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‘बहराइच के दरिंदों का हो गया इलाज’: जिस अब्दुल हमीद के घर हुई रामगोपाल मिश्रा की हत्या, उसके 2 बेटों का नेपाल बॉर्डर पर यूपी STF ने किया एनकाउंटर; कॉन्ग्रेस का विलाप शुरू

उत्तर प्रदेश के बहराइच में दुर्गा पूजा के मूर्ति विसर्जन के दौरान रामगोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या करने के आरोपित रिंकू उर्फ सरफराज खान और तालिब उर्फ सबलू का एनकाउंटर कर दिया गया है। एनकाउंटर में दोनों आरोपितों के पैरों में गोली लगी है। इससे वे घायल हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार, यह मुठभेड़ नानपारा कोतवाली के बाइपास में हुई है। 

घायल आरोपियों को इलाज के लिए नानपारा सीएचसी में भर्ती किया गया है। सीएचसी के बाहर पुलिस का पहरा बढ़ा दिया गया है। सीएचसी ने दोनों आरोपितों को बहराइच मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया है। कहा जाता है कि गोपाल मिश्रा पर गोली सरफराज ने ही चलाई थी। तालिब और सरफराज भाई बताए जा रहे हैं। दोनों आरोपित नेपाल भागने की फिराक में थे।

उत्तर प्रदेश के ADG (Law & Order) अमिताभ यश ने बताया कि पुलिस ने पाँच आरोपित पकड़े हैं। वहीं, एनकाउंटर में दो को गोली लगी है। रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपितों के नेपाल भागने की की सटीक सूचना मिलने पर दोपहर करीब 2 बजे STF और बहराइच पुलिस ने नानपारा कोतवाली क्षेत्र में हांडा बसेहरी नहर के पास आरोपितों को घेर लिया।

पुलिस ने आरोपितों को सरेंडर करने के लिए कहा तो वे पुलिस पर फायरिंग की। इसके बाद पुलिस और STF ने भी जवाबी कार्रवाई की, जिसमें सरफराज और तालिब को पैरों में गोली लगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बहराइच हिंसा के आरोपियों के पुलिस मुठभेड़ में घायल होने की जानकारी दी गई है।

बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला का कहना है, “जब पुलिस टीम हत्या में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी के लिए नानपारा इलाके में गई थी तो मोहम्मद सरफराज उर्फ ​​रिंकू और मोहम्मद तालिब उर्फ ​​सबलू ने हत्या में इस्तेमाल हथियार को वहाँ लोड करके रखा रखा हुआ था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने पुलिस पर फायरिंग करने के लिए किया।”

उन्होंने आगे कहा, “आत्मरक्षा में पुलिस ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें दोनों घायल हो गए। उनका इलाज चल रहा है और वे जीवित हैं। हमने अन्य तीन आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया है। सभी 5 को आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार कर लिया गया है। उन सभी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी… अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।”

पुलिस ने सरफराज के भाई फहीम, पिता अब्दुल हमीद और एक अन्य को भी पकड़ा है। इससे एक दिन पहले सरफराज की गोली चलाते हुए तस्वीर सामने आई थी। इससे पहले राम गोपाल मिश्रा की हत्या मामले में पहली गिरफ्तारी भी आज गुरुवार (17 अक्टूबर 2024) को ही हुई। आरोपित की पहचान राजा उर्फ मोहम्मद दानिश उर्फ जहीर/सहीर खान के तौर पर हुई है।

बताया जा रहा है कि जहीर नेपाल जाने की फिराक में था, लेकिन उसे माहसी खंड में राजी क्रॉसिंग पर गिरफ्तार कर लिया गया। बहराइच हिंसा मामले में अब तक 11 एफआईआर दर्ज हुई हैं, इसमें 6 नामजद और 1304 अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। वहीं, राम गोपाल की हत्या मामले में 10 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है। ​

मोहम्मद दानिश उर्फ ​​साहिर/जहीर खान इन्हीं आरोपितों में से एक था। उसके अलावा अब्दुल हामिद, सरफराज, फहीम भी इस मामले में आरोपित हैं। गौरतलब है कि 13 अक्टूबर को दुर्गा विसर्जन के दौरान हुई हिंसा मामले में अब तक 55 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इन लोगों की पहचान सीसीटीवी फुटेज के आधार पर हुई है।

उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने एनकाउंटर पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि सरकार शुरू से ही फर्जी एनकाउंटर करा रही है। वे सिर्फ अपनी विफलता को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। मृतक रामगोपाल मिश्रा के पैर के नाखूनों को उखाड़ने के सवाल पर राय ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार दंगा कराना चाहती है।

अजमेर दरगाह के सरवर चिश्ती ने रामगोपाल मिश्रा की हत्या को ठहराया जायज, कहा- फूल नहीं बरसेंगे, जो हुआ वही होना था: बहराइच में दुर्गा विसर्जन जुलूस पर हुआ था हमला

बहराइच में रामगोपाल मिश्रा की निर्मम हत्या को जायज ठहराने की कोशिश की गई है। अजमेर में खादिमों की संस्था ‘अंजुमन सैयद जादगान’ के सचिव सरवर चिश्ती ने कहा है कि जो हुआ, वो होना ही था। अगर मुस्लिमों को गालियाँ बकी जाएँगी तो फूल नहीं बरसेंगे।

सरवर चिश्ती का यह बयान दैनिक भास्क समेत तमाम मीडिया रिपोर्टों पर प्रकाशित है। इसके अनुसार सरवर चिश्ती ने कहा, “घर पर चढ़कर हरा झंडा उतारकर धर्म विशेष का झंडा लहराया जा रहा है। तो फिर फूल तो बरसेंगे नहीं, जो हुआ यही होना था।”

सरवर चिश्ती ने इस घटना में रामगोपाल मिश्रा की हत्या की निंदा करने की जगह कहा- “अब तो ये आए दिन का हो गया है। हमारे मजहबी उलेमाओं की शान में गुस्ताखी की जाती है। कोई आज तक नहीं पकड़ा गया। हमारे जुलूस निकलते हैं हम तो किसी को गाली नहीं देते। शांति से जुलूस निकालते हैं ये सब सिर्फ एक तरफ से हो रहा है।”

अपने बयान में सरवर ने बाबा सिद्दीकी और सिद्धू मूसेवाला की हत्या को लेकर सरकार पर सवाल खड़े किए और कहा कि यहाँ नामचीन मुस्लिमों का मारा जा रहा, कभी सिखों को मारा जा रहा। इसमें सरकार का हाथ नहीं तो ऐसे कैसे हो सकता है।

सरवर चिश्ती के विवादित बयान

बता दें कि सरवर चिश्ती का ये पहला विवादित बयान नहीं है। सरवर चिश्ती वक्फ एक्ट में संशोधन की बात पर मुस्लिमों को भड़का चुके हैं।

उन्होंने कहा था कि भारत के अंदर पिछले कुछ साल से ऐसा सिस्टम चलाया जा रहा है, जिसके जरिए मुसलमान और इस्लाम के प्रति नफरत फैलाई जा रही है। कभी लव जिहाद, लैंड जिहाद, यूपीएससी जिहाद तो कभी हमारे पैगंबर मोहम्मद की शान में गुस्ताखी हो रही है। मदरसे और मस्जिद शहीद की जा रही है, जो कि नाकाबिले बर्दाश्त हो गई है।

इससे पहले सरवर चिश्ती ने अजमेर-92 फिल्म को लेकर विवादित बयान दिया था। रिपोर्टों के अनुसार, सरवर ने कहा था, “लड़की चीज ही ऐसी है… बड़े से बड़ा फिसल जाता है। आदमी पैसों से करप्ट नहीं हो सकता, मूल्यों से करप्ट नहीं हो सकता। लड़की चीज ही ऐसी है कि बड़े से बड़ा फिसल जाता है। वो थे ना जिनका नाम क्या था। जो पेड़ के नीचे बैठे थे, विश्वामित्र जैसे भटक सकते हैं। अच्छा जितने बाबा लोग जेल में हैं। ये सिर्फ वो हैं, जो लड़की के मामले में फंसे। यह ऐसा सब्जेक्ट है कि बड़े से बड़ा फिसल जाता है।”

इसी तरह 2022 में एक बार सरवर चिश्ती ने कहा था जब मुस्लिम समाज ने नुपूर शर्मा की गिरफ्तारी को लेकर जुलूस निकाला तो फिर हिंदू समाज ने जुलूस क्यों निकाला?इससे भावनाएँ आहत पहुई। मुसलमान ये कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। सके अलावा सरवर ये भी कह चुके हैं कि नबी की शान में गुस्ताखी हुई तो हिंदुस्तान हिल जाएगा। उनका ये भी मानना है कि भारत सरकार ने जिस पीएफआई को देश में बैन किया है वो मुस्लिमों की आवाज उठाने वाला संगठन है।

क्या है ‘असम एकॉर्ड’, क्यों सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखी नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता: फैसले का ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ पर सीधा असर

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता कानून, 1955 के भाग 6A को सही ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने 4:1 के निर्णय से यह फैसला दिया है। नागरिकता कानून का भाग 6A असम के भीतर बांग्लादेश से आने वाले अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर लाया गया कानून असम समझौते के तहत बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1971 के बाद जो भी लोग असम में बांग्लादेश से घुसे हैं, उनको अवैध प्रवासी घोषित माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस MM सुन्दरेश, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने बुधवार (17 अक्टूबर, 2024) को यह निर्णय सुनाया। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने फैसले से असहमति जताई है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि असम आंदोलन और राजीव गाँधी की सरकार के बीच हुआ समझौता ‘असम एकॉर्ड’ एक समस्या का समाधान था। उन्होंने कहा कि अवैध शरणार्थियों का आना एक राजनीतिक समस्या बन चुकी थी।

असम एकॉर्ड के बाद संसद ने कानून बनाया था कि 1966 से पहले बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से आए भारतीय मूल के सभी लोग भारतीय नागरिक होंगे जबकि 1966 से 25 मार्च, 1971 के बीच आए लोग नागरिकता लेने के लिए आवेदन कर सकेंगे। इसे 1955 के नागरिकता कानून में 6A के तौर पर जोड़ा गया था।

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ बाकी तीन जजों ने पाया कि राजनीतिक समस्या का इस तरह कानूनी समाधान कर दिया गया था और संसद को इस तरह का क़ानून बनाने का अधिकार था। कोर्ट ने उन आपत्तियों को नकार दिया कि संसद को इस तरह का विशेष कानून बनाने का अधिकार नहीं था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि इस कानून के जरिए असम को बाकी सीमाई प्रदेशों से अलग रखा था, जो कि ठीक नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असम में इस समस्या का प्रभाव कहीं ज्यादा था क्योंकि यहाँ की जनसंख्या अधिक प्रभावित हो रही थी।

बेंच ने पाया कि असम की बांग्लादेश से लगने वाली सीमा पश्चिम बंगाल से कहीं छोटी है, ऐसे में उसके लिए विशेष कानून बनाना ठीक था। बेंच ने याचिकाकर्ताओं का यह ऐतराज भी नकार दिया कि इस क़ानून से संविधान की प्रस्तावना में बताए गए भाईचारे को खतरा होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “ऐसे में जब लाखों लोगों को नागरिकता से वंचित करने या किसी समुदाय की जीवन शैली की रक्षा करने के बीच में एक चुनने की दुविधा आती है तो कोर्ट निश्चित रूप से भाईचारे के सिद्धांतों के अंतर्गत नागरिकता देने को प्राथमिकता देगा। अतः याचिकाकर्ताओं की यह दलील खारिज की जाती है।”

सुप्रीम कोर्ट में याचिकर्ताओं ने यह भी दलील दी थी कि बाकी देश में 1951 से पहले आ गए लोगों को नागरिकता दी गई है जबकि असम में यह तारीख 1971 तक बढ़ा दी गई जो कि ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1971 की तारीख रखना सही है क्योंकि तभी बांग्लादेश में मुक्ति संग्राम खत्म हुआ था।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस कानून की वजह से असमिया संस्कृति पर कोई प्रभाव पड़ा, ऐसा याचिकाकर्ता नहीं दिखा पाए, अतः यह अनुच्छेद 29 का उल्लंघन भी नहीं करता। (यह अनुच्छेद संस्कृति के संरक्षण से सम्बन्धित है)सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ नागरिकता कानून, 1955 के भाग 6A को सही ठहराया और याचिकाकर्ताओं कि दलीलों को खारिज कर दिया।

क्या है नागरिकता कानून का हिस्सा 6A?

वर्ष 1971 से पहले पाकिस्तान ने बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में पाकिस्तान की सरकार ने अत्याचार करना चालू कर दिया था। पकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं और बांग्ला भाषियों को निशाना बना रहा था। 1970-71 आते-आते यह स्थिति और भी गंभीर हो गई थी।

इसके बाद लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत भागकर असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में आ गए गए थे। असम इससे काफी प्रभावित हुआ था। 1971 में युद्ध के खत्म होने के साथ बांग्लादेश नया राष्ट्र बन गया था। हालाँकि, इसके बाद भी बड़ी संख्या में शरणार्थी वापस नहीं गए।

असम के कई जिलों की जनसांख्यिकी इन शरणार्थियों की वजह से बदल गई। इसके बाद 1980 से असम में आंदोलन चालू हुआ। यह आंदोलन कई बार उग्र भी हुआ। इसके बाद समस्या बढ़ती देख असमिया आंदोलनकारियों और राजीव गाँधी सरकार में 1985 में एक समझौता हुआ। इसे ‘असम एकॉर्ड’ का नाम दिया गया। इसके तहत 1966 से पहले असम के भीतर आए भारतीय मूल के लोग (वह लोग जो अविभाजित भारत का हिस्सा थे) को भारतीय नागरिक माना गया।

इसके अलावा 1966 से 1971 के बीच आए लोगों को वैध रूप से नागरिकता के लिए आवेदन का अधिकार दिया गया। हालाँकि, 1971 के बाद आए लोगों को अवैध माना गया। यह बातें 1955 के नागरिकता क़ानून में एक संशोधन के जरिए जोड़ी गईं। इसे ही नागरिकता कानून, 1955 के भाग 6A का नाम दिया गया। इसी के खिलाफ कई लोगों ने याचिका डाली थी।

इस कानून का विरोध करने वाले कौन?

सुप्रीम कोर्ट में असम एकॉर्ड के तहत नागरिकता कानून में जोड़े गए इस हिस्से 6A को असम संमिलता महासंघ नाम की एक संस्था ने 2012 में चुनौती दी थी। उन्होंने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 6, 7, 14, 29 और 355 का उल्लंघन करता है। याचिका में माँग की गई कि असम में नागरिकता देने की तारीख 1971 की जगह 1951 की जाए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी थी कि संसद ऐसा कानून नहीं बना सकती थी। उन्होने इस कानून को राजनीतिक अधिकारों में दखल भी बताया था।

याचिकाकर्ताओं ने माँग की थी कि 1951 के बाद असम में आए शरणार्थियों को देश के सभी हिस्सों में आनुपातिक रूप से बांटा जाए। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने माँग की थी कि असम सीमा की पूरी तरह से बाड़बंदी की जाए और अवैध प्रवासियों को बाहर किया जाए। हालाँकि, उनकी दलीलें कोर्ट में नहीं मानी गई।

अवैध बांग्लादेशियों को निकाला जाए बाहर

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता अधिनियम के 6A को सही ठहराने के साथ ही असम से अवैध प्रवासियों को वापस भेजने को लेकर बात की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1 जनवरी,1966 से पहले असम में प्रवेश करने वाले लोगों को नागरिकता दी जाएगी जबकि 1966 से 1971 के बीच आने वालों को कुछ शर्तों के साथ नागरिकता दी जाएगी।

लेकिन 25 मार्च, 1971 को या उसके बाद असम में प्रवेश करने वाले अवैध लोगों नागरिकता नहीं दी जाएगी और और उन्हें अवैध अप्रवासी घो/षित कर दिया जाता है, जिन्हें पहचान कर बाहर निकाला जाना चाहिए।

वक्फ प्रॉपर्टी है नई संसद: AIUDF चीफ बदरुद्दीन अजमल ने मुस्लिमों को भड़काया, कहा- 9.7 लाख बीघा जमीन ह़ड़पना चाहती है सरकार, वसंत विहार पर भी दावा

असम के धुबरी से पूर्व सांसद और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल का दावा है कि नया संसद भवन वक्फ की जमीन पर बना हुआ है। उन्होंने हाल में वक्फ बोर्ड संशोधन बिल का विरोध करते हुए इस मुद्दे पर अपना बयान दिया।

उन्होंने मुस्लिमों को भड़काते हुए कहा कि सरकार वक्फ की 9.7 लाख बीघा जमीन ह़ड़पना चाहती है। उन्होंने ये भी माँग की कि अब इस जमीन को सरकार को मुस्लिम समाज को सौंप देना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को वक्फ की सारी जमीन मुसलमानों को वापस कर देनी चाहिए। उनके मुताबिक, अगर सरकार उन्हें जमीन दे देगी तो मुस्लिम समाज के लिए शिक्षा, हेल्थ और अनाथालय का इंतजाम वो लोग खुद कर लेंगे उन्हें सरकार का एहसान नहीं चाहिए।

समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा साझा की गई वीडियो में अजमल कहते दिखते हैं- “अगर आप लोग रिसर्च करेंगे तो पता चलेगा नया संसद भवन भी वक्फ की प्रॉपर्टी पर है। इसके अलावा वसंत विहार के आसपास का इलाका और शायद एयरपोर्ट भी वक्फ का है।” उन्होंने कहा कि जो लोग बिन अनुमति के वक्फ प्रॉपर्टी का इस्तेमाल करते हैं वो लोग इन सबके ऊपर मुसीबत आएगी। वो लोग खुद देखेंगे। सबकी सरकार जाएगी। छोटे-मोटे लोगों से मजाक करना अलग बात है। पीर-फकीर वो लोग हैं जिन्हें दुनिया रहने तक हिंदू-मुसलमान सब मानेंगे। वक्फ बोर्ड मामले पर इनकी पूरी मिनिस्ट्री चली जाएगी।”

उनके इसी बयान के बाद अब केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने इस पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सभी सांसदों से वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 का समर्थन करने की अपील करते हुए कहा कि भारत में सबसे बड़ी वक्फ संपत्तियाँ हैं और उनका उपयोग महिलाओं, बच्चों, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समुदाय के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।

इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कहा कि बदरुद्दीन अजमल तुष्टिकरण की राजनीति कर रहे हैं, क्योंकि उनके पूरे वोट बैंक ने लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस का समर्थन किया था, जिसके कारण उनकी हार हुई।

संविधान, मुकुट, साड़ी… न्याय की देवी का नूतन अवतार: जानिए आँखों पर पट्टी वाली ‘लेडी ऑफ जस्टिस’ कहाँ से आई, CJI चंद्रचूड़ ने क्यों बदलवाई तलवार वाली मूर्ति

भारत में ‘न्याय की देवी’ (Lady of Justice) आँखों पर बँधी पट्टी हटा दी गई है। उनके हाथ में तलवार की जगह संविधान की प्रति दे दी गई है। गाउन को हटाकर साड़़ी पहना दिया गया है। सिर पर मुकुट और गले में हार आदि से अलंकृत कर दिया गया है। इस प्रतिमा को न्याय की यूनानी देवी से न्याय की भारतीय देवी का अवतार कहा जा सकता है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्याय की देवी की एक नई प्रतिमा का अनावरण किया है। आँखों पर पट्टी होने का अर्थ कानून का अंधा होने का संकेत देता था। वहीं, तलवार सजा को प्रदर्शित करता था। अब परिवर्तनकारी प्रतीक संवैधानिक मूल्यों और कानून के समक्ष समानता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की लाइब्रेरी में लगाई गई नई मूर्ति को CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने ऑर्डर देकर बनवाया है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि देश में कानून अँधा नहीं है और यह सजा का प्रतीक नहीं है। मूर्ति के दाएँ हाथ में तराजू को बनाए रखा है, जो दोनों पक्षों के तथ्यों और तर्कों को देखने और सुनने के बाद न्याय करने का प्रतीक है।

यह बदलाव उपनिवेश के निशानियों से आगे बढ़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में भारत सरकार ने ब्रिटिश कानून इंडियन पीनल कोड (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) कानून लागू किया था। लेडी ऑफ जस्टिस की मूर्ति में यह बदलाव भी इसी कड़ी के तहत उठाया कदम माना जा रहा है।

मिस्र की न्याय की देवी मात (साभार: egyptianmuseum/britannica)

एक न्यायिक अधिकारी ने बताया, “न्याय की देवी का रूप हमारे संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए बदलना आवश्यक था। तलवार के बजाय संविधान थामने से यह संदेश जाता है कि न्याय लोकतांत्रिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।”

कई सभ्यताओं से जुड़ी है लेडी ऑफ जस्टिस की कहानी

न्याय की देवी का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी सबसे शुरुआती मूर्ति प्राचीन मिस्र में पाई जाती है। कहा जाता है कि यह देवी मात (Ma’at) की थी। मात सत्य, व्यवस्था और संतुलन का प्रतीक थीं। उन्हें अक्सर एक पंख पकड़े हुए दिखाया जाता था, जिसका उपयोग मृत्यु के बाद आत्मा के न्याय के लिए किया जाता था।

ग्रीक न्याय की देवी थेमिस (साभार: ब्रिटानिका)

बाद में यूनानी और रोमन सभ्यताओं ने अपनी न्याय की देवी की मूर्ति बनाई। ग्रीक देवी थेमिस कानून और व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती थीं। उनकी बेटी डाइक, जिन्हें एस्ट्राया के नाम से भी जाना जाता है, न्याय और नैतिक व्यवस्था का प्रतीक थीं। थेमिस को तराजू पकड़े हुए दिखाया गया था। इन्हें ही न्याय की देवी का शुरुआती रूप माना जाता है।

रोमन की पौराणिक कथाओं में थेमिस को जस्टिशिया के साथ जोड़ा गया था, जो रोमन साम्राज्य में न्याय की देवी थीं। जस्टिशिया की छवि आज की न्याय व्यवस्था को दिखाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। रोमन सम्राट टिबेरियस ने रोम में जस्टीशिया का एक मंदिर बनवाया था। जस्टीशिया न्याय के उस गुण का प्रतीक बन गईं। इनके साथ हर सम्राट खुद को जोड़ता था।

रोमन साम्राज्य में न्याय की देवी जस्टिशिया (साभार: ThoughtCo)

आगे चलकर रोमन सम्राट वेस्पाशियन ने जस्टिशिया की छवि के साथ सिक्के बनाए। इन सिक्कों में वह एक सिंहासन पर बैठी हैं, जिसे ‘जस्टीशिया ऑगस्टा’ कहा जाता था। उनके बाद कई सम्राटों ने खुद को न्याय का संरक्षक घोषित करने के लिए इस देवी की छवि का उपयोग किया। दुनिया के कई देशों में न्याय की देवी की यह मूर्ति देखी जा सकती है।

यूनानी सभ्यता से न्याय की देवी यूरोप और अमेरिका पहुँची। औपनिवेशिक काल में ब्रिटेन के एक अंग्रेज न्यायिक अधिकारी 17वीं सदी में इन्हें भारत लेकर आया था। ब्रिटिश काल में 18वीं शताब्दी के दौरान न्याय की देवी की मूर्ति का सार्वजनिक इस्तेमाल किया जाने लगा। भारत की आजादी के बाद न्याय की देवी को उसके प्रतीकों के साथ भारतीय लोकतंत्र में स्वीकार किया गया।

25 से 30 छर्रे, नाखूनों का हिस्सा गायब, आँख के पास वार… बहराइच के CMO ने बताया रामगोपाल मिश्रा की बॉडी की हालत, गोली मारने का पहला Video आया

राम गोपाल मिश्रा के साथ हुई बर्बरता की खबरों का बहराइच पुलिस ने खंडन किया है लेकिन जिला के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ संजय कुमार शर्मा के हालिया बयान से संकेत मिलते हैं कि गोपाल मिश्रा के साथ वीभत्सता हुई।

समाचार एजेंसी ANI द्वारा साझा की गई सीएमओ संजय शर्मा की वीडियो में वो कहते सुनाई पड़ते हैं, “मेरी जानकारी में जो तथ्य आए है वो ये कि बॉडी पर 25-30 छर्रे लगने से अत्यधिक रक्तरसाव है और उस कारण से उसकी मौत हुई है। इसके अलावा बाई आँख के ऊपर कोई कुंद चीज लगने से फटने का निशान है। पैर के दोनों अंगूठों के बीच में भी चोट है। थोड़ा नाखून का हिस्सा भी गायब है।”

जब रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि मीडिया में राम गोपाल मिश्रा को करंट देकर टॉर्चर देने कीबात सामने आई है तो इस पर वह बोले कि संभवत: ऐसा हो सकता है लेकिन इस बारे में वही लोग बता पाएँगे जिन्होंने पोस्टमार्टम किया है।

बता दें कि एक तरफ जहाँ राम गोपाल को दी गई प्रताड़ना के संकेत सीएमओ के बयान से मिल रहे हैं। वहीं एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में दिखाई दे रहा है कि गोपाल मिश्रा को पहली गोली उसी टाइम मारी गई थी जब वो झंडा फहरा रहे थे।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में साझा की गई वीडियो में देख सकते हैं कि पहले राम गोपाल को गोली मारी गई और बाद में पीछे से आवाज आई ‘मर गया मर गया।’ ये आवाज बच्चों की जान पड़ती है।

इसके आगे क्या हुआ इस बारे में अभी नहीं पता चला, मगर इंटरनेट पर जो वीडियो वायरल है उसमें कुछ लोग राम गोपाल का शव सीढ़ियों से उतारते दिख रहे हैं। इसके अलावा आरोपित का वीडियो भी है जिसमें आरोपित के हाथ में बंदूक दिखाई दे रही है। मालूम हो कि ये वीडियो बहराइच में इंटरनेट बहाल होने के बाद सामने आई है।

गौरतलब है कि इससे पहले बहराइच के महाराजगंज में राम गोपाल मिश्रा की हत्या मामले में सामने आ रही ‘प्रताड़ना देने’ की जानकारी को बहराइच पुलिस ने नकारा था। उन्होंने अपील जारी करते हुए बताया कि गोपाल मिश्रा की मौत गोली लगने से हुई थी। पुलिस के अनुसार, गोपाल मिश्रा को करंट देने, तलवार से मारने और नाखून उखाड़ने की बातें केवल अफवाह है। पुलिस ने बयान में ये भी कहा कि घटना में अतिरिक्त किसी अन्य की मृत्यु नहीं हुई है। उन्होंने अपील की है कि सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के प्रयास न किए जाएँ, न अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं को प्रसारित किया जाए।

जिस सलीम ने हैदराबाद के मंदिर में देवी प्रतिमा को मारी लात, उसने मुंबई के गणेश पंडाल में भी किया था हमला: जाकिर नाइक के वीडियो देख कट्टरपंथी बना कंप्यूटर इंजीनियर

हैदराबाद के मुत्यालम्मा मंदिर में देवी की प्रतिमा को खंडित करने वाला 30 वर्षीय कंप्यूटर इंजीनियर सलीम सलमान इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक का वीडियो देखा करता था। वह सोशल मीडिया पर इस्लामी तकरीरें देख-सुनकर कट्टरपंथी बना था। हैदराबाद की मंदिर में देवी की प्रतिमा को खंडित करने से पहले वह मुंबई में भी गणेश पूजा पंडाल में तोड़फोड़ कर चुका है।

मंगलवार (15 अक्टूबर 2024) को गिरफ्तार सलीम सलमान ने पूछताछ में हैदराबाद पुलिस को बताया कि वह मुंबई का मूल निवासी है। वह इस्लामी कट्टरपंथियों की वीडियो देखा करता था। एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “वह स्वयं कट्टरपंथी बन गया और मूर्तिपूजा जैसे अन्य धर्मों की प्रथाओं के प्रति कट्टरपंथी मानसिकता और घृणा विकसित कर ली।”

आरोपित सलमान साल 2022 में मुंबई में भी इसी तरह की तोड़फोड़ की घटनाओं में शामिल था। वह जूते पहनकर गणेश पूजा पंडाल में घुस गया था और स्थानीय लोगों पर हमला कर दिया था। पुलिस ने बताया कि आरोपित सलमान एक महीने के पर्सनालिटी डेवलपमेंट पाठ्यक्रम के लिए हैदराबाद आया था।

दरअसल, सलीम सलमान मस्जिद जाते समय मंदिर को निशाना बनाया था। आरोपित ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि वह सिकंदराबाद के ‘सिने पुलिस होटल’ में ठहरा हुआ था। आरोपित की जानकारी के आधार पर पुलिस ने 50 कमरों वाले होटल पर छापा मारा, जहाँ पता चला कि यह होटल ज्यादातर चोरों द्वारा किराए पर लिया जाता था।

पुलिस ने आगे बताया कि सलीम सलमान के साथ और भी असामाजिक तत्व मंदिर पर हमला कर रहे थे, लेकिन बाकी सभी भाग गए। बता दें कि सोमवार (14 सितंबर 2024) को तेलंगाना के कुर्मागुड़ा क्षेत्र में मुत्यालम्मा मंदिर की मूर्ति तोड़े जाने के बाद सिकंदराबाद में तनाव पैदा हो गया, जिससे स्थानीय हिंदू निवासियों में गुस्सा और विरोध भड़क गया।

यह घटना पास के पासपोर्ट कार्यालय के पास की है। घटना के दौरान लोगों ने इस कट्टरपंथी को स्थानीय लोगों ने तुरंत पकड़ लिया। बाद में उसे मार्केट पुलिस स्टेशन की हद में पुलिस को सौंप दिया गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। घटना के बाद अधिकारियों ने सुरक्षा कड़ी कर दी और शांति बहाल करने के प्रयास कर रहे हैं।

इस बीच, स्थानीय लोगों ने मंदिर के पास प्रदर्शन किया और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की। प्रदर्शन में बीजेपी नेता भी शामिल हुए। इस प्रदर्शन के दौरान हैदराबाद लोकसभा सीट से बीजेपी की उम्मीदवार माधवी लता समेत कई बीजेपी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी कर लिया गया। वहीं, केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी भी मंदिर पहुँचे थे।।

उन्होंने इस घटना को ‘शर्मनाक‘ करार दिया और कुछ लोगों पर जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव भड़काने का आरोप लगाया। इस बीच, घटना का सीसीटीवी फुटेज सामने आया, जिसमें एक युवक सफेद कुर्ता और काली इस्लामिक टोपी पहने देवी की मूर्ति पर लात मारते हुए दिख रहा है। उसने मूर्ति को बेरहमी से तोड़ा और उसके टुकड़े ज़मीन पर फेंक दिए।

निज्जर पर पकड़ा गया कनाडा का झूठ, भारत बोला- रिश्तों को खराब करने के लिए ट्रूडो इकलौते जिम्मेदार: PM पद से हटाने के लिए खुद की पार्टी के सांसदों ने शुरू किया अभियान

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पोल खुद ही खोल दी है। ट्रूडो ने माना है कि कनाडा के पास भारत सरकार के निज्जर की हत्या में शामिल होने के कोई स्पष्ट सबूत नहीं हैं। भारत ने इस कबूलनामे पर कहा है कि कनाडा और भारत के रिश्ते खराब करने के जिम्मेदार अकेले ट्रूडो ही होंगे।

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो बुधवार (16 अक्टूबर, 2024) को कनाडा में विदेशी दखल की जाँच करने वाली कमिटी के सामने पेश हुए थे। यहाँ उन्होंने कनाडा में हो रही जासूसी और दखल को लेकर अपना बयान दर्ज करवाया। उन्होंने इस दौरान भारत के कनाडा के भीतर दखल का पुराना राग छेड़ा।

अपने बयान में ट्रूडो ने निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर लगाया। उन्होंने कमिटी को बताया कि कनाडा ने भारत को इस संबंध में जानकारी दी थी। लेकिन जब सबूतों की बात आई तो ट्रूडो ने खुद स्वीकारा कि उन्होंने भारत को कोई मजबूत सबूत नहीं उपलब्ध करवाए हैं।

ट्रूडो ने क्या कहा?

ट्रूडो ने बताया, “हमारे पास मौक़ा था कि हम यह जानकारी (निज्जर की हत्या) को G-20 से पहले सार्वजनिक कर देते, इससे भारत काफी मुश्किल परिस्थिति में पड़ता। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। हम परदे के पीछे से भारत से इस मुद्दे को सहयोग करने को कहते रहे। भारत ने हमसे पूछा कि आप आखिर क्या जानते हैं, हमें वो सबूत दीजिए जो आपके पास है। हमने (कनाडा) ने कहा कि यह आपकी (भारत) की एजेंसी हैं, आपको इसमें जाँच करनी चाहिए। लेकिन उन्होंने हमसे कहा कि आप सबूत दिखाइए।”

ट्रूडो ने आगे कहा, “उस समय यह केवल ख़ुफ़िया जानकारी ही थी और हमारे पास कोई पक्का सबूत नहीं था। ऐसे में हमने कहा कि आपकी सुरक्षा एजेंसियों की जाँच करें और सच सामने लाएँ। उन्होंने (भारत) ने कहा कि नहीं हमें सबूत दिखाइए। मैंने पीएम मोदी से इस बारे में G20 के बाद बात की। उन्होंने कहा कि कनाडा में लोग भारत के खिलाफ काम कर रहे है और हम उनके खिलाफ कार्रवाई चाहते हैं। हालाँकि, हमने उन्हें बोलने की आजादी का हवाला दिया।”

भारत ने दिया जवाब

कैमरे के सामने ट्रूडो ने अपनी ही पोल खोल दी है। इससे भारत की स्थिति और मजबूत हो गई है। भारत लगातार कहता आया है कि कनाडा ने उसे निज्जर की हत्या के संबंध में कोई भी सबूत नहीं दिया है। यही बात ट्रूडो ने खुद ही दोहरा दी। ट्रूडो के इस कबूलनामे के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपना बयान जारी किया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत और कनाडा के रिश्ते खराब करने के जिम्मेदार ट्रूडो ही हैं।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, “आज हमने जो सुना है, उससे वही बात पुष्ट होती है जो हम लगातार पहले से कहते आ रहे हैं। कनाडा ने भारत और भारतीय राजनयिकों के विरुद्ध लगाए गए गंभीर आरोपों के लिए में हमें कोई भी सबूत नहीं दिया है। इस लापरवाह रवैये के कारण भारत-कनाडा संबंधों को जो नुकसान पहुँचा है, उसकी जिम्मेदारी अकेले प्रधानमंत्री ट्रूडो की है।”

गौरतलब है कि भारत ट्रूडो के आरोपों पर सबूतों की माँग करता आया है। भारत ने लगातार यह कहा है कि कनाडा ने उसे रत्ती भर भी सबूत नहीं उपलब्ध करवाए हैं। वहीं कनाडा पहले दिन से एक ही जैसे आरोप दोहरा रहा है। उसका एक ही राग है कि भारत ने कनाडा में निज्जर को मरवाया और इसमें भारतीय अधिकारी शामिल थे। कनाडा की सरकार और पुलिस ने आज तक कोई भी सबूत इस संबंध में सामने नहीं रखे हैं। वह इस मामले में सिर्फ जानकारी को लेकर बात कर रहे हैं।

अपने ही देश में फंसे ट्रूडो

जस्टिन ट्रूडो भारत पर आरोप लगाते-लगाते अपने ही देश में घिर गए हैं। कनाडा के नेता प्रतिपक्ष पिएरे पोलिवर ने ट्रूडो पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ट्रूडो ने इसी कमिटी के सामने कुछ सांसदों के चीन से मिले होने की बात कही थी। अब पियरे पोलिवर ने जस्टिन ट्रूडो को उन सांसदों के नाम सार्वजनिक करने की चुनौती दी है। उन्होंने कहा आरोप लगाया है कि जस्टिन ट्रूडो अपनी कुर्सी बचाने को लेकर ऐसे आरोप लगाए हैं और वह नाम कभी सार्वजनिक नहीं करेंगे।

दूसरी तरफ ट्रूडो की पार्टी के भीतर से भी असंतोष बढ़ रहा है। उनकी लिबरल पार्टी के ही कुछ सांसद उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतारने के लिए काम कर रहे हैं। कई सांसदों ने ट्रूडो सरकार की नाकामियों के चलते जस्टिन ट्रूडो से प्रधानमंत्री पद छोड़ने को कहा है। कई सांसद मुखर होकर यह बात उठा रहे हैं। कनाडाई मीडिया बता रहा है कि लिबरल पार्टी के सांसद एक साथ आकर ट्रूडो पर दबाव बना रहे है कि वह आगामी चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद छोड़ दें। उन पर यह दबाव हालिया टोरंटो उपचुनाव में हार के बाद और बढ़ा है।

CBC की एक रिपोर्ट बताती है कि सांसद सीन केसी ने जस्टिन ट्रूडो से खुले तौर पर पद छोड़ने को कहा है। इसके अलावा बाकी सांसद संख्याबल जुटा रहे हैं ताकि वह ट्रूडो को किनारे लगा सकें। ट्रूडो के विरोधी सांसद तब तक इस पूरी प्रक्रिया को चुपचाप कर रहे हैं। कई सांसदों से एक ऐसे कागज पर दस्तखत करने को कहा जा रहा है जिसमें ट्रूडो को हटाने की बात कही गई है। ट्रूडो को हटाने की यह कोशिश अकारण ही नहीं हो रही है। कनाडा में 2025 में आम चुनाव होने हैं।

चुनाव से पहले जस्टिन ट्रूडो की जनता में लोकप्रियता रसातल को चली गई है। जनता की पसंद-नापसंद बताने वाली अप्रूवल रेटिंग में भारी गिरावट हुई है। सितम्बर, 2024 में ट्रूडो की अप्रूवल रेटिंग मात्र 30% थी। यानी 100 में से 70 लोग ट्रूडो को पसंद नहीं करते। जब ट्रूडो प्रधानमंत्री बने थे, तब उनको पसंद करने वालों का आँकड़ा 60% के पार था। युवा वर्ग और पुरुषों में तो ट्रूडो की रेटिंग 25% पर पहुँच गई है। उनकी लोकप्रियता घटने का सबसे बड़ा कारण कनाडा में बढती महंगाई और बेरोजगारी है।

रामगोपाल मिश्रा की हत्या में पहली गिरफ्तारी मोहम्मद दानिश की, नेपाल भागते हुए UP पुलिस ने दबोचा: लाठीचार्ज करवाने वाला CO सस्पेंड, बहराइच हिंसा में अब तक 55 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के बहराइच में राम गोपाल मिश्रा की हत्या मामले में पहली गिरफ्तारी हो गई है। आरोपित की पहचान राजा उर्फ मोहम्मद दानिश उर्फ जहीर/सहीर खान के तौर पर हुई है। बताया जा रहा है कि जहीर नेपाल जाने की फिराक में था, लेकिन उसे माहसी खंड में राजी क्रॉसिंग पर गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस अब जहीर से इस मामले में पूछताछ कर रही है। वहीं सरफराज समेत 5 अन्य आरोपितों की तलाश के लिए दबिश दी जा रही है।

मालूम हो कि बहराइच हिंसा मामले में अब तक 11 एफआईआर दर्ज हुई हैं इसमें 6 नामजद और 1304 अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। वहीं राम गोपाल की हत्या मामले में 10 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है। ​मोहम्मद दानिश उर्फ ​​साहिर/जहीर खान इन्हीं आरोपितों में से एक था। उसके अलावा अब्दुल हामिद, सरफराज, फहीम भी इस मामले में आरोपित हैं।

गौरतलब है कि 13 अक्टूबर को दुर्गा विसर्जन के दौरान हुई हिंसा मामले में अब तक 55 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इन लोगों की पहचान सीसीटीवी फुटेज के आधार पर हुई है। इसके अलावा प्रशासन ने इस मामले पर एक्शन लेते हुए महसी सीओ रूपेंद्र गौड़ा को निलंबित कर दिया है। उनकी जगह रामपुर में तैनात रहे रवि खोखर को सीओ महसी पद पर नियुक्त किया गया है।

आरोप है कि रूपेंद्र गौड़ ने यात्रा में शामिल लोगों पर लाठियाँ चलवाई थीं जिसके बाद भीड़ उग्र हो गई और हिंसा की घटना देखने को मिली। फिलहाल डीजीपी प्रशांत कुमार का कहना है कि अब बहराइच में पूरी तरह से शांति है। डीजी कानून-व्यवस्था अमिताभ यश ने बहराइच की स्थिति देखने के बाद डीजीपी को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। रूपेंद्र गौड़ा के अलावा माना जा रहा है कि अभी उन पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई होगी जिन्होंने घटना वाले दिन स्थानीय स्तर पर लापरवाही की थी।

पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुस्तान मुर्दाबाद… फैजान ने लगाया नारा, हाई कोर्ट ने कहा- मंगलवार को राष्ट्रीय ध्वज को 21 बार सलामी दो, भारत माता की जय बोलो

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ चिल्लाने वाले एक शख्स को इस शर्त पर बेल दी कि वो पुलिस थाने में लगे राष्ट्रीय ध्वज को महीने में दो बार आकर 21 दफा सलाम करेगा वो भी ‘भारत माता की जय’ नारे के साथ।

कोर्ट ने कहा कि आरोपित को ऐसा हर माह के पहले और चौथे मंगलवार को सुबह 10 से 12 बजे के बीच आकर करना होगा। इसके अलावा आरोपित पर 50000 रुपए का बॉन्ड प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया।

ये फैसला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जस्टिस दिनेश कुमार पालीवाल की एकल पीठ ने दिया। उन्होंने फैजान उर्फ फैजल नाम के आरोपित के केस पर सुनवाई करते हुए अपना यह निर्णय दिया ताकि उसमें उस देश के प्रति सम्मान जगे जहाँ वो पैदा हुआ और रह रहा है।

फैजान को पुलिस ने आईपीसी की धारा 153 सी के तहत हिरासत में लिया था। बाद में उसने कोर्ट से बेल माँगी ये कहकर कि उसपर फर्जी मामला दायर हुआ है। हालाँकि जब अभियोजन पक्ष ने वीडियो दिखाई जो झूठ पकड़ा गया और कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया है।

बता दें कि इस मामले में 17 मई 2024 को भोपाल के मिसरौद पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। जाँच के बाद ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट दायर की गई थी। इस दौरान वीडियो क्लिप को आधार बनाया गया जिसमें आरोपित स्पष्ट रूप से नारेबाजी कर रहा था। जाँच में पुलिस ने पाया कि आरोपित पर पहले से 14 आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं।