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‘छात्राओं को पोशाक चुनने की आजादी’: सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के कॉलेज में हिजाब बैन पर लगाई रोक, कहा- तिलक एवं बिंदी पर रोक क्यों नहीं लगाई

सुप्रीम कोर्ट ने हिजाब पर बैन से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए मुंबई के एक कॉलेज के उस आदेश पर आंशिक रूप से रोक लगा दी है, जिसमें कॉलेज परिसर में ‘हिजाब, बुर्का और नकाब’ पहनने पर पाबंदी लगाई गई थी। शुक्रवार (09 अगस्त 2024) को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि छात्राओं को यह चयन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह क्या पहनें। इस मामले में सुनलाई करने हुए शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि शैक्षिक संस्थान छात्राओं पर अपनी पसंद को नहीं थोप सकते।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने ‘एन जी आचार्य और डी के मराठे कॉलेज’ चलाने वाली ‘चेंबूर ट्रॉम्बे एजुकेशन सोसाइटी’ को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने उन्हें 18 नवंबर तक जवाब तलब करने को कहा है। पीठ ने मुस्लिम छात्राओं के लिए ‘ड्रेस कोड’ को लेकर उत्पन्न विवाद से केंद्र में आए कॉलेज प्रशासन से कहा कि छात्राओं को यह चयन करने की आजादी होनी चाहिए कि वे क्या पहनें। इसके लिए कॉलेज उन पर दबाव नहीं डाल सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपको (कॉलेज प्रशासन ) अचानक पता चलता है कि देश में कई धर्म हैं। पीठ ने कहा कि अगर कॉलेज का इरादा छात्राओं की धार्मिक आस्था के प्रदर्शन पर रोक लगाना था, तो उसने ‘तिलक’ और ‘बिंदी’ पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया। कोर्ट ने एजुकेशनल सोसायटी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील माधवी दीवान से पूछा कि क्या छात्राओं के नाम से उनकी धार्मिक पहचान उजागर नहीं होती?

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि छात्राओं को कक्षा के अंदर बुर्का पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती और न ही परिसर में किसी भी धार्मिक गतिविधि की अनुमति दी जा सकती है। पीठ ने कहा कि उसके अंतरिम आदेश का किसी के द्वारा दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए और किसी भी दुरुपयोग के मामले में ‘एजुकेशनल सोसायटी’ और कॉलेज को अदालत का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता है।

लाइव लॉ के मुताबिक, जस्टिस कुमार ने आगे सवाल किया, “क्या आप किसी को तिलक लगाने से मना कर सकते हैं? क्या यह आपके दिशा-निर्देशों में शामिल नहीं है?” सुप्रीम कोर्ट उस याचिका की समीक्षा कर रहा था जिसमें जून माह के बॉम्बे उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें कॉलेज के प्रतिबंध लागू करने के निर्णय को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।

ये विवाद 1 मई को शुरू हुआ जब चेंबूर ट्रॉम्बे एजुकेशन सोसाइटी के एनजी आचार्य और डीके मराठे कॉलेज ने अपने आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में एक नोटिस जारी किया, जिसमें संकाय सदस्य और छात्र दोनों शामिल थे। नोटिस में एक ड्रेस कोड जारी किया गया, जिसमें परिसर में हिजाब, नकाब, बुर्का, टोपी, बैज और स्टोल पहनने पर प्रतिबंध लगाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह निर्देश बिना किसी कानूनी अधिकार के जारी किया गया था, जो लागू नहीं होता।

ये विवाद 1 मई को शुरू हुआ जब चेंबूर ट्रॉम्बे एजुकेशन सोसाइटी के एनजी आचार्य और डीके मराठे कॉलेज ने अपने आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में एक नोटिस जारी किया, जिसमें संकाय सदस्य और छात्र दोनों शामिल थे। नोटिस में एक ड्रेस कोड जारी किया गया, जिसमें परिसर में हिजाब, नकाब, बुर्का, टोपी, बैज और स्टोल पहनने पर प्रतिबंध लगाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह निर्देश बिना किसी कानूनी अधिकार के जारी किया गया था, जो लागू नहीं होता।

इस मामले में छात्रों ने सबसे पहले कॉलेज प्रबंधन और प्रिंसिपल से संपर्क किया और अनुरोध किया कि हिजाब, नकाब और बुर्का पर प्रतिबंध हटा दिए जाएँ, क्योंकि उन्हें कक्षा में अपनी पसंद, सम्मान और निजता का अधिकार है। जब उनके अनुरोधों की अनदेखी की गई, तो उन्होंने इस मुद्दे को मुंबई विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और उप-कुलपति के साथ-साथ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष उठाया और हस्तक्षेप की माँग की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बिना किसी भेदभाव के शिक्षा प्रदान की जाए। कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर छात्रों ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील अल्ताफ खान ने कुरान की आयतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि हिजाब पहनना इस्लाम का एक अनिवार्य हिस्सा है। याचिका में कॉलेज की कार्रवाई को “मनमाना, अनुचित, कानूनी रूप से दोषपूर्ण और गलत” बताया गया। कॉलेज प्रबंधन ने प्रतिबंध का बचाव करते हुए दावा किया कि यह एक समान ड्रेस कोड लागू करने और अनुशासन बनाए रखने के लिए एक उपाय था, जिसका मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव करने का कोई इरादा नहीं था। कॉलेज का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील अनिल अंतुरकर ने जोर देकर कहा कि ड्रेस कोड सभी धर्मों और जातियों के छात्रों पर लागू होता है।

‘गाजा पर तो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन बांग्लादेश के हिंदुओं पर चुप्पी साध लेते हैं’: अनुराग ठाकुर ने राहुल गाँधी को सदन में घेरा, पूछा- ऐसी क्या मजबूरी है?

बांग्लादेश में जारी हिंदुओं के नरसंहार पर भारत के विपक्षी दल चुप्पी साध रखे हैं। इसको लेकर भाजपा ने शुक्रवार (9 अगस्त) को विपक्षी दलों की आलोचना की और कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति पर उनकी चुप्पी दुर्भाग्यपूर्ण है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि राहुल गाँधी गाजा पर तो बोलते हैं, लेकिन बांग्लादेशी हिंदुओं पर आवाज नहीं निकलती।

शून्यकाल के दौरान भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बारे में कुछ भी नहीं कहा। उन्होंने कहा, “जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने कार्यभार संभाला तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई दी, लेकिन साथ ही उन्होंने उनसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने आगे कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि विपक्ष के नेता ने अंतरिम सरकार (बांग्लादेश की) को बधाई दी, लेकिन हिंदुओं एवं अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का जिक्र नहीं किया। आखिर इनकी क्या मजबूरी थी कि ये वहाँ के हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर बात नहीं की? इन्होंने गाजा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कीं, लेकिन बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के बारे में नहीं बोला।”

दरअसल, नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस की अगुवाई में गुरुवार (8 अगस्त) की शाम को बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन किया गया है। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर ट्वीट करके उन्हें बधाई दी और हिंदुओं के साथ-साथ अन्य अल्पसंख्यकों के जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा।

वहीं, राहुल गाँधी ने अपने पोस्ट में हिंदुओं या अन्य अल्पसंख्यकों का जिक्र तक नहीं किया। राहुल गाँधी ने अपने पोस्ट में लिखा, “बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में शपथ लेने पर प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस को बधाई। शांति और सामान्य स्थिति की शीघ्र बहाली समय की हमारी माँग है।”

बता दें कि शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर हमले किए जा रहे हैं। उनके घरों एवं मंदिरों को लूटा और जलाया जा रहा है। हिंदुओं की हत्या की जा रही है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है। बांग्लादेश के अलग-अलग हिस्सों से हिंदू भागकर भारतीय सीमा की ओर आ रहे हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर मोदी सरकार सख्त, निगरानी के लिए बनाई समिति: मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार से भी बात करेगा केंद्र

बांग्लादेश में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के हिंसक होने के बाद शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर मुल्क छोड़ दिया है। वहाँ नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस की अगुवाई में अंतरिम सरकार का गठन कर दिया है। इसके बावजूद वहाँ हिंदुओं के खिलाफ हिंसा थम नहीं रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर नजर रखने के लिए एक कमेटी गठित की है।

यह कमिटी हिंसाग्रस्त बांग्लादेश में हिंदुओं एवं अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों पर हो रहे अत्याचार और मौजूदा हालात का जायजा लेगी। इसके साथ ही गृहमंत्री अमित शाह हिंदुओं एवं अन्य अल्पसंख्यक वर्ग की सुरक्षा और उनकी संपत्ति का संरक्षण सुनिश्चित कराने के लिए बांग्लादेश सरकार से भारत बात करेगा। इस संबंध में गृहमंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किया है।

उन्होंने लिखा, “बांग्लादेश में जारी हालात के मद्देनजर मोदी सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर नजर रखने के लिए एक समिति गठित की है। यह समिति बांग्लादेश में अपने समकक्ष अधिकारियों के साथ संवाद करेगी, ताकि वहाँ रहने वाले भारतीय नागरिकों, हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। इस समिति की अध्यक्षता सीमा सुरक्षा बल के पूर्वी कमान के ADG करेंगे।”

बता दें कि गुरुवार (8 अगस्त) की शाम को बैंकर मुहम्मद यूनुस के बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख बनने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंदुओं का मुद्दा उठाया था। उन्होंने सोशल मीडिया साइट X पर लिखा था, “हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी, जिससे हिंदुओं और अन्य सभी अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।”

बता दें कि शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं पर हमले किए जा रहे हैं। उनके घरों एवं मंदिरों को लूटा और जलाया जा रहा है। हिंदुओं की हत्या की जा रही है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जा रहा है। बांग्लादेश के अलग-अलग हिस्सों से हिंदू भागकर भारतीय सीमा की ओर आ रहे हैं।

दलाल को दिए ₹3000, सुरंग के रास्ते भारत में घुस गया मुल्ला: बीवी के साथ आराम से जिंदगी गुजार रहा था बांग्लादेशी घुसपैठिया, बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पकड़ा

गुजरात में बांग्लादेशी घुसपैठियों के पकड़े जाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इसी कड़ी में अहमदाबाद के नरोदा में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मिंटू अलीभर मुल्ला नाम के बांग्लादेशी घुसपैठिए को पकड़कर पुलिस के हवाले किया है। वो महज 3000 रुपए एक दलाल को देकर भारत में घुसा था और नरोदा में अपनी बीवी के साथ आराम से जिंदगी दी रहा था। बांग्लादेशी घुसपैठिया मिंटू अलीभर मुल्ला दानिलिम्दा के चंदोला झील के पास शाह आलम के मिल्लत नगर में रह रहा था।

शुरुआती जानकारी के मुताबिक, नरोदा क्षेत्र के बजरंग दल के संयोजक विशाल राजपूत और सह-संयोजक आतिश राजपूत नरोदा पाटिया इलाके से गुजर रहे थे, वहाँ उन्होंने संदिग्ध बांग्लादेशी घुसपैठिए को घूमता पाया। ऑपइंडिया से बातचीत में उन्होंने बताया कि मिंटू अलीभर मुल्ला काले कपड़े और टोपी पहने हुए था और हिंदू इलाके में हाथों में अगरबत्ती लेकर घूम रहा था। हमने उससे पूछताछ की तो पता चला कि उसे न तो गुजराती आती है और न ही हिंदी।

विशाल राजपूत ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “हमने जब उसे (मिंटू अलीभर मुल्ला) रोका तो उसने बताया कि उसे हिंदी या गुजराती नहीं आती। हमने उसके रहने की जगह के बारे में पूछा, तो उसने चंदोला झील के पास मिल्लतनगर में अपने रहने की जगह बताई। कड़ाई से पूछताछ में उसने उगला कि वो बांग्लादेशी है। जैसे ही हमें उसके विदेशी होने के बारे में पता चला, हमने उसे पुलिस को सौंप दिया।”

दलाल को पैसे देकर सुरंग के रास्ते भारत में घुसा

विशाल राजपूत ने बताया कि जिस बांग्लादेशी को उन्होंने पकड़ा है वह अपनी बीवी के साथ भारत में घुसा था। उसने एक दलाल के माध्यम से 3000 रुपए दिए थे। विशाल ने ऑपइंडिया को यह भी बताया कि बांग्लादेशियों द्वारा पूछताछ करने पर उसने उन्हें यह भी बताया था कि वह एक सुरंग/सुरंग के रास्ते भारत में दाखिल हुआ था। विशाल के मुताबिक, जब वे उसे पुलिस स्टेशन ले जा रहे थे तो एक स्थानीय मुस्लिम शख्स उसे छुड़ाने की कोशिश कर रहा था। वह दलील दे रहा था कि उनके पास सारे सबूत हैं। हालाँकि, विशाल ने ऑपइंडिया को जो वीडियो दिया है, उसमें शख्स खुद स्वीकार कर रहा है कि वह बांग्लादेशी है।

चंदोला झील और मिल्लत कस्बे में बांग्लादेशियों के रहने की कई शिकायतें

गौरतलब है कि अहमदाबाद के चंदोला झील, मिल्लत नगर और उसके आसपास के इलाकों में कई बांग्लादेशी घुसपैठिये अवैध रूप से रह रहे हैं। इस इलाके से बांग्लादेशियों के पकड़े जाने की घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं। सिर्फ अहमदाबाद ही नहीं, बल्कि सूरत समेत ज्यादातर शहरों में पुलिस द्वारा बांग्लादेशी मुस्लिमों के पकड़े जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं।

फिलहाल बजरंग दल कार्यकर्ताओं द्वारा पकड़े गए बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए को अहमदाबाद के नरोदा पुलिस स्टेशन को सौंप दिया गया है। फिलहाल पुलिस विशाल राजपूत और आतिश राजपूत की शिकायत पर मिंटू अलीबर मुल्ला से पूछताछ कर रही है।

यह खबर मूलरूप से गुजराती भाषा में प्रकाशित की गई है। मूल खबर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

माना आप सेलिब्रिटी हैं जया अमिताभ बच्चन, पर पैपराजी नहीं हैं सभापति… यूँ बार-बार बिदकना चलचित्र में भले अच्छे लगते हों पर संसद में सही नहीं

बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री रह चुकी जया बच्चन वर्तमान में समाजवादी पार्टी से सांसद हैं और इन दिनों अपने पूरे नाम के कारण काफी चर्चा में हैं। आज राज्यसभा सदन में सभापति जगदीप धनखड़ ने जब उन्हें एक मुद्दे पर बोलने के लिए उनका पूरा नाम लिया तो वह इसे सुन भड़क गईं और कहा कि वो कलाकार हैं। चेहरे के हाव-भाव समझती हैं। उन्हें सभापति की टोन पसंद नहीं आई। इस दौरान सभापति ने भी सख्ती से जया बच्चन को बैठने को कहा और समझाया- “आप सेलिब्रिटी होंगे लेकिन आपको सदन की गरिमा का ध्यान रखना होगा।”

मालूम हो कि जया बच्चन ने पहली बार राज्यसभा सदन में इस प्रकार ‘जया अमिताभ बच्चन’ कहे जाने पर नाराजगी नहीं जताई। कुछ दिन पहले उपसभापति ने हरिवंश नारायण सिंह ने उन्हें उनके पूरे नाम ‘जया अमिताभ बच्चन’ से संबोधित किया, तो इस पर वह नाराज हो गईं और इसे नारीवाद का मुद्दा बना दिया था।

उन्होंने भड़कते हुए कहा था, सिर्फ जया बच्चन बोलते तो काफी था। जब उन्हें बताया गया कि उनके डॉक्यूमेंट्स में उनका यही नाम लिखा है, तो उन्होंने कहा था, “ये जो है कुछ नया शुरू हुआ है कि महिलाएँ जो हैं वो अपने पति के नाम से जानी जाएँ। उनका कोई अस्तित्व ही नहीं हैं। उनकी कोई उपलब्धि नहीं है अपने में।”

इसके कुछ दिन बाद उपराष्ट्रपति व सदन के सभापति जगदीप धनखड़ ने उन्हें इस नाम से पुकारा तो उन्हें इससे भी आपत्ति हो गई। हालाँकि तब जगदीप धनखड़ ने उन्हें सलाह दी कि अगर उन्हें नाम नहीं पसंद तो वो नाम बदल लें, मगर तब जया बच्चन ने कहा कि उन्हें इस पर और अपने पति पर गर्व है और इस तरह उस दिन भी ये मामला हँसी में टल गया।

अब आज दोबारा यही हुआ। सदन में जब सभापति ने जया बच्चन को उनके पूरे नाम से बुलाया तो वह फिर भड़क गईं और खड़े होकर कहा, “मैं कलाकार हूँ। बॉडी लैंग्वेज समझती हूँ और चेहरे की अभिव्यक्ति समझती हूँ। सर! माफ कीजिएगा, आपका लहजा स्वीकार्य नहीं है। भले ही आप आसन पर बैठे हैं, लेकिन हम आपके साथी हैं।”  … यह सुन जगदीप धनखड़ ने उन्हें जमकर फटकारा।

जया बच्चन को सभापति ने सख्त लहजे में कहा, “‘जया जी, कृपया अपने स्थान पर बैठिए। आपने अपनी एक प्रतिष्ठा बनाई है। आप जानती हैं कि अभिनेता निर्देशक के अनुसार काम करता है। आपने वह चीजें नहीं देखी हैं, जो मैंने यहाँ इस आसन पर बैठकर देखा है। आप मेरे लहजे के बारे में बात कर रही हैं? बस बहुत हुआ। आप होंगे सेलिब्रिटी, लेकिन आपको यहाँ सदन की गरिमा का ध्यान रखना होगा।” सभापति से फटकार पाने के लिए जया बच्चन ने मीडिया से बात की और कहा कि उन्हें सभापति का तरीका पसंद नहीं आया, कोई उन्हें डांट नहीं सकता उन्हें संबंध में चाहिए कि उनसे माफी माँगी जाए।

मालूम हो कि राज्यसभा में दिखा जया बच्चन का गुस्सा होना या किसी बात पर नाराज होना कोई नया नहीं है। सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें कई बार उनके प्रशंसकों के बर्ताव से, पैपराजियों के बिन परमिशन फोटो खींचने लेने के अंदाज से, उनके फैमिली टाइम में दखल देने पर, उन्हें कई बार नाराज होते देखा जा चुका है। ज्यादा वक्त नहीं बीता जब साल 2021 में बंगाल चुनावों के वक्त वह रैली करने बंगाल पहुँची थीं और रोड शो के दौरान एक फैन जब उनके साथ सेल्फी लेने आया था तो उन्होंने उसे थप्पड़ मार दिया था।

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर ये सवाल खूब उठा था कि आखिर जया बच्चन को इतना गुस्सा क्यों आता है। लोग इस सवाल के जवाब में कई बार देश की बेहतरीन अदाकारा को गाली तक देने पर उतर आते थे। उन्हें असभ्य और गुस्सैल जैसे शब्द कहते थे। सोशल मीडिया पर लिखा जाता था कि पता नहीं अमिताभ बच्चन ने इन्हें कैसे झेला। आज सदन में घटित घटना के बाद दोबारा से वैसे कमेंट सोशल मीडिया पर दिखने शुरू हो गए हैं उन्हें जरा-जरा सी बात पर नाराज होने वाली महिला कहा जा रहा है। पूछा जा रहा है कि उन्हें उनके पति के नाम पर गर्व है तो इतना गुस्सा आखिर क्यों।

क्लॉस्टेरोफोबिया कारण है गुस्से का?

बता दें कि जया बच्चन के गुस्से के बारे में सिर्फ मीडिया में और सोशल मीडिया यूजर्स ही चर्चा नहीं करते। उनके बच्चे खुद भी इस बात को मानते हैं कि उनकी माँ गुस्सैल स्वभाव की हैं। एक बार कॉफी विथ करण में जया के दोनों बच्चों यानी श्वेता बच्चन और अभिषेक बच्चन ने बताया भी था कि उनकी माँ को क्लॉस्टेरोफोबिया नाम की बीमारी है। ये एक ऐसी मानसिक बीमारी है, जिसमें इंसान अचानक भीड़ को देखकर परेशान हो जाता है और गुस्सा करने लगता है।

अब जाहिर सी बात है कि बेटी श्वेता द्वारा करण के शो में जो बात कही गई वो वजह जया को गुस्सा आने का एक कारण हो सकती है… लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि वो इसके कारण अपनी उस छवि को नष्ट करें जो उन्होंने 70 के दशक में बतौर अभिनेत्री दर्शकों के दिलों में कायम की थी। लोग आज भी पुरानी फिल्में देखते हुए उनकी अदाकारी को सराहने में कोई कसर नहीं छोड़ते, उनकी राजनैतिक यात्रा के बारे में सुनते हैं तो उनकी तारीफ करते हैं… ये सब कुछ उन्हें उनकी पुरानी छवि के कारण ही मिला है। वह खुद कहती हैं कि अमिताभ बच्चन पर उन्हें गर्व है फिर आखिर क्यों उन्हें ये नहीं पसंद कि लोग उनके नाम के साथ उनके पति का नाम लें? इसमें महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई या अपमानित करने की बात तो कहीं नहीं आती… उलटा इससे तो ये पता चलता है कि अमिताभ बच्चन जहाँ एक्टिंग तक सीमित रह गए उनकी पत्नी जया बच्चन ने आगे बढ़कर पहचान बनाई।

फिल्मी दुनिया में किसी मुद्दे का बवाल बनाना, नाराज होना क्रांतिकारी समझा जाता हो, मगर वो पर्दे की दुनिया है। आम जिंदगी में भी जरा-जरा सी बात बात पर गुस्सा करने वाले व्यक्ति को व्यवहार सुधारने की सलाह दी जाती है। उसे बोलते समय और प्रतिक्रिया देते समय नियंत्रित रहने को कहा जाता है, फिर जया बच्चन तो सम्मानित अभिनेत्री और वर्तमान सांसद दोनों है। सार्वजनिक जीवन में रहते हुए गुस्से को हावी होने देना या पैपराजी से लेकर सभापति को एक बराबर तोलना कहाँ तक उचित है ये जया बच्चन को खुद सोचना चाहिए। साथ ही ये सोचना चाहिए कि क्या इतना सबकुछ हासिल करने के बाद अगर कोई दूसरा व्यक्ति उन्हें उनके पूरे नाम से बुला दे तो क्या इससे उनकी उपलब्धि सच में खत्म हो जाएगी?

हिंदुओं की हत्या, महिलाओं से रेप, लूटी जा रही संपत्ति… लेकिन हम बांग्लादेश हिंसा पर बात भी नहीं कर सकते क्योंकि अल जजीरा के लिए यह है ‘मुस्लिम घृणा’

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर पर्दा डालने के लिए इस्लामी कट्टरपंथ के समर्थक लगतार जुटे हुए हैं। इस कोशिश में अब इस्लामी देश क़तर का सरकारी मीडिया अल जजीरा भी शामिल हो गया है। उसे हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को दिखाना ‘इस्लामोफोबिक’ नजर आ रहा है। अल जजीरा का कहना है कि भारतीय मीडिया बांग्लादेश में हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचार को दिखा रही है, इसलिए वह इस्लामोफोबिक है।

अल जजीरा ने शुक्रवार (9 अगस्त, 2024) को शीर्षक, ‘इस्लामोफोबिक, अलार्मिस्ट: हाउ सम इंडिया आउटलेट्स कवर्ड बांग्लादेश क्राइसिस’ से एक लेख प्रकाशित किया। इसे फैसल महमूद और सकीब सरकार ने लिखा है। इसमें भारतीय मीडिया के हिन्दुओं पर अत्याचार करने की रिपोर्टिंग करने को अल जजीरा ‘इस्लामोफोबिक’ बता रहा है।

अल जजीरा

इस लेख में दावा किया गया है कि टाइम्स ग्रुप के मिरर नाउ ने एक भ्रामक खबर चलाई कि 24 लोगों को बांग्लादेश में भीड़ ने जिंदा जला दिया और ‘हमलों के केंद्र में अल्पसंख्यक थे’ ताकि यह संकेत दिया जा सके कि हिंदुओं को जिंदा जलाया गया है। हालाँकि, यह दावा फर्जी है क्योंकि मिरर नाउ ने ना ही यह कहा कि मरने वाले सारे हिन्दू थे और ना ही यह कहा कि पूरे बांग्लादेश में मात्र हिन्दुओं पर हमला हो रहा है। अल जजीरा ने हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों को कम करने के दिखाने की कोशिश भी की है।

अल जजीरा ने इस लेख में दावा किया कि जबसे हिंसा चालू हुई है, तब से मात्र दो हिन्दुओं की हत्या हुई है। हालाँकि, यह बात सर्वथा गलत है क्योंकि कई जगह हिन्दुओं को निशाना बनाया गया है और बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गए हैं। यहाँ तक कि हिन्दुओं के पूरे-पूरे गाँव जलाए गए हैं। अल जजीरा यहीं नहीं रुकता है। अल जजीरा भारतीय मीडिया के इस बात को भी गलत बताता है कि BNP ने भी शेख हसीना सरकार को गिराया। अल जजीरा का दावा है कि यह सब कुछ छात्र प्रदर्शन के कारण हुआ।

जहाँ यह बात ठीक है कि यह आन्दोलन छात्रों के प्रदर्शन से प्रारम्भ हुआ था लेकिन कुछ ही दिनों के बाद इसमें BNP और जमात-ए-इस्लामी शामिल हो गए और हसीना सरकार के खिलाफ हिंसा की। हसीना सरकार के जवाब देने पर प्रदर्शन और भड़का और सरकार गिर गई। अल जजीरा बांग्लादेश में हिन्दू पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों को बचाने के लिए और आगे निकल गया। अल जजीरा ने यह भी दावा किया कि हिन्दुओं पर बांग्लादेश में हो रहे हमले धार्मिक कारणों से नहीं हो रहे।

अल जजीरा का दावा है कि यह हमले इसलिए हो रहे हैं क्योकि हिन्दू सत्ता से बाहर हो चुकी आवामी लीग के समर्थक के तौर पर देखे जाते थे। अल जजीरा ने यह भी कहानी गढ़ दी कि मुस्लिम बहुत बांग्लादेश में हिन्दू शेख हसीना की सत्ता के दौरान बाकियों को चिढ़ाते थे, इसलिए उनके साथ अत्याचार हो रहा है। अल जजीरा यहाँ भी नहीं रुका। उसने यह भी दावा कर दिया कि मुस्लिम बांग्लादेश में हिन्दू मंदिरों को बचा रहे हैं। हालाँकि, अल जजीरा यह नहीं बता पाया कि मुस्लिम मंदिरों को बचा किनसे रहे हैं।

अल जजीरा ने हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की तुलना भारत में मुस्लिमों के खिलाफ होने वाली इक्का-दुक्का वारदातों से भी कर दी। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत में जो हमले मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा के तौर पर पेश किए जाते हैं, उनमें से कई झूठे निकलते हैं या फिर उनकी सच्चाई कुछ अलग होती है। लेकिन बांग्लादेश के मामले में ऐसा नहीं है, बांग्लादेश में हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा इसलिए हो रही है क्योंकि वह हिन्दू और इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें काफिर समझते हैं।

हालाँकि, यह कोई नई बात नहीं है कि विदेशी और भारतीय वामपंथी मीडिया हिन्दुओं के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों के अत्याचारों पर पर्दा डाल रहा हो। इससे पहले बांग्लादेश मामले में ही न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी यही सिद्ध करने का प्रयास किया था कि हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा राजनीतिक है। भारतीय वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल स्क्रॉल ने सिरे से हिंसा को नकारने की बात की थी। यहाँ तक कि स्क्रॉल ने इस हिंसा को जायज तक ठहराया था।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखा है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

‘यह धार्मिक नहीं, राजनीतिक’: मजहबी आक्रामकता की बात करने पर इस्लामी-वामपंथी करते हैं बेतुका दावा, जानिए इस नैरेटिव के पीछे का मूल मकसद

जब भी कोई इस्लामी चरमपंथी या भीड़ उत्पात मचाती है तो विश्व भर के वामपंथियों की तुरंत प्रतिक्रिया होती है। पिछले कुछ दशकों से इस्लामवादियों के सबसे वफादार सेवक के रूप में सामने आए ये वामपंथी इस्लामी चरमपंथियों की करतूतों को नकारने की कोशिश करते हैं। यदि उनकी करतूतों को स्पष्ट रूप से नकारना संभव ना हो तो उसे कमजोर करने के लिए अपनी जी-जान लगा देते हैं।

बांग्लादेश में अराजकता के एक और दौर के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपने पद से इस्तीफ़ा देकर देश से भागने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद से इस्लामी भीड़ द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। हालाँकि, वामपंथी इस पर पर्दा डालने में लगे हैं। यह सब सोमवार को हुआ था और आज शुक्रवार है। जुमे की नमाज के लिए भीड़ के इकट्ठा होने के बाद वहाँ हालात और भी बदतर हो सकते हैं।

वामपंथी प्रोपेगेंडा के टूल्स

इस्लामवादियों के अपराधों को छिपाने के लिए वामपंथियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले प्रोपेगेंडा में कई तकनीकें और टूल्स शामिल हैं। पहला है इनकार। इसमें किसी भी जानकारी को दबाना और सेंसर करना शामिल है, जो उनके सुनियोजित कथानक के खिलाफ है, जैसे पीड़ित मुस्लिम होने चाहिए आदि। हालाँकि, जब से इंटरनेट खासकर सोशल मीडिया आया है, तब से यह तकनीक काम नहीं कर रहा है। तथ्य सामने आने लगे हैं।

चूँकि इनकार करना अब कठिन हो गया है, इसलिए उसे कमजोर करने के औजार महत्वपूर्ण हो गए हैं। इन औजारों में सबसे महत्वपूर्ण है ‘फैक्ट चेक’ का औजार। अब फैक्ट सामने आने लगे, इसलिए ‘फैक्ट चेकर’ बनाए गए। इसके लिए प्रोपेगेंडा फैलाने वालों को कुछ जानकारियों के दावे खोजने पड़ते हैं या फिर उन्हें षडयंत्र के रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है, जिन्हें फर्जी या झूठा घोषित किया जा सके। इससे लोगों के मन में संदेह के बीज पड़ते हैं और इस तरह पूरा मामला ही फर्जी माना जा सकता है। यही बात एक खास तरह के ‘फैक्ट चेकर’ को प्रेरित करती है।

हालाँकि, यह तरकीब नई नहीं है। कई वकील बलात्कार पीड़ितों को बदनाम करने के लिए इसी तरह की तरकीबें अपनाते रहे हैं। उदाहरण के लिए, वकील पूछेंगे, “आपने उस सुबह लाल ड्रेस पहनी थी या हरा गाउन?”। एक पीड़ित व्यक्ति धुंधली याददाश्त के कारण गलत जवाब दे सकती है। इस तरह वकील कहेगा, “महामहिम, सीसीटीवी फुटेज में वह नीले रंग की ड्रेस में दिख रही है। वह साफ झूठ बोल रही है और कोई बलात्कार नहीं हुआ!”

अब लोग धीरे-धीरे ‘फैक्ट चेकर’ की इस प्रकृति को समझने लगे हैं। इस प्रकार, तथ्यों को कमजोर करने के अन्य उपकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। यहीं पर वे नैरेटिव बनाने के आजमाए एवं परखे हुए टूल्स की ओर लौट रहे हैं। जैसे कि पक्षपातपूर्ण मीडिया रिपोर्ट प्रकाशित की जाएँगी, ‘प्रतिष्ठित नागरिकों’ के तथ्य-खोजी मिशन गठित किए जाएँगे, वकीलों की दलीलों या चालों को चुनिंदा रूप से तथ्य के रूप में पेश किया जाएगा (यदि मामला अदालत में हो तो)।

इतना नहीं, उसे प्रोपेगेंडा आर्ट बनाया जाएगा, इन्हें मशहूर हस्तियों एवं प्रभावशाली लोगों द्वारा आगे बढ़ाया जाएगा। यदि जरूरी हुआ तो पोर्नस्टार की भी मदद ली जाएगी। इसके अलावा, ‘विद्वानों’ द्वारा शोध पत्र प्रकाशित किए जाएँगे। क्या आप विश्वास करेंगे कि वास्तव में ऐसी भी कोई व्यक्ति है जिसने ऑपइंडिया पर एक ‘शोध पत्र’ लिखा है, ताकि इसका हवाला देकर ऑपइंडिया के विकिपीडिया पेज को खराब किया जा सके? लेकिन, यह सच है। ऐसा किया गया है।

इन सभी के खिलाफ एक साथ लड़ना भारी पड़ जाता है, क्योंकि वे मौजूदा पुराने नैरेटिव (सचमुच एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी) पर आधारित हैं। इन नैरेटिव को अभी भी ध्वस्त किया जाना बाकी है। इसी नैरेटिव का हिस्सा है कि आज भी ‘धर्म एक निजी मामला है’ या ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ जैसी बेतुकी बातें लगभग सभी सार्वजनिक वक्ताओं द्वारा बार-बार दोहराई जाती हैं।

राजनीति बनाम धर्म का तर्क

बांग्लादेश में हिंदुओं के जारी नरसंहार के मामले में ‘यह धार्मिक नहीं, राजनीतिक है’ के पुराने नैरेटिव को ही अपनाया जा रहा है, क्योंकि ‘फैक्ट चेक’ और ‘मानव श्रृंखला’ के माध्यम से अत्याचारों को नकारने का प्रयास भी काम नहीं कर रहा है।वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट स्क्रॉल ने सबसे पहले इस सिद्धांत को आगे बढ़ाया और कहा कि हिंदुओं पर हमले धार्मिक कारणों से नहीं, राजनीतिक कारणों से हो रहे हैें।

स्क्रॉल का मत है कि वहाँ के हिंदू पारंपरिक रूप से शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को वोट देते हैं, इसलिए वे निशाने पर हैं। इसे नैरेटिव को कतर की मीडिया संस्थान अल जज़ीरा ने तुरंत दोहराया। अल जजीरा वर्तमान में खुद को इस्लामवादियों का सबसे अच्छा सहयोगी साबित किया है। दरअसल, अल जजीरा का एक ‘पत्रकार’ पार्टटाइम आतंकी के रूप में काम करते हुए यहूदियों को बंधक बना रहा था।

अब मैं सिर्फ़ इसे प्रकाशित करने वाले प्लेटफ़ॉर्म को बदनाम करके ‘यह राजनीतिक था, धार्मिक नहीं’ कथन को बदनाम नहीं करना चाहता, भले ही वे अवमानना ​​के अलावा किसी और चीज़ के लायक न हों। यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह तर्क क्यों दोषपूर्ण और भयावह है, क्योंकि इसका इस्तेमाल अक्सर इस्लामी आक्रामकता (जिसमें कट्टरता, अन्याय, अत्याचार और आतंकवाद भी शामिल है) को छिपाने के लिए किया जाता है।

इस तर्क का इस्तेमाल मुगल तानाशाह औरंगजेब को एक न्यायप्रिय शासक के रूप में पेश करने के लिए किया गया है। वहीं, ऑड्रे ट्रुश्के जैसे ‘विद्वानों’ ने यह दिखाने के लिए शोध प्रबंध लिखा है कि औरंगजेब की सेना द्वारा मंदिरों को नष्ट करना वास्तव में धार्मिक कट्टरता के नग्न प्रदर्शन के बजाय एक राजनीतिक कदम था।

कश्मीर में भी इसी तर्क का इस्तेमाल इस्लामी आतंकियों की करतूतों पर पर्दा डालने के लिए किया जाता है और ये बताने की कोशिश की जाती है कि कश्मीर में ‘संघर्ष’ राजनीतिक है, ना कि धार्मिक। वहीं, ये आतंकी खुद गाय के मूत्र पीने वालों और मूर्तिपूजकों जैसे धार्मिक अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं।

कर्नाटक में प्रशांत पुजारी की हत्या या उत्तर प्रदेश में चंदन गुप्ता की हत्या में भी यही तर्क दिया जाता है कि उन्हें धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से मारा गया। इसने इस्लामी आतंकवादियों को एक बहुत ही चतुर बहाना दे दिया है, जहाँ उन्हें हिंदुओं के प्रति अपने सभी हिंसक विचारों को व्यक्त के लिए बस ‘संघी’ शब्द का उपयोग करना होता है। वहीं, उनकी धार्मिक कट्टरता को धार्मिक नहीं बल्कि “राजनीतिक” बयान की ढाल मिल जाती है।

यह तर्क खूब चलता है। कई हिंदू इसे मान भी लेते हैं, क्योंकि वे वास्तव में मानते हैं कि राजनीति और धर्म अलग-अलग क्षेत्र हैं। हालाँकि, मुस्लिम समाज में ऐसा नहीं होता। इस तरह राजनीतिक रूप से गलत यह बयान दिया जाना चाहिए, अन्यथा अधिक से अधिक हिंदुओं की हत्या की जाएगी और इस अपराध को ‘राजनीतिक हिंसा’ के रूप में छिपाया जाएगा, जबकि यह वास्तव में एक जातीय नरसंहार है।

राजनीति सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं है

यह बिंदु इसलिए आया है, क्योंकि इस्लाम अपनी स्थापना के समय की स्थिति के सबसे करीब है। इसमें उस प्रकृति की रक्षा करने के तरीके हैं। इस्लाम को ‘सुधारने’ की कोशिश करने वाले किसी भी व्यक्ति को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया जाता है। इस्लामी समाज में अंबेडकर जैसा कोई व्यक्ति दूसरे दिन ही मार दिया जाता या किसी दूर देश में भगोड़ा बन जाता है, जहाँ दशकों बाद भी वह अपनी आँख खो देता।

इस्लाम के विभिन्न प्रचारकों ने इस तथ्य पर गर्व किया है कि यह एक ‘पूर्ण धर्म’ है। यह ठीक वैसे ही है, जैसा मार्क्सवादी अपनी विचारधारा के बारे में मानते हैं, जिसका उनके जीवन के हर पहलू पर प्रभाव पड़ता है। ‘हलाल अर्थव्यवस्था’ का कारण भी ठीक यही है। हालाँकि, अभी भी लाखों हिंदू ऐसे हैं, जो सोचते हैं कि हलाल खाना पकाने या वध करने का तरीका है, न कि एक समानांतर आर्थिक प्रणाली।

यही कारण है कि जो सवाल हिंदुओं को सामान्य लगते हैं, वे विभिन्न फतवों का विषय बन जाते हैं। बांग्लादेश को भूल जाइए, बस अपने देश में देवबंद की वेबसाइट देखिए। क्या इस्लाम में मोबाइल फोन पर गेम खेलना जायज़ है? क्या मुझे उस लड़की से डेट करना चाहिए, जो जींस पहनती है? क्या मेरी बहन को एयर होस्टेस की नौकरी करनी चाहिए? और भी बहुत कुछ है। एक हिंदू को ऐसी बातें मज़ेदार लग सकती हैं, लेकिन ये आपकी सोच से ज़्यादा करीब हैं।

सिर्फ़ इस्लामी उपदेशक ही नहीं, बल्कि एक औसत मुसलमान भी इस्लाम को एक संपूर्ण और आदर्श धर्म मानता है और उस पर गर्व करता है। दूसरी ओर, हिंदू इस बात पर गर्व करते हैं कि हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जहाँ कुछ भी अनिवार्य नहीं है, यह एक जीवन जीने का तरीका है, जहाँ आप अपनी सुविधा के अनुसार चुनाव कर सकते हैं। इन दावों को इस्लामी नज़रिए से घृणा और उपहास दोनों के साथ देखा जाता है।

संक्षेप में, राजनीति या राजनीति या लोगों को अपने मामलों को सामूहिक रूप से कैसे प्रबंधित करना है, इस बारे में विचारधारा और आस्था इस्लाम का एक अभिन्न अंग है। अन्यथा, आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि जैसे ही किसी क्षेत्र में मुसलमान बहुसंख्यक हो जाते हैं, वहाँ की भूमि का हर टुकड़ा इस्लामी राष्ट्र बन जाता है। यानी संविधान और कानून वहाँ कुरान और हदीस से प्रेरित हो जाते हैं।

भारत में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जहाँ पर्याप्त मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र में शुक्रवार को छुट्टी घोषित की गई (वैसे यह एक ‘राजनीतिक’ निर्णय है, जिस पर स्थानीय प्रशासन निर्णय लेता है)। ये सब इसलिए होता है, क्योंकि इस्लाम में राजनीति और धर्म अलग-अलग चीजें नहीं हैं। राजनीति को आस्था के अधीन माना जाता है। यह कोई दोष नहीं है, बल्कि इस्लाम की विशेषता है। यह आलोचना नहीं है, बल्कि वास्तव में इस्लाम की प्रशंसा है (इस्लामी दृष्टिकोण से ही)।

इस प्रकार, जब इस्लाम की बात आती है तो यह पूरा तर्क कि ‘यह धर्म से नहीं बल्कि राजनीति से प्रेरित था’ बेकार हो जाता है, खासकर तब जब आप गैर-मुसलमानों से निपट रहे हों। आप यह तर्क तभी दे सकते हैं, जब आप मामले के तथ्यों को छिपाना चाहते हों। आप ऐसा तभी कर सकते हैं, जब आप बेईमान या पापी हों, या फिर दोनों हों। इसलिए कोई भी रिपोर्ट, ऐतिहासिक विवरण या लेख, जो इसे केंद्रीय तर्क बनाता है – चाहे वह औरंगजेब, कश्मीर, बांग्लादेश या कहीं भी हो – उसे हमेशा के लिए कूड़ेदान में डाल दिया जाना चाहिए।

(इस लेख को राहुल रौशन ने मूलत: अंग्रेजी में लिखा है। इसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद के सर्वे पर लगी रोक सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाई, श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस में अब 21 अक्टूबर से होगी सुनवाई: मुस्लिम पक्ष की दलील खारिज

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि- शाही ईदगाह मस्जिद विवाद मामले में एडवोकेट कमिश्नर के सर्वे पर रोक जारी रहेगी। कोर्ट ने इस रोक को हटाने से इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि हमें इस मामले पर विचार करने के लिए समय चाहिए। इस मामले में लंबी सुनवाई की जरूरत है। ऐसे में इस मामले की सुनवाई 21 अक्टूबर से शुरू होने वाले हफ्ते में सुनवाई होगी। ⁠तब तक सर्वे पर लगी रोक जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि कृष्ण जन्मभूमि मंदिर और उससे सटी मस्जिद के विवाद से संबंधित हिंदू वादियों की ओर से दायर किए गए मुकदमे पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम का उल्लंघन करते हैं और इसलिए वे सुनवाई योग्य नहीं हैं। हिंदू पक्ष की ओर से दायर किए गए मामलों में औरंगजेब के समय की मस्जिद को हटाने की माँग की गई है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मस्जिद यहाँ मौजूद मंदिर को ध्वस्त करके बनाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने सभी मुकदमों को सुनवाई योग्य ठहराया है। उस आदेश का अध्ययन करने के बाद ही आगे सुनवाई की जा सकती है। मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुननी होंगी। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस केस में समय लगेगा। इसमें लंबी सुनवाई की जरूरत है। 21 अक्टूबर के बाद ही अब इसमें सुनवाई की जाएगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से निचली अदालत में लंबित कुल 18 मुकदमों को सुनवाई के लिए अपने पास ट्रांसफर किए जाने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था।

हिंदू पक्ष की तरफ से दायर याचिकाओं में शाही ईदगाह मस्जिद की जमीन को हिंदुओं का बताकर यहाँ पर पूजा का अधिकार देने की माँग की गई है। हिंदू पक्ष की तरफ से ये मुकदमे शाही ईदगाह मस्जिद का ढाँचा हटाकर जमीन का कब्जा देने और मंदिर का पुनर्निर्माण कराने की माँग को लेकर दायर किए गए हैं। यह विवाद मुगल बादशाह औरंगजेब के समय की शाही ईदगाह मस्जिद से जुड़ा है, माना जाता है कि जिसका निर्माण भगवान कृष्ण की जन्मस्थली पर बने मंदिर को ध्वस्त करने के बाद किया गया।

वहीं, मुस्लिम पक्ष ने इसे खारिज किए जाने को लेकर दलील पेश की थी। मुस्लिम पक्ष ने इसके लिए प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, लिमिटेशन एक्ट. वक्फ एक्ट, स्पेसिफिक पजेशन एक्ट का हवाला दिया था। इस मामले पर 6 जून को सुनवाई हुई थी, जिस पर हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

हिंदू पक्ष की ओर से कैविएट दायर

हिंदू पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर कर अनुरोध किया है कि यदि मुस्लिम पक्ष इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया आदेश को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाता है तो उनका भी पक्ष सुना जाए। हाई कोर्ट ने मथुरा में मंदिर-मस्जिद विवाद से संबंधित 18 मामलों की पोषणीयता के खिलाफ याचिका खारिज कर दी थी। यह कैविएट वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से दायर की गई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यदि दूसरा समूह शीर्ष अदालत में जाता है तो हिंदू पक्षकारों के खिलाफ कोई एकपक्षीय आदेश नहीं दिया जाए। बता दें कि कैविएट आवेदन किसी वादी की ओर से यह सुनिश्चित करने के लिए दायर किया जाता है कि उसका पक्ष सुने बिना उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल आदेश पारित न किया जाए।

चीन में लाश चुराने वाले गैंग का भंडाफोड़, श्मशान से लेकर मेडिकल लैब तक में थी सेटिंग: 4000+ शव के साथ अमानवीयता

चीन में एक ऐसे गैंग का भंडाफोड़ हुआ है जो श्मशान से लाश चुरा कर बेचता था। इस गैंग ने 4000 से अधिक लाशों की तस्करी कर ली थी। इन लाशों की तस्करी अंगों के लिए होती थी। मामले में चीन की एजेंसियों ने 75 लोगों को आरोपित बनाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन के शांक्सी प्रांत की पुलिस वर्तमान में ऐसे मामले की जाँच कर रही है। पुलिस को ऐसे गैंग के बारे में पता चला है जो मृत लोगों के शरीर को श्मशान और मेडिकल लैब से चुरा कर बेच देता था। यह लाशें शांक्सी ओस्टेराइड बायोमेडिकल और हेन्गपू टेक्नोलॉजी नाम की कम्पनियों को बेचीं गई।

लाशें बेचने का यह सिलसिला 2015-23 के बीच चला और इससे लाशें बेचने वाले गैंग ने कम से कम ₹75 करोड़ बनाए। यह धंधा चीन के सात राज्यों में चल रहा था और यहाँ से लाशों की तस्करी हो रही थी। जिन लाशों की तस्करी हुई, उनमें से हड्डियाँ निकाली गईं, उनको क्षत विक्षत किया गया। कई लाशें बचा कर रख ली गईं थी।

इस मामले में जिन 75 लोगों को आरोपित बनाया गया है, उनमें श्मशान का प्रबन्धन करने वाले अधिकारी, डॉक्टर और कम्पनी के अधिकारी शमिल हैं। इस रिपोर्ट के बाद चीन के लोगों में काफी गुस्सा है। टीवी पर कुछ देर यह रिपोर्ट दिखाए जाने के बाद हटा ली गई।

बताया गया है कि इन लाशों की हड्डियों ने उन लोगों को इलाज होता था जिनको गंभीर चोट आई हों और जिनकी हड्डियों में गहरी चोट हो। इसके लिए दूसरे व्यक्ति की हड्डी से ऊतक लिए जाते हैं और उससे इलाज होता है। सामान्यतः अंगदान करने वाले की अनुमति ली जाती है।

लेकिन इस मामले में लाशों की हड्डियों के साथ खिलवाड़ हुआ। बताया गया है कि इन लाशों को दफनाने के लिए श्मशान वालों ने शुल्क भी वसूला था लेकिन उसके बाद भी यह बदसलूकी हुई। कई मामलों उन लाशों के साथ ऐसा हुआ, जिनकी अस्थियाँ घर वाले अपने साथ नहीं ले जाना चाहते थे। लावारिस लाशों को भी बेचा गया।

चीन की एक मेडिकल यूनिवर्सिटी के कर्मचारी ने 400 से अधिक लाशें तीन श्मशान से खरीदीं। उसने यह लाशें लगभग ₹11,000 में खरीदीं और दस गुने दामों पर अस्पतालों को बेच दी। एक डॉक्टर ने एक लाश के लिए ₹2.5 लाख तक लिए। पूरे मामले का खुलासा होने के बाद चीन की एजेंसियाँ अब जाँच और कार्रवाई में जुटी हैं।

लोकसभा में कॉन्ग्रेस सांसदों की संख्या हो सकती है 0, उसी हाई कोर्ट में जनहित याचिका जिसने PM इंदिरा गाँधी के चुनाव को किया था रद्द: जानिए क्या है मामला

साल 1975 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के चुनावी अभियान में गड़बड़ी के चलते उन्हें संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहरा दिया था, और बदले में इंदिरा गाँधी ने देश पर इमरजेंसी थोप दी थी। अब इतने दशकों बाद उसी इलाहाबाद हाई कोर्ट में कॉन्ग्रेस पार्टी के साल 2024 के लोकसभा चुनाव में जनता से झूठे वादों और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 121(1)(ए) के उल्लंघन को लेकर याचिका दाखिल की गई है, जिसमें इस चुनाव में जीते कॉन्ग्रेस के सभी 99 सांसदों की संसद सदस्यता को रद्द करने की माँग की गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉन्ग्रेस पार्टी के 99 सांसदों को अयोग्य घोषित करने, पार्टी का चुनाव चिन्ह जब्त करने व पार्टी का पंजीकरण निलम्बित करने की माँग में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। सामाजिक कार्यकर्ता भारती सिंह ने अधिवक्ता ओ पी सिंह व शाश्वत आनंद के मार्फत यह जनहित याचिका दाखिल की है, जिसकी अगले हफ्ते सुनवाई की सम्भावना है। इस मामले में अगर कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को माना और उस हिसाब से फैसला दिया, तो कॉन्ग्रेस पार्टी पूरी तरह से खत्म हो सकती है, क्योंकि कॉन्ग्रेस पार्टी पर भी बैन लग सकता है।

याचिका में कहा गया है कि लोकसभा चुनाव 2024 में कॉन्ग्रेस पार्टी ने ‘घर घर गारंटी’ कार्ड योजना के तहत गरीब, पिछड़े, दलित व अल्पसंख्यकों को चुनाव बाद जुलाई माह से प्रतिमाह 8500 रुपए उनके बैंक खाते में जमा करने का वायदा किया था, जो वादा झूठा निकला। इस वादे से कॉन्ग्रेस सहित सहयोगी दलों के पक्ष में वोट देने वाले को प्रतिमाह रुपये दिए जाने की गारंटी दी गई थी। इस वायदा पत्र में वोट के बदले रुपए देने का लालच दिया गया था। कॉन्ग्रेस पार्टी के इस वायदा पत्र पर अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे व राहुल गाँधी के हस्ताक्षर हैं। साथ ही पावती रसीद भी है, जिससे लोगों को विश्वास हो गया कि वोट देने पर रुपए मिलेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

याचिकाकर्ता ने कहा कि इस मामले में चुनाव आयोग ने 2 मई 24 को एडवाइजरी भी जारी की थी, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी ने उस पर अमल नहीं किया। याची का कहना है कि कॉन्ग्रेस पार्टी का यह कृत्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 121(1)(ए) का खुला उल्लंघन है। साथ ही भारतीय न्याय संहिता व भारतीय दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध है।

इस मामले में याची ने कार्रवाई करने के लिए चुनाव आयोग को प्रत्यावेदन दिया है, किन्तु आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद जनहित याचिका के जरिए अदालत से इस मामले में दखल दिए जाने की गुहार लगाई गई है। इसके साथ ही कॉन्ग्रेस पार्टी के सभी 99 सांसदों को अयोग्य घोषित करने, पार्टी का चुनाव चिन्ह जब्त करने और रजिस्ट्रेशन रद्द करने की माँग की गई है।