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‘आनंद कुमार’ बन मोहम्मद आलिम ने हिंदू महिला का किया रेप, मुस्लिम बनने का डाला दबाव: UP की अदालत ने ‘लव जेहादी’ को सुनाई उम्रकैद, विदेश फंडिंग की आशंका भी जताई

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सोमवार (30 सितंबर 2024) को लव जिहाद के एक मामले में मोहम्मद आलिम नाम के युवक को उम्रकैद की सजा सुनाई है। उस पर 1 लाख रुपए का जुर्माना भी ठोंका गया है। अपने बेटे की करतूत में सहयोगी बने आलिम के अब्बा साबिर को भी 2 साल की कैद की सजा हुई है। अपनी टिप्पणी में अदालत ने भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसी हालात पैदा करने की साजिश चलने की आशंका जताई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश (फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम) रवि कुमार दिवाकर की अदालत में हुई। लगभग सवा साल चले इस मुकदमे में अभियोजन व बचाव पक्ष दोनों ने अपने-अपने तर्क रखे व सबूत पेश किए। आखिरकार अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को सन्तोषजनक नहीं पाया और आरोपित आलिम को उसके अब्बा साबिर सहित सजा सुना दी। आलिम को उम्रकैद जबकि साबिर को 2 साल की सजा मिली। आलिम पर 1 लाख रुपए का जुर्माना भी ठोंका गया है।

अपनी टिप्पणी में अदालत ने लव जिहाद को भारत में कुछ धर्म विशेष के लोगों द्वारा जनसंख्या वृद्धि का हथियार बताया। साथ ही इसे धर्मान्तरण की एक अंतरराष्ट्रीय साजिश करार दिया। अवैध मतांतरण को देश की एकता व सम्प्रभुता के लिए खतरा बताते हुए जस्टिस दिवाकर ने इसमें विदेशी फंडिंग होने की भी आशंका जाहिर की है। कोर्ट ने यह भी माना कि अगर भारत में इस हरकत पर अंकुश नहीं लगा तो आने वाले भविष्य में गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

क्या था पूरा मामला

बताते चलें कि बरेली जिले का यह पूरा मामला साल 2022 का है। तब आलिम ने खुद को आनंद बताते हुए हिन्दू लड़की से दोस्ती की थी। वह हाथ में कलावा बाँधता था और मंदिर भी जाता था। पीड़िता कम्प्यूटर की कोचिंग करने जाती थी जहाँ आलिम उसका पीछा करता था। 13 मार्च 2022 को आलिम ने एक मंदिर में पीड़िता की माँग भरी। इसके बाद उसने लड़की से कई बार रेप किया। जब पीड़िता गर्भवती हो गई तब उसने आलिम पर शादी का दबाव बनाया। आलिम मुकरने लगा और उसने पीड़िता का गर्भपात करवा दिया।

मई 2023 में पीड़िता आलिम के घर पहुँच गई। यहाँ उसे आलिम के मुस्लिम होने की जानकारी मिली। जब उसने आलिम के परिजनों को सारी करतूत बताई तो उन्होंने पीड़िता की ही पिटाई शुरू कर दी। पिटाई के साथ आलिम के अब्बा साबिर ने निकाह के लिए पीड़िता को इस्लाम कबूल करने का विकल्प दिया। लड़की ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने केस दर्ज कर आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था। कुछ ही दिनों में कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी गई थी।

बांग्लादेश से भारत में घुसा पाकिस्तान का ‘सिद्दीकी परिवार’, बेंगलुरु में ‘शर्मा परिवार’ बनकर रहने लगा: 10 साल बाद घर की दीवारों से खुला राज, सारे हुए गिरफ्तार

पिछले 10 साल से भारत में फर्जी पहचान के साथ रहने वाले 4 पाकिस्तानियों को 30 सितंबर को गिरफ्तार किया गया है। इनके असली नाम राशिद अली सिद्दीकी (47), आयशा (38), हानिफ मोहम्मद (73) और रुबीना (61) है। ये लोग राजपुरा गाँव में शंकर शर्मा, आशा रानी, राम बाबू शर्मा और रानी शर्मा नाम से रह रहे थे।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने खुफिया इनपुट्स के आधार पर इन्हें चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया है। ये लोग ढाका से चन्नई एयरपोर्ट पर उतरे थे। जाँच के दौरान आव्रजन अधिकारियों ने इन्हें इनके फर्जी पासपोर्टों के साथ गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में पहले इन्होंने बताया कि ये लोग शर्मा परिवार है और बेंगलुरु में 2018 से रह रहे हैं। इनके पास जो पहचान पत्र मिले उनमें भी हिंदू नाम दिखे। हालाँकि जब पुलिस छानबीन के लिए इनके घर गई तो इनके घर की दीवार पर बड़ा-बड़ा ‘मेहदी फाउंडेशन इंटरनेशनल जश्न-ए-युनूस’ लिखा था।

जब सिद्दीकी से सख्ती से पूछताछ हुई तो उसने मान लिया कि वो पाकिस्तानी है और कराची के लियायकतबाद के निवासी है। वहीं उसकी बीवी और उसका परिवार लाहौर का है। उसने बताया कि उसका निकाह आयशा से साल 2011 में ऑनलाइन हुआ था जब वो अपने माता पिता के साथ बांग्लादेश में रहती थी। बाद में राशिद को भी बांग्लादेश आना पड़ा क्योंकि पाकिस्तान मे उसका विरोध होने लगा था।

बांग्लादेश में उसने मेहदी फाउंडेशन में उलेमा का काम शुरू किया। जहाँ संस्था ही उसका सारा खर्चा उठाती थी। बाद में 2014 में भी सिद्दीकी पर हमला हुआ और तब उसे किसी परवेज नाम के शख्स ने भारत में अवैध रूप से एंट्री करा दी

सिद्दीकी अपनी बीवी और उसके परिवार व रिश्तेदारों समेत बांग्लादेश से भारत पश्चिम बंगाल के मालदा को क्रॉस करके पहुँचा। कुछ दिन वह दिल्ली में रहे, फिर सिद्दीकी 2018 में जब नेपाल गया तो वहाँ मुलाकात वाशिम और अल्ताफ से हुई। उसके बाद पूरा परिवार बेंगलुरु चला गया। यहाँ सिद्धीकी को मेहदी फाउंडेशन की ओर से उलेमा बनने को कहा गया। उसने ऑफर स्वीकार लिया और आलरा टीवी पर दिखने लगा। वो शो बनाता और उसके किराए का सारा खर्चा अल्ताफ उठाता।

हकीकत खुलने के बाद पुलिस ने इन चारों की गिरफ्तारी कर ली है। मले को आईपीसी की धारा 420, 468, 471 के तहत और पासपोर्ट एक्ट की सुसंगत धाराओं के तहत दर्ज किया है।

मक्का-मदीना भेजने के नाम पर 189 मुस्लिमों से ठगी, दिल्ली से मुंबई तक फैला जाल: ओडिशा पुलिस ने नबील शेख को दबोचा

ओडिशा पुलिस ने हज यात्रा के नाम पर ठगी करने वाले एक ट्रेवेल एजेंट को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपित का नाम नबील अब्दुल मुबीन शेख है। शुक्रवार (27 सितंबर 2024) को पुलिस ने शेख को मुंबई से दबोचा है। वह अब तक 189 लोगों को चूना लगा चुका है। ठगी और जालसाजी के शिकार ये तमाम पीड़ित मुस्लिम समुदाय से हैं और भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। पकड़े गए मुबीन शेख से पूछताछ की जा रही है और उसके बाकी नेटवर्क का पता लगाया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला ओडिशा के बालासोर जिले का है। यहाँ ओडिशा पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को नबील अब्दुल मुबीन शेख नाम के व्यक्ति द्वारा धोखाधड़ी की कई शिकायतें मिलीं। ये शिकायतें भद्रक, बारीपदा और बालासोर आदि जिलों के उन मुस्लिमों की थी, जिनको हज और उमराह करवाने के नाम पर ठग लिया गया था। साल 2019 से 2023 के बीच प्रत्येक यात्री से लगभग 96000 रुपए लिए गए थे। शिकायत में ठगी की कुल रकम लगभग 1 करोड़ 20 लाख रुपयों के आसपास बताई गई।

पुलिस के मुताबिक, नबील शेख ‘अल आदम टूर एन्ड ट्रेवेल्स’ नाम की कम्पनी चलाता है। ट्रेवेल्स के इस धंधे में उसके अब्बा फिरदौस बी और बहन साइमा अंजुम भी शामिल हैं। ओडिशा का नबील शेख मुंबई के कुर्ला इलाके की अल इजमा टूर एन्ड ट्रेवेल्स के सहयोग से लोगों को हज यात्रा करवाने का झाँसा देता था। मुंबई की कम्पनी के मालिक का नाम मोहम्मद बिस्मिल्लाह शेख है। इन दोनों ने कंपनियों ने मिल कर कुल 189 लोगों के पैसे ले लिए पर उनको हज पर नहीं ले गया।

हज यात्रा न जाने पर नाराज मुस्लिमों ने नबील से अपने पैसे वापस माँगे। पहले तो नबील शेख ने आनाकानी की लेकिन बाद में उसने अधिकतर लोगों को चेक काट कर दे दिए। बैंक में जाने के बाद ये तमाम चेक बाउंस हो गए थे। आखिरकार खुद को ठगा पा कर पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू की तो पता चला कि नबील शेख द्वारा पीड़ित लोग सिर्फ ओडिशा नहीं बल्कि महाराष्ट्र, दिल्ली व अन्य प्रदेशों में भी हैं।

अपने खिलाफ केस दर्ज होने की जानकारी मिलते ही नबील शेख ओडिशा छोड़ कर भाग निकला। पुलिस ने उसकी खोजबीन शुरू की तो लोकेशन मुंबई में मिली। शुक्रवार को ओडिशा पुलिस ने मुंबई में दबिश दी, जिसमें नबील शेख गिरफ्तार कर लिया गया। नबील शेख पर जालसाजी और धोखाधड़ी सहित कई अन्य धाराओं में कार्रवाई की गई है। पुलिस जाँच पड़ताल के दौरान उसके बाकी नेटवर्क को भी खंगालने में जुटी हुई है।

मुबारक हो बिहार! ‘कमाई’ का सीजन आ गया है…

बिहार में बाढ़ की यह तस्वीर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) ने बनाई है। ऐसी तस्वीर आपको देश के दूसरे हिस्से से भी समय-समय पर देखने को मिलती होंगी। लेकिन बिहार और बाढ़ की कहानी उनसे काफी अलग है। जो बाढ़ देश के दूसरों हिस्सों के लिए ‘विपदा’ है, वह बिहार में एक वर्ग के लिए ‘कमाई का सीजन’ है। जो बाढ़ प्राकृतिक ‘आपदा’ है, बिहार में वह उस ‘कुकर्म की उपज’ है, जिसमें बिहारी नदी-नाले सब खा गए, भले सरकारी नक्शों में वे नदी-नाले आज भी जीवित हैं।

मुझे बिहार से घृणा करने वाला शख्स बताकर आप यह दलील दे सकते हैं कि इस बार सूखे बिहार में जो सैलाब आया है, वह अलग है। कोशी में इस बार 56 साल का सबसे अधिक पानी आया है। गंडक में 21 साल का सबसे अधिक पानी आया है। पर यदि यह जल प्रलय इतना ही असामान्य होता तो भला मुख्यमंत्री अपने राज्य को छोड़कर दिल्ली यात्रा पर क्यों निकल जाता? वैसे भी यह यात्रा तब हुई जब मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में तस्वीर/वीडियो नदियों के तटबंध तोड़ने, घरों-नगरों में बाढ़ के पानी घुसने, लोगों के बेघर होने से भरे पड़े थे। इस स्थिति से लड़ने की सत्ताधारी दल की ‘गंभीरता’ इतनी अधिक क्यों थी कि दिल्ली यात्रा में पार्टी के नंबर 2 को ही मुख्यमंत्री का बगलगीर बनना पड़ा?

जाहिर सी बात है जिन पर इस स्थिति को सँभालने, राहत-बचाव कार्यों का जिम्मा है, उनके लिए यह सलाने जलसे से अधिक कुछ नहीं है। सलाने जलसे से अधिक तो यह उन पीड़ितों के लिए भी नहीं है, जिनका बाढ़ सब कुछ छीन ले जाती है और वे इस आसरे में किसी ऊँचाई की जगह पर बैठे होते हैं कि कब सरकारी तिरपाल और चूड़ा आएगा। यदि ऐसा नहीं होता तो बिहार में जाति की जगह वोट इस बात पर पड़ते कि बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान कौन सा राजनीतिक दल लाएगा। दुर्भाग्य से बिहार में यह विमर्श का मुद्दा न कभी था। न है। न कभी बनने की उम्मीद दिखती है।

यह उस राज्य का हाल है जो अपनी राजनीतिक चेतना पर इठलाता है। राजनीतिक चेतना के इसी खोखले दंभ के कारण बिहार में बाढ़ सामान्य सी बात हो चली है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार राज्य की सभी नदियाँ उफान मार रही हैं। गंडक, बागमती, कोसी, कमला, धारधा, गंगा, फुल्हर जैसी नदियाँ खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। 16 जिलों में हालात बदतर बताए जा रहे हैं। 6 तटबंधों के अब तक टूटने की खबर है।

बाढ़ बिहार के लिए नया नहीं है। मौजूदा बिहार का करीब 76 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जिस पर हर साल बाढ़ का खतरा बना रहता है। नेपाल से आने वाले पानी को इसका जिम्मेदार बताया जाता है। बाढ़ के पानी को रोकने के लिए बिहार में तटबंध बनाने का सिलसिला भी करीब 70 साल पुराना है। 1954 में पहली बार तटबंध बना था। उस समय के बिहार में 160 किलोमीटर इलाके में तटबंध थे जो आज बढ़कर 3790 किलोमीटर हो चुका है।

लेकिन साल दर साल तबाही भी बढ़ती जा रही है। वजह व्यवस्था की वह मानसिकता जो उन्हें इतना खाने को प्रोत्साहित करती है ताकि उनकी सात पुश्तों का इंतजाम हो सके। बाढ़ इस व्यवस्था की इस लालसा को पूर्ण करने का वह मार्ग है, जिसका भ्रष्टाचार पानी का सैलाब अपने साथ बहा ले जाता है।

बिहार में सालों से तटबंध ही नहीं बन रहे। हर साल उनकी मजबूती बढ़ाने पर भारी-भरकम बजट खर्च होता है। लेकिन ये तटबंध हर बार टूटते हैं। कभी-कभार तो चूहे भी इनकी मजबूती को खोखला कर देते हैं और बाढ़ का पानी गाँव के गाँव बहाकर ले जाता है। जब गाँव उजड़ते है, घर बहते हैं तो बचाव के नाम पर तिरपाल से लेकर चूड़ा वितरण तक के कमाई के दूसरे कई मार्ग भी खुल जाते हैं। सरकारी कागजों में वितरण के नाम पर जो कुछ दर्ज होता है, बाढ़ का पानी उतरने के बाद उसकी प्रमाणिकता की पुष्टि करने का कोई तंत्र नहीं है। इसलिए व्यवस्था को बाढ़ की प्रतीक्षा रहती है।

चंद दिनों की प्रतीक्षा करिए। आज जो बिहार के बाढ़ पर शोर, चिंता, विलाप दिख रहा, वह बाढ़ का पानी उतरते ही विलुप्त हो जाएगा। पलायन करने के लिए बिहारियों की एक नई खेप तैयार हो जाएगी। पंजाब के खेत से लेकर गुजरात के कल-कारखाने तक नए कामगारों से लहलहा जाएँगे। जिस बाढ़ से व्यवस्था को इतना ‘फायदा’ हो उसका स्थायी समाधान तलाशने की भला फिक्र कौन करे? वैसे भी इस देश में बिहारियों की जान बहुत ही सस्ती है।

भगवान को राजनीति से दूर रखिए: तिरुपति के बीफ वाले लड्डू पर सुप्रीम कोर्ट, कहा- मिलावट के पुख्ता सबूत नहीं; CM से पूछा- चल रही थी SIT जाँच तो प्रेस में क्यों गए

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (30 सितंबर 2024) को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को तिरुमाला तिरुपति मंदिर में लड्डू बनाने के लिए मिलावटी घी के इस्तेमाल का दावा सार्वजनिक रूप से करने के लिए कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि ‘हम उम्मीद करते हैं कि भगवान को राजनीति में नहीं लाया जाएगा।’ यह मामला तिरुपति के प्रसिद्ध मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के प्रसाद के रूप में दी जाने वाली लड्डूओं में मिलावटी घी के उपयोग से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट में बी.आर. गवई और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि जब इस मामले की जाँच चल रही थी, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह का सार्वजनिक बयान देना कितना उचित था। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जब संवेदनशील मुद्दे की जाँच जारी हो, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे सावधानी बरतें और इस प्रकार के बयान देने से बचें, जिससे लोगों की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष तौर पर कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं है कि जिस घी का उपयोग लड्डू बनाने में किया गया था, वह मिलावटी था। कोर्ट ने यह भी बताया कि लैब रिपोर्ट, जिसमें घी के नमूने जाँच के लिए भेजे गए थे, में दिखाया गया कि रिजेक्ट किए गए घी के सैंपल ही जाँच के लिए दिए गए थे। इस संबंध में कोर्ट ने पूछा कि जब मामले की जाँच चल रही थी, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले को सार्वजनिक रूप से उठाने की क्या जरूरत थी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने की तीखी टिप्पणी

जस्टिस गवई और जस्टिस विश्वनाथन की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह याचिका धार्मिक विश्वासों से जुड़ी है, जो पूरे विश्व में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री ने दावा किया था कि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान तिरुपति लड्डू बनाने के लिए पशु वसा का उपयोग किया गया था। हालाँकि, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने इस दावे का खंडन किया और कहा कि ऐसा मिलावटी घी कभी भी लड्डू बनाने में इस्तेमाल नहीं किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि मुख्यमंत्री नायडू द्वारा बयान 18 सितंबर को सार्वजनिक किया गया, जबकि इस मामले में प्राथमिकी (FIR) 25 सितंबर को दर्ज की गई और विशेष जाँच टीम (SIT) का गठन किया गया। इसका मतलब यह हुआ कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से दिया गया बयान जाँच शुरू होने से पहले का था। कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया कि जाँच जारी होने के दौरान उच्च संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को इस प्रकार का बयान देने की आवश्यकता क्यों थी।

लड्डू बनाने में इस्तेमाल किए गए घी पर उठे सवाल

इस मामले में टीटीडी की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट को बताया कि जून और 4 जुलाई तक जिस घी की आपूर्ति की गई थी, उसे जाँच के लिए नहीं भेजा गया था। बल्कि 6 और 12 जुलाई को प्राप्त घी के टैंकरों से नमूने एनडीडीबी (राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) को भेजे गए थे और इन नमूनों में मिलावट पाई गई। उन्होंने यह भी बताया कि जून और 4 जुलाई तक आपूर्ति किया गया घी तिरुपति लड्डू बनाने के लिए उपयोग किया गया था।

कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जब आपने जाँच शुरू कर दी थी और एसआईटी का गठन कर लिया था, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले को सार्वजनिक करने की क्या आवश्यकता थी? जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, “लैब रिपोर्ट में कुछ अस्वीकार किए गए तथ्य हैं, जो यह संकेत देते हैं कि अस्वीकार किए गए घी के नमूने ही परीक्षण के लिए भेजे गए थे। जब आपने स्वयं जाँच का आदेश दिया, तो प्रेस में जाने की क्या जरूरत थी?” जस्टिस गवई ने भी यही सवाल उठाया और कहा, “जब आपने एसआईटी द्वारा जाँच का आदेश दिया है, तो प्रेस में जाने की क्या जरूरत थी? जब आप संवैधानिक पद पर होते हैं, तो हम उम्मीद करते हैं कि भगवान को राजनीति से दूर रखा जाएगा।”

वकील की दलीलें और कोर्ट के सवाल

कोर्ट ने टीटीडी के वकील सिद्धार्थ लूथरा से यह स्पष्ट करने के लिए कहा कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के अधिकारियों ने यह बयान क्यों दिया था कि मिलावटी घी का उपयोग कभी नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा लाखों भक्तों की भावनाओं से जुड़ा है, और इस प्रकार की बातें सार्वजनिक रूप से करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि जिस घी का उपयोग लड्डू बनाने में किया गया था, वह मिलावटी था। जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, “लैब टेस्टिंग तो रूटीन प्रक्रिया के तहत होती है, ताकि खराब घी के खेप को लौटाया जा सके। अभी तक यह साफ नहीं है कि जिस घी का नमूना लिया गया था, वह वास्तव में लड्डू बनाने में इस्तेमाल हुआ था या नहीं।”

टीटीडी के वकील सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि टीटीडी द्वारा घी के नमूने की जाँच के बाद यह पाया गया कि उसमें मिलावट थी। हालाँकि जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि यह साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि यह घी लड्डू बनाने में इस्तेमाल किया गया था।

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका और अन्य याचिकाएँ

इस विवाद पर सुनवाई के दौरान भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से सीनियर एडवोकेट राजशेखर राव ने दलील दी कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया बयान तथ्यात्मक रूप से गलत था और इसका खंडन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के कार्यकारी अधिकारी ने किया था। उन्होंने तर्क दिया कि जब इस प्रकार के बयान बिना उचित प्रमाण के दिए जाते हैं, तो इसका व्यापक प्रभाव होता है और यह सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ सकता है। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री ने बिना किसी ठोस प्रमाण के यह दावा किया कि लड्डू बनाने के लिए मिलावटी घी का उपयोग किया गया था। इस प्रकार का बयान, जब किसी संवैधानिक पदधारी द्वारा दिया जाता है, तो यह न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, बल्कि यह जाँच प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।”

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका में माँग की गई थी कि इस मामले की जाँच के लिए एक स्वतंत्र जाँच समिति गठित की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री नायडू का बयान टीटीडी के कार्यकारी अधिकारी के बयान से विरोधाभासी था और इस प्रकार की बयानबाजी से जाँच प्रभावित हो सकती है।

इसके अलावा चार अन्य याचिकाएँ भी दायर की गई थीं, जिनमें से एक टीटीडी के पूर्व चेयरमैन वाई.वी. सुब्बा रेड्डी द्वारा और अन्य याचिकाएँ इतिहासकार विक्रम संपथ, वैदिक प्रवक्ता दुश्यंत श्रीधर और न्यूज एंकर सुरेश चव्हाणके द्वारा दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में भी कोर्ट की निगरानी में जाँच की माँग की गई थी और यह सुनिश्चित करने की माँग की गई थी कि हिंदू धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप न हो।

सुनवाई के अंत में कोर्ट ने कहा कि जब मुख्यमंत्री ने इस प्रकार का बयान दिया, तो जाँच प्रक्रिया पहले से ही जारी थी और यह उचित नहीं था कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करें कि क्या राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी को जाँच जारी रखने दी जानी चाहिए या फिर इस मामले की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए। अगली सुनवाई 3 अक्टूबर को निर्धारित की गई है, जिसमें इस मामले पर और विस्तृत चर्चा की जाएगी।

गौरतलब है कि तिरुपति लड्डू विवाद एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करता है, बल्कि इस पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुख्यमंत्री नायडू की बयानबाजी की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर बयान देते समय सावधानी बरतनी चाहिए।

बकरी लो और बन जाओ ईसाई: प्रयागराज में चंगाई सभा के जरिए हिंदुओं का हो रहा था धर्मांतरण, हिंदू संगठनों ने विरोध किया तो बरसे पत्थर

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में ईसाई धर्मान्तरण का मामला सामने आया है। यहाँ चंगाई सभा के नाम पर हिन्दुओं के धर्मान्तरण के आरोप में स्थानीय लोगों ने हंगामा किया है। आरोप है कि गरीब हिन्दुओं को बकरी का लालच देकर ईसाई बनाने की कोशिश की जा रही थी। धर्मान्तरण रोकने पहुँचे हिन्दू संगठन के सदस्यों पर पत्थरबाजी भी की गई। पुलिस ने केस दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है। कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। घटना रविवार (29 सितंबर 2024) की है।

यह मामला प्रयागराज जिले के थानाक्षेत्र सरायइनायत का है। रविवार को यहाँ विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं ने सामूहिक तौर पर पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में उन्होंने बताया कि रविवार को दोपहर लगभग 12 बजे गाँव सरपतीपुर में चंगाई सभा के नाम पर लोगों का जमावड़ा किया गया था। आरोप है कि इसी जमावड़े में कुछ लोगों द्वारा ईसाइयों को अच्छा और हिन्दुओं को बुरा बताया जा रहा था। यहीं पर हिन्दू देवी-देवताओं के बारे में भी अभद्र टिप्पणियाँ की जा रही थीं।

इस मामले की जानकारी पाते ही गाँव में हिन्दू संगठन से जुड़े सदस्य पहुँचे। ग्रामीणों ने उनको बताया कि वहाँ पर सामूहिक धर्मान्तरण की तैयारी चल रही है। लोगों का धर्म बदलने के लिए लालच के तौर पर उन्हें बकरी देने का वादा किया जा रहा था। आरोपित यह भी दावा कर रहे थे कि ईसाई बनने के बाद तमाम रोगों से छुटकारा मिल जाता है। इस करतूत के मास्टरमाइंड के तौर पर अशोक कुमार, मदन बिन्द, डॉ मुन्ना लाल निगम और सूरज कुमार वर्मा का नाम लिया गया है।

आरोपितों में अशोक कुमार सोनभद्र जिले का रहने वाला है। बाकी सभी आरोपित प्रयागराज के ही रहने वाले हैं। हिन्दू संगठन के सदस्यों और ग्रामीणों द्वारा रोके जाने पर इन सभी ने अपने 10 अज्ञात साथियों के साथ पत्थरबाजी शुरू कर दी। मामले की सूचना पर पुलिस फ़ौरन मौके पर पहुँची। पुलिस ने चारों नामजद आरोपितों को हिरासत में ले लिया और थाने आ गई। इन सभी से पूछताछ चल ही रही थी कि हिन्दू संगठन के सदस्य भी पुलिस स्टेशन पहुँच गए। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

वायरल हो रहे एक वीडियो में हिन्दू संगठन के सदस्यों को पुलिस पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाते सुना जा सकता है। इसी वीडियो में चारों आरोपित थाने में बैठे नजर आ रहे हैं। फ़िलहाल इन सभी नामजदों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 302 और 125 के साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई है। हिरासत में लिए गए आरोपितों से पूछताछ की जा रही है। पुलिस मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

CPI नेता के घर ट्यूशन पढ़ने आती थी 12वीं की छात्रा, 1 साल तक करता रहा रेप: विरोध करने पर देता था मारने की धमकी, स्कूल में टीचर भी है सेबिन फ्रांसिस

केरल के कुन्नमकुलम में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के एक पदाधिकारी पर नाबालिग लड़की से यौन शोषण का आरोप लगा है। आरोपित का नाम सेबिन फ्रांसिस है जो सीपीआई में चिरनेलूर का शाखा सचिव पद संभाल रहा है। आरोपित एक स्कूल टीचर है और पीड़िता क्लास 12 में पढ़ने वाली उसकी छात्रा। सेबिन फ्रांसिस ने साल 2023 से पीड़िता का कई बार बलात्कार किया। विरोध करने पर नाबालिग को जान से मार डालने की धमकी दी जाती थी। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

मनोरमा की रिपोर्ट के मुताबिक घटना कुन्नम्कुलम थानाक्षेत्र की है। यहाँ सेबिन फ्रांसिस अकेले रहता है। उसकी शादी हो चुकी थी लेकिन कुछ कारणों से पत्नी से अलगाव हो गया। सेबिन सत्तारूढ़ वामपंथी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) में चिरनेलूर का शाखा सचिव है। वह एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता है। बताया जा रहा है कि कक्षा 12 में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा सेबिन से ट्यूशन पढ़ने उसके घर आया करती थी। इसी दौरान साल 2023 में सेबिन फ्रांसिस ने पीड़िता से अपने घर में ही रेप किया।

आरोप है कि पीड़िता ने लगातार सेबिन की इस हरकत का विरोध किया। विरोध के दौरान सेबिन नाबालिग को जान से मार डालने की धमकी देकर चुप करवा देता था। लगातर हो रहे यौन शोषण और सेबिन की धमकियों से पीड़िता परेशान हो गई। उसने अपने एक रिश्तेदार से अपनी व्यथा बताई। लड़की के रिश्तेदार ने फौरन ही सेबिन की हरकतों की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया।

सेबिन फ्रांसिस को गिरफ्तार कर लिया गया है। पीड़िता की काउंसिलिंग करवाकर उनको मेडिकल जाँच के लिए भेजा गया है। आरोपित को अदालत में पेश किया गया है जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। पुलिस इस मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

जगन्नाथ पुरी मंदिर में गैर हिंदू ने कैसे किया प्रवेश? अमेरिकी राजदूत के ‘पतितपावन’ दर्शन की तस्वीरों से उठे सवाल, जानिए सच्चाई

भारत में अमेरिका के राजदूत 28 सितंबर 2024 को अपने परिवार सहित ओडिशा गए थे। वे जगन्नाथ पुरी मंदिर भी गए और ध्वजा परिवर्तन रीति देखी। बाद में उन्होंने अपना अनुभव सोशल मीडिया पर साझा किया। मीडिया में उनकी इस यात्रा की कई तस्वीरें भी आईं।

लोग उनका अनुभव देख खुश थे, लेकिन इस बीच सोशल मीडिया पर बातें होने लगीं कि पुरी मंदिर में तो गैर हिंदुओं का प्रवेश निषेध है, फिर उन्हें कैसे भीतर जाने दिया गया? इस सवाल का जवाब ये है कि एरिक गार्सेटी ने पूरी तरह से जगन्नाथ मंदिर में में प्रवेश नहीं किया। इस मंदिर में गैर हिंदुओं के प्रवेश को लेकर बहुत सख्ती है। यहाँ तक कि इस्कॉन से जुड़े विदेशी श्रद्धालुओं जो हिंदू धर्म नहीं मानते उनको भी मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं है।

गार्सेटी ने ओडिशा यात्रा के दौरान जगन्नाथ मंदिर के भव्य ध्वज ‘पतितपावन’ के दर्शन किए। ये एक ध्वज परिवर्तन प्रक्रिया है। इसमें एक सेवायत 1000 साल पुराने मंदिर पर कुशलता से चढ़कर पुराने ध्वज को उतारकर वहाँ नया ध्वज फहराता है। इस रीति को देखने के लिए सैंकड़ों लोग मुख्य मंदिर के बाहर वहाँ इकट्ठा होते हैं।

गार्सेटी जगन्नाथपुरी मंदिर में इसी अनुष्ठान के साक्षी बने न कि वो चतुर्थ मूर्ति के दर्शन के लिए मुख्य मंदिर गए। उन्होंने पतितपावन भव्य ध्वज के दर्शन किए जो भगवान जगन्नाथ का प्रतिनिधित्व करता है।

यहाँ जानना जरूरी है कि ‘चतुर्थ मूर्ति’ के दर्शन का अर्थ है मुख्य मंदिर की आंतरिक संरचना में प्रवेश करना, और भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन की भव्य मूर्तियों के दर्शन करना। जो लोग मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, उन्हें केवल रथ यात्रा और स्नान पूर्णिमा के दौरान चतुर्ध मूर्ति के दर्शन का आशीर्वाद मिलता है, जब देवता मंदिर से बाहर निकलते हैं। रथ यात्रा के दौरान किसी भी धर्म या राष्ट्रीयता के लिए ग्रैंड रोड पर प्रवेश की कोई बाधा नहीं है।

गौरतलब है कि भगवान जगन्नाथ के मंदिर जिसे नष्ट करने की साजिश कई बार मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा की गई, लेकिन हर बार वो विफल हुए, वहाँ गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर बहुत बार विवाद हो चुका है। यहाँ गैर हिंदुओं को प्रवेश अनुमति न होने की वजह से संत कबीर, बीआर अंबेडकर, भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन, थाईलैंड की पूर्व रानी महाचक्री सिरिधरन और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाई थीं।

नोट: यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है। इसे पूरा पढ़ने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक करें।

जम्मू-कश्मीर से लखनऊ तक मातम मना रहे भारत के धर्मांतरित मुस्लिम, हिजबुल्लाह के आतंकी सरगना नसरल्लाह से इनका रिश्ता क्या?

भारत के मुस्लिम समुदाय का जिन मजहबी नारों से खासा लगाव है, उनमें से एक है- “तेरा मेरा रिश्ता क्या- ला इलाहा इल्लल्लाह”। चाहे वह कश्मीर के आतंकी हों या फिर CAA विरोध के नाम पर हिंसा करने वाले इस्लामी दंगाई, इस नारे को हर विरोध प्रदर्शन में सुना जा सकता है।

जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर सड़कों और गलियों में होने वाले मजहबी जलसों तक, यह नारा अक्सर सुनाई देता है। लेकिन जब इजरायल के हमले में मारे गए हिजबुल्लाह के आतंकी सरगना हसन नसरल्लाह की मौत के बाद, जम्मू-कश्मीर से लेकर लखनऊ तक भारतीय मुस्लिमों के बीच मातम का माहौल देखने को मिलता है, तब यह सवाल उठता है कि आखिर ये संबंध कैसा है? क्या ये रिश्तेदारी महज मजहबी है, या इसके पीछे कुछ और गहरी वजहें हैं?

वैसे, इजरायल के हमले में मारे गए आतंकी संगठन हिजबुल्लाह के सरगना सैयद हसन नसरल्लाह से ऐसी किसी ‘रिश्तेदारी’ का मुस्लिम दावा भी नहीं कर सकते। यदि ‘उम्माह’ से इसका वास्ता होता तो इस्लामिक वर्ल्ड में नसरल्लाह की मौत पर जश्न नहीं मनता। अरब देश हों या सीरिया… सुन्नी मुस्लिम इस मौत का खुलकर जश्न मना रहे हैं। यह बताता है कि फिरकों में बँटे इस्लाम में उम्माह की कुछ खास कूवत नहीं है।

यह दूसरी बात है कि भारत के धर्मांतरित मुस्लिम खुद को इस बेड़ी में जकड़ कर दुनिया के किसी भी हिस्से में हुई घटना को लेकर अपने ही देश में उपद्रव करते हैं। शायद इस उम्मीद में कि उन्हें इस्लामी जगत में ‘इज्जत’ नसीब हो। दोयम दर्जे के मुस्लिम वाले टैग से मुक्ति मिले। इन मुद्दों पर आगे हम विस्तार से आपको समझाएँगे…

‘उम्माह’ और उसकी असलियत

इस्लाम में ‘उम्माह’ का मतलब है- पूरी दुनिया के मुसलमान एक ‘रूहानी’ भाईचारे में जुड़े हुए हैं, और उन्हें एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। लेकिन जब नसरल्लाह की मौत पर अरब और सुन्नी मुस्लिम देशों ने खुलकर जश्न मनाया, तो उम्माह की यह अवधारणा भी सवालों के घेरे में आ गई। यदि वास्तव में उम्माह का कोई ठोस आधार होता, तो क्या इस्लामी जगत के कुछ हिस्से नसरल्लाह की मौत का स्वागत करते?

सुन्नी मुस्लिमों और शिया मुस्लिमों के बीच का यह मतभेद आज का नहीं है। सदियों से चले आ रहे इस संघर्ष ने इस्लाम के अंदर ही कई विभाजन पैदा कर दिए हैं। अरब देश, विशेषकर सुन्नी बहुल देश, नसरल्लाह की मौत को अपनी जीत मानते हैं।

इसके बावजूद, भारत के मुस्लिम समुदाय ने न सिर्फ इस्लामी उम्माह से जुड़ने की कोशिश की, बल्कि उन्होंने नसरल्लाह की मौत पर मातम भी मनाया। कश्मीर से लेकर लखनऊ तक, शिया समुदाय के लोग इमामबाड़ों में शोक मनाते देखे गए। लखनऊ में तो यह मातम तीन दिनों तक जारी रहा, जहाँ बड़ी संख्या में लोग जमा हुए और इमामबाड़ों में हुसैनियों की तरह आंसू बहाते रहे।

लखनऊ में तीन दिन का मातम

लखनऊ के शिया समुदाय के बीच नसरल्लाह की मौत पर मातम एक प्रतीकात्मक घटना थी। इमामबाड़े में तीन दिन तक चलने वाला यह मातम यह दर्शाता है कि भारतीय मुस्लिम समुदाय, विशेषकर शिया मुस्लिम, वैश्विक शिया नेताओं के साथ अपने संबंधों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

यहाँ एक दिलचस्प बात यह भी है कि नसरल्लाह की मौत के बाद इस्लामिक जगत के सुन्नी मुसलमानों ने उसकी मृत्यु पर खुशी जताई, जबकि भारतीय शिया मुस्लिमों ने इसे एक बड़ी क्षति के रूप में देखा। यह अंतरराष्ट्रीय इस्लामी राजनीति में भारतीय मुस्लिमों के स्थान को लेकर भी एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

‘इज्जत’ की तलाश और भारतीय मुस्लिम

भारतीय मुस्लिम, विशेषकर शिया समुदाय, सदियों से अपनी मजहबी और सांस्कृतिक पहचान को इस्लामी दुनिया के केंद्र से जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन उन्हें अक्सर इस्लामी जगत में एक ‘दूसरे दर्जे’ का मुस्लिम माना जाता है। अरब के मुस्लिमों की नजर में भारतीय मुस्लिम चाहे कितनी भी मजहबी निष्ठा दिखा लें, उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता।

लखनऊ के इमामबाड़े में तीन दिन का मातम भी इसी ‘इज्जत’ की तलाश का एक हिस्सा है। भारतीय मुस्लिम समुदाय अपनी मजहबी और सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक इस्लामी पहचान से जोड़ने की कोशिश करता है। उन्हें लगता है कि अगर वे इस्लामी उम्माह का हिस्सा बनेंगे, तो उन्हें उस ‘दूसरे दर्जे’ के मुस्लिम होने के टैग से छुटकारा मिलेगा।

महबूबा मुफ्ती और राजनीतिक अवसरवाद

नसरल्लाह की मौत के बाद जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपने चुनाव प्रचार को रोक दिया। यह एक स्पष्ट संकेत था कि कैसे भारत के मुस्लिम नेता अंतरराष्ट्रीय इस्लामी मुद्दों को अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं। महबूबा मुफ्ती ने न सिर्फ नसरल्लाह को एक शहीद के रूप में पेश किया, बल्कि उन्होंने इस मौके को मुस्लिम समुदाय को साधने के लिए एक अवसर के रूप में भी देखा।

महबूबा मुफ्ती ही नहीं, बल्कि नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के श्रीनगर लोकसभा सीट से सांसद रुहुल्लाह मेहदी ने भी ऐसा ही कदम उठाया। मेहदी ने भी चुनाव प्रचार बंद करने की तुरंत ही घोषणा कर दी, जैसे ही नसरल्लाह के मारे जाने की सूचना सामने आई।

इन दोनों नेताओं का यह कदम बताता है कि भारत में राजनीतिक नेता किस तरह अंतरराष्ट्रीय इस्लामी घटनाओं को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। कश्मीर में पहले से ही संवेदनशील माहौल था, और इस तरह की घटनाओं को उभारने से उन्हें अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने का एक और मौका मिल गया।

वैसे, मामला सिर्फ यूपी, कश्मीर या अन्य मुस्लिम बहुल इलाकों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई की एक मस्जिद तक में नसरल्लाह के पोस्टर लगा दिए गए और श्रद्धांजलि दी गई।

सीएए विरोध भी था महज बहाना

भारतीय मुस्लिमों का अपने देश में सड़कों पर उतरना कोई नई बात नहीं है। चाहे वह सीएए का मुद्दा हो या किसी भी वैश्विक इस्लामी घटना का, भारतीय मुस्लिम अक्सर बहुसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के रूप में अपनी असंतुष्टि जताते हैं। सीएए, जो कि विशेष रूप से गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए था, को लेकर मुस्लिमों का गुस्सा दिखाता है कि कैसे उन्हें हर कानून या फैसले में अपने खिलाफ कुछ न कुछ नजर आता है।

यह विरोध केवल राजनीतिक या सामाजिक नहीं था, बल्कि मजहबी भावनाओं से भी जुड़ा हुआ था। सीएए के विरोध के दौरान जो नारे लगाए गए, उनमें ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की ध्वनि भी सुनाई दी, जो दर्शाता है कि भारतीय मुस्लिम अपने विरोध को मजहबी रंग देने से भी पीछे नहीं हटते।

अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं भारतीय मुस्लिम

जब भारत के मुस्लिमों को अपने देश में कोई मुद्दा नहीं मिलता, तो वे अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को उठाकर अपनी असंतुष्टि दिखाते हैं। चाहे वह इजरायल-फिलिस्तीन का विवाद हो, या फिर इराक, सीरिया या लेबनान में होने वाली घटनाएँ, भारतीय मुस्लिम इन मुद्दों को अपने विरोध प्रदर्शनों में शामिल कर लेते हैं।

लखनऊ की घटना इसका एक और उदाहरण है। नसरल्लाह की मौत पर लखनऊ के शिया समुदाय ने जो मातम मनाया, वह सिर्फ एक मजहबी कर्तव्य नहीं था, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे भारतीय मुस्लिम वैश्विक इस्लामी घटनाओं से जुड़े रहना चाहते हैं।

भारत के मुस्लिमों की बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने की मानसिकता

अब सवाल यह उठता है कि भारतीय मुस्लिमों का यह रवैया क्यों है कि वे हमेशा बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने की कोशिश करते हैं? क्या यह उनकी मजहबी शिक्षा का परिणाम है, जहाँ काफिरों पर विजय पाने की बात की जाती है? भारत में जहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं, मुस्लिम समुदाय हमेशा अपनी पहचान को मजबूत करने की कोशिश करता रहता है। यह सिर्फ मजहबी पहचान की बात नहीं है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे वे अपने मजहबी कर्तव्यों के नाम पर राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं।

भारत के मुसलमान खुद को इस्लाम में दोयम दर्जे का मानते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी पहचान और इज्जत की तलाश में इस्लामी जगत के मुद्दों को अपने देश में उठाते रहते हैं। उन्हें बहाना चाहिए बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने का, उन्हें डराने का। चाहे सीएए का मुद्दा हो, फिलिस्तीन का या फिर लेबनान का – भारतीय मुस्लिम हमेशा यही संदेश देने की कोशिश करते हैं कि जब चाहें, तब वे सड़कों पर उतर सकते हैं, और हिंदुओं को दबोच सकते हैं।

ऐसे में यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि भारतीय मुस्लिम कब तक इस तरह की मानसिकता को अपनाए रखेंगे। कब तक वे अंतरराष्ट्रीय इस्लामी मुद्दों को लेकर अपने ही देश में विरोध प्रदर्शन करेंगे, और कब तक वे बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने की कोशिश करेंगे? बाकी यह तो तय ही है कि इस्लामी उम्माह का हिस्सा बनकर भी भारतीय मुस्लिमों को इस्लामी दुनिया में बराबरी का दर्जा नहीं मिलने वाला। अरब देशों के सुन्नी मुस्लिम उन्हें हमेशा ही एक ‘दूसरे दर्जे’ का मुस्लिम मानते रहेंगे।

‘आबादी बढ़ रही है मुसलमानों की, अब तुम्हारा राज खत्म होगा’: जो कार्यक्रम ‘संविधान’ के नाम पर उसमें सपा MLA महबूब अली ने ‘मजहब की ताकत’ का दिखाया खौफ

अपने नेताओं की विवादित बयानबाजी से आए दिन चर्चा में चल रही समाजवादी पार्टी की बदनामी में एक और इजाफा हुआ है। यह इजाफा सपा के टिकट पर अमरोहा से जीत कर आए विधायक महबूब अली ने कराया है। महबूब अली ने संविधान के नाम पर एक सार्वजनिक मंच से मुस्लिमों की आबादी बढ़ने का हवाला देते हुए भाजपा को चेतावनी दी है। इस दौरान महबूब अली ने मुगल काल का भी जिक्र किया। सपा विधायक द्वारा रविवार (29 सितंबर 2024) को दिए गए इस भड़काऊ बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

वायरल हो रहे लगभग 1 मिनट के वीडियो में महबूब अली ने सबसे पहले मुस्लिमों का प्रतिशत बढ़ने की बात कही। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “आने वाले वक्त में समझ लो, अब तुम्हारा राज खत्म हो जाएगा।” हाथ से इशारा करते हुए महबूब अली आगे बोले, “आबादी बढ़ रही है मुसलमानों की इतनी। आगे सत्ता में आना नहीं है।” अपनी रफ्तार में महबूब अली ने आगे कहा कि ये काम तो उन मुगलों के बस का भी नहीं है जो 850 साल तक हुकूमत कर के गए हैं।

महबूब अली ने दावा किया कि आज देश को गुमराह करके चलाया जा रहा है लेकिन हिंदुस्तान की आवाम जाग चुकी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ इशारा करते हुए महबूब अली आगे बोले, “आने वाले 2027 के अंदर आप जाएँगे जरूर। और इंशाअल्लाह हम आएँगे जरूर।” महबूब अली की इस बयानबाजी पर मंच के साथ-साथ उनको सुन रही भीड़ ने भी तालियाँ बजाकर और शोर मचाकर समर्थन किया। इस वीडियो को शेयर करते हुए पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने लिखा, “उनका एजेंडा एकदम साफ है।”

महबूब अली ने यह विवादित बयान अमरोहा के पड़ोसी जिले बिजनौर में दिया है। रविवार (29 सितंबर) को वह बिजनौर में अपने समर्थकों सहित पहुँचे थे। “संविधान मानस्तंभ स्थापना’ के नाम पर हुआ ये कार्यक्रम शहर के रामलीला मैदान में आयोजित हुआ था। इस कार्यक्रम में मंच पर और श्रोताओ में हिन्दू समाज के भी कई लोग मौजूद थे। इन सभी में से किसी ने भी महबूब का विरोध नहीं किया। उलटे तालियाँ बजा कर उनका स्वागत किया गया।