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नसरल्लाह का आतंक दुनिया से खत्म: इजरायली सेना ने भीषण हमले में हिज़्बुल्लाह चीफ को उड़ाया, बेरूत अटैक में बेटी-भाई की भी मौत

लेबनान के आतंकवादी शिया संगठन हिज़्बुल्लाह के प्रमुख हसन नसरल्लाह को इजरायल ने मार गिराया है। इजरायली रक्षा बल (आईडीएफ) ने यह दावा किया कि उन्होंने एक हवाई हमले में हसन नसरल्लाह को मार गिराया है। यह हमला को बेरूत के दक्षिणी उपनगर में स्थित हिज़्बुल्लाह के मुख्यालय पर किया गया, जहाँ नसरल्लाह की उपस्थिति की जानकारी मिली थी।

इजरायल ने हिज़्बुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह को मारने के लिए स्पेशल ऑपरेशन ‘न्यू ऑर्डर‘ शुरू किया था। इस ऑपरेशन में इजरायल ने अपनी अत्याधुनिक तकनीक और रणनीतियों का उपयोग किया और आखिरकार अपने सबसे बड़े दुश्मनों में से एक नसरल्लाह को मार गिराया। बताया जा रहा है कि इजरायली फाइटर जेट्स ने 6 ब्लॉक की बिल्डिंगों को पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिए 80 बमों का इस्तेमाल किया और हिज़्बुल्लाह के हेडक्वॉर्टर को पूरी तरह से समतल कर दिया।

आईडीएफ के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ‘न्यू ऑर्डर’ ऑपरेशन की पुष्टि की गई, जिसमें कहा गया कि अब हसन नसरल्लाह दुनिया को आतंकित नहीं कर पाएगा।

आईडीएफ के प्रवक्ता डेनियल हगारी ने इस ऑपरेशन की जानकारी देते हुए बताया कि इजरायली खुफिया एजेंसियों से प्राप्त सटीक जानकारी के आधार पर यह हमला किया गया था। इस हमले में हिज़्बुल्लाह की सीनियर लीडरशिप के कई प्रमुख नेता मारे गए, जिनमें नसरल्लाह के साथ-साथ दक्षिणी मोर्चे के कमांडर अली कर्की भी शामिल थे। इसके अलावा, हिज़्बुल्लाह के मिसाइल यूनिट के प्रमुख मुहम्मद अली इस्माइल को भी इस हमले में मारा गया।

लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि इस हमले में कुल 6 लोग मारे गए और 91 लोग घायल हुए। इस हमले से छह अपार्टमेंट बिल्डिंग पूरी तरह नष्ट हो गईं, जिनके मलबे के नीचे से अभी और शव मिलने की आशंका है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इजरायली विमानों ने बेरूत के दक्षिणी उपनगर और पूर्वी लेबनान के बेक़ा घाटी में कई ठिकानों को निशाना बनाया।

कौन था हसन नसरल्लाह की पृष्ठभूमि

हसन नसरल्लाह का जन्म 31 अगस्त 1960 को बेरूत के एक गरीब इलाके में हुआ था। वह एक किराना व्यापारी के बेटे थे और उनके आठ भाई-बहन थे। उनकी पढ़ाई शुरुआती दिनों में धार्मिक शिक्षा से शुरू हुई और बाद में वह शिया आलिम (धार्मिक विद्वान) बने। उन्होंने 1992 में अब्बास अल-मुसावी की हत्या के बाद हिज़्बुल्लाह की कमान संभाली और तब से लेकर अब तक वह इस संगठन के महासचिव रहे।

नसरल्लाह के नेतृत्व में हिज़्बुल्लाह ने लेबनान में काफी प्रभावी भूमिका निभाई। हिज़्बुल्लाह एक शिया मिलिशिया समूह है, जो अपने सशस्त्र विंग और राजनीतिक ताकत दोनों के कारण लेबनान के सबसे महत्वपूर्ण दलों में से एक माना जाता है। यह समूह इजरायल के खिलाफ सक्रिय है और उसका उद्देश्य इजरायल को खत्म करना है। हिज़्बुल्लाह के पास हजारों प्रशिक्षित लड़ाके और बड़े पैमाने पर हथियारों का भंडार है, जिसमें मिसाइलें भी शामिल हैं जो इजरायल के अंदर गहराई तक हमला करने में सक्षम हैं।

नसरल्लाह की हत्या से हिज़्बुल्लाह के नेतृत्व को बड़ा झटका लगा है। हिज़्बुल्लाह और इजरायल के बीच तनाव पहले से ही चरम पर था, और अब नसरल्लाह की मौत की खबरों ने इस तनाव को और भी बढ़ा दिया है। इजरायल की सेना ने अपनी तरफ से कहा है कि वह उन सभी को निशाना बनाना जारी रखेगी, जो उसके नागरिकों के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी कहा था कि अगर हिज़्बुल्लाह इस विवाद में दूसरा मोर्चा खोलता है, तो उसे अकल्पनीय जवाब मिलेगा।

लेबनान में पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट जारी है, और अब हिज़्बुल्लाह और इजरायल के बीच बढ़ते इस तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। लेबनान की जनता में अब यह डर पैदा हो रहा है कि इस संघर्ष के चलते उनका देश एक और युद्ध में फंस सकता है।

हिज़्बुल्लाह की रणनीति और नसरल्लाह का नेतृत्व

हिज़्बुल्लाह ने 2006 में इजरायल के खिलाफ एक महीने तक चले विनाशकारी युद्ध में हिस्सा लिया था। उस युद्ध ने लेबनान को बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचाई थी। नसरल्लाह के नेतृत्व में हिज़्बुल्लाह ने खुद को लेबनान के सबसे ताकतवर सैन्य और राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित किया। नसरल्लाह की रणनीति हमेशा से ही इजरायल के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा देने की रही है।

नसरल्लाह ने कई बार सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया कि वह लगातार अपने सोने की जगह बदलते रहते थे ताकि इजरायल के हमलों से बच सकें। वह लंबे समय से सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए थे और ज्यादातर वीडियो संदेशों के माध्यम से ही अपने समर्थकों से बात करते थे। उनका यह गुप्त जीवन और सशस्त्र संघर्ष के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें उनके समर्थकों के बीच एक हीरो की तरह स्थापित करती थी, वहीं उनके दुश्मन उन्हें एक कुख्यात आतंकवादी के रूप में देखते थे।

हिज़्बुल्लाह और ईरान का संबंध

हिज़्बुल्लाह का ईरान के साथ घनिष्ठ संबंध है। ईरान ने हमेशा हिज़्बुल्लाह का समर्थन किया है और उसे सैन्य और वित्तीय सहायता प्रदान की है। नसरल्लाह और ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई के बीच निकट संबंध रहे हैं। हिज़्बुल्लाह को अमेरिका ने आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है, लेकिन इसके बावजूद ईरान और नसरल्लाह के बीच संबंध कभी छिपे नहीं रहे।

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहीम रईसी ने हाल ही में कहा था कि इजरायल के अपराध हद से बाहर हो चुके हैं और वॉशिंगटन से उन्हें इस पर संयम बरतने के लिए कहा जा रहा है, लेकिन अमेरिका इजरायल का खुला समर्थन कर रहा है।

इजरायल और हिज़्बुल्लाह के बीच यह संघर्ष केवल इन दोनों देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे मध्य पूर्व पर पड़ सकता है। लेबनान की जनता, जो पहले से ही आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है, इस संघर्ष का सबसे बड़ा शिकार हो सकती है। अब देखना यह होगा कि इस क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय क्या कदम उठाता है और इजरायल-हिज़्बुल्लाह संघर्ष किस दिशा में जाता है।

कनाडा में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा का अपमान, हमास समर्थकों ने लगाया फिलिस्तीन का झंडा: सामने आया VIDEO, मुँह पर कपड़ा बाँधे दिखे उपद्रवी

कनाडा के ब्रैम्पटन प्रांत में मुँह बाँधे कुछ फिलिस्तीनी उपद्रवियों ने महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति पर तोड़फोड़ करने की कोशिश की। उन्होंने महाराजा की प्रतिमा पर फिलिस्तीन का झंडा तक लगा दिया। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो वायरल हुआ है। वीडियो को कनाडा के एक पत्रकार ने शेयर किया है। पत्रकार ने उपद्रवियों को जिहादी कहकर संबोधित किया है।

वायरल हो रहा यह वीडियो करीब 37 सेकेंड का है। इसमें महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा के प्लेटफॉर्म पर चढ़कर 2 आरोपित उनके घोड़े पर फिलिस्तीन का झंडा लगाते दिख रहे हैं। दोनों उपद्रवियों ने चेहरे पर नकाब बाँध रखा है। वहीं, नीचे कई व्यक्ति खड़े हैं। वीडियो में एक व्यक्ति महाराजा रणजीत सिंह के घोड़े पर कपड़ा बाँधता हुआ नजर आ रहा है।

इस घटना का कई लोगों ने वीडियो बनाया है। इस मामले में पुलिस से शिकायत की जा चुकी है। मामले की कनाडा पुलिस जाँच कर रही है। फिलिस्तीन के समर्थन के लिए निकाले गए विरोध प्रदर्शन के दौरान फिलिस्तीन समर्थकों ने इस घटना को अंजाम दिया। बताया जा रहा है कि प्रतिमा को खंडित करने वाले उपद्रवी का नाम होशाम हमदान है।

कनाडा का ब्रैम्पटन वही शहर है, जहाँ खालिस्तान समर्थक पर भी बड़ी संख्या में रहते हैं और भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। कई मौकों पर उन्होंने इसका प्रदर्शन किया है। हालाँकि, फिलिस्तीनी द्वारा महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा को अपवित्र करने के बावजूद अभी तक उनकी तरफ से कोई बयान नहीं आया है।

कौन थे महाराजा रणजीत सिंह?

बता दें कि महाराजा रणजीत सिंह भारतीय इतिहास के प्रभावशाली राजाओं में से एक थे। वे सिख धर्म के एक महान राजा थे। उनका जन्म 13 नवंबर 1780 को पंजाब के गुजरांवाला में (अब पाकिस्तान में) हुआ था। सिर्फ 10 साल की उम्र में उन्होंने अपने जीवन का पहला युद्ध लड़ा था। मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने राजगद्दी सँभाली और 18 साल की उम्र में लाहौर को जीत लिया था।

महाराजा रणजीत सिंह ने 40 वर्षों के अपने शासनकाल में कई मुस्लिम शासन को खत्म किया। वहीं, अंग्रेजों को वे अपने साम्राज्य के आसपास भी फटकने भी नहीं दिया। महाराजा रणजीत सिंह जब 12 साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। 12 साल की उम्र में उन्होंने गद्दी संभाली, लेकिन पंजाब के महाराजा के रूप में उनकी तापोशी 20 साल होने के बाद 12 अप्रैल 1801 को की गई।

ताजपोशी के बाद 1802 में उन्होंने अमृतसर को अपने साम्राज्य में मिला लिया और 1807 में अफगानी शासक कुतुबुद्दीन को हराकर कसूर पर कब्जा कर लिया। उन्होंने सन 1818 में मुल्तान और 1819 में कश्मीर पर अधिकार कर लिया। उन्होंने शक्तिशाली अफगानों को भी हरा दिया था। उन्हें प्रशासन में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और यूरोपीय भी शामिल थे।

बचपन में चेचक के कारण वे एक आँख से देख नहीं पाते थे। वे एक महान शासक, योद्धा और रणनीतिकार थे। उनकी उदारता की कई कहानियाँ भी प्रचलित हैं। उन्होंने सिख साम्राज्य की स्थापना की थी। इस कारण उन्हें ‘पंजाब का शेर’ कहा जाता था। महाराजा रणजीत सिंह की 27 जून 1839 को निधन हो गया था।

36 बुलडोजर, 70 ट्रैक्टर-ट्रॉली के साथ सोमनाथ में चला बड़ा अभियान… मस्जिद-ईदगाह समेत कई अवैध ढाँचे ध्वस्त: बवाल करने पर पुलिस ने 70 को पकड़ा, 1500 सुरक्षाकर्मी तैनात

गुजरात के सोमनाथ शहर में हाल ही में अब तक की सबसे बड़ी अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई की गई, जिसमें प्रशासन ने अवैध रूप से बने कई मजहबी निर्माणों को भी ध्वस्त कर दिया। इस कार्रवाई में 36 बुलडोजर, 70 ट्रैक्टर-ट्रॉली, और 1500 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। गिर सोमनाथ में विशेष रूप से समुद्री इलाकों और पूजा स्थलों के आसपास के अवैध निर्माणों को हटाने के उद्देश्य से यह मेगा अभियान चलाया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह विध्वंस अभियान सुबह 5 बजे शुरू किया गया, जिसमें प्रशासन ने भारी सुरक्षा इंतजाम किए थे। पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में बदल दिया गया, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। मीडिया की एंट्री पर भी बैन लगा दिया गया था। तोड़फोड़ के लिए 36 बुलडोजर और 5 हिताची मशीनों का इस्तेमाल किया गया, जबकि मलबा हटाने के लिए 50 ट्रैक्टर और 10 बड़े डंपरों को लगाया गया।

इस मेगा ड्राइव के दौरान प्रशासन ने ईदगाह और मस्जिद सहित कई अवैध मजहबी स्थलों को हटाया, जिससे कुछ स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग विरोध में एकत्रित हो गए। विरोध के बावजूद, प्रशासन ने सख्ती से स्थिति को नियंत्रण में लिया और कार्रवाई को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। सोशल मीडिया पर इस विध्वंस के कई वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें धार्मिक स्थलों को हटाते हुए देखा जा सकता है।

इस अभियान की संवेदनशीलता को देखते हुए जिले के कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद थे। गिर सोमनाथ, जूनागढ़ और पोरबंदर जिलों से लगभग 1500 पुलिसकर्मियों को इस कार्रवाई के लिए तैनात किया गया। इनमें 3 एसपी, 6 डिप्टी एसपी, 50 इंस्पेक्टर और 2 एसआरपी कंपनियाँ भी शामिल थीं। जिला कलेक्टर दिग्विजयसिंह जाडेजा, रेंज आईजी नीलेश झांजड़िया, एसपी मनोहरसिंह जाडेजा जैसे अधिकारी भी इस महत्वपूर्ण ऑपरेशन का हिस्सा थे।

विरोध प्रदर्शन के दौरान भीड़ ने हंगामा किया, लेकिन प्रशासन की तैयारी के आगे वे ज्यादा कुछ नहीं कर सके। 70 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया, जो कि कार्रवाई में बाधा डालने की कोशिश कर रहे थे।

यह विध्वंस अभियान पिछले एक महीने से तैयार किया जा रहा था। प्रशासन ने करीब एक महीने तक सर्वेक्षण किया और सभी अवैध निर्माणों की पहचान की। हाजी मंगरोलीशा पीर दरगाह, हजरत माईपुरी, सीपे सालार और मस्तानशा बापू जैसी प्रमुख दरगाहों को भी इस कार्रवाई के दौरान हटाया गया। प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया कि इस प्रक्रिया के दौरान शांति व्यवस्था बनी रहे और विध्वंस कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो सके।

मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

‘द लीजेंड ऑफ मौला जट’ नहीं चलेगी भारत में, रिलीज कैंसिल: आतंकी हाफिज सईद के समर्थक हमजा अली को देख लोगों ने किया था विरोध, राज ठाकरे ने भी दी थी चेतावनी

भारत के सिनेमाघरों में पाकिस्तान की फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ मौला जट्ट’ रिलीज नहीं होगी। यह जानकारी सूत्रों के हवाले से मीडिया में सामने आई है। बताया गया है कि यह निर्णय पाकिस्तान की ओर से भारतीय फिल्मों की रिलीज पर प्रतिबंध के चलते लिया गया है, जो 2019 से लागू है।

फवाद खान और माहिरा खान की ये फिल्म 1979 में आई मूवी मौला जट्ट का रीमिक्स है जिसे बिलाल लशारी ने डायरेक्ट किया था। जानकारी के अनुसार, 10 साल बाद जाकर कोई पाकिस्तानी फिल्म इंडिया में रिलीज होने की खबरें आई थी जिसके बाद, लेकिन अब इस पर रोक लग गई है।

बता दें कि जब से इस फिल्म को भारत में रिलीज करने की बातें चल रही थी तभी से इसका विरोध सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहा था। राज ठाकरे ने भी उन सिनेमाघरों को खुली चुनौती दी थी जो इस फिल्म को रिलीज करने वाले थे। उन्होंने कहा था महाराष्ट्र में किसी सिनेमाघर में ये फिल्म नहीं लगेगी।

इस फिल्म के विरोध का कारण फिल्म का एक्टर हमजा अली है जिसका कनेक्शन भारत में हुए 26/11 हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद से है। इसके अलावा उसे उसके हिदू विरोधी ट्वीट के लिए भी जाना जाता है।

2019 में जब मुंबई टेरर अटैक पर डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट किया था तब हमजा अली अब्बासी ने उन्हें बेवकूफ कहते हुए ये बताया था कि हाफिद सईद ने मुंबई ने सार्वजनिक रूप से मुंबई हमलों की निंदा की थी। साथ ही हाफिज सईद के शब्द दोहरा कहा था, “मैं मुंबई हमलों की निंदा करता हूँ। मेरी समस्या कश्मीर में भारत सरकार/सेना से है। मेरे मन में भारतीय लोगों के लिए कुछ नहीं है। वो लोग इंसान है और इंसान पाक है।”

इस ट्वीट के जरिए हमजा ने न केवल हाफिज अली के कुकर्मों को धो-पोंछने का काम किया था बल्कि खुलेआम हाफिज का बचाव करते हुए उसे अच्छा दिखाने की कोशिश की थी। इतना ही नहीं सोशल मीडिया पर उसके कई ट्वीट वायरल हैं जिसमें वो बताता दिखता है कि भारत में मुस्लिमों को दबाया जाता है।

इन्हीं ट्विटों को शेयर करते हुए लोग हमजा की फिल्म पर रोक लगाने की माँग कर रहे थे। सूत्रों से आ रही खबर से लगता है कि उन लोगों की सुनवाई हो गई है।

बता दें कि फवाद खान और माहिरा खान की यह फिल्म 2022 में पर्दे पर आई थी रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म ने दुनिया भर में 400 करोड़ से ज्यादा की कमाई की थी। उस दौरान इसे भारत में रिलीज नहीं किया गया था मगर कुछ दिन पहले खबर आई कि ये फिल्म 2 अक्टूबर को रिलीज होगी।

पाकिस्तान में जमीन के लिए भिड़े शिया और सुन्नी… अब तक 37 लोगों की मौत, सैंकड़ों घायल: दोनों और से चल रही ताबड़तोड़ गोलियाँ, जुलाई में हुई थी 35 की मौत

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के कुर्रम जिले में शिया और सुन्नी मुस्लिमों के बीच पिछले तीन महीने से हिंसा जारी है। 21 सितंबर 2024 को शुरू हुए हालिया हिंसा में अब तक 37 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। पिछले एक सप्ताह में शिया और सुन्नी संघर्ष में 150 से अधिक लोग घायल हुए हैं। यह मामला जमीन से जुड़े एक विवाद से शुरू हुआ है।

यह शिया और समुदाय के बीच चल रहे भूमि विवाद से जुड़ा है। दोनों समुदाय के लोग इस पर अपना-अपना दावा करते हैं। हालाँकि, जिरगा (मुस्लिम कबीलों की स्थानीय पंचायत) के माध्यम से युद्ध विराम पर सहमति बन गई, लेकिन जिले के 10 इलाकों में संघर्ष जारी रहा। हिंसा के दौरान भारी हथियार इस्तेमाल किए गए हैं।

एक अधिकारी ने बताया, “भूमि विवाद से शुरू हुआ मामला अब एक सांप्रदायिक झड़प में बदल गया है, जिसमें स्वचालित और अर्ध-स्वचालित हथियारों के साथ-साथ मोर्टार के गोले का भी इस्तेमाल किया गया है।” इस खूनी संघर्ष में मौत और घायलों के अलावा कुल 28 घर भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। कुर्रम जिले में इस्लाम के इन दो तबकों के बीच हिंसक झड़पों का लंबा इतिहास रहा है।

यह हिंसा साल 2007 में दो परिवारों के बीच शुरू हुई थी, जो धीरे-धीरे दो समुदायों के बीच होते हुए पूरे जिले में फैल गई। इस विवाद की जड़ में 30 एकड़ जमीन है। इसके मालिकाना हक को लेकर कुर्रम जिले के बुशेहरा गाँव में दो कबीलों के बीच विवाद है। अगस्त में अधिकारियों ने जिरगा के बुजुर्गों के साथ मिलकर समुदायों के बीच समझौता कराया था।

पाकिस्तान की स्थानीय खबरों को माने तो यह लड़ाई सुन्नी समुदाय के मिदगी कबीले और शिया समुदाय के मलीखेल कबीले के बीच इस जमीन को लेकर विवाद साल 2007 में शुरू हुआ था। उस समय भी हिंसा की घटनाएँ हुई थीं। इसके बाद से समय-समय पर हो रही हिंसा के कारण सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं।

खैबर पख्तूनख्वा के प्रवक्ता सैफ अली ने बताया कि इलाके में धार्मिक रूप से तनावपूर्ण स्थिति को कम करने के प्रयास चल रहे हैं। बता दें कि पाकिस्तान की आबादी में शिया मुस्लिमों की हिस्सेदारी लगभग 15 प्रतिशत है। वहीं, यहाँ सुन्नी संप्रदाय के मुस्लिमों का बहुमत है। इस साल जुलाई में हुई हिंसा में 35 लोग मारे गए थे। जिरगा की घोषणा के बाद युद्ध विराम की घोषणा की गई थी।

बरेली में अवैध मस्जिद निर्माण को लेकर विवाद, पथराव के वीडियो वायरल: बीजेपी विधायक विरोध में बैठे धरने पर, भारी पुलिस बल तैनात

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के केला डांडी गाँव में हाल ही में अवैध मस्जिद निर्माण के चलते सांप्रदायिक तनाव फैल गया है। यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने गाँव के अंदर एक अवैध मस्जिद का निर्माण करना शुरू किया। यह मामला तब और बिगड़ गया जब अवैध निर्माण को लेकर हिंदू समाज के लोग सड़कों पर उतर आए और कथित तौर पर मस्जिद की दीवार का एक हिस्सा गिर गया। इस घटना के बाद पूरे गाँव में तनाव फैल गया और पुलिस को भारी संख्या में तैनात करना पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिम समुदाय के फिदा हुसैन और उनके भाई आरिफ ने आबादी के बीच अपना प्लॉट मस्जिद के लिए दान कर दिया। इसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने उस प्लॉट पर दीवारें खड़ी कर दीं और वहां मस्जिद का निर्माण शुरू कर दिया। दीवारों पर मस्जिद की पेंटिंग कर दी गई और नमाज पढ़ी जाने लगी। लेकिन यह निर्माण बिना किसी सरकारी अनुमति के किया गया था, जो विवाद का मुख्य कारण बना।

हिंदू समुदाय के लोगों ने करीब तीन महीने पहले ही इस अवैध निर्माण को लेकर प्रशासन से शिकायत की थी। उस समय प्रशासन ने पुलिस की मौजूदगी में निर्माण कार्य रुकवा दिया था और उस स्थान पर ताला भी डलवा दिया था। हालाँकि, उसके बाद भी अवैध निर्माण को पूरी तरह से नहीं तुड़वाया गया, जिससे हिंदू समाज में नाराजगी बढ़ने लगी।

स्थिति तब और बिगड़ी जब कथित तौर पर शुक्रवार (27 सितंबर 2024) को हिंदू समाज के लोगों ने अवैध मस्जिद की दीवार का एक हिस्सा गिरा दिया। इस घटना के बाद पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची और अपनी निगरानी में फिर से दीवार बनवा दी। यह कदम पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करने वाला था, क्योंकि हिंदू समाज का आरोप था कि पुलिस मुस्लिम पक्ष के साथ मिलकर काम कर रही थी और अवैध निर्माण को बढ़ावा दे रही थी। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हिंदू समाज के लोग फिर से सड़कों पर उतर आए और धरने पर बैठ गए।

विधायक डॉ. एमपी आर्या भी इस विवाद में सक्रिय रूप से शामिल हो गए। जब उन्हें इस मामले की जानकारी हुई, तो वह तुरंत गाँव पहुँचे और धरने पर बैठी महिलाओं के साथ शामिल हो गए। उन्होंने भी इस अवैध निर्माण को हटवाने की माँग की और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर कड़ी आलोचना की। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए इस पूरे मामले की जानकारी दी और पुलिस के रवैये की आलोचना की।

इस विवाद के बाद पुलिस और प्रशासन हरकत में आए और गांव में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया। एसपी दक्षिणी मुकेश चंद्र मिश्रा ने इस मामले में कहा कि प्रशासन ने पहले भी मस्जिद के अवैध निर्माण को रुकवाने के लिए कदम उठाए थे। उन्होंने बताया कि मजिस्ट्रेट के आदेश पर पहले ही निर्माण कार्य को रुकवाया गया था, लेकिन हिंदू पक्ष का आरोप था कि वहां नमाज अदा की जा रही थी और यह निर्माण चोरी-छिपे फिर से शुरू किया गया था।

इस विवाद ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब दोनों समुदायों के बीच पथराव होने लगा। सोशल मीडिया पर इस पथराव की कई वीडियो वायरल हो गईं, जिनमें देखा जा सकता है कि दोनों पक्षों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंक रहे हैं। इस घटना के बाद इलाके में और तनाव फैल गया। पुलिस ने मौके पर तुरंत फायर ब्रिगेड की गाड़ी मंगवाई और छतों से फेंके जा रहे पत्थरों को रोकने के लिए सुरक्षा बढ़ाई गई।

पथराव के बाद पुलिस ने 12 लोगों को हिरासत में लिया। ये लोग मुख्य रूप से हिंदू समाज के थे, जिन पर अवैध निर्माण की दीवार गिराने का आरोप था। इस गिरफ्तारी ने हिंदू पक्ष के लोगों में और गुस्सा भर दिया, जिसके चलते उन्होंने विधायक एमपी आर्या के नेतृत्व में धरना देना शुरू कर दिया। धरने पर बैठे लोगों की मुख्य माँग यही थी कि पकड़े गए युवकों को बिना शर्त रिहा किया जाए और अवैध निर्माण को पूरी तरह से खत्म किया जाए। फिलहाल तनावपूर्ण हालात को देखते हुए गाँव में कई थानों की पुलिस और पीएससी बल तैनात किया गया।

फिलहाल गाँव में स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है। पुलिस बल की भारी तैनाती के बीच गाँव में शांति बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि, दोनों समुदायों के बीच तनाव अभी भी बना हुआ है और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। विधायक एमपी आर्या और उनके समर्थकों का कहना है कि जब तक अवैध निर्माण पूरी तरह से हटाया नहीं जाता और पकड़े गए युवकों को रिहा नहीं किया जाता, तब तक वह अपना धरना जारी रखेंगे।

RG Kar अस्पताल में हुई डॉक्टर की रेप-हत्या का TMC के छात्र नेताओं ने उड़ाया मजाक: आलोचना के बाद पार्टी ने 2 को किया सस्पेंड, BJP ने कहा- ये अपमान से भी परे है

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की छात्र शाखा ‘तृणमूल छात्र परिषद’ ने शुक्रवार (27 सितंबर 2024) को अपने दो वरिष्ठ नेताओं को निलंबित कर दिया। प्रांतिक चक्रवर्ती और राजन्या हलधर ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक महिला ट्रेनी डॉक्टर की बलात्कार के बाद निर्मम हत्या पर एक लघु फिल्म बनाई थी।

तृणमूल छात्र परिषद ने इसे पार्टी विरोधी गतिविधि बताया है और इसके आरोप में दोनों में निलंबित कर दिया। चक्रवर्ती और हलधर ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज की इस घटना पर बनाई लघु फिल्म का नाम ‘अगमनी, तिलोत्तोमादेर गल्पो’ (तिलोत्तोमा की कहानी) दिया है। यह मामला तब सामने आया, जब राजन्या हलधर ने सोशल मीडिया पर फिल्म का पोस्टर अपलोड किया।

राजन्य हलधर ने सोशल मीडिया पोस्टर के नीचे टैगलाइन दिया था, ‘आरजी कर घटना की पृष्ठभूमि में’। प्रांतिक चक्रवर्ती द्वारा निर्देशित यह फिल्म अगले महीने यानी अक्टूबर के पहले सप्ताह में रिलीज होने वाली है। परिषद के प्रदेश अध्यक्ष त्रिनकुर भट्टाचार्य ने नोटिस में कहा कि दोनों सदस्यों को निलंबित करने का निर्णय तब तक लागू रहेगा, जब तक पार्टी की अनुशासन समिति इस पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेती।

तृणमूल छात्र परिषद की नोटिस में कहा गया है, “दोनों छात्र कार्यकर्ताओं ने पार्टी के अनुशासन का उल्लंघन किया है और जनता के बीच यह गलत धारणा बनाई कि टीएमसीपी फिल्म का प्रचार कर रही है।” इस बीच, प्रांतिक चक्रवर्ती ने दावा किया है कि इस फिल्म का आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल की घटना से कोई संबंध नहीं है।

इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता कुणाल घोष ने कहा कि रचनात्मक क्षेत्र में हर किसी को व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, लेकिन अगर कोई भी आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी चौंकाने वाली एवं दुखद घटना का फायदा उठाकर अपनी फिल्म का प्रचार करने की कोशिश करेगा तो पार्टी उस पर कार्रवाई करेगी।

वहीं, बंगाल भाजपा ने इस फिल्म को लेकर निशाना साधते हुए कहा कि यह मृत डॉक्टर की स्मृति का घृणित अपमान है। भाजपा ने सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि टीएमसी ने एक मौत को सस्ते स्टंट में बदल दिया है। इससे साबित होता है कि उनके पास कोई शर्म, विवेक और न्याय के लिए सम्मान नहीं बचा है।

इससे पहले प्रांतिक ने कहा था, “मिथुन चक्रवर्ती ने सुमन घोष की ‘नोबेल चोर’ में काम किया था। सीबीआई अभी भी नोबेल पुरस्कार का पता नहीं लगा पाई है। क्या किसी ने फिल्म पर सवाल उठाया? राज चक्रवर्ती ने बरुन बिस्वास के जीवन पर ‘प्रोलॉय’ बनाई, हालांकि मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है।”

उन्होंने आगे कहा, “मेरी फिल्म में पूजा (दशहरा) से पहले सकारात्मक माहौल है। बलात्कार भारत के हर हिस्से में एक वास्तविकता है। मुझे खुशी है कि बंगाल इसके खिलाफ खड़ा हुआ। बंगाल में विरोध करने की हिम्मत और लोकतांत्रिक माहौल है। मेरी 12 मिनट की फिल्म विरोध, भावना और उम्मीद की कहानी है।”

राजन्या ने इस बात पर जोर दिया कि वह एक कलाकार के तौर पर इस परियोजना का हिस्सा थीं, न कि अपने राजनीतिक जुड़ाव के लिए। उन्होंने कहा, “हमने यह फिल्म एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए बनाई है। मेरी किरदार ‘माँ’ एक डॉक्टर है, जिसका बलात्कार हुआ था। दर्शक उसे आरजी कर जूनियर डॉक्टर के रूप में देख सकते हैं। हालाँकि हमने ऐसा नहीं बताया है।”

आरजी कर जूनियर डॉक्टर से एक्टर बनीं किंजल नंदा ने कहा, “यह आंदोलन को कमजोर करने का एक बेशर्म प्रयास है। मैं पोस्टर में ‘आरजी कर घटना की पृष्ठभूमि पर आधारित’ लाइन के इस्तेमाल की निंदा करती हूँ। एक एक्टर के तौर पर मैं एक कलाकार की स्वतंत्रता का सम्मान करती हूँ, लेकिन यह एक क्रूर अपराध है और इसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है।”

गाजियाबाद में धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़, LLB छात्र समेत 4 गिरफ्तार: ऑपइंडिया की रिपोर्ट के बाद पुलिस ने की कार्रवाई, सैकड़ों लोगों को बना चुके हैं ईसाई

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में जबरन धर्मांतरण से जुड़ा एक संगीन मामला सामने आया है, जिसमें मोदीनगर इलाके से चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें एक LLB छात्र भी शामिल है। इन आरोपितों ने अब तक सौ से अधिक लोगों का धर्मांतरण करवाया है, जिसमें वे लोगों को लालच, दबाव, और डर के आधार पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर करते थे। इससे पहले, इसी प्रकार की घटना नंदग्राम में भी सामने आई थी, जहाँ एक अन्य गिरोह ने लोगों को धर्मांतरण के लिए फुसलाया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोदीनगर पुलिस ने इस मामले में चार आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिनमें आशु, पोलूस मसीह, पास्टर रासी बालियार, और छट्ठू कुमार शाह शामिल हैं। आशु, जो कि एक LLB का छात्र है, पर अपनी चाची संगीता पर जबरन धर्मांतरण का दबाव बनाने का आरोप है। आशु अपनी चाची और उनके पति पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव डाल रहा था, और बीमारी के इलाज और अन्य सुविधाओं का लालच देकर उन्हें कन्वर्ट करने की कोशिश कर रहा था।

पुलिस ने जब इस मामले की जाँच की, तो आरोप सही पाए गए और आरोपितों की गिरफ्तारी की गई। यह भी पता चला कि इस मामले में दिल्ली से फंडिंग की जा रही थी। पोलूस मसीह को दिल्ली के एक संगठन से हर महीने 3,000 रुपये की फंडिंग मिलती थी, और उसे धर्म के प्रचार के लिए अलग से पैसे भी दिए जाते थे।

गिरफ्तार आरोपितों ने कबूल किया कि वे अब तक सौ से अधिक लोगों का धर्मांतरण करवा चुके हैं। विशेषकर बीमारी से पीड़ित लोग और युवा, जिन्हें नौकरी और शादी का लालच दिया जाता था, उनके निशाने पर थे। इस गिरोह के तार दिल्ली के अलावा गौतमबुद्ध नगर और अन्य राज्यों से भी जुड़े हुए हैं।

नंदग्राम के सेवानगर में पहले सामने आई घटना में भी यही पैटर्न देखा गया था, जहाँ इंग्राहम स्कूल के पीटीआई और पादरी को गिरफ्तार किया गया था। उस मामले में भी सैकड़ों लोगों का धर्मांतरण करने की बात सामने आई थी, और पुलिस ने इस गिरोह के संबंध मुंबई और केरल से होने की आशंका जताई थी।

धर्मांतरण के इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) का गठन किया है। डीसीपी देहात सुरेंद्रनाथ तिवारी के अनुसार, नंदग्राम और मोदीनगर दोनों ही मामलों की जांच के लिए अलग-अलग एसआईटी बनाई गई हैं, जो डीसीपी के तहत काम करेंगी। पुलिस अब आरोपितों के बैंक खातों, मोबाइल डेटा और विदेशी फंडिंग के बारे में भी जानकारी जुटा रही है। इसके अलावा, जिन लोगों का धर्मांतरण करवाया गया है, उनकी भी जानकारी एकत्र की जा रही है।

चारों आरोपितों की गिरफ्तारी से पहले ऑपइंडिया ने इस मामले पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उस रिपोर्ट में में पीड़िता संगीता ने अपने ससुराल वालों पर धर्मांतरण का दबाव बनाने का आरोप लगाया था। संगीता ने बताया कि उसके जेठ के बेटे आशु ने अपने परिवार के साथ ईसाई धर्म अपना लिया था और अब वह उसी पर भी धर्मांतरण का दबाव बना रहा था। जब संगीता और उसके पति ने इसका विरोध किया, तो उन पर मारपीट और धमकी दी गई। ऑपइंडिया ने इस रिपोर्ट में खासतौर पर बताया था कि संगीता के ससुराल वाले ईसाई पादरियों को बुलाकर उन्हें धर्मांतरण के लिए मजबूर कर रहे थे। इस रिपोर्ट के बाद पुलिस ने कार्रवाई की और चारों को गिरफ्तार कर लिया।

गाजियाबाद में धर्मांतरण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। पहले नंदग्राम और अब मोदीनगर में पुलिस को बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के सबूत मिले हैं। इन घटनाओं में आरोपितों ने लोगों को डर, लालच, और भ्रम के आधार पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया। पुलिस की जाँच में यह भी पता चला है कि इस तरह के गिरोह विदेशी फंडिंग के जरिए चलाए जा रहे हैं, और इन्हें दिल्ली, मुंबई, और अन्य राज्यों से समर्थन मिल रहा है। पुलिस का मानना है कि यह गिरोह न केवल गाजियाबाद में बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं और इनके तार कई राज्यों से जुड़े हुए हैं।

इजरायल ने इस बार सीधे हिजबुल्लाह के हेडक्वार्टर पर किया धमाका, 6 की मौत, 91 घायल: चीफ नसरल्लाह की मौत की भी खबर उड़ी, आतंकी संगठन ने नकारा

इजरायल ने एक बार फिर से लेबनान में हमला किया। इस बार उनका निशाना सीधे बेरट स्थित हिजबुल्लाह का हेडक्वार्टर था। दावा किया गया कि इस हमले में हेडक्वार्टर के भीतर कोई नहीं बचा। वहीं कुछ रिपोर्ट ने बताया कि हमले में 6 लोग मरे हैं और 91 घायल हुए हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स तो यह भी कह रही हैं कि इस हमले में हिजबुल्लाह के चीफ नसरल्लाह की मौत हो गई। हालाँकि हिजबुल्लाह संगठन ने खुद इस दावे से इनकार किया है।

बताया ये भी जा रहा कि इजराइली हमले में नसरल्लाह की बेटी और उसके भाई हाशिम सफी अल दीन की मौत हो गई है। हाशिम हिज्ब कार्यकारी परिषद का चीफ था। हालाँकि इन मौतों को लेकर अभी कहीं आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

वहीं हमले से जुड़ी जो जानकारी इजरायल रक्ष बल ने दी है। उसमें बताया गया, “दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह की मिसाइल यूनिट के कमांडर मुहम्मद अली इस्माइल और उनके डिप्टी हुसैन अहमद इस्माइल को इजरायल द्वारा एक सटीक हवाई हमले में मार गिराया गया है। अली इस्माइल इजरायल राज्य के खिलाफ कई आतंकवादी हमलों को निर्देशित करने के लिए जिम्मेदार था, जिसमें बुधवार को इजरायली क्षेत्र की ओर रॉकेट दागना और मध्य इजरायल की ओर सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल का प्रक्षेपण शामिल था।”

इजरायल ने बताया कि हिजबुल्ला ने इजरायली नागरिकों को मारने के लिए 150,000 रॉकेट छोड़े थे। अब इजरायली सेना हिजबुल्लाह को मारकर सिर्फ इजरायल को बचा रही है। लेबनान के लोगों के साथ उनका कोई द्वेष नहीं है। उन्होंने बताया कि हिजबुल्लाह की मिसाइलें उनकी जमीन और समुद्र दोनों को निशाना बना रही है, लेकिन वह अपने नागरिकों को बचाने के लिए चाहे भूमि से हो, वायु से हो या समुद्र से हो हमेशा तत्पर हैं। आईडीएफ ने जानकारी दी कि वह खुफिया सूचना के आधार पर आतंकी संगठन के ठिकाने पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा है कि हिजबुल्लाह को तबाह करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

जो खुद देता है आतंकवाद और नशे को बढ़ावा, वो हमें ज्ञान दे रहा: कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से करने पर भड़का भारत, UN में पाकिस्तानी PM को लताड़ा

कंगाली के कगार पर खड़े पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में एक बार फिर जम्मू-कश्मीर का राग अलापा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कश्मीर में भारत सरकार की कार्रवाई की आलोचना की है। इतना ही नहीं, उन्होंने जम्मू-कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन से की है। इन आरोपों का मुँहतोड़ जवाब देते हुए भारत ने कहा कि आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी से चलने वाला मुल्क ज्ञान दे रहा है।

शहबाज शरीफ ने कहा, “फिलिस्तीन के लोगों की तरह जम्मू और कश्मीर के लोगों ने भी अपनी स्वतंत्रता और आत्म-निर्णय के अधिकार के लिए एक सदी तक संघर्ष किया है।” उन्होंने भारत पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को लागू करने की प्रतिबद्धताओं से मुकरने का आरोप लगाया। इतना ही नहीं, इस्लामी प्रोपगेंडा फैलाने वाले ट्रॉल्स की तरह ही शहबाज शरीफ ने आरोप लगाए।

उन्होंने भारत पर न्यायेतर हत्याओं (एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग), क्षेत्र में लंबे समय तक कर्फ्यू लगाने और अन्य कठोर कार्रवाई करने का आरोप लगाया है। शरीफ ने कहा, “उपनिवेशवादी प्रोजेक्ट के तहत भारत कश्मीरी जमीनों और संपत्तियों को जब्त कर रहा है और मुस्लिम बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यक में बदलने की साजिश के तहत बाहरी लोगों को जम्मू और कश्मीर में बसा रहा है।”

शहबाज शरीफ ने यह आशंका जताई कि अगर पाकिस्तान किसी तरह का दुस्साहस करने की सोचता है तो भारत उसे छोड़ेगा नहीं है। भारत की बढ़ती सैन्य क्षमताओं के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत के नेतृत्व ने ‘नियंत्रण रेखा पार करने की धमकी’ दी है। हालाँकि उन्होंने अपनी कमजोर छिपाते हुए कहा कि पाकिस्तान जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

शहबाज शरीफ ने इस्लामोफोबिया पर बहस वाले एक सेगमेंट में उन्होंने भारत में ‘हिंदू वर्चस्ववादी एजेंडे’ को इस मुद्दे की ‘सबसे भयावह अभिव्यक्ति’ बताया। उन्होंने आगे कहा कि इसका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को वश में करना और ‘भारत की इस्लामी विरासत को मिटाना’ है।

शहबाज शरीफ को जवाब देते हुए UNGA में भारतीय राजनयिक भाविका मंगलनंदन ने कहा, “आज इस सभा में दुर्भाग्य से एक हास्यास्पद घटना घटी। आतंकवाद, नशीले पदार्थों के व्यापार और अंतरराष्ट्रीय अपराध के लिए विश्व में बदनाम सेना द्वारा संचालित एक देश ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर हमला करने का दुस्साहस किया। मैं पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के भाषण में भारत के संदर्भ के बारे में बात कर रही हूँ।”

भाविका मंगलनंदन ने पाकिस्तान को आईना दिखाते हुए कहा, “जैसा कि दुनिया जानती है, पाकिस्तान ने लंबे समय से अपने पड़ोसियों के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। इसने हमारी संसद, हमारी वित्तीय राजधानी मुंबई, बाजारों और तीर्थस्थलों पर हमला किया है। यह सूची लंबी है। ऐसे देश के लिए कहीं भी हिंसा के बारे में बात करना सबसे बड़ा पाखंड है।”

उन्होंने कहा, “धांधली वाले चुनावों के इतिहास वाले मुल्क के लिए लोकतंत्र में राजनीतिक विकल्पों के बारे में बात करना और भी असाधारण है। सच्चाई यह है कि पाकिस्तान हमारे क्षेत्र पर नजर गड़ाए हुए है और भारत के अभिन्न अंग जम्मू और कश्मीर में चुनावों को बाधित करने के लिए लगातार आतंकवाद का इस्तेमाल करता रहा है। आतंकवाद के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता।”

आतंकवाद पर पाकिस्तान को लताड़ लगाते हुए भाविका मंगलनंदन ने कहा, “पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद के परिणाम उसे निश्चित रूप से भुगतने होंगे। यह हास्यास्पद है कि एक राष्ट्र जिसने 1971 में नरसंहार किया और जो आज भी अपने अल्पसंख्यकों पर लगातार अत्याचार करता है, वह असहिष्णुता और भय के बारे में बोलने की हिम्मत करता है।”

उन्होंने कहा, “दुनिया खुद देख सकती है कि पाकिस्तान क्या है। हम एक ऐसे देश की बात कर रहे हैं जिसने लंबे समय तक ओसामा बिन लादेन को पनाह दी। एक ऐसा देश, जिसकी उंगलियों के निशान दुनिया भर में कई आतंकवादी घटनाओं पर हैं। हम जानते हैं कि पाकिस्तान सच्चाई का मुकाबला झूठ से करने की कोशिश करेगा। बार-बार दोहराने से कुछ नहीं बदलेगा। हमारा रुख स्पष्ट है।”