Home Blog Page 637

मुल्ला-मुल्ला, भाई-भाई… बांग्लादेश में पाकिस्तानी सामान जाएँगे बेरोकटोक, हटाया जाँच का नियम: भारत से वापस बुलाया था राजदूत

लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गईं प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद सत्ता में आई बांग्लादेश की मोहम्मद युनुस की सरकार पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ कर रही है। बांग्लादेश ने अब पाकिस्तान से आयात होकर आने वाले सामानों की जाँच का नियम खत्म कर दिया है।

अब बांग्लादेश में जाने वाले सभी सामानों को सामने से नहीं जाँचा जाएगा। पाकिस्तान से आने वाले सामानों की जाँच का निर्णय शेख हसीना की सरकार ने लिया था ताकि अवैध ड्रग्स या हथियार चुपके से बांग्लादेश ना पहुँच पाएँ।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश के नेशनल बोर्ड ऑफ़ रेवेन्यू (NBR) ने 29 सितम्बर, 2024 को यह निर्णय लिया है। अब पाकिस्तान से आयात होकर बांग्लादेश जाने वाले हर सामान की अलग-अलग जाँच नहीं होगी।

बांग्लादेश पहुँचने वाले सामानों पाकिस्तानी सामानों की जाँच अब खतरे के अनुमान के आधार पर की जाएगी। NBR का कहना है कि पाकिस्तान से आने वाले सभी सामानों की विशेष जाँच के चलते उसे अतिरिक्त स्टाफ इस काम के लिए लगाना पड़ता था।

बांग्लादेश का यह फैसला अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनुस और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अमेरिका में हुई मुलाक़ात के बाद सामने आया है। पाकिस्तानी सामानों की जाँच का यह नियम शेख हसीना सरकार लाई थी।

जहाँ बांग्लादेश ने इस फैसले के पीछे दोनों देशों के व्यापार में आसानी बढ़ाने को कारण बताया है, वहीं अब यह खतरा बढ़ गया है कि कहीं अवैध सामान बांग्लादेश पहुँचने लगें। कई मौकों पर सामने आया है कि वैध सामानों के बीच हथियार और ड्रग्स छुपा कर तस्करी की जाती है।

बांग्लादेश की नई सरकार का पाकिस्तान के साथ गलबहियाँ करने का यह कोई पहला मामला नहीं है। वह पाकिस्तान से जहाँ नजदीकियाँ बढ़ा रही है, वहीं उसके कुछ कदम भारत विरोधी भी दिखे हैं। हाल ही में बांग्लादेश ने भारत से अपना राजदूत भी वापस बुला लिया था।

इससे पहले बांग्लादेश भारत को दुर्गा पूजा के दौरान इस्तेमाल में लाई जाने वाली हिल्सा मछली निर्यात करने से मना दिया था। इसके अलावा बांग्लादेश ने हाल ही में शेख हसीना सरकार के दौरान भारत के साथ किए गए बिजली समझौतों पर भी जाँच चालू की थी। बांग्लादेश का भारत के प्रति यह रवैया युनुस सरकार के बाद ही बदला है।

इससे पहले पाकिस्तान की अंतरिम सरकार में शामिल सलाहकार नाहिद इस्लाम ने कहा था कि वह पाकिस्तान के साथ 1971 के बाद के रिश्तों को लेकर समझौता चाहते हैं। गौरतलब है कि बांग्लादेश पहले पाकिस्तान का ही हिस्सा था और 1970 के दशक में पाकिस्तान ने यहाँ रहने वाली बंगाली जनता पर अत्याचार किया था। इसके बाद भारत ने बांग्लादेश को पाकिस्तान से मुक्त करवा कर नया देश बनाने में सहयोग दिया था।

पति-पत्नी के बीच सेक्स और इच्छा: मैरिटल रेप को अपराध बनाना कठोर कदम, ‘शादी एक संस्था’ पर आधारित केंद्र का सुप्रीम कोर्ट को जवाब

केंद्र सरकार ने गुरुवार (3 अक्टूबर 2024) को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपराध बनाने को अत्यधिक कठोर और असंगत बताया है। केंद्र सरकार ने उन याचिकाओं का विरोध किया, जिनमें वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की माँग की गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मौजूदा भारतीय बलात्कार कानून का समर्थन किया, जिसमें पति-पत्नी के यौन संबंधों के लिए अपवाद है।

अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार कानूनी से अधिक सामाजिक मुद्दा है, जिसका सीधा असर आम समाज पर पड़ता है। केंद्र ने तर्क दिया कि अगर ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपराध माना भी जाता है तो ऐसा करना सुप्रीम कोर्ट के बस की बात नहीं है। इस मुद्दे पर सभी हितधारकों से उचित परामर्श किए बिना या सभी राज्यों के विचारों को ध्यान में रखे बिना निर्णय नहीं लिया जा सकता।

केंद्र ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद 2 और धारा 376B तथा सीआरपीसी की धारा 198B की संवैधानिक वैधता तय करने के लिए सभी राज्यों के साथ उचित परामर्श की आवश्यकता है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय महिला आयोग की 2022 की रिपोर्ट पर निर्भर है, जिसमें कई सुझाव दिए गए हैं।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की उस रिपोर्ट में कहा गया है कि एमआरई को बरकरार रखा जाना चाहिए क्योंकि (i) एक विवाहित महिला को अविवाहित महिला के समान नहीं माना जा सकता है (ii) वैकल्पिक उपचार मौजूद हैं (iii) दंडात्मक उपायों से पत्नी और आश्रित बच्चों के लिए बेसहारापन और आवारागर्दी हो सकती है।

केंद्र ने कहा कि विवाह से महिला की सहमति समाप्त नहीं होती है और इसके उल्लंघन के लिए दंडात्मक परिणाम होने चाहिए। हालाँकि, विवाह के भीतर इस तरह के उल्लंघन के परिणाम विवाह के बाहर के उल्लंघनों से भिन्न होते हैं। इसमें कहा गया है कि सहमति के उल्लंघन के लिए अलग-अलग तरीके से सजा दी जानी चाहिए। यह इस बात पर निर्भर करता है कि ऐसा कृत्य विवाह के भीतर हुआ है या बाहर।

केंद्र सरकार ने कहा कि विवाह में अपने जीवनसाथी से उचित यौन संबंध बनाने की निरंतर अपेक्षा की जाती है। ऐसी अपेक्षाएँ पति को अपनी पत्नी की इच्छा के विरुद्ध उससे यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करने का अधिकार नहीं देती हैं। हालाँकि, केंद्र ने कहा कि इस तरह के कृत्य के लिए बलात्कार विरोधी कानूनों के तहत किसी व्यक्ति को दंडित करना अत्यधिक और असंगत हो सकता है।

केंद्र सरकार ने आगे कहा कि संसद ने विवाह के भीतर विवाहित महिला की सहमति की रक्षा के लिए पहले से ही विभिन्न उपाय प्रदान किए हैं। इनमें विवाहित महिलाओं के प्रति क्रूरता के लिए दंडित करने वाले कानून (IPC के तहत धारा 498A), महिलाओं की शील के विरुद्ध कृत्यों के लिए दंडित करने वाले कानून तथा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत उपाय शामिल हैं।

हलफनामे में कहा गया है, “यौन पहलू पति-पत्नी के संबंधों के कई पहलुओं में से एक है, जिस पर उनके विवाह की आधारशिला टिकी होती है। हमारे सामाजिक-कानूनी परिवेश में वैवाहिक संस्था की प्रकृति को देखते हुए, यदि विधायिका का यह विचार है कि वैवाहिक संस्था के संरक्षण के लिए आपत्तिजनक अपवाद को बरकरार रखा जाना चाहिए तो यह न्यायालय द्वारा अपवाद को रद्द करना उचित नहीं होगा।”

केंद्र ने विवाह संस्था को निजी संस्था मानने के याचिकाकर्ताओं के दृष्टिकोण की आलोचना की और इसे एकतरफा बताया। उसने कहा कि एक पति-पत्नी के मामले को अन्य मामलों की तरह नहीं माना जा सकता। उसने कहा कि अलग-अलग स्थितियों में यौन शोषण के दंडात्मक परिणामों को अलग-अलग तरीके से वर्गीकृत करना विधायिका पर निर्भर है।

केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि मौजूदा कानून पति-पत्नी के बीच यौन संबंधों के लिए सहमति की अवहेलना नहीं करता है, बल्कि केवल तभी अलग व्यवहार करता है जब यह विवाह के भीतर हो। केंद्र ने कहा कि यह दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के अनुरूप भी है, क्योंकि यह दो अतुलनीय स्थितियों (विवाह के भीतर और बाहर यौन संबंध) को समान मानने से इनकार करता है।

केंद्र सरकार ने कहा कि वह महिलाओं की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध है और वैवाहिक बलात्कार को प्रतिबंधित करने की आवश्यकता नहीं है। बता दें कि भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जेबी पारदीवाला और न्यायाधीश मनोज मिश्रा की पीठ इस मामले पर विचार कर रही है।

पहले भी केंद्र कर चुका है विरोध

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद 2 के माध्यम से वैवाहिक बलात्कार को ‘बलात्कार’ के दायरे से बाहर रखा गया है। इसी तरह का प्रावधान हाल ही में अधिनियमित भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भी मौजूद है। साल 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध माना जाना चाहिए या नहीं, इसको लेकर विभाजित फैसला सुनाया था।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। केंद्र ने पिछले साल दिल्ली हाई कोर्ट में मैरिटल रेप पर चल रही सुनवाई के दौरान कहा था कि केवल इसलिए कि अन्य देशों ने मैरिटल रेप को अपराध घोषित कर दिया है, भारत को भी ऐसा करने की जरूरत नहीं है। केंद्र ने तर्क दिया था कि भारत की सामाजिक व्यवस्था अलग है।

इससे पहले साल 2016 में मोदी सरकार ने मैरिटल रेप के विचार को खारिज कर दिया था। सरकार ने कहा था कि देश में अशिक्षा, गरीबी, ढेरों सामाजिक रीति-रिवाजों, मूल्यों, धार्मिक विश्वासों और विवाह को एक संस्कार के रूप में मानने की समाज की मानसिकता जैसे विभिन्न कारणों से इसे भारतीय संदर्भ में लागू नहीं किया जा सकता है।

वहीं, साल 2017 में केंद्र सरकार ने मैरिटल रेप को अपराध न मानने के कानूनी अपवाद को हटाने का विरोध किया था। सरकार ने तर्क दिया था कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने से विवाह की संस्था अस्थिर हो जाएगी और इसका इस्तेमाल पत्नियों द्वारा अपने पतियों को सजा देने के लिए किया जाएगा।

वैवाहिक बलात्कार या मैरिटल रेप

दरअसल, पत्नी की अनुमति के बिना पति द्वारा जबरन शारीरिक संबंध बनाने को मैरिटल रेप या वैवाहिक बलात्कार कहा जाता है। इसे पत्नी के खिलाफ एक तरह की घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न माना जाता है। वर्तमान कानून के तहत देश में वैवाहिक बलात्कार को अपराध नहीं माना जाता है। रेप से संबंधित कानूनों में इसके लिए अपवाद जोड़े गए हैं।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 (बलात्कार) के अपवाद 2 के मुताबिक मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना गया है। मैरिटल रेप को लेकर नए कानून बनाने की माँग काफी समय से हो रही थी। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद 2 और धारा 376B तथा सीआरपीसी की धारा 198B में इसके लिए पर्याप्त उपाय हैं। वहीं, भारत सरकार इसे रेप मानने से इनकार करती रही है।

मासूम खान ने बनाया इस्लाम नगर, 100 एकड़ में फैला… कब्जा कर ली थी सरकारी वन भूमि: ओडिशा में पटनायक सरकार में रोड-बिजली-तालाब भी बना दिए

एक समय था, जब वामपंथी-कॉन्ग्रेसी जैसे छद्म सेक्युलर लव जिहाद और लैंड जिहाद को दक्षिणपंथियों का दुष्प्रचार बताकर खारिज करते थे, लेकिन आज यह हकीकत साबित हो गया है। लव जिहाद के स्थापित सत्य के बाद अब लैंड जिहाद भी मिथ नहीं, बल्कि सच्चाई है। झारखंड, उत्तराखंड, बंगाल, हिमाचल जैसे राज्यों के बाद ओडिशा में भी लैंड जिहाद का एक बड़ा मामला सामने आया है।

ओडिशा के मलकानगिरी जिले के मोटू क्षेत्र में वन क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर कब्जा करके ‘इस्लाम नगर’ स्थापित दिया गया है। पिछली बीजद सरकार के कार्यकाल में स्थापित इस्लाम नगर राष्ट्रीय राजमार्ग 326 से मात्र 2-3 किलोमीटर की दूरी पर वन भूमि पर बसाया गया है। यह सबरी नदी के किनारे घने जंगलों से घिरा हुआ है। यहाँ सड़कें, बिजली आदि लगाने के साथ तार की बाड़ भी लगा दी गई है।

वन भूमि पर अतिक्रमण के मामले पर चिंता व्यक्त करते हुए भाजपा के स्थानीय विधायक नरसिंह मदकामी ने बीजू जनता दल (बीजद) के नेताओं पर इसमें शामिल होने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि जिले के जनजातीय बहुल मोटू क्षेत्र में वन अधिनियम का उल्लंघन कर 100 एकड़ से अधिक वन भूमि पर अतिक्रमण में स्थानीय बीजद नेता मासूम खान शामिल है।

उनका कहना है कि मासूम खान नवरंगपुर के पूर्व सांसद एवं बीजद नेता प्रदीप माझी का करीबी सहयोगी है। माझी के साथ उसकी कई तस्वीरें भी ऑनलाइन वायरल हो रही हैं। मासूम खान बीजद के राजनीतिक कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल रहा है। इसकी तस्वीरें सामने आई हैं। हालाँकि, प्रदीप माझी ने अभी तक इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

मदकामी ने कहा कि मासूम खान सहित बीजद के नेता मोटू क्षेत्र में इस्लाम नगर स्थापित करने के लिए अवैध गतिविधियों में लिप्त हैं। उन्होंने कहा कि यह चौंकाने वाली बात है कि पारंपरिक बारिबाँचा गाँव का नाम बदलकर इस्लाम नगर कर दिया गया है और महात्मा गाँधी नरेगा (MANREGA) फंड का उपयोग करके अतिक्रमित क्षेत्र में कई अवैध इमारतें, गोदाम, सड़कें और तालाब बना दिए गए हैं।

भाजपा विधायक का कहना है कि यहाँ बिजली विभाग ने भी बड़े-बड़े ट्रांसफॉर्मर लगाए हैं। ये सभी अवैध गतिविधियाँ मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली पिछली बीजद सरकार के कार्यकाल में हुई हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि 100 एकड़ वन भूमि पर कब्जा करना, पेड़ों को साफ करना और ऊँची इमारतों का निर्माण राजनीतिक समर्थन के बिना नहीं हो सकता।

इन खुलासों के बाद वन विभाग के मलकानगिरी डिवीजन ने जाँच शुरू कर दी है। लकानगिरी जिले की सहायक वन संरक्षक प्रियंका महुका ने बताया कि शिकायत मिलने पर स्थानीय रेंजर को सूचित कर जाँच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। स्थानीय रेंजर की जाँच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

उधर, ओडिशा भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अनिल बिस्वाल ने कहा कि मुद्दा लैंड जिहाद के इर्द-गिर्द घूमता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड और असम में भाजपा सरकारों ने लैंड जिहाद के खिलाफ स्पष्ट रूप से कड़ा रुख अपनाया है और सख्त कदम उठा रही हैं। बिस्वाल ने कहा कि ओडिशा सरकार भी उत्तराखंड और असम की भाजपा सरकारों जैसी ही नीति अपनाएगी।

पैगम्बर मोहम्मद के वंशज को भी मार गिराया इजरायल ने: हफ्ते भर पहले ही बना था हिजबुल्लाह का सरगना, इस्लामी बता रहे थे इसे ‘खूंखार योद्धा’

इजरायल ने इस्लामी आतंकी संगठन हिजबुल्लाह के नए सरगना हाशिम सैफिद्दीन को भी मार गिराया है। उसे लेबनान के भीतर एक हवाई हमले में मार दिया गया। हिजबुल्लाह ने इस संबंध में अभी आधिकरिक जानकारी नहीं दी है। नए हिजबुल्लाह सरगना की मौत उसके पिछले मुखिया हसन नसरुल्लाह के मारे जाने के एक सप्ताह के भीतर हो गई है।

इजरायली मीडिया ने जानकारी दी है कि शुक्रवार रात (4 अक्टूबर, 2024) को इजरायल की वायु सेना के तीन विमानों ने बेरूत के भीतर एक जगह पर भारी हवाई बमबारी की। इस बमबारी में हिजबुल्लाह का नया सरगना हाशिम सैफिद्दीन मारा गया। हमले के दौरान वह के बंकर में मौजूद था और अपने कमांडरों के साथ बैठक कर रहा था।

हिजबुल्लाह के नए सरगना के मारे जाने को लेकर इजरायली सुरक्षा बलों (IDF) और हिजबुल्लाह ने अभी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। इजरायल के इस हवाई हमले के कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर आए हैं। इनमें एक रिहायशी इलाके में आग की लपटें उठती दिखाई देती हैं।

कौन था हाशिम सैफिद्दीन?

हिजबुल्लाह के मुखिया हसन नसरल्लाह को शुक्रवार (27 सितम्बर, 2024) को इजरायल ने एक हवाई हमले में मार गिराया था। इसी के साथ हिजबुल्लाह के कई और कमांडर भी मारे गए थे। इसके बाद प्रश्न उठा था कि इस आतंकी संगठन का सरगना अब कौन बनेगा। इस बीच हाशिम सैफिद्दीन का नाम उठा था।

सैफिद्दीन को हिजबुल्लाह का नया मुखिया माना जा रहा था। सैफिद्दीन भी नसरल्लाह की तरह एक शिया इमाम है। वह हिजबुल्लाह के सबसे वरिष्ठ लोगों में से एक है। लेबनान में जन्मा सैफिद्दीन हिजबुल्लाह की शूरा कमिटी का सदस्य था।

यह कमिटी हिजबुल्लाह को नियंत्रित करती है। इसके अलावा यह एग्जीक्यूटिव कमिटी और जिहाद काउंसिल का मुखिया था जो कि हिजबुल्लाह के आतंक समेत बाकी मामलों को देखती है। सैफिद्दीन 60 वर्ष का था और वह हिज्बुलाह के मृत सरगना नसरल्लाह का ममेरा भाई था।

उसके बेटे की शादी ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर कासिम सुलेमानी के बेटी के साथ हुई थी। सैफिद्दीन काली पगड़ी पहनता था, यह शियाओं के बड़े इमाम पहना करते हैं। वह खुद को इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद के वंशज के तौर पर दर्शाता था। उसे इस्लामी सोशल मीडिया मीडिया हैंडल्स ने ‘खूंखार योद्धा’ बताया था।

सैफिद्दीन को अमेरिका ने 2017 में आतंकी घोषित कर दिया था। माना जाता है कि उसे लम्बे समय से हिजबुल्लाह का अगला मुखिया बनने के लिए तैयार किया जा रहा था। ईरान भी उसे नया मुखिया बनाने जाने के पक्ष में था। सालों से उसे इस बात की ट्रेनिंग दी जा रही थी। हालाँकि, अब उसके मारे जाने की बात सामने आई है।

हिजबुल्लाह पर इजरायल का कहर जारी

इजरायल लगातार आतंक के खात्मे के लिए लेबनान में हिजबुल्लाह और गाजा के भीतर हमास पर हमले कर रहा है। उसने लेबनान में सैफिद्दीन के अलावा एक अन्य हमले में राकेट और मिसाइल के विशेषज्ञ मुहम्मद युसूफ अनीसी को मार गिराया है। मैकेनिकल इंजीनियर की शिक्षा लेने वाला अनीसी इजरायल पर हमले के लिए रॉकेट बनाता था।

इजरायल ने इसी के साथ वेस्ट बैंक में भी बमबारी की और यहाँ के हमास कमांडर यासिर अब्दुलरज्जाक को मार गिराया। इस आतंकी ने इजरायल में बीते माह एक हमले को अंजाम दिया था। इससे पहले इजरायल ने लगभग 2 दशक पहले 2 इजरायली सैनिकों को मारने वाले एक हमास आतंकी को भी मार गिराया।

गिर सोमनाथ में बुलडोजर कार्रवाई रोकने से हाई कोर्ट का इनकार, प्रशासन ने अवैध मस्जिदों, दरगाह और कब्रों को कर दिया था समतल: औलिया-ए-दीन कमेटी ने दी थी चुनौती

गुजरात हाई कोर्ट ने गुरुवार (3 अक्टूबर 2024) को मुस्लिमों की मस्जिद, दरगाह और कब्रों के हटाने के संबंध में यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश देने से इनकार कर दिया। दरअसल, इन कार्रवाई करने के लिए 28 सितंबर को गिर सोमनाथ में अधिकारियों द्वारा आदेश दिया गया था। प्रशासन ने अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई में अवैध रूप से बने मजहबी निर्माणों को भी ध्वस्त कर दिया था। 

औलिया-ए-दीन कमेटी नाम के वक्फ द्वारा दायर याचिका पर राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए न्यायमूर्ति संगीता के. विशेन की एकल पीठ ने अपने मौखिक आदेश में कहा, “जहाँ तक ​​यथास्थिति का सवाल है, इसमें कोई विवाद नहीं है कि 1983 में राज्य सरकार द्वारा इस अदालत के समक्ष बॉम्बे लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 37 के तहत जाँच कराने के बारे में एक बयान दिया गया था।”

न्यायमूर्ति संगीता विशेन ने आगे कहा, “डिप्टी कलेक्टर ने अपनी जाँच के बाद एक आदेश पारित किया, जिसके तहत भूमि को राज्य सरकार की भूमि घोषित किया गया था। इसके खिलाफ कलेक्टर के समक्ष अपील दायर की गई थी और यह याचिकाकर्ता के लिए किसी भी रोक या सुरक्षा के बिना लंबित है।” कोर्ट ने राज्य की इस दलील पर भी गौर किया कि ये कदम अतिक्रमण हटाने के लिए उठाए गए हैं।

अदालत ने आगे कहा कि साल 2015 में याचिकाकर्ता द्वारा एक सिविल मुकदमा दायर किया गया था और वरिष्ठ सिविल जज ने शुरू में रोक लगा दी थी। इसके बाद 2020 में याचिकाकर्ता द्वारा वादपत्र वापस करने के लिए एक आवेदन दायर किया गया, जिसे 18 जनवरी 2020 को अनुमति दे दी गई। वादपत्र वापस कर दिया गया और मामला अब वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित है।

न्यायमूर्ति विशेन ने आगे कहा कि वक्फ ट्रिब्यूनल में भी रोक नहीं लगाई गई। हाई कोर्ट ने भी इस साल अलग-अलग अवमानना ​​कार्यवाही में इस पारित आदेश पर ध्यान दिया है। इसलिए यह स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है कि कोई रोक नहीं दी गई थी। 18 जनवरी 2020 के आदेश के खिलाफ इस अदालत के समक्ष एक रिट याचिका दायर की गई है और वह लंबित है।

कोर्ट ने कहा कि इस अदालत की प्रथम दृष्टया राय में याचिकाकर्ता किसी भी यथास्थिति का हकदार नहीं है और इसलिए इसे खारिज कर दिया गया है। कोर्ट ने कहा, “इस अदालत की प्रथम दृष्टया राय में याचिकाकर्ता संपत्ति का प्रबंधक होने का दावा करता है, लेकिन याचिका के रिकॉर्ड पर रखा गया पीटीआर किसी भी संपत्ति का संकेत नहीं देता है। याचिकाकर्ता के वकील ने इसे स्वीकार किया है।”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 24 अक्टूबर की तारीख तय की है। इसके साथ ही अदालत ने प्रतिवादी राज्य के अधिकारियों से हटाए गए अतिक्रमण का विवरण प्रदान करने के लिए कहा है। इसमें इमारत की प्रकृति, जिस वर्ष यह बना, भौगोलिक संकेत (यानी स्थान) और वर्ष संरचनाओं का अंकन आदि सहित संपत्तियों का ब्योरा भी शामिल है।

दरअसल, अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में 36 बुलडोजर, 70 ट्रैक्टर-ट्रॉली और 1500 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। मलबा हटाने के लिए 50 ट्रैक्टर और 10 बड़े डंपरों को लगाया गया। गिर सोमनाथ में विशेष रूप से समुद्री इलाकों और पूजा स्थलों के आसपास के अवैध निर्माणों को हटाने के उद्देश्य से यह मेगा अभियान चलाया गया।

इस मेगा ड्राइव के दौरान प्रशासन ने ईदगाह और मस्जिद सहित कई अवैध मजहबी स्थलों को हटाया, जिससे कुछ स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग विरोध में एकत्रित हो गए। विरोध के बावजूद, प्रशासन ने सख्ती से स्थिति को नियंत्रण में लिया और कार्रवाई को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। यह विध्वंस अभियान पिछले एक महीने से तैयार किया जा रहा था।

प्रशासन ने करीब एक महीने तक सर्वेक्षण किया और सभी अवैध निर्माणों की पहचान की। हाजी मंगरोलीशा पीर दरगाह, हजरत माईपुरी, सीपे सालार और मस्तानशा बापू जैसी प्रमुख दरगाहों को भी इस कार्रवाई के दौरान हटाया गया। प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया कि इस प्रक्रिया के दौरान शांति व्यवस्था बनी रहे और विध्वंस कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो सके।

वक्फ के मुतवल्ली (प्रबंधक/ट्रस्टी) ने एक याचिका दायर करके प्रशासन की कार्रवाई को अवैध और असंवैधानिक बताया। साथ ही कहा कि प्रशासन ने सदियों पुराने मस्जिदों, ईदगाहों, दरगाहों और कब्रों को गिरा दिया। याचिका में यह भी कहा गया कि तोड़फोड़ से पहले कोई नोटिस नहीं दी गई थी। याचिका में यह भी कहा गया कि मामला वक्फ ट्रिब्यूनल में होने के बावजूद कार्रवाई की गई।

गाजा पट्टी से आतंक की सरकार चला रहा था रावी मुश्तहा, इजरायल ने हवाई हमले में मार गिराया: हमास ने अपने लोगों से भी छिपाया राज

इजरायल ने गाजा पट्टी में इस्लामी आतंकी संगठन हमास की सरकार चलाने वाले रावी मुश्तहा को मार गिराने का ऐलान किया है। मुश्तहा के साथ हमास के दो और बड़े आतंकी मारे गए हैं। इजरायल ने यह हवाई हमला तीन माह पहले किया था। इसका खुलासा अब किया गया है।

इजरायली सेना ने एक बयान में बताया है कि इस हवाई हमले में उत्तरी गाजा का एक तहखाना निशाने पर था। इस हवाई हमले में मुश्तहा के साथ समेह अल सिराज और सामी औदेह को मार गिराया गया। रावी मुश्ताहा गाजा पट्टी का सर्वेसर्वा था। सिराज हमास का राजनीतिक ब्यूरो और हमास श्रम समिति के सुरक्षा पोर्टफोलियो का काम देखता था। औदेह दूसरे काम देखता था।

इजरायल के आधिकारिक बयान में बताया गया, “IDF और ISA की खुफिया जानकारी पर किए गए हमले के दौरान, इजरायली वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने उत्तरी गाजा पट्टी में एक किलेबंद तहखाने में छिपे आतंकियों पर हमला किया और उन्हें मार गिराया। यह तहखाना हमास के कमांड और नियंत्रण केंद्र के रूप में काम करता था। इसके अंदर आतंकी शरण लेते थे।”

इसी बयान में इजरायल ने आगे बताया, “तहखाने पर हमले और आतंकियों के खात्मे के बाद भी हमास ने मुश्तहा की मौत की घोषणा नहीं की ,ताकि उसके आतंकियों का मनोबल ना गिरे।” बयान के अनुसार, रावी मुश्तहा हमास का एक प्रमुख एजेंट था, जिसका हमास सैनिकों की तैनाती पर सीधा प्रभाव था।

मुश्तहा गाजा पट्टी के भीतर नागरिक सरकार का नेतृत्व करता था और साथ ही आतंकी गतिवधियां चलाता रहता था। वह हमास के मुखिया याहया सिनवार का दायाँ हाथ था। मुश्तहा और याह्या सिनवार ने हमास का आतंकी ढाँचा बुना था। इन दोनों ने एक साथ इजरायली जेल में सजा काटी थी।

मुश्तहा को गाजा पट्टी में हमास के राजनीतिक ब्यूरो में सबसे वरिष्ठ माना जाता था। अक्टूबर, 2023 में इजरायल का गाजा से संघर्ष छिड़ने के बाद आतंकी अभियानों में शामिल होने के दौरान उसने हमास प्रशासन पर नागरिक नियंत्रण बनाए रखा। मुश्तहा सिनवार के करीबी विश्वासपात्रों में से एक था।

इससे कुछ ही दिन पहले इजरायल ने हिजबुल्लाह के मुखिया हसन नसरुल्लाह को मार गिराया था। उसे बेरुत में एक हवाई हमले में मारा गया था। इजरायल ने इसके अलावा हमास के एक बड़े आतंकी मोहम्मद दाईफ को भी जुलाई में मार गिराया था। इजरायल लगातार उसके दुश्मन आतंकी संगठनों का नेतृत्व खत्म करता जा रहा है।

इजरायल के इन हमलों के बीच ईरान ने भी उस पर मिसाइलें दागी हैं। ईरान के इन हमलों में कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह ईरान को माकूल जवाब देंगे। ईरान और इजरायल के बीच बढती अदावत के कारण मध्य एशिया में संकट और गहरा गया है।

इतना तो गिरगिट भी नहीं बदलता रंग, जितने विनेश फोगाट ने बदल लिए

ओलंपिक खेलों के बाद भारत आकर कॉन्ग्रेस ज्वाइन करने वाली विनेश फोगाट हरियाणा चुनावों के मध्य काफी चर्चा में हैं। अब तक लोग जहाँ उन्हें नारीशक्ति के रूप में कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर देख रहे थे। वहीं अब ये सवाल होने लगे हैं कि विनेश फोगाट राजनीति करने के लिए कितने सच और कितने झूठ बोल रही हैं।

एक के बाद एक विनेश फोगाट की वीडियो वायरल हो रही है जिसमें कॉन्ग्रेस की तारीफ करने के चक्कर में वो अलग-अलग दावे कर रही हैं और मोदी सरकार को लेकर विशुद्ध झूठ बोल रही हैं।

पहले तो उन्होंने एक जनसभा को संबोधित करते हुए ये कहा कि वो ओलंपिक में जाने का श्रेय अगर प्रियंका गाँधी को दें तो गलत नहीं होगा… उन्होंने ये क्या सोचकर कहा और कैसे प्रियंका गाँधी को श्रेय दिया जा सकता है ये तो नहीं पता, लेकिन लोग ये जानते हैं कि ओलंपिक तक विनेश को पहुँचाने के लिए मोदी सरकार ने कोई कसर नही छोड़ी थी।

ओलंपिक के बाद खुद खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने संसद में बताया था कि सरकार ने विनेश पर 70 लाख 45 हजार रुपए खर्च किए। उन्होंने कहा था कि विनेश को ट्रेनिंग के लिए विदेश भी भेजा गया था। क्या बिन इस समर्थन के विनेश का ओलंपिक जाना संभव था?

उस समय, इस पर सरकार ने कोई सफाई नहीं दी, उन्होंने बस अपने खिलाड़ी के लिए क्या किया इसकी एक जानकारी दी जो कोई भी सरकार देती…। इस पर भी एहसानफरामोश होकर विनेश ये बोलती दिखीं कि सरकार ने उन्हें ट्रेनिंग देकर या पैसे खर्च करके कोई एहसान नहीं किया ये सरकार का फर्ज था।

विनेश आज कॉन्ग्रेस ज्वाइन करके जिस प्रकार की राजनीति कर रही हैं अगर मोदी सरकार को ऐसी पॉलिटिक्स करनी होती तो फिर वो क्यों एक ऐसी खिलाड़ी को बढ़ावा देते जो चुनावों से ठीक पहले उनके खिलाफ माहौल बनाने का काम कर रही थीं…। मोदी सरकार ने राजनीति को किनारे रखकर विनेश के भीतर के खिलाड़ी को प्राथमिकता दी और उन्हें आगे बढ़ाया।

अगर बावजूद इस सच्चाई के, विनेश अब भी यही कहती हैं कि ओलंपिक के वक्त भी प्रियंका ही उनकी मददगार थीं तो क्या ये सवाल उठना नहीं बनता कि प्रियंका ने उनकी मदद किन मायनों में और कहाँ की? कैसे प्रियंका गाँधी की वजह से वो ओलंपिक में गईं?

इस झूठ की तरह विनेश का एक और झूठ सोशल मीडिया पर वायरल है। हाल में विनेश ने राजदीप सरदेसाई को इंटरव्यू देते हुए कहा कि भाजपा के किसी नेता ने उन्हें ओलंपिक के दौरान कॉल नहीं किया। वीडियो में उन्होंने ऐसे दिखाया जैसे मोदी सरकार उन्हें ओलंपिक के दौरान सपोर्ट नहीं कर रही थी। उनके साथ अन्य खिलाड़ियों से अलग बर्ताव कर रही थी…।

इस दावे की हकीकत को किसी पुराने उदाहरण के साथ गलत साबित करने की जरूरत नहीं है। विनेश ने द लल्लनटॉप को दिए बयान से ही खुद के इस झूठ का खंडन कर दिया। वीडियो में देख सकते हैं कि उन्होंने खुद कहा था कि ओलंपिक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें फोन किया था लेकिन उन्होंने बात करने से मना कर दिया।

विनेश के मन में अगर राजनीति पहले से नहीं थी तो वो ऐसी स्थिति में एक ऐसे व्यक्ति का अनादर नहीं करतीं जो देश के प्रधानमंत्री हैं और उससे भी बड़ी बात उन्हें हौंसला देने के लिए उनसे बात करना चाहते थे…? उन्होंने पहले बात करने को नकारा और उसके बाद कॉन्ग्रेस ने इस हरकत को प्रमोट किया ।

विनेश के जब झूठ पकड़े गए.. फजीहत ज्यादा हुई तो क्या किया जाता… कॉन्ग्रेस ने उनकी एक वीडियो बनाई। वीडियो में उन्होंने बताया कि ओलंपिक खेल के बाद प्रधानमंत्री मोदी से बात करने के लिए उनके कमरे में कैमरे लगाए गए थे और उन्हें खुद अपने फोन से वीडियो नहीं बनाने दी जा रही थी, इसलिए उन्होंने बात करने से मना कर दिया।

विनेश जहाँ अपने हर बयान के साथ पक्ष बदल रही थीं वहीं उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस इससे भी ज्यादा घिनौनी हरकत करने में लगी थी। उन्होंने अपनी वीडियो के थंबनेल से मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए उसमें ऐसे दिखाया जैसे मोदी सरकार ने रात भर विनेश फोगाट के बेडरूम से लेकर हर जगह पर कैमरे फिट करवा दिए थे और वो विनेश की रिकॉर्डिंग करना चाहते थे।

जब सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठाने लगे तो बड़ी चालाकी से उस थंबनेल को बदल दिया गया। हालाँकि स्क्रीनशॉट वायरल होने के चलते ये घटिया हरकत छिप नहीं पाई। देख सकते हैं कि विनेश की कही गई बातों को जनता तक पहुँचाने का तरीका कितना ज्यादा भ्रमित करने वाला है।

अजीब बात ये है कि कॉन्ग्रेस की इस हरकत पर विनेश फोगाट ने विरोध तक नहीं किया। राजनीति में आकर वह ये तक भूल गईं कि जिस मोदी सरकार पर वह इतने बड़े-बड़े लांछन लगा रही है। उस मोदी सरकार ने न केवल उनकी ट्रेनिंग को प्रमुखता से कराया बल्कि वित्तीय सहायता भी खी। इसके अलावा खेल क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2016 में अर्जुन पुरस्कार और 2020 में ध्यानचंद खेल रत्न दिया।

इसके अलावा ओलंपिक में भी ट्रेनिंग, पर्सनल स्टाफ और वित्तीय सहायता से लेकर हर प्रकार की सहायता तब मिली जब भाजपा केंद्र और उनके गृह राज्य हरियाणा में सत्ता में थी। बावजूद इन सब सच्चाइयों के विनेश झूठ बोलने में जुटी हैं। उनकी बहन बबीता फोगाट खुद मानती हैं कि विनेश बदल गई हैं।

उन्होंने बताया कि जब विनेश के पिता का देहांत हुआ था तब उनके पिता यानी महावीर फोगाट ने उनकी दोबारा कुश्ती में वापसी कराई थी। मगर जब वो ओलंपिक से लौटीं तो उन्होंने अपने गुरु को धन्यवाद देना तो दूर, दीपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ रोड शो किया था जैसे हुड्डा ही उनके कोच हों।

गौरतलब है कि अपने ओलंपिक में डिस्क्वालिफाई होने को भी विनेश फोगाट ने हरियाणा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बना दिया है। भाजपा सरकार ने उनके सम्मान में उन्हें रजत विजेता की तरह हर सुविधा देने का ऐलान किया था लेकिन विनेश चुनावों के लिए जगह-जगह घूमकर ये दिखा रही हैं जैसे ओलंपिक में भी हारी वह मोदी सरकार के कारण ही थीं । जबकि, सच्चाई तो ये है कि मोदी सरकार ने उन्हें हराने क प्रयास नहीं बल्कि उन्हें विजेता साबित करवाने के लिए जी-जान लगाई थी। सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे को भेज विनेश के लिए अपील की गई थी, लेकिन वजन ज्यादा निकलने की वजह विनेश डिस्क्वालिफाई हुईं और अब वो उसी बात को भूल गई हैं। उनकी आँख पर सिर्फ राजनीति की पट्टी चढ़ गई हैं जो उन्हें आवाज उठाने का अर्थ सिर्फ मोदी सरकार का विरोध बता रही है।

सनातन रक्षा दल के अध्यक्ष गिरफ्तार, चला रहे थे साईं मूर्तियों को गंगा में प्रवाहित करने का अभियान: वाराणसी के 14 मंदिरों से हटाई जा चुकी है प्रतिमा, 60 की लिस्ट है तैयार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी के मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटाने वाले अजय शर्मा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। बुधवार (2 अक्टूबर 2024) की रात 2 बजे अजय शर्मा मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटाने के लिए घर से निकला था। इसकी सूचना मिलते ही सादी वर्दी में पुलिस पहुँची और रास्ते से ही उसे उठा लिया। उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

DCP काशी गौरव बंसवाल ने बताया कि सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा को शांतिभंग के आरोप में हिरासत में लिया गया। इस बीच, चौक स्थित आनंदमई मंदिर के पुजारी ने चौक थाने में अजय शर्मा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस ने धार्मिक परंपराओं, धार्मिक स्थलों या प्रतीकों के अपमान, शांतिभंग आदि के आरोपों में मुकदमा दर्ज करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

इसी आरोप में साईं भक्तों ने भी अजय शर्मा के खिलाफ सिगरा थाने में तहरीर दी है। इससे पहले शर्मा के घरवालों ने आरोप लगाया था कि रात 2 बजे मैदागिन चौराहे से नीली कार से आए कुछ युवक उसे उठा ले गए। उसके दोनों मोबाइल नंबर ऑफ हैं। पुलिस कमिश्नर से साईं मंदिर के प्रबंधकों ने मुलाकात की। काशी के सभी 72 मंदिरों की सुरक्षा की माँग की है।

सनातन रक्षक दल ने 1 अक्टूबर को वाराणसी के 14 मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटाई थीं। संस्थान का दावा है कि अभी 60 और मंदिरों की लिस्ट है। इधर, लखनऊ में भी अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने मंदिरों से साईं मूर्तियों को हटाने की माँग की है। महासभा का कहना है कि मंदिरों में साईं मूर्तियों को स्थान नहीं दिया जाएगा।

इस घटना के बाद महाराष्ट्र स्थित शिरडी साईं ट्रस्ट ने इस पर तत्काल रोक लगाने की माँग की। शिरडी साईं ट्रस्ट का कहना है, “हमने महाराष्ट्र सरकार से बात की है और उनसे कहा है कि यूपी सरकार से इस मसले पर बातचीत करे। मूर्तियाँ हटाने पर तत्काल रोक लगाई जाए। ऐसे कार्य से साईं भक्तों की भावना आहत हो रही है।” उसने कहा कि ऐसे 100 मंदिरों की सूची बनाई गई है।

इस घटना से पहले अजय शर्मा ने दैनिक भास्कर से कहा था कि काशी भगवान शिव की नगरी है। यहाँ साईं बाबा का कोई काम नहीं है। मूर्तियाँ हटाने का संकल्प 2 साल पहले लिया था। तभी अभियान का आगाज हुआ था। लोगों को जागरूक करने में इतना समय लगा। शर्मा ने कहा कि काशी खंड के सभी मंदिरों से साईं की मूर्तियों को हटाया जाएगा। अगर किसी को पूजा करनी है तो वह घर में करे।

बता दें कि केंद्रीय ब्राह्मण सभा के विरोध के बाद मूर्तियाँ हटाई गई थीं, जिसमें साईं की पूजा को सनातन धर्म विरोधी बताया गया था। मूर्तियाँ हटाने से पहले संबंधित मंदिरों की सहमति ली गई है और उन्हें विधि-विधान से गंगा में विसर्जित किया जा रहा है। जिन प्रमुख मंदिरों से साईं की प्रतिमाएँ हटाई गई हैं, उनमें बड़ा गणेश मंदिर, त्र्यंबकेश्वर मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर और पुरुषोत्तम मंदिर शामिल हैं।

जितना पैखाना, उतना देना होगा पैसा: हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार वसूलेगी सीवर टैक्स, कमाई बढ़ाने के लिए गाँवों में पानी की फ्री आपूर्ति बंद-शहरों में रेट बढ़ा

हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार अब लोगों पर टॉयलेट टैक्स भी लगाएगी। आर्थिक संकट में फंसे राज्य के राजस्व बढ़ाने को राज्य की सुक्खू सरकार ने यह फार्मूला निकाला है। राज्य सरकार शहरी इलाकों में हर घर से अब शौचालय पर टैक्स वसूलने जा रही है। इसकी दरें भी जारी कर दी गई हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के जल शक्ति विभाग ने हाल ही में फैसला लिया है कि अब राज्य के शहरी इलाकों में हर घर से सीवर टैक्स लिया जाएगा। जल शक्ति विभाग घरों में लगी प्रत्येक टॉयलेट सीट पर ₹25/माह का टैक्स लगाएगा। यानी एक घर में जितने शौचालय बने होंगे, उनसे उतना अधिक टैक्स वसूला जाएगा।

हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार का कहना है कि इससे उसके राजस्व में वृद्धि होगी। इसके अलावा पानी की दरों में भी कॉन्ग्रेस सरकार ने बदलाव किए हैं। उसने ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की मुफ्त आपूर्ति भी बंद कर दी है। अब ग्रामीण इलाकों में पानी लेने वालों को हर ₹100/माह देना होगा।

इसके अलावा शहरों में भी पानी की दरों में बदलाव किया गया है। सुक्खू सरकार ने गैर घरेलू पानी कनेक्शन के लिए और भी अधिक पानी की दरें रखी हैं। पानी की दरों के अलावा मेंटेनेंस चार्ज भी लगाया जाएगा। इन सबके जरिए सुक्खू सरकार अपना खजाना भरेगी।

हिमाचल प्रदेश में शौचालय पर टैक्स से पहले भी सुक्खू सरकार कमाई के जरिए बढ़ाने के लिए जनता पर बोझ बढ़ाती रही है। हाल ही में उसने राज्य में वाहनों की बिक्री पर ग्रीन टैक्स लगाया था। यह टैक्स वाहनों की खरीद के साथ लगेगा।

जहाँ एक ओर सरकार लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ाती जा रही है, वहीं दूसरी ओर उनको दिए जाने वाले फायदे भी घटाए जा रहे हैं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश में आयकर भरने वालों को दी जाने वाली 125 यूनिट मुफ्त बिजली की योजना सुक्खू सरकार ने बंद कर दी थी। अब उसने उद्योगों को दी जाने वाली ₹1 की सब्सिडी भी बंद कर दिया है।

सुक्खू सरकार के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश की आर्थिक हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि वह सितम्बर माह में कर्मचारियों को तनख्वाह और पेंशन तक नहीं समय से दे पाया था। सुक्खू सरकार राज्य में कई रेवड़ी योजनाओं का ऐलान करके सत्ता में आई थी। इन पर भी काम नहीं हो पाया है।

आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया की है स्थिति

हिमाचल की बदहाल आर्थिक स्थिति इसके 2024-25 के बजट से समझी जा सकती है। वित्त वर्ष 2024-25 के लिए ₹58,444 करोड़ का बजट सुक्खू सरकार ने पेश किया था। इस बजट में भी सरकार का राजकोषीय घाटा (सरकार की आय और खर्चे के बीच का अंतर, जिसे कर्ज लेकर पूरा किया जाता है) ₹10,784 करोड़ है।

इस बजट का बड़ा हिस्सा तो केवल पुराने कर्जा चुकाने और राज्य के कर्मचारियों की पेंशन और तनख्वाह देने में ही चला जाएगा। इस बजट में से ₹5479 करोड़ का खर्च पुराने कर्ज चुकाने, ₹6270 करोड़ का खर्च पुराने कर्ज का ब्याज देने में करेगी। यानी पुराने कर्जों के ही चक्कर बजट का लगभग 20% हिस्सा चला जाएगा।

इसके अलावा सुक्खू सरकार तनख्वाह और पेंशन पर ₹27,208 करोड़ खर्च करेगी। इस हिसाब से देखा जाए तो ₹38,957 का खर्च तो केवल कर्ज, ब्याज, तनख्वाह और पेंशन पर ही हो आएगा। यह कुल बजट का लगभग 66% है। अगर नए कर्ज को हटा दें तो यह हिमाचल के कुल बजट का 80% तक पहुँच जाता है। यानी राज्य को बाकी खर्चे करने की स्वतंत्रता ही नहीं है।

हिमाचल प्रदेश 2024-25 में लगभग ₹1200 करोड़ सब्सिडी पर भी खर्च करने वाला है। यह धनराशि सामान्य तौर पर छोटी लग सकती है, लेकिन आर्थिक संकट में फंसे हिमाचल के लिए यह भी भारी पड़ रही है। इस सब्सिडी में सबसे बड़ा खर्चा बिजली सब्सिडी का है।

जिस स्कूल का तारणहार बना अडानी फाउंडेशन, वहाँ संसाधन-गुणवत्ता पर काम कैथोलिक ननों को नहीं आया रास: कहा- नाम में से ‘माउंट कार्मेल’ निकालो

भारत स्थित दुनिया की प्रमुख कंपनी अडानी समूह ने अपनी NGO अडानी फाउंडेशन नाम के के माध्यम से महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में स्थित घुघुस में एक निजी क्रिश्चियन स्कूल का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया है। स्कूल शिक्षा विभाग ने राज्य के लगभग नौ स्कूलों के प्रबंधन के हस्तांतरण के लिए एक सरकारी संकल्प (जीआर) जारी किया है।

इसमें चंद्रपुर जिले के घुघुस में माउंट कार्मेल कॉन्वेंट स्कूल का प्रबंधन अडानी फाउंडेशन को सौंपना भी शामिल है। स्कूल स्व-वित्तपोषित है और यहाँ कक्षा 1 से 12 तक पढ़ाई होती है। सरकारी निर्णय में कहा गया है, “माउंट कार्मेल कॉन्वेंट हाई स्कूल का प्रबंधन अडानी फाउंडेशन को सौंपने का प्रस्ताव विचाराधीन था। नियम और शर्तों के साथ मंजूरी दी गई है।”

इसमें यह शर्त थी कि अडानी फाउंडेशन विद्यार्थियों की न्यूनतम संख्या की सीमा को नहीं बदल सकता है। इसके साथ उसे शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी। स्कूल की मंजूरी की शर्तों में कोई बदलाव नहीं होगा। आदेश में कहा गया है कि अडानी फाउंडेशन को स्कूल, शिक्षकों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों और उनके वेतन आदि के संबंध में नियम-आदेशों का पालन करना होगा।

इसके अलावा, विद्यार्थियों से संबंधित नियम-आदेशों का भी पालन करना होगा। स्कूल शिक्षा विभाग ने अपने आदेश में यह चेतावनी भी दी है कि अगर उसे स्कूल चलाने और कर्मचारियों की सेवा शर्तों के उल्लंघन जैसे नियमों और विनियमों के उल्लंघन के बारे में कोई शिकायत मिलती है तो प्रबंधन के स्थानांतरण को रद्द करने का अधिकार सुरक्षित है।

उधर, अडानी फाउंडेशन ने कहा है कि ACC लिमिटेड के स्वामित्व वाले माउंट कार्मेल कॉन्वेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रबंधन का हस्तांतरण कार्मेल एजुकेशन सोसाइटी की इच्छा और निर्णय के अनुसार शुरू किया गया था। जून 2023 में एसीसी लिमिटेड ने कार्मेल एजुकेशन सोसाइटी के निर्णय को स्वीकार कर लिया और अडानी फाउंडेशन से स्कूल का प्रबंधन सँभालने का अनुरोध किया था।

दरअसल, इस स्कूल का निर्माण ACC लिमिटेड द्वारा अपने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत किया गया था। बता दें कि अडानी समूह एसीसी लिमिटेड का बहुमत शेयरधारक है। अडानी फाउंडेशन ने कहा कि स्कूल को बुनियादी ढाँचे में वृद्धि की सख्त जरूरत थी और इसके लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। फाउंडेशन ने आधिकारिक तौर पर सितंबर 2024 में प्रबंधन ग्रहण किया।

अडानी फाउंडेशन द्वारा स्कूल का प्रबंधन सँभालने के बाद ‘कॉन्ग्रेगेशन ऑफ़ द मदर ऑफ़ कार्मेल (सीएमसी)’ से संबंधित ननों ने स्कूल छोड़ दिया। उन्होंने यह भी माँग की है कि स्कूल में अब ‘माउंट कार्मेल’ को हटा देना चाहिए। नहीं रखा जाना चाहिए। स्कूल की पूर्व प्रिंसिपल लीना ने कहा कि ननों ने स्कूल छोड़ने का फैसला किया, क्योंकि वे अडानी समूह के तहत काम नहीं करना चाहती थीं।

लीना ने कहा, “अडानी की प्राथमिकता व्यावसायिक हित हैं। उनकी नीति और हमारी नीति पूरी तरह से अलग है, इसलिए हम स्कूल छोड़ दिए।” साल 1972 से नन ने ACC के स्वामित्व वाले इस स्कूल का प्रबंधन किया है। इस ACC (Associated Cement Companies) लिमिटेड सीमेंट फैक्ट्री को अडानी समूह ने साल 2022 में स्विट्जरलैंड स्थित होलसिम से अधिग्रहण कर लिया था।

इसी साल यानी 2022 में ही लगभग 2,000 छात्रों वाले इस को-एड विद्यालय ने अपनी स्वर्ण जयंती मनाई थी। अब यह अडानी फाउंडेशन के अधीन है। बता दें कि अडानी फाउंडेशन की स्थापना साल 1996 में की गई थी। यह वर्तमान में 19 राज्यों के 6,769 गाँवों में काम करता है और नए भारत की उभरती जरूरतों को पूरा करना चाहता है।