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पाकिस्तान में टेस्ट क्रिकेट खेल रहे शाकिब अल हसन पर बांग्लादेश में संकट, हत्या का केस दर्ज: शेख हसीना की पार्टी से सांसद थे ऑलराउंडर, अब ‘घर वापसी’ पर सवाल

बांग्लादेश के स्टार क्रिकेटर शाकिब अल हसन एक गंभीर विवाद में फंस गए हैं, क्योंकि उन पर एक कपड़ा फैक्ट्री कर्मचारी की हत्या में शामिल होने का आरोप है। ये आरोप उस समय सामने आए हैं जब शाकिब पाकिस्तान में हैं और पाकिस्तानी टीम के खिलाफ दो मैचों की टेस्ट सीरीज खेल रहे हैं। इस मामले में पीड़ित के पिता ने ढाका पुलिस स्टेशन में डेढ़ सौ से अधिक नामजद और 500-600 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है।

बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला बांग्लादेशी संसद के सदस्य के तौर पर शाकिब की पिछली भूमिका से जुड़ा है। जिसमें उनके संसदीय क्षेत्र में प्रदर्शन के दौरान युवक की मौत के मामले में पीड़ित के पिता ने शाकिब और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना समेत 156 लोगों को आरोपित बनाया है।

जानकारी के मुताबिक, ये मामला ढाका के अदबोर पुलिस स्टेशन में रूबेल नाम के युवक के पिता ने दर्ज कराया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अगस्त को रूबेल विरोध प्रदर्शन का हिस्सा था, जहाँ भीड़ पर गोलियाँ चलाई गई। इस गोलीबारी में रूबेल को सीने-और पेट में गोली लगी, जिसकी 7 अगस्त को मौत हो गई।

इस एफआईआर में 156 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट है, जिसमें शाकिब का नाम आरोपित नंबर 28वें के तौर पर है। अन्य आरोपितों में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, ओबैदुल कादर और 154 अन्य शामिल हैं। करीब 400-500 अज्ञात लोग भी आरोपित हैं।

बता दें कि बांग्लादेश में राजनीतिक संकट के बावजूद शाकिब को अंतरिम सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भाग लेने की अनुमति दी है। और वो पाकिस्तान में टेस्ट मैच खेल रहे हैं। इस मामले में बांग्लादेशी क्रिकेट टीम के कप्तान नजमुल हुसैन शांतो का भी बयान सामने आया है। शांतो ने कहा कि शाकिब का ध्यान क्रिकेट पर है। उन्होंने कहा, “शाकिब ने यह खेल काफी समय तक खेला है, इसलिए उन्हें अपनी भूमिका और खुद को तैयार करने का तरीका पता है। मैं उनके राजनीतिक करियर के बारे में नहीं सोच रहा हूँ।”

गौरतलब है कि शाकिब अल हसन बांग्लादेश के अब तक सबसे बेहतरीन क्रिकेटर माने जाते हैं। उन्होंने अब तक 67 टेस्ट मैच खेला है, जिसमें 217 के उच्च स्कोर के साथ 4505 रन बनाए हैं। टेस्ट मैचों में उन्होंने 5 शतक और 31 अर्धशतक लगाए हैं, तो बॉलिंग में 237 विकेट लिए हैं। वो बांग्लादेश के लिए सर्वाधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज भी हैं। शाकिब ने वनडे क्रिकेट में 247 मैच खेले हैं और 9 शतक, 56 अर्धशतक के साथ 7570 रन बनाए हैं, साथ ही 317 विकेट लिए हैं। वहीं, टी20 इंटरनेशनल फॉर्मेट में उन्होंने 129 मैच खेलते हुए 13 अर्धशकतों के साथ 2551 रन बनाए हैं, तो 149 विकेट भी लिए हैं। वो तीनों ही फॉर्मेट में बांग्लादेश ही नहीं, दुनिया के सबसे शानदार आल राउंडर्स में गिने जाते हैं।

40 साल में असम में बस गए 47928 अवैध प्रवासी, इनमें 56% मुस्लिम: विधानसभा में बीजेपी सरकार ने रखे आँकड़े, बांग्लादेश से घुसपैठ राज्य में बड़ा मुद्दा

असम में लगभग 48000 घुसपैठियों की पहचान की गई है। इन घुसपैठियों की पहचान बीते लगभग साढ़े चार दशक में की गई है। राज्य में घुसपैठियों के संबंध में यह जानकारी असम सरकार ने दी है। यह जानकारी असम विधानसभा में दी गई है।

असम विधानसभा में सरकार ने घुसपैठियों पर पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में बताया है कि राज्य में 1971 से लेकर 2014 के बीच 47,928 घुसपैठियों की पहचान की गई है। इन लोगों को राज्य के फॉरेन ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित किया है। असम विधानसभा में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बताया कि इन 47,928 विदेशी लोगों में से 27,309 मुस्लिम हैं जबकि 20613 हिन्दू हैं। यानी कुल घुसपैठियों में 56% मुस्लिम हैं।

राज्य विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, 27,309 मुस्लिम घुसपैठियों में से सबसे अधिक 4182 जोरहाट जिले में जबकि 3897 मुस्लिम गुवाहाटी शहर में पहचाने गए हैं। डिब्रूगढ़ में 2782 लोगों को मुस्लिम घुसपैठिया बताया गया है। इसके अलावा होजाई, सिवासनगर, नगांव और कछार में भी 2000 से अधिक मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान हुई है। इसके अलावा भी असम के कई जिलों में मुस्लिम घुसपैठियों को पहचाना गया है। वहीं बाहर से आने वाले सबसे अधिक हिन्दुओं की सँख्या कछार, गुवाहाटी और लखीमपुर जैसे जिलों में हैं।

वर्ष 1971 से घुसपैठियों की पहचान किए जाने के पीछे वर्ष 1985 में राजीव गाँधी की सरकार के दौरान किया गया असम एकॉर्ड है। इस समझौते को असम के छात्र नेता प्रफुल्ल कुमार महंत और भारत सरकार के बीच किया था। इस समझौते के अनुसार, उन लोगों को घुसपैठिया माना जाएगा जो अवैध रूप से राज्य में वर्ष 1971 में घुसे हैं। यह समझौता असम में घुसपैठ को लेकर हुए छात्र आन्दोलन के बाद किया गया था।

असम में बांग्लादेश के रास्ते होने वाली घुसपैठ बड़ा मुद्दा रही है। इसी को लेकर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी बताया था कि राज्य की 72% जनसंख्या असमिया भाषी है जबकि 28% बांग्ला बोलते हैं। असम सरकार ने प्रदेश में बाहरी घुसपैठ और असम की संस्कृति को बचाने को लेकर आश्वासन भी दिया है।

बेटी से कर रहा था रेप की कोशिश, बीवी ने सिर पर हथौड़े से वार कर मार डाला: तमिलनाडु पुलिस ने बनाया ‘हत्या’ का केस, हाई कोर्ट ने ‘आत्मरक्षा’ बता किया बरी

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने पति की हत्या करने वाली एक महिला के खिलाफ दायर हत्या के केस को खारिज कर दिया है। महिला का पति नशे की हालत में अपनी 21 साल की बेटी के साथ रेप करने का प्रयास किया था। बेटी को बचाने की कोशिश में महिला ने पति के सिर पर वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी। इसके बाद पुलिस ने महिला के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया था।

न्यायाधीश जी जयचंद्रन की एकल पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत फोटोग्राफ और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित विभिन्न रिकॉर्ड आरोपित महिला (याचिकाकर्ता) और उसकी बेटी द्वारा दिए गए बयान मेल खाते हैं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जाँच में पाया गया कि मृतक अपनी बेटी के ऊपर लेटा हुआ था और उसका मुँह बंद कर रहा था। महिला ने जब बेटी की चीखने की आवाज सुनी तो वहाँ आई।

इस दौरान आरोपित महिला ने अपने पति को बेटी के ऊपर से खींचकर दूर करने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं हटा। इसके बाद महिला ने अपने पति को लकड़ी के चाकू से उसके सिर पर मारा। इस पर उका पति नहीं माना और कुकृत्य जारी रखा तो महिला ने पीछे से उसके सिर पर हथौड़ा मार दिया। इससे उसके पति की मौके पर ही मौत हो गई। महिला पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया था।

हत्या का मामला दर्ज किए खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। महिला ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 97 के तहत यह मामला खुद के बचाव से संबंधित था। इसलिए, भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत उस पर हत्या का मुकदमा चलाना अनुचित है। उसने कोर्ट से हत्या का मामला हटाने का आग्रह किया।

अदालत ने इसके ‘सामान्य अपवादों’ पर विचार किया और कहा कि प्रत्येक व्यक्ति आत्मरक्षा और दूसरे व्यक्ति को बचाने का अधिकार रखता है। कोर्ट ने कहा, “कोई भी व्यक्ति खुद को या किसी को ऐसे यौन अपराधों से बचाने के लिए IPC की धारा 97 के तहत निजी बचाव का अधिकार रखता है। भले ही अपराध स्वीकार कर लिया गया हो, लेकिन उसे दंडित किए जाने से छूट दी जाएगी।”

इस मामले में कोर्ट ने मृतक की बेटी के बयान के साथ-साथ अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई तस्वीरों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला दिया। इसमें दिखाया गया था कि मृतक के सिर के पिछले हिस्से में चोट लगी थी। कोर्ट ने कहा, “मृतक नशे में अपनी बेटी के साथ दुर्व्यवहार करने की कोशिश की। बेटी की इज्जत बचाने के लिए याचिकाकर्ता, जो लड़की की माँ है, ने ये अपराध किया है।”

न्यायालय ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में यह हस्तक्षेप करने के लिए उपयुक्त मामला था। इसलिए कोर्ट ने याचिका को स्वीकार कर लिया और महिला के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता महिला की ओर से कोई भी अदालत में पेश नहीं हुआ था।

कोलकाता-बदलापुर के बाद गैंगरेप से उबला असम, ट्यूशन से लौट रही हिंदू नाबालिग को दरिंदगी के बाद सड़क पर फेंका: बोले CM- लोकसभा चुनाव के बाद विशेष समुदाय अत्यंत सक्रिय

कोलकाता और बदलापुर में रेप की घटनाएँ सामने आने के बाद अब असम के ढिंग में एक हिंदू नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप की घटना सामने आई है। वहाँ स्थानीय सड़कों पर प्रदर्शन करने उतरे हुए हैं। पुलिस ने दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है जबकि एक अब भी फरार है। प्रदेश मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस मुद्दे पर मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि बच्ची के साथ जघन्य अपराध करने वाले को छोड़ा नहीं जाएगा।

असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, जिस नाबालिग के साथ कुकर्म किया गया है वो दसवीं कक्षा की छात्रा है। घटना वाले दिन शाम 7 से 8 बजे के करीब वो ट्यूशन से घर लौट रही थी। इसी दौरान उसपर तीन लोगों ने हमला किया। बाद में उसके साथ दुष्कर्म करके उसे सड़क किनारे बेहोशी की हालत में फेंक गए। पीड़िता सड़क किनारे करीब एक घंटे तक पड़ी रही।

इसी बीच एक स्थानीय की नजर लड़की पर पड़ी। उन्होंने बच्ची की हालत देख फौरन पुलिस को फोन किया और कार्रवाई की माँग की। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर पहले पीड़िता को ढिंग फर्स्ट रेफरल यूनिट में ले गए जहाँ उसकी चोटें देख उसे नगाँव के एक अस्पताल में रेफर कर दिया गया।

घटना की सूचना फैलते ही स्थानीय संगठन भी सड़कों पर न्याय माँगने उतर आए। इस दौरान जमकर प्रदर्शन हुआ, सड़कें जाम हुई और न्याय की माँग को लेकर रास्ते बंद कर दिए गए। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) की ढिंग यूनिट ने भी दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की माँग की और अपराधियों के पकड़े जाने तक धींग इलाके में बंद का आह्वान किया है। वहीं सीएम सरमाने भी घटना की निंदा की और अपराधी को सजा दिलाने की बात कही।

उन्होंने अपने एक्स पर लिखा, “ढिंग में हुई भयावह घटना मानवता के खिलाफ अपराध है और इसने हमारी अंतरात्मा को झकझोर दिया है। हम किसी को नहीं बख्शेंगे और अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाएँगे। मैंने असम पुलिस के डीजीपी को घटनास्थल पर जाने और ऐसे राक्षसों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, “जिन अपराधियों ने ढिंग की एक हिंदू नाबालिग लड़की के साथ जघन्य अपराध करने का साहस किया, उन्हें कानून छोड़ेगा नहीं। लोकसभा चुनाव के बाद एक विशेष समुदाय अत्यंत सक्रिय हो रहा है। हिंदुओं को भाषाओं के आधार पर बाँटने की कोशिश से सभी को सतर्क रहना चाहिए।”

UP सरकार का बुलडोजर पब्लिक के भी जीत रहा दिल, देश के सबसे पॉपुलर CM हैं योगी आदित्यनाथ: टक्कर में भी नहीं केजरीवाल-ममता, 19% लोग चाहते हैं मोदी के बाद बने PM

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश के सबसे लोकप्रिय CM हैं। वह लोकप्रियता के मामले में अन्य CM से दोगुना आगे हैं। यह राय देश के लाखों लोगों ने व्यक्त की हैं। CM योगी आदित्यनाथ लोकप्रियता के मामले में CM अरविन्द केजरीवाल, CM ममता बनर्जी और बाकियों से काफी आगे बढ़ चुके हैं। यह जानकारी आजतक के मूड ऑफ़ द नेशन सर्वे (MOTN) में सामने आई है। यह सर्वे में हाल ही में किया गया है।

आजतक के MOTN के अनुसार, योगी आदित्यनाथ को देश के 33.2% लोग पसंद करते हैं। वहीं अरविन्द केजरीवाल को 13.8% लोग पसंद करते हैं। CM ममता बनर्जी 9.1% लोग पसंद करते हैं। CM स्टालिन और CM चंद्रबाबू नायडू इसके बाद लोकप्रिय हैं।

आजतक का यह MOTN सर्वे 15 जुलाई, 2024 से 10 अगस्त, 2024 के बीच हुआ था। इस सर्वे में 1.36 लाख लोगों से CM की लोकप्रियता के बारे में प्रश्न पूछे गए। इससे पहले भी CM योगी आदित्यनाथ देश में लोकप्रियता के मामले में शीर्ष पर बने रहे हैं।

CM योगी आदित्यनाथ के देश में सबसे अधिक लोकप्रिय होने का कारण उनका उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था पर जोर देना है। लोगों ने सर्वे में बताया है कि योगी आदित्यनाथ के अपराधियों पर बुलडोजर एक्शन करवाने और अवैध संपत्तियों के जब्तीकरण के कारण भी वह उन्हें पसंद करते हैं।

योगी आदित्यनाथ की प्रशासन को लेकर स्पष्टता भी देश में लोगों को पसंद आई है। योगी आदित्यनाथ के सामने पेपर लीक और उत्तर प्रदेश के अन्य मुद्दे चुनौती बन कर भी उभरे हैं, लोगों ने कहा है कि CM योगी को इन पर काम करने की आवश्यकता है।

CM योगी आदित्यनाथ की अपने राज्य में भी लोकप्रियता अच्छी खासी है। CM योगी का कामधाम भी राज्य में लोगों को पसंद आया है। प्रदेश के लगभग 40% लोग उनके कामकाज से संतुष्ट हैं। हालाँकि, यह आँकड़ा पिछली बार अधिक था। बताया गया है कि इसमें 2024 लोकसभा चुनाव के बाद थोड़ा सा प्रभाव पड़ा है।

CM योगी को मुख्यमंत्री के तौर पसंद करने के अलावा देश की जनता उन्हें बड़े रोल में भी देखना चाहती है। MOTN सर्वे में सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद लोग अमित शाह और फिर सबसे ज्यादा CM योगी को उनका सही उत्तराधिकारी मानते हैं। 19% लोग CM योगी को लोग देश के PM के रूप में देखना चाहते हैं।

14 साल की बच्ची का महीनों रेप करता रहा 50 साल का हैदर, गर्भपात कराने के लिए पीड़िता और उसके पिता को किया अगवा: बिहार के पूर्णिया की घटना

बिहार के पूर्णिया में 50 साल के अधेड़ गुलाम हैदर उर्फ रमजान नाम के व्यक्ति ने 14 साल की नाबालिग को महीनों तक डरा-धमका कर अपनी हवस का शिकार बनाया। नाबालिग जब गर्भवती हो गई, तो उसका परिवार पीड़ित परिवार पर गर्भपात का दबाव बनाने लगा। जब परिवार नहीं माना, तो गर्भपात कराने के लिए पीड़ित बच्ची और उसके पिता का ही अपहरण कर लिया। हालाँकि पुलिस ने 23 अगस्त को पीड़ित बच्ची और उसके पिता को बरामद कर लिया है।

ये मामला मंगलवार (20 अप्रैल 2024) को पूर्णिया के बायसी थाने में दर्ज हुआ था। इसमें पीड़िता की माँ ने पुलिस को बताया कि आरोपित गुलाम हैदर उर्फ रमजान अप्रैल महीने से ही उनकी बच्ची का यौन शोषण कर रहा था। डर के मारे बच्ची ने किसी को कुछ नहीं बताया। जब बच्ची के शरीर में बदलाव दिखने लगे तो पता चला कि वो गर्भवती है। इसकी शिकायत पीड़ित परिवार ने आरोपित के बड़े भाई अब्दुल कैयूम से की, लेकिन उन पर दबाव बनाया जाने लगा।

पीड़ित बच्ची की माँ ने शिकायत में बताया है कि आरोपित पक्ष बच्ची के गर्भपात का दबाव बना रहा था, ताकी मामले को दबा दिया जाए। यही नहीं, परिवार को बच्ची की शादी में मदद का लालच भी दिया गया, लेकिन जब पीड़ित परिवार ने इनकार कर दिया, तो नाबालिग बच्ची और उसके पिता का अपहरण कर लिया गया। अपने पति और बेटी के अपहरण के बाद वो बायसी थाने में मदद की फरियाद लेकर पहुँची है।

इस मामले में ऑपइंडिया ने बायसी पुलिस से संपर्क किया। पुलिस ने बताया है कि शुक्रवार (23 अगस्त 2024) को पीड़ित बच्ची और उसके पिता को बरामद कर लिया गया है। उनका बयान दर्ज कराया जा रहा है। बयान दर्ज होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। बायसी पुलिस ने कहा कि अभी कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। पीड़ित बच्ची का बयान दर्ज होने के बाद समुचित वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

दारू घोटाले के फैसले अरविंद केजरीवाल के आदेश पर ही, जमानत मिला तो मिटा सकते हैं सबूत: सुप्रीम कोर्ट में CBI, दिल्ली CM की याचिका पर अब 5 सितंबर को सुनवाई

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने शुक्रवार (23 अगस्त 2024) को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अगर अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया तो वे सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं। जाँच एजेंसी ने यह भी कहा कि वे दिल्ली शराब घोटाले से संबंधित मामले की चल रही जाँच को भी बाधित कर सकते हैं। CBI ने कहा कि दिल्ली आबकारी नीति के सारे फैसले सीएम केजरीवाल के आदेश पर लिए गए थे।

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश उज्जल भुइयाँ की पीठ के समक्ष हलफनामा दायर करके यह बात कही है। सीबीआई का यह हलफनामा सीएम केजरीवाल की उस याचिका के जवाब में है, जिसमें सीबीआई द्वारा उनकी गिरफ्तारी को रद्द करने और उन्हें अंतरिम जमानत पर रिहा करने के लिए दायर किया गया है। इसके बाद पीठ ने 5 सितंबर तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी है।

सीबीआई ने हलफनामे में कहा, “एक प्रमुख राजनेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री होने के नाते याचिकाकर्ता बहुत प्रभावशाली है और वह हिरासत में पूछताछ के दौरान अपने सामने पहले से मौजूद गवाहों एवं सबूतों तथा संभावित गवाहों को भी प्रभावित कर सकता है। वह आगे एकत्र किए जाने वाले सबूतों के साथ भी छेड़छाड़ कर सकता है और चल रही जाँच में बाधा डाल सकता है।”

इसमें आगे कहा गया है, “याचिकाकर्ता के पास आबकारी सहित कोई भी मंत्री पद नहीं है। हालाँकि, समय के साथ यह बात सामने आई कि नई आबकारी नीति के बनाने में सभी महत्वपूर्ण निर्णय याचिकाकर्ता (सीएम अरविंद केजरीवाल) के इशारे पर दिल्ली के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री एवं आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा लिए गए थे।”

सीबीआई द्वारा दायर हलफनामे में आगे कहा गया है कि दिल्ली आबकारी नीति की आड़ में किए गए शराब घोटाले में सह-आरोपियों के हार्ड ड्राइव और मोबाइल फोन से डेटा हासिल किए गए हैं। उन डेटा से संबंधित लेन-देन और नीतिगत निर्णयों में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के संबंध होने की पुष्टि हुई है। केजरीवाल ने जानबूझकर आबकारी नीति 2021-22 में हेरफेर किया।

एजेंसी ने आगे कहा, “याचिकाकर्ता माननीय न्यायालय के समक्ष मामले को राजनीतिक रूप से सनसनीखेज बनाने का प्रयास कर रहा है, जबकि विभिन्न न्यायालयों द्वारा बार-बार आदेश पारित किए गए हैं। वे प्रथम दृष्टया अपराधों के होने से संतुष्ट हैं, जिसके लिए पहले ही संज्ञान लिया जा चुका है। इस तरह के अनुचित कथन खारिज किए जाने योग्य हैं।”

दिल्ली हाई कोर्ट ने 5 अगस्त 2024 को इस संबंध में अरविंद केजरीवाल की याचिकाओं को खारिज कर दिया था और उन्हें जमानत के लिए निचली अदालत में जाने को कहा था। इसके बाद सीएम केजरीवाल ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त 2024 को जमानत देने से इनकार करते हुए सीबीआई से जवाब माँगा था।

कौन हैं कबिता सरकार, कोलकाता हॉरर में गिरफ्तार संजय रॉय की करेंगी पैरवी: रेप-हत्या से पहले RG Kar हॉस्पिटल के हॉस्टल में रहती थीं 160 महिला डॉक्टर, अब केवल 17 बचीं

आर जी कर अस्पताल में डॉक्टर के रेप और मर्डर के आरोपित संजय रॉय को अदालत में केस लड़ने के लिए एक वकील मिल गईं हैं। वकील का नाम कबिता सरकार है। 52 साल की कबिता के पास वकालत का 25 साल का अनुभव है। उन्होंने अपने पूरे करियर में कई मुश्किल केसों का सामना किया है।

कबिता सरकार को इस केस की जिम्मेदारी तब दी गई जब कोई वकील संजय रॉय की ओर से केस लड़ने को तैयार नहीं था। जानकारी के मुताबिक कबिता सरकार ने यह केस इसलिए लिया क्योंकि वह अदालती सुनवाई के ज़रिए न्याय मिलने में विश्वास करती हैं, न कि सुनवाई से पहले के फ़ैसलों में। वह चाहती हैं कि किसी भी मामले में अभियुक्त समेत हर किसी को निष्पक्ष सुनवाई का मौका मिले ताकि वो मजबूरी से कोर्ट में अपना पक्ष रख पाए।

इसके अलावा रिपोर्ट्स बताती हैं कि कबिता सरकार सजा के तौर पर मृत्युदंड का भी विरोध करती हैं। उनका मानना है कि किसी अपराध के लिए अधिकतम सजा सिर्फ आजीवन कारावास होनी चाहिए ताकि अपराधी सोच सके कि उसने अपनी जीवन में किया क्या। उनका मानना है कि जब तक किसी का दोष साबित नहीं हो जाता तब तक उसे निर्दोष ही मानना चाहिए।

कबिता सरकार का करियर

कबिता सरकार ने हुगली कॉलेज से कानून में स्नातक किया हुआ है। उसके बाद उन्होंने अलीपुर कोर्ट से अपना कानूनी करियर शुरू किया जहाँ उन्होंने सिविल मामलों में विशेषज्ञता हासिल की। फरवरी​ 2023 से वह क्रिमिनल लॉ पर ध्यान देने लगीं, इसके लिए उन्होंने SALSA (दक्षिण एशियाई कानूनी सेवा संघ) को ज्वाइन किया। बाद में जून 2023 में, क्रिमिनल डिफेंस के कार्य किया। अब वही कबिता सरकार संजय रॉय के केस को लड़ेंगी। उन्होंने अपने वरिष्ठ सौरव बनर्जी से अनुरोध किया है कि वे पूरे केस में उनकी सहायता करें।

आरजी कर अस्पताल से कम हो रही एमबीबीएस महिला छात्राओं की संख्या

उल्लेखनीय है कि 9 अगस्त 2024 की घटना के बाद से आर जीकर अस्पताल लगातार चर्चा में बना हुआ है। कभी वहाँ सबूतों से छेड़छाड़ की बात सामने आती है तो कभी भीड़ के घुसने की। इन सबके बीच एक ताजा जानकारी सामने आई है वो ये कि इस अस्पताल से धीरे-धीरे महिलाओं की संख्या कम होने लगी है। इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार, एक एमबीबीएस महिला ने बताया कि हॉस्टल में पहले 160 जूनियर डॉक्टर रहती थीं लेकिन अब सिर्फ 17 ही बची हैं। वहीं कैंपस में पहले 700 रेजिडेंट डॉक्टर थे, जिसमें से 30-40 महिलाएँ डॉक्टर ही अब कैंपस में रहती हैं वहीं 60-70 पुरुष डॉक्टर। बाकी सब चले गए हैं। एमबीबीएस छात्राओं के अनुसार, 14 अगस्त को जो कुछ भी हुआ उसे बताया नहीं जा सकता। कई महिला नर्सें और डॉक्टर प्रदर्शन करने आई थी, लेकिन भीड़ ने हमला कर दिया। उस रात कोई छात्रा नहीं सो पाई थी।

घटना से एक दिन पहले संजय रॉय कर रहा था पीड़िता का पीछा

इसके अलावा इस मामले में एक और नई जानकारी सामने आई है वो आरोपित संजय रॉय को लेकर है। मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि कोलकाता पुलिस द्वारा पूछताछ के दौरान रॉय ने कबूल किया कि उसने अपराध से एक दिन पहले 8 अगस्त को चेस्ट मेडिसिन वार्ड में पीड़िता को देखा था। वार्ड के सीसीटीवी फुटेज से भी पुष्टि होती है कि रॉय – सुबह करीब 11 बजे वार्ड में था – उसी समय जब पीड़िता और चार अन्य जूनियर डॉक्टर वार्ड में मौजूद थे। सूत्रों ने बताया, “सीसीटीवी फुटेज में रॉय को उनकी ओर घूरते हुए देखा जा सकता है।”

धारा 370 की वापसी, ‘आतंकियों’ को नौकरी… चुनाव जम्मू-कश्मीर का, वादे पाकिस्तान वाले: कॉन्ग्रेस+नेशनल कॉन्फ्रेंस का इरादा क्या- चुनाव जीतना या पत्थरबाजी का वही दौर लाना?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में साल 2019 में लगातार दूसरी बार एनडीए ने प्रचंड बहुमत हासिल करते हुए केंद्र में सरकार बनाई और सबसे पहला बड़ा काम किया था जम्मू-कश्मीर पर लागू होने वाले आर्टिकल 370 को रद्द करने का। जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में करके केंद्र शासित प्रदेश बनाने का। मोदी सरकार ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिसे अब कोई सरकार नहीं हटा पाई। ये अलग बात है कि कॉन्ग्रेस आर्टिकल 370 को हटाने का पुरजोर विरोध करती रही। खैर, अब कॉन्ग्रेस ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू एवँ कश्मीर के विधानसभा चुनाव के लिए फिर से अपने ऐसे पुराने सहयोगी के साथ ‘हाथ’ मिलाया है, जो जम्मू-कश्मीर को लेकर अलगाववादी शक्तियों की मदद करती है। अलगाववाद को बढ़ावा देती है। भारत के दुश्मन पाकिस्तान से दोस्ती की वकालत करती है और कश्मीरियों को भारतीयों से अलग बताती है।

जी हाँ, कॉन्ग्रेस के ‘बिना राजतिलक’ वाले युवराज राहुल गाँधी ने श्रीनगर का दौरा किया। वहाँ उन्होंने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की बात कही और कश्मीर से अपना ‘खून का रिश्ता’ बताया। उसके बाद राहुल गाँधी अपने ‘मुखौटे’ के साथ जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक़ अब्दुल्ला से मिले और फिर दोनों तरफ ये घोषणा की गई कि कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस पार्टी साथ चुनाव लड़ेंगी। इसमें माकपा भी सहयोगी रहेगी।

खैर, ये रिश्ता पहले भी रहा है। इस रिश्ते पर सवाल पहले नहीं उठते थे। खासकर 2019 से पहले तो बिल्कुल भी नहीं। चूँकि कॉन्ग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस की सोच कमोवेश एक जैसी ही रही है। बात चाहे पड़ोसी पाकिस्तान से रिश्तों को लेकर हो या आतंकवाद से निपटने को लेकर, लेकिन इस बार सारी हदें पार कर दी गई हैं।

हम ये बात यूँ ही नहीं कह रहे हैं, बल्कि ये बाते कह रही है कॉन्ग्रेस की रिश्तेदार नेशनल कॉन्फ्रेंस ही। दरअसल, नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने बीते सोमवार (19 अगस्त 2024) को पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया है। उन्होंने घोषणापत्र को एनसी का विजन डॉक्यूमेंट और शासन का रोडमैप बताया। घोषणापत्र में 12 व्यापक वादे किए गए हैं, जिनमें 2000 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा पारित स्वायत्तता प्रस्ताव के पूर्ण कार्यान्वयन के लिए प्रयास करना शामिल है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस का घोषणा पत्र देखकर लगता ही नहीं कि ये किसी भारतीय राजनीतिक पार्टी का घोषणा पत्र है। ये बात सुनी-सुनाई सी लग रही होंगी, लेकिन इन्हें हल्के में मत लीजिए। हल्के में लेने की जगह जरा नेशनल कॉन्फ्रेंस के घोषणा पत्र की हाईलाइट्स पढ़ लीजिए…

नेशनल कॉन्फ्रेंस के घोषणा पत्र की 12 गारंटियों में—

  • हम (अनुच्छेद) 370-35ए को बहाल करने और 5 अगस्त, 2019 से पहले की स्थिति में राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रयास करते हैं।
  • हम जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर सरकार के कामकाज के नियम, 2019 को फिर से तैयार करने का प्रयास करेंगे।
  • जम्मू और कश्मीर के लोगों के भूमि और रोजगार के अधिकारों की रक्षा करेंगे, यानी पहले की तरह बाहरी (भारतीयों) लोगों पर बैन।
  • भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत को प्रोत्साहित करेंगे, जोकि मोदी सरकार नहीं कर रही है।
  • राजनीतिक कैदियों को एमनेस्टी देना, पीएसए व यूएपीए हटाना (जिन पर आतंकवादी कृत्यों के आरोप हैं) यानी माफी देकर जेल से रिहा करेंगे।
  • कर्मचारियों की “अन्यायपूर्ण” (आतंकवाद के समर्थन की वजह) बर्खास्तगी की बहाली की जाएगी और राजमार्गों पर लोगों के उत्पीड़न (सेना की कड़ाई, पूछताछ) को समाप्त करेंगे।

अब अगर इन बातों पर गौर करें तो आर्टिकल 370 को फिर से लागू करना? ये कैसे करेंगे, किसी को नहीं पता है। वो फिर से कश्मीरियों और पाकिस्तानी नागरिकों तक ही कश्मीर की जमीन को सीमित करने का प्रयास करेंगे, मानों पूरा भारत कश्मीर में बस ही गया हो। और जो रोजगार, कामधंधे, निवेश आया है, वो फिर से शून्य हो जाएगा।

ये पाकिस्तान के साथ बातचीत को बढ़ावा देंगे? क्यों भाई? उस पार से आने वाले आतंकवाद पर प्रहार हुआ है इसलिए? क्योंकि इससे आप (कुछ लोगों) का भला होता था? याद करें अभी कुछ दिन पहले ही जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन का 20 साल तक अध्यक्ष रहा मियाँ अब्दुल कयूम भट्ट जून महीने में ही गिरफ्तार हुआ है। गिरफ्तार भी क्यों हुआ? क्योंकि उसने आतंकवादियों की मदद से एक विरोधी वकील को ‘रास्ते से’ हटवाया था। वो कश्मीरी आतंकवादियों का केस भी लड़ता रहा है। अब नेशनल कॉन्फ्रेंस उसे ‘राजनीतिक कैदी’ बताकर रिहा करेगी।

जरा सरकारी कर्मचारियों की अन्यायपूर्ण बर्खास्तगी वाली लाइन समझ लीजिए। ऐसे लोगों को नेशनल कॉन्फ्रेंस फिर से बहाल करेगी, जो आतंकवाद से जुड़े मामलों की वजह से बर्खास्त कर दिए गए हैं। ये वो लोग हैं, जिनके पति-पत्नी, भाई, पिता घोषित आतंकवादी हैं। सरकार से मिलने वाली सैलरी वो आतंकवादियों को देते हैं। या फिर आतंकवादियों की मदद करने, उन्हें सूचना पहुँचाने और देश के खिलाफ काम करने के मामले में जिनकी सेवाएँ समाप्त की गई हैं, नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार बनने पर उन्हें माफी दे दी जाएगी। खैर, ये तो तब होगा, जब जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा और उसके इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद देगी कॉन्ग्रेस।

वैसे, एक वादा तो और भी किया है उमर अब्दुल्ला ने, कि साल 2000 में जो रिजोल्यूशन जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार रहते पास किया गया था, जिसमें जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता की माँग थी, उसे तत्कालीन एनडीए सरकार यानी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पूरी तरह से खारिज कर दिया था। उसे फिर से पास करके केंद्र सरकार के पास भेजने की। अब ये संविधान के 16वें संसोधन की मजबूरी कहें या कुछ और, कि नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर को अलग देश बनाने की बात नहीं कर रही, वर्ना वो ये भी कर देती। बाकी उनकी इस माँग में और पड़ोसी पाकिस्तान की माँग में कोई खास अंतर रह नहीं गया है।

जी हाँ, अगर अब तक आपके मन में ये सवाल आ रहा हो कि कॉन्ग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस का रिश्ता क्या कहलाता है? तो ये जवाब है। जवाब है कॉन्ग्रेस का ऐसी ताकतों के साथ हाथ मिलाना, जो देश को विभाजन की तरफ ढकेलने की कोशिश करते हैं। वैसे, कॉन्ग्रेस खुद आर्टिकल 370 के हटाने का भी विरोध करती रही है। वैसे, राहुल गाँधी के ‘खून वाले रिश्ते’ के बयान के बाद गाँधी खानदान का अब्दुल्ला खानदान से रिश्ता आप भी जानते ही होंगे, अगर नहीं जानतें तो यहाँ पढ़ लीजिए

बहरहाल, अब जब पूरा देश कॉन्ग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के ना’पाक’ रिश्ते को जान ही चुका है, तो यहाँ ये भी जानना जरूरी है कि जिस अखिलेश यादव को इंडी गठबंधन खास कर सपा कार्यकर्ता देश का अगला ‘रक्षा मंत्री’ बनाने पर तुले हैं, उनके पिता मुलायम सिंह यादव रक्षा मंत्री रह भी चुके हैं, उनका राहुल गाँधी, उमर अब्दुल्ला से कितना याराना है। फिर इस गठबंधन के बाकी साथी चाहें वो शरद पवार हों, या ममता बनर्जी, इनके पाकिस्तान और ‘मजहब विशेष’ प्रेम से भी सभी वाकिफ हैं। साथ ही वामपंथी पार्टियों के 1962 से लेकर हमेशा किए जाने वाेल देश से छल से भी। ऐसे में इस गठबंधन को जम्मू-कश्मीर के असली देश वासी ही जवाब देंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।

बता दें कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव तीन चरणों में 18 सितंबर, 25 सितंबर और 1 अक्टूबर को होंगे। नतीजे 4 अक्टूबर को घोषित किए जाएँगे। पहले चरण के लिए नामांकन 27 अगस्त, दूसरे चरण के लिए 5 सितंबर और तीसरे चरण के लिए 12 सितंबर से दाखिल किए जाएँगे। इस चुनाव में कश्मीरी प्रवासियों के लिए दिल्ली, जम्मू और उधमपुर में स्पेशल पोलिंग बूथ बनाए गए हैं।

जम्मू-कश्मीर में कुल 90 निर्वाचन क्षेत्र हैं जिनमें से 74 जनरल, 9 अनुसूचित जाति और 7 अनुसूचित जनजाति के लिए हैं। केंद्रशासित प्रदेश में मतदाताओं की संख्या कुल 87.09 लाख हैं जिसमें 44.46 लाख पुरुष और 42.62 लाख महिला मतदाता हैं। जम्मू-कश्मीर में युवा मतदाताओं की संख्या 20 लाख है। पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 30 सितंबर तक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने का निर्देश दिया था।

1- जम्‍मू-कश्‍मीर से 5 अगस्‍त 2019 को आर्टिकल 370 को हटाया गया था।

2- आखिरी विधानसभा चुनाव 2014 में 87 सीटों पर हुआ था, जिनमें 4 सीटें लद्दाख की थीं।

3- जम्‍मू-कश्‍मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद सात विधानसभा सीटें बढ़ गई हैं।

4- 90 विधानसभा सीटों में से 74 सामान्‍य, 7 एससी और 9 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं।

5- जम्मू-कश्मीर सरकार का कार्यकाल पहले 6 साल होता था, अब 5 साल का होगा।

सवाल ये नहीं है कि कौन सी पार्टी किसके साथ गठबंधन करेगी। सवाल नीतियों का है। एक तरफ कॉन्ग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी होने का दंभ भरती है, तो उसके नेता और कार्यकर्ता, उसके राजनीतिक सहयोगी देश में सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक स्तर पर तोड़फोड़ और अलगाववादी नीतियाँ अपनाते हैं। दक्षिण में कॉन्ग्रेस की सहयोगी द्रमुक की बात करें तो वो सनातन परंपरा को ही मिटाने का संकल्प लेती है, तो उत्तर में नेशनल कॉन्फ्रेंस भारत की शान जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दिलाने, पाकिस्तान से बातचीत करने, आतंकवादियों को जेल से रिहा करने की बात करती है। ऐसी दो मुँही बातें कब तक चलेंगी मिस्टर युवराज?

5 साल का बैन, ₹25 करोड़ जुर्माना… शेयर बाजार में अनिल अंबानी पर प्रतिबंध: जानिए क्या है RHFL का लोन फर्जीवाड़ा जिसमें 25 लोगों पर SEBI ने लिया एक्शन

सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (SEBI) ने कारोबारी अनिल अंबानी समेत 25 लोगों और कम्पनियों पर बड़ी कार्रवाई की है। SEBI ने इन सभी के शेयर बाजार में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी है। SEBI ने अनिल अंबानी पर ₹25 करोड़ का जुर्माना भी ठोंका है। कई अन्य लोगों पर भी जुर्माने लगाए गए हैं। SEBI ने यह कार्रवाई रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) के लोन गड़बड़ तरीके से दिए जाने पर की है।

SEBI ने क्या कार्रवाई की?

SEBI ने RHFL के लोन गड़बड़ी मामले में 222 पेज का अपना अंतिम आदेश दिया है। SEBI ने इस आदेश में अनिल अंबानी पर 5 साल तक शेयर बाजार में हिस्सा लेने से रोक लगाई है, उन पर ₹25 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। उनके ऊपर किसी कम्पनी में प्रमुख पद लेने पर भी रोक लगा दी गई है। उनके अलावा RHFL में प्रमुख पद पर रहे अमित बापना पर ₹27 करोड़, रविन्द्र सुधालकर पर ₹25 करोड़ और पिंकेश शाह पर ₹21 करोड़ का जुर्माना ठोंका है। इन पर भी बाजार शेयर बाजार में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी गई है।

SEBI इनके अलावा RHFL पर 6 महीने का प्रतिबन्ध भी लगाया है और इस कम्पनी पर भी ₹6 लाख का जुर्माना ठोंका है। अनिल अंबानी से जुड़ी रिलायंस ग्रुप की कई अन्य कम्पनियों पर भी SEBI ने यही प्रतिबंध लगाया है। इनमें रिलायंस बिग इंटरटेनमेंट, रिलायंस कैपिटल लिमिटेड और रिलायंस ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड जैसी कम्पनियाँ शामिल हैं।

क्या है पूरा मामला?

SEBI ने पाया है कि वित्त वर्ष 2018-19 में RHFL ने कई ऐसे लोगों को हजारों करोड़ के लोन दिए जो इसके लायक नहीं थे। जिन्हें यह लोन दिए गए उनके पास इन्हें चुकाने के साधन ही नहीं थे और कई तो पहले ही बड़े कर्जे में डूबे हुए थे। RHFL ने इनकी पृष्ठभूमि पर ध्यान दिए बिना ही लोन बाँट दिए।

RHFL ने लगातार लोन देने सम्बन्धी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया। RHFL यह सब तब भी करती रही जब कम्पनी के बोर्ड ने उसे इस पर ध्यान देने को कहा। इस दौरान प्रमोटर के तौर पर अनिल अंबानी ने इन सभी लोन को दिलाने में अपना प्रभाव डाला। इसके अलावा अमित बापना ने कम्पनी के CFO के तौर पर यह लोन जारी किए और CEO रविन्द्र सुधालकर ने इन लोन को आगे उन फर्जी कम्पनियों और लोगों तक पहुंचाने का काम किया।

SEBI ने जाँच में यह पाया कि जिन कम्पनियों को RHFL ने लोन दिया, असल में वह अनिल अंबानी से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में RHFL का पैसा घुमा फिरा कर अनिल अंबानी के पास पहुँचा। इन सब कामों के लिए नियमों का जम कर उल्लंघन किया गया। कंपनी का पैसा अनिल अंबानी तक पहुँचाने के लिए इसे लोन का नाम दिया गया था। RHFL ने जो लोन बिना देखे परखे दिए थे। उनमें से अधिकांश वापस नहीं आए। उन्हें NPA घोषित करना पड़ा।

RHFL दिए गए लोन वापस ना आने के कारण खुद भी दिवालिया होने की स्थिति में पहुँच गई। उसने अपने लोन पर डिफ़ॉल्ट करना चालू कर दिय़ा। इसके बाद कम्पनी के अपने संसाधन खत्म होने चालू हो गए। RHFL के निवेशकों को भी इससे बड़ा नुकसान हुआ। RHFL का शेयर 2018 में जहाँ लगभग ₹60-₹65 के आसपास था तो वहीं 2020 में यह ₹.75 पैसे पहुँच गया। SEBI की इस कार्रवाई के कारण रिलायंस की अन्य कम्पनियों के शेयरों पर भी प्रभाव पड़ा है।