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ओडिशा के भद्रक में सोशल मीडिया पोस्ट पर भड़की हिंसा, इस्लामी कट्टरपंथियों ने किया पथराव: बवाल के बाद इलाके में इंटरनेट बैन, 3 पुलिसकर्मियों समेत कई घायल

ओडिशा के भद्रक जिले में एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर स्थिति तनावपूर्ण हो गई है। इस घटना में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने पुलिस पर भी जमकर पत्थरबाजी की है, जिसमें तीन वरिष्ठ पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। भद्रक में स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि एसडीएम ने आदेश जारी कर हर तरह के इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी है। फिलहाल पूरे इलाके में भारी सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये घटना पुरुना बाजार थाना इलाके की है। यहाँ घटना की शुरुआत तब हुई, जब एक स्थानीय व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई सामग्री को कट्टरपंथी मुस्लिमों ने आपत्तिजनक बताया। इसके बाद कट्टरपंथियों ने रैली आयोजित की और भीड़ इकट्ठी की। उन्होंने नारेबाजी करते हुए सड़क को जाम कर दिया, और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया।

भद्रक जिले में कचेरी बाजार-पुरुनाबाजार को जोड़ने वाले संथिया पुल पर हिंसक प्रदर्शन देखते ही देखते बढ़ गया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके अलावा, कई इलाकों में तनाव और अफवाहें फैलने लगीं। इस बीच, इलाके में दो समुदाय के बीच बनी तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए 7 प्लाटून पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की।

हालाँकि, इस्लामी कट्टरपंथियों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा था, जिससे प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी पड़ी। भद्रक जिले में बढ़ते तनाव के बीच पुलिस ने अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की है। हालात को देखते हुए जिला प्रशासन ने धारा 163 के तहत कार्रवाई की है, जिसमें हिंसा फैलाने वाले दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही गई है। धारा 163 के तहत प्रशासन को किसी भी व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार होता है, यदि वह सामाजिक या धार्मिक उन्माद फैलाने का दोषी पाया जाता है।

पूर्वी रेंज के DIG सत्यजीत नाइक ने बताया, हमने स्थिति को नियंत्रित करने और इलाके में शांति बनाए रखने के लिए पुरुना बाजार इलाके में BNSS की धारा 163 लागू कर दी है। सुरक्षा बल की तैनाती की गई है जो इलाके में फ्लैग मार्च कर रहे हैं। इलाके में नाकाबंदी भी की जा रही है… FIR दर्ज़ कर ली गई है और दोषियों की पहचान कर ली गई है। दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

साल 2017 में एक महीने तक जारी रहा था कर्फ्यू

बता दें कि साल 2017 में भद्रक जिला सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ चुका है। उस समय हुई हिंसा में सैकड़ों दुकानों, मकानों को जला दिया गया था, जिससे करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। भद्रक जिले में 1 महीने तक कर्फ्यू लगाया गया था। वो दंगे भी इसी पुरुना बाजार इलाके में हुए थे, जिसमें इस्लामी कट्टरपंथियों ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए थे। फिलहाल प्रशासन की कोशिश है कि हालात जल्द से जल्द सामान्य हो जाएँ, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। वहीं, हिंसा में शामिल दोषियों की पहचान की जा रही है, और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

केरल वक्फ बोर्ड ने 3 गाँवों की 400 एकड़ जमीन पर ठोका दावा, 600 परिवारों पर मंडराया संकट: विरोध में उतरा चर्च, कानून में जल्द बदलाव के लिए केंद्र से किया आग्रह

केरल में कोच्चि के उपनगरीय इलाकों मुनम्बम और चेराई गाँवों 400 एकड़ जमीन को लेकर गंभीर विवाद उभर आया है, जहाँ लगभग 600 परिवारों की जमीन पर वक्फ बोर्ड ने अवैध दावा कर दिया है। यह मामला धीरे-धीरे राज्य की सीमाओं को पार कर अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। इस विवाद में मुख्य रूप से मुनम्बम, चेराई, और पल्लिकाल द्वीप के इलाके शामिल हैं, जो कई दशकों से इन परिवारों की संपत्ति रही है। अब यह इलाका वक्फ बोर्ड की नज़र में है, जिससे इन परिवारों को अपनी जमीन खोने का डर सताने लगा है।

वक्फ बोर्ड का दावा और विरोध की शुरुआत

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब पाँच साल पहले साल 2019 वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल के इलाके उनकी संपत्ति हैं। यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, जिनके पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया। इन परिवारों ने अपनी जमीन को वैध रूप से खरीदा था, लेकिन अब उन्हें जबरन खाली करने के आदेश दिए जा रहे हैं, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (KCBC) और सायरो-मालाबार पब्लिक अफेयर्स कमीशन (SMPAC) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए लोकसभा सचिवालय के सामने रखा है। दोनों संगठनों ने सरकार से वक्फ कानूनों में संशोधन की मांग की है, ताकि इस प्रकार के अवैध दावे भविष्य में न हों। इन संगठनों के प्रमुखों कार्डिनल बासेलियोस क्लेमिस और आर्कबिशप मार एंड्रूज़ थाझाथ ने अपने पत्रों में कहा, “किसी भी नागरिक के संपत्ति के अधिकार और गरिमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। यह समिति की जिम्मेदारी है कि वह कानून को निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से लागू करे।”

साल 1902 तक जाती है विवाद की जड़

विवाद की जड़ 1902 में जाती है, जब त्रावणकोर के राजा ने गुजरात से आए एक किसान अब्दुल सत्तार मूसा हाजी सेठ को 404 एकड़ जमीन और 60 एकड़ जल क्षेत्र पट्टे पर दिया था। उस समय, यह जमीन मछुआरों के लिए अलग रखी गई थी, जो वहाँ कई वर्षों से रह रहे थे। 1948 में सेठ के उत्तराधिकारी सिद्दीक सेठ ने यह जमीन पंजीकृत करवा ली थी। इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्री कटाव के कारण खो गया, और 1934 की भारी बारिश ने पांडरा समुद्र किनारे की जमीन को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। लेकिन सिद्दीक सेठ द्वारा पंजीकृत जमीन में मछुआरों के रहने वाले इलाके भी शामिल हो गए।

1950 में सिद्दीक सेठ ने यह जमीन फरोख कॉलेज को उपहार स्वरूप दे दी, लेकिन शर्त यह थी कि कॉलेज केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही इसका उपयोग करेगा। अगर कभी कॉलेज बंद हो जाता है, तो जमीन वापस सेठ के वंशजों को लौटाई जाएगी। लेकिन दस्तावेजों में गलती से या जानबूझकर ‘वक्फ’ शब्द लिख दिया गया, जिससे अब यह विवाद खड़ा हो गया है।

वक्फ बोर्ड ने साल 2019 में किया जमीनों पर दावा

हालाँकि, वक्फ बोर्ड ने पहली बार 2019 में इस जमीन पर दावा किया, जब उन्होंने कहा कि यह जमीन वक्फ संपत्ति है। लेकिन इस दावे से पहले किसी भी कानूनी प्रक्रिया के तहत स्थानीय निवासियों को कोई जानकारी नहीं दी गई थी। KCBC के सोशल हार्मनी और विजिलेंस कमीशन के सचिव फ्र. माइकल पुलिकल ने बताया, “पहले ही निवासियों ने इस जमीन पर अपने अधिकार प्रमाण पत्र तालुक कार्यालय से प्राप्त कर लिए थे, जिससे उन्हें बिजली और पानी जैसी सुविधाएँ प्राप्त होती थीं। लेकिन अचानक वक्फ बोर्ड का दावा उनके लिए संकट बन गया।”

इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। 27 सितंबर को मुनम्बम के वंची स्क्वायर में एक बड़े प्रदर्शन का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए। इसके साथ ही, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस विवाद में चर्च और स्थानीय निवासियों का समर्थन करने की घोषणा की है। बीजेपी नेता शौन जॉर्ज ने कहा, “मुनम्बम भू-समरक्षण समिति द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन को हमारी पार्टी का पूरा समर्थन रहेगा।”

बीजेपी का कहना है कि यह मामला केवल जमीन के अधिकारों का नहीं है, बल्कि इससे बड़ी साजिश का हिस्सा है, जिसमें ‘चरमपंथी’ तत्वों का हाथ हो सकता है। बीजेपी जिला अध्यक्ष के.एस. शैजू और प्रवक्ता के.वी.एस. हरिदास ने कहा कि यह मुद्दा न केवल स्थानीय निवासियों का है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर इसे उठाया जाना चाहिए। पार्टी ने यह भी माँग की कि वक्फ बोर्ड द्वारा किए गए दावे की जाँच होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि इसमें किन-किन चरमपंथी तत्वों की भूमिका है।

बीजेपी की राज्य इकाई ने केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल और सायरो-मालाबार चर्च द्वारा वक्फ एक्ट संशोधन के समर्थन का स्वागत किया है। बीजेपी नेताओं ने कहा कि यह मामला केवल ईसाई समुदाय का नहीं है, बल्कि इससे अन्य धर्मों के लोग भी प्रभावित हो सकते हैं। पार्टी ने संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) और वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) से भी इस पर अपना रुख स्पष्ट करने की माँग की है।

इस विवाद को लेकर राजनीतिक और धार्मिक संगठनों के बीच एक अनूठा गठजोड़ बनता दिख रहा है। बीजेपी के नेताओं का मानना है कि अगर वक्फ एक्ट में उचित संशोधन नहीं किया गया, तो इससे भविष्य में और भी कई ऐसे विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। दूसरी ओर, चर्च और ईसाई संगठन भी इस मुद्दे पर सक्रिय हो गए हैं, जिससे यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर गर्म हो चुका है।

दिल्ली में बीजेपी नेता अनूप एंटनी जोसफ ने कहा, “आज जब पूरे देश में वक्फ बिल पर चर्चा हो रही है, तो लोगों को यह जानना जरूरी है कि केरल में 600 से ज्यादा परिवारों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है।”

जैसे-जैसे यह मामला गरमा रहा है, राज्य और केंद्र सरकार दोनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे इस विवाद का समाधान निकालें। एक तरफ, बीजेपी और चर्च की एकजुटता ने इस मामले को नया आयाम दिया है, वहीं दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों का भविष्य अधर में लटक गया है। वक्फ बोर्ड और स्थानीय प्रशासन के बीच संवादहीनता ने इस विवाद को और जटिल बना दिया है। वक्फ एक्ट में संशोधन की माँग जोर पकड़ रही है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस पर क्या कदम उठाती है।

मंदिर में घुसकर हमला किया, शिवलिंग तोड़कर नाली में फेंका: हिमाचल प्रदेश के गुस्साए हिंदुओं ने निकाला विरोध प्रदर्शन, बाजार कराया बंद

हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुँचाई गई है। काँगड़ा में एक मंदिर में स्थापित शिवलिंग को अज्ञात शरारती तत्वों ने तोड़ कर नाले में फेंक दिया। इस घटना के सामने आने के बाद से माहौल गरमाया हुआ है और हिन्दू संगठन इस मलमे में कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांगड़ा के नगरोटा बगवां में गाँधी मैदान के पास एक छोटा मंदिर बना हुआ है। इसमें एक शिवलिंग स्थापित किया गया है, यह शिवलिंग शुक्रवार (27 सितम्बर, 2024) की सुबह क्षतिग्रस्त पाया गाया। शिवलिंग को उसके अरघे से निकाल दिया गया था।

लोगों ने तलाश की तो शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा नाले में पड़ा मिला। इसके बाद यहाँ पर पहुँचे श्रद्धालु भड़क गए। लोगों ने पुलिस बुला ली। हिन्दू संगठनों को जब यह सूचना मिली तो वह भी यहाँ पहुँच गए। हिन्दू संगठनों ने माँग की कि तुरंत मंदिर क्षतिग्रस्त करने वालो को पकड़ा जाए।

हिन्दू संगठनों ने यहाँ मंदिर के साथ ही पुलिस प्रशासन के सामने प्रदर्शन किया। वहीं मौके पर पहुँची पुलिस ने टूटे शिवलिंग को कब्जे में लेकर आसपास के CCTV खंगालने चालू कर दिए हैं। पुलिस अभी शिवलिंग तोड़ने वाले को खोज नहीं पाई है।

हिन्दू संगठनों के साथ ही यहाँ का व्यापारी वर्ग भी सड़कों पर उतर आया। नगरोटा का बाजार भी बंद कर दिया गया। उधर पुलिस माहौल शांत करवाने में जुटी है। पुलिस ने कहा है कि रात में जो भी गाड़ियाँ यहाँ से निकली हैं उनको चिन्हित किया जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश में यह घटना ऐसे समय हुई है जब पहले ही लोग अवैध मस्जिद और बाहरी घुसपैठ को लेकर गुस्साए हुए हैं। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में संजौली मस्जिद से लेकर चालू हुआ विवाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी पहुँच चुका है। लोगो ने मंडी और बाकी जगहों पर अवैध मस्जिद के खिलाफ प्रदर्शन किया है।

चायनीज खतरे से लड़ना, अमेरिका पर निर्भरता कम, Asian NATO का कॉन्सेप्ट: जानें कौन हैं जापान के नए प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में नेतृत्व बदलने जा रहा है। जापान को जल्द नया प्रधानमंत्री मिलेगा। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) के वरिष्ठ नेता और रक्षा मंत्री, कृषि मंत्री जैसे महत्वपूर्ण ओहदों को संभाल चुके शिगेरू इशिबा जापान के नए प्रधानमंत्री बन रहे हैं। 67 वर्षीय इशिबा, फुमियो किशिदा की जगह लेंगे। 

इशिबा को ऐसे समय में चुना गया है जब जापान, चीन की बढ़ती ताकत को रोकने और साथ ही आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है। किशिदा को ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाना गया है जो जापान को और मजबूत देश बनाने के पक्ष में हैं। किशिदा की पहचान LDP के भीतर गहरी भूराजनीतिक समझ रखने वाला समझा जाता है। 

कौन हैं शिगेरू इशिबा?

शिगेरू इशिबा जापान की राजधानी टोक्यो के रहने वाले हैं। वह बीते लगभग 4 दशकों से राजनीति में हैं। शिगेरू पिछले 38 सालों से सांसद हैं। 67 साल के शिगेरू इशिबा को किताबें पढ़ने का शौक है। उन्होंने हाल ही में बताया कि वह दिन में तीन किताबें पढ़ते हैं। इसके अलावा शिगेरू को खिलौना मॉडल बनाने का भी शौक है। उनकी कुछ तस्वीरें भी वायरल हुई हैं, इनमें वह जहाज और गाड़ियों के मॉडल के साथ नजर आ रहे हैं। 

शिगेरू इशिबा एक ईसाई हैं। वह इसे खुले तौर पर बताते हैं। वह पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे और फुमियो किशिदा के आलोचक रहे है। शिगेरू इशिबा के पिता भी जापान की राजनीति में सक्रिय थे। वह भी सांसद रहे थे। शिगेरू इशिबा को लेकर माना जाता है कि उन्हें पार्टी में अधिक लोग पसंद नहीं करते। ऐसा उनके स्पष्टवादी रवैये के चलते है। 

लंबा राजनीतिक जीवन

शिगेरू इशिबा बीते 38 सालों से जापान की संसद में सदस्य हैं। वह टोत्तोरी संसदीय सीट से 12 बार चुनाव जीत चुके हैं। शिगेरू इशिबा LDP के महासचिव, जापान में जनसंख्या में गिरावट पर काबू पाने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को सक्रिय करने के प्रभारी मंत्री, राष्ट्रीय सामरिक क्षेत्रों के राज्य मंत्री, कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन मंत्री, और रक्षा मंत्री रहे हैं। शिगेरू जब पहली बार सांसद बने थे, तब वह जापान के सबसे युवा सांसद थे। शिगेरू इशिबा ने जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे को भी चुनौती दी है।

कैसे जीता पार्टी का द्वंद? 

12 बार सांसद रह चुके शिगेरू इशिबा को प्रधानमंत्री पद पाने के लिए अपनी पार्टी LDP में लम्बी दौड़ जीतनी पड़ी है। फुमियो किशिदा के प्रधानमंत्री पद छोड़ने के ऐलान के बाद पार्टी के भीतर चालू हुए द्वन्द में इशिबा के सामने 9 उम्मीदवार और थे। उनकी सबसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी जापान की आर्थिक मामलों की मंत्री सनाए तकाईची थीं। 

सनाए तकाईची अगर जीततीं तो वह जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री होतीं। इशिबा इससे पहले 4 बार और प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन असफल रहे हैं। इस बार उनका पांसा पलट गया और वह जीत गए। इशिबा पर LDP का विश्वास जनता में बढ़ाने का जिम्मा आ गया है। 

‘एशिया का नाटो’ बनाने की वकालत

शिगेरू इशिबा के प्रधानमंत्री बनने से सबसे अधिक प्रभाव जापान के सामरिक माहौल पर पड़ने वाला है। इशिबा ऐसे व्यक्ति के तौर पर जाने जाते रहे हैं जो जापान को और शक्तिशाली सैन्य ताकत बनाने की वकालत करते आए हैं। इशिबा एशिया के भीतर उन देशों का सैन्य सहयोगी संगठन बनाना चाहते हैं जो चीन के खतरे को लेकर आशंकित हैं।

इशिबा की इस सोच को ‘एशियन नाटो’ का नाम दिया गया है। गौरतलब है कि नाटो को अमेरिका ने सोवियत संघ का मुकाबला करने के लिए बनाया था। शिगेरू इशिबा का कहना है कि जापान को अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए।

इशिबा का कहना है कि जापान की सेना अकेले ही किसी देश से भिड़ने में सक्षम होनी चाहिए। वह चीनी मामलों पर कड़ा रुख मानने वाले माने जाते हैं। अमेरिका पर निर्भरता कम करने की बात के कारण अमेरिका भी उनको लेकर थोड़ा आशंकित है।

शिगेरू इशिबा जापान में घटती जन्म दर को लेकर मुखर रहे हैं। वह लगातार जापान की बूढ़ी होती जनसंख्या के कारण काम करने वालों की कम संख्या को लेकर चिंतित रहे हैं। वह जापान के अन्य सामाजिक मुद्दों पर भी बोलते रहे हैं।

जबलपुर में गायत्री मंदिर की जमीन पर बनी मस्जिद तोड़ने पहुँचे हिंदू संगठन, प्रशासन को दिया 10 दिन का अल्टीमेटम: कड़ी सुरक्षा के बीच स्थिति तनावपूर्ण

मध्य प्रदेश के जबलपुर के राँझी इलाके में गायत्री मंदिर की जमीन पर अवैध मस्जिद के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। गुरुवार (26 सितंबर 2024) को विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इलाके में पहुँचकर मस्जिद तोड़ने की माँग उठाई। इन संगठनों का आरोप है कि मस्जिद गायत्री बाल मंदिर की जमीन पर अवैध रूप से बनाई गई है, जिसके खिलाफ पिछले कई सालों से विरोध जारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अवैध मस्जिद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंदूवादी कार्यकर्ताओं ने जमकर नारेबाजी की और प्रशासन से तुरंत कार्रवाई की माँग की। उनका दावा है कि मस्जिद के निर्माण से पहले भी वे प्रशासन को इस संबंध में शिकायत कर चुके हैं। उन्होंने प्रशासन को 10 दिन का अल्टीमेटम दिया है, जिसमें कहा गया है कि यदि मस्जिद को नहीं हटाया गया, तो वे खुद इस मस्जिद को गिरा देंगे।

इस मस्जिद को लेकर विवाद नया नहीं है। हिंदू संगठनों का कहना है कि 2021 से ही इस मसले पर विरोध चल रहा है। 12 जून 2021 को कलेक्ट्रेट में ज्ञापन सौंपा गया था, जिसमें दस्तावेज और खसरा नंबरों का हवाला देते हुए कहा गया था कि मस्जिद का निर्माण अवैध रूप से किया जा रहा है। इसके बाद 27 जुलाई 2021 को एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था। हालाँकि, प्रशासन ने तब कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, और मस्जिद का निर्माण चलता रहा।

इसके बाद, 2021 में तत्कालीन एसडीएम ऋषभ जैन ने मस्जिद निर्माण पर रोक लगा दी थी, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इसके बावजूद मस्जिद का निर्माण चोरी-छिपे चलता रहा। वे बताते हैं कि लोग बाहर से आते हैं और मस्जिद में ठहरते हैं, जिससे इलाके में कानून व्यवस्था को खतरा पैदा हो रहा है। इसके अलावा, रोहिंग्या मुसलमानों की उपस्थिति को भी लेकर सवाल उठाए गए हैं। हिंदू संगठनों का दावा है कि इस इलाके में रोहिंग्या की गतिविधियाँ बढ़ी हैं, जिनके पास स्थानीय पहचान पत्र भी नहीं हैं, और इसके चलते अपराध भी बढ़ रहा है।

स्थानीय प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। पुलिस और प्रशासन की टीमें मौके पर तैनात कर दी गई हैं ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे। कई थानों के पुलिस बल को बुलाकर मस्जिद के आसपास की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। मस्जिद के पास के सभी मार्गों को सील कर दिया गया है ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके। प्रशासन की ओर से इस मुद्दे पर जाँच का आश्वासन दिया गया है।

एएसपी प्रदीप शेनडे ने बताया कि एसडीएम को ज्ञापन दिया गया है और जाँच के बाद कार्रवाई की जाएगी। एसडीएम ने कहा है कि वे मस्जिद के निर्माण से संबंधित सभी दस्तावेजों की जाँच करेंगे और उस आधार पर निर्णय लिया जाएगा।

हालाँकि, हिंदू संगठनों का कहना है कि प्रशासन ने इससे पहले भी कई बार आश्वासन दिया था, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। हिंदू संगठनों के विरोध के बीच मस्जिद की स्थिति पर सरकार और प्रशासन के कदमों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यह आरोप भी लगाया गया है कि मस्जिद को बिजली और पानी की सरकारी सुविधाएँ भी दी जा रही हैं, जबकि इसके निर्माण के दस्तावेज संदिग्ध हैं। संगठनों ने इस पर भी आपत्ति जताई है और कहा है कि सरकारी सुविधाएँ अवैध निर्माण को कैसे मुहैया कराई जा सकती हैं।

विवादित स्थल पर तनाव बढ़ने के बाद प्रशासनिक अधिकारियों के बीच चर्चाएँ हो रही हैं। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई बार तनाव की स्थिति बनी, लेकिन बड़े पैमाने पर हिंसा की कोई खबर नहीं है। हिंदू संगठनों का कहना है कि यह मामला केवल जमीन के कब्जे का नहीं है, बल्कि इसके पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। उनका कहना है कि अयोध्या, काशी, और मथुरा जैसे स्थानों पर भी इसी तरह के अवैध कब्जे हुए थे, और यहाँ भी वही स्थिति उत्पन्न हो रही है।

इस मसले पर 21 मार्च 2023 को भी एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था, जिसमें संगठन ने प्रशासन से मस्जिद गिराने की माँग की थी। उस समय भी प्रशासन ने जाँच का आश्वासन दिया था, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। अब एक बार फिर हिंदू संगठन मस्जिद को गिराने की माँग पर अड़े हुए हैं, और स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। अब आखिरी बार प्रदर्शनकारियों ने एसडीएम कार्यालय में ज्ञापन सौंपा है और स्पष्ट किया है कि यदि 10 दिनों के भीतर मस्जिद नहीं तोड़ी गई, तो वे खुद इसे गिरा देंगे।

बिहारियों से घृणा, छठ से नफरत, हिंदी बोलने वाले ‘गुटखा अपराधी’: जानिए Bangla Pokkho को, जिसने मारा बिहारी छात्रों को, TMC से भी कनेक्शन

पश्चिम बंगाल में स्टाफ सिलेक्शन कमिशन जनरल ड्यूटी (SSC GD) का फिजिकल टेस्ट देने गए बिहार के दो युवकों के साथ मारपीट की गई है। वीडियो में एक आदमी इनके साथ बदसलूकी करते हुए कहता है, “बिहार के हो तो बंगाल में परीक्षा देने क्यों आए हो”। इसका वीडियो वायरल होने के बाद बवाल मच गया है। सोशल मीडिया से लेकर नेता तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आलोचना कर रहे हैं।

यह घटना पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी की बताई जा रही है। घटना कब की है, इसको लेकर अभी तक साफ नहीं हो पाया है। गुरुवार (26 सितंबर) को वीडियो सामने आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ममता बनर्जी को चिट्ठी लिखी। इसके साथ ही भाजपा नेताओं ने इसकी आलोचना की। छात्रों से मारपीट करने के मुख्य आरोपित रजत भट्टाचार्य और उसके साथी गिरिधारी रॉय को पकड़ लिया गया है।

इस घटना को लेकर बिहार पुलिस का कहना है कि अंकित यादव और उनका एक साथी सिलीगुड़ी में एक कमरे में सो रहे थे। उसी दौरान पश्चिम बंगाल के कुछ स्थानीय लोग इनके कमरे में घुसे और उन्हें जबरदस्ती उठा दिए। इनमें एक व्यक्ति बांग्ला भाषा में इनसे सवाल पूछता है और कहता है कि बिहार से हो तो बंगाल में परीक्षा देने क्यों आए हो। इस दौरान वे छात्रों से उनका डॉक्यूमेंट भी माँगते हैं।

हालाँकि, फाड़े जाने के डर से छात्र ने डॉक्यूमेंट दिखाने से मना कर दिया। इसके बाद उसको थप्पड़ मारा गया और गाली दी गई। इतना ही नहीं, इन लोगों ने इन छात्रों को जेल भेजने की भी धमकी दी। आखिरकार डर छात्र बिना परीक्षा में शामिल हुए ही तुरंत बिहार लौटने की बात कहता है। इसके बाद बंगाल के आरोपित उनसे उठक-बैठक कराते हैं और जल्दी बंगाल से निकलने की धमकी देते हैं।

पीली टी-शर्ट में दिख रहा एक व्यक्ति कहता है, “जब तुम लोग बांग्ला जानते नहीं हो तो क्यों दूसरे जगह आ गए हो।” इस पर एक छात्र कहता है कि वह फिजिकल देने आया, क्योंकि यहाँ सिलीगुड़ी में उसका सेंटर पड़ गया है। उसने कहा कि सिलीगुड़ी में उसका सेंटर पड़ने में उसकी कोई गलती नहीं है। इस पर वह व्यक्ति कहता है, “बंगाल के डोमिसाइल नहीं हो तो क्यों तुमने अप्लाई किया?”

पुलिस की पूछताछ में रजत भट्टाचार्य ने बताया, “बिहार और यूपी से नकली प्रमाणपत्र लेकर बिहार के युवक एसएससी परीक्षा के लिए आ रहे हैं और हमारे युवकों की नौकरियाँ छीन रहे हैं। हम बांग्ला पक्खो संगठन से हैं और हमें बताया गया था कि उनके पास नकली प्रमाणपत्र हैं। इसलिए हम उन्हें पकड़ने के लिए वहाँ गए थे।” दोनों आरोपित सिलीगुड़ी के ही रहने वाले हैं।

जानिए कट्टरपंथी संगठन ‘बांग्ला पक्खो’ के बारे में

बता दें कि ‘बांग्ला पक्खो’ एक कट्टरपंथी संगठन है। ‘बांग्ला पक्खो’ का अर्थ है बांग्ला पक्ष। यह बंगाल की सरकारी नौकरियों में 100 प्रतिशत और अन्य नौकरियों में 90 प्रतिशत बांग्ला भाषियों के लिए आरक्षण की माँग करता है। इसकी स्थापना गार्गा चटर्जी नाम के शख्स ने साल 2018 में की थी। कुछ रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस की यह एक इकाई है।

भाजपा की मुखर विरोधी इस संगठन ने पहले भी पश्चिम बंगाल में हिंदी में लिखे साइनबोर्ड को मिटाने का अभियान चलाया था। यह संगठन पश्चिम बंगाल में सिर्फ बंगाली भाषा की वकालत करता है। इसके साथ ही राज्य में हिंदी भाषियों के खिलाफ कई तरह की आपत्तिजनक पोस्टरबाजी करके उनके खिलाफ माहौल तैयार करता है। इस तरह के कई प्रयासों में उसकी संलिप्तता सामने आ चुकी है।

नवंबर 2023 में छठ महापर्व के दौरान यह संगठन हिंदी भाषी, खासकर बिहारी लोगों के खिलाफ जमकर पोस्टरबाजी की थी। इसमें लिखा था, “जय बांग्ला…जय बांग्ला…’ यानी बंगाल की जय हो, बंगाल की जय हो। ऐसे ही ‘पाहाड़ थेके सोमुद्रो… भूमि पुत्रो, भूमि पुत्रो…’ यानी ‘पहाड़ से समुद्र.. भूमिपुत्र, भूमिपुत्र…।’ आजकल पश्चिम बंगाल में चारों ओर इन्हीं नारों की गूंज है।

छठ पूजा का विरोध और ‘लव जिहाद’ के काउंटर में ‘गुटखा जिहाद’

उस दौरान इस संगठन के संस्थापक गार्गा चटर्जी ने राज्य सरकार, जिला प्रशासन और पुलिस को एक शिकायत पत्र दिया था, जिसमें लिखा था कि छठ पूजा के नाम पर गंगा घाटों, नदियों और तालाबों को दूषित किया जाता है। चटर्जी ने आगे लिखा था कि छठ पूजा के समय जो भोजपुरी या हिंदी गाने बजते हैं, उससे ध्वनि प्रदूषण होता है। इसलिए बंगाल में छठ बंद होना चाहिए। इसे रोकने के लिए नदियों और तालाबों के किनारे सुरक्षा गार्ड तैनात किए जाने चाहिए।

अगस्त 2023 में गार्गा चटर्जी की टिप्पणी के साथ चलती ट्रेन से शूट किए गए एक वीडियो सामने आया था। इसमें बताया गया था कि कैसे दक्षिण 24-परगना जिले का मल्लिकपुर इलाका पिछले 10 सालों में ‘यूपी और बिहार के अपराधियों का अड्डा’ बन गया है। इतना ही नहीं, बांग्ला पक्खो ने भाजपा के ‘लव जिहाद’ को काउंटर करने के लिए ‘गुटखा जिहाद’ शब्द गढ़ा गया था।

बांग्ला पोक्खो बंगाली महिलाओं का हिंदी भाषी पुरुषों से शादी का भी विरोध करता है। इस संगठन ने अपने एक पोस्ट में कहा था कि वह ऐसे बंगाली पुरुषों को अधिक देखना चाहता है, जिनकी बीवियाँ हिंदी भाषी हों। इस संगठन ने बंगाली लड़कियों से अपील की थी कि वह ‘गुटखा पुरुषों’ के चंगुल में ना फँसे।

जनवरी 2020 में सिलीगुड़ी के प्रमुख चौराहों के नाम परिवर्तन पर आपत्ति जताई है। उसे शहर के चौराहों के नामों में ‘चौक’ शब्द स्वीकार नहीं था। उस दौरान संगठन ने कहा था कि ‘चौक’ की जगह ‘मोड़’ या ‘सरणी’ का उपयोग किया जाना चाहिए। ‘चौक’ बिहार व यूपी में प्रचलित हिंदी का शब्द है और यह वहाँ की संस्कृति का परिचायक है। बंगाल की बांग्ला संस्कृति के परिचायक ‘मोड़’ अथवा ‘सरणी’ है।

इसी तरह मार्च 2020 में कोलकाता से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में स्थित चंदननगर शहर के फाटकगोरा इलाके में रहने वाले सोमनाथ सिंह के घर पर ‘बांग्ला पक्खो’ के कई कट्टरपंथी पहुँच गए थे। उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के लिए उन्हें धमकी दी थी। इतना ही नहीं, अनीस सिंह नाम के एक अन्य हिंदी भाषी को भी प्रताड़ित किया था।

नौकरी की तलाश में पश्चिम बंगाल के रानीगंज पहुँचे मुकेश भगत ने एक लड़के ने अपने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि बांग्ला पक्खो के सदस्यों ने निवास प्रमाण पत्र में जालसाजी करने का आरोप लगाकर पुलिस को सौंप दिया। इसके कुछ दिन बाद बांग्ला पोक्खो ने अपने फेसबुक पेज पर भगत का एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें वह गार्गा चटर्जी से माफी माँगते दिख रहे थे।

बांग्ला पोक्खो के अनुसार, ‘हिंदी बेल्ट’ वह इलाका है, जहाँ हर कोई गुटखा खाता है, असभ्य और पिछड़ा है, शाकाहारी और भाजपा के मतदाता हैं। तब अपने फेसबुक पेज में बांग्ला पक्खो ने ‘हिंदी/उर्दू बेल्ट’ को ‘काऊ बेल्ट’, ‘बेबी फैक्ट्री बेल्ट’, ‘गुटखा बेल्ट’ और ‘कन्या भ्रूण हत्या बेल्ट’ जैसा नाम दिया था। हिंदी भाषियों के लिए ये लोग ‘गुटखा अपराधी’, ‘गुटखा-आतंकवादी’ या ‘गुटखा जोंटू (जानवर)’ कहते हैं।

कौन है गार्गा चटर्जी, जिसने बनाई है यह संस्था

गार्गा चटर्जी के पास हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री है। उन्होंने मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) से मस्तिष्क और संज्ञानात्मक विज्ञान, दोनों पर पोस्ट-डॉक्टरल शोध किया है। वह खुद को भाषाई कार्यकर्ता कहते हैं। उन्होंने साल 2017-18 के आसपास बंगाल की राजनीति में जातीय आयाम लाने में अहम भूमिका निभाई थी।

साल 2022 में असम के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप में गार्गा के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई थी। कोलकाता पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया था। इसके बाद गुवाहाटी में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया था।

तब राजनीति खेलते हुए गार्गा चटर्जी ने कहा था, “मैं पूरे भारत में बंगाल और बंगालियों के खिलाफ किए गए अत्याचारों के खिलाफ बहुत मुखर रहा हूँ, जिसमें NRC, CAA, डिटेंशन कैंप शामिल हैं। इसके चलते मुझे निशाना बनाया जा रहा है और यह सब भाजपा के इशारे पर हो रहा है।” गार्गा चटर्जी बांग्ला भाषियों के लिए भारतीय सेना में बंगाल रेजिमेंट बनाने की भी माँग करते रहे हैं।

UNSC में भारत की पक्की सदस्यता को UK का समर्थन, फ्रांस-अमेरिका-रूस पहले ही कह चुके शामिल करने की बात: चीन लगाता रहा है अड़ंगा

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा समिति (UNSC) में भारत की पक्की सदस्यता को ब्रिटेन का समर्थन हासिल हुआ है। ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में माँग उठाई है कि भारत को UNSC में जगह दी जाए। ब्रिटेन UNSC का स्थायी सदस्य है। इससे पहले फ्रांस समेत बाकी देश भी भारत की सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं।

वर्तमान में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का अधिवेशन चल रहा है। इसी में ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने अपने संबोधन के दौरान भारत को स्थायी सदस्य बनाए जाने का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “मैं UNSC को लेकर आश्चर्य में हूँ। इसको बदलना पड़ेगा। ताकि यह ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व कर सके। हम यहाँ अफ़्रीकी देशों को स्थायी सदस्य के तौर पर देखना चाहेंगे।”

उन्होंने आगे कहा, “भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी को हम स्थायी सदस्य बनाना चाहेंगे। हम यहाँ के अस्थायी सदस्यों की संख्या भी बढ़ाना चाहेँगे। हम ब्रिटेन के काम करने के तरीके भी बदलेंगे। हम सुनेंगे ज्यादा और बोलेंगे कम ताकि पुरानी परंपरा बदले।”

ब्रिटिश प्रधानमंत्री से पहले फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी भारत का पक्ष लिया। उन्होंने कहा, “जब तक UNSC सदस्य देशों के निजी हितों की वजह से अटकी रहेगी, तब तक आगे बढ़ना मुश्किल होगा। क्या इससे बढ़िया को व्यवस्था है, हमें ये नहीं मालूम। ऐसे में UN को हो अधिक प्रभावी बनाते हैं। इसके लिए हमें इसमें प्रतिनिधित्व बढ़ाना पड़ेगा।”

फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने इसके बाद कहा, “फ्रांस UNSC के विस्तार का समर्थन करता है। जर्मनी, जापान, भारत और ब्राजील इसके स्थायी सदस्य होने चाहिए। इसी के साथ अफ्रीका के दो देश भी महाद्वीप के प्रतिनिधित्व के लिए होने चाहिए।”

ब्रिटिश और फ्रांसीसी नेताओं के अलावा चिली और पुर्तगाल के राष्ट्रध्यक्षों ने भी भारत को UNSC में स्थायी सदस्यता देने का समर्थन UNGA की 2024 की बैठक में किया है। भारत के स्थायी सदस्य बनने का समर्थन अमेरिका और रूस भी करता आया है।

UNSC क्या है, क्यों भारत चाहता है इसकी सदस्यता?

संयुक्त राष्ट्र की कई अलग-अलग शाखाएँ हैं। UNSC भी उनमें से एक है लेकिन यह सबसे महवपूर्ण मानी जाती है। UNSC का जिम्मा विश्व में शांति और सुरक्षा बनाए रखना है। UNSC दुनिया भर में हो रही भूराजनीतिक गतिविधियों पर बड़े फैसले लेती है। इसमें 15 सदस्य होते हैं। इनमें से 5 सदस्य- अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन स्थायी सदस्य हैं। बाकी 10 सदस्यों अस्थायी तौर पर शामिल किए जाते हैं। UNSC में कोई भी निर्णय पाँचों सदस्यों की सहमति के बिना नहीं हो सकता।

UNSC के महत्व के चलते भारत इसकी सदस्यता चाहता है। चीन UNSC के भीतर भारत को घुसने नहीं देना चाहता है। चीन को लगता है कि यदि भारत UNSC का सदस्य बन गया तो एशिया में उसके दबदबे पर असर पड़ेगा। वर्तमान में UNSC में एशिया से मात्र चीन ही इसका सदस्य है। इसमें अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी महाद्वीप का कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं है।

भारत लगातार माँग करता आया है कि उसे UNSC में जगह दी जाए। भारत का कहना है कि वह वर्तमान में विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, ऐसे में उसे महत्त्वपूर्ण UNSC से बाहर रखना UN के प्रभाव को ही कम कर रहा है।

मुस्लिम लड़की हिंदू बॉयफ्रेंड से मिलने आई तो आसिफ कुरैशी की अगुवाई में कट्टरपंथियों ने मिल कर किया पथराव: देहरादून पुलिस ने भाँजी लाठियाँ, दूसरे दिन भी बाजार बंद

उत्तराखंड में गुरुवार (26 सितंबर 2024) को एक मामूली घटना ने साम्प्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। मामला तब शुरू हुआ, जब एक मुस्लिम किशोरी अपने हिंदू प्रेमी से मिलने देहरादून आ गई। इस घटना के बाद, स्थानीय मुस्लिम और हिंदू समुदायों के बीच विवाद बढ़ा और पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा।

ये मामला एक मुस्लिम नाबालिग लड़की के देहरादून आने से जुड़ा है, जिसमें वो अपने हिंदू प्रेमी से मिलने आ गई थी। इस पूरी घटना में हिंदू संगठन और मुस्लिम कट्टरपंथियों की भीड़ भिड़ गई, तो पुलिस को लाठीचार्ज भी करना पड़ा। इस दौरान अजाद समाज पार्टी के नेता आसिफ कुरैशी के नेतृत्व में आई मुस्लिम कट्टरपंथियों की भीड़ द्वारा किए गए पथराव में कई लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आ रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजय नाम का लड़का बदायूँ का रहने वाला है। लड़की भी बदायूँ की ही है। वो पहले लखनऊ गई, फिर वहाँ से देहरादून आ गई थी, जहाँ अजय उससे मिला। लेकिन वो वापस जाने को तैयार नहीं थी। अजय ने जब उसके साथ आरपीएफ चौकी को रिपोर्ट किया, तो बवाल शुरू हो गया। रिश्तेदारों और कट्टरपंथियों की भीड़ ने रेलवे स्टेशन के बाहर इकट्ठा होकर पुलिस चौकी को घेर लिया और पत्थरबाजी शुरू कर दी। इस पथराव में कई लोग घायल हो गए। हालात बिगड़ते देख, हिंदू संगठन भी मौके पर पहुँचे और विवाद और बढ़ गया। पुलिस ने स्थिति को काबू में करने के लिए लाठीचार्ज किया।

देहरादून के एसएसपी अजय सिंह और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौके पर पहुँचकर स्थिति का जायजा लेते रहे। कट्टरपंथी मुस्लिमों के आक्रामक रूख को देखते हुए अजय को जीआरपी थाने में रखा गया, तो लड़की को आरपीएफ की चौकी में। देर रात, लड़की के परिजनों के आने पर उसे उन्हें सौंप दिया गया, जबकि अजय को पुलिस सुरक्षा के बीच उसके भाई के पास भेजा गया।

बताया जा रहा है कि हिंदुओं को डर था कि कहीं मुस्लिम कट्टरपंथियों के दबाव में अजय को जेल न भेज दिया जाए, जबकि उसके लड़की को खुद ही आरपीएफ के सुपुर्द किया था। ऐसे में अजय के समर्थन में भी वहाँ पहुँच गए। हिंदू संगठनों का आरोप था कि मुस्लिम कट्टरपंथी अजय को गलत तरीके से फँसाने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अजय ने स्वेच्छा से लड़की को आरपीएफ के हवाले किया था और वह इस मामले में निर्दोष है। दूसरी ओर, मुस्लिम समुदाय के लोग इस घटना को सांप्रदायिक रंग देते हुए हिंसक हो उठे। पुलिस द्वारा मौके से पत्थर और घटनास्थल की वीडियोग्राफी कराई गई, जिन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है। पुलिस का कहना है कि मामले में जो भी दोषी पाए जाएँगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

ये पूरा विवाद गुरुवार की दोपहर से शुरू हुआ और आखिरकार रात के समय पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। वहीं, गुरुवार देर रात लड़की के परिजनों के पहुँचने पर लड़की को उनके हवाले कर दिया गया। इसके साथ ही पुलिस भारी सुरक्षा के बीच अजय को भी उसके भाई के पास छोड़ आई। अजय सिंह, दातागंज जिला बदायूँ-यूपी का रहने वाला है और सेलाकुई में नौकरी करता है। उससे मिलने आई किशोरी भी दातागंज की ही है। वह बिना बताए घर से आई थी।

इस पूरी घटना के दौरान एसएसपी अजय सिंह समेत वरीय पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। वहीं, रेलवे स्टेशन पर पत्थरबाजी की घटना की पुलिस ने वीडियोग्राफी कराई है। मौके से पुलिस ने पत्थर कब्जे में लिए हैं। इन्हें फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा जाएगा। पुलिस ने मौके से पत्थर और वीडियो फुटेज को कब्जे में लेकर थोड़े से जाँच के लिए भेज दिया है। पुलिस का कहना है कि इस मामले में उनकी ओर से केस दर्ज किया जा रहा है। मामले में जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

शुक्रवार को इस मामले ने एक नया मोड़ तब लिया, जब पुलिस ने बजरंग दल के नेता और स्थानीय व्यापारी विकास वर्मा को हिरासत में ले लिया। इसके विरोध में व्यापारियों ने पूरा बाजार बंद कर दिया और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि विकास वर्मा को जल्द से जल्द रिहा किया जाए। इस दौरान करीब 5000 हिंदुओं ने पलटन बाजार को बंद कर सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ किया और विकास वर्मा की रिहाई की माँग की।

उत्तराखंड पुलिस ने एक बयान जारी करते हुए कहा, “रेलवे स्टेशन पर हुई इस घटना में कानून और शांति व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश की गई है। इसके लिए संगीन धाराओं में केस दर्ज किया गया है, और दोषियों को चिह्नित किया जा रहा है।” पुलिस के अनुसार, पत्थरबाजी और हंगामे में 30 से 35 नामजद लोगों और 150 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

इस घटना के बाद देहरादून के कई हिस्सों में तनाव बना हुआ है। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए संवेदनशील इलाकों में भारी संख्या में जवान तैनात किए हैं। प्रशासन ने कहा है कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

डॉक्टर पर ईशनिंदा का आरोप लगा, पाकिस्तान की पुलिस ने कर दी हत्या: इस्लामी कट्टरपंथियों ने चूमे थे हाथ, अब कमिटी ने बाहर निकाला सच

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के उमरकोट में ईशनिंदा के आरोपित डॉक्टर शाहनवाज का पुलिस ने फर्जी एनकाउंटर किया था। सिंध प्रान्त की मीरपुर ख़ास पुलिस ने झूठी कहानी गढ़ कर उसे मार दिया था जिसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनको हार पहनाए थे। सिंध सरकार की कमिटी ने अब खुलासा किया है कि यह एनकाउंटर पूरी तरह से फर्जी था और इसमें DIG स्तर तक के अधिकारी शामिल थे।

सिंध प्रांत के गृह मंत्री जियाउल हसन लंजर ने गुरुवार (26 सितम्बर, 2024) को डॉक्टर शाहनवाज के एनकाउंटर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लंजर ने बताया कि उन्होंने इस मामले में पुलिस की कारस्तानी की जाँच पर एक कमिटी गठित की थी। इसकी रिपोर्ट आ गई है। लंजर ने बताया कि कमिटी ने निर्विवाद रूप से यह माना है कि यह एनकाउंटर पहले से बनाई गई योजना के अनुसार किया गया। कमिटी ने इसके लिए घटना के CCTV फुटेज और गाड़ियों की लोकेशन का पता लगाया और इस निष्कर्ष पर पहुँची।

गृह मंत्री लंजर ने कहा है कि इस संबंध में 31 पेज की रिपोर्ट कमिटी ने सौंपी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉक्टर शाहनवाज पर ईशनिंदा के आरोप लगने के बाद पुलिस ने उनकी तलाश चालू की। उमरकोट के SSP ने इस सम्बन्ध में एक टीम को कराची भेजा था। कराची के एक होटल से डॉक्टर शाहनवाज को उमरकोट पुलिस द्वारा उठाया गया और उन्हें सुरक्षा का वादा किया। हालाँकि, इसके बाद उन्हें रास्ते में ही मीरपुर ख़ास की पुलिस को सौंप दिया गया।

इसके बाद मीरपुर ख़ास पुलिस के SSP की गाड़ी में शाहनवाज को ले जाया गया। मीरपुर ख़ास की एक पुलिस यूनिट ने इसके बाद 19 सितम्बर, 2024 को डॉक्टर शाहनवाज की हत्या कर दी। पुलिस ने इसके बाद उनके एनकाउंटर का दावा किया। इसके बाद उनका पोस्टमार्टम करवाया गया। डॉक्टर शाहनवाज के शव के साथ भी रास्ते में इस्लामी कट्टरपंथियों ने बर्बरता की। उन्होंने शाहनवाज के शव को जला दिया था। हालाँकि, जिस वाहन में उनका शव ले जाया जा रहा था, उसके हिन्दू ड्राइवर ने किसी तरह उनका शव बचाया।

डॉक्टर शाहनवाज का फर्जी एनकाउंटर करने पर पुलिस के अधिकारियों के इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाथ चूमे थे और उन्हें हार पहनाए थे। अब इन सभी अधिकारियों पर सिंध की सरकार ने कार्रवाई की है। उन्हें इस मामले में निलंबित कर दिया गया है। इन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध सिंध सरकार ने FIR का आदेश दिया है।

गृह मंत्री लंजर ने कहा है कि उन्होंने इस संबंध में पीड़ित परिवार को पुलिसवालों के विरुद्ध FIR करने का मौक़ा दिया है। यदि वह FIR नहीं करते तो फिर सरकार FIR करेगी। वहीं पीड़ित परिवार के वकील ने कहा है कि वह जल्द इस संबंध में FIR करवाएँगे। पीड़ित परिवार ने इस मामले में न्यायिक जाँच की माँग की है।

बता दें कि डॉ शाहनवाज का मुद्दा 17 सितंबर से ही पाकिस्तान में गर्माया हुआ था। उनके ऊपर आरोप था कि उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के लिए अपशब्द कहे। इस आरोप के बाद उनके कुछ सोशल मीडिया पोस्ट के स्क्रीनशॉट वायरल हुए और उमरकोट के डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर अस्पताल ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। साथ ही बयान में बताया कि उन्होंने पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया है और चूँकि उनके खिलाफ उमरकोट और अन्य जगहों पर प्रदर्शन हो रहे हैं अब अस्पताल को उनकी सेवा नहीं चाहिए।

18 सितंबर को इस बाबत कई कट्टरपंथी सड़क पर आ गए। प्रेस क्लप के सामने इकट्ठा होकर डॉक्टर शहनवाज की फौरन गिरफ्तारी की माँग उठाई। मामला 295 सी के तहत दर्ज कराते हुए खुलेआम सजा-ए-मौत माँगी। इस दौरान पुलिस अधिकारियों के वाहन में भी आग लगाई गई, उनपर पथराव भी हुआ और कई सार्वजनिक और सरकारी प्रॉपर्टी तोड़ी-फोड़ी गई। पुलिस ने हालात कंट्रोल करने के लिए डॉक्टर शहनवाज को पकड़ा तो, लेकिन सजा उन्हें कानून के मुताबिक नहीं दी बल्कि उनका फर्जी एनकाउंटर कर दिया।

बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान न तो मूर्ति विसर्जन… न ही छुट्टियाँ: इस्लामी कट्टरपंथियों ने धमकी देकर कहा – ‘पंडालों पर लिखनी होंगी हिंदुस्तान विरोधी बातें’

बांग्लादेश में दुर्गा पूजा को लेकर हिंदू समुदाय के लिए इस साल हालात काफी तनावपूर्ण हैं। कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने दुर्गा पूजा के आयोजनों के खिलाफ धमकियाँ दी हैं और कहा है कि पूजा के दौरान मूर्ति विसर्जन, छुट्टियाँ और कोई भी धार्मिक कार्यक्रम नहीं होने चाहिए। इस्लामी संगठन ‘इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता’ ने सरकार से साफ तौर पर कहा है कि अगर दुर्गा पूजा के दौरान छुट्टियाँ रद्द नहीं की गईं और मूर्ति विसर्जन जैसी गतिविधियों को रोका नहीं गया, तो वे सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में इस कट्टरपंथी ग्रुप ने ढाका के सेक्टर 13 में एक मार्च निकाला, जिसमें हिंदुओं द्वारा खेल के मैदान के उपयोग का विरोध किया गया, जो सालों से उस स्थान पर दुर्गा पूजा मनाते आ रहे हैं। इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता नामक संगठन ने विरोध प्रदर्शन किया, हाथों में बांग्ला में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था, “सड़कें बंद करके कहीं भी पूजा नहीं की जाएगी, मूर्ति विसर्जन से जल को प्रदूषित नहीं किया जाएगा, मूर्तियों की पूजा नहीं की जाएगी”।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता’ की तरफ से प्रदर्शन कर रहे लोगों ने 16 सूत्रीय माँगों वाली तख्तियाँ भी पकड़ी हुई थी, जिसमें पर्यावरण को होने वाले नुकसान का हवाला देते हुए पूजा-अर्चना और मूर्ति विसर्जन के सार्वजनिक प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई है। उनकी माँगों में धार्मिक आयोजनों के लिए सड़क बंद करने और त्योहारों के खर्चों के लिए सरकारी राहत कोष के इस्तेमाल पर रोक लगाना भी शामिल है।

इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता का तर्क है कि चूँकि हिंदुओं की आबादी यहाँ दो प्रतिशत से भी कम है, इसलिए दुर्गा पूजा के लिए सार्वजनिक अवकाश नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे मुस्लिम बहुसंख्यकों का जीवन प्रभावित होता है। उनकी माँगों में “बांग्लादेश में कई विशेष भूमि पर कब्जा करके बनाए गए” मंदिरों को हटाना भी शामिल है।

यही नहीं, इस संगठन की एक और माँग भी है, जिसमें कहा गया है, “चूँकि भारत बांग्लादेश का राष्ट्रीय दुश्मन है, इसलिए बांग्लादेश के हिंदू नागरिकों को भी भारत विरोधी होना चाहिए। इसलिए पंडालों-मंदिरों में भारत विरोधी बैनर और भारत विरोधी नारे लगाए जाने चाहिए।” इन घटनाओं से हिंदू समुदाय में चिंता बढ़ रही है, जो अत्यधिक तनाव के बीच दुर्गा पूजा मनाने की तैयारी कर रहा है।

बता दें कि पिछली शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद से समुदाय पर हमलों में वृद्धि हुई है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले प्रशासन द्वारा सुरक्षा के आश्वासन के बावजूद स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। मंदिरों में तोड़फोड़ और मूर्तियों को नष्ट करने की खबरों ने विशेषकर खुलना जैसे जिलों में, जिसने चिंता को और बढ़ा दिया है।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में दुर्गा पूजा का आयोजन हर साल बड़े स्तर पर होता है, जिसमें हिंदू समुदाय पूरे उत्साह से भाग लेता है। दुर्गा पूजा हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है और बांग्लादेश में करीब 8 प्रतिशत हिंदू आबादी इसे मनाती है। लेकिन इस साल ‘इंसाफ कीमकरी छात्र-जनता’ जैसे कट्टरपंथी समूहों ने इस त्योहार के खिलाफ चेतावनी देकर हिंदू समुदाय को डर और चिंता में डाल दिया है। इन संगठनों का कहना है कि बांग्लादेश एक इस्लामी देश है और यहां गैर-इस्लामी त्योहारों को सार्वजनिक रूप से मनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

यह पहली बार नहीं है जब बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान तनाव का माहौल बना है। पिछले कुछ वर्षों में भी दुर्गा पूजा के समय हिंदू समुदाय को इस तरह की धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ा है। 2021 में दुर्गा पूजा के दौरान हिंसा की घटनाएँ सामने आई थीं, जब कट्टरपंथियों ने कई पूजा पंडालों और हिंदू मंदिरों पर हमले किए थे। इन हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की आलोचना हुई थी, और सरकार को धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की माँग की गई थी।