खाने-पीने की चीजों पर थूकने का एक और मामला उत्तर प्रदेश के नोएडा से सामने आया है। यहाँ के वायरल हो रहे एक वीडियो में यामीन का बेटा चाँद एक ढाबे पर बन रही रोटियों पर थूकता नजर आ रहा है। चाँद इसी ढाबे पर खाना बनाने के लिए कारीगर के तौर पर नियुक्त था। शनिवार (7 सितंबर, 2024) को पुलिस ने वीडियो का संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज कर ली है। चाँद को गिरफ्तार कर लिया गया है।
यह घटना नोएडा के थानाक्षेत्र रबूपुरा की है। यहाँ शनिवार को सब इंस्पेक्टर हरेंद्र कुमार ने थाने में तहरीर दी है। तहरीर में हरेंद्र कुमार ने बताया कि उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो मिला है। यह वीडियो रबूपुरा मार्किट में ही A-One ढाबे का है जो शुक्रवार (6 सितंबर) को रात लगभग 8:30 पर बनाया गया है। वीडियो में यामीन का बेटा चाँद दिखाई दे रहा है। रोटियाँ बनाते हुए चाँद उन पर थूक रहा है। चाँद की इस करतूत की सोशल मीडिया पर भी काफी आलोचना हो रही है।
— POLICE COMMISSIONERATE GAUTAM BUDDH NAGAR (@noidapolice) September 7, 2024
वीडियो में चाँद एक ही नहीं बल्कि कई बार अलग-अलग रोटियों पर थूकता दिख रहा है। अपनी शिकायत में दरोगा हरेंद्र ने रोटियों पर थूक रहे चाँद की करतूत को कोरोना गाइडलाइन का उल्लंघन बताया है। उन्होंने आशंका जताई है कि चाँद की हरकत से संक्रामक बीमारी फैल सकती है जो मानव जीवन के लिए खतरा बन सकती है। पुलिस ने इस तहरीर पर चाँद को नामजद करते शनिवार को हुए FIR दर्ज कर ली है। यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 (बी), 271 और 271 के तहत दर्ज की गई है।
ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। चाँद मूल रूप से नोएडा के ही रबूपुरा का रहने वाला है। ग्रेटर नोएडा के ADCP अशोक कुमार ने इस घटना पर बयान दिया है। उन्होंने बताया कि मामले में जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है। बताते चलें कि दुकानों का नाम A-One अधिकतर मुस्लिम वर्ग के लोग रखते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे A (अल्लाह) One (एक ही है) भी कहा जाता है।
उत्तराखंड के कुछ गाँवों में स्थानीय निवासियों ने मुस्लिमों की इंट्री बैन करने का फैसला किया है। तमाम ग्रामीणों ने एकमत हो कर गाँव के बाहर इस आशय का बोर्ड लगा दिया है। बोर्ड में मुस्लिम फेरीवालों को गाँव में न घुसने की हिदायत दी गई है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर कोई बाहरी मुस्लिम वहाँ सामान बेचने आया तो उस से जुर्माना वसूला जाएगा। रविवार (8 सितंबर, 2024) से यह बोर्ड सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हालाँकि स्थानीय निवासियों ने अपनी सफाई में इसे सुरक्षा के मद्देनजर लिया गया निर्णय बताया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चमोली जिले के नंदप्रयाग इलाके में एक नाबालिग हिन्दू लड़की से मुस्लिम समुदाय के सैलून संचालक द्वारा की गई अश्लील हरकतों के बाद लोगों में काफी गुस्सा है। अब हिन्दू संगठनों की पहल पर गाँव स्तर पर लोगों ने बाहर से आने वाले मुस्लिमों की इंट्री बैन करने का निर्णय लिया है। इस निर्णय का सबसे ज्यादा असर रुद्रप्रयाग जिले में देखा जा सकता है। यहाँ के ग्रामसभा गौरीकुंड, त्रियुगीनारायण, मेखंडा, शेरसी और नयालसू आदि में ग्रामीणों ने गाँव के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड लगा कर चेतावनी जारी कर दी है।
इस बोर्ड में लाल रंग से मोटे शब्दों में हेडलाइन के तौर पर ‘चेतावनी’ लिखा हुआ है। इसके बाद गौरीकुंड ग्रामसभा के बोर्ड में लिखा, “गैर हिन्दू/रोहिंग्या मुसलमानों व फेरी वालों का गाँव में व्यापार करना/घूमना वर्जित है। अगर गाँव में कहीं भी मिलता है तो दंडात्मक व कानूनी कार्रवाई की जाएगी।” इस बोर्ड में आदेश समूची ग्रामसभा द्वारा लिया जाना बताया गया है। बहरी व्यक्तियों को हिदायत देता लगभग यही बोर्ड न्यालसू, मेखंडा, त्रियुगीनारायण और शेरसी आदि ग्रामसभाओं में भी लगाया गया है।
बताया जा रहा है कि बोर्ड पर दी गई हिदायत का उल्लंघन करने वालों पर ग्रामीणों की तरफ से 5000 रुपए के जुर्माने का भी एलान किया गया है। ग्रामीणों की इस पहल का कई इस्लामी और वामपंथी हैंडलों द्वारा विरोध किया जा रहा है। आए दिन हिन्दू विरोधी पोस्ट करने वाले अली त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माँग की है कि वो बोर्ड लगाने वालों पर कार्रवाई करें। हालाँकि, ग्रामीणों ने मीडिया से बात करते हुए यह बोर्ड लगाने के पीछे की वजह स्पष्ट कर दी है।
इसकी वजह ये रही।
जो ये बोर्ड लगाना पड़ा मामला रुद्रप्रयाग जिले के शेरसी व गौरीकुंड गांव का है। pic.twitter.com/E6X7gDEjv0
गाँव शेरसी के एक स्थानीय निवासी ने राजसत्ता पोस्ट से बताया कि अधिकतर समय गाँव के पुरुष घरों के बाहर रह कर विभिन्न शहरों में कमाई करने चले जाते हैं जिसके बाद घरों में सिर्फ महिलाएँ रह जाती है। स्थानीय निवासी ने आगे कहा, “जिनका सत्यापन नहीं है वो गाँव में जाते हैं। उनके पास कोई परिचय पत्र नहीं है। घरों में महिलाएँ हैं। गाँव में हमारे मंदिर है जिसमें कभी ताले नहीं लगते। पूर्व में भी हमारे मंदिर में चोरी हुई है।”
गोंडाल में और स्थानीय गढ़वाल ज्वेलर्स की दुकान में ताला तोड़ कर हुई चोरी का उदहारण भी ग्रामीण द्वारा दिया गया। स्थानीय निवासी ने आगे बताया कि ऐसी घटनाओं के चलते लोग सचेत हुए हैं। बोर्ड को ग्रामीण ने जागरूकता के लिए लगा बताया है। बताया गया कि लोगों को समझाया गया है कि बिना पहचान पत्र के दिखने वाले किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को पकड़ कर पुलिस के हवाले करें। ग्रामीणों ने इसे सुरक्षा के मद्देनजर लिया गया सामूहिक निर्णय बताया है।
बांग्लादेश की जेल से रिहा होने के तीन हफ़्ते बाद कट्टरपंथी मुहम्मद जसीमुद्दीन रहमानी ने जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की बात कही है। उसने अपने नापाक एजेंडे के लिए पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान स्थित कट्टरपंथियों से भी मदद माँगी है। रहमानी कट्टरपंथी संगठन ‘अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT)’ का नेता है और इस्लामी आतंकी संगठन ‘अलकायदा’ का मुखर समर्थक है।
ऑनलाइन मीडिया हाउस The Print ने शनिवार (7 सितंबर) को एक रिपोर्ट में ये खुलासा किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि रहमानी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन से आजादी की घोषणा करने का भी आग्रह किया था। इतना ही नहीं, उसने खालिस्तानियों के समर्थन से भारत के विघटन में सहायता करने का वादा किया था।
शेख हसीना के तख्ता पलट के बाद BNP एवं जमात जैसे ट्टरपंथियों के सहयोग से बांग्लादेश में बनी मुहम्मद यूनुस सरकार द्वारा छोड़े गए रहमानी का वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो को लेकर द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, “अस्पताल के कमरे जैसी दिखने वाली जगह से की गई उसकी भड़काऊ टिप्पणी यूट्यूब पर पोस्ट की गई है और अब यह सोशल मीडिया पर घूम रही है।”
द प्रिंट की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
इस वीडियो में इस्लामी कट्टरपंथी मुहम्मद जसीमुद्दीन रहमानी यह कहता हुआ दिख रहा है, “मैं भारत को चेतावनी दे रहा हूँ… बांग्लादेश कोई सिक्किम या भूटान जैसा नहीं है। यह 18 करोड़ मुसलमानों का देश है… अगर आप बांग्लादेश की तरफ़ एक कदम भी बढ़ाते हैं तो हम चीन से कहेंगे कि चिकन नेक बंद कर दो।”
वीडियो में वह आगे कहता दिख रहा है, “हम सात बहनों (सेवन सिस्टर कहलाने वाले पूर्वोत्तर भारत के राज्य) से कहेंगे कि वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हों… कश्मीर से कहेंगे कि वह आजादी के लिए तैयार हो जाए। पाकिस्तान और अफगानिस्तान मिलकर कश्मीर को आजादी दिलाने में मदद करेंगे। हम कश्मीर की आजादी के लिए काम करेंगे।”
कट्टरपंथी रहमानी का ममता बनर्जी से विशेष आग्रह
इस्लामी कट्टरपंथी मुहम्मद जसीमुद्दीन रहमानी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कहा, “हम पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी से कहेंगे कि वह बंगाल को मोदी के शासन से मुक्त करें और आजादी की घोषणा करें।” उसने उन खालिस्तानी चरमपंथियों के साथ भी एकजुटता व्यक्त की, जो पंजाब को भारत से अलग करने का ख्वाब देखते हैं।
आतंकी संगठन ABT को दिल्ली पर कब्जे की उम्मीद
वीडियो में रहमानी आगे कहता है, “मैं सिखों से कहूँगा कि तुम्हारा समय आ गया है। अब आजादी का आह्वान करो। भारत के हर प्रांत में जो सिख खालिस्तानी हैं, उनका समय आ गया है।” आतंकी संगठन अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) के सरगना ने बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना को अलोकतांत्रिक तरीके से हटाए जाने से प्रेरित होकर दिल्ली पर कब्जे की उम्मीद जताई है।
उसने कहा, “अगर हमें चुनौती दी गई, अगर हमें नजरअंदाज किया गया, अगर हमारे देश में अराजकता पैदा की गई तो बांग्लादेश की तौहीद आबादी जैसे हसीना के खिलाफ उठी है, बांग्लादेश की आजादी की रक्षा के लिए, बांग्लादेश में इस्लाम की रक्षा के लिए, तौहीद एकजुट होकर आपका सामना करेंगे। वह दिन दूर नहीं जब आपका देश भी टूट जाएगा और दिल्ली के ऊपर तौहीद के झंडे लहराएँगे।”
कौन है जसीमुद्दीन रहमानी?
बरगुना में लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के मामले में रहमानी को 12 अगस्त 2013 को गिरफ्तार किया गया था। अंसारुल्लाह बांग्ला टीम के 30 सदस्यों को भी गिरफ्तार किया गया था। 2013 में गिरफ्तारी के बाद से रहमानी जेल में ही था। उस पर छह अलग-अलग मामले चल रहे हैं और पुलिस ने उनके खिलाफ सभी मामलों में चार्जशीट दाखिल कर दी है।
ढाका की एक अदालत ने 31 दिसंबर 2015 को ब्लॉगर राजीब हैदर की हत्या से जुड़े एक मामले में उसे 5 साल की सजा सुनाई थी। यह मामला पल्लबी पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। उसने यह सजा पूरी कर ली है। इस चरमपंथी समूह ने कम से कम चार ब्लॉगर्स और लेखकों की हत्या की है।
इस मामले के अलावा मोहम्मदपुर पुलिस स्टेशन में दो, गुलशन पुलिस स्टेशन में एक, बरगुना सदर पुलिस स्टेशन में एक और उत्तर पश्चिम पुलिस स्टेशन में एक मामला दर्ज किया गया था। इन सभी मामलों में मुकदमा लंबित है। दो मामलों में उसे 2020 और 2022 में ढाका के आतंकवाद-रोधी विशेष न्यायाधिकरण द्वारा जमानत दी गई थी।
साल 2022, 2023 और जनवरी 2024 में उसे अन्य तीन मामलों में जमानत दी गई थी। फरवरी 2013 में राजीब हैदर की हत्या के साथ अंसारुल्लाह बांग्ला टीम सुर्खियों में आई थी। मई 2015 में बांग्लादेश सरकार ने संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया। ABT ने 2016 में LGBT अधिकार कार्यकर्ता ज़ुल्हाज़ मन्नान और उनके दोस्त खांडोकर महबूब रब्बी टोनॉय की हत्या में भी शामिल थे।
भारत में अंसारुल्लाह बांग्ला टीम
बांग्लादेश में स्थित अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) अंतरराष्ट्रीय इस्लामी आतंकी संगठन अल कायदा से संबद्ध है। यह बांग्लादेश। के साथ-साथ भारत और म्यामांर में अपनी जड़े जमाने की फिराक में है। साल 2017 में भारत में पैर जमाने की कोशिश कर रहे पाँच एबीटी आतंकवादियों को असम में पकड़ा गया था।
जुलाई 2022 में असम में एबीटी से जुड़े दो मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया गया था। 2022 में फिर से एबीटी से जुड़े दो इमामों को गिरफ्तार किया गया था। दोनों इमामों को असम के गोलपाड़ा पुलिस ने एबीटी और इस्लामिक आतंकवादी समूह अल कायदा भारतीय उपमहाद्वीप (AQIS) के खिलाफ अभियान के तहत गिरफ्तार किया गया था।
पुलिस द्वारा कई घंटों तक पूछताछ करने के बाद तिलपारा नतून मस्जिद के 49 साल के इमाम जलालुद्दीन शेख और मोरनोई के टिंकुनिया शांतिपुर मस्जिद के 43 वर्षीय इमाम अब्दुस सुभान को पुलिस हिरासत में ले लिया गया था। जाँच के दौरान दोनों इमामों के घरों से आतंकी संगठनों से जुड़े सामान बरामद हुए थे।
अधिकारियों ने बताया कि जब दोनों इमामों के घरों की तलाशी ली गई तो उन्हें AQIS से जुड़े कई महत्वपूर्ण सबूत मिले थे। इसके अलावा उनके यहाँ से जिहादी साहित्य, पोस्टर, किताबें और मोबाइल फोन, सिम कार्ड और आईडी कार्ड सहित अन्य सामग्री भी मिली थीं। गिरफ्तार किए गए दोनों इमाम बारपेटा और मोरीगाँव में ABT इकाइयों के संपर्क में थे।
अगस्त 2022 में असम के मुख्यमंत्री ने बताया था कि पुलिस ने बांग्लादेशी आप्रावासियों के कई जिहादी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। इनमें AQIS से जुड़ा अंसारुल्लाह बांग्ला टीम सबसे अधिक सक्रिय था। पिछले कुछ महीनों में राज्य में एबीटी के पाँच मॉड्यूल पकड़े गए हैं। इन समूहों का भंडाफोड़ खुफिया सूचनाओं के आधार पर किया गया।
बांग्लादेश में शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर देश छोड़ने के बाद से ही हिन्दू विरोधी हिंसा चरम पर है और हिंदुओं पर हमले की सैकड़ों घटनाएँ हो चुकी हैं। वहाँ के नेताओं ने शेख हसीना को शरण देने को लेकर भारत को धमकाया भी है। मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश में अंतरिम सरकार चल रही है। नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस की सरकार ने जशीमुद्दीन रहमानी नामक कट्टरपंथी मौलाना को जेल से छोड़ दिया। अब उसने भी भारत के खिलाफ ज़हर उगला है।
‘अंसारुल्लाह बांग्ला टीम’ (ABT) के मुखिया मौलाना जशीमुद्दीन रहमानी ने अब जम्मू कश्मीर की ‘आज़ादी’ के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान से मदद माँगी है। वो अलकायदा और इससे जुड़े भारतीय उपमहाद्वीप में सक्रिय संगठन AQIS का भी कट्टर समर्थक है। उसने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी अपील की है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन से राज्य को ‘आज़ाद’ करें। साथ ही उसने खालिस्तानियों की मदद से भारत को खंडित करने का इरादा भी जाहिर किया है।
सोशल मीडिया पर उसका ये बयान सर्कुलेट हो रहा है, जो किसी अस्पताल के कमरे से दिया गया हुआ लगता है। इससे पहले भी वो और उसका संगठन कई जिहादी कंटेंट का प्रसार कर चुका है। अब उसने कहा है कि बांग्लादेश कोई सिक्किम या भूटान नहीं बल्कि 18 करोड़ मुस्लिमों का मुल्क है, अगर तुम बांग्लादेश की तरफ बढ़ोगे तो हम चीन से कह कर चिकेन्स नेक (पूर्वोत्तर और शेष भारत के बीच का क्षेत्र) को काटने के लिए कहेंगे। उसने कहा कि अब वो सिखों से कहेगा कि उनका समय आ गया है।
What on earth led to the release of a hate-filled terrorist from jail? One thing I can appreciate about Sheikh Hasina is her ability to keep these types of extremists in check. Just recently, Mufti Jashimuddin Rahmani, who leads the al-Qaeda-inspired Ansar-al Islam Bangla, got… pic.twitter.com/smrC0p1QeP
2013 से ही जशीमुद्दीन रहमानी को गाज़ीपुर स्थित काशिमपुर सेन्ट्रल जेल में रखा गया था। नास्तिक ब्लॉगर अहमद राजीब हैदर की हत्या के मामले में उसे दोषी ठहराया गया था। कई अन्य नास्तिक ब्लॉगरों की हत्या में भी उसका नाम आया था। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार शेख हसीना के शासनकाल के बंदियों को रिहा कर रही है। जमात-ए-इस्लामी और उसके संगठन ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ पर से भी प्रतिबंध हटा लिया गया है। रहमानी का ABT इसी संगठन से सदस्यों को भर्ती करता रहा है।
उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से लव जिहाद का मामला सामने आया है। यहाँ एक नाबालिग हिन्दू लड़की से रेप और धर्मान्तरण की कोशिश की गई है। पीड़िता को उसके पिता ने हिन्दू संगठन के सदस्यों के साथ होटल के एक कमरे से पकड़ा है। मामले का मुख्य आरोपित आमिर है, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आमिर खुद को राजा बताता था और हाथ में कलावा बाँधा करता था। घटना शनिवार (7 सितंबर 2024) की है।
आगरा के ताजगंज थानाक्षेत्र की 14 वर्षीय पीड़िता अपने परिवार के साथ रहती है। वह कक्षा 9 की छात्रा है। शनिवार को पीड़िता अपने घर से कोचिंग के लिए निकली पर काफी देर तक नहीं लौटी। परेशान घर वालों ने पीड़िता की खोजबीन शुरू कर दी। इसी दौरान पीड़िता के पिता को पता चला कि आमिर नाम का युवक उनकी बेटी को लम्बे समय से परेशान और ब्लैकमेल कर रहा था। जानकारी यह भी मिली कि शनिवार को वह पीड़िता के साथ शहर के एक होटल में गया है।
इस सूचना पर पीड़िता के पिता ने हिन्दू संगठनों से मदद माँगी। राष्ट्रीय बजरंग दल के प्रांत अध्यक्ष रौनक ठाकुर अपने साथियों सहित पीड़िता के पिता के साथ हो लिए। ये सब होटल पहुँचे और बंद पड़े एक कमरे को खुलवाया गया। सूचना सही पाई गई। अंदर आमिर पीड़िता के साथ मौजूद मिला। पीड़िता अपने पिता के साथ घर चली गई जबकि राष्ट्रीय बजरंग दल कर कार्यकर्ताओं ने आमिर को पुलिस के हवाले कर दिया। बाद में पीड़िता के पिता की तहरीर पर आमिर को नामजद करते हुए FIR दर्ज कर ली गई है।
तहरीर में पीड़िता के पिता ने आमिर पर अपनी बेटी को लम्बे समय से ब्लैकमेल करने और इस्लाम कबूल करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है। आरोप है कि उसने होटल में पीड़िता से रेप भी किया। पुलिस ने आमिर पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65 (1) के साथ पॉक्सो एक्ट व उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म सम्परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत FIR दर्ज कर ली है। आमिर को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस मामले की जाँच और अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।
ऑपइंडिया ने इस मामले में राष्ट्रीय बजरंग दल के पदाधिकारी रौनक ठाकुर से बात की। रौनक ने हमें बताया कि आमिर सोशल मीडिया के फेसबुक और इंस्टाग्रम हैंडलों पर काफी एक्टिव रहता है। वह हाथ में कलावा बाँध कर रहता है और खुद को राजा बताता है। बकौल रौनक आमिर ताजमहल के आसपास घूम कर लड़कियों का पीछा करता है। आमिर काफी लम्बे समय से पीड़िता का पीछा कर रहा था और आखिरकार उसने लड़की का नंबर हासिल करके ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया था।
कुछ लोग कहते हैं कि आज जो भारत है ये अंग्रेजों की देन है, यानी अंग्रेजों के आने से पहले भारत था ही नहीं। ऐसा मानने वालों में अभिनेता सैफ अली खान भी शामिल हैं। अब शिवा ट्राइलॉजी के लेखक अमीश त्रिपाठी ने एक वीडियो सीरीज शुरू की है, जिसमें उन्होंने तथ्यों एवं तर्कों के सहारे ऐसा मानने वालों को जवाब दिया है। पहले एपिसोड में ही उन्होंने बताया कि अंग्रेजी प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल का भी ऐसा ही मानना था। इस दौरान उन्होंने पॉलिटिकल कंसल्टेंट दिलीप चेरियन का बयान दिखाया, जिन्होंने कहा था कि आपस में दुश्मन रखने वाले कबीलों को एक झंडे के नीचे एकत्रित किया गया।
इसी तरह उन्होंने खुद को ‘हिस्ट्री बफ’ बताने वाले सैफ अली खान का बयान दिखाया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘इंडिया’ का कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था अंग्रेजों से पहले। अमीश त्रिपाठी ने इसका विश्लेषण किया है कि आज पढ़े-लिखे लोग भी ऐसा क्यों सोचते हैं। उन्होंने इस दौरान JNU में ‘सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज’ के प्रोफेसर राकेश बतबयाल का बयान दिखाया, जिन्होंने कहा था कि सैफ अली खान ने किताबों में पढ़ा होगा कि अंग्रेजों ने प्रशासनिक रूप से भारत के एक बड़े क्षेत्र को एक किया।
अमीश त्रिपाठी कहते हैं कि हमारी शिक्षा प्रणाली हमें ऐसी बातें सिखा रही हैं। उन्होंने बताया कि 200 वर्षों तक भारत अंग्रेजों व अन्य यूरोपियन देशों के गुलाम रहे जिन्होंने इतिहास अपने हिसाब से लिखा और हमारे सोच व नैरेटिव को अपने एजेंडे के लिए इस सोच से भर दिया कि हम एक राष्ट्र थे ही नहीं। उन्होंने हमारी आवाज़ों को दबा दिया और आज भी हमारी शिक्षा व्यवस्था गुलामी के कालखंड वाली ही है। हम चीजों को उसी तरह देखते हैं जैसा अंग्रेज चाहते थे। अमिश त्रिपाठी इसे Gaslighting कहते हैं, यानी पीड़ित के मन में ये बिठा देना कि उसका शोषण उसी की गलती है।
अमीश त्रिपाठी ने बताया कि भारत को अंग्रेजों ने बँटा हुआ बताया और उन्हें इसका फायदा हुआ, जैसे एक तमिल को कहा जाएगा कि पंजाबी उससे अलग हैं तो वो क्यों भारत की आज़ादी के लिए लड़ेंगे। उन्होंने एलेक्जेंडर डाओ की एक पुस्तक का जिक्र करते हुए बताया कि उसने लिखा था कि भारत कई टुकड़ों में बँटा हुआ है और ये आपस में लड़ते रहते हैं। JR सिली ने भी लिखा कि सबके अलग धर्म और रीति-रिवाज हैं। अंग्रेज मानते थे कि भारत को सभ्य बनाने के लिए इसे गुलाम बनाने की ज़रूरत थी।
अमीश त्रिपाठी ने कहा, “अंग्रेजों ने भारत को असभ्य, नियम का पालन न करने वाला और उपद्रवी बताया। रेडयार्ड किपलिंग ने कहा कि भारत को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी अंग्रेजी की थी। इसके बदले हमारी संस्कृति और हमारे जीवन पर भी उन्होंने अपना दावा ठोक दिया। जिन भारतीयों का अंग्रेजीकरण हो गया है, वो आज भी इस पर विश्वास करते हैं। ब्रिटिश प्रशासन भी यही कर रहा था। कैम्ब्रिज में एक अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि भारत कभी संगठित नहीं था। जबकि हम आज भी यही हैं और रहेंगे।”
उन्होंने इस दौरान ‘शोले’ के ‘गब्बर सिंह’ का उदाहरण दिया, जिसमें वो गाँव वालों की हिफाजत के लिए उनसे अनाज वगैरह लेने को जायज ठहराता है। लेखक अमीश त्रिपाठी ने कहा कि अगर हम खुद को कमज़ोर मान लेते तो उनसे लड़ नहीं पाते और उन्हें हम पर राज करने में आसानी होती। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे मात्र 1 लाख अंग्रेजों ने 35 करोड़ भारतीयों पर 200 वर्ष राज किया। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे भारत सबसे पुरानी सभ्यता है जो आज तक जीवित है, हमारे पूर्वज भारत को एक राष्ट्र के रूप में मानते थे।
उन्होंने इस दौरान विष्णु पुराण का उदाहरण दिया, जिसे आधुनिक इतिहासकार 1500 वर्ष पुराना तक बताते हैं, उसमें साफ़-साफ़ लिखा है कि जिस राष्ट्र के उत्तर में हिमालय और दक्षिण में समुद्र है उसे भारत कहते हैं और यहाँ भरत के वंशज रहते हैं। इसी ग्रन्थ में भारत के 7 महत्वपूर्ण पर्वतों के बारे में भी दिया गया है, जिनमें 2 दक्षिण भारत के हैं। इसमें चंद्रभागा से लेकर गोदावरी तक की नदियों के नाम है। इसमें लिखा है कि भारत के पश्चिम में ग्रीक और पूर्व में चीनी रहते हैं।
उन्होंने समझाया कि प्राचीन तमिल ग्रन्थ ‘तोलकप्पियम’ में लिखा है कि ये वेदों से प्रेरित है। अमीश त्रिपाठी ने विदेशियों की यात्रा वृत्तांत का जिक्र करते हुए भी बताया कि वो भी भारत को एक देश के रूप में देखते थे। 2000 वर्ष पूर्व सिंधु नदी पार कर के भारत आए लोगों ने कहा कि वो ‘इंडिका’ आए हैं, मेगस्थनीज ने भी लिखा कि उत्तर में पहाड़ है और दक्षिण में समुद्र। इसी तरह रोमन यात्री ने भारत में लोकतांत्रिक सरकार होने की बात कही, लिखा कि लोगों के पास अधिकार है, वो न्याय का सम्मान करते हैं, सच्चे हैं, लेकिन उनके पास राजा-मंत्री भी हैं जिनकी सेना है।
अमीश त्रिपाठी ने समझाया कि अंग्रेजों से 2000 वर्ष पूर्व भारत आए रोमन भी इसे एक राष्ट्र में देखते थे, वो रोमन जिनसे प्रेरित इमारतें इंग्लैंड में भी हैं। सन् 400 में भारत आए एक चीनी संत ने लिखा कि यहाँ उत्तर के पहाड़ों से लेकर दक्षिण के सागर तक भगवान बुद्ध उन्हें महसूस हुए। श्रीलंका से आए बौद्ध तमिलनाडु में उतरे जो गौतम बुद्ध के जन्मस्थान से 2500 किलोमीटर दूर है लेकिन उन्हें पता था कि वो भारत में आए हैं। यहाँ तक कि अरब यात्रियों ने भी भारत को एक सभ्यता माना, उन्होंने लिखा कि भारत कई कबीलों से भरा है लेकिन वो एक हैं, अपने पूर्वजों के प्रति उनमें एक जैसी श्रद्धा है।
उन्होंने बताया कि कैसे कोलंबस भी भारत को खोजने निकला था लेकिन अमेरिका पहुँच गया, वो भी भारत को एक राष्ट्र के रूप में ही देखता था। उन्होंने सवाल दागा कि अंग्रेजों ने फिर भारत का नाम ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ क्यों रखा? उन्होंने बताया कि 17वीं शताब्दी में यूरोप में युद्ध को रोकने के लिए एक संधि हुई और परिभाषित किया गया कि जिसकी एक भाषा, एक रिलिजन और एक नस्ल है वही देश है। वहाँ ईसाई मजहब में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक दो अलग-अलग पंथ थे।
अमीश त्रिपाठी ने कहा कि शायद भारत इस परिभाषा में फिट नहीं बैठ रहा था लेकिन एक सभ्यता की परिभाषा में फिट बैठता है जो एक सांस्कृतिक धागे से बँधा हो। उन्होंने बताया कि एक सभ्यता एक राष्ट्र से बहुत बड़ा होता है, जैसे ब्रिटेन एक राष्ट्र है लेकिन पश्चिमी सभ्यता का भाग है, UAE-सऊदी भी अलग-अलग देश हैं लेकिन अरब सभ्यता का भाग हैं। नेशन स्टेट का कॉन्सेप्ट 1648 से आया, जबकि सभ्यता पुरानी है। सभ्यता विविधता के साथ फलती-फूलती है, नेशन स्टेट में एक सरकार के सारे नियम होते हैं लेकिन सभ्यता किसी राजनीतिक शक्ति नहीं बल्कि नैतिकता से चलती है, जैसे भारत में धर्म है।
जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा का चुनाव होे जा रहा है। इस दौरान वहाँ बहुत कुछ बदल गया है। राज्य में अब ना ही धारा 370 और ना ही पूर्ण राज्य का दर्जा। जम्मू-कश्मीर अब केंद्रशासित प्रदेश है। इसके साथ ही यहाँ का सामाजिक परिदृश्य भी बदल गया है। यहाँ के वाल्मीकि समुदाय के लोग पहली बार मतदान करेंगे। इससे पहले उन्हें मतदान करने का अधिकार नहीं था।
जम्मू-कश्मीर में रह रहे लगभग 350 वाल्मीकि परिवार के लोग इससे बेहद उत्साहित हैं। अनुच्छेद 370 और 35A हटने के बाद उन्हें अन्य नागरिकों की तरह ही सारे अधिकार मिल गए हैं। इन परिवारों के पूर्वजों को 1957 में तत्कालीन सरकार द्वारा महामारी के दौरान सफाई कर्मचारी के रूप में काम करने के लिए पंजाब से जम्मू लाया गया था।
यह परिवार यहीं का होकर रह गया। इसके बावजूद इन्हें राज्य के स्थायी निवासी का कभी दर्जा नहीं दिया गया। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सबसे अहम हिस्सा मतदान तक से वंचित यह तबका जम्मू-कश्मीर में दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रह रहा था। इन्हें राज्य के अन्य निवासियों के लिए उपलब्ध अन्य अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया था।
केंद्र की मोदी सरकार ने जब 5 अगस्त 2019 को राज्य से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया तो इनकी स्थिति अचानक से बदल गई। इनके राज्य में आने के लगभग छह दशक बाद वाल्मीकि समुदाय के सदस्यों को आखिरकार 2020 में स्थायी निवास प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। इस तरह इन परिवारों के लिए यह एक नया सवेरा था।
वाल्मीकि समुदाय के इन परिवारों के लगभग 10,000 सदस्य राज्य विधानसभा चुनाव में पहली बार मतदान करेंगे। वाल्मीकि समाज के अध्यक्ष घारू भट्टी ने इंडिया टुडे से बातचीत में संवैधानिक बदलावों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति समुदाय की ओर से गहरी कृतज्ञता व्यक्त की है। उन्होंने कहा यह सपना सच होने जैसा है।
दरअसल, मतदान के साथ-साथ वाल्मीकि समुदाय के बच्चों के वहाँ की सरकारी नौकरियों में आवेदन भी नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनके पास स्थायी निवासी प्रमाण पत्र नहीं था। इससे उन लोगों में भारी निराशा होती है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे वाल्मीकि समुदाय में खुशी की लहर छा रही है।
पाकिस्तान जैसी हालत थी वाल्मीकि समुदाय की
पाकिस्तान में सफाईकर्मियों की नौकरी के लिए गैर-मुस्लिम होना जरूरी है। इस तरह के वहाँ विज्ञापन भी निकलते रहते हैं। नाले-पेशाब-पखाना साफ करते हिंदू दलितों की जो हालत आज पाकिस्तान में है, वही हालत अनुच्छेद 370 के उन्मूलन से पहले भारत के जम्मू-कश्मीर में थी। इनके लिए जम्मू-कश्मीर का कोई भी राजनीतिक दल आवाज नहीं उठाया।
1957 में जम्मू-कश्मीर राज्य ने राज्य विधानसभा के शासनादेश से सफाई कर्मी के नाम पर वाल्मीकि समाज के लोगों को पंजाब के पठानकोट, अमृतसर, जालंधर, होशियारपुर इत्यादि से लाकर जम्मू-कश्मीर राज्य के भिन्न-भिन्न स्थानों पर उनकी कॉलोनी बना कर बसाया गया। सरकारी दस्तावेजों में इस नौकरी को ‘भंगी पेशा’ नाम दिया गया था।
वाल्मीकि समुदाय के लोगों को सफाई-कर्म के अलावा कोई भी अन्य नौकरी करना आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित था। देश-विदेश तक से शिक्षित इस समुदाय के लोग न ही किसी सरकारी उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल कोर्स, जैसे मेडिकल या इंजीनियरिंग कोर्स में एडमिशन ले सकते थे, न ही विधानसभा में चुनाव लड़ सकते थे और वोट भी नहीं डाल सकते थे।
उत्तराखंड के विभिन्न इलाकों में डेमोग्राफिक बदलाव की खबरों के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने ऐक्शन शुरू कर दिया है। लोगों के सत्यापन के लिए पुलिस ने ‘वेरिफिकेशन अभियान’ शुरू किया है। इससे पहले सीएम धामी ने डीजीपी अभिनव कुमार एवं अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मिलकर उन्हें जनसांख्यिकी परिवर्तन, धर्मांतरण और लव जिहाद के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश दिया था।
सत्यापन अभियान को लेकर DGP अभिनव कुमार ने शनिवार (7 सितंबर 2024) को कहा कि साल 2011 के बाद जनसंख्या की जानकारी के लिए कोई जनगणना नहीं हुई है, लेकिन कुछ लोगों के बीच, खासकर पहाड़ी जिलों में यह धारणा है कि पिछले कुछ वर्षों में बाहर से लोगों के बसने के कारण वहाँ की डेमोग्राफी बदल गई है। इसलिए यह महीने भर का अभियान शुरू किया गया है।
TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, डीजीपी ने कहा कि राज्य में बसे असामाजिक तत्वों की जाँच के लिए कुछ क्षेत्रों में एक महीने का वेरिफिकेशन अभियान शुरू किया गया है। इसके पूरा होने के बाद डेमोग्राफी बदलाव के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। अगर इस प्रकार का कोई मामला है तो इस अभियान से इसकी जानकारी मिलेगी।
दरअसल, अंतिम बार साल 2011 में हुई जनगणना के दौरान उत्तराखंड की कुल जनसंख्या लगभग 1.10 करोड़ थी। इसमें लगभग 84 लाख आबादी हिंदू थी, जो कुल जनसंख्या का 83% थी। वहीं, मुस्लिमों की आबादी 14.06 लाख यानी 13.9% और सिख 2.34% थे। वहीं, 2001 की जनगणना में राज्य में मुस्लिम आबादी 10.12 लाख थी।
लव जिहाद के मामलों को लेकर DGP ने कहा कि दो व्यस्क अपना जीवनसाथी चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन, अगर कोई दूसरे के धर्म को बदलने के इरादे से रिश्ता बनाता है तो पुलिस मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई करेगी। अगर ऐसा कोई मकसद नहीं है तो पुलिस किसी को परेशान नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि दोनों मुद्दे राज्य पुलिस के लिए प्राथमिकता है।
हाल ही में कुछ हिंदूवादी संगठनों ने आरोप लगाया था कि देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, पौड़ी गढ़वाल एवं टिहरी गढ़वाल जैसे कुछ पहाड़ी जिलों में मुस्लिमों की आबादी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। उनका आरोप है कि यह देवभूमि की डेमोग्राफी को बदलने की व्यापक साजिश का हिस्सा है और इसे सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया जा रहा है।
दरअसल, उत्तरकाशी के पुरोला कस्बे, धारचूला और चमोली के नंदानगर इलाके जैसे कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में हाल ही में सांप्रदायिक तनाव हुए थे। इसमें लव जिहाद की बड़ी भूमिका थी। इसको लेकर हिंदू कार्यकर्ताओं ने राज्य में बाहरी लोगों की मौजूदगी बढ़ने का सवाल भी उठाया है। इसके बाद सीएम धामी ने कार्रवाई का आदेश दिया।
देश भर में मनाए जा रहे गणेशोत्सव के दौरान मध्य प्रदेश के रतलाम के मोचीपुरा में गणेश प्रतिमा पर किसी ने पत्थर फेंक दिया। इसको लेकर बवाल हो गया है। शनिवार (7 सितंबर) की रात 500 से ज्यादा लोगों ने स्टेशन रोड थाने का घेराव कर दिया और जमकर नारेबाजी की। पुलिस ने पहले उन्हें समझाया और बाद में अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली।
एफआईआर दर्ज करने के बाद पुलिस जाँच के लिए घटनास्थल पर गई। पीछे-पीछे भीड़ भी वहाँ पहुँच गई। एसपी राहुल कुमार लोढ़ा भीड़ को समझा रहे थे और लोगों को वापस लौटने के लिए बोल रहे थे। लोगों ने वापस लौटना भी शुरू कर दिया। इसी बीच किसी ने फिर पत्थर फेंक दिया। जवाब में लोगों ने भी पत्थर फेंके गए।
एक पत्थर पुलिस की गाड़ी पर भी लगा, जिससे उसका शीशा टूट गया। हालात को बिगड़ने से रोकने के लिए पुलिस एक्शन में आई। उसने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग किया। फिलहाल, किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए शहर में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। सुरक्षाबलों की दो टुकड़ियाँ बुलाई गई हैं।
एफआईआर में कहा गया है कि शनिवार रात करीब 8.30 बजे पूजा समिति के लोगों के साथ गणेश जी की स्थापना के लिए खेतलपुर से मूर्ति लेकर मेहंदीकुई बालाजी से हाथीखाना मोचीपुरा होते हुए जा रहे थे। इस जुलूस में महिलाएँ, बच्चे भी साथ थे। जैसे ही वे लोग हाथीखाना रोड पर मोचीपुरा पहुँचा, किसी ने मूर्ति पर पत्थर फेंक दिया।
सिटी एसपी अभिनव बारंगे ने बताया, ‘जुलूस में शामिल लोगों में से कुछ का यह भी कहना है कि उनके ऊपर पत्थर फेंके गए। इसकी तस्दीक के लिए सीसीटीवी कंट्रोल रूम में उस व्यक्ति को भेजा गया, जिसने पत्थर फेंके जाने के आरोप लगाए। फिलहाल, केस दर्ज कर लिया गया है। स्थिति नियंत्रण में है।’
विरोध प्रदर्शन में शामिल विश्व हिंदू परिषद (VHP) का कहना है कि त्योहार आने के पहले ही इस तरह का षड्यंत्र रचा गया। मुस्लिम क्षेत्रों में हिंदू समाज के कार्यक्रमों को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि मोचीपुरा में कुछ कट्टरपंथियों ने पत्थरबाजी की है। अब प्रश्न ये है कि किसी न किसी ने तो पत्थर मारा ही है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शनिवार (7 सितंबर 2024) को एक बेहद महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार उन लोगों को आधार कार्ड जारी नहीं करेगी, जिन्होंने साल 2015 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का हिस्सा बनने के लिए आवेदन नहीं किया था। उन्होंने कहा कि यह निर्णय असम सरकार द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है।
सीएम सरमा ने धुबरी, बारपेटा और मोरीगाँव का उदाहरण दिया, जहाँ अनुमानित जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड जारी किए गए हैं। ये तीनों जिले मुस्लिम बहुल हैं। अनुमानित जनसंख्या के अनुपात में धुबरी में 103%, बारपेटा में 103% और मोरीगाँव में 101% आधार कार्ड जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इससे लगता है कि इन जिलों में संदिग्ध विदेशियों ने भी आधार कार्ड हासिल किए हैं।
असम के मुख्यमंत्री सरमा कहा कि इसके कारण राज्य सरकार ने भविष्य में आधार कार्ड जारी करने के लिए एक मानक संचालन प्रोटोकॉल जारी करने का निर्णय लिया है। इसके तहत एनआरसी आवेदन संख्या प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा, जो उन्हें साल 2015 में आवेदन करते समय प्रदान की गई थी। बता दें कि हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि असम में घुसपैठियों की संख्या में वृद्धि हुई है।
एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया साल 2015 में शुरू हुई थी। हालाँकि, साल 2019 में ‘अंतिम एनआरसी’ के प्रकाशन के बाद फिलहाल यह अधर में लटकी हुई है। इस प्रक्रिया में जो आवेदक 24 मार्च 1971 से पहले राज्य में आ चुके थे, उन्हें एनआरसी में शामिल किया जाना था और उन्हें नागरिक के रूप में मान्यता दी जानी थी।
असम के कुछ विशेष ज़िलों में जनसंख्या से अधिक लोगों ने आधार कार्ड का आवेदन किया। इसीलिए हम उन्हें आधार कार्ड देंगे जिसके पास NRC नंबर हो, ताकि घुसपैठियों को नागरिकता ना मिले। #Clause6Implementationpic.twitter.com/Qp8urA7oR8
जिन लोगों को एनआरसी से बाहर रखा गया था, उन्हें राज्य की विदेशी न्यायाधिकरण प्रणाली में मुकदमे का सामना करना था। इसके लिए आवेदन मार्च से अगस्त 2015 के बीच किए गए थे। इसमें 3,30,27,661 लोगों ने आवेदन किया था। अगस्त 2019 में प्रकाशित अंतिम एनआरसी में इनमें से 19 लाख आवेदकों को बाहर कर दिया गया था।
हालाँकि, उस एनआरसी को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है। मुख्यमंत्री सरमा ने सुझाव दिया कि जो लोग एनआरसी के लिए आवेदन करने वाले 3.3 करोड़ लोगों में शामिल नहीं हैं, उन्हें आधार कार्ड जारी नहीं किए जाएँगे।
उन्होंने कहा, “किसी व्यक्ति का नाम एनआरसी में शामिल किया गया या नहीं, यह अलग बात है, लेकिन उसे आवेदक होना चाहिए। अगर आपने आवेदन ही नहीं किया है तो इसका मतलब है कि आप असम में थे ही नहीं। इससे प्रथम दृष्टया यह माना जा सकता है कि व्यक्ति 2014 के बाद असम में आया था।”
उन्होंने आगे कहा, “1 अक्टूबर से असम में आधार कार्ड की उपलब्धता एक कठिन परीक्षा होगी। हम अगले 10-15 दिनों में एक सख्त एसओपी जारी करेंगे।” उन्होंने कहा कि चाय बागान समुदाय को इस प्रक्रिया में कठिनाइयों से छूट दी जाएगी, क्योंकि राज्य सरकार अभी भी समुदाय के एक बड़े हिस्से के लोगों के आधार कार्ड वितरित नहीं कर पाई है।