Wednesday, April 1, 2020
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35-A का वह पहलू जिसका भार उठाते जम्मू-कश्मीर में दलितों की पीढ़ियाँ खप गईं

जब शेष भारत में ऐसा माहौल है कि जाति सूचक शब्द बोलने पर सजा हो जाती है तब J&K में वाल्मीकि समुदाय को जाति प्रमाण पत्र तक जारी नहीं होता, जिससे इस समुदाय के लोगों को अनुसूचित जातियों के लिए बनाए गए विशेष प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ता है

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अबुल फ़ज़्ल ने ‘आइन-ए-अक़बरी’ में लिखा है कि कश्मीर के सबसे इज़्ज़तदार लोग वे ऋषि हैं जो रिवाज़ों से बँधे नहीं हैं फिर भी ईश्वर के सच्चे पुजारी हैं। ये ऋषि किसी अन्य मत या पंथ को गाली नहीं देते और न ही किसी से कुछ माँगते हैं बल्कि वे तो राहगीरों के लिए मार्ग पर फल देने वाले वृक्ष लगाते हैं।

प्राचीनकाल में ऐसे ऋषि केवल कश्मीर में ही नहीं बल्कि समूचे भारत में थे। जैसा कि भाषा विज्ञान के ख्यातिप्राप्त प्रोफेसर कपिल कपूर कहते हैं, “ऋषिगण अपने जमाने के ‘इंटेलेक्चुअल’ हुआ करते थे। इसमें संशय नहीं कि समाज को दिशा दिखाने के साथ ही ये ऋषि सामाजिक बुराइयों की सफाई भी करते रहते थे।”

ऋषि परंपरा में सर्वाधिक प्रसिद्ध आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। यह विडंबना ही है कि वाल्मीकि को अपना मानने वाला और खुद को उनके नाम से संबोधित करने वाला ‘वाल्मीकि समुदाय’ आज भी मैला ढोने का घृणित काम करने को विवश है। दलित वर्ग के वाल्मीकि समुदाय के लोग भारत में हर जगह रहते हैं और चूहड़ा, भंगी, मेहतर आदि नामों से भी जाने जाते हैं। हमारे आसपास प्रायः वाल्मीकि समुदाय के लोग सीवर में गहरे उतरकर सफ़ाई करते दिख जाएँगे जिन्हें नगरपालिका अस्थाई रूप से सफ़ाई कर्मचारी के तौर पर वेतन देती है

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वाल्मीकि समुदाय तथा अन्य दलित वर्गों को संविधान और समय-समय पर लागू किए गए क़ानूनों द्वारा अनेक प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं। सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 में छुआछूत करने वालों को दंड के प्रावधान हैं। सन 1993 और 2013 में आये अन्य कानूनों में यह प्रावधान किया गया कि स्थानीय प्रशासन सर्वे कर यह सुनिश्चित करेगा कि सूखे पाखाने न बनें जहाँ हाथों से मानव मल-मूत्र की सफ़ाई करनी पड़े।

जो व्यक्ति इस प्रकार के कार्यों में लिप्त हैं उनके पुनर्वास और मैला ढोने का काम छुड़ा कर दूसरे सम्मानित रोजगार देने का प्रावधान भी किया गया है। दलितों के उत्थान के लिए देश में न जाने कितने आंदोलन हुए, कमीशन और क़ानून बने जिनकी कोई गिनती नहीं है। लेकिन जम्मू कश्मीर राज्य में 1957 से रह रहे वाल्मीकि समुदाय की पीड़ा ऐसी है जिससे देश आज भी अनभिज्ञ है। इसका एक कारण यह भी है कि शेष भारत में दलितों के लिए जो कानून बने हैं वे जम्मू कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय के लोगों पर लागू नहीं होते।

यह कहानी आरंभ होती है सन 1957 में जब जम्मू-कश्मीर के सफ़ाई कर्मचारी कई महीनों के लिए हड़ताल पर चले गए थे। तब जम्मू कश्मीर राज्य सरकार के हाथ पाँव फूल गए थे क्योंकि पूरे राज्य में विशेषकर जम्मू और श्रीनगर में कूड़े-कचरे और मानव मल-मूत्र का अंबार लग गया था। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री बक्शी ग़ुलाम मुहम्मद ने कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और तय किया कि दूसरे राज्यों से सफ़ाई कर्मचारी बुलाकर उन्हें जम्मू कश्मीर में नौकरी दी जाएगी।

चूँकि निकटतम राज्य पंजाब था इसलिए वहाँ के गुरदासपुर और अमृतसर ज़िले से लगभग 272 सफ़ाई कर्मचारी बुलाए गए और उन्हें जम्मू डिवीज़न में बसाया गया। जम्मू कश्मीर राज्य में उन सभी वाल्मीकि समुदाय के लोगों को बसाने के साथ ही उनके साथ संवैधानिक छल किया गया।

दरसअल जम्मू-कश्मीर राज्य भारत की स्वतंत्रता के समय से ही कुछ मुट्ठी भर नेताओं के स्वार्थ का शिकार हुआ जिसका परिणाम आज वहाँ रह रहा प्रत्येक व्यक्ति भुगत रहा है। इसकी शुरुआत तब हुई जब शेख अब्दुल्ला से मित्रता रखने वाले जवाहरलाल नेहरू ने संविधान बनने के अंतिम दिनों में गोपालस्वामी आयंगर के ज़रिये अनुच्छेद 370 को संविधान में जुड़वा दिया।

अनुच्छेद 370 यह कहता है कि भारतीय संविधान एक बार में पूर्ण रूप से जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं होगा। भारतीय संविधान के सभी अनुच्छेद और अन्य कानूनी प्रावधान एक-एक कर के राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक आदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करवाए गए। अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान है कि भारत के राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर राज्य से सलाह लेकर समय-समय पर संविधान के अनुच्छेद राज्य में लागू करवाते रहेंगे।

इसी क्रम में 14 मई 1954 को एक ऐसा संवैधानिक आदेश भारत के राष्ट्रपति द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करवाया गया जिसने भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ दिया। इस अनुच्छेद को 35-A के नाम से जाना जाता है। इसी अनुच्छेद के कारण आज जम्मू-कश्मीर में वाल्मीकि समुदाय समेत कई समुदाय के लोग पीड़ित हैं।

अनुच्छेद 35-A जम्मू-कश्मीर राज्य को यह निर्णय लेने का अधिकार देता है कि राज्य के स्थाई निवासी कौन होंगे। अर्थात यह राज्य तय करेगा कि स्थाई निवास प्रमाण पत्र किसको देना है और किसे नहीं। जम्मू-कश्मीर राज्य को जब यह अधिकार दिया गया तब तक राज्य का संविधान भी नहीं बना था। बाद में राज्य का संविधान बनते ही उसमें यह लिख दिया गया कि जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासी का दर्ज़ा उन्हें ही दिया जाएगा जो 1944 या उसके पहले से राज्य में रह रहे हैं।  

लेकिन वाल्मीकि समाज के लोग तो 1957 में पंजाब से लाकर बसाए गए थे इसलिए आजतक उन्हें जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं माना गया और उन्हें स्थाई निवास प्रमाण पत्र- जिसे PRC कहा जाता है- नहीं दिया गया। राज्य सरकार ने वाल्मीकि समुदाय के लोगों को अपने यहाँ रोजगार देने के लिए नियमों में परिवर्तन कर यह लिख दिया कि इन्हें केवल ‘सफ़ाई कर्मचारी’ के रूप में ही अस्थाई रूप से रहने का अधिकार और नौकरी दी जाएगी। इस प्रकार जब इस समुदाय का कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसके माथे पर वैधानिक रूप से ‘दलित’ लिखा होता है। वह बड़ा होकर चाहे कितनी भी पढ़ाई कर ले उसे जम्मू-कश्मीर राज्य में सफ़ाई कर्मचारी की नौकरी ही मिल सकती है।

वाल्मीकि समुदाय के लोगों के पास स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वे राज्य में स्थाई रूप से न तो बस सकते हैं न ही संपत्ति खरीद सकते हैं। उनके बच्चों को राज्य सरकार द्वारा छात्रवृत्ति भी नहीं मिल सकती। यही नहीं PRC के अभाव में वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को राज्य सरकार के इंजीनियरिंग, मेडिकल या किसी अन्य टेक्निकल कोर्स के कॉलेजों में दाख़िला नहीं मिल सकता।     

जम्मू-कश्मीर राज्य में 1957 में आए वाल्मीकि समुदाय के 272 लोगों के वंशजों की संख्या आज बढ़कर हज़ारों में हो गई है लेकिन वे उसी अस्थाई रूप से एक के ऊपर एक बने कई तलों में बने बसेरों में रहते हैं जो आज से 60 वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर राज्य ने उन्हें रहने के लिए दिए थे क्योंकि राज्य सरकार उन्हें मकान बनवाकर रहने की अनुमति नहीं देती। स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वाल्मीकि समुदाय के लोग लोकसभा चुनाव में तो मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं किंतु विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डाल सकते।

हालत ये हो चुकी है कि आज जब पूरे देश में दलित उत्थान की बातें होती हैं तब जम्मू-कश्मीर में रह रहे वाल्मीकि समुदाय के लड़के-लड़कियाँ स्कूली शिक्षा के आगे पढ़ाई ही नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि जब पढ़-लिख कर सफ़ाई कर्मचारी ही बनना है तब पढ़ने से क्या फ़ायदा? इस समुदाय की लड़कियाँ जम्मू-कश्मीर राज्य के बाहर जाकर विवाह कर रही हैं क्योंकि वे अपनी जाति के कम पढ़े लिखे सफाई कर्मचारी की नौकरी करने वाले युवाओं से विवाह नहीं करना चाहतीं। ऐसे में वाल्मीकि समुदाय के लड़कों को विवाह के लिए लड़कियाँ नहीं मिल रहीं।

आज जब शेष भारत में ऐसा माहौल है कि एक जाति सूचक शब्द बोलने पर सजा हो जाती है तब जम्मू-कश्मीर राज्य वाल्मीकि समुदाय को जाति प्रमाण पत्र तक जारी नहीं करता जिससे इस समुदाय के लोगों को अनुसूचित जातियों के लिए बनाए गए विशेष प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ता है। यही नहीं 2015 में एकलव्य नामक एक लड़के के प्रमाण पत्र पर जम्मू-कश्मीर राज्य के सरकारी कर्मचारी ने जाति सूचक शब्द लिखा और उस कर्मचारी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। जाति प्रमाण पत्र न होने से एक प्रकार से अनुसूचित जातियों में जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय की गिनती ही नहीं होती।

मीडिया में भी जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय की कवरेज नहीं के बराबर है। मैला ढोने की कुप्रथा पर भाषा सिंह ने एक बहुचर्चित पुस्तक लिखी ‘Unseen: The Truth About Indian Manual Scavengers’ जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर की उन जातियों के बारे में लिखा जो यह घृणित कार्य आज भी करने को विवश हैं किन्तु भाषा सिंह ने अपनी पुस्तक में वाल्मीकि समुदाय के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा।

इस तरह जम्मू-कश्मीर में संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुल्लमखुल्ला मखौल उड़ाया जा रहा है और इसकी जड़ में है अनुच्छेद 35-A जिसे गलत तरीके से संविधान में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ने की प्रक्रिया ही अपने आप में असंवैधानिक थी। संविधान संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है जिसके अनुसार संविधान में कोई भी अनुच्छेद जोड़ने के लिए संसद में संविधान संशोधन बिल लाया जाता है। परन्तु अनुच्छेद 35-A कभी संसद से पास नहीं हुआ।   

जब इसे हस्ताक्षर के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के पास भेजा गया था तब उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से पूछा था कि क्या मैं यह असंवैधानिक कार्य कर सकता हूँ। इस पर नेहरू ने उनसे कहा था कि हम इस मामले पर अनौपचारिक रूप से चर्चा करेंगे। ख़ास बात यह है कि यह संवाद भी औपचारिक रूप से किया गया था। आज उच्चतम न्यायालय में 35-A पर एक दो नहीं बल्कि पाँच याचिकाएँ लंबित हैं किंतु न्यायाधीशों को इन पर निर्णय देने का समय नहीं मिल रहा।

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