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हिन्दू मंदिर में घुसा यासीन, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी, हिन्दुओं ने पकड़ा: अम्मी बोली- मेरा बेटा दिमाग से कमजोर, बांग्लादेश का मामला

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से हिन्दुओं पर अत्याचार जारी हैं। बांग्लादेश के मैमेनसिंह जिले दुर्गा पूजा से कुछ दिन पहले ही एक इस्लामी कट्टरपंथी ने हिन्दू देवी दुर्गा समेत कई मूर्ति क्षतिग्रस्त कर दीं। उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों में तोड़फोड़ करने वाले इस कट्टरपंथी का नाम यासीन मिया है। यासीन की उम्र 22 वर्ष है और पुलिस ने उसको तलाश कर उसे गुरुवार (26 सितम्बर) को गिरफ्तार कर लिया है। उसने जिन मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किया है, वह अभी तैयार नहीं की जा सकीं थी।

यासीन मिया बुधवार (25 सितम्बर, 2024) को मैमेनसिंह जिले के गौरीपुर शहर में बने एक मंदिर में घुस गया और पिछले लगभग 20 दिनों से तैयार की जा रहीं हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों में तोड़फोड़ करना चालू कर दिया। उसने मूर्तियों को उठा कर ले जाने की कोशिश की। इसी दौरान उस पर डॉली नाम की एक हिन्दू महिला की नजर पड़ गई।

हिन्दू महिला ने यासीन को देख कर शोर मचाया, इसी दौरान आसपास मौजूद दो स्थानीय हिन्दू युवक आ गए और यासीन को पकड़ लिया। इसके बाद हिन्दुओं ने मौके पर पुलिस को बुला लिया। यासीन को पुलिस को सौंप दिया गया है। यासीन ने यह तोड़फोड़ गौरीपुर के गोबिन्दाज्यू मंदिर में की।

यासीन ने जिन मूर्तियों में तोड़फोड़ की है वह लगभग तैयार हो चुकीं थी और उन्हें 9 अक्टूबर, 2024 से चालू होने वाली दुर्गा पूजा में इस्तेमाल किया जाना था। इन मूर्तियों को केवल रंगना ही बाकी रह गया था। यासीन की तोड़फोड़ के कारण पूजा में बड़ा व्यवधान पड़ गया है।

यासीन को पुलिस गिरफ्तार करके उससे पूछताछ कर रही है। वह भी मैमेनसिंह जिला का ही रहने वाला है। उसकी अम्मी ने दावा किया है कि यासीन मानसिक रूप से विक्षिप्त है। पुलिस ने उसके खिलाफ हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए मुकदमा भी दर्ज कर लिया है।

इस मामले पर बात करते हुए बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद (गौरीपुर उपजिला) के अध्यक्ष ने कहा, “सभी मूर्तियाँ लगभग टूट गई हैं। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों किया गया। मैंने अपने जीवन में ऐसी घटना पहले कभी नहीं देखी।”

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमला

शेख हसीना को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के पद से हटाए जाने के बाद से हिंदू मंदिरों, दुकानों और व्यवसायों पर कम से कम 205 हमले हो चुके हैं। ऑपइंडिया ने इससे पहले बताया था कि कैसे खुलना शहर के सोनाडांगा क्षेत्र में ‘ईशनिंदा’ के आरोप में उत्सव मंडल नामक एक हिंदू लड़के को मुस्लिम भीड़ ने पीट-पीटकर लगभग मार डाला था।

हमने यह भी बताया था कि कैसे मुस्लिम छात्रों ने 60 हिंदू शिक्षकों, प्रोफेसरों और सरकारी अधिकारियों को अपने पदों से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित बांग्लादेशी ब्लॉगर, असद नूर ने हाल ही में खुलासा किया है कि अल्पसंख्यक समुदाय को अब ‘जमात-ए-इस्लामी’ में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। 6 सितंबर को, बांग्लादेश के चटगाँव शहर के कदम मुबारक इलाके में भगवान गणेश की मूर्ति ले जा रहे हिंदू भक्तों के जुलूस पर हमला किया गया था।

‘मेरे अब्बू कलेक्टर के साथ उठते-बैठते हैं’: उदयपुर के कॉलेज में महिला प्रोफेसर को धमका रहा था MBA का छात्र मोहम्मद कैफ, क्लास में थूक कर निकला

राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के MBA कॉलेज का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें मोहम्मद कैफ नाम का एक छात्र महिला प्रोफेसर को धमकी दे रहा है। प्रोफेसर को धमकाते हुए उसने कहा कि उसके अब्बू कलेक्टर के साथ उठते-बैठते हैं और वो चाहे तो ऐसे चार कॉलेज बना सकते हैं। इसके बाद वह प्रोफेसर को धमकाते हुए क्लास में थूक कर चला गया।

दरअसल, मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के FMM कॉलेज में MBA फर्स्ट ईयर के फर्स्ट सेमेस्टर की क्लास चल रही थी। महिला प्रोफेसर सोनू नागौरी क्लास में पढ़ा रही थीं। इसी दौरान मोहम्मद कैफ नाम का छात्र करीब 40 मिनट लेट से क्लास में घुस आया। उसने क्लास में घुसने के लिए प्रोफेसर से अनुमति भी नहीं ली। देर से आने पर महिला प्रोफेसर ने मोहम्मद कैफ को टोका तो वह भड़क गया।

वह प्रोफेसर के पास जाकर उनसे बहस करने लगा। बहस के दौरान उसने महिला प्रोफेसर को धमकी भी दी। उसने कहा, “मेरे पिता चाहें तो ऐसे चार कॉलेज और बना सकते हैं। मेरे पिता कलेक्टर के साथ उठते-बैठते हैं। पैसों या किसी चीज की कोई कमी नहीं है। यहाँ पढ़कर मैं 20-25 हजार की नौकरी करूँगा क्या?” प्रोफेसर ने बदतमीजी करने से मना किया तो वह क्लास में थूक कर चला गया।

क्लास में बैठे एक छात्र ने इसका विडियो बना लिया और सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। प्रोफेसर सोनू नागौरी ने घटना की शिकायत कॉलेज की डायरेक्टर डॉक्टर मीरा माथुर से की। इसके बाद मीरा ने मोहम्मद कैफ को निलंबित करते हुए उसके खिलाफ प्रतापनगर थाने में रिपोर्ट दी है। पुलिस का कहना है कि जाँच कमिटी की रिपोर्ट मिलने के बाद आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

वहीं, एबीवीपी के महानगर मंत्री पुष्पेन्द्र सिंह ने पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर यूनिवर्सिटी के कुलपति से मुलाकात की और उनसे मोहम्मद कैफ को तुरंत निष्कासित करने की माँग की है। मामले की जाँच के लिए प्रोफेसर एसवीएस भानावत, प्रोफेसर हनुमान प्रसाद, डॉक्टर राजश्री चौधरी और डॉक्टर गरिमा मिश्रा की सदस्यता में एक कमेटी बनाई गई है। यह कमिटी सात दिन में रिपोर्ट देगी।

देश के 25 हाई कोर्ट में 749 जज, लेकिन संपत्ति का ब्यौरा केवल 98 का मौजूद: RTI पर जवाब- हमें इसमें नहीं दिखता कोई ‘जनहित’

मोदी सरकार 2.0 के अंतिम दिनों में देश के सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति का ब्यौरा अनिवार्य रूप से सार्वजनिक करने को लेकर नियम बनाने की बात कही गई थी। इस संबंध में दिवंगत राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति को सरकार ने फरवरी, 2024 में नियम बनाने की जानकारी दी थी।

देश में वर्तमान में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों का अपनी संपत्ति का ब्यौरा जनता के सामने रखना अनिवार्य नहीं है। इसी कड़ी में एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में हाई कोर्ट के लगभग 87% जजों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। देश के सुप्रीम कोर्ट के जजों का संपत्ति का ब्यौरा भी सार्वजनिक नहीं है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर भी यह जानकारी दी गई थी कि यहाँ सेवाएँ देने वाले 27 जजों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इन जजों के नाम बताए थे लेकिन संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक पटल पर नहीं रखा गया था।

क्या बताती है रिपोर्ट?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में देश के अलग-अलग 25 हाई कोर्ट में 749 जज सेवाएँ दे रहे हैं। इनमें से मात्र 98 की संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक तौर पर मौजूद है। इन 98 जजों की संपत्ति का ब्यौरा उन हाई कोर्ट की वेबसाइट पर डाला गया है जहाँ यह वर्तमान में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली हाई कोर्ट के 39 में से 11, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के 55 में से 31, हिमाचल प्रदेश के 12 में से 10 और केरल के 39 में से 37 जजों की अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक पटल पर रखा गया है। इनके अलावा मद्रास हाई कोर्ट के 62 में से 5, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 17 में से 2 और कर्नाटक हाई कोर्ट के 50 में से 2 जजों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक किया गया है।

रिपोर्ट बताती है कि देश के बाकी 18 हाई कोर्ट के एक भी जज की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसमें जजों की सबसे बड़ी संख्या वाले इलाहाबाद और बॉम्बे हाई कोर्ट भी शामिल हैं। रिपोर्ट का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि किसी भी हाई कोर्ट के 100% जजों की संपत्ति सार्वजनिक नहीं की गई है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति का का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं है, उन्हें RTI भी भेजी गई है। RTI के जवाब में अधिकांश हाई कोर्ट ने जजों की संपत्ति का खुलासा ना करने को लकर अलग-अलग कारण बताए हैं।

जहाँ बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि वह RTI की परिभाषा के तहत नहीं आता तो वहीं उत्तराखंड हाई कोर्ट ने जजों की संपत्ति का ब्यौरा RTI के तहत लाने पर ऐतराज जताया है। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने कहा है कि उसे जजों की संपत्ति घोषित करने में कोई ‘जनहित’ नहीं दिखाई पड़ता। अन्य हाई कोर्ट ने भी कमोबेश ऐसे ही जवाब दिए हैं।

जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने को लेकर अभी क्या नियम?

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट बताती है कि उसकी एक फुल बेंच ने यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया था कि प्रत्येक जज को अपनी संपत्ति का ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को देना होगा। इसके अलावा उन्हें किसी बड़ी खरीद-फरोख्त का ब्यौरा भी देना होगा। हालाँकि, यह जानकारी वेबसाइट पर डाल कर सार्वजनिक करना उनकी मर्जी की बात होगी।

जिस निर्णय की सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर बात की गई है, वह वर्ष 1997 में लिया गया था। इस दौरान कहा गया था कि जजों को अपने घरों और बाकी संपत्तियों की जानकारी चीफ जस्टिस को देनी होगी। इसमें उनके पति/पत्नी और उन पर आश्रित लोगों की संपत्ति का ब्यौरा भी होता।

संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर अपलोड कर उसे सार्वजनिक करने को लेकर 2009 में सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच ने एक और निर्णय लिया था। कहा गया था कि सभी जज अपनी संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर डालेंगे, लेकिन कहा गया था कि यह जजों की स्वेच्छा पर निर्भर होगा।

केंद्र सरकार ने उठाए हैं कदम

भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने को लेकर अभी कोई कानून नहीं है। यह पूरी तरह से जज पर निर्भर है कि वह अपनी संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर अपलोड करें। इस संबंध में केंद्र सरकार कानून बनाने को लेकर कदम बढ़ा चुकी है।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के अंतिम दिनों में कानून मंत्रालय ने राज्यसभा की एक कमिटी को यह जानकारी दी थी कि वह जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने सबंधित नियम बना रही है। यह जवाब इस कमिटी की रिपोर्ट पर दिया गया था। कमिटी ने अगस्त, 2023 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

30 सदस्यों वाली इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया था कि आखिर नेता और अफसर ही क्यों बल्कि जजों को भी अपनी संपत्ति जनता के सामने रखनी चाहिए। कमिटी का कहना था कि इससे जनता का व्यवस्था पर विश्वास बढ़ाने में सहायता मिलेगी।

यह जानकारी भी सामने आई है कि केंद्र सरकार संपत्ति सार्वजनिक करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट से सलाह मशविरा कर रही है। अभी तक इस संबंध में कोई नियम सामने नहीं आए हैं। केंद्र सरकार अब आगे इस पर क्या एक्शन लेती है और न्यायपालिका का इस पर क्या रुख होता है, यह देखने वाला होगा।

हाई कोर्ट जजों पर लगे हैं भ्रष्टाचार के आरोप

देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की संपत्ति के सार्वजनिक किए जाने की माँग लम्बे समय से उठती रही है। तर्क दिया जाता रहा है कि जज भी एक सार्वजनिक पद है और ऐसे में उसकी शुचिता अनिवार्य है। पूर्व में भी हाई कोर्ट के जजों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगते आए हैं।

2008 के ऐसे ही एक मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की पूर्व जज निर्मला यादव पर ₹15 लाख कि रिश्वत लेने के आरोप लगे थे। या ₹15 लाख की रिश्वत एक जमीनी विवाद में फैसला दिए जाने को लेकर लगाए गए थे। इस रिश्वत से भरा हुआ एक बैग निर्मला यादव के घर भेजा जाना था लेकिन गलती से यह दूसरे जज के पास पहुँच गया और भेद खुल गया। वर्तमान में इस मामले की सुनवाई अंतिम चरण में है।

इसी तरह के एक और मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज एसएन शुक्ला और उनकी पत्नी पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में भी CBI जाँच और मुकदमा चल रहा है। एक अन्य मामले में मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मार्कन्डेय काटजू ने एक जज के भ्रष्ट होने की बात कही थी।

उस अदनान को कोर्ट ने दी जमानत, जिसने ज्ञानवापी सर्वे का आदेश देने वाले जज को ‘काफिर’ बता हलाल करने की कही थी बात

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित विशेष एनआईए कोर्ट ने अदनान खान नाम के इस्लामी कट्टरपंथी को जमानत दे दी, जिसने जज रवि कुमार दिवाकर को जान से मारने की धमकी दी थी। यही नहीं, जज की तस्वीर पोस्ट करते हुए उसने जज को काफिर कह कर संबोधित किया था और कहा था कि ऐसे लोगों का खून हलाल हैं, जो आपके ‘दीन’ के खिलाफ है। जज दिवाकर ने 2022 में ज्ञानवापी ढाँचे का सर्वे कराने का आदेश दिया था।

इस मामले में अदनान खान को एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने 4 जून 2024 को गिरफ्तार किया था। उस पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 115, 506 और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) की धारा 13 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

एफआईआर के मुताबिक, अदनान ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर जज रवि कुमार दिवाकर की एक फोटो पोस्ट की थी, जिसमें उनके चेहरे के ऊपर लाल रंग से “काफ़िर” लिखा हुआ था। साथ ही कैप्शन में लिखा था, “THE KAFIRS BLOOD IS HALAL FOR YOU THOSE WHO FIGHT AGAINST YOUR DEEN”। यह पोस्ट देखने के बाद यूपी पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और अदनान खान को हिरासत में लिया था।

कोर्ट में पेश की गई एफआईआर में कहा गया है कि अदनान की इस पोस्ट को कई लोगों ने देखा, जिससे उनकी विचारधारा से जुड़े लोगों को जज की हत्या के लिए प्रेरित किया गया। इसके साथ ही यह पोस्ट धार्मिक आधार पर वर्गों के बीच वैमनस्य और नफरत फैलाने के उद्देश्य से की गई थी। अदनान के वकील ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल की कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है और जिन धाराओं के तहत उन पर मामला दर्ज किया गया है, वे सात साल से कम सजा वाली हैं। इसके अलावा, अदनान जून 2024 से जेल में बंद था और इस दौरान अभियोजन पक्ष ने कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया जो अदनान के खिलाफ किसी बड़ी साजिश को साबित कर सके।

विशेष एनआईए जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदनान को जमानत दे दी। जज ने अपने फैसले में कहा कि जिन धाराओं के तहत अदनान पर मुकदमा चल रहा है, उनकी सजा सात साल से कम है और अभियोजन पक्ष ने अदनान के किसी पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को साबित नहीं किया है। जज ने यह भी कहा कि अदनान को पहले से ही काफी समय से जेल में रखा गया है और इस आधार पर उसे जमानत दी जाती है।

बता दें कि जज रवि कुमार दिवाकर ने ज्ञानवापी ढाँचे का सर्वे कराने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद उन्हें कई बार धमकियाँ मिल चुकी हैं। उन्होंने इस साल की शुरुआत में शासन को पत्र लिखकर अपनी सुरक्षा बढ़ाने की माँग की थी और मौजूदा सुरक्षा इंतजामों को ‘अपर्याप्त’ करार दिया था। कोर्ट का मानना है कि अदनान खान पर लगे आरोप गंभीर हैं, लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा पर्याप्त सबूत न होने की वजह से जमानत दी जा रही है।

जला दी गई थी फातिमा मस्जिद, आरोप लगा था मिट्ठन सिंह और जॉनी कुमार पर… दिल्ली दंगों के केस में पिता-पुत्र कोर्ट से बाइज्जत बरी

दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने साल 2020 के दिल्ली विरोधी दंगों के दौरान एक मस्जिद और आसपास के घरों में आग लगाने के आरोपित पिता-पुत्र को बरी कर दिया है। कोर्ट ने इसमें आरोपित पिता मिट्ठन सिंह और बेटे जॉनी कुमार को संदेह का लाभ दिया। मोहम्मद मुनाजिर नामक के एक व्यक्ति ने दोनों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी।

कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमाचला ने दोनों को बरी करते हुए कहा कि सभी पीड़ित या सार्वजनिक गवाह दोनों आरोपितों की पहचान से मुकर गए थे। सभी ने इन दोनों पिता-पुत्र को दंगाइयों की भीड़ के बीच देखने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि दंगाइयों की भीड़ के बीच अनुमान लगाना सही नहीं है।

कोर्ट ने आगे कहा, “कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि ऐसे बयान दोनों आरोपियों के खिलाफ पूर्व-निर्धारित मानसिकता के साथ दिए गए थे या तैयार किए गए थे, जो पहले से ही 05.03.2020 से पुलिस हिरासत में थे।” इसके बाद कोर्ट ने कहा कि दोनों संदेह के लाभ के हकदार हैं और इस आधार पर कोर्ट ने दोनों को इस मामले में बरी कर दिया।

मुनाजिर ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि फातिमा मस्जिद से नमाज पढ़ करके वह अपने घर लौट रहा था। उसी समय उसने अपनी गली में भीड़ देखी थी। उस दौरान भीड़ ने फातिमा मस्जिद के शीशे तोड़कर उसमें आग लगा दी। इसके बाद आसपास के घरों में भी आग लगा दी थी। उसने यह भी आरोप लगाया था कि उसके घर पर पत्थर और गैस सिलेंडर फेंके जा रहे थे और गोलियों की आवाजें आ रही थीं।

मुनाजिर ने आरोप लगाया था कि उसका घर पूरी तरह से जला दिया गया। इसके साथ ही उसने यह भी क हा था कि उसके घर से रखे सोने के गहने और 1,50,000 रुपए नकद भी लूट लिए गए थे। शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली और उसमें मिट्ठन और उसके बेटे जौनी कुमार को नामजद अभियुक्त बनाया। इसमें अज्ञात लोगों को भी शामिल बताया गया था।

इसके बाद 20 दिसंबर 2021 को दोनों पिता-पुत्र के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 147 (दंगा करना), 148 (घातक हथियार से लैस होकर दंगा करना), 392 (डकैती), 436 (घर या अन्य इमारत को नष्ट करने के इरादे से आग या विस्फोटक पदार्थों से उत्पात मचाना) और 149 (गैरकानूनी सभा करना) के तहत आरोप तय किए गए थे। हालाँकि, बाप-बेटे की इस जोड़ी ने खुद को निर्दोष बताया था।

हिजबुल्लाह के आतंकियों पर नरमी नहीं दिखाएगा इजरायल, लेबनान में ’21 दिनों का युद्धविराम’ के अमेरिकी प्रस्ताव को नेतन्याहू की ना: कहा- गाजा में भी लड़ाई जारी रहेगी

फिलिस्तीन के बाद इजरायल का लेबनान पर सैन्य कार्रवाई जारी है। लेबनान के आतंकी संगठन हिजबुल्लाह पर कार्रवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने आपातकालीन बैठक की। बुधवार (25 सितंबर) को अमेरिका, फ्रांस और उनके कुछ सहयोगियों ने इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच 21 दिन के युद्ध विराम की अपील की। साथ ही गाजा में भी युद्ध विराम के लिए समर्थन व्यक्त किया।

संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के दूत ने इस आह्वान का स्वागत किया और कहा कि इजरायल कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता है। हालाँकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह समझौता उन शर्तों को पूरा नहीं करता है, जिसके तहत इजरायल के निवासियों को सुरक्षित रूप से अपने घरों में लौटने की अनुमति दी जाए तो इजरायल बल प्रयोग करने में संकोच नहीं करेगा।

इस बीच खबरें आईं कि इजरायल ने हिजबुल्लाह ने 21 दिन के युद्ध विराम को स्वीकार कर लिया है। इसके बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने युद्ध विराम को स्वीकार करने की खबरों को खारिज कर दिया। पीएमओ ने कहा, “युद्ध विराम के बारे में रिपोर्ट गलत है। यह एक अमेरिकी-फ्रांसीसी प्रस्ताव है, जिस पर प्रधानमंत्री ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।”

यह बयान तब जारी किया गया है, जब नेतन्याहू संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सत्र को संबोधित करने के लिए न्यूयॉर्क जा रहे थे। इस रिपोर्ट को को भी खारिज कर दिया गया है कि कूटनीतिक पहल के परिणामस्वरूप इजरायली सेना IDF ने हिजबुल्लाह को लिटानी नदी तक वापस लौटने के लिए अपने सैन्य अभियान के स्तर को कम कर दिया है, जो कि UNSC के प्रस्ताव 1701 के तहत अनिवार्य है।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने आगे कहा, “उत्तर में लड़ाई कम करने के कथित निर्देश के बारे में रिपोर्ट सच्चाई के विपरीत है। प्रधानमंत्री ने आईडीएफ को अपनी प्रस्तुत योजना के अनुसार पूरी ताकत से लड़ाई जारी रखने का निर्देश दिया है। गाजा में लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक युद्ध के सभी उद्देश्य हासिल नहीं हो जाते।”

इजराइल के विदेश मंत्री इजराइल काट्ज़ ने गुरुवार (26 सितंबर) को सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “उत्तर (नॉर्थ) में युद्धविराम नहीं होगा।” इजरायल के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री का यह बयान ह्वाइट हाउस के बयान के बाद आया है। अमेरिका, फ्रांस और अन्य दस देशों ने 31 मई को गाजा में हुए युद्धविराम और बंधक समझौते के क्रियान्वयन का भी आह्वान किया है।

अपने ही मंत्री के आदेश से हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार ने झाड़ा पल्ला, कहा- दुकानों पर नाम लिखने का नहीं हुआ है फैसला: हाईकमान ने भी विक्रमादित्य सिंह को फटकारा

रेस्टोरेंट-ढाबों और खाने-पीने की रेहड़ियों पर दुकान मालिक का नाम दर्शाने को लेकर लिए गए फैसले से हिमाचल प्रदेश सरकार पलट गई है। हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने इस फैसले को लेकर अपना स्पष्टीकरण जारी किया है। कॉन्ग्रेस सरकार ने साफ़ किया है कि अभी ऐसा कोई फैसला लागू नहीं किया जा रहा है।

राज्य सरकार ने गुरुवार (26 सितम्बर, 2024) को इस संबंध में एक बयान जारी किया है। राज्य सरकार के प्रवक्ता ने बताया है कि वर्तमान में ऐसा कोई आदेश लागू नहीं है लेकिन इस पर राज्य सरकार कैबिनेट बैठक में मंथन करेगी। कॉन्ग्रेस सरकार ने कहा है कि यह फैसला लेने से पहले सभी लोगों से राय ली जाएगी।

कॉन्ग्रेस सरकार ने यह भी बताया है कि इस संबंध में एक कमिटी का गठन किया गया है। इसके मुखिया राज्य सरकार में मंत्री हर्षवर्धन सिंह चौहान होंगे। इस कमिटी में भाजपा और कॉन्ग्रेस, दोनों राज्यों के विधायक शामिल होंगे। कमिटी इस मुद्दे को लेकर विचार विमर्श करेगी। यह कमिटी अपने सुझाव सरकार को देगी।

कॉन्ग्रेस सरकार ने यह स्पष्टीकरण कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह के ऐलान के एक दिन के बाद दिया है। विक्रमादित्य सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट करके इस निर्णय की जानकारी दी थी। इसमें उन्होंने बताया था कि हिमाचल प्रदेश में शुद्ध भोजन मिले, इसके नाम दर्शाने को अनिवार्य किया जा रहा है।

विक्रमादित्य सिंह ने इस निर्णय को बताते हुए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा लिए गए ऐसे ही निर्णय की एक फोटो डाली थी। विक्रमादित्य सिंह के इस बयान के बाद खलबली मच गई थी। कहा गया था कि यह निर्णय उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के नक़्शेकदम पर लिया गया है।

योगी सरकार ने इससे पहले कांवड़ यात्रा के दौरान जब ऐसा ही निर्णय लिया था तो कॉन्ग्रेस ने इसे संविधान पर हमला बताया था। इसके बाद जब हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐसा ही निर्णय लिया तो लोगों ने दोहरे रवैये पर प्रश्न उठाए। इसके बाद गुरुवार को इस संबंध में स्पष्टीकरण दे दिया गया।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने हाल ही में आदेश दिया है कि होटल-रेस्टोरेंट, ढाबों और दुकानों पर मालिक और मैनेजर का नाम और उनका पता स्पष्ट रूप से प्रदर्शित की जाए। इसके अलावा सरकार ने आदेश दिया है कि रेस्टोरेंट-होटल में सब कहीं CCTV भी लगाए जाएँ।

विक्रमादित्य सिंह ने गुरुवार को इसको लकर सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि उनके राज्य में नाम प्रदर्शित करने को लेकर लिया गया निर्णय योगी सरकार से सम्बन्धित नहीं है। उन्होंने कहा कि था कि हिमाचल अलग राज्य है और इसके अलग मुद्दे हैं। उन्होंने कहा कि हालिया घटनाओं के कारण इस मामले पर कमिटी बनाई गई है।

रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि विक्रमादित्य के इस बयान को लेकर कॉन्ग्रेस हाईकमान खफा है। दावा किया गया है कि विक्रमादित्य सिंह से ऐसे बयानों से बचने की अपील की गई है। यह भी बताया गया है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे विक्रमादित्य सिंह से इस बात को लेकर खासे गुस्सा हैं।

जिसने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए बनाया ₹8300 करोड़ का फंड, उसने अब अमेरिका में खरीदे 200+ रेडियो स्टेशन: कौन है PM मोदी-ट्रंप से घृणा करने वाला जॉर्ज सोरोस?

वामपंथी अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस को अमेरिका में ‘ऑडेसी’ खरीदने की मंजूरी मिल गई है। ऑडेसी कंपनी अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी रेडियो चेन है और इसके पास अमेरिका के भीतर 200 से अधिक रेडियो स्टेशन हैं। इसे सुनने वालों की संख्या 16 करोड़ से अधिक है। इसे हाल ही में अमेरिका में रेडियो, केबल और ऐसे ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को नियंत्रण करने वाली संस्था FCC ने मंजूरी दी है। यह एक बड़ी डील मानी जा रही है।

FCC की इस मंजूरी के कारण अमेरिकी चुनाव के कुछ दिन पहले वामपंथी कारोबारी की पहुँच 16 करोड़ से अधिक लोगों और 40 बाजारों तक हो सकती है। जिस कम्पनी को सोरोस ने अधिग्रहित किया है उस पर $400 मिलियन (लगभग ₹3200 करोड़) का कर्ज है। सोरोस ने हाल ही में यह कर्ज अपने हाथों में ले लिया था। सोरोस ने लगभग $280 मिलियन टर्म लोन और $135 मिलियन रिवॉल्विंग कर्ज को 50 सेंट/डॉलर पर या ऑडेसी में लगभग 40% मालिकाना हक़ के बदले लिया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, “FCC का यह निर्णय मतदान के बाद आया। FCC में शामिल 3 डेमोक्रेट ने इस कदम के पक्ष में मतदान किया, जबकि दो रिपब्लिकन ने इसके खिलाफ मतदान किया।” FCC नियमों के अनुसार, अमेरिकी रेडियो स्टेशनों पर किसी विदेशी कंपनी का मालिकाना हक़ 25% से अधिक नहीं होना चाहिए।

इस विषय में उपलब्ध सार्वजनिक दस्तावेजों के अनुसार, सोरोस ने कम्पनी की बोली लगाने के लिए अपने विदेशी निवेश वाली कम्पनी का इस्तेमाल किया। उसने विदेशी कम्पनी के जरिए मालिक बनने के लिए FCC से रियायत भी माँगी। इस प्रक्रिया में अमेरिकी सुरक्षा पर प्रभाव को भी जाँचा जाता है, इस प्रक्रिया में 1 साल तक लग सकता है। इस बार इसका पालन भी नहीं हुआ।

FCC के एक प्रवक्ता के अनुसार, “कोई भी निर्णय तब तक अंतिम नहीं होता जब तक आयोग इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं करता। सोरोस वाले निर्णय हमने सार्वजनिक नहीं किया है।” FCC के प्रवक्ता ने बताया है कि उसे ऑडेसी के दिवालिया होने के पहले के स्वरुप और बाद के स्वरुप को लेकर आवेदन मिला है। उसने बताया है कि इसमें 1 साल तक लगता है।

दूसरी ओर, FCC के कुछ लोगों ने इस बात को नकारा है कि सोरोस वाली डील में कोई जल्दबाजी बरती गई है। उन्होंने बताया कि क्यूम्यलस मीडिया (2018), आईहार्ट मीडिया (2019), लिबरमैन टेलीविजन (2019), फ्यूजन कनेक्ट (2019), विंडस्ट्रीम होल्डिंग्स (2020), अमेरिका-सीवी स्टेशन ग्रुप (2021), और अल्फा मीडिया (2021) के ऐसे ही दिवालिया होने के बाद यही प्रक्रिया अपनाई गई थी और इतना ही समय लिया गया था।

वहीं, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नामित FCC आयुक्त नाथन सिमिंगटन ने इस प्रक्रिया की आलोचना की है और दावा किया है कि इसे तेजी से आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया, “FCC ऐसी कम्पनियों को विदेशी स्वामित्व वाली सीमा की शर्त से छूट देता है जो दिवालियापन से बाहर निकल रहीं हो। मेरे विरोध के बावजूद, इस निर्णय में ऐसा ही किया गया। लेकिन यह एकमात्र ऐसा कारण नहीं था जिससे इसको तेजी से आगे बढ़ाया गया।”

सिमिंगटन ने आगे बताया, “FCC ने कर्मचारियों के ही स्तर पर इसे निपटाने का फैसला ले लिया था। इसकी सूचना FCC आयुक्तों को शुक्रवार को दी गई। इस संबंध में लगभग कोई तथ्यात्मक रिकॉर्ड नहीं है क्योंकि इसका कोई विश्लेषण तक नहीं किया गया। अध्यक्ष के अलावा किसी भी आयुक्त को इस मुद्दे के बारे में विचार करने के लिए नहीं बुलाया गया। यहाँ तक कि कर्मचारियों को हमारे वोट के बिना हमारी ओर से इसे संभालने का निर्देश दिया गया था। यही असली फास्ट-ट्रैक है।”

ट्रंप द्वारा FCC में नामित दूसरे सदस्य ब्रेंडन कैर ने भी पहले इस सौदे के बारे में चिंता जताई थी। उन्होंने हाल ही में कहा, “मुझे लगता है कि FCC कई वर्षों से स्थापित की गई लेन-देन की समीक्षा के लिए अपनी सामान्य प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहा है। मुझे लगता है कि FCC पहली बार एक बिल्कुल नया शॉर्टकट बनाने के लिए तैयार है।”

कैर ने कहा, “हम आम तौर पर लोगों से हमारे पास याचिका दायर करने के लिए कहते हैं, इसके बाद विदेशी मालिकाना हक़ की जाँच के लिए सुरक्षा एजेंसियों की राय लेते हैं और उसके बाद मतदान करते हैं। यहाँ, वे कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं जो आयोग के मामले में पहले कभी नहीं किया गया है।”

कैर ने एक इंटरव्यू में कहा, “सोरोस देश के दूसरे सबसे बड़े रेडियो स्टेशन समूह को खरीदना चाहता है। उनमें से कुछ पेंसिल्वेनिया, वर्जीनिया और फ्लोरिडा (आगामी राष्ट्रपति चुनाव में महत्वपूर्ण राज्य) में हैं। अधिकांश संभवतः संगीत या खेल से संबंधित हैं, लेकिन उन राज्यों में कुछ ऐसे भी हैं जो बातचीत प्रसारित करते हैं।”

हालाँकि, एक वेबसाइट दिखाती है कि यह अमेरिका की सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली रेडियो कम्पनियों में से एक है। ऑडेसी ने जनवरी में दिवालियापन के लिए आवेदन किया था, इसमें दावा किया गया था कि उनके विज्ञापन राजस्व में अरबों डॉलर की गिरावट आई है। उन्ह्होने इसे वित्तीय कठिनाइयों का सबसे बड़ा कारण बताया था।

सोरोस के इस कम्पनी को खरीदने के बाद अवर्तमान शेयरहोल्डर की भागीदारी इसमें खत्म हो जाएगी। इससे पहले टेक्सास के रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने अप्रैल में सोरोस की संदिग्ध गतिविधियों पर FCC के ढुलमुल रवैये का मामला उठाया था।

रॉय द्वारा खुलासा किए जाने से कुछ महीने पहले ही सोरोस ने ऑडेसी में लगभग $400 मिलियन का निवेश किया था। रॉय ने एक कानून का हवाला दिया, इसके अनुसार जिन फर्मों में 25% से अधिक विदेशी स्वामित्व है, वह रेडियो लाइसेंस नहीं रख सकतीं। रॉय के कारण सोरोस की रेडियो नेटवर्क खरीदने की योजना खटाई में पड़ गई।

रॉय ने FCC को एक पत्र में लिखा है कि सोरोस ने FCC को आवेदन देकर सामान्य प्रक्रिया का पालन करने के बजाय प्रक्रिया ही खत्म करने का आवेदन दिया और इसे कुछ समय के लिए टालने का अनुरोध भी किया। सोरोस ने इस पूरी प्रकिया को ही उलट पलट डालने का प्रयास किया।

93 साल के वामपंथी सोरोस ने अपनी 6.7 बिलियन डॉलर की कुल संपत्ति का उपयोग करके कई लिबरल नीतियों को बढ़ाया है। 2021 में, उसने अपने ‘ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन’ के माध्यम से चुनाव और राजनीतिक न्याय के नाम परकम से कम $140 मिलियन का योगदान दिया।

सोरोस ने 2023 में अपने बेटे एलेक्स को अपनी विरासत सौंप दी थी। इस बीच उसका संगठन लाखों डॉलर खर्च करके टेक्सास जैसे राज्यों में डेमोक्रेट को जिताने के लिए काम कर रहा है। सोरोस लगातार ऐसे मीडिया संस्थान कब्जाता रहा है जो दक्षिणपंथी झुकाव रखते हैं। सोरोस ने पिछले साल के चुनाव से पहले पोलैंड में एक मीडिया कंपनी खरीदी थी और इसने एक दक्षिणपंथी सरकार को गिराने में अहम रोल निभाया था।

कौन हैं जॉर्ज सोरोस?

जॉर्ज सोरोस एक अमेरिकी अरबपति हैं, जो स्टॉक मार्केट में निवेश करके लाभ कमाते हैं। उनका जन्म 1930 में पश्चिमी देश हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में एक यहूदी परिवार में हुआ था। कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब यहूदियों पर अत्याचार हो रहा था, तब उन्होंने झूठा पहचान पत्र बनाकर अपना और अपने परिवार की जान बचाई थी।

जब विश्वयुद्ध खत्म हुआ और हंगरी में कम्युनिस्ट सरकार बनी तो वे 1947 में इंग्लैंड की राजधानी लंदन चले गए। वहाँ उन्होंने रेलवे स्टेशन पर कुली और क्लबों में वेटर का भी काम किया। इस दौरान वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई की। इसके बाद कुछ समय तक उन्होंने लंदन मर्चेंट बैंक में भी काम किया।

साल 1956 में वे लंदन छोड़कर अमेरिका आ गए और फाइनांस एवं इन्वेस्टमेंट में कदम रखा। उसके बाद उनकी किस्मत चमक उठी और रात दूनी दिन चौगुनी तरक्की करने लगे और खूब संपत्ति इकट्ठा की। वित्तीय पत्रिका फोर्ब्स मैगजीन के अनुसार 17 फरवरी 2023 तक उनके पास 6.7 बिलियन डॉलर (लगभग 55,455 करोड़ रुपए) की संपत्ति है।

सन 1973 में उन्होंने सोरोस फंड मैनेजमेंट की स्थापना की और कथित अत्याचार पीड़ितों की मदद करने लगे। इस दौरान उन्होंने ब्लैक लोगों की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप देना शुरू किया। उनका दावा है कि उन्होंने अब 32 अरब डॉलर (2.62 लाख करोड़ रुपए) जरूरतमंदों को दे चुके हैं। सन 1984 में उन्होंने ओपन सोसायटी नामक संस्था की स्थापना की। आज यह संस्था 70 से अधिक देशों में कार्यरत है।

इन सब मानवीय सेवाओं और दानों के पीछे उनका एक विकृत चेहरा भी है। उन्होंने लाभ कमाने के लिए कई संस्थानों और देशों में वित्तीय संकट खड़ा कर दिया। इसके अलावा, उन्होंने कई देशों की सरकारों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने और उन्हें गिराने के लिए फंडिंग करने का काम किया। ओपन सोसायटी का इसमें नाम आया है। इस तरह के आरोप उन पर लगते रहे हैं।

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को हटाने के लिए अथाह पैसे खर्च किए थे। साल 2003 में उन्होंने कहा था कि जॉर्ज बुश को हटाना उनके लिए जिंदगी और मौत का सवाल है। उन्होंने कहा था कि अगर बुश को सत्ता से हटाने की अगर कोई गारंटी लेता है और वे अपनी पूरी संपत्ति उस पर लुटा देंगे। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ बुश की कार्रवाई का भी खूब विरोध किया था। बुश को हराने के लिए उन्होंने 250 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए थे।

सोरोस को चीन, भारत के नरेंद्र मोदी, ब्लादिमीर पुतिन, अमेरिका पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता पसंद नहीं हैं। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को ठग और पीएम मोदी को तानाशाह कहा था। उन्होंने दुनिया में ‘राष्ट्रवाद’ के बयार से लड़ने के लिए लगभग 100 अरब डॉलर की फंड की स्थापना की है। इन फंड का इस्तेमाल इन लोगों के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाने के लिए किया जाता है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में उन्होंने कहा था कि दुनिया में राष्ट्रवाद तेजी से बढ़ रहा है। इसका सबसे खतरनाक नतीजा भारत में देखने को मिला है।

सरकारों के खिलाफ प्रोपगेंडा और भारत

राफेल डील में जाँच के लिए फंडिंग: फ्रांस से भारत ने 36 राफेल विमानों को खरीदा था। इसको लेकर विपक्षी दल कॉन्ग्रेस ने हंगामा किया था और कहा था कि इसमें दलाली हुई है। हालाँकि, यहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था। इसके बाद फ्रांस की एनजीओ शेरपा एसोसिएशन ने इसमें भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराकर जाँच की माँग की थी। इस एनजीओ को जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से फंड जारी किया जाता है।

भारत जोड़ो यात्रा और सोरोस: कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा से भी जॉर्ज सोरोस के नाम जोड़ा गया था। 31 अक्टूबर, 2022 को सलिल शेट्टी नाम का एक व्यक्ति राहुल गांधी की कर्नाटक के हरथिकोट में उनकी भारत जोड़ी यात्रा में शामिल हुआ। सलिल शेट्टी जॉर्ज सोरोस द्वारा स्थापित ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन के वैश्विक उपाध्यक्ष हैं। इसके पहले शेट्टी एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े थे।

CAA प्रोटेस्ट: सीएए प्रोटेस्ट में भी जॉर्ज सोरोस का नाम जुड़ा है। कहा जाता है कि नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर हुए विरोध को हवा देने के लिए जॉर्ज सोरो ने फंडिंग की थी। इसकी पुष्टि उनके बयानों से भी होती है। सोरोस ने भारत में लागू किए जा रहे NRC और CAA को मुस्लिम विरोधी बताया था।

कश्मीर से धारा 370 का खात्मा: इसी तरह कश्मीर से जब केंद्र की मोदी सरकार ने धारा 370 को खत्म कर जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त किया था, तब भी सोरोस सामने आए थे। उन्होंने मोदी सरकार के इस फैसले का विरोध किया था। सोरोस ने कहा था कि भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ रहा है। इसी तरह किसान आंदोलन और भारत द्वारा कोरोना का वैक्सीन बनाने के बाद उसके खिलाफ वैश्विक मुहिम चलाने में भी सोरोस का नाम आ चुका है।

दरअसल, जॉर्ज सोरोस की भूमिका उन हर बातों में लगभग सामने आई, जो केंद्र की भाजपा सरकार और पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ रही। जॉर्ज सोरोस की नरेंद्र मोदी के खिलाफ कितनी नरफत है, इसका वे तानाशाह कहकर सबूत दे चुके हैं और समय-समय पर अन्य आरोपों के जरिए इसकी पुष्टि भई करते रहते हैं। वैसे तो सोरोस की कहानी सैकड़ों पन्नों में भी नहीं खत्म होगी, लेकिन फिलहाल संक्षिप्त में इतना ही।

मदरसे के 12 वर्षीय छात्र को मौलाना ने बीड़ी पीने से रोका, कर दी पिटाई: गुस्साए किशोर ने रात में आकर आस मोहम्मद के गले को आरी से रेता, हालत गंभीर

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में पिटाई से भड़के मदरसे के एक नाबालिग छात्र ने धारदार हथियार से मौलवी का गला रेत दिया है। इसमें मौलवी गंभीर रूप से घायल हो गया है। गंभीर हालात में मौलवी को हापुड के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहाँ उसका इलाज चल रहा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि मदरसा अवैध रुप से चल रहा है।

यह घटना मोदीनगर शहर के भोजपुर थाना क्षेत्र के गाँव त्योढ़ी 13 बिस्वा स्थित मदरसे की है। इस मदरसे में 8वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है। यहाँ कक्षा छह में गाँव का ही एक 13 वर्षीय किशोर भी पढ़ाई करता है। कहा जा रहा है कि दो दिन पहले वह कक्षा में बीड़ी पीता हुआ पकड़ा गया था। इसके बाद मदरसे के मौलाना आस मोहम्मद ने देख लिया था।

आस मोहम्मद ने किशोर को टोका और बीड़ी पीने के कारण उसकी पिटाई कर दी। मौलाना ने किशोर को दोबारा बीड़ी नहीं पीने की चेतावनी भी दी। इससे छात्र भड़क गया। वह देर शाम मदरसे में गया और कमरे में सो रहे आस मोहम्मद का गला आरी से रेत दिया। इस अचानक हमले से मौलाना आस मोहम्मद चिल्लाने लगा। उसकी चीख सुनकर आसपास के लोग दौड़ते हुए आए।

उन्होंने देखा कि मौलाना के गले से खून बह रहा है और वह गंभीर रूप से घायल है। इसके बाद वे मौलाना को लेकर अस्पताल लेकर पहुँचे। सूचना मिलते ही गाजियाबाद पुलिस भी मौके पर पहुँच गई। उसने पूछताछ के लिए छात्र को हिरासत में ले लिया। इसके साथ ही घटनास्थल से खून से सनी आरी बरामद कर ली है। मदरसे को भी कब्जे में ले लिया गया है।

पुलिस इस मामले का संज्ञान लेकर इसकी जाँच कर रही है। हालाँकि, इस मामले में अभी तक किसी ने तहरीर नहीं दी है। एसीपी मोदीनगर ज्ञान प्रकाश राय ने बताया कि मौलाना का अस्पताल में उपचार चल रही है। उनकी हालत खतरे से बाहर है। इस मामले में जाँच की जा रही है।

‘नरेश चिकन कॉर्नर’ पर थूक वाली रोटी सेंक रहा था शहजाद… हिंदू नाम देख इस्लामी कट्टपंथियों ने झूठ फैलाया, गिरफ्तारी के बाद सब चुप

सोशल मीडिया पर थूक वाली वीडियो दिखना कोई नया नहीं रह गया। 25 सितंबर को भी ऐसी एक वीडियो वायरल हुई थी। वीडियो बागपत के टिटिरी शहर स्थित नरेश चिकन कॉर्नर से थी। वीडियो में एक युवक रोटी पर थूककर उसे सेंक रहा था।

हिंदुओं ने जहाँ इस वीडियो को देख सवाल उठाया था कि अगर हिंदुओं की दुकान पर ऐसा होगा तो किस पर विश्वास किया जाना चाहिए। वहीं इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस वीडियो के बहाने ये दिखाया था कि मुस्लिमों को बेवजह बदनाम किया जाता है। थूकने वाला काम तो हिंदू भी करते हैं।

इस क्रम में अकॉउंट से इस वीडियो को कइयों ने साझा किया। हालाँकि नाम का खुलासा होने के बाद किसी ने इस पर मुँह नहीं खोला है।

अब इसी मामले में जानकारी सामने आई है कि जिस युवक को देखकर हिंदुओं को सवालों को घेरे में घेरा जा रहा था उस युवक का नाम शहजाद है। शहजाद की वीडियो में देख सकते हैं कि वो ढाबे के बाहर हाथ से रोटी बना रहा है और फिर उसे थूककर सेंक रहा है।

पुलिस ने इस मामले में जाँच की और शहजाद को गिरफ्तार किया। ढाबे के मालिक से पूछताछ में सामने आया कि जब मालिक ने ये वीडियो देखी तो उन्होंने शहजाद से सवाल-जवाब किए लेकिन शहजाद ने सफाई देने की बजाय मालिक के साथ ही गलत व्यवहार करना शुरू कर दिया। अब पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है।

इससे पहले लोनी बॉर्डर के पास से ऐसा मामला उजागर हुआ था। जूस की दुकान पर जावेद (बदला हुआ नाम) और उसका बेटा जूस में पेशाब मिलाकर लोगों को पिला रहे थे। छानबीन में उनकी दुकान से पेशाब भरी बोतल भी मिली थी।

7 सितंबर को नोएडा के ढाबे की वीडियो सामने आई थी। यामीन का बेटा चांद रोटी पर थूकता दिखा था। उसकी वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था।

मालूम हो कि लगातार थूक जिहाद के मामले सामने आने के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आदेश दिया है कि हर खाने की दुकान पर मालिक का नाम होना अनिवार्य है। इसके लिए पुलिस वेरिफिकेशन भी करेगी। ये निर्णय़ सीएम ने हाई लेवल मीटिंग के बाद लिया। उन्होंने रेस्टोरेंट आदि में हा ग्राहकों के बैठने वाली जगह पर सीसीटीवी लगाने के निर्देश भी दिए हैं।