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हाथों में तिरंगा, जुबाँ पर भारत माता की जय… यूक्रेन में कुछ यूँ हुआ PM मोदी का स्वागत, रूस के साथ संघर्ष खत्म होने की लोगों ने जताई उम्मीद

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज ऐतिहासिक यात्रा के लिए यूक्रेन की राजधानी कीव पहुँचे। यहाँ उनकी मुलाकात यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से होनी है, लेकिन इस मुलाकात से पहले जो खबर चर्चा में है वो यूक्रेन में पीएम मोदी के कीव में हुए भव्य स्वागत की है।

दरअसल, एक वीडियो सामने आई है जिसमें दिख रहा है कि कीव के जिस होटल में प्रधानमंत्री मोदी गए वहाँ भारतीय लोगों का जमावड़ा था। इस दौरान सबने पीएम का का भव्य स्वागत किया। लोगों ने हाथ में तिरंगा लेकर जोर-जोर से मोदी-मोदी के नारे लगाए। इस दौरान पूरा होटल ‘भारत माता की जय’ के नारों से गूँज उठा। वहीं कहा जा रहा है बीच-बीच में जय श्रीराम के नारे भी सुनाई पड़ते रहे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देख कीव में रह रहे भारतीय लोग अपनी खुशी नहीं रोक पाए। उन्होंने पीएम मोदी को देख अपनी अपेक्षाएँ व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वो पीएम मोदी की इस यात्रा से बेहद खुद हैं। सबने उम्मीद जताई की शायद पीएम मोदी यूक्रेन और रूस के बीच चल संघर्ष को समाप्त करने के लिए कोई संदेश लेकर आएँगे।

उ्लेखनीय है कि यूक्रेन में पीएम मोदी का रुकना 7 घंटे होगा। इस दौरान दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों, रक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में सहयोग को बढ़ावा देने के मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। पीएम मोदी की यूक्रेन की यह यात्रा ऐतिहासिक और चर्चा का विषय इसीलिए है क्योंकि 1991 में यूक्रेन के स्वतंत्र बोने के बाद यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की वहाँ पहली यात्रा है। यही वजह है कि केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि यूक्रेन के स्थानीय भी इस यात्रा से काफी खुश हैं और हर ओर से मोदी-मोदी की गूँज सुनाई पड़ रही है। लोग हाथ में तिरंगा लेकर लहरा रहे हैं।

कुछ साल में फिर होंगे चांद पर, 2035 तक हमारा खुद का अंतरिक्ष स्टेशन होगा: ‘नेशनल स्पेस डे’ पर बोले PM मोदी-10 साल में 5X बढ़ेगी स्पेस अर्थव्यवस्था

भारत के महत्वाकांक्षी चंद्रयान-3 मिशन के चंद्रमा पर पहुँचने का एक वर्ष पूरा हो गया है। इस दिन को भारत सरकार नेशनल स्पेस डे के रूप में मना रही है। पहले स्पेस डे कार्यक्रमों का आयोजन दिल्ली के भारत मंडपम में हुआ है, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू भी शामिल हुई हैं। पीएम मोदी ने इस दिन की देश को बधाई दी है और कहा है कि आने वाले दिनों में भारत फिर से चाँद पर पहुँचेगा। पीएम मोदी ने भारतीयों के अन्तरिक्ष में जाने की बात भी कही है।

पीएम मोदी ने स्पेस डे की बधाई देते हुए कहा, “मंगलयान और चंद्रयान की सफलता और गगनयान की तैयारी ने भारत की युवा पीढ़ी को एक नया मिजाज दिया है। भारत ने हजारों साल पहले ही अन्तरिक्ष में देखना चालू कर दिया था…आने वाले 10 वर्षों में भारत की स्पेस अर्थव्यवस्था 5 गुना बढ़ जाएगी। भारत आने वाले दिनों में एक बड़ा ग्लोबल स्पेस कॉमर्शियल हब बनेगा। आने वाले कुछ वर्षों में हम चन्द्रमा पर फिर जाएँगे। शुक्र भी ISRO का लक्ष्य है। इसी अमृतकाल में भारत का अन्तरिक्ष यात्री भारत के ही रॉकेट से चन्द्रमा पर उतरेगा।”

पीएम मोदी ने कहा कि 2035 भारत का अपना स्पेस स्टेशन होगा। पीएम मोदी के अलावा राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू भी दिल्ली के भारत मंडपम में नेशनल स्पेस डे कार्य्रकम में शामिल हुईं। उन्होंने यहाँ ISRO प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरष्कार बाँटे। इसके बाद उन्होंने यहाँ मौजूद छात्रों को संबोधित भी किया। राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि चंद्रयान-3 की सफलता पर मैं भी गर्वित हुई थी। उन्होंने नेशनल स्पेस डे की बधाई दी और ISRO की उपलब्धियों को गिनाया। उन्होंने हाल ही में प्रज्ञान रोवर द्वारा भेजी गई जानकारी का उल्लेख भी किया।

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलावा ISRO मुखिया एस सोमनाथ ने भी बधाई दी। उन्होंने कहा कि जब ISRO की सफलता के बाद 23 अगस्त को नेशनल स्पेस डे घोषित किया तो हमें बहुत प्रसन्नता हुई, हमने पहले ऐसा नहीं सोचा था। एस सोमनाथ ने प्रधानमंत्री को नए स्पेस मिशन को लेकर धन्यवाद भी दिया।

23 अगस्त, 2023 को भारत चंद्रयान-3 मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला पहला मिशन बन गया था। इस मिशन को ISRO ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। प्रधानमंत्री मोदी ने इसके बाद चंद्रयान की लैंडिंग साईट का नाम शिवशक्ति पॉइंट रखा था और नेशनल स्पेस डे की घोषणा की थी।

घुमंतू पशुओं की करने जा रहा था हत्या… बदायूँ पुलिस ने 25000 के इनामी गोतस्कर नजीम को मुठभेड़ के बाद पकड़ा: छुरी, कुल्हाड़ी, तमंचा बराबद

उत्तर प्रदेश के बदायूं के इस्लामनगर थाना क्षेत्र में पुलिस ने एक गोतस्कर को गिरफ्तार किया है। गोतस्कर की पहचान नाजिम के तौर पर हुई है। पुलिस ने उसे मुठभेड़ के बाद पकड़ा। वहीं उसके दो साथी शकील और मोनिश इस बीच अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गए।

पुलिस के अनुसार, नाजिम और उसके साथी घुमंतू पशुओं की हत्या की योजना बना रहे थे। जैसे ही पुलिस को इस संबंध में पता चला उन्होंने 21 अगस्त को विक्रमपुर चरसौरा मोड़ पर घेराबंदी की, फिर संदेह होने पर एक टेंपो को रोकने का प्रयास किया, लेकिन तस्कर टेंपो रोकने की बजाय वहाँ से भागने लगे। जब पुलिस और एसओजी की टीम ने गोतस्करों का पीछा किया तो उन्होंने इस दौरान फायरिंग भी की।

पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई में गोली चलाई। इस दौरान नाजिम के पाँव में गोली लगी और वो वहीं गिर गया। जबकि बाकी साथी फरार हो गए। पुलिस ने नाजिम के पास से एक तमंचा, कारतूस, मांस काटने के उपकरण (दो छुरी, कुल्हाड़ी), रस्सा, लकड़ी का गुटका और टेंपो बरामद किया। इस मुठभेड़ में एक पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं।

पुलिस अधीक्षक ने नाजिम की गिरफ्तारी पर बताया कि पुलिस ने उस पर पहले 25000 का इनाम रखा हुआ था। पुलिस ने उसे पकड़ लिया है। अब उसके फरार साथियों को भी जल्द ही कोर्ट में पेश किया जाएगा। इस संबंध में बदायूँ पुलिस ने भी ट्वीट किया है।

पहले बहन का कुचला सिर, फिर गला घोंटकर ली जान: दिल्ली से अब्दुल्लाह और अरीब गिरफ्तार, पड़ोसियों ने बताया था- राते में मिलने आ रहे थे लोग

दिल्ली के हौज काजी इलाके में दो भाइयों ने अपनी तलाकशुदा बहन की हत्या कर दी। भाइयों ने बहन के सर को भारी चीज कुचला और फिर भी उनका मन नहीं भरा तो उसका गला दबा दिया। दोनों ने महिला को एक युवक के साथ आपत्तिजनक हालत में देख लिया था। पुलिस ने अब दोनों को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 35 वर्षीय मृतका हौज काजी स्थित एक किराए के मकान में रहती थी। महिला का दो वर्ष पूर्व अपने पति से तलाक हो गया था। महिला का पति लक्ष्मी जगह पर बच्चों के साथ रहता है। महिला के तीन बच्चे हैं। महिला के पड़ोसियों ने उसके भाइयों को बताया था कि उनकी बहन के घर में कुछ लोग मिलने आते हैं।

महिला के पड़ोसियों ने शिकायत की थी कि यहाँ कुछ महिला के साथ रात में रुक जाते हैं। इसके बाद गुरुवार (22 अगस्त, 2024) सुबह 4 बजे के आसपास महिला के दोनों भाई अरीब और अब्दुल्लाह यहाँ पहुँच गए। यहाँ उन्होंने महिला को एक युवक के साथ आपत्तिजनक हालत में देख लिया।

महिला के साथ रुका हुआ युवक तो यहाँ से भाग गया लेकिन उसके भाइयों को यह बात नागवार गुजरी। भाइयों ने अपनी बहन से बहस और मारपीट चालू कर दी। उन्होंने अपनी बहन को इज्जत का हवाला दिया। इसके बाद विवाद इतना बढ़ा कि अरीब और अब्दुल्लाह ने बहन की हत्या करने की ठान ली।

महिला के दोनों भाइयों ने उसके सर पर भारी चीज से वार कर उसको घायल कर दिया इसके बाद भी जब नहीं मरी तो उसका गला दबा दिया। इसके बाद महिला की मौत हो गई। उसके दोनों भाई यहाँ से उसे मारने के बाद भाग गए। सुबह 4:30 बजे दिल्ली पुलिस को इस संबंध में सूचना मिली।

जब पुलिस यहाँ पहुँची तो उसे शव मिला। पुलिस ने सबसे पहले आसपास में पूछताछ चालू की। पुलिस ने इसके बाद यहाँ के CCTV खंगाले, जिसमें दोनों महिला के घर से निकलते दिखे। इसके बाद पुलिस ने दोनों की तलाश चालू की और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। महिला की हत्या पर उसकी माँ और बाकी परिजन शांत हैं।

नहीं हटाई महिला पहलवानों की सुरक्षा, गलतफहमी के कारण ड्यूटी पहुँचने में लेट हुए PSO: नई दिल्ली DCP ने दिया विनेश फोगाट के आरोपों का जवाब, कोर्ट तक चला गया था मामला

कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला पहलवानों की सुरक्षा हटाए जाने की बात उठने के बाद नई दिल्ली के डीसीपी ने बयान जारी किया है। उन्होंने बताया है कि सुरक्षा हटाए जाने की बात सही नहीं है। उन्होंने महिला पहलवानों की सुरक्षा हटाई नहीं है बल्कि उसमें थोड़े बदलाव हुए हैं।

डीसीपी नई दिल्ली के ट्वीट के अनुसार, पहलवानों को दी गई सुरक्षा वापस नहीं ली गई है; बल्कि निर्णय यह लिया गया कि भविष्य में हरियाणा पुलिस से यह जिम्मेदारी संभालने का अनुरोध किया जाए, क्योंकि जिन्हें सिक्योरिटी दी गई है वो लोग वहीं पर रहते हैं।

डीसीपी नई दिल्ली के अनुसार, दिल्ली पुलिस के नियुक्त पीएसओ ने इस फैसले को गलत समझ लिया, इसलिए उन्हें रिपोर्ट करने में लेट हो गई। स्थिति को सुधार लिया गया है और पहलवानों को सुरक्षा मुहैया कराना जारी है।

बता दें कि बृजभूषण सिंह के खिलाफ गवाही देने वाली महिलाओं की सुरक्षा हटाए जाने की बात विनेश फोगाट ने अपने ट्वीट में कही थी। उन्होंने ट्वीट में कहा, “जिन महिलाओं को बृजभूषण के खिलाफ कोर्ट में गवाही देनी है, दिल्ली पुलिस ने उनकी सुरक्षा हटा दी है।”

हरियाणा की पहलवान विनेश फोगाट ने बृजभूषण शरण सिंह से जुड़े यौन शोषण मामले को लेकर बड़ा दावा किया है। विनेश ने अपनी इस पोस्ट में दिल्ली पुलिस, दिल्ली महिला आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग को टैग किया है।

इसके अलावा ये मामला राउज एवेन्यू कोर्ट भी पहुँचा। वहाँ सुरक्षा हटाए जाने की बात कहकर अर्जी दाखिल की जिसके बाद कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित कर पुलिस को पहलवान को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। साथ ही डीसीपी दिल्ली को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है।

डीसीपी को रिपोर्ट दाखिल कर बताना है कि किन वजहों से महिला पहलवानों की सुरक्षा को वापस लेने का फैसला लिया गया। इसी नोटिस के बाद डीसीपी नई दिल्ली ने अपना ट्वीट किया।

हिन्दू महिला का किया रेप, जबरन कबूल करवाया इस्लाम: रफीक को कर्नाटक HC ने जमानत देने से किया मना, कहा- हम देख रहे गरीबों का धर्मांतरण

कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मुस्लिम व्यक्ति को एक हिन्दू महिला के रेप और इस्लाम में धर्मांतरण मामले में जमानत देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि गरीब हिन्दू महिला का इस्लाम में धर्मांतरण गंभीर मसला है और कोर्ट ऐसे मामले में काफी मुस्तैद है।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा, ““वर्तमान मामले में, निर्दोष और गरीब महिला को बहला-फुसलाकर जबरन इस्लाम में धर्मांतरित करना एक गंभीर घटना है। इसलिए, इस तरह की घटना से बचने के लिए, समाज को यह संदेश देना आवश्यक है कि कोर्ट ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए सतर्क हैं और समाज की निर्दोष और वंचित महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा कर रही हैं।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रफीक बेपारी नाम के एक शख्स ने एक हिन्दू महिला से पहले नजदीकियाँ बढ़ाईं और उससे दोस्ती कर ली। रफीक हिन्दू महिला से कहता रहा कि वह उसे नौकरी दिला देगा। रफीक ने इसके लिए हिन्दू महिला से उसके साथ चलने का दबाव डाला।

रफीक ने लगातार महिला का यौन शोषण भी किया। रफीक इसके बाद उसे जबरदस्ती अपने साथ बेलगावी ले गया और उसे एक जगह बंद कर दिया। हिन्दू महिला कहीं चली ना जाए, इसलिए यहाँ एक और महिला की चौकीदार के रूप में तैनाती कर दी गई। महिला को यहाँ कई दिनों तक बंद रखा गया।

हिन्दू महिला का बेलगावी में भी कई बार रेप हुआ। इसके बाद रफीक निकाह के लिए ने हिन्दू महिला का इस्लाम में धर्मांतरण करवा दिया। कुछ समय बाद महिला यहाँ से किसी तरह भाग निकली और पूरी कहानी अपने पति को बताई। इसके बाद महिला ने रफीक के विरुद्ध रेप और अवैध धर्मांतरण की FIR दर्ज करवाई।

कोर्ट में हिन्दू महिला के वकीलों ने रफीक की जमानत याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि उसने यह जानते हुए भी महिला को इस्लाम में धर्मांतरित किया कि वह विवाहित है और उसके दो बच्चे भी हैं। कहा गया कि रफीक का महिला को इस्लाम में धर्मांतरित करना असहनीय है।

वहीं रफीक ने खुद को निर्दोष बता कर जमानत माँगी। हालाँकि हाई कोर्ट ने कहा कि महिला ने उसकी कैद से छूट कर तुरंत ही अपने परिवार को फोन किया। यह दिखाता है कि महिला को किस प्रकार प्रताड़ना दी गई। कोर्ट ने इस मामले में रफीक को जमानत देने से मना कर दिया।

‘नरबलि के अपराधियों को मिले कड़ी सजा’: गुजरात विधानसभा में अंधविश्वास और जादू-टोना पर रोक वाला बिल पेश, संतों ने सरकार के कदम को सराहा

गुजरात विधानसभा में 21 अगस्त से तीन दिवसीय मानसून सत्र शुरू हो चुका है। गुजरात सरकार ने इस सत्र के दौरान नरबलि, अंधविश्वास और जादू-टोना पर रोक लगाने के लिए एक विधेयक भी पेश किया है। राज्य में अंधविश्वास और जादू-टोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। सरकार के मानव बलि और अंधविश्वास विरोधी बिल को अब साधु-संतों का भी समर्थन मिल गया है।

गुजरात के प्रमुख कथावाचकों और महंतों ने सरकार की सराहना करते हुए अंधविश्वास विरोधी विधेयक का स्वागत किया है। महंतों ने एक सुर में कहा है कि राज्य में ऐसे कानून की तत्काल आवश्यकता थी और यह भी जरूरी था कि नर बलि के अपराधियों को कानून द्वारा कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

जानकारी के मुताबिक, 21 अगस्त को विधानसभा के मानसून सत्र में अंधविश्वास विरोधी विधेयक को लेकर साधु वत्सलदासजी महाराज ने कहा है, ”ऋग्वेद में भी अंधविश्वास और जीव हत्या को वर्जित माना गया है। यही बात कई संहिताओं में भी कही गई है। सभी देवताओं से भी यही कहा गया है कि किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए। इसके लिए कानून बनाया जाना चाहिए और जीव हत्या के अपराधियों को कड़ी सजा दी जानी चाहिए।”

डाकोर के प्रसिद्ध कथावाचक भाविनलालजी महाराज ने कहा , ”नरबलि और काला जादू की प्रथा को रोकने और अंधविश्वास को मिटाने का सरकार का विचार सराहनीय है। हम इसका स्वागत करते हैं। सरकार जो भी कानून और नियम लागू करती है, हम उसका पूरा समर्थन करते हैं। राज्य के हित में ऐसे कानूनों और नियमों की भी बहुत आवश्यकता है।”

इसके साथ ही उज्जैन के प्राचार्य डॉ. अर्जुन शर्मा ने गुजरात सरकार की भी तारीफ की है। डॉ अर्जुन शर्मा ने कहा, ”गुजरात सरकार द्वारा लाया जा रहा कानून बहुत अच्छा और सराहनीय कदम है। क्योंकि कई जगहों पर कई लोग अंधविश्वास फैलाते हैं। इस कानून से इस पर नियंत्रण होगा और सजा दी जाएगी। साथ ही ग्रामीण समाज के भोले-भाले लोगों को भी इसका लाभ मिलेगा। अंधविश्वास हर पंथ के लोगों में पाया जाता है। इसे हटाना गुजरात सरकार का एक सही और बेहतरीन कदम है।” इसके अलावा गुजरात के कई धार्मिक समुदायों के प्रतिनिधियों ने इस कानून का स्वागत किया है।

गौरतलब है कि गुजरात में अंधविश्वास और काले जादू के प्रसार से निपटने के लिए एक सख्त कानून बनाने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष एक जनहित याचिका दायर की गई थी। इसके लिए राज्य गृह विभाग के प्रभारी उप सचिव ने गुजरात हाई कोर्ट में हलफनामा देकर कानून बनाने के अहम फैसले की घोषणा भी की थी। इस आशय का एक विधेयक 21 अगस्त को गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी द्वारा विधानसभा में पेश किया गया है। गुजरात हाईकोर्ट में पेश हलफनामे में गृह विभाग के उप सचिव ने कहा था कि अंधविश्वास, जादू-टोना और काले जादू की आड़ में होने वाली अमानवीय गतिविधियों को कुचलने के लिए गुजरात विधानसभा में एक विधेयक पेश किया जाएगा।

मूल रूप से ये समाचार गुजराती भाषा में प्रकाशित किया गया है। मूल समाचार पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

बंगाल की CPIM सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को ममता सरकार ने आगे बढ़ाया: 24 घंटे में लिए ताबड़-तोड़ फैसले, सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में चौंकाने वाले खुलासे

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने बिना किसी जाँच-पड़ताल के मुस्लिम समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कोटे में शामिल कर लिया, ताकि अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधा जा सके। तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सरकार ने न केवल राज्य में पिछली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सरकार द्वारा अपनाई गई तुष्टिकरण नीति को जारी रखा, बल्कि उसमें और इजाफा भी किया।

अब, ममता बनर्जी की सरकार पर 77 जातियों को मनमाने ढंग से ओबीसी श्रेणी में शामिल करने के लिए आलोचना हो रही है। इन 77 जातियों में 75 जातियाँ मुस्लिमों से संबंधित हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने 22 मई को अपने ऐतिहासिक फैसले में 5 मार्च 2010 और 11 मई 2012 के बीच वामपंथी और टीएमसी सरकारों द्वारा 77 समूहों को जारी किए गए ओबीसी प्रमाण पत्र को रद्द कर दिया था।

इस बीच, पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करके अपने फैसले का बचाव किया। CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने 5 अगस्त के अपने आदेश में ओबीसी श्रेणी में शामिल होने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया के बारे में सरकार से विवरण माँगा था। हालाँकि, इसके विवरणों से पता चलता है कि मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए सभी मानदंडों का उल्लंघन किया।

जटिल 3-स्तरीय प्रक्रिया, लेकिन कई खामियाँ

TOI के अनुसार, सरकार ने दावा किया कि ओबीसी सूची का विस्तार एक जटिल तीन-स्तरीय प्रक्रिया के माध्यम से किया गया। इसमें दो सर्वेक्षण और पिछड़ा वर्ग आयोग की एक सुनवाई शामिल थी। दूसरी ओर यह खुलासा किया गया है कि कुछ मुस्लिम समूहों के लिए यह प्रक्रिया एक दिन से भी कम समय में पूरी की गई। यह जटिलता और सरकारी मशीनरी की गति को देखते हुए असंभव प्रतीत होता है।

यह बात सामने आई है कि खोट्टा मुस्लिम समुदाय ने 13 नवंबर 2009 को आवेदन किया और उसी दिन पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग ने उसे ओबीसी सूची में शामिल करने की सिफारिश कर दी। इसी तरह 21 अप्रैल 2010 को आवेदन करने वाले जमादार मुस्लिम समूह को उसी दिन ओबीसी श्रेणी में शामिल कर लिया गया।

इसने एक दिन के भीतर गायेन और भाटिया मुस्लिम समुदायों को शामिल करने की सिफारिश की गई। चार दिनों में चुटोर मिस्त्री मुस्लिम समुदाय को शामिल किया और एक महीने से भी कम समय में एक दर्जन अन्य मुस्लिम समूहों को ओबीसी सूची में शामिल कर लिया गया। ओबीसी आयोग ने इस मामले में आश्चर्यजनक गति से काम किया।

ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ उप-वर्गीकरण सर्वेक्षण का काम समुदाय के सदस्यों द्वारा ओबीसी श्रेणी में शामिल होने के लिए आयोग में आवेदन करने से पहले ही कर दिया गया। काजी, कोटल, हजारी, लायेक, खस और कुछ अन्य मुस्लिम समुदायों के लिए सर्वेक्षण जून 2015 में पूरा कर लिया गया था, लेकिन उन्हें OBC में शामिल करने का आवेदन काफी बाद में, यहाँ तक ​​कि एक या दो साल बाद दिए गए।

पश्चिम बंगाल की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में इसके पक्ष में अपना तर्क दिया। राज्य सरकार ने दावा किया, “विस्तृत जाँच और/या मौखिक या दस्तावेजी प्रकृति में उसके समक्ष प्रस्तुत सामग्री पर विचार करने के बाद ही 34 समुदायों में से प्रत्येक पर अंतिम रिपोर्ट आयोग द्वारा अंतिम सिफारिश के साथ तैयार की गई थी।”

अभिजीत मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत हलफनामे के अनुसार, प्रक्रिया उन समुदायों द्वारा आवेदन से शुरू होती है जो ओबीसी सूची में शामिल होना चाहते हैं। इनमें वर्ग का नाम, उसकी जनसंख्या, उसका निवास क्षेत्र के साथ-साथ उनकी सामाजिक, शैक्षिक, वैवाहिक, व्यावसायिक और आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी दी जाती है। मुखर्जी फिलहाल पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग में अतिरिक्त सचिव और पदेन संयुक्त आयुक्त (आरक्षण) हैं।

अभिजीत मुखर्जी ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि पश्चिम बंगाल की सरकार ने इस मामले में तीन-स्तरीय प्रक्रिया का बेहद सावधानीपूर्वक पालन किया है। आयोग अपने सदस्यों (2012 से पहले) या राज्य सरकार के सांस्कृतिक अनुसंधान संस्थान (CRI) और उनके साथ काम करने वाले मानवविज्ञानियों (2012 के बाद) के माध्यम से अनुरोध करने पर क्षेत्र का सर्वेक्षण करता है।

आयोग आवेदन की सुनवाई और ऐसे सर्वेक्षण के दौरान दावे के किसी भी विरोध के बारे में जनता को सूचित करता है। आयोग प्रस्ताव को स्वीकृत या अस्वीकृत करने का निर्णय लेने से पहले सार्वजनिक सुनवाई में प्रस्तुत दस्तावेजों, सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं, प्रश्नों और साक्ष्यों की समीक्षा करता है।

राज्य सरकार ने कहा कि यह सिफारिश स्वीकृति के बाद सरकार पर सामान्य रूप से बाध्यकारी है और सरकार उस समूह को ओबीसी सूची में शामिल कर लेती है। उसके बाद कैबिनेट को इसे स्वीकृत करने के लिए कहा जाता है और बाद में प्राधिकरण के बाद इसे आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है।

कलकत्ता हाई कोर्ट की टिप्पणी

इस साल मई में कलकत्ता हाई कोेर्ट की न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और राजशेखर मंथा की पीठ ने 5 मार्च 2010 और 11 मई 2012 के बीच वामपंथी और तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकारों द्वारा 77 समूहों को जारी किए गए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाण पत्र रद्द कर दिए थे। न्यायाधीशों ने पाया कि पश्चिम बंगाल प्रशासन ने 2006 की सच्चर समिति की रिपोर्ट का ‘व्यापक रूप से’ उपयोग किया।

कोर्ट ने यह पाया कि इसके व्यापक उपयोग से कुख्यात निष्कर्ष निकाला गया कि भारत में मुस्लिम अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के सदस्यों की तुलना में बदतर स्थिति में हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट के अनुसार, मुस्लिमों को पिछड़ा बताने और उन्हें ओबीसी के रूप में वर्गीकृत करने के लिए राज्य द्वारा इस्तेमाल की गई सच्चर समिति की रिपोर्ट में संवैधानिक वैधता का अभाव था।

न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नियुक्त आयोग की लापरवाही पर भी सवाल उठाया, क्योंकि उसने ओबीसी श्रेणी में शामिल समूहों के सामाजिक वंचना की गहराई का पता लगाने के लिए गहन जाँच करने में विफल रहा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल पुरानी हो चुकी मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर 2011 से 2022 के बीच ओबीसी श्रेणियों को अधिसूचित करना उचित नहीं है।

इसके अलावा, कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम 2012 पारित करके और नए ओबीसी की पहचान करने की प्रक्रिया में आयोग की भागीदारी को समाप्त करके, पश्चिम बंगाल सरकार ने ‘राज्य की संवैधानिक शक्ति के साथ धोखाधड़ी’ की है।

विद्वान न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया कि आयोग ने मुसलमानों को ओबीसी के रूप में वर्गीकृत करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों की कैसे अवहेलना की। अदालत ने आगे बताया कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान विभाग ने धार्मिक मानदंडों पर आधारित नए ओबीसी के पहले समूह की घोषणा करने के फैसले को सही ठहराने के लिए पिछली वामपंथी सरकार के साथ सहयोग किया था।

न्यायाधीशों ने मुस्लिमों को ‘राजनीतिक वस्तु’ के रूप में इस्तेमाल करके अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल प्रशासन की कड़ी आलोचना की। कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा लगभग पाँच लाख ओबीसी प्रमाण-पत्रों को रद्द करने के बाद सीएम ममता बनर्जी ने घोषणा की, “मैं कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले को स्वीकार नहीं करती। ओबीसी आरक्षण वैसे ही जारी रहेगा।”

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने जून 2023 में पाया कि पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या मुस्लिमों और बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासियों मुस्लिमों को भी ओबीसी प्रमाण-पत्र जारी कर दिए गए थे। एनसीबीसी ने आगे पाया कि पश्चिम बंगाल में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन राज्य में मुस्लिम ओबीसी जातियाँ हिंदू ओबीसी जातियों से अधिक हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉनग्रेस (TMC) से पहले राज्य में सीपीआईएम की सरकार थी। उसने सन 1994 से सन 2009 के बीच 66 वर्गों को ओबीसी घोषित किया था। इनमें से करीब 12 वर्ग मुस्लिम समुदाय के थे। सीपीआईएम सरकार ने 5 मार्च से 10 सितंबर 2010 के बीच सात कार्यकारी आदेश जारी करके 42 अतिरिक्त वर्गों को ओबीसी की मान्यता दी।

यह कदम संभवतः 2011 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। इन 42 वर्गों में से 41 मुस्लिम समुदाय से थे। नतीजतन, ये नए समूह पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा प्रस्तावित नौकरियों में प्रतिनिधित्व और आरक्षण के लिए योग्य हो गए। अपने मुस्लिम वोट बैंक को और अधिक समायोजित करने के लिए सीपीआईएम ने फरवरी 2010 में सरकारी पदों पर मुस्लिमों के लिए 10% आरक्षण भी दे दी।

हालाँकि, इन सब कामों के बावजूद सीपीआईएम चुनाव में हार गई और तृणमूल कॉन्ग्रेस जीत गई। इसके बाद मई 2011 में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार सँभाला। उन्होंने वामपंथी शासन की तुष्टिकरण नीति को जारी रखा। 11 मई 2012 के कार्यकारी आदेश में TMC सरकार ने ओबीसी के रूप में अतिरिक्त 35 नए वर्गों जोड़ा।

इनमें से 34 वर्ग मुस्लिम समुदाय के थे। इस तरह केवल दो वर्षों में वामपंथी और टीएमसी सरकारों ने ओबीसी समूह में 77 नए वर्ग (जिनमें से 75 मुस्लिम थे) जोड़े। ममता बनर्जी की सरकार ने एक नए कानून के जरिए इन 77 समूहों को ओबीसी ए (अधिक पिछड़ा) और ओबीसी बी (पिछड़ा) नाम की दो श्रेणियों में विभाजित कर दिया।

इसके बाद 18 जनवरी 2011 को अमल चंद्र दास नाम के व्यक्ति ने वामपंथी सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए पहली याचिका दायर की। उन्होंने 42 जातियों को केवल धार्मिक मान्यताओं के आधार पर ओबीसी के रूप में नामित करने के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ओबीसी की पहचान में मदद करने के लिए स्थापित आयोग का सर्वेक्षण पूर्वनिर्मित था।

साल 2012 से साल 2020 तक अमल चंद्र दास, पूरबी दास और आत्मदीप ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम 2012 की संवैधानिकता और इसके कई प्रावधानों को चुनौती देते हुए तीन और याचिकाएँ दायर कीं। सभी चार याचिकाओं को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक साथ जोड़ा और उन पर फैसला सुनाया।

RG कर अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और 4 ट्रेनी डॉक्टरों का होगा पॉलीग्राफ टेस्ट: कोर्ट की मंजूरी के बाद ट्रेनी डॉक्टर की रेप-हत्या से पर्दा उठाएगी CBI

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल डॉ संदीप घोष का पॉलीग्राफ टेस्ट होगा। सीबीआई ने पॉलीग्राफ टेस्ट की माँग को लेकर कोर्ट का रुख किया था, जिसके कोर्ट ने मंजूरी दे दी है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 31 साल की डॉक्टर की रेप के बाद हत्या कर दी गई थी। उस समय महिला डॉक्टर के साथ तैनात रहे 4 अन्य ट्रेनी डॉक्टरों, जो महिला डॉक्टर के साथ शिफ्ट में थे, उनका भी पॉलीग्राफ टेस्ट किया जाएगा।

सीबीआई जानना चाहती है कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के उस समय प्रिंसिपल रहे डॉ संदीप घोष और पीड़ित महिला डॉक्टर के साथ तैनात रहे 4 डॉक्टरों के बयान में कितनी सच्चाई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीबीआई आरोपितों को सियालदह कोर्ट में पॉलीग्राफ टेस्ट और मजिस्ट्रेट के सामने बयान की अर्जी के लिए लेकर पहुँची थी। पॉलीग्राफ टेस्ट में जज और जिसका पॉलीग्राफ टेस्ट होना है, दोनों की सहमति लेना जरूरी होता है। इस मामले में सियालदह कोर्ट से सीबीआई को पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए मंजूरी मिल गई है, जिसके बाद साफ हो गया है कि कोलकाता कांड में आरजी कर के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और 4 ट्रेनी डॉक्टर्स का पॉलीग्राफ टेस्ट होगा।

एक अधिकारी ने बताया कि हम घोष के जवाबों की और पुष्टि करना चाहते हैं, क्योंकि हमारी ओर से पूछे गए सवालों के कुछ उत्तरों में झोल है। ऐसे में हम उनका पॉलीग्राफ टेस्ट कराने के विकल्प पर विचार कर रहे। दरअसल पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान व्यक्ति की ओर से सवालों के जवाब दिए जाते समय एक मशीन की मदद से उसकी शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापा जाता है और यह पता लगाया जाता है कि वह सच बोल रहा है या झूठ। इस मामले में मुख्य आरोपित संजय रॉय के पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए भी मामला कोर्ट में है जिस पर शुक्रवार (23 अगस्त 2024) को फैसला आएगा।

पीड़ित की पहचान उजागर करने का भी केस

इस बीच, कोलकाता पुलिस ने भी संदीप घोष पर शिकंजा कसना तेज कर दिया है। पुलिस ने डॉ. घोष को अब मृतक महिला डॉक्टर की पहचान उजागर करने के मामले में तलब किया है। हालाँकि, सीबीआई की पूछताछ के कारण पेश नहीं हो सके और दूसरी तारीख माँगी है।

एक तरफ तो सीबीआई लगातार घोष से पूछताछ कर रही है और अब उनकी गिरफ्तारी की तैयारी में लगी है, तो दूसरी तरफ डॉ संदीप घोष को ममता सरकार ने स्वास्थ्य मंत्रालय में ओएसडी बना दिया है। बुधवार (21 अगस्त 2024) को जारी अधिसूचना में डॉ संदीप घोष को पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में ओएसडी नियुक्त किया गया है।

कौन हैं संदीप घोष?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, संदीप घोष ने अपनी स्कूली शिक्षा कोलकाता के पास बोंगांव हाई स्कूल से पूरी की थी। मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने आरजी कर मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की। डॉ. घोष ने 1994 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और एक आर्थोपेडिक सर्जन बने। साल 2021 में वो आरजी कर मेडिकल कॉलेज के प्रिसिंपल बने। इससे पहले, उन्होंने कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज में उप-प्रिंसिपल के रूप में कार्य किया था।

हालाँकि संदीप घोष के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिसिंपल बनने के पीछे अलग कहानी नजर आ रही है। आजतक के मुताबिक, जब प्रिसिंपल के पद को लेकर इंटरव्यू चल रहे थे, तो संदीप घोष का नाम 16वें स्थान पर था। लेकिन रातोंरात वो सभी कैंडिडेट्स को पीछे छोड़कर लिस्ट में टॉप पर पहुँच गए और प्रिंसिपल के पद पर नियुक्त हो गए।

कौन हैं संदीप घोष, जिसे ममता बनर्जी के स्वास्थ्य मंत्रालय में बनाया OSD: जानें कैसे 16वें नंबर पर होने के बावजूद बना था RG कर मेडिकल कॉलेज का प्रिंसिपल

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष से केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) पूछताछ कर रही है। इसी मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ रेप-हत्या के बाद संदीप घोष को इस्तीफा देना देना पड़ा था, लेकिन तुरंत उन्हें कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिंसिपल नियुक्त कर दिया गया। इस पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने फटकार लगाई और छुट्टी पर भेजने के लिए कहा, तो अब ममता सरकार ने संदीप घोष को स्वास्थ्य मंत्रालय में बुलाकर ओएसडी ही बना दिया है।

खास बात ये है कि संदीप घोष जैसे दागी व्यक्ति को न सिर्फ एक से बढ़कर एक महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात किया जा रहा है, बल्कि उसके कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिंसिपल बनने के पीछे भी एक बड़ी जानकारी सामने आई है कि वो मेरिट लिस्ट में 16वें नंबर पर होने के बावजूद कैसे कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिंसिपल बनने में कामयाब रहा। यही नहीं, उस पर कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में तमाम अनियिमतताओं का भी आरोप है।

ममता बनर्जी ने डॉ संदीप घोष को बनाया ओएसडी

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुधवार (21 अगस्त 2024) को जारी अधिसूचना में डॉ संदीप घोष को पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में ओएसडी नियुक्त किया गया है।

डॉ संदीप घोष के हटाने की खबर के बीच ही फिर खबर आई है कि संदीप घोष को संदीप घोष को ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बनाया गया है। आंदोलनकारी छात्रों ने सवाल किया है कि आखिर सरकार ने संदीप घोष को बर्खास्त क्यों नहीं किया, जबकि उनके खिलाफ लगातार आरोप लग रहे हैं। क्या वह इतने प्रभावशाली हैं कि सरकार उनके खिलाफ कदम नहीं उठा पा रही है?

कौन हैं संदीप घोष?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, संदीप घोष ने अपनी स्कूली शिक्षा कोलकाता के पास बोंगांव हाई स्कूल से पूरी की थी। मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने आरजी कर मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की। डॉ. घोष ने 1994 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और एक आर्थोपेडिक सर्जन बने। साल 2021 में वो आरजी कर मेडिकल कॉलेज के प्रिसिंपल बने। इससे पहले, उन्होंने कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज में उप-प्रिंसिपल के रूप में कार्य किया था।

हालाँकि संदीप घोष के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिसिंपल बनने के पीछे अलग कहानी नजर आ रही है। आजतक के मुताबिक, जब प्रिसिंपल के पद को लेकर इंटरव्यू चल रहे थे, तो संदीप घोष का नाम 16वें स्थान पर था। लेकिन रातोंरात वो सभी कैंडिडेट्स को पीछे छोड़कर लिस्ट में टॉप पर पहुँच गए और प्रिंसिपल के पद पर नियुक्त हो गए।

बायोमेडिकल वेस्ट और मेडिकल सामानों की तस्करी बाँग्लादेश तक

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार संदीप घोष को लेकर मेडिकल कॉलेज के पूर्व डिप्टी सुप्रीटेंडेंट अख्तर अली ने दावा किया कि संदीप घोष तो अस्पताल से बायोमेडिकल वेस्ट और मेडिकल सप्लाई की तस्करी बांग्लादेश में भी करते थे। अख्तर अली का दावा है कि साल 2023 में उन्होंने इस बात की चिंता राज्य सतर्कता आयोग के समक्ष उठाई थी। जाँच में वह दोषी भी पाए गए लेकिन फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

बीवी को बेरहमी से पीटा, पड़ोसी आज तक नहीं भूले

इंडिया टुडे की एक अन्य मीडिया रिपोर्ट बताती है कि आरजी कर अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल अपनी पत्नी को बेरहमी से मारने के कारण भी बदनाम हो चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार संदीप घोष पहले बारासाट में रहते थे। वहीं के पड़ोसी ने इंडिया टुडे को बताया कि कैसे 12 साल पहले जब संदीप ने अपनी पत्नी को उस समय बुरी तरह पीटा था जब उसकी सिजेरियन हुए 14 दिन ही हुए थे।

रिपोर्ट में खुद को संदीप का पूर्व पड़ोसी बताने वाला शख्स कहता है, “एक बार मेरे और घोष के बीच बहस हुई थी। उनका व्यवहार हमेशा खराब रहता था। बाद में मुझे पता चला कि वह एक डॉक्टर थे। यहाँ रहने के दौरान एक घटना हुई जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी को इतनी बुरी तरह पीटा कि उनके सिजेरियन टांके फट गए और उन्हें खून बहने लगा। शुरुआत में स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि इसे पारिवारिक मामला माना गया, लेकिन जब मामला बहुत गंभीर हो गया तो सभी ने विरोध करना शुरू कर दिया।”

गौरतलब है कि आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर के रेप और हत्या के मामले में घोष को 12 अगस्त को रिजाइन देना पड़ा था। बाद में सीबीआई ने उनसे पूछताछ शुरू की और संदीप से जुड़े विवाद सामने आते रहे। बांग्लादेश में तस्करी, बीवी से मारपीट के अलावा संदीप घोष पर जून 2023 में भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। उस समय उन्हें वित्तीय गड़बड़ी के आरोप में मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज ट्रांसफर किया गया था। हालाँकि बाद में दोबारा उनका आरजी कर अस्पताल में कार्यभार मिल गया।

अस्पताल में हुई रहस्यमयी मौतें, देह व्यापार का भी दावा

बता दें कि जिस तरह आरजी कर अस्पताल के प्रिंसिपल का नाम पहली बार विवादों से नहीं जुड़ा, उसी तरह इस अस्पताल का नाम भी विवादों में पहली बार नहीं आया है। कहा जा रहा है कि इस अस्पताल मेंपहले भी रहस्यमयी मौते हुई हैं। कभी यहाँ मेडिकल प्रोफेशनल मारे गए तो कभी प्रोफेसर और कभी हाउस स्टाफ।

  1. 25 अगस्त, 2001 को ऐसी एक घटना हुई थी जब चौथे वर्ष के छात्र सौमित्र विश्वास को छात्रावास के कमरे में ही फंदे से मृत लटका हुआ पाया गया था। उनकी मौत को भी प्रशासन ने आत्महत्या बताया था, लेकिन तब भी हॉस्टल में अश्लील फिल्मों के निर्माण की बात उड़ी थी। अरोमिता दास और अमित बाला नामक उसके 2 सहपाठियों की गिरफ़्तारी के बावजूद ये मामला अनसुलझा रहा, जबकि कलकत्ता हाईकोर्ट ने CID जाँच का आदेश दिया था।
  2. 5 फरवरी, 2003 को अरिजीत दत्ता नामक हाउस स्टाफ ने आत्महत्या की थी। बताया गया कि उसने पहले खुद को हाथ में एनेस्थीसिया का इंजेक्शन दिया, फिर कलाई की नस काट ली और फिर छत से कूद गया। वो बीरभूम के सिउरी के रहने वाले थे। न कोई सुसाइड नोट मिला, न आत्महत्या का कारण पता चला।
  3. घटना के कुछ ही दिन बाद 16 फरवरी को प्रवीण गुप्ता ने आत्महत्या का प्रयास किया। हरियाणा के प्रवीण मानिकतल्ला स्थित लालमोहन हॉस्टल में रहते थे, उन्होंने अपनी दोनों कलाई की नस काटने का प्रयास किया था। प्रवीण के पिता ने बेटे के किसी बात से परेशान होने की बात कही थी, वहीं पुलिस ने प्रेम-प्रसंग बता कर कहा कि उसने अपनी प्रेमिका को सुसाइड नोट भेजा था। हालाँकि, उसके साथियों ने उसे कभी अवसादग्रस्त नहीं पाया।
  4. 24 अक्टूबर, 2016 को 52 वर्षीय मेडिसिन के प्रोफेसर गौतम पाल का सड़ा-गला शव दक्षिणी दमदम स्थित उनके किराए के घर से बरामद हुआ था। दरवाजा अंदर से बंद था तो हार्ट अटैक से अचानक मौत की बात कह पुलिस ने पल्ला झाड़ लिया।
  5. कोरोना महामारी के दौरान स्नातकोत्तर द्वितीय वर्ष की छात्रा पौलमी साहा की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी। पुलिस ने अस्पताल की छठी मंजिल से कूद कर आत्महत्या की बात कही, सहपाठियों ने उसके अवसाद में होने की बात कही थी। आज तक ये भी रहस्य है।

इन रहस्यमयी मौतों के अलावा इस अस्पताल में देह-व्यापार का धंधा चलने से लेकर यहाँ ड्रग्स तस्करों तक के सक्रिय रहने की बातें होती रही हैं… अब इन बातों की सच्चाई क्या है जाहिर सी बात है ये जाँच के बाद ही सामने आ पाएगा, लेकिन सवाल तो उठता है कि अगर एक राज्य में किसी अस्पताल से जुड़ी इतनी गड़बड़ घोटालों को लेकर खुलासे हो रहे हैं तो फिर जाँच क्यों नहीं हुई। क्यों संदीप घोष को मुर्शिदाबाद से दोबारा आरजीकर अस्पताल में अपनी नौकरी वापस मिल गई, क्यों बार-बार ट्रांसफर होते-होते रह गया।