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प्रताड़ित करता था फिरोज आलम, दूसरी बीवी ने थाने पहुँचकर खोल दी पोल: बताया- घर में 4 बीवी… 10 से 12 औरतों को मुस्लिम बनाकर कर चुका है निकाह

झारखंड की राजधानी रांची में एक महिला ने अपने मुस्लिम शौहर पर धर्मान्तरण का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। महिला का दावा है कि उसका शौहर फ़िरोज़ आलम अब तक 10 से 12 महिलाओं को इस्लाम कबूल करवा चुका है। पीड़िता की शिकायत पर फ़िरोज़ आलम और उसकी बहनों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। शुक्रवार (28 सितंबर 2024) को दी गई शिकायत में पीड़िता ने फिरोज आलम पर जातिसूचक शब्दों से गालियाँ देने और चाकू मारने की कोशिश का भी आरोप लगाया है। पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना रांची के बरियातू स्थित सत्तार कॉलोनी की है। महिला पौलिना हेमरोन ने पुलिस स्टेशन में अपने पति फ़िरोज़ आलम के खिलाफ शिकायत दी है। पौलिना ने बताया कि उनका निकाह 1992 में फ़िरोज़ से हुआ था, तब वह फ़िरोज़ की दूसरी बीवी बनी थी। निकाह के समय फ़िरोज़ ने पौलिना को प्रेम और सम्मान देने का वादा किया था, लेकिन बाद में वह अपने वादे से मुकर गया और उसने पौलिना के साथ मारपीट शुरू कर दी।

पौलिना ने यह भी बताया कि फ़िरोज़ लगातार उस पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डालता रहा। जब उसने इनकार किया, तो उसे जातिसूचक गालियाँ दी गईं। इसी बीच, पौलिना एक बेटे की माँ बनी। बेटे के निकाह के बाद पौलिना का परिवार बढ़ा, लेकिन दुख की बात है कि कुछ समय बाद उनके बेटे का निधन हो गया। इसके बाद पौलिना ने फ़िरोज़ से जायदाद में अपनी बहू और पोतों को हिस्सा देने की माँग की, जिस पर फ़िरोज़ नाराज हो गया।

आरोप है कि 28 सितंबर को फ़िरोज़ ने अपनी बहनों शहनाज़ खातून, रहनुमा खातून और निखत परवीन के साथ मिल कर पीड़िता की पिटाई की और जान से मार डालने की धमकी दी। उसे जातिसूचक गालियाँ दी गईं और विरोध करने पर फ़िरोज़ ने चाकू से हमला करने की कोशिश की। इसके बाद पौलिना को घर से निकाल दिया गया। अपनी शिकायत में पौलिना ने फ़िरोज़ पर धर्मान्तरण का रैकेट चलाने का आरोप लगाया है, जिसमें अब तक 10 से 12 महिलाओं को इस्लाम कबूल कराया जा चुका है।

पुलिस ने फ़िरोज़ और उसकी बहनों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस मामले की जाँच और कानूनी कार्रवाई कर रही है।

31 मई को लापता हुई प्रियंका, 21 सितंबर को मिली लावारिस लाश… UP पुलिस ने एनकाउंटर के बाद सलमान, सरवर, जावेद और शहंशाह को पकड़ा: शादी को कहा तो गला घोंटकर मार डाला

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में 21 सितंबर 2024 को पुलिस ने एक अज्ञात महिला का शव लावारिस हालत में बरामद किया था। पीड़िता की पहचान प्रियंका के तौर पर हुई थी। मृतका अपने घर से 31 मई 2024 से लापता हो गई थी। जाँच में पीड़िता की हत्या के आरोपितों के तौर पर सलमान, शहंशाह, जावेद और सरवर का नाम सामने आया। मंगलवार (1 अक्टूबर) को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद सलमान, सरवर और जावेद को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया है। शहंशाह को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।

यह मामला सुल्तानपुर जिले के कादीपुर थानाक्षेत्र का है। यहाँ 1 जून 2024 को पीड़िता के दादा ने पुलिस में तहरीर दी थी। शिकायत में उन्होंने बताया था कि 31 मई को रात लगभग 10 बजे उनकी नातिन शौच के लिए घर से निकली थी पर वापस लौट कर नहीं आई। परिजनों ने प्रियंका की काफी खोजबीन की पर कुछ भी पता नहीं चल पाया। उन्होंने आशंका जताई थी कि प्रियंका कोई बहला-फुसला कर अपने साथ ले गया होगा। ऑपइंडिया के पास शिकायत की कॉपी मौजूद है।

तब पुलिस ने इस शिकायत पर FIR दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी थी। अभी पुलिस जाँच कर ही रही थी कि 21 सितंबर 2024 को सुल्तानपुर के ही थाना गोसाईगंज क्षेत्र में एक अज्ञात महिला की लाश मिली। पोस्टमार्टम से पता चला कि मृतका की हत्या गला दबा कर की गई थी। पीड़िता की पहचान प्रियंका के तौर पर हुई थी। तब पुलिस ने प्रियंका की गुमशुदगी में हत्या की धाराएँ बढ़ा कर पड़ताल शुरू की। इसी खोजबीन में पता चला कि लड़की की हत्या में सलमान, शहंशाह, सरवर और जावेद शामिल हैं।

पुलिस को जानकारी मिली कि पीड़िता और सलमान में पुराने समय से संबंध थे। एक बार सलमान प्रियंका को मुंबई भी ले जा चुका था। वापस लौटने के बाद वह फिर से सलमान के पास पहुँच गई। गोसाईंगंज में ही सलमान और प्रियंका के रुकने और खाने-पीने का इंतज़ाम सरवर, शहंशाह और जावेद ने किया। गोसाईंगंज में ही प्रियंका ने सलमान पर शादी का दबाव बनाना शुरू कर दिया। आनाकानी करने पर उसने सलमान सहित उसके तीनों साथियों को जेल भिजवाने की धमकी दी।

प्रियंका की धमकी के बाद सलमान और उसके तीनों साथियों ने उसकी हत्या की साजिश रच डाली। उन्होंने 20 सितंबर को प्रियंका की गला घोंट कर हत्या कर दी। हत्या के बाद उन्होंने लाश को गोसाईंगज थानाक्षेत्र में एक सुनसान जगह पर फेंक दिया। पुलिस आरोपितों की लताश में जुट गई। सबसे पहले शहंशाह को गिरफ्तार किया गया और बाकियों की तलाश जारी रही। 1 अक्टूबर (मंगलवार) को पुलिस को तीनों आरोपितों के अखंडनगर थानाक्षेत्र में होने की सूचना मिली।

चित्र- X/सुल्तानपुर पुलिस

सूचना पर पुलिस ने दबिश दी। तीनों आरोपितों ने पुलिस को देखते ही गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी फायरिंग में सलमान, सरवर और जावेद घायल हो गए। इन सभी को गिरफ्तार कर के अस्पताल में इलाज करवाया गया। पकड़े गए आरोपितों के पास से अवैध हथियार और कारतूस बरामद हुए हैं। पुलिस इन सभी को जल्द ही अदालत में पेश करेगी। मामले में प्रशासन की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई जारी है।

अल्तमस चला रहा ‘तोमर डेयरी’, मोहम्मद अयान के दुकान का नाम ‘रावल डेयरी’… राजधानी दिल्ली का हाल देख बिफरे BJP नेता, पूछा- हिंदुओं को क्यों दे रहे हो धोखा?

दिल्ली के पटपड़गंज इलाके में भारतीय जनता पार्टी के नेता रवींद्र सिंह नेगी उर्फ रवि नेगी का गुस्सा उन दुकानदारों पर फूटा जो मुस्लिम होकर हिंदू नाम से कारोबार कर रहे थे। उन्होंने इलाके में जाकर मुस्लिम दुकानदारों को चेतावनी दी कि अगर वो अपनी असली पहचान के साथ काम नहीं करेंगे तो काम बंद करवा दिया जाएगा।

सामने आई वीडियो में देख सकते हैं कि वो पहले पटपड़गंज के मंडावली इलाके में स्थित तोमर डेरी पर गए। वहाँ अल्तमस तोमर नाम का युवक अपनी दुकान ‘तोमर डेयरी’ नाम से दुकान खोला हुआ था। रवि नेगी ने उससे पहले उसकी पहचान पूछी। बाद में बोले,

“अगर तुम मुस्लिम हो तो तुमने दुकान पर नाम तोमर क्यों लिखा हुआ है। तुम्हारा नाम अल्तमस है, तो इसे बोर्ड पर लिखवाओ तुम हिंदू बस्ती में काम कर रहे हो। तुम्हें अपना नाम बताकर रखना चाहिए। अगर तुम ऐसा नहीं करते तो तुम्हारी दुकान बंद हो जाएगी।”

रवि ने ये भी कहा, “देखो हमारी आपसे कोई लड़ाई नहीं है और न ही आपके मजहब से है। हमारी लड़ाई इस बात से है कि आप लोग होते मुसलमान हो, लिखते तोमर हो। “

इसी तरह वह एक अन्य दुकान वाले के पास गए। दुकानदार का असली नाम मोहम्मद अयान था लेकिन वो रावल डेयरी के नाम पर दुकान चला रहा था। अयान से उन्होंने पूछा- “आप लोग हिंदुओ को क्यों धोखा दे रहे हो। क्या हमसे कोई लड़ाई है। लिखा रावल है, नाम आपका मोहम्मद अयान है।”

रवींद्र नेगी ने अपने अकॉउंट पर दुकानदारों से बातचीत की वीडियो साझा की। साथ ही लिखा- “…हिंदुओं के साथ क्यों खिलवाड़ कर रहे हैं.. पटपड़गंज विधानसभा में बिल्कुल भी इस तरह की दुकान हम नहीं चलने देंगे जो हिंदू नाम रख रहे हैं पर है मुस्लिम।”

उनकी वीडियो देखने के बाद कई लोग इसे एक अच्छा प्रयास बता रहे हैं। साथ ही उनकी तारीफ भी कर रहे हैं।

बता दें कि ये वीडियो ऐसे समय में सामने आई है जब पिछले दिनों यूपी में योगी सरकार ने आदेश दिय़ा था कि हर दुकान पर मालिक का असली नाम और पता दिखना जरूरी है। बाद में हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने भी देखा-देखी में ऐसा ऑर्डर निकाला था कि दुकानों पर मालिक का असली नाम लिखना जरूरी है।

मोसाद का एजेंट चला रहा था ईरान की खुफिया यूनिट: पूर्व राष्ट्रपति का खुलासा, बताया- 20 अन्य जासूस भी थे इजरायल के मोहरे, इन्होंने ही चुराए न्यूक्लियर दस्तावेज

ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने सीएनएन-तुर्क को दिए गए एक इंटरव्यू में बड़ा खुलासा किया है। अहमदीनेजाद ने कहा है कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरानी सीक्रेट सर्विस में ही घुसपैठ कर ली थी। मोसाद ने उस ईरानी एजेंसी के चीफ को ही अपनी तरफ मोड़ लिया था, जिसका काम इजरायल पर निगरानी का था। उन्होंने कहा, “हमने इजरायल का मुकाबला करने के लिए एक स्पेशल टीम बनाई, लेकिन उसका हेड ही मोसाद का एजेंट निकल गया।”

ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का दावा है कि मोसाद ने ईरान के कई खुफिया अधिकारियों, खासकर सीनियर अधिकारियों को अपनी तरफ कर लिया था। अहमदीनेजाद ने कहा कि करीब 20 ईरानी अधिकारी डबल एजेंट्स की भूमिका में थे, जो एक तरफ ईरान के लिए काम कर रहे थे और दूसरी तरफ इजरायल को सीक्रेट इन्फॉर्मेशन भी दे रहे थे। मोसाद के इस ऑपरेशन का टारगेट ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करना था। उन्होंने बताया कि 2021 में काउंटर यूनिट के प्रमुख की पहचान एक इजरायली जासूस के रूप में हुई थी।

मोसाद ने ईरान में बड़े सीक्रेट ऑपरेशन को दिया था अंजाम

यह पहली बार नहीं है जब इजरायल पर ईरान की जासूसी का आरोप लगा हो। 2018 में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुलासा किया था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई दस्तावेज इजरायली एजेंटों द्वारा चुरा लिए गए थे। नेतन्याहू ने एक हाई-प्रोफाइल भाषण में दस्तावेज़ों को दिखाया और दावा किया कि इससे साबित होता है कि ईरान सीक्रेट तरीके से परमाणु हथियारों का कार्यक्रम चला रहा है। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने बाद में पुष्टि की थी कि ये दस्तावेज़ तेहरान में एक सीक्रेट ऑपरेशन के दौरान कब्जे में लिए गए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, उस ऑपरेशन के दौरान मोसाद एजेंटों ने तेहरान में एक गोदाम में घुसकर कई लॉकरों को तोड़ दिया और 100,000 से अधिक गोपनीय दस्तावेज़ अपने कब्जे में ले लिए। इस ऑपरेशन में दो दर्जन से अधिक एजेंट शामिल थे और यह छह घंटे तक चला था। इन दस्तावेज़ों में ईरान के परमाणु हथियारों के विकास से जुड़ी व्यापक जानकारी थी, जिसने दुनिया भर में ईरान के परमाणु कार्यक्रम की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी थी।

चोरी गए इन दस्तावेज़ों ने अमेरिका की ईरान पर नीति को काफी हद तक प्रभावित किया था। 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका ने 2018 में उस वक्त हाथ खींच लिया था जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को नेतन्याहू ने एक सीक्रेट ब्रीफिंग दी थी। इन दस्तावेजों के खुलासे से यह दावा मजबूत हुआ कि ईरान समझौते की शर्तों का पालन नहीं कर रहा था, जिसका उद्देश्य ईरान की परमाणु आकांक्षाओं को कम करना और उसके बदले प्रतिबंधों को हटाना था।

हिज़बुल्लाह नेता की हत्या के बाद बड़े खुलासे

इजरायल द्वारा लेबनान में हिज़बुल्लाह के मुख्य नेता हसन नसरल्लाह की हत्या के बाद अहमदीनेजाद ने यह चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने ये भी कहा है कि ईरान के भीतर एक महत्वपूर्ण काउंटर इजरायल यूनिट में मोसाद का एजेंट शामिल है, जिससे लगातार इजरायल को जानकारी मिल रही है। उन्होंने कहा कि 2018 में ईरानी परमाणु दस्तावेजों की चोरी और ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की टारगेट किलिंग के लिए जिम्मेदार यही एजेंट थे।

अहमदीनेजाद ने आगे यह भी कहा कि ईरान की मोसाद विरोधी इकाई का प्रमुख 2021 में एक इजरायली जासूस के रूप में सामने आया। उन्होंने आरोप लगाया कि “इजरायल ने ईरान के भीतर जटिल ऑपरेशन किए। उन्हें जानकारी हासिल करना बहुत आसान हो गया था। ईरान में अभी भी इस पर चुप्पी साधी हुई है।” बता दें कि महमूद अहमदीनेजाद साल 2005 से 2013 तक, 2 बार ईरान के राष्ट्रपति रह चुके हैं। उन्होंने इस साल भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए मैदान में उतरने की कोशिश की थी, लेकिन उनका पर्चा ही खारिज हो गया था और वो शुरुआती राउंड में ही बाहर हो गए थे।

बता दें कि 23 सितंबर 2024 से इजरायल ने लेबनान में कई हवाई हमले किए, जिसमें हिज़बुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाया गया। इस बीच, 27 सितंबर 2024 को इजरायली सेना ने बेरूत में एक हवाई हमले के जरिए हिज़बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह को मार गिराया। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इन हमलों में 960 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 2,770 से अधिक लोग घायल हो चुके हैं। हमलों में कई हिज़बुल्लाह नेताओं की भी जान गई है।

हिज़बुल्लाह और इजरायल के बीच यह संघर्ष तब से जारी है, जब इजरायल ने गाजा पर हमला शुरू किया था। ये हमला अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा सीमा पार करके इजरायल पर किए गए हमले के बाद शुरू हुआ था, जिसमें 1200 से अधिक इजरायलियों की मौत हो गई थी। इसी हमले के बाद इजरायली पलटवार में अकेले गजा पट्टी में ही 41,600 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने चिंता जताई है कि लेबनान में इजरायली हमलों से गाजा का संघर्ष एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो सकता है। इस प्रकार, महमूद अहमदीनेजाद के बयान ईरान की खुफिया सेवाओं में विदेशी घुसपैठ और उसकी गंभीरता पर ध्यान आकर्षित करते हैं, जो ईरान की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं।

हाई कोर्ट से नहीं मिली राहत तो कर्नाटक के CM सिद्दारमैया ने चली नई चाल, पत्नी के नाम से आवंटित सभी प्लॉट वापस करने को तैयार: क्या MUDA स्कैम में कम होगी मुसीबत?

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की पत्नी बी. एम. पार्वती ने उन 14 प्लॉट्स को वापस करने का प्रस्ताव रखा है, जिन्हें लेने के मामले में सिद्दारमैया मुश्किल में फँसे हैं। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में आया है, जब कर्नाटक हाई कोर्ट ने सिद्दारमैया को इस मामले में राहत देने से इनकार कर दिया था। उनके खिलाफ जाँच के लिए राज्यपाल ने मंजूरी दी थी।

सिद्दारमैया के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला

बता दें कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के तहत एक मामला दर्ज किया है, जो मैसूरु अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) के तहत भूमि आवंटन घोटाले से जुड़ा है। आरोप है कि 2010 में सिद्दारमैया के साले मल्लिकार्जुन स्वामी ने 3.16 एकड़ जमीन को मैसूरु के बाहरी इलाके में पार्वती को उपहार में दिया था।

इसके बाद इस जमीन को 50:50 एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत 14 हाउसिंग साइट्स में बदल दिया गया था। यह एक्सचेंज प्रोग्राम भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शासनकाल में शुरू किया गया था। इन प्लॉट्स का आवंटन 2021 में किया गया था, जिससे राज्य को 56 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब पार्वती ने इन प्लॉट्स को वापस करने का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि वह परिवार की प्रतिष्ठा को धन या संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण मानती हैं। उन्होंने MUDA से इन प्लॉट्स के दस्तावेज़ रद्द करने और प्लॉट्स को वापस लेने की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करने का आग्रह किया। पार्वती ने यह भी कहा कि उन्होंने इस फैसले को बिना किसी से परामर्श किए लिया है, यहाँ तक कि अपने पति सिद्दारमैया से भी नहीं। उनका कहना था कि उनके पति का राजनीतिक करियर हमेशा नैतिकता और ईमानदारी पर आधारित रहा है और इस मामले से उनकी इमेज नहीं बिगड़नी चाहिए।

पार्वती ने पत्र लिखकर की जमीन वापसी की अपील

पार्वती ने अपने पत्र में लिखा कि उनका यह फैसला उनके पति की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। उन्होंने कहा कि उनके पति सिद्दारमैया पिछले 40 सालों से राजनीति में हैं और उन्होंने कभी किसी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं किया। उन्होंने अपने जीवन में हमेशा पारदर्शिता और ईमानदारी का पालन किया है, और इस मामले से उनके परिवार की छवि को जो नुकसान हो रहा है, उससे पार्वती मानसिक रूप से काफी परेशान हैं।

उन्होंने आगे लिखा कि उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख यह है कि उनके पति को जनता से जो सम्मान मिला है, वह उनके लिए किसी भी संपत्ति से अधिक मूल्यवान है। उनके लिए यह स्वीकार करना असहनीय है कि उनकी परिवार की प्रतिष्ठा को गलत आरोपों से धूमिल किया जा रहा है। इसीलिए, उन्होंने यह कदम उठाने का फैसला किया है।

सिद्दारमैया की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पर बयान

मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने भी इस पूरे विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि उनकी पत्नी ने बिना औपचारिक प्रक्रिया के ही प्लॉटों को लौटाने का फैसला किया है। उन्होंने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि ये सारे आरोप “झूठे” और “राजनीतिक दुर्भावना” से प्रेरित हैं। उन्होंने कहा कि वह हमेशा अन्याय के खिलाफ खड़े रहे हैं, लेकिन इस मामले से उनकी पत्नी पार्वती को जो मानसिक कष्ट हो रहा है, वह उन्हें बहुत दुखी कर रहा है।

सिद्दारमैया ने यह भी कहा कि उनकी पत्नी ने कभी भी सार्वजनिक जीवन में किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत लाभ नहीं लिया और वह हमेशा राजनीति से दूर रही हैं। इस विवाद ने उनकी पत्नी को मानसिक रूप से परेशान किया है, और इसी कारण उन्होंने यह निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री ने अपनी पत्नी के फैसले का सम्मान करते हुए कहा कि वह इस निर्णय में उनके साथ हैं और उनकी स्थिति को पूरी तरह समझते हैं।

लोकायुक्त पुलिस की शिकायत और ED की जाँच

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने यह मामला कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस की शिकायत के आधार पर दर्ज किया है। लोकायुक्त पुलिस ने सिद्दारमैया, उनकी पत्नी बी. एम. पार्वती, उनके साले मल्लिकार्जुन स्वामी और पूर्व भूमि मालिक देवराज के खिलाफ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपों के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी। यह मामला मैसूरु अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) के तहत 14 भूखंडों के आवंटन में अनियमितताओं से जुड़ा है। इन भूखंडों की कुल कीमत लगभग 56 करोड़ रुपये आँकी गई है।

ED ने इन आरोपों की जाँच के तहत मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत एक प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) दर्ज की है, जो एक प्रकार की प्राथमिकी होती है। इस जाँच में सिद्दारमैया और उनके परिवार की संपत्तियों की जब्ती भी हो सकती है, यदि अनियमितताएँ पाई जाती हैं।

भूमि आवंटन घोटाला और अन्य विधायकों के नाम

इस बीच, एक अन्य विवाद में चिक्कमगलूर जिले के कडूर और मुदिगेरे तालुकों में 10,000 एकड़ से अधिक भूमि के अवैध आवंटन का मामला सामने आया है। इस मामले की जाँच रिपोर्ट में 6 पूर्व विधायकों और 326 अधिकारियों के नाम शामिल हैं, जो इस अवैध आवंटन के लिए जिम्मेदार ठहराए गए हैं। यह भूमि आवंटन प्रक्रिया राज्य की भूमि नियमितीकरण समिति के तहत हुई थी, जिसमें भारी अनियमितताएँ पाई गईं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कडूर विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक वाई. एस. वी. दत्ता, बेल्ली प्रकाश, मुदिगेरे के पूर्व विधायक मोतम्मा, एम. पी. कुमारस्वामी, और बी. बी. निंगैया सहित कई विधायकों के नाम इस घोटाले में शामिल हैं। इसके अलावा, समिति के अध्यक्ष बी. एल. प्रकाश और अन्य 23 सदस्यों पर भी आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने अयोग्य व्यक्तियों को भूमि आवंटित की।

रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल 10,598 एकड़ भूमि में से 6,248 एकड़ भूमि अयोग्य व्यक्तियों को दी गई, और इस प्रक्रिया में कई प्रकार की अनियमितताएँ देखी गईं, जैसे बिना आवेदन के भूमि आवंटन, पात्रता की तारीख के बाद आवेदन प्राप्त करना, और फर्जी दस्तावेज़ों का उपयोग करना।

विधायकों और अधिकारियों ने खुद को बताया बेगुनाह

वाई. एस. वी. दत्ता ने इस मामले पर सफाई देते हुए कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान सभी समिति की बैठकें सार्वजनिक रूप से आयोजित की गई थीं। उन्होंने कहा कि अगर कोई अनियमितता हुई है, तो वह सरकार के निर्णय का पालन करेंगे। इसी तरह, पूर्व विधायक सी. टी. रवि ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कोई भी गलत काम नहीं किया है और हमेशा कानून का पालन किया है।

इस मामले में 326 अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं, जिनमें तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और गाँव प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन अधिकारियों ने प्रक्रियात्मक गड़बड़ियों और नियमों का उल्लंघन करके भूमि आवंटित की, और इनमें से कई मामले बिना किसी समिति की मंजूरी के हुए हैं।

‘आनंद कुमार’ बन मोहम्मद आलिम ने हिंदू महिला का किया रेप, मुस्लिम बनने का डाला दबाव: UP की अदालत ने ‘लव जेहादी’ को सुनाई उम्रकैद, विदेश फंडिंग की आशंका भी जताई

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सोमवार (30 सितंबर 2024) को लव जिहाद के एक मामले में मोहम्मद आलिम नाम के युवक को उम्रकैद की सजा सुनाई है। उस पर 1 लाख रुपए का जुर्माना भी ठोंका गया है। अपने बेटे की करतूत में सहयोगी बने आलिम के अब्बा साबिर को भी 2 साल की कैद की सजा हुई है। अपनी टिप्पणी में अदालत ने भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसी हालात पैदा करने की साजिश चलने की आशंका जताई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश (फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम) रवि कुमार दिवाकर की अदालत में हुई। लगभग सवा साल चले इस मुकदमे में अभियोजन व बचाव पक्ष दोनों ने अपने-अपने तर्क रखे व सबूत पेश किए। आखिरकार अदालत ने बचाव पक्ष की दलीलों को सन्तोषजनक नहीं पाया और आरोपित आलिम को उसके अब्बा साबिर सहित सजा सुना दी। आलिम को उम्रकैद जबकि साबिर को 2 साल की सजा मिली। आलिम पर 1 लाख रुपए का जुर्माना भी ठोंका गया है।

अपनी टिप्पणी में अदालत ने लव जिहाद को भारत में कुछ धर्म विशेष के लोगों द्वारा जनसंख्या वृद्धि का हथियार बताया। साथ ही इसे धर्मान्तरण की एक अंतरराष्ट्रीय साजिश करार दिया। अवैध मतांतरण को देश की एकता व सम्प्रभुता के लिए खतरा बताते हुए जस्टिस दिवाकर ने इसमें विदेशी फंडिंग होने की भी आशंका जाहिर की है। कोर्ट ने यह भी माना कि अगर भारत में इस हरकत पर अंकुश नहीं लगा तो आने वाले भविष्य में गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

क्या था पूरा मामला

बताते चलें कि बरेली जिले का यह पूरा मामला साल 2022 का है। तब आलिम ने खुद को आनंद बताते हुए हिन्दू लड़की से दोस्ती की थी। वह हाथ में कलावा बाँधता था और मंदिर भी जाता था। पीड़िता कम्प्यूटर की कोचिंग करने जाती थी जहाँ आलिम उसका पीछा करता था। 13 मार्च 2022 को आलिम ने एक मंदिर में पीड़िता की माँग भरी। इसके बाद उसने लड़की से कई बार रेप किया। जब पीड़िता गर्भवती हो गई तब उसने आलिम पर शादी का दबाव बनाया। आलिम मुकरने लगा और उसने पीड़िता का गर्भपात करवा दिया।

मई 2023 में पीड़िता आलिम के घर पहुँच गई। यहाँ उसे आलिम के मुस्लिम होने की जानकारी मिली। जब उसने आलिम के परिजनों को सारी करतूत बताई तो उन्होंने पीड़िता की ही पिटाई शुरू कर दी। पिटाई के साथ आलिम के अब्बा साबिर ने निकाह के लिए पीड़िता को इस्लाम कबूल करने का विकल्प दिया। लड़की ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने केस दर्ज कर आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था। कुछ ही दिनों में कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी गई थी।

बांग्लादेश से भारत में घुसा पाकिस्तान का ‘सिद्दीकी परिवार’, बेंगलुरु में ‘शर्मा परिवार’ बनकर रहने लगा: 10 साल बाद घर की दीवारों से खुला राज, सारे हुए गिरफ्तार

पिछले 10 साल से भारत में फर्जी पहचान के साथ रहने वाले 4 पाकिस्तानियों को 30 सितंबर को गिरफ्तार किया गया है। इनके असली नाम राशिद अली सिद्दीकी (47), आयशा (38), हानिफ मोहम्मद (73) और रुबीना (61) है। ये लोग राजपुरा गाँव में शंकर शर्मा, आशा रानी, राम बाबू शर्मा और रानी शर्मा नाम से रह रहे थे।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने खुफिया इनपुट्स के आधार पर इन्हें चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया है। ये लोग ढाका से चन्नई एयरपोर्ट पर उतरे थे। जाँच के दौरान आव्रजन अधिकारियों ने इन्हें इनके फर्जी पासपोर्टों के साथ गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में पहले इन्होंने बताया कि ये लोग शर्मा परिवार है और बेंगलुरु में 2018 से रह रहे हैं। इनके पास जो पहचान पत्र मिले उनमें भी हिंदू नाम दिखे। हालाँकि जब पुलिस छानबीन के लिए इनके घर गई तो इनके घर की दीवार पर बड़ा-बड़ा ‘मेहदी फाउंडेशन इंटरनेशनल जश्न-ए-युनूस’ लिखा था।

जब सिद्दीकी से सख्ती से पूछताछ हुई तो उसने मान लिया कि वो पाकिस्तानी है और कराची के लियायकतबाद के निवासी है। वहीं उसकी बीवी और उसका परिवार लाहौर का है। उसने बताया कि उसका निकाह आयशा से साल 2011 में ऑनलाइन हुआ था जब वो अपने माता पिता के साथ बांग्लादेश में रहती थी। बाद में राशिद को भी बांग्लादेश आना पड़ा क्योंकि पाकिस्तान मे उसका विरोध होने लगा था।

बांग्लादेश में उसने मेहदी फाउंडेशन में उलेमा का काम शुरू किया। जहाँ संस्था ही उसका सारा खर्चा उठाती थी। बाद में 2014 में भी सिद्दीकी पर हमला हुआ और तब उसे किसी परवेज नाम के शख्स ने भारत में अवैध रूप से एंट्री करा दी।

सिद्दीकी अपनी बीवी और उसके परिवार व रिश्तेदारों समेत बांग्लादेश से भारत पश्चिम बंगाल के मालदा को क्रॉस करके पहुँचा। कुछ दिन वह दिल्ली में रहे, फिर सिद्दीकी 2018 में जब नेपाल गया तो वहाँ मुलाकात वाशिम और अल्ताफ से हुई। उसके बाद पूरा परिवार बेंगलुरु चला गया। यहाँ सिद्धीकी को मेहदी फाउंडेशन की ओर से उलेमा बनने को कहा गया। उसने ऑफर स्वीकार लिया और आलरा टीवी पर दिखने लगा। वो शो बनाता और उसके किराए का सारा खर्चा अल्ताफ उठाता।

हकीकत खुलने के बाद पुलिस ने इन चारों की गिरफ्तारी कर ली है। मले को आईपीसी की धारा 420, 468, 471 के तहत और पासपोर्ट एक्ट की सुसंगत धाराओं के तहत दर्ज किया है।

मक्का-मदीना भेजने के नाम पर 189 मुस्लिमों से ठगी, दिल्ली से मुंबई तक फैला जाल: ओडिशा पुलिस ने नबील शेख को दबोचा

ओडिशा पुलिस ने हज यात्रा के नाम पर ठगी करने वाले एक ट्रेवेल एजेंट को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपित का नाम नबील अब्दुल मुबीन शेख है। शुक्रवार (27 सितंबर 2024) को पुलिस ने शेख को मुंबई से दबोचा है। वह अब तक 189 लोगों को चूना लगा चुका है। ठगी और जालसाजी के शिकार ये तमाम पीड़ित मुस्लिम समुदाय से हैं और भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। पकड़े गए मुबीन शेख से पूछताछ की जा रही है और उसके बाकी नेटवर्क का पता लगाया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला ओडिशा के बालासोर जिले का है। यहाँ ओडिशा पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को नबील अब्दुल मुबीन शेख नाम के व्यक्ति द्वारा धोखाधड़ी की कई शिकायतें मिलीं। ये शिकायतें भद्रक, बारीपदा और बालासोर आदि जिलों के उन मुस्लिमों की थी, जिनको हज और उमराह करवाने के नाम पर ठग लिया गया था। साल 2019 से 2023 के बीच प्रत्येक यात्री से लगभग 96000 रुपए लिए गए थे। शिकायत में ठगी की कुल रकम लगभग 1 करोड़ 20 लाख रुपयों के आसपास बताई गई।

पुलिस के मुताबिक, नबील शेख ‘अल आदम टूर एन्ड ट्रेवेल्स’ नाम की कम्पनी चलाता है। ट्रेवेल्स के इस धंधे में उसके अब्बा फिरदौस बी और बहन साइमा अंजुम भी शामिल हैं। ओडिशा का नबील शेख मुंबई के कुर्ला इलाके की अल इजमा टूर एन्ड ट्रेवेल्स के सहयोग से लोगों को हज यात्रा करवाने का झाँसा देता था। मुंबई की कम्पनी के मालिक का नाम मोहम्मद बिस्मिल्लाह शेख है। इन दोनों ने कंपनियों ने मिल कर कुल 189 लोगों के पैसे ले लिए पर उनको हज पर नहीं ले गया।

हज यात्रा न जाने पर नाराज मुस्लिमों ने नबील से अपने पैसे वापस माँगे। पहले तो नबील शेख ने आनाकानी की लेकिन बाद में उसने अधिकतर लोगों को चेक काट कर दे दिए। बैंक में जाने के बाद ये तमाम चेक बाउंस हो गए थे। आखिरकार खुद को ठगा पा कर पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू की तो पता चला कि नबील शेख द्वारा पीड़ित लोग सिर्फ ओडिशा नहीं बल्कि महाराष्ट्र, दिल्ली व अन्य प्रदेशों में भी हैं।

अपने खिलाफ केस दर्ज होने की जानकारी मिलते ही नबील शेख ओडिशा छोड़ कर भाग निकला। पुलिस ने उसकी खोजबीन शुरू की तो लोकेशन मुंबई में मिली। शुक्रवार को ओडिशा पुलिस ने मुंबई में दबिश दी, जिसमें नबील शेख गिरफ्तार कर लिया गया। नबील शेख पर जालसाजी और धोखाधड़ी सहित कई अन्य धाराओं में कार्रवाई की गई है। पुलिस जाँच पड़ताल के दौरान उसके बाकी नेटवर्क को भी खंगालने में जुटी हुई है।

मुबारक हो बिहार! ‘कमाई’ का सीजन आ गया है…

बिहार में बाढ़ की यह तस्वीर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) ने बनाई है। ऐसी तस्वीर आपको देश के दूसरे हिस्से से भी समय-समय पर देखने को मिलती होंगी। लेकिन बिहार और बाढ़ की कहानी उनसे काफी अलग है। जो बाढ़ देश के दूसरों हिस्सों के लिए ‘विपदा’ है, वह बिहार में एक वर्ग के लिए ‘कमाई का सीजन’ है। जो बाढ़ प्राकृतिक ‘आपदा’ है, बिहार में वह उस ‘कुकर्म की उपज’ है, जिसमें बिहारी नदी-नाले सब खा गए, भले सरकारी नक्शों में वे नदी-नाले आज भी जीवित हैं।

मुझे बिहार से घृणा करने वाला शख्स बताकर आप यह दलील दे सकते हैं कि इस बार सूखे बिहार में जो सैलाब आया है, वह अलग है। कोशी में इस बार 56 साल का सबसे अधिक पानी आया है। गंडक में 21 साल का सबसे अधिक पानी आया है। पर यदि यह जल प्रलय इतना ही असामान्य होता तो भला मुख्यमंत्री अपने राज्य को छोड़कर दिल्ली यात्रा पर क्यों निकल जाता? वैसे भी यह यात्रा तब हुई जब मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में तस्वीर/वीडियो नदियों के तटबंध तोड़ने, घरों-नगरों में बाढ़ के पानी घुसने, लोगों के बेघर होने से भरे पड़े थे। इस स्थिति से लड़ने की सत्ताधारी दल की ‘गंभीरता’ इतनी अधिक क्यों थी कि दिल्ली यात्रा में पार्टी के नंबर 2 को ही मुख्यमंत्री का बगलगीर बनना पड़ा?

जाहिर सी बात है जिन पर इस स्थिति को सँभालने, राहत-बचाव कार्यों का जिम्मा है, उनके लिए यह सलाने जलसे से अधिक कुछ नहीं है। सलाने जलसे से अधिक तो यह उन पीड़ितों के लिए भी नहीं है, जिनका बाढ़ सब कुछ छीन ले जाती है और वे इस आसरे में किसी ऊँचाई की जगह पर बैठे होते हैं कि कब सरकारी तिरपाल और चूड़ा आएगा। यदि ऐसा नहीं होता तो बिहार में जाति की जगह वोट इस बात पर पड़ते कि बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान कौन सा राजनीतिक दल लाएगा। दुर्भाग्य से बिहार में यह विमर्श का मुद्दा न कभी था। न है। न कभी बनने की उम्मीद दिखती है।

यह उस राज्य का हाल है जो अपनी राजनीतिक चेतना पर इठलाता है। राजनीतिक चेतना के इसी खोखले दंभ के कारण बिहार में बाढ़ सामान्य सी बात हो चली है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार राज्य की सभी नदियाँ उफान मार रही हैं। गंडक, बागमती, कोसी, कमला, धारधा, गंगा, फुल्हर जैसी नदियाँ खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। 16 जिलों में हालात बदतर बताए जा रहे हैं। 6 तटबंधों के अब तक टूटने की खबर है।

बाढ़ बिहार के लिए नया नहीं है। मौजूदा बिहार का करीब 76 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जिस पर हर साल बाढ़ का खतरा बना रहता है। नेपाल से आने वाले पानी को इसका जिम्मेदार बताया जाता है। बाढ़ के पानी को रोकने के लिए बिहार में तटबंध बनाने का सिलसिला भी करीब 70 साल पुराना है। 1954 में पहली बार तटबंध बना था। उस समय के बिहार में 160 किलोमीटर इलाके में तटबंध थे जो आज बढ़कर 3790 किलोमीटर हो चुका है।

लेकिन साल दर साल तबाही भी बढ़ती जा रही है। वजह व्यवस्था की वह मानसिकता जो उन्हें इतना खाने को प्रोत्साहित करती है ताकि उनकी सात पुश्तों का इंतजाम हो सके। बाढ़ इस व्यवस्था की इस लालसा को पूर्ण करने का वह मार्ग है, जिसका भ्रष्टाचार पानी का सैलाब अपने साथ बहा ले जाता है।

बिहार में सालों से तटबंध ही नहीं बन रहे। हर साल उनकी मजबूती बढ़ाने पर भारी-भरकम बजट खर्च होता है। लेकिन ये तटबंध हर बार टूटते हैं। कभी-कभार तो चूहे भी इनकी मजबूती को खोखला कर देते हैं और बाढ़ का पानी गाँव के गाँव बहाकर ले जाता है। जब गाँव उजड़ते है, घर बहते हैं तो बचाव के नाम पर तिरपाल से लेकर चूड़ा वितरण तक के कमाई के दूसरे कई मार्ग भी खुल जाते हैं। सरकारी कागजों में वितरण के नाम पर जो कुछ दर्ज होता है, बाढ़ का पानी उतरने के बाद उसकी प्रमाणिकता की पुष्टि करने का कोई तंत्र नहीं है। इसलिए व्यवस्था को बाढ़ की प्रतीक्षा रहती है।

चंद दिनों की प्रतीक्षा करिए। आज जो बिहार के बाढ़ पर शोर, चिंता, विलाप दिख रहा, वह बाढ़ का पानी उतरते ही विलुप्त हो जाएगा। पलायन करने के लिए बिहारियों की एक नई खेप तैयार हो जाएगी। पंजाब के खेत से लेकर गुजरात के कल-कारखाने तक नए कामगारों से लहलहा जाएँगे। जिस बाढ़ से व्यवस्था को इतना ‘फायदा’ हो उसका स्थायी समाधान तलाशने की भला फिक्र कौन करे? वैसे भी इस देश में बिहारियों की जान बहुत ही सस्ती है।

भगवान को राजनीति से दूर रखिए: तिरुपति के बीफ वाले लड्डू पर सुप्रीम कोर्ट, कहा- मिलावट के पुख्ता सबूत नहीं; CM से पूछा- चल रही थी SIT जाँच तो प्रेस में क्यों गए

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (30 सितंबर 2024) को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को तिरुमाला तिरुपति मंदिर में लड्डू बनाने के लिए मिलावटी घी के इस्तेमाल का दावा सार्वजनिक रूप से करने के लिए कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि ‘हम उम्मीद करते हैं कि भगवान को राजनीति में नहीं लाया जाएगा।’ यह मामला तिरुपति के प्रसिद्ध मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के प्रसाद के रूप में दी जाने वाली लड्डूओं में मिलावटी घी के उपयोग से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट में बी.आर. गवई और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि जब इस मामले की जाँच चल रही थी, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह का सार्वजनिक बयान देना कितना उचित था। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जब संवेदनशील मुद्दे की जाँच जारी हो, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे सावधानी बरतें और इस प्रकार के बयान देने से बचें, जिससे लोगों की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष तौर पर कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं है कि जिस घी का उपयोग लड्डू बनाने में किया गया था, वह मिलावटी था। कोर्ट ने यह भी बताया कि लैब रिपोर्ट, जिसमें घी के नमूने जाँच के लिए भेजे गए थे, में दिखाया गया कि रिजेक्ट किए गए घी के सैंपल ही जाँच के लिए दिए गए थे। इस संबंध में कोर्ट ने पूछा कि जब मामले की जाँच चल रही थी, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले को सार्वजनिक रूप से उठाने की क्या जरूरत थी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने की तीखी टिप्पणी

जस्टिस गवई और जस्टिस विश्वनाथन की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह याचिका धार्मिक विश्वासों से जुड़ी है, जो पूरे विश्व में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री ने दावा किया था कि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान तिरुपति लड्डू बनाने के लिए पशु वसा का उपयोग किया गया था। हालाँकि, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने इस दावे का खंडन किया और कहा कि ऐसा मिलावटी घी कभी भी लड्डू बनाने में इस्तेमाल नहीं किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि मुख्यमंत्री नायडू द्वारा बयान 18 सितंबर को सार्वजनिक किया गया, जबकि इस मामले में प्राथमिकी (FIR) 25 सितंबर को दर्ज की गई और विशेष जाँच टीम (SIT) का गठन किया गया। इसका मतलब यह हुआ कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से दिया गया बयान जाँच शुरू होने से पहले का था। कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया कि जाँच जारी होने के दौरान उच्च संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को इस प्रकार का बयान देने की आवश्यकता क्यों थी।

लड्डू बनाने में इस्तेमाल किए गए घी पर उठे सवाल

इस मामले में टीटीडी की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट को बताया कि जून और 4 जुलाई तक जिस घी की आपूर्ति की गई थी, उसे जाँच के लिए नहीं भेजा गया था। बल्कि 6 और 12 जुलाई को प्राप्त घी के टैंकरों से नमूने एनडीडीबी (राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) को भेजे गए थे और इन नमूनों में मिलावट पाई गई। उन्होंने यह भी बताया कि जून और 4 जुलाई तक आपूर्ति किया गया घी तिरुपति लड्डू बनाने के लिए उपयोग किया गया था।

कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जब आपने जाँच शुरू कर दी थी और एसआईटी का गठन कर लिया था, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले को सार्वजनिक करने की क्या आवश्यकता थी? जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, “लैब रिपोर्ट में कुछ अस्वीकार किए गए तथ्य हैं, जो यह संकेत देते हैं कि अस्वीकार किए गए घी के नमूने ही परीक्षण के लिए भेजे गए थे। जब आपने स्वयं जाँच का आदेश दिया, तो प्रेस में जाने की क्या जरूरत थी?” जस्टिस गवई ने भी यही सवाल उठाया और कहा, “जब आपने एसआईटी द्वारा जाँच का आदेश दिया है, तो प्रेस में जाने की क्या जरूरत थी? जब आप संवैधानिक पद पर होते हैं, तो हम उम्मीद करते हैं कि भगवान को राजनीति से दूर रखा जाएगा।”

वकील की दलीलें और कोर्ट के सवाल

कोर्ट ने टीटीडी के वकील सिद्धार्थ लूथरा से यह स्पष्ट करने के लिए कहा कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के अधिकारियों ने यह बयान क्यों दिया था कि मिलावटी घी का उपयोग कभी नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा लाखों भक्तों की भावनाओं से जुड़ा है, और इस प्रकार की बातें सार्वजनिक रूप से करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि जिस घी का उपयोग लड्डू बनाने में किया गया था, वह मिलावटी था। जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, “लैब टेस्टिंग तो रूटीन प्रक्रिया के तहत होती है, ताकि खराब घी के खेप को लौटाया जा सके। अभी तक यह साफ नहीं है कि जिस घी का नमूना लिया गया था, वह वास्तव में लड्डू बनाने में इस्तेमाल हुआ था या नहीं।”

टीटीडी के वकील सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि टीटीडी द्वारा घी के नमूने की जाँच के बाद यह पाया गया कि उसमें मिलावट थी। हालाँकि जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि यह साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि यह घी लड्डू बनाने में इस्तेमाल किया गया था।

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका और अन्य याचिकाएँ

इस विवाद पर सुनवाई के दौरान भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से सीनियर एडवोकेट राजशेखर राव ने दलील दी कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया बयान तथ्यात्मक रूप से गलत था और इसका खंडन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के कार्यकारी अधिकारी ने किया था। उन्होंने तर्क दिया कि जब इस प्रकार के बयान बिना उचित प्रमाण के दिए जाते हैं, तो इसका व्यापक प्रभाव होता है और यह सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ सकता है। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री ने बिना किसी ठोस प्रमाण के यह दावा किया कि लड्डू बनाने के लिए मिलावटी घी का उपयोग किया गया था। इस प्रकार का बयान, जब किसी संवैधानिक पदधारी द्वारा दिया जाता है, तो यह न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, बल्कि यह जाँच प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।”

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका में माँग की गई थी कि इस मामले की जाँच के लिए एक स्वतंत्र जाँच समिति गठित की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री नायडू का बयान टीटीडी के कार्यकारी अधिकारी के बयान से विरोधाभासी था और इस प्रकार की बयानबाजी से जाँच प्रभावित हो सकती है।

इसके अलावा चार अन्य याचिकाएँ भी दायर की गई थीं, जिनमें से एक टीटीडी के पूर्व चेयरमैन वाई.वी. सुब्बा रेड्डी द्वारा और अन्य याचिकाएँ इतिहासकार विक्रम संपथ, वैदिक प्रवक्ता दुश्यंत श्रीधर और न्यूज एंकर सुरेश चव्हाणके द्वारा दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में भी कोर्ट की निगरानी में जाँच की माँग की गई थी और यह सुनिश्चित करने की माँग की गई थी कि हिंदू धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप न हो।

सुनवाई के अंत में कोर्ट ने कहा कि जब मुख्यमंत्री ने इस प्रकार का बयान दिया, तो जाँच प्रक्रिया पहले से ही जारी थी और यह उचित नहीं था कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करें कि क्या राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी को जाँच जारी रखने दी जानी चाहिए या फिर इस मामले की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए। अगली सुनवाई 3 अक्टूबर को निर्धारित की गई है, जिसमें इस मामले पर और विस्तृत चर्चा की जाएगी।

गौरतलब है कि तिरुपति लड्डू विवाद एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करता है, बल्कि इस पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुख्यमंत्री नायडू की बयानबाजी की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर बयान देते समय सावधानी बरतनी चाहिए।