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पराली का 93% प्रदूषण पंजाब से, पर जहरीली हवा के लिए हरियाणा-UP को जिम्मेदार ठहरा रही दिल्ली सरकार: ब्लेम गेम से दम घोंट रही AAP, जानिए सच्चाई

ठंड का मौसम आते ही दिल्ली में प्रदूषण और हवा के जहरीले होने का मुद्दा उठने लगा है। दिल्ली की हवा भी फिर से एक बार दूषित होने के संकेत दिखा रही है। कभी दिवाली का बहाना लेकर प्रदूषण को हिन्दू त्योहारों के मत्थे मढ़ने वाला लिबरल गैंग भी अब कुछ नहीं बोल पा रहा। पंजाब में धान कटाई का सीजन चालू होते ही पराली भी जलने लगी है। इन सबके बीच लगभग एक दशक से दिल्ली की सत्ता में काबिज आम आदमी पार्टी (AAP) ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए हरियाणा और उत्तर प्रदेश को जिम्मेदार बताना चालू कर दिया है।

क्या है दिल्ली का हाल?

अक्टूबर का महीना शुरू होने के बाद से लगातार दिल्ली की हवा में प्रदूषण की मात्रा बढ़ रही है। सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) को दिल्ली के आनंद विहार, पटपडगंज, नेहरू नगर और विवेक विहार समेत अधिकांश इलाकों में AQI का स्तर 300 के ऊपर है। कुछ एक इलाकों में यह आँकड़ा 400+ है। दिल्ली में स्मॉग की वापसी भी हो चुकी है। सड़कों पर विजिबिलिटी कम हो गई है। राजधानी दिल्ली में मास्क लगाए लोग दिखने लगे हैं। इस बीच यहाँ से गुजरने वाली यमुना में भी सफ़ेद जहरीला झाग तैर रहा है।

AAP सरकार का ‘ब्लेम गेम’ चालू

दिल्ली की हवा बिगड़ने के साथ ही AAP सरकार ने अपना पुराना ‘ब्लेम गेम’ चालू कर दिया है। 2022 से पहले AAP पंजाब में विपक्ष में थी तब वह दिल्ली के प्रदूषण के लिए पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान को दोषी बताते थे। हालाँकि, भगवंत मान की सरकार बनने के बाद अब इस लिस्ट से पंजाब को बाहर कर दिया गया है। अब सारा दोष भाजपा शासित हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश का है। प्रदूषण रोकने के लिए कोई कदम ना उठाने वाली AAP सरकार अब जल्दीबाजी में हास्यास्पद बातें कर रही है।

मुख्यमंत्री आतिशी ने हाल ही में दावा किया कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा से आने वाली बसें दिल्ली में प्रदूषण फैला रही हैं। उनका यह भी दावा है कि दिल्ली की गंदी हवा हरियाणा और यूपी से आती है। AAP ने इस हवा का जिक्र करते हुए हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मत्थे पूरा दोष मढ़ दिया लेकिन पंजाब का नाम नहीं लिया। प्रदूषण को राजनीतिक तराजू पर तोलने वाली AAP बाकी प्रदेशों को छोड़ दे तो उसने भी पिछले एक दशक में कोई ख़ास काम नहीं किया।

यह ब्लेम गेम आप के लिए कोई नई बात नहीं है। प्रदूषण का मुद्दा छोड़ भी दिया जाए तो दिल्ली में पानी की कमी से लेकर जल जमाव और कोरोना के ऑक्सीजन तक पर AAP ने यही ब्लेम गेम खेला है। दिल्ली की किसी भी समस्या का समाधान करने वाली AAP यह कार्ड पच्चीसों पर बार खेल चुकी है।

AAP सरकार पूरी तरह फेल

प्रदूषण कम करने के लिए AAP सरकार ऑड-ईवन नीति लेकर आई थी। वह भी फ्लॉप हो गई। इसके बाद दी दिल्ली में स्मॉग टॉवर पर AAP ने खूब हल्ला मचाया। इनकी संख्या 2-4 से ऊपर नहीं बढ़ी और जो बने भी हैं, वह आज के समय में एक इमारत के सिवा कुछ नहीं। AAP सरकार ने 2020 दिल्ली विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि वह प्रदूषण का स्तर अपनी सरकार आने के बाद तिहाई स्तर पर ले आएँगे, यह भी होता नहीं दिख रहा।

यहाँ तक कि दिल्ली के प्रदूषण से निपटने का सबसे आसान तरीका था कि वह अपनी सरकारी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक में बदले और इसकी शुरुआत बसों से करे। इसमें भी आप फिसड्डी है। दिल्ली में अभी लगभग 10000 बसों में 2000 बसें ही इलेक्ट्रिक हैं। यह भी केंद्र सरकार के सहयोग से आई हैं। दिल्ली में मेट्रो और RRTS नेटवर्क बढ़ाने पर भी AAP सरकार फिसड्डी रही है। दिल्ली में 2014 के बाद से 2022 तक कई बार एक्शन प्लान का शिगूफा छोड़ा जा चुका है, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ।

दिल्ली में प्रदूषण खत्म करने का एक नायाब तरीका AAP सरकार को दिल्ली के पटाखे बैन करना लगता है। उसने एक बार फिर दिल्ली में दिवाली से लेकर नए साल तक पटाखों पर बैन लगा दिया है। वह बात अलग है कि हाल ही में दिल्ली में केजरीवाल की रिहाई हुई थी, तब AAP कार्यकर्ताओं ने जम कर पटाखे फोड़े थे।

पंजाब की विफलता, दिल्ली पर भारी

भले ही अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते AAP सारा दोष हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान समेत बाकी संसार को दे लेकिन सच्चाई यह है कि दिल्ली के प्रदूषण में बड़ा रोल पंजाब का है। और दूसरा सत्य यह है कि पंजाब की भगवंत मान सरकार इसमें फेल है। यह बात आँकड़ों से भी साबित होती है। यदि इस साल की बात की जाए तो अभी धान की कटाई सही शुरू भी नहीं हुई है और पंजाब में पराली जलाने का आँकड़ा 1400 के पार पहुँच गया है। यह आँकड़ा खुद भगवंत मान की सरकार का है।

इसके अलावा बीते सालों की बात की जाए तो 2023 में पराली जलाने की 93% से अधिक घटनाएँ पंजाब में हुई। पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में दिल्ली NCR, पंजाब और हरियाणा में मिलाकर पराली जलाने की कुल 39186 घटनाएँ हुई। इनमें से 36663 घटनाएँ अकेले पंजाब में हुई। पंजाब के मुकाबले हरियाणा में मात्र 2303 घटनाएँ दर्ज की गईं। यह आँकड़ा दिखाता है कि पंजाब की भगवंत मान की अगुवाई वाली AAP सरकार अपनी ही पार्टी की दिल्ली सरकार का सहयोग नहीं कर रही और इसका नुकसान नागरिक उठा रहे हैं।

देखना होगा कि दिल्ली में प्रदूषण का यह सालाना जलसा इस बार भी बिना किसी पक्के नतीजे के चले जाता है या फिर आतिशी की सरकार इसे रोकने के लिए क्कुह देर राजनीति छोड़ती है और अपने नागरिकों का साफ़ हवा में सांस लेने का अधिकार दे पाती है।

भारत में इस्लामी आतंक फैलाने के लिए सिंगापुर-खाड़ी देशों में 13000 लोगों का नेटवर्क, बना रहे थे जिहादी फौज: PFI पर ED डोजियर की डिटेल

ईडी ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर एक रिपोर्ट जारी उसके खतरनाक मंसूबों को बेनकाब किया है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) एक कट्टरपंथी संगठन है जिस पर भारत में आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने, साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने और एक इस्लामी जिहाद की योजना बनाने का आरोप है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) द्वारा की गई जाँचों से यह साफ़ हुआ है कि PFI ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी अपने नेटवर्क का विस्तार किया है।

इसका उद्देश्य समाज में अस्थिरता फैलाकर साम्प्रदायिक दंगों को भड़काना, सरकार के खिलाफ विद्रोह करना और हिंसा को उकसाना था। इस रिपोर्ट में PFI के वित्तीय नेटवर्क, विदेशी फंडिंग, और उसकी गतिविधियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है।

क्या है पीएफआई?

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की स्थापना 2006 में केरल में हुई थी। यह संगठन पहले एक ‘सामाजिक सुधारक’ संगठन के रूप में सामने आया, लेकिन धीरे-धीरे इसके असली उद्देश्य सामने आए। संगठन ने जल्दी ही भारत के विभिन्न राज्यों जैसे केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, और अन्य राज्यों में विस्तार किया। इसके अलावा, PFI का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी खाड़ी देशों और सिंगापुर तक फैला हुआ है।

PFI का संचालन इसके शीर्ष नेताओं और महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। ये सदस्य संगठन के विभिन्न आयामों को संचालित करने, फंडिंग का प्रबंधन करने, और संगठन की रणनीति बनाने में शामिल हैं। पीएफआई के महत्वपूर्ण पदाधिकारियों में सिर्फ देश में बैठे कट्टरपंथी ही नहीं हैं, बल्कि विदेश में बैठे इस्लामी कट्टरपंथी भी हैं, जिनमें से देश में बैठे अधिकांश कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कुछ को आप भी जान लीजिए..

KA रऊफ शरीफ, पद: नेशनल जनरल सेक्रेटरी, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI)

भूमिका: संगठन के यूथ विंग के संचालन की जिम्मेदारी थी। इनके नेतृत्व में युवाओं को संगठन में शामिल किया गया और विभिन्न स्थानों पर हिंसक गतिविधियों के लिए प्रेरित किया गया।

अब्दुल रज़ाक BP, पद: डिविजनल प्रेसिडेंट, केरल

भूमिका: स्थानीय स्तर पर संगठन का विस्तार और विभिन्न अभियानों का नेतृत्व किया।

अशरफ MK, पद: राज्य कार्यकारी परिषद (SEC) सदस्य, PFI केरल यूनिट

भूमिका: राज्य स्तर पर फंडिंग, कार्यक्रमों की योजना और सामरिक निर्णय लेने में शामिल थे।

शफीक़ पायथ, पद: PFI सदस्य, कतर

भूमिका: कतर से संगठन के लिए धन इकट्ठा करने और उसे भारत भेजने का कार्य किया।

परवेज़ अहमद, पद: दिल्ली स्टेट PFI के अध्यक्ष

भूमिका: दिल्ली में PFI की गतिविधियों का नेतृत्व और साम्प्रदायिक दंगे भड़काने में शामिल रहे।

साहुल हमीद, पद: PFI सदस्य, सिंगापुर

भूमिका: सिंगापुर से हवाला के जरिए धन इकट्ठा कर भारत में भेजने का कार्य किया।

KS एम. इब्राहिम उर्फ असगर, पद: अरिवगम मदरसा का सचिव

भूमिका: मदरसों का इस्तेमाल धार्मिक रूपांतरण के लिए किया और जिहादी प्रशिक्षण में शामिल रहे।

ओ. एम. ए. सलाम, पद: PFI के अध्यक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद (NEC) सदस्य

भूमिका: संगठन के मुख्य रणनीतिकार थे और राष्ट्रीय स्तर पर अभियानों का नेतृत्व किया।

अनिस अहमद, पद: NEC सदस्य

भूमिका: PFI के राष्ट्रीय अभियानों में प्रमुख भागीदारी।

ए. मोहम्मद युसुफ, पद: NEC सदस्य

भूमिका: संगठन के आतंकी एजेंडे को लागू करने में शामिल थे।

अब्दुल खाडर पुत्तूर, पद: शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षक

भूमिका: सदस्यों को हथियारों का प्रशिक्षण देने का कार्य करते थे।

PFI का नेटवर्क और फंडिंग

PFI का वित्तीय नेटवर्क अत्यंत जटिल और वैश्विक स्तर पर फैला हुआ है। जाँच में पाया गया कि संगठन ने विभिन्न स्रोतों से कुल 94 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि जमा की थी। यह राशि हवाला, डमी दानदाताओं, और विदेशों से बैंकिंग चैनलों के माध्यम से प्राप्त की गई थी।

PFI ने देशभर में 29 बैंक खातों का उपयोग किया, जो कि केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में स्थित थे। यह धनराशि विभिन्न परियोजनाओं और अभियानों के लिए उपयोग की जाती थी, जिनमें हिंसक गतिविधियाँ और साम्प्रदायिक तनाव भड़काने के प्रयास शामिल थे​।

PFI का विदेशी नेटवर्क विशेष रूप से खाड़ी देशों में फैला हुआ था, जहाँ इसके 13,000 से अधिक सक्रिय सदस्य थे। संगठन ने सिंगापुर, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, ओमान और UAE में ज़िला कार्यकारी समितियाँ (District Executive Committees) बनाई थीं। हर समिति को करोड़ों रुपये जुटाने का लक्ष्य दिया गया था, और यह धन हवाला और अन्य गुप्त चैनलों के माध्यम से भारत में भेजा जाता था​।

पीएफआई खड़ा कर रही थी जिहादी फौज

PFI के सदस्यों को हिंसक अभियानों के लिए तैयार करने के लिए विशेष हथियार प्रशिक्षण दिया जाता था। केरल के कन्नूर जिले में स्थित नारथ कैम्प में 2013 में ऐसा ही एक प्रशिक्षण कैंप चल रहा था, जहाँ सदस्यों को विस्फोटक और हथियारों का उपयोग सिखाया जा रहा था। इन प्रशिक्षण शिविरों को ‘शारीरिक शिक्षा’ के नाम पर आयोजित किया जाता था, जबकि असल में यहाँ आक्रामक युद्धाभ्यास की तैयारी की जाती थी​।

PFI के सदस्यों ने फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में भाग लिया था, जिसमें उन्होंने हिंसा भड़काने का काम किया था। इसके अलावा, हाथरस (उत्तर प्रदेश) में संगठन के सदस्यों ने साम्प्रदायिक तनाव भड़काने का प्रयास किया। PFI का लक्ष्य था कि वह समाज में अस्थिरता फैलाकर सरकार और कानून-व्यवस्था को चुनौती दे सके​।

ED ने PFI और इसके सहयोगी संगठनों की 56.56 करोड़ रुपये की 35 संपत्तियाँ जब्त की हैं। इन संपत्तियों में कई ट्रस्टों और व्यक्तियों के नाम पर खरीदी गई जमीनें और इमारतें शामिल हैं। ये संपत्तियाँ धार्मिक संस्थानों और शैक्षिक ट्रस्टों के रूप में चलाई जा रही थीं, लेकिन इनका उपयोग संगठन की आतंकी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था।

जाँच में पाया गया कि PFI ने नकली दानदाताओं के नाम पर फंडिंग इकट्ठा की थी और इसे विभिन्न संपत्तियों और खातों में छुपा रखा था। ED ने अब तक PFI से जुड़े 26 सदस्यों को गिरफ्तार किया है और 9 शिकायतें दर्ज की हैं​।

PFI की गतिविधियों की जाँच से साफ़ है कि यह संगठन केवल एक सामाजिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक संगठित आतंकवादी नेटवर्क था। इसके विदेशी फंडिंग, हवाला तंत्र, और देशभर में हिंसक गतिविधियों में संलिप्तता ने इसे भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बना दिया है। ED और NIA की जाँच में संगठन की गहरी जड़ें उजागर हो चुकी हैं, और इसके प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हालाँकि PFI का नेटवर्क अभी भी सक्रिय है और इसे पूरी तरह से समाप्त करने के लिए सुरक्षा एजेंसियाँ और भी कठोर कदम उठा रही हैं।

‘आस्था हो तो भगवान निकाल देते हैं रास्ता’: CJI चंद्रचूड़ ने बताया रामजन्मभूमि विवाद के समय कैसे खोजा समाधान, बोले- मैं रोज करता हूँ पूजा

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि अयोध्या राम जन्मभूमि पर चले मुकदमे में रास्ता निकालने के लिए उन्होंने भगवान का सहारा लिया। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर किसी को आस्था है भगवान रास्ता निकाल ही देते हैं। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ उस बेंच में शामिल थे, जिसने अयोध्या के रामजन्मभूमि विवाद पर फैसला दिया था।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “कई बार हमारे पास निर्णय के लिए मामले होते हैं, लेकिन हम समाधान पर नहीं पहुँच पाते। अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ, यह मामला तीन महीने तक हमारे सामने रहा। इसके बाद मैं भगवान के सामने बैठा और उनसे कहा कि उन्हें ही अब इसका समाधान खोजना होगा।”

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि वह रोज पूजा करते हैं। उन्होंने बताया, “मेरा विश्वास करें, अगर आपमें आस्था है, तो भगवान हमेशा कोई ना कोई रास्ता निकाल देंगे।” यह सारी बातें जस्टिस चंद्रचूड़ ने महाराष्ट्र के कन्हेरसर गाँव में कहीं। यह उनका पैतृक गाँव है, यहाँ वह अपने लोगों से बात कर रहे थे।

जस्टिस चंद्रचूड़ उस बेंच का हिस्सा थे जिसने रामजन्मभूमि पर अधिकार को लेकर मुकदमे में फैसला दिया था। 9 नवम्बर, 2019 को यह फैसला चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने दिया था। पाँच जजों की इस बेंच में वर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ भी शामिल थे।

इस बेंच ने फैसला दिया था कि विवादित बाबरी मस्जिद की पूरी जमीन हिन्दू पक्ष को दे दी जाए। इस मुकदमे में रामलला विराजमान और हिन्दू पक्ष की जीत हुई थी। इसके बाद यहाँ राम मंदिर का निर्माण चालू हो गया था। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी, 2024 को हुई थी। वर्तमान में मंदिर के बाकी हिस्से पर निर्माण चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को भी अयोध्या में 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ आगामी 10 नवम्बर, 2024 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। वह 9 नवम्बर, 2022 को देश के 51वें चीफ जस्टिस बने थे। उन्होंने जस्टिस संजीव खन्ना को देश के अगले चीफ जस्टिस के रूप में नामित किया है।

सिर फोड़ा, जबड़ा फाड़ा: बहराइच में सुधाकर तिवारी पर भी टूटी थी इस्लामी भीड़, भाई ने बताया- मस्जिद के पास बेहोश मिले थे, सबसे ज्यादा हमले यहीं हुए

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में रविवार (13 अक्टूबर 2024) को भड़की हिंसा में रामगोपाल मिश्रा नाम के युवक की मुस्लिम भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड के बाद देश की वामपंथी व इस्लामी मीडिया ने एक प्रोपोगेंडा चलाया जिसमें माँ दुर्गा के विसर्जन में जा रहे श्रद्धालुओं को ही खलनायक दिखाया जाने लगा। जोर-शोर से प्रचार किया जाने लगा कि माँ दुर्गा के भक्तों ने एकजुट हो कर मुस्लिमों के घरों और दुकानों पर हमले किए। बहराइच पुलिस ने भी तब तक सबूत नहीं माँगे। ऑपइंडिया ने इन आरोपों की पड़ताल घटनास्थल पर जाकर की तो मामला उलटा निकला। यहाँ मुस्लिम भीड़ के हमले में हिन्दू ही प्रताड़ित मिले।

रामगोपाल की हत्या करने के साथ मुस्लिम भीड़ ने कई हिन्दुओं को अधमरा कर दिया था। उन्हीं में से एक पीड़ित हैं सुधाकर तिवारी। सुधाकर तिवारी हरदी थानाक्षेत्र के ही रहने वाले हैं। वो खेती-किसानी करके परिवार पालते हैं। उनकी 3 बेटियाँ व एक छोटा बेटा है। सबसे बड़ी बेटी की की शादी इसी साल होने वाली है। धारदार हथियारों से गंभीर रूप से घायल सुधाकर तिवारी को बहराइच से लखनऊ रेफर किया गया था। डॉक्टरों के अथक प्रयास से सुधाकर तिवारी की जान बच तो गई लेकिन गहरे घाव देह पर अभी भी देखे जा सकते हैं।

पुलिस के लाठीचार्ज से भटक गए थे राह

ऑपइंडिया ने सुधाकर तिवारी के भाई प्रभाकर से बात की। प्रभाकर ने हमें बताया कि उनके भाई माँ दुर्गा के विसर्जन जुलूस में शामिल थे। उनके पास एक वीडियो भी है जब वो शांतिपूर्वक विसर्जन यात्रा में आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान विसर्जन यात्रा पर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ जिसमें सुधाकर तिवारी रास्ता भटक गए। प्रभाकर बताते हैं कि उनके भाई लाठीचार्ज से बचने के लिए जिस गली में गलती से चले गए वो मुस्लिम बहुल थी। इस गली में मांस बेचने वालों की दुकानें हैं।

प्रभाकर बताते हैं कि जब उनके भाई उस मुस्लिम बहुल गली में पहुँचे तब वहाँ कुछ हमलावरों ने रोक लिया। सुधाकर के सिर और जबड़े पर धारदार हथियार और लाठी-डंडों से वार किया गया। लहूलुहान सुधाकर जमीन पर गिर गए और बेहोश हो गए। दावा है कि सुधाकर को हमलावर भीड़ ने मरा जानकर वहीं छोड़ दिया और आगे बढ़ गई। मस्जिद के पास बेहोशी की हालत में मिले सुधाकर को सरकारी एम्बुलेंस ने स्थानीय अस्पताल पहुँचाया। एक लाइन में प्रभाकर ने स्वीकारा, “मस्जिद के पास से ही ज्यादा हमले हुए।”

हालत थी गंभीर, पहले बहराइच फिर लखनऊ रेफर

प्रभाकर तिवारी ने ऑपइंडिया को आगे बताया कि उनके भाई को इतनी बेरहमी से मारा गया था कि स्थानीय अस्पताल ने इलाज के लिए बहराइच मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया था। यहाँ पहुँचने के बाद मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने भी स्थिति को गंभीर बताते हुए लखनऊ रेफर किया। लखनऊ जाते समय एम्बुलेंस में कोई पुलिस स्टाफ मौजूद नहीं था। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में लगभग 5 दिनों तक सुधाकर तिवारी का इलाज चला तब जाकर उनकी जान बच पाई।

एम्बुलेंस से अस्पताल जाते सुधाकर तिवारी की कुछ तस्वीरें भी ऑपइंडिया के पास मौजूद हैं। इन तस्वीरों में सुधाकर का जबड़ा फटा हुआ है जिससे खून बह रहा है। CT स्कैन सहित इलाज में लगे कई शुरुआती ख़र्च सुधाकर के परिजनों ने किए। बाद में कुछ इलाज सरकारी खर्चे पर हुआ। रविवार (20 अक्टूबर) को सुधाकर तिवारी को वापस घर लाया गया है। उनके तमाम घाव और उन पर बँधी पट्टियाँ अभी भी साफ़ देखी जा सकती हैं। जबड़ा फट जाने की वजह से सुधाकर तिवारी बोलने में असहज हैं।

धार्मिक माहौल वाले घर में मच गई चीख पुकार

प्रभाकर तिवारी हमें आगे बताते हैं कि उनका पूरा परिवार धार्मिक है जो माँ दुर्गा की पूरी नवरात्रि व्रत रखता है। विसर्जन के दिन जैसे ही उनके परिजनों को पता चला कि सुधाकर हमले के शिकार हो गए तो घर में चीख-पुकार मच गई। औरतें परिवार में रो रहीं थीं तो पुरुष सुधाकर की तलाश में निकल पड़े थे। आखिरकार अपना खून आदि देकर जैसे-तैसे सुधाकर तिवारी की जान बच पाई। प्रभाकर को आशंका है कि घटना के दिन सिर पर लाल गमछा देख कर ही भीड़ में हमलावरों ने उनके भाई को टारगेट पर लिया होगा।

मुस्लिम बहुल हो जाए तो भविष्य में प्रदेश देश भी छोड़ दें?

प्रभाकर तिवारी का कहना है कि जिस रास्ते से इस बार माँ दुर्गा की विसर्जन यात्रा इस्लामी भीड़ के हमले का शिकार बनी उसे मुस्लिम बहुल जैसा क्षेत्र कहना बेतुकी बात है। उन्होंने रास्ते को मुस्लिम इलाका कहने वालों से सवाल कर डाला। प्रभाकर ने कहा, “जिस रास्ते पर हमला हुआ वहीं से विसर्जन यात्रा हर साल निकलती है। अब मुस्लिम बहुल जैसे कुतर्क देना कहीं से उचित नहीं। क्या भविष्य में मुस्लिम बहुल हो जाए तो प्रदेश और देश भी छोड़ना पड़ेगा ?” प्रभाकर ने ऐसे बातें करने वालों को भी सोच-समझकर बोलने की सलाह दी।

उन्नाव के एक गाँव में शिव मंदिर का जीर्णोद्धार नहीं कर सकते हिंदू, क्योंकि मुस्लिम बहुसंख्यक हैं-पास में ही है मस्जिद: ऑपइंडिया ने पूछा सवाल तो जवाब देने में आनाकानी करने लगा SHO

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के रानीपुर गाँव में स्थित मंदिर के जीर्णोद्धार को इस्लामी कट्टरपंथियों ने रोकने का प्रयास किया है। बीघापुर कोतवाली की निबई चौकी के अंतर्गत आने वाले इस गाँव में निहाल, अनीस खान, असगर खान, शोएब, सलीम, यूनुस, अच्छे, रईस जैसे स्थानीय कट्टरपंथियों का कहना है कि मंदिर के निर्माण से मस्जिद में नमाज़ के समय बाधा उत्पन्न होगी, क्योंकि मस्जिद केवल 100 मीटर की दूरी पर स्थित है।

रानीपुर गाँव मुस्लिम बहुल है, जहाँ सवा सौ से अधिक मुस्लिम परिवार और केवल 25-30 हिंदू परिवार रहते हैं। इस गाँव में एक शिव मंदिर है, जो 70 वर्ष से भी अधिक पुराना है। इस मंदिर के चबूतरे पर हिंदू परिवार अपने धार्मिक कार्य जैसे मुंडन, छेदन और शादी-विवाह संपन्न करते हैं। मंदिर के चबूतरे पर चारों ओर दीवारें और खंभे खड़े हैं, लेकिन छत डालने का कार्य अभी लंबित है, क्योंकि गाँव के निहाल, अनीस खान, असगर खान, शोएब, सलीम, यूनुस, अच्छे, रईस जैसे बहुसंख्यक इस्लामी कट्टरपंथियों को ये पसंद नहीं है। इस्लामी कट्टरपंथियों का कहना है मंदिर से सिर्फ 100 मीटर दूर मस्जिद है। मंदिर बन जाने से उनकी नमाज में दिक्कत आएगी।

यह विवाद 7-8 अक्टूबर 2024 को पुलिस की चौकी से बीघापुर कोतवाली तक पहुँचा। पुलिस ने तात्कालिक रूप से 26 मुस्लिमों और 6 हिंदुओं को पाबंद किया, ताकि मामला ठंडा पड़ जाए। हालाँकि मामला शांत होता नहीं दिखा, और 20 अक्टूबर 2024 को यह विवाद सोशल मीडिया पर छा गया।

इस पर स्थानीय दैनिक जागरण अखबार ने रिपोर्ट बनाई। जागरण की टीम ने मामले में सीओ से भी बात की और फिर सोमवार (21 अक्टूबर 2024) को एक न्यूज पब्लिश की है। इस न्यूज रिपोर्ट में बीघापुर कोतवाली क्षेत्र के सीओ ऋषिकांत शुक्ल का बयान है। जिसमें उन्होंने कहा है कि धार्मिक स्थल बनाने से पहले प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है। ग्रामीणों (हिंदुओं) को प्रशासन से अनुमति लेने के लिए कहा गया है। प्रशासन से अनुमति (अगर) मिल गई, तो मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो सकता है। इस पूरे मामले की रिपोर्ट एसडीएम को भेजी जा चुकी है।

इतना तो ठीक है। सीओ ने बयान दे दिया, आधिकारिक कार्रवाई चल रही है। चूँकि मामले में पाबंदी की गई है, ऐसे में ये मामला स्थानीय कोतवाल (कोतवाली के SHO अब कोतवाल ही हुए) को भी पता ही होगा, लेकिन जब ऑपइंडिया ने SHO राजपाल से फोन पर संपर्क काटा, तो उन्होंने साफ तौर पर मामले से ही इनकार कर दिया, लेकिन जब मामले की मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से सीओ के बयान की जानकारी दी गई, तो उन्होंने पूरे मामले में सफाई देने के अंदाज में आ गए।

जो SHO अभी तक ये कह रहे थे कि कोई विवाद ही नहीं है, वो मामले को घुमाते दिखे। बीघापुर के SHO राजपाल ने कहा, “कोई विवाद नहीं है। ये मामला 7-8 अक्टूबर का है। दोनों तरफ से लोगों को पाबंद कर दिया गया है।” ये पूछने पर, कि क्या पाबंदी बिना किसी विवाद के ही हो गई? इसका भी उन्होंने बचाव किया और कहा, “मामले को बढ़ने से रोकने के लिए पाबंदी की गई।” मतलब साफ है, विवाद है।

ये मामला मीडिया में न उठ जाए, शायद SHO साहब इस बात की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उन्नव पुलिस का हैंडल संभालने वाले तो उससे भी 20 कदम पीछे निकले। उन्नाव पुलिस की सोशल मीडिया टीम तो मामले की जानकारी ले रहे युवक से ही पूछ लिया, “थाना कौन सा है?”

दरअसल अविरल नाम के युवक ने उन्नाव पुलिस और यूपी पुलिस को टैग करते हुए लिखा था, “उत्तर प्रदेश से चौंकाने वाली खबर! 90% आबादी हम मुसलमानों की है, हम मंदिर बनने नहीं देंगे! मुस्लिम बाहुल्य गाँव में हिन्दुओं को मंदिर बनाने से मुस्लिम भीड़ ने रोका! उन्नाव के रानीपुर गाँव में कट्टरपंथी मुसलमानों की मनमानी! @unnaopolice @Uppolice मामले का सच क्या है?” इसके जवाब में उन्नाव पुलिस ने ही पूछ लिया, “कृपया, थाना क्षेत्र अवगत कराएँ।”

यह जवाब पुलिस की निष्क्रियता और समस्या को टालने का एक स्पष्ट संकेत था। अविरल द्वारा उठाए गए इस मामले को लेकर पुलिस का ध्यान हटाने की कोशिश साफ नजर आती है। यह मुद्दा हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों के हनन और उत्पीड़न का है, लेकिन पुलिस प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

यह स्पष्ट है कि इस्लामी कट्टरपंथियों का दबदबा गाँव में लंबे समय से बना हुआ है और पुलिस-प्रशासन ने इस पर अंकुश लगाने के बजाय घुटने टेक दिए हैं। मंदिर के जीर्णोद्धार को प्रशासनिक अनुमति के पेंच में फँसाकर लटकाया जा रहा है। यह देखना बाकी है कि यह अनुमति कब मिलती है, लेकिन उन्नाव पुलिस द्वारा इसे विवाद न मानने की कोशिशें स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। यदि यह मामला मस्जिद से जुड़ा होता, तो प्रशासन तत्काल कार्यवाही करता, परंतु इस मामले में हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों के हनन को गंभीरता से नहीं लिया गया है। ऐसे में लगता है मानों पुलिस-प्रशासन ने घुटने टेक रखे हो।

CSIS के लिए काम करते हैं खालिस्तानी आतंकी, निज्जर पर जस्टिन ट्रूडो सरकार ने नहीं दिए कोई सबूत: संजय वर्मा ने खोली कनाडा की पोल

कनाडा के भारत पर आरोपों के बीच पूर्व हाई कमिश्नर संजय वर्मा ने अंदर की बात बताई है। उन्होंने कहा है कि खालिस्तानी आतंकी कनाडा की खुफिया एजेंसी की कठपुतली हैं और उनके लिए काम करते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि कनाडा खालिस्तानी आतंकियों को प्रत्यर्पित करने में लगातार आनाकानी कर रहा है।

पूर्व हाई कमिश्नर संजय वर्मा ने यह बातें कनाडा के CTV चैनल को दिए गए 26 मिनट लम्बे इंटरव्यू में कही हैं। उन्होंने इस दौरान निज्जर की हत्या में भारत का रोल होने की बात सिरे से नकार दी है। उन्होंने इसके साथ इस मामले का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप कनाडा के प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर लगाया है।

इंटरव्यू के दौरान संजय वर्मा ने कहा, “खालिस्तानी आतंकियों को यहाँ प्रश्रय दिया जाता है, खालिस्तानी आतंकी यहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसी CSIS के एसेट हैं। यह आरोप मैं बिना कोई सबूत दिए हुए लगा रहा हूँ… यही काम ट्रूडो ने किया है।”

संजय वर्मा ने निज्जर की हत्या पर आगे बताया,”हमें इस बारे में कोई भी सबूत नहीं पेश किया गया है। अगर ट्रूडो और उनके साथी इस बारे में जानते थे और वह कोर्ट नहीं जा रहे थे तो क्या यह एक अपराध नहीं है… आखिर किस आधार पर वह मुझसे पूछताछ करना चाहते हैं। अगर कोई छोटे अपराध के लिए पकड़ा जाता है तो सबूत दिए जाते हैं, इस मामले में नहीं दिए जा रहे।”

उन्होंने पश्चिमी देशों पर निशाना भी साधा। संजय वर्मा ने कहा कि अब वह समय नहीं रहा जब पश्चिमी देश किसी देश को कुछ करने को कहते और वह करने लगते। सने संजय वर्मा ने कहा कि भारत एक कानून के राज वाला देश है, आखिर ऐसे में कनाडा सबूत क्यों नहीं पेश कर रहा।” यह इंटरव्यू आप नीचे लगे लिंक पर देख सकते हैं।

संजय वर्मा ने कहा कि उनको और ट्रूडो और उनकी सरकार पर भरोसा नहीं है। संजय वर्मा ने बताया कि उनकी जगह पर कोई नया आएगा या नहीं, यह बातचीत के बाद तय होगा। संजय वर्मा ने कहा है कि ट्रूडो ने सिर्फ ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर ही भारत पर आरोप जड़ दिए और बाद में खुद कबूल किया कि उनके पास कोई पक्का सबूत नहीं है।

कनाडा में बैठ कर भारत तोड़ने वालों को लेकर बात करते हुए संजय वर्मा ने कहा, “भारत में क्या होता है, वह भारतीय तय होंगे। कनाडा में रहने वाली खालिस्तानी आतंकी और चरमपंथी भारती नहीं बल्कि कनाडा के नागरिक हैं, और हमें लगता है कि किसी भी देश को अपने नागरिकों को दूसरे देश को तोड़ने का प्रयास नहीं करने देना चाहिए।”

हाई कमिश्नर संजय वर्मा ने यह भी कहा कि भारत और कनाडा के बीच का यह विवाद सांस्कृतिक और व्यापारिक सम्बन्धों को ख़ास नुकसान नहीं पहुँचाएगा। उन्होंने कहा कि इससे कुछ असर जरूर पड़ सकता है। संजय वर्मा ने कनाडा से भारत की चिंताओं पर एक्शन लेने को भी कहा है।

गौरतलब है कि निज्जर की हत्या में भारत सरकार के शामिल होने के आरोप ट्रूडो के लगाने के बाद विवाद हाल ही में काफी बढ़ गया था। इसके बाद भारत ने संजय वर्मा को वापस बुला लिया था और कनाडा के हाई कमिश्नर को देश से निकल जाने को कहा था। संजय वर्मा ने इसके बाद इन आरोपों पर जवाब दिया है।

कैंप में कर रहे थे आराम, TRF आतंकियों ने भून डाला: डॉक्टर समेत 7 की मौत, उमर अब्दुल्ला की सरकार बनने के बाद J&K में दूसरा अटैक

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल के गगनगीर इलाके में आतंकी हमला हुआ है। खबर है कि वहाँ आतंकियों ने एक सुरंग में काम कर रहे लोगों के कैंप पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं जिसके बाद 7 लोगों की मौत हो गई। इन 7 लोगों में 6 सुरंग में काम करने वाले लोग और 1 डॉक्टर की हत्या की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मरने वालों में मैकेनिकल कर्मचारी अनिल शुक्ला थे जो मध्य प्रदेश के रहने वाले थे। वहीं बिहार के फहीम नासिर, मोहम्मद हारिफ और कलीम को निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया और पंजाब के गुरमीत को भी गोलियों से भून डाला गया। इनके अलावा इस सूची में जम्मू कश्मीर के रहने वाले शशि अब्रोल और डॉ शहनवाज भी शामिल हैं।

वहीं घायल लोगों में इंदर यादव, मोहन लाल, मुश्ताक अहमद लोन और इश्फाक अहमद भट और जगतार सिंह हैं। घटना रात के करीब 8:30 बजे हुई। एक चश्मदीदों ने बताया कि आतंकियों ने हमला उस समय बोला जब खाने की तैयारी चल रही थी तभी अचानक 3 हथियारबंद आतंकी मेस में पहुँचे और वहाँ मौजूद वर्कर्स पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। गोलियाँ इतनी मारी गई कि दो गाड़ियाँ भी जलकर खाक हो गई।

अभी तक सामने आई जानकारी के अनुसार, हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन ‘द रेजिस्टेंट फ्रंट’ ने ली है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में ये हमला नई सरकार बनने के मात्र 4 दिन बाद ही किया है। इससे पहले भी उमर अब्दुल्ला की सरकार बनने के बाद पहली बार हमला 18 अक्तूबर को हुआ था। हमले में गैर स्थानीय व्यक्ति अशोक चौहान को गोली मारी गई थी।

इन हमलों के बाद बता दें कि सेना ने भी संयुक्त टीम बनाकर आतंकियों को निशाना बनाया। ये कार्रवाई सेना ने बारामुला में की। वहाँ संयुक्त टीम ने हथियारों से लैस आतंकी को मार गिराया। इसके साथ एक बड़ी आतंकी साजिश नाकाम हुई। सेना ने छानबीन में उसके पास से हथियारों का एक बड़ा जखीरा बरामद किया है। कहा जा रहा है कि ये हथियार ऐसे थे जैसे वो किसी युद्ध कि तैयारी के लिए सामान जुटा रहा हो। उसके पास एके 47, दो एके मैग्जीन, 57 एके राउंड, दो पिस्टल के अलावा कई खतरनाक हथियार मिले हैं।

जिस हिंदू बुजुर्ग पर मुस्लिम भीड़ ने किया हमला, वे चीख-चीखकर कह रहे- मस्जिद से ऐलान हुआ… लेकिन जाँच की जगह मोहम्मद जुबैर की लाइन पकड़ रही बहराइच पुलिस

बहराइच के महाराजगंज में 13 अक्तूबर 2024 को दुर्गा विसर्जन जुलूस को इस्लामी भीड़ ने निशाना बनाया था। इस हमले में 23 साल के युवक रामगोपाल मिश्रा की हत्या कर दी गई थी। कई अन्य हिंदू घायल हुए थे। इनमें से एक 70 साल के बुजुर्ग विनोद मिश्रा भी हैं।

रिटायर शिक्षक विनोद मिश्रा ने मीडिया संस्थानों को विस्तार से बताया है कि उस दिन कैसे हिंसा भड़की थी। उनका कहना है कि पहले मूर्ति पर पत्थर मारी गई, फिर डीजे वाले के साथ मारपीट की गई। कथित तौर पर इसके बाद मस्जिद से ऐलान कर उकसाया गया, जिसके बाद मुस्लिम भीड़ हथियारों संग सड़क पर आ गई और हमला कर दिया।

मस्जिद से मुस्लिमों को उकसाने की बात उन्होंने आजतक के साथ बातचीत में कही। ऑपइंडिया के रिपोर्टर राहुल पाण्डेय से बातचीत में भी कैमरे पर यही दावे दोहराए। उनके इस बयान को लेकर दैनिक जागरण समेत कई अन्य मीडिया संस्थानों ने भी रिपोर्ट की है।

राहुल पाण्डेय को इस घटना का विवरण देते हुए विनोद मिश्रा ने कहा;

“पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो हिंदू तितर-बितर होगए। तब, मस्जिद से अल्लाह-हू-अकबर करके बोला गया और उसके बाद आवाज आई कि जो जहाँ मिले उसे मार दो काट दो।”

वीडियो में विनोद मिश्रा की यह बात आप साफ तौर पर 1 मिनट से पहले ही सुन सकते हैं और बाद में राहुल पाण्डेय को पूछते भी सुना जा सकता है कि क्या आपने ये खुद सुना?

इस पर विनोद मिश्रा ने हाँ, बिल्कुल सुना में जवाब देते हुए कहा,

“उधर से 200-300 की संख्या में भीड़ बाँस बल्लम, अवैध असलहे, तमंचे जैसे औजार लेके दौड़ी। सामने हमारी गाड़ी थी। उसे हम इस पार लेकर आने। हमने गाड़ी स्टार्ट की हुई थी ये सोचकर ये सब लोग हमें जानते-पहचानते हैं हमें कुछ नहीं करेंगे। लेकिन वो 5-7 की संख्या में आए और फरसा से वार कर दिया। हमने हाथ उठाया तो वहाँ गहरा घाव हो गया और कुर्ता खून से सराबोर हो गया। हम लहूलुहान थे और उन्होंने तब तक गाड़ी का तार काट दिया। हम इतने में वहाँ से भागने लगे। जब भागे तो उन्होंने लाठी चला दी। हमारी पीठ पर काफी चोट के निशान हैं और हाथ भी टूट गया। बाद में पता चला कि गाड़ी में भी आग लगा दी गई है।”

विनोद मिश्रा ने इसी तरह की बातें आजतक के रिपोर्टर को भी बताई। इसके बाद जी न्यूज और अन्य समाचार पोर्टलों ने भी उनके बयान को कवर किया।

आजतक की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

विनोद मिश्रा का यह बयान जैसे ही ऑपइंडिया ने सार्वजनिक किया तो मोहम्मद जुबैर जैसे लोग एक्टिव हो गए। उन्होंने हिंदू पीड़ित के पूरे बयान को खारिज कर इसे तथ्यहीन बता दिया और बहराइच पुलिस को टैग कर दिया। आश्चर्यजनक तौर पर बहराइच पुलिस ने भी यही लाइन पकड़ी और बयान को ‘भ्रामक तथ्य’ करार दिया। साथ ही अपरोक्ष तौर पर मीडिया को धमकाते हुए कहा जिन घटना के संबंध में साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, उन्हें बिन जानकारी प्रसारित न करें।

इस संबंध में दैनिक जागरण की खबर का स्क्रीनशॉट साझा किए जाने पर तो बहराइच पुलिस ने मीडिया संस्थान को नोटिस जारी करने की धमकी तक दे दी।

मोहम्मद जुबैर जैसे लोग जो बहराइच में हिंदुओं पर हमले के बाद से रामगोपाल मिश्रा की हत्या को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, एक हिंदू पीड़ित के बयान को फेक बताना तो समझ में आता है। लेकिन बहराइच पुलिस का यह रवैया समझ से परे है।

विनोद मिश्रा इस घटना के चश्मदीद हैं। इस हमले में घायल हुए लोगों में से हैं। उनका बयान एक तरह से पूरे घटनाक्रम का साक्ष्य है। लेकिन उनके बयान को जाँच का आधार बनाने की जगह पुलिस मीडिया संस्थानों को अपरोक्ष तौर पर धमकाते हुए यह बताने की कोशिश करती दिख रही है कि हिंदू पीड़ितों के विवरण प्रकाशित प्रसारित न किए जाएँ।

इसके क्या कारण हो सकते हैं? आखिर बहराइच पुलिस पीड़ितों की आँखों देखी और कानों सुनी तथ्यों को क्यों बाहर नहीं आने देना चाहती है? वैसे इस हिंसा को लेकर बहराइच का पुलिस-प्रशासन शुरू से ही सवालों के घेरे में है। योगी सरकार ने कई अधिकारियों पर कार्रवाई भी की है। हिंसा के चश्मदीदों का भी कहना है कि यदि पुलिस ने सक्रियता दिखाई होती तो शायद रामगोपाल जिंदा होते…।

यह भी माना जा सकता है कि तनावपूर्ण माहौल में पुलिस-प्रशासन की कोशिश होती है कि ऐसे ‘कटु सत्य’ बाहर न आए जिससे तनाव बढ़े। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि पीड़ितों की रिपोर्टिंग ही न की जाए। या फिर कोई तथ्य सामने आ जाए तो पुलिस मीडिया को ही धमकाने पर उतारू हो जाए। ऐसे तथ्य सामने आने के बाद यह पुलिस का दायित्व बन जाता है कि वे इसे अपनी जाँच का बिंदु बनाए और समुचित कार्रवाई करे।

बहराइच पुलिस का ‘दायित्व बोध’ तो 13 अक्टूबर की घटना के बाद से ही कठघरे में है। लेकिन उसके बाद भी वह जिस तरह का रवैया दिखा रही है, उस पर योगी सरकार को गंभीरता से गौर करना चाहिए। बहराइच पुलिस की पीड़ितों के पक्ष को सोशल मीडिया पर भ्रामक करार देने की सक्रियता, मोहम्मद जुबैर जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों के सुर में सुर मिलाते नजर आना, यूपी पुलिस की ‘छवि’ पीड़ित हिंदुओं की नजर में पश्चिम बंगाल पुलिस जैसा गढ़ सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस इकबाल को मलिन करने का कार्य करेगा जो उन्होंने प्रदेश में अपराधियों और कट्टरपंथियों पर कार्रवाई कर अर्जित की है।

सेंसर वाली जिस सीट पर बैठ पैखाना करते थे अरविंद केजरीवाल वह ‘शीशमहल’ से गायब, अमित मालवीय का दावा: PWD ने जारी की दिल्ली CM आवास के शाही सामानों की लिस्ट

लोक निर्माण विभाग (PwD) ने दिल्ली के 6 फ्लैगस्टाफ रोड पर स्थित ‘शीश महल’ में मौजूद सामानों की विस्तृत सूची जारी की है। यह शीशमहल दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का 9 साल तक आधिकारिक आवास था। दिल्ली सीएमओ (मुख्यमंत्री कार्यालय) द्वारा मौजूदा मुख्यमंत्री आतिशी को बंगला आवंटित करने के लिए कहने के बाद पीडब्ल्यूडी ने सामानों की यह सूची तैयार की है।

इस शीशमहल को लेकर अरविंद केजरीवाल पहली बार मई 2023 में सवालों के घेरे में आए थे। उस समय मीडिया ने केजरीवाल द्वारा करदाताओं के पैसे को अपनी विलासिता पर खर्च करने डिटेल जारी किया था। इसको लेकर आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की खूब आलोचना हुई थी।

अब PWD द्वारा अरविंद केजरीवाल के आवास में स्थित समानों की सूची भाजपा नेता अमित मालवीय ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर डाला है। अमित मालवीय ने सोशल मीडिया X के पोस्ट में कहा है, “अरविंद केजरीवाल के ‘शीशमहल’ में लगाए गए बिजली के उपकरणों और गैजेट्स की सूची यहाँ दी गई है।”

उन्होंने दावा किया, “आश्चर्य की बात है कि अरविंद केजरीवाल के आराम के लिए लगाए गए पूरी तरह से स्वचालित, सेंसर से लैस TOTO स्मार्ट टॉयलेट सीट, जिसमें ऑटोमैटिक ओपन-क्लोज सीट, हीटेड सीट, वायरलेस रिमोट डियोडोराइज़र और ऑटोमैटिक फ्लशिंग जैसी सुविधाएँ हैं, गायब हैं। ऐसी एक टॉयलेट सीट की कीमत 10-12 लाख रुपए के बीच है!”

अरविंद केजरीवाल के ‘शीश महल’ में मौजूद सामान की पूरी सूची नीचे दी गई है:

  • 16 अल्ट्रा स्लिम स्मार्ट 4K टीवी, वॉयस कंट्रोल्ड- ₹64 लाख
  • स्मार्ट एलईडी – ₹19.5 लाख
  • फ्रीस्टैंडिंग ल्यूमिनरी – ₹9.2 लाख
  • ओसाडा फुल बॉडी मसाज चेयर- ₹4 लाख
  • रेक्लाइनर सोफा – ₹10 लाख
  • 8 मोटराइज्ड रेक्लाइनर सोफा: ₹10 लाख
  • बोस लाउडस्पीकर – ₹4.5 लाख
  • इनबिल्ट टीवी और एआई विजन स्क्रीन के साथ 2 स्मार्ट रेफ्रिजरेटर – ₹9 लाख
  • 73-लीटर स्टीम ओवन – ₹9 लाख
  • 50-लीटर माइक्रोवेव ओवन – ₹6 लाख
  • 2 माउंटेड हुड 140 सेमी स्टेनलेस स्टील चिमनी – ₹6 लाख
  • बॉश सीरीज 8 बिल्ट-इन कॉफी मशीन – ₹2.5 लाख
  • 3 हॉट वाटर जेनरेटर (एयर टू वॉटर हीट पंप) – ₹22.5 लाख
  • सुपीरियर वाटर सप्लाई और सैनिटरी इंस्टॉलेशन – ₹15 करोड़
  • एलजी 12 किलोग्राम फ्रंट लोड ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन + ड्रायर – ₹2.1 लाख
  • एसएस रेलिंग, सीढ़ी कवरिंग (पीतल, शॉवर एनक्लोजर, आदि) – ₹1.2 करोड़
  • 20 ग्रैंड एज्ड ब्रास एंट्रेंस स्कॉन्स आउटडोर लाइट्स – ₹10 लाख
  • ऑटोमैटिक स्लाइडिंग सेंसर के साथ लकड़ी और कांच के दरवाजे – ₹70 लाख
  • 24 सजावटी खंभे: ₹36 लाख
  • 80 खिड़की के पर्दे – ₹4 करोड़ से ₹5.6 करोड़ के बीच
  • बेहतरीन जलापूर्ति – ₹15 करोड़

साल 2013 में अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि वह और उनकी आम आदमी पार्टी की सरकार के मंत्री सरकारी बंगलों में नहीं रहेंगे, बल्कि छोटे सरकारी फ्लैटों में रहेंगे। उनके द्वारा किए गए बड़े-बड़े वादे और दावे 11 साल बाद भी उनके राजनीतिक दिखावे के अलावा और कुछ नहीं लगते।

अपने आवास के जीर्णोद्धार पर केजरीवाल ने खर्च किए ₹45 करोड़

अरविंद केजरीवाल का पुराना ‘शीश महल’ 13000 वर्ग फीट क्षेत्र में फैला हुआ है। इस आवास में 399 वर्ग फीट का लॉन क्षेत्र है और यह सभी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। टाइम्स नाउ नवभारत ने पिछले साल बताया था कि अरविंद केजरीवाल अपने परिवार के साथ पहली मंजिल पर रहते थे। ग्राउंड फ्लोर पर एक बड़ा मीटिंग हॉल और एक विजिटर रूम है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का यह बंगला बहुत बड़ा है और इसमें अत्याधुनिक इंटीरियर डिज़ाइन, फ़्लोरिंग और उच्च श्रेणी के फ़र्नीचर लगे हैं। मई 2023 में सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल के आवास के सभी कमरों में सेंसर युक्त स्वचालित दरवाजे लगे हैं।

टाइम्स नाउ नवभारत की रिपोर्ट में कहा गया था कि सिविल लाइंस में केजरीवाल के सरकारी बंगले का करीब 45 करोड़ रुपए लगाकर नवीनीकरण किया गया था। ‘ऑपरेशन शीश महल’ नाम के रिपोर्ट में कहा गया था कि नवीनीकरण के लिए करदाताओं के 44.78 करोड़ रुपए का इस्तेमाल किया गया, जिससे आम आदमी पार्टी की मितव्ययिता को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता पर सवाल उठ रहे हैं।

खालिस्तानी वोटों के लिए अपने ही लोगों के साथ ही ‘खेल’ रहा है कनाडा, अब पुलिस ने बयान जारी कर कहा- भारत से तत्काल खतरा नहीं

कनाडाई पुलिस ने शनिवार (20 अक्टूबर 2024) को एक बार फिर खालिस्तानी वोटों को साधने के लिए भारत पर निशाना साधा। कनाडा पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा कि भारत से जनता को कोई ‘तात्कालिक खतरा’ नहीं है। ये बयान उस समय आया है, जब कनाडा की रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP),ने सार्वजनिक रूप से ‘भारत सरकार के एजेंटों’ पर कनाडाई धरती पर हिंसक घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया था, जिनमें हत्याएँ भी शामिल हैं।

RCMP के शीर्ष अधिकारियों ने भारतीय मीडिया पर भी ‘झूठी’ रिपोर्ट्स फैलाने का आरोप लगाया और कहा कि कनाडाई पुलिस ‘तथ्यों को सही करने’ की कोशिश कर रही है। RCMP के ये बयान तब आए जब कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत सरकार पर खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया था।

RCMP की असिस्टेंट कमिश्नर ब्रिजिट गॉविन ने कनाडाई ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (CBC) न्यूज को दिए बयान में कहा, “इस घोषणा के पीछे कोई तात्कालिक खतरा नहीं था।” RCMP ने दावा किया है कि वे ‘विस्तृत हिंसक घटनाओं’ की जाँच कर रहे हैं, जिनमें निज्जर की हत्या भी शामिल है। सितंबर 2023 में ट्रूडो ने भारतीय एजेंटों पर निज्जर की हत्या का आरोप लगाया था, जिसके बाद से भारत और कनाडा के बीच कूटनीतिक संबंध बिगड़ते जा रहे हैं और उनके सुधार का कोई संकेत नहीं है।

CBC को दिए इंटरव्यू में गॉविन ने दावा किया कि भारत के खिलाफ सार्वजनिक रूप से जाने से पहले कई प्रयास किए गए थे, जिनमें भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सबूत दिए गए। साथ ही कनाडा और भारत सरकार के सीनियर अधिकारियों के बीच बैठकें भी हुई, लेकिन ये प्रयास ‘असफल’ रहे।

गौरतलब है कि हाल ही में भारत ने खालिस्तानी आतंकियों की सूची में एक कनाडाई बॉर्डर सर्विस एजेंसी (CBSA) के अधिकारी का नाम भी शामिल किया, जिसे भारत से प्रत्यर्पित करने की माँग की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, संदीप सिंह सिद्धू प्रतिबंधित इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन (ISYF) का सदस्य है और CBSA के साथ काम करता है, वो पंजाब में आतंकवाद को बढ़ावा देने में शामिल रहा है।

भारत ने यह सूची तब जारी की जब RCMP ने भारतीय उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा और अन्य राजनयिकों को खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में ‘रुचि रखने वाले’ व्यक्तियों के रूप में नामित किया। RCMP ने यह भी दावा किया है कि भारतीय सरकार ने कनाडा में आपराधिक गतिविधियों के लिए लॉरेंस बिश्नोई गैंग का इस्तेमाल किया है।