि पर अधिकार को लेकर मुकदमे में फैसला दिया था। 9 नवम्बर, 2019 को यह फैसला चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने दिया था। पाँच जजों की इस बेंच में वर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ भी शामिल थे।

इस बेंच ने फैसला दिया था कि विवादित बाबरी मस्जिद की पूरी जमीन हिन्दू पक्ष को दे दी जाए। इस मुकदमे में रामलला विराजमान और हिन्दू पक्ष की जीत हुई थी। इसके बाद यहाँ राम मंदिर का निर्माण चालू हो गया था। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी, 2024 को हुई थी। वर्तमान में मंदिर के बाकी हिस्से पर निर्माण चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को भी अयोध्या में 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ आगामी 10 नवम्बर, 2024 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। वह 9 नवम्बर, 2022 को देश के 51वें चीफ जस्टिस बने थे। उन्होंने जस्टिस संजीव खन्ना को देश के अगले चीफ जस्टिस के रूप में नामित किया है।