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बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्या, मंदिर जला रहे इस्लामी, जान बचा भाग रहीं औरतें-बच्चियाँ: बांग्लादेशी अखबार में खबर, कट्टरपंथियों को बचाने मोहम्मद जुबैर बता रहा झूठ

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे और देश छोड़ने के बीच इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा जारी है। पूरे बांग्लादेश में अलग-अलग शहरों में हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है। इस्लामी कट्टरपंथी हिन्दुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों को नष्ट कर रहे हैं। कई जगह से हिन्दू घरों में लूटपाट और हिंसा की खबरें हैं। इस बीच भारत में बैठा इस्लामी गैंग मुस्लिम कट्टरपंथियों के इन कारनामों को मिटाने में जुट गया है।

जहाँ बांग्लादेश से लगातार हिन्दुओं पर हमले की खबरें आईं है वहीं मोहम्मद जुबैर इस्लामी कट्टरपन्थियों की हिंसा को झुठलाने में जुट गया है। जुबैर ट्विटर पर फोटो डाल कर बता रहा है कि बांग्लादेश में मुस्लिम हिन्दू मंदिरों को बचाने में लगे हैं। उसका दावा है कि यह सब बाहर बैठ कर मंदिरों पर होने वाले हमलों को रोक रहे हैं।

जुबैर के इन दावों की हवा बांग्लादेशी मीडिया ने ही निकाल दी है। जुबैर से पूछा जा रहा है कि मुस्लिम आखिर किनसे इन हिन्दू मंदिरों को बचा रहे हैं और हमला करने वाले कौन हैं। लोगों ने प्रश्न उठाए कि यदि इस्लामी कट्टरपंथी ही हमला कर रहे हैं तो उन्हें मुस्लिम कैसे बचा रहे हैं।

बांग्लादेशी मीडिया हिन्दुओं पर हमले की खबरें बता रहा है। बांग्लादेश की प्रमुख समाचार वेबसाइट द डेली स्टार के अनुसार, देश में 5 अगस्त, 2024 को कम से कम 27 जगहों पर हिन्दुओं को निशाना बनाया गया। उनके दुकान, मंदिर और घर तोड़े गए। एक हिन्दू पार्षद की हत्या कर दी गई। एक हिन्दू पत्रकार भी मार दिया गया।

बांग्लादेश के कालीगंज में 4 हिन्दुओं के घर लूटे गए। उनके घर में तोड़फोड़ हुई। लालमोनिरहाट में भी कई हिन्दुओं की दुकानों और मकानों पर हमला हुआ। हतिबंधा में हिन्दुओं के 12 घरों को आग के हवाले कर दिया गया। दिनाजपुर में भी हिन्दुओं के कई मकान तोड़े गए हैं। कई मंदिरों पर ही हमला हुआ और इनमें मूर्तियाँ तोड़ी गईं। बांग्लादेश के बड़े तटीय शहर खुलना में भी हिन्दुओं के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ हुई।

बांग्लादेश के खुलना में भी इस्कॉन मंदिर को भी जला दिया गया, यहाँ रखी मूर्तियाँ भी तोड़ दी गईं। इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस मंदिर में हिन्दू समुदाय के छुपने के बाद हमला किया। शरण लेने वाले यहाँ से भाग गए लेकिन मूर्तियों को काफी नुकसान पहुँचाया गया। इसके अलावा मौलवी बाजार में भी काली मंदिर पर हमला किया गया। इस मंदिर को आग लगा दी गई है। ट्विटर पर डाली गई एक वीडियो में दावा किया गया कि एक हिन्दू व्यक्ति को इस्लामी कट्टरपंथियों ने जीवित जला दिया। ठाकुरगांव में भी हिन्दू महिलाओं को निशाना बनाया और मंदिर तोड़े गए।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में जुलाई महीने से ही आरक्षण खत्म करने की माँग को लेकर प्रदर्शन चल रहे थे। इस प्रदर्शन को इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाइजैक कर लिया और इसके बाद भारी हिंसा हुई। यह हिंसा अगस्त में और बढ़ गई और प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। शेख हसीना सोमवार (5 अगस्त, 2024) को ढाका छोड़ कर भारत आ गईं। वर्तमान में वह भारत में हैं। उनके कुछ दिन भारत में रह कर आगे ब्रिटेन जाएँगी।

मंदिर की जमीन पर अतिक्रमणकारियों को बनाओ किराएदार: मद्रास हाई कोर्ट का निर्देश, सुनामी के बाद विस्थापित लोगों ने किया था कब्जा

मद्रास हाईकोर्ट की प्रथम पीठ ने सोमवार को (5 अगस्त 2024 ) हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग को निर्देश देते हुए कहा कि मंदिर की जमीन पर कब्जा करके बैठे अतिक्रमणकारियों को मंदिर की जमीन लीज पर देने के लिए सोचा जा सकता है।

हाई कोर्ट ने कहा कि साल 2004 में आई सुनामी के कारण जो लोग विस्थापित होने के बाद ईस्ट कोड रोड पर स्थित मंदिर की भूमि पर कब्जा करके रहने लगे थे उन्हें अब किराएदार बनाने पर विचार किया जाए।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश डी कृष्णकुमार और न्यायमूर्ति पीबी बालाजी की पहली पीठ ने कहा, “या तो निवासियों को स्थानांतरित करने के लिए पास के इलाके में एक भूमि की पहचान करें या मंदिर की जमीन को अतिक्रमणकारियों को पट्टे पर देने पर विचार करें।”

बता दें कि साल 2004 में जब सुनामी आई थी तब लोगों ने अलवंतर ट्रस्ट की भूमि (ये ट्रस्ट तीन गाँव में फैले एक मंदिर को दी गई भूमि का प्रबंधन करता है) पर अतिक्रमण कर लिया था। वह वहाँ से विस्थापित होकर ईस्ट कोड रोड पर स्थित मंदिर की भूमि पर रहने लगे थे।

साल 2022 में हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग ने इस जमीन को खाली कराने के लिए निर्देश जारी किए। हालाँकि जमीन पर कब्जा करके रह रहे लोगों ने जगह से न हटने के लिए एचआर एंड सीई आयुक्त से गुहार लगाई। जब उन्होंने इस पर सुनवाई नहीं की तो याचिका मद्रास हाईकोर्ट पहुँची।

कोर्ट ने संदीरन और 36 अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुएकहा कि अगर याचिकाकर्ता मंदिर की जमीन खाली करने के लिए तैयार हैं तो वह समय दे देगी या फिर एचआर एंड सीई इस पर विचार कर सकती है कि क्या वे उन्हें किरायेदार के रूप में परिवर्तित करने के लिए आवेदन जमा करा लें, बशर्ते वे जमीन पर रहने के लिए किराया चुकाएं।

प्रधानमंत्री आवास में हुई लूट, लूट नहीं… जनता का अधिकार और शक्ति: बांग्लादेश की लूटेरी इस्लामी भीड़ के साथ रवीश कुमार – ये है निष्पक्ष पत्रकारिता?

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मचाए गए उत्पात की जो तस्वीरें सामने आई हैं उससे भारत के कुछ लोग बहुत खुश लग रहे हैं। इनमें एक नाम पत्रकार रवीश कुमार का भी है। रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट की है। इस वीडियो में वो बताते दिख रहे हैं कि किस तरह से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री आवास में प्रदर्शनकारी घुसे और उनके घर के सामान अपने साथ ले गए।

चैनल पर अपलोड 22 मिनट 6 सेकेंड की वीडियो में रवीश ने बांग्लादेश में मचाए उत्पात को ‘छात्रों का प्रदर्शन’ बताया। साथ ही प्रधानमंत्री भवन में घुसने वाली दंगाई भीड़ को देश की जनता कहकर वीडियो में संबोधित किया और दिखाया कि बांग्लादेश के लोग पीएम आवास से सोफे, कुर्सियाँ, अटैची, बैग, साड़ी, मछली, बकरी, खरगोश वगैरह लेकर जा रहे हैं। उन्होंने वीडियो में पहले सवाल किया कि क्या इन हरकतों को लूट कहा जा सकता है। आगे खुद जवाब देते हुए बोले- ये लूट नहीं है बल्कि जनता को ये एहसास हुआ है कि उनके पास अधिकार और शक्तियाँ हैं।

रवीश कुमार जिस भीड़ के कृत्य को शब्दों के हेर-फेर से जस्टिफाई करते दिख रहे हैं और उनकी हरकतों को लोकतंत्र की लड़ाई जैसा दिखा रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए कि उसी भीड़ ने छात्र प्रदर्शन के नाम कितने लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस भीड़ ने थाने के थाने जला डाले। उसमें काम करने वाले पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया। यही भीड़ जो आरक्षण के नाम पर सड़कों पर उतरी है और जिसकी ताकत देख रवीश कुमार हैरानी जता रहे हैं वो खुलेआम हिंदुओं को निशाना बना रही है, मंदिरों पर हमले कर रही है… लेकिन रवीश कुमार जैसे लोग इसे छात्रों का सफल विद्रोह बताकर संबोधित कर रहे हैं और शेख हसीना जिन्हें खुद चुनावों के जरिए सत्ता मिलती रही उन्हें तानाशाह के तौर पर दिखा रहे हैं।

उनका कहना है कि मुल्क में जो आगजनी हुई है, संपत्तियों को तोड़फोड़ा गया है वो सिर्फ जनता का गुस्सा है और सोशल मीडिया फेसबुक, यूट्यूब के समय में इस गुस्से शांत नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि छात्रों का प्रदर्शन पहले शांत ही था लेकिन 12 जुलाई को शेख हसीना ने इन्हें रजाकार कह दिया था इसके बाद लोगों का गुस्सा उनपर भड़क गया। रवीश कुमार ने अपनी 22 मिनट की वीडियो में सिर्फ ये दिखाना चाहा कि किस तरह से बांग्लादेश में जो कुछ हुआ वो सही था और शेख हसीना द्वारा सरकारी नौकरी में बढ़ाया जा रहा आरक्षण गलत।

दिलचस्प बात ये है कि ये रवीश कुमार जैसे लोग आरक्षण का समर्थन और विरोध मुल्क और भीड़ को देखकर करते हैं। भारत में आरक्षण कम करने की बात होना इन्हें गलत लगता है और बांग्लादेश में आरक्षण का बढ़ना इनके लिए समस्या की बात है। रवीश कुमार इस लिस्ट में अकेले नहीं हैं जो बांग्लादेश में हुए तख्तापलट और लूट को जायज बता रहे हैं। आरफा खानुम शेरवानी समेत कई नाम हैं जिन्हें ये पूरा तख्तापलट लोकतंत्र को बचाने का एकमात्र तरीका जैसा दिख रहा है, लेकिन सवाल ये है कि क्या हिंसक आंदोलन में शामिल भीड़ सिर्फ छात्रों की थी। इसमें बांग्लादेश के विपक्ष का कोई रोल नहीं था? क्या इसमें इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों का हाथ नहीं था?

बांग्लादेश अब बनेगा पाकिस्तान, शेख हसीना राजनीति में नहीं लौटेंगी: तख्तापलट के बाद बोले शेख हसीना के बेटे – ‘अब देश हमारी समस्या नहीं’

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट किए जाने के बाद भी हिंसा नहीं रुकी है। बांग्लादेश में आवामी लीग के नेता और हिन्दू निशाने पर लिए जा रहे हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना देश छोड़ कर भारत आ गई हैं। इस बीच उनके पुत्र सजीब वाजेद ने कहा है कि उनकी माँ इन सब से दुखी हैं। वाजेद ने कहा है कि बांग्लादेश के लोगों ने जो किया है, वह भुगतना अब उनकी जिम्मेदारी है।

Wion को दिए इंटरव्यू में वाजेद ने कहा, “बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह डरावना है। बांग्लादेश में अराजकता है, कानून का कोई राज नहीं है। भीड़ सड़कों पर घूम रही है, घरों, कारखानों में तोड़फोड़ कर रही है और मैंने जो सुना है उसके अनुसार वे अल्पसंख्यकों पर हमला कर रहे हैं। हमलावर अल्पसंख्यकों और हिंदू मंदिरों पर हमला कर रहे हैं। इसलिए बांग्लादेश सही में अराजकता की स्थिति में है।”

वाजेद ने बताया कि शेख हसीना सही हालत में हैं लेकिन काफी दुखी हैं। उन्होंने बताया कि शेख हसीना ने बांग्लादेश में काफी विकास किया जिसके उत्तर में उन्हें यह भुगतना पड़ा है। वाजेद ने चिंता जताई है कि बांग्लादेश अब दूसरा पाकिस्तान बन जाएगा। उन्होंने शेख हसीना की राजनीति में वापसी को भी नकार दिया है। उन्होंने बताया कि शेख हसीना अब 77 वर्ष की हैं और उनका वापस देश की राजनीति में लौटने का कोई विचार नहीं है।

वाजेद ने कहा बांग्लादेश के लोगों ने अपने नेता चुन लिए हैं और वहीं उन्हें मिलेंगे। वाजेद ने खुद के भी राजनीति में आने के कयासों पर रोक लगा दी। उन्होंने बताया कि उनकी भविष्य में ऐसी कोई योजना नहीं है। वाजेद ने कहा कि उनका परिवार तीन बार सैन्य तख्तापलट झेल चुका है। उन्होंने कहा कि उनका परिवार बांग्लादेश को बचाते बचाते थक चुका है और अब बांग्लादेश के लोग खुद ही यह काम करें। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश अब उनकी समस्या नहीं है।

वाजेद ने कहा कि बांग्लादेश के लोग कृतघ्न हैं। उन्होंने बांग्लादेश में शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियाँ तोड़े जाने पर रोष जताया। उन्होंने कहा कि शेख हसीना ने बांग्लादेश को एक विफल देश से एशिया में बढ़ता हुआ देश बनाया और उनका कार्यकाल बांग्लादेश के लिए स्वर्णिम काल माना जाएगा।

वाजेद ने इन सब के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना भी की है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने हर मुद्दे पर बांग्लादेश की आलोचना की है और अब वह बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को मारे जाते हुए देखेंगे। उन्होंने कहा कि यही यह लोग चाहते थे। उन्होंने शेख हसीना के भविष्य को लेकर भी बात की।

उन्होंने बताया कि अब शेख हसीना अपने पोते-पोतियों के साथ वक्त बिताएँगी। वह अब कुछ दिन अपने बेटे-बेटी और बहन पास रहेंगी। वाजेद ने बांग्लादेश अंतरिम सरकार को लेकर चिंता जताई और कहा कि यह सरकार कहीं दिख नहीं रही और कुछ कर भी नहीं पा रही है।

वाजेद ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो भी जारी किया। उन्होंने कहा कि जितना ही सरकार इस्लामी प्रदर्शनकारियों के सामने झुकती गई, उतना ही वह आगे बढ़ते गए। उन्होंने बांग्लादेश में चुनावों के गड़बड़ होने के आरोप खारिज कर दिए। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में अब जो कुछ होगा वहां के लोगों की जिम्मेदारी है।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में जुलाई महीने से ही आरक्षण खत्म करने की माँग को लेकर प्रदर्शन चल रहे थे। इस प्रदर्शन को इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाइजैक कर लिया और इसके बाद भारी हिंसा हुई। यह हिंसा अगस्त में और बढ़ गई और प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। शेख हसीना सोमवार (5 अगस्त, 2024) को ढाका छोड़ कर भारत आ गईं। वर्तमान में वह भारत में हैं। उनके कुछ दिन भारत में रह कर आगे ब्रिटेन जाएँगी।

समझिए भारत में क्यों नहीं आ सकती बांग्लादेश जैसी स्थिति: कभी ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ पर चिढ़ाने वाला गिरोह आज देख रहा देश में अराजकता के ख्वाब, अंतर समझो और पीट लो माथा

बांग्लादेश में अराजकता का माहौल है। प्रधानमंत्री शेख हसीना को मुल्क छोड़ना पड़ा। उनका विमान भारत के गाजियाबाद स्थित हिंडन एयरपोर्ट पर लैंड हुआ। उन्होंने अपना इस्तीफा भी दे दिया है। अब बांग्लादेश में फौज ये तय कर रही है कि आगे क्या होगा। बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष वकार-उज-जमान का कहना है कि वो विपक्षी पार्टियों से बात कर के नई अंतरिम सरकार के गठन के लिए पहल करेंगे। दो-तिहाई बहुमत से हाल ही में सत्ता में लौटी शेख हसीना की ‘आवामी लीग’ को इन चर्चाओं से पूरी तरह अलग रखा जाएगा।

बांग्लादेश में कोटा का मुद्दा, भारत में आरक्षण पर राजनीति

आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि बांग्लादेश में ऐसी स्थिति आई ही क्यों है। असल में ये पूरा का पूरा मामला आरक्षण से जुड़ा है। बड़ा ही जाना-पहचाना शब्द लग रहा है न? 1990 के दशक की शुरुआत में प्रधानमंत्री रहे VP सिंह OBC समाज के लिए 27% आरक्षण का फैसला लेकर आए थे, तभी से भारत में भी आरक्षण को लेकर लेकर हिंसा होती रही है। इसके पक्ष-विपक्ष में सोशल मीडिया में दलीलें दी जाती रही हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST समाज में उपवर्गीकरण का आदेश दिया है, ताकि जो पिछड़ गए हैं उन्हें भी फायदा मिले। इसके खिलाफ कुछ जातियों ने ‘भारत बंद’ बुला रखा है।

कॉन्ग्रेस पार्टी की तो आजकल की पूरी की पूरी राजनीति ही आरक्षण और जाति के इर्दगिर्द घूमती है। राहुल गाँधी संसद में हर सवाल के जवाब में जातिगत जनगणना कराने की बातें करते हैं। ये बिहार में हो चुका है, लेकिन कोई नहीं बता रहा कि इससे फायदा क्या हुआ। राम मंदिर को लेकर एक हुए हिन्दुओं को जातियों में बाँटने के लिए ‘मंडल पॉलिटिक्स’ फिर शुरू है। बांग्लादेश में जिस आरक्षण को लेकर विवाद हुआ, वो जाति वाला नहीं बल्कि मुल्क की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले परिवारों से जुड़ा हुआ था। साथ ही इसके तहत पाकिस्तान द्वारा प्रताड़ित की गई महिलाओं, कुछ क्षेत्रों और कुछ जनजातियों को प्राथमिकता दी गई थी। ये फैसला खुद बंग-बंधु शेख मुजीबुर रहमान का था

बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों को ‘मुक्ति योद्धा’ कहा जाता है। तर्क ये था कि ये ‘मुक्ति योद्धा’ जब युवा थे जब उन्हें आरक्षण देने का तुक बनता था क्योंकि तब वो नौकरी खोज रहे थे। हालाँकि, बाद में ये आरक्षण उनके बेटे-बेटियों और फिर पोते-पोती-नाती-नातिन तक पहुँच गया। फिर आरोप लगा कि ‘आवामी लीग’ के कार्यकर्ता इसका फायदा उठा रहे हैं। 2018 में भी इसके खिलाफ प्रदर्शन हुआ था, तब हाईकोर्ट ने आरक्षण खत्म करने की माँग ठुकरा दी थी। फिर शेख हसीना ने सारा आरक्षण खत्म करने का निर्णय किया, इसका भी विरोध हुआ क्योंकि छात्र इसे खत्म करने की जगह सुधार की माँग कर रहे थे।

सरकारी नौकरियों में ‘मुक्ति योद्धाओं’ और उनके वंशजों के लिए 30% आरक्षण की व्यवस्था थी। ‘मुक्ति योद्धाओं’ के परिजन सुप्रीम कोर्ट पहुँचे और सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की व्यवस्था फिर से बहाल कर दी। इससे 56% सरकारी नौकरियाँ आरक्षित हो गईं। सुप्रीम कोर्ट ने 93-7 की व्यवस्था दी थी, यानी 93% नौकरियाँ मेरिट के आधार पर और 7% आरक्षण के आधार पर। इसके बाद छात्रों ने सरकार के साथ असहयोग का आंदोलन चलाया। शेख हसीना ने प्रदर्शनकारियों को ‘रज़ाकार’ (पाकिस्तानी अत्याचारी) कह कर संबोधित किया और उनके दमन का प्रयास किया।

बांग्लादेश का ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ बताने वाले कहाँ गए?

खैर, ये था पूरा मामला। अब शेख हसीना जैसे ही बांग्लादेश छोड़ कर भारत आई हैं, उनके इस्तीफे के बाद भारत के एक वामपंथी गिरोह की बाँछें खिल गई हैं। कोई इसे ‘युवा शक्ति की जीत’ बता रहा तो कोई ‘लोकतंत्र की विजय’ करार दे रहा। इसमें विनोद कापड़ी और अभिनव पांडेय जैसे पत्रकार शामिल हैं। RJ सायमा और अरफ़ा खानम शेरवानी जैसी सोशल मीडिया में प्रभाव रखने वाली मुस्लिम महिलाएँ भी जश्न मना रहीं। इनकी शह पर कुछ सोशल मीडिया हैंडल लिख रहे कि PM नरेंद्र मोदी के साथ ऐसा होगा तो वो किस देश में लैंड करेंगे?

ये अलग बात है कि कुछ दिनों पहले तक यही गिरोह बांग्लादेश का ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ दिखा कर मोदी सरकार के समर्थकों को चिढ़ा रहा था। YouTuber ध्रुव राठी भाजपा समर्थकों को ‘अंधभक्त’ कहते हुए ऐसे समझा रहे थे जैसे कि बांग्लादेश ही दुनिया की नई महाशक्ति बन गया हो। वो कह रहे थे कि वास्तविक विकास कैसे होता है, इसमें बांग्लादेश अपने पड़ोसी देशों के लिए उदाहरण सेट कर रहा है। वहीं ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट’ में भी बांग्लादेश को 125वीं रैंक दी गई थी, जबकि भारत को 140वें स्थान पर रखा गया था। इसे लेकर भारत को यहीं के वामपंथियों ने खूब चिढ़ाया था और जैसा कि वो करते रहे हैं, ‘विश्वगुरु’ वाला तंज कसा था।

अब देखिए, जो गिरोह कल तक बांग्लादेश की तारीफ़ में कसीदे पढ़ रहा था अब वही गिरोह बांग्लादेश की अराजकता को ‘तानाशाही का अंत’ बता रहा है। स्थिति ऐसी है कि सरकारी इमारतें जलाई जा रही हैं, ISKCON के मंदिर और माँ काली के मंदिर जलाए जा रहे हैं। हिन्दू नेताओं और पत्रकारों की हत्याएँ हुई हैं। भीड़ PM आवास में घुस गई। वहाँ से महिलाओं के प्राइवेट कपड़ों को लूट कर लहराया जा रहा है। जो हिन्दू पहले से ही डरे हुए थे, उनके लिए मोदी सरकार से हस्तक्षेप की माँग की जा रही है। 2021 के दशहरा में कुरान के अपमान की अफवाह फैला कर कई मंदिरों और पूजा पंडालों को जलाया गया था।

इन सबको नज़रअंदाज़ कर भारत का वामपंथी गिरोह बांग्लादेश की अराजक भीड़ का महिमामंडन कर रहा है। शायद इन्हें पता नहीं है कि भारत में ऐसी स्थिति नहीं चलती। जहाँ तक तानाशाही की बात है, 1975 में इंदिरा गाँधी ने यहाँ ‘आपातकाल’ लगा कर विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करवाया था और उनके बेटे संजय गाँधी ने कइयों की जबरन नसबंदी कराई थी। आखिरकार उन्हें चुनाव कराना पड़ा और उसमें उनकी बुरी हार हुई। जन-आंदोलन से निकली ‘जनता पार्टी’ जब ठीक से शासन नहीं कर पाई तो 1980 में उसकी भी बुरी हार हुई।

मजबूत है भारत का लोकतंत्र, यहाँ चुनाव मतलब उत्सव

जो लोग ये दिवास्वप्न देख रहे हैं कि भारत में बांग्लादेश जैसी स्थिति आ जाएगी, उन्हें ये देखना चाहिए कि यहाँ जनता सामूहिक नाराज़गी का जवाब चुनावों में देती है। भले ही लोकसभा चुनावों के लिए 5 साल इंतज़ार करना पड़े, लेकिन बीच में अलग-अलग राज्यों के चुनाव आते हैं और जनता के पास जवाब देने के कई मौके होते हैं। सत्ताधारी पार्टी राज्यों के चुनाव में हारती है तो वो जनता की भावनाओं को समझ कर उस अनुरूप काम करती है। नहीं करेगी, तो सत्ता किसी और को मिल जाएगी। भाजपा भले केंद्र में 10 वर्षों से सत्ता में है, बीच में उसने बिहार और हिमाचल प्रदेश से लेकर कई चुनाव हारे।

दूसरी बात, भारत में विकास कार्य काफी तेज़ी से हो रहा है। कोरोना के दौरान 100 से अधिक देशों को भारत ने वैश्विक महामारी से निपटने के लिए वैक्सीन भेजी। देश सड़कों के निर्माण के मामले में रिकॉर्ड बना रहा है, यहाँ रेल नेटवर्क को दुरुस्त किया जा रहा है, अब महिलाएँ मिट्टी के चूल्हे पर भोजन नहीं पकातीं क्यों ‘उज्ज्वला’ के तहत उन्हें गैस सिलिंडर मिलता है, शत-प्रतिशत गाँवों में बिजली पहुँची है, हर घर नल से स्वच्छ जल पहुँच रहा है, करोड़ों घर बन रहे हैं ग़रीबों के, व्यवसाय करने के लिए ऋण दिए जा रहे हैं, यहाँ कई शैक्षिक संस्थान हैं अव्वल दर्जे के, जिनसे निकले युवा बड़ी नौकरियाँ पाते हैं।

बांग्लादेश में ये सब नहीं था। दूसरा बड़ा कारण है, भारत की अर्थव्यवस्था बड़ी विविधता वाली है। कृषि पर आधी से अधिक जनसंख्या निर्भर है, लेकिन यहाँ की उपजाऊ भूमि और किसानों को मिलने वाली सरकारी सहूलियतों ने कृषकों का जीवन आसान किया है। IT सेक्टर में भारत एक हब है। यहाँ NCR, पुणे, हैदराबाद और चेन्नई जैसे कई शहर सॉफ्टवेयर कंपनियों की पसंद बन रहे हैं। बांग्लादेश में IT सेक्टर फल-फूल रहा था लेकिन सस्ते वर्कफोर्स के कारण। बांग्लादेश टेक्सटाइल-गारमेंट्स उद्योग पर निर्भर है, कोरोना के दौरान इस इंडस्ट्री को भी मार पड़ी।

बांग्लादेश और भारत के लोगों में भी फर्क है। बांग्लादेश एक इस्लामी मुल्क है, भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ हिन्दू बहुलता में हैं लेकिन हर धर्म-पंथ-मजहब के लोग यहाँ खुल कर जीते हैं, अपनी परंपराओं का पालन करते हैं। भारत कई भाषाओं वाला देश है। हमने विविधता को आत्मसात किया है। हम इसके साथ ही जीते हैं। ऐसे में एक भारतीय खुद को समय एवं स्थान के हिसाब से अनुकूलित करने की क्षमता रखता है, वो समझौता कर के भी रह सकता है। क्योंकि, उसे पता है कि कठिन समय लंबे नहीं चलते। यही कारण है कि भारत में क्रूर शासकों को हमेशा सत्ता से बेदखल होना पड़ा, या उनका प्रभाव घट गया। हालाँकि, कभी लाख-करोड़ लोग एक साथ अराजक नहीं हुए।

भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्वायत्त हैं। सबसे पहले यहाँ की न्यायपालिका की बात कर लीजिए, कई फैसले आपको सरकार के खिलाफ जाते हुए दिखेंगे। यहाँ की बहुमत वाली आबादी को भी अपने आराध्य देवता के जन्मस्थान पर मंदिर के लिए 500 वर्ष संघर्ष करना पड़ा। ED, CBI और IT जैसी संस्थाओं पर पक्षपात के आरोप ज़रूर लगते हैं लेकिन ये कोरी राजनीति का हिस्सा होते हैं और अंतिम फैसला अदालत में ही होना होता है। यहाँ की सेना एक पदक्रम वाले अनुशासन का पालन करती है, उनका प्रशिक्षण ऐसा होता है कि वो देशहित में कार्य करते हैं, तख्तापलट जैसी चीजें यहाँ की विचारधारा में ही नहीं है।

भारत में चुनाव निष्पक्ष होते हैं, इसके लिए चुनाव आयोग जैसी संस्था है। यहाँ गाँवों में वार्ड से लेकर राजधानी में राष्ट्रपति तक के चुनाव बड़े ही पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत होते हैं। चुनाव भारत में एक उत्सव है, भले ही ये पंचायत का हो या प्रधानमंत्री का। हर कोई हिस्सा लेता है। बांग्लादेश में चुनावी प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में थी, लोगों में वोट डालने का उत्साह भी नहीं था। स्थानीय चुनावों में तो वहाँ 35% मतदाता भी नहीं निकले। भारत में सहकारी संस्थाओं से लेकर वकील संघों तक में, हर जगह चुनाव होते हैं। भारत लोकतंत्र को जीता है। बांग्लादेश जैसे मुल्कों में ये नहीं होता।

नहीं, भारत नहीं बन सकता पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका या म्यांमार

भारत की संसद में किसी भी मुद्दे पर लंबी बहस होती है और जनता इसका लाइव प्रसारण देखती है। संसद में दो सदन हैं, ऐसे में हर बिल को पारित कराना एक बड़ी चुनौती होती है। पूरी की पूरी स्क्रूटनी से सब कुछ गुजरता है। मीडिया की वजह से जनता की नज़र हर एक चीज पर होती है। यहाँ प्रमुख सोशल मीडिया मंच प्रतिबंधित नहीं हैं, हर कोई अपनी राय रखता है। बांग्लादेश में समय-समय पर फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स बैन किए जाते रहे हैं। भारत में समाचारपत्रों के कॉलमों से लेकर टीवी की बहस और सोशल मीडिया के ट्वीट्स तक, पक्ष-विपक्ष में रोज लाखों लोग अपनी राय रखते हैं।

1991 हो या फिर 2008, ऐसा नहीं है कि भारत पर वैश्विक आर्थिक तंगी का प्रभाव नहीं पड़ा लेकिन कभी उदारीकरण तो कभी वित्तीय पैकेजों के माध्यम से हमेशा इसे नियंत्रित किया गया। यहाँ हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की अलग-अलग अर्थव्यवस्था है, अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियाँ हैं, अलग-अलग उद्योग-धंधे हैं और यहाँ तक कि खेती की मिट्टी भी अलग-अलग है। इस कारण कोई एक समस्या पूरे देश को बुरी तरह प्रभावित नहीं करती। 1980 के दशक में पंजाब में खालिस्तानी आतंकद हो या फिर जम्मू कश्मीर में इस्लामी आतंकवाद, हमारे सुरक्षा बल उससे निपटने में सक्षम होते हैं

हम श्रीलंका की तरह कर्ज में डूबे हुए नहीं हैं, न ही पाकिस्तान की तरह महँगाई हमें मार रही है और हमें कटोरा लेकर भीख के लिए घूमना पड़ रहा है। म्यांमार की तरह यहाँ सेना चुनी हुई सरकार को अपदस्थ नहीं करती। बांग्लादेश के हालात आप देख ही रहे हैं। हाँ, भारत में ‘किसान आंदोलन’ हुए, अब जातियों के जरिए लड़ाई की साजिश रची जा रही है, लेकिन हमेशा भारत की राजनीति और यहाँ की सुरक्षा एजेंसियों के पास इन सबसे निपटने के तरीके होते हैं। भारत, बांग्लादेश नहीं है। ये पाकिस्तान नहीं है, अरब नहीं है, म्यांमार नहीं है, पाकिस्तान नहीं है।

हाँ, पाकिस्तान और बांग्लादेश ज़रूर कभी भारत हुआ करते थे। भारत में हजारों वर्ष पूर्व भी गुरुकुलों में अनुशासन सिखाया जाता था, राजा-महाराजा भी ऋषि-मुनियों के सामने अपना मुकुट उतार कर सिर झुकाते थे। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों ने उस संस्कृति को छोड़ कर बाहरी इस्लामी संस्कृति को आत्मसात किया, इस कारण वो अनुशासन भूल गए। हर देश में सत्ताधीश मलाई चाटते हैं, लेकिन पाकिस्तान-बांग्लादेश जैसे देशों में जनता को लूट कर यूरोप में संपत्ति जुटाने का चलन है। भारत की महान संस्कृति के अंश यहाँ की मिट्टी में रचे-बसे हैं, वो हमेशा हमें सही राह दिखाते हैं।

जहाँ तक गिरोह विशेष की बात है, जब 2011 में ‘अरब स्प्रिंग’ आया था तब भी वो भारत में अराजकता के सपने देख रहे थे। आज क्या स्थिति है? सीरिया ISIS का गढ़ बन गया, यमन में हूती और सरकार लड़ रहे, ट्यूनीशिया में PM को बरख़ास्त कर के संसद भंग कर दी गई, मिस्र में राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को फ़ौज ने भगा दिया, बहरीन में अल-खलीफा परिवार के खिलाफ बोलना अपराध है और लीबिया में कई इस्लामी गुट आपस में लड़ रहे हैं। अराजकता से ये कैसा प्रेम है इस गिरोह को? वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हिंसा भड़काने में ये कई दिनों से लगे हुए हैं।

मुस्लिम बहुल गाँव में काँवड़ यात्रियों का रास्ता रोक कर हमला, शिवभक्तों को दी गईं गंदी-गंदी गालियाँ: तैमूर और उसके साथियों की गिरफ्तारी न होने पर भड़के ग्रामीण

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में पड़ने वाले एक मुस्लिम बाहुल्य गाँव में काँवड़ यात्रियों का रास्ता रोक लिया गया। यहाँ शुक्रवार (2 अगस्त, 2024) को शिवभक्तों से गाली-गलौज और मारपीट भी की गई। कांवड़ यात्रियों ने इसे सोची समझी साजिश बताते हुए पुलिस में शिकायत दी है। शिकायत में यामीन के बेटे बिल्लू, शाहिद, माज़िद, गुलबहार, तैमूर, फारुख, महरूफ, कामिल, शाकिर, शाहरुख़ व कुछ अन्य लोगों को नामजद किया गया है। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ FIR दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। आरोपितों की गिरफ्तारी न होने से नाराज हिन्दू संगठन सोमवार (5 अगस्त, 2024) को थाने पर एकजुट हुए।

यह घटना सहारनपुर जिले के थाना क्षेत्र सरसावा की है। शनिवार (4 अगस्त) को यहाँ ढिक्काकला गाँव के सुधीर कुमार शर्मा ने पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में उन्होंने बताया कि उनके गाँव के बगल मुस्लिम बाहुल्य इलाका है जिसे टबरा गाँव बोलते हैं। शुक्रवार (2 अगस्त) की शाम लगभग 3:40 पर इस गाँव के आगे काँवड़ यात्री पहुँचे। इनके साथ DJ भी था जिस पर धार्मिक गाने बज रहे थे। आरोप है कि इस गाँव के कुछ मुस्लिमों ने पहले से ही काँवड़ियों को न निकलने देने की साजिश रच रखी थी।

शिकायत के मुताबिक, यामीन के बेटे बिल्लू, शाहिद, माज़िद, गुलबहार, तैमूर, फारुख, महरूफ, कामिल, शाकिर, शाहरुख़ व कुछ अन्य लोगों ने काँवड़ यात्रियों को रोक कर घेर लिया। इन सभी के हाथों में लाठी-डंडे और सरिया आदि होने का दावा किया गया है। आरोप है कि इन सभी ने पहले शिवभक्तों को गंदी-गंदी गालियाँ दीं, फिर उनके साथ मारपीट की गई। शिकायतकर्ता का बेटा भी उन पीड़ित कांवड़ियों में से एक था। उसने अपने घर पर इस विवाद की सूचना दी। आखिरकार मामले की सूचना पुलिस तक भी पहुँची।

पुलिस ने फ़ौरन मौके पर पहुँच कर हालात को काबू किया। दोनों पक्षों को समझा कर शांत करवाया गया। पीड़ित काँवड़ियों की तरफ से सुधीर कुमार ने आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने इस मामले में मुस्लिम समुदाय के 12 आरोपितों के खिलाफ नामजद FIR दर्ज कर ली है। इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 126 (2), 191 (2), 115 (2), 352 और 300 के तहत कार्रवाई की है। इस बीच 24 घंटे बीत जाने पर भी आरोपितों की गिरफ्तारी न होने पर हिन्दू संगठनों ने नाराजगी जताई है।

ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। सोमवार (5 अगस्त) को सरसावा थाने पर ग्रामीणों और हिन्दू संगठन से जुड़े लोगों का जमावड़ा हुआ। इन सभी ने पुलिस पर आरोप लगाया कि वो आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई में हीलाहवाली कर रही है। सरसावा के डॉक्टर सुभाष चौहान ने कहा कि काँवड़ियों के DJ के भी बंद करने की कोशिश की गई। उन्होंने बताया कि पुलिस के आने से काँवड़ियों की जान बच पाई थी। कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि हमलावरों ने पुलिस की मौजूदगी में कांवड़ियों के साथ अभद्रता की है।

‘किस आधार पर 77 मुस्लिम जातियों को दे दिया OBC का दर्जा?’: सुप्रीम कोर्ट का TMC सरकार से सवाल, कोलकाता हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से किया इनकार

मुस्लिम समुदाय की 77 जातियों को OBC समुदाय का दर्जा और आरक्षण देने के मामले में ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट में भी घिर गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इन 77 जातियों के OBC कोटे को खत्म करने वाले कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से फिलहाल इनकार कर दिया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी। अब सोमवार (5 अगस्त, 2024) को उच्चतम न्यायालय ने ममता बनर्जी सरकार को नोटिस जारी करते हुए उन 77 जातियों को OBC वर्ग में शामिल करने का आधार पूछा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममता सरकार ने OBC समुदाय में मुस्लिम समाज की 77 जातियों को शामिल किया था। इस फैसले का काफी विरोध हुआ था और इसे कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता सरकार के इस फैसले को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। इस मामले में सोमवार (5 अगस्त) को सुनवाई हुई। सोमवार को यह सुनवाई प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच में हुई।

पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से सरकारी वकील इंदिरा जयसिंह पेश हुईं। पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ प्रतिवादी के तौर पर सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने बहस की। पश्चिम बंगाल सरकार ने उच्चतम न्यायालय में यहाँ तक कह डाला कि कलकत्ता हाईकोर्ट ही प्रदेश में सरकार चलाना चाह रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस आदेश का विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि आरक्षण पाने वाली जातियाँ मुस्लिम समुदाय की हैं। इंदिरा जयसिंह ने इसे मंडल आयोग के निर्देशों पर उठाया गया सही कदम ठहराया।

वहीं प्रतिवादी अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इंदिरा जयसिंह के तर्कों का विरोध किया। दोनों पक्षों के सुनने के बाद तीनों जजों की बेंच ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से फिलहाल इंकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी करते हुए सवाल किया है कि किस आधार पर उन्होंने मुस्लिम समाज की 77 जातियों को OBC वर्ग में शामिल किया है ? सुप्रीम कोर्ट ने उन दो निजी वादियों को भी नोटिस जारी किया है जिन्होंने ममता सरकार के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी।

बताते चलें कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा 77 मुस्लिम जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में वर्गीकृत करने को रद्द कर दिया था और 2010 के बाद पश्चिम बंगाल में जारी सभी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाण पत्र रद्द कर दिए थे।

मुस्लिम लड़की से शादी करने वाले हिंदू युवक की हत्या, रिश्ते नॉर्मल करने की बात कह बुलाया और कुल्हाड़ी-चाकू-रॉड से किया हमला: नाबालिग सहित 7 गिरफ्तार

गुजरात के द्वारका जिले में मुस्लिम लड़की से शादी करने की वजह से एक हिन्दू युवक की बेरहमी से हत्या कर दी गई है। मृतक का नाम याग्निक लाक्षीदास दूधरेजिया है। याग्निक ने डेढ़ साल पहले अपनी ही गाँव की मुस्लिम लड़की रज़मा से लव मैरिज की थी। रज़मा के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था। सुरक्षा के डर से पत्नी सहित गाँव छोड़ चुके याग्निक को धोखे में रख कर पहले बुलाया गया, फिर शनिवार (3 अगस्त, 2024) को उन्हें कुल्हाड़ी से काट डाला गया।

इस केस में एक नाबालिग सहित रजमा के भाई साजिद, उसके चाचा सलीम, आमेद मूसा, जुमा, उस्मान और कासम को नामजद किया गया है। सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना द्वारका जिले के भनवाद तालुका की है। यहाँ के शेधाखाई गाँव के रहने वाले याग्निक ने लम्बे समय तक चले प्रेम प्रसंग के बाद डेढ़ साल पहले पड़ोस में रहने वाली मुस्लिम लड़की ईशा से शादी कर ली थी। दोनों एक-दूसरे के साथ बेहद खुश थे लेकिन ईशा के घर वाले इस रिश्ते से नाराज थे। याग्निक को जान से मार डालने की धमकियाँ मिलने लगीं थीं जिस वजह से उसने अपनी पत्नी सहित गाँव छोड़ दिया। डेढ़ महीने पहले याग्निक एक बच्ची का पिता बना।

इस बीच रज़मा के घर वाले याग्निक से अपने रिश्ते सामान्य होने का दिखावा करने लगे। इसी दिखावे के जाल में फँस कर याग्निक अपनी पत्नी और बेटी के साथ गाँव लौट आया। हालाँकि रजमा के परिजन अंदर ही अंदर गुस्से से भरे हुए थे। वो याग्निक को ठिकाने लगाने के लिए सही समय की तलाश में थे। शनिवार की दोपहर लगभग 3 बजे याग्निक अपने एक दोस्त के साथ घर से निकल कर गाँव के बस अड्डे तक गया। इसी दौरान रज़मा के परिजनों ने उसका पीछा किया। इन परिजनों में एक नाबालिग के साथ साजिद, सलीम, आमेद, जुमा, उस्मान, होती कासम शामिल थे।

बताया जा रहा है कि इन सभी के हाथों में कुल्हाड़ी, चाकू और लोहे के पाइप जैसे घातक हथियार थे। इन्होने याग्निक को चारों तरफ से घेर लिया और अंधाधुंध वार शुरू कर दिए। याग्निक सम्भल या कुछ समझ पाता उस से पहले उसके पेट में कई चाकू और सिर में लोहे की रॉड लग गईं। हमले के दौरान आरोपित शोर मचा रहे थे कि इसने हमारी लड़की से शादी कर ली है, इसे ज़िंदा नहीं छोड़ना है। याग्निक के दोस्त ने हमलावरों के आगे हाथ जोड़े और रहम की अपील की। हालाँकि, इस अपील का हमलावरों पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

याग्निक के साथी ने उसके परिजनों को फोन पर सूचना दी। फ़ौरन ही उसकी माँ और बीवी घटनास्थल पर पहुँचीं। तब तक हमलावर फरार हो चुके थे। मामले की सूचना पुलिस को दी गई। पुलिस और परिजनों ने गंभीर रूप से घायल याग्निक को अस्पताल पहुँचाया। हालत गंभीर देख कर याग्निक को जामनगर रेफर कर दिया गया। जामनगर ले जाने के दौरान रास्ते में याग्निक की मौत हो गई। मृतक की माँ ने सभी हमलावरों के खिलाफ भानवड थाने में तहरीर दी। तहरीर के आधार पर पुलिस ने 1 नाबालिग सहित 7 हमलावरों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली।

पुलिस ने मृतक की माँ की तहरीर पर सभी आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(2), 189(2), 189(4), 1991(2), 191(3), 190 और जीपी एक्ट धारा 135(1) के तहत कार्रवाई की है। नाबालिग सहित सभी अन्य आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। याग्निक की पत्नी रजमा खुल कर मीडिया के सामने आईं और अपने भाइयों और चाचा के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। रजमा ने बताया कि आरोपितों ने उनकी और डेढ़ माह की बच्ची की जिंदगी को बर्बाद कर दिया। पुलिस मामले की जाँच और अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

पत्रकार-नेताओं की हत्या, मंदिर पर हमले… बांग्लादेश में हिंदू बने आसान शिकार: शेख हसीना को छोड़ना पड़ा देश, अल्पसंख्यकों को बचाने के लिए भारत से दखल की गुहार

बांग्लादेश में अराजक माहौल पैदा होने के बाद वहाँ की प्रधानमंत्री शेख हसीना को मुल्क छोड़ कर भागना पड़ा है, उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। उनका विमान सोमवार (5 अगस्त, 2024) की शाम को गाजियाबाद स्थित हिंडन एयरपोर्ट पर लैंड हुआ। बता दें कि यहाँ भारतीय वायुसेना का बेस है। बता दें कि AJAX1431 कॉल साइन वाला C-130 एयरक्राफ्ट जैसे ही भारतीय सीमा की तरफ बढ़ा था, भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ इसे ट्रैक कर रही थीं। विमान पटना के ऊपर से होकर उत्तर प्रदेश में दाखिल हुआ।

शेख हसीना के मुल्क छोड़ने के कुछ ही देर बाद वहाँ के सेनाध्यक्ष वकार-उज-जमान ने घोषणा की कि विपक्षी दलों के साथ सलाह-मशविरा कर नई अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा। प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश की राजधानी ढाका के धानमंडी स्थित ‘सुधा सदन’ को आग के हवाले कर दिया है। उससे पहले यहाँ लूटपाट मचाई गई। प्रदर्शनकारियों ने PM आवास ‘गण भवन’ में घुस कर भी लूटपाट की और के सामान तहस-नहस कर दिए।

ढाका स्थित शाहजमाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट को अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया है। वहीं इसी प्रदर्शन की आड़ में बांग्लादेश में हिन्दुओं को भी निशाना बनाया जा रहा है। हरधन रॉय नामक हिन्दू पार्षद को रंगपुर में मार डाले जाने की खबर है। साथ ही ISKCON के मंदिरों में भी तोड़फोड़ मचाई गई है। काली मंदिरों में घुस कर भी प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की। बांग्लादेश में पहले से ही हिन्दू डरे हुए हैं। 2021 के दशहरा के दौरान ईशनिंदा का झूठा आरोप लगा कर कई पूजा पंडालों और मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था।

हिन्दू पत्रकार की भी हत्या हुई है। रायगंज प्रेस क्लब को घेर कर प्रदर्शनकारियों ने पत्रकार प्रदीप कुमार भौमिक को मार डाला। इन सबके बीच भारत सरकार से भी हस्तक्षेप की माँग की जा रही है। हिन्दू संगठनों का कहना है कि मोदी सरकार को बांग्लादेश की नई व्यवस्था और फ़ौज के समक्ष ये स्पष्ट कर देना चाहिए कि वहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। भारत में कई वामपंथी इस अराजकता को ‘युवा शक्ति व लोकतंत्र की जीत’ बता कर इसका महिमामंडन कर रहे हैं। जबकि मुल्क के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की मूर्ति ही तोड़ डाली गई है।

‘मुस्लिम एक हो गए तो…’: भड़काऊ पोस्ट करने वाला मौलाना हसीब अंसारी गिरफ्तार, लिखा था – शुक्र मनाओ मुस्लिम फिरके में बँटे हुए हैं, वरना…

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में शनिवार (3 अगस्त, 2024) को हसीब अंसारी नाम के युवक ने भड़काऊ पोस्ट डाली थी। इस पोस्ट में उसने एक हो जाने के बाद मुस्लिमों के पूरी फ़ोर्स लगाने के बावजूद काबू में न आने का चैलेन्ज दिया था। हिन्दू संगठनों ने तब हसीब अंसारी के खिलाफ ‘X’ हैंडल से शिकायत दर्ज करवाई थी। आखिरकार पुलिस हसीब अंसारी पर FIR दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया है। यह कार्रवाई सोमवार (5 अगस्त, 2024) को की गई है।

ऑपइंडिया ने हसीब अंसारी की इस करतूत को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। तब बरेली पुलिस ने इस मामले में जाँच कर के कार्रवाई की बात कही थी। सोमवार को हसीब अंसारी को दबोच लिया गया है। हसीब अंसारी के खिलाफ खुद पुलिस ने वादी बन कर 4 अगस्त (रविवार) को थाना नवाबगंज में केस दर्ज करवाया था। इस शिकायत में पुलिस ने हसीब अंसारी की पोस्ट को गैरकानूनी और सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ पाया था। यह FIR ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 353(2) के तहत दर्ज हुई थी।

पुलिस के अपनी FIR में हसीब अंसारी लिखी गई लाइन ‘मुस्लिम एक हो गया तो पूरी फ़ोर्स लगाने के बाद भी रोक नहीं मिलेगा। शुक्र मनाओ मुसलमान फिरके में पड़ा है’ का जिक्र किया है। बकौल पुलिस यह हरकत समाज में एक वर्ग के लोगों की भावनाओं को भड़काने वाली है। आरोपित को आखिरकार गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले में जाँच और अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है। हसीब के अब्बा का नाम वहीद है। वह बरेली के नवाबगंज थाना क्षेत्र में आने वाले प्रभात नगर इलाके का निवासी है।

बताते चलें कि हसीब अंसारी ने यह आपत्तिजनक पोस्ट अपने व्हाट्सएप स्टेट्स पर डाली थी। तब उसने लिखा, “मुस्लिम एक हो गए तो पूरी फ़ोर्स लगाने के बाद भी रोक नहीं मिलेगा। शुक्र मनाओ कि मुसलमान फिरके-फिरके में पड़े हुए हैं और ये मौलवी इन्हें एक नहीं होने दे रहे हैं।” हसीब अंसारी ने इस स्टेट्स के ऊपर बड़े-बड़े शब्दों में लिख कर लोगों से इसे हर हाल में शेयर करने की गुजारिश भी की थी। हसीब अंसारी को बरेली के लोग मौलाना बताते हैं। उसने मदरसे से दीनी तालीम हासिल कर रखी है।

बरेली के ‘विश्व हिन्दू परिषद’ पदाधिकारी हिमांशु पटेल ने ऑपइंडिया से बात की। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई का स्वागत किया और हसीब अंसारी को गिरफ्तार करने वाले पुलिसकर्मियों की तारीफ की। हिमांशु पटेल ने बताया कि हसीब अंसारी निठल्लों की तरफ इधर-उधर घूमता है। आरोप है कि वो सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी मौलवियों और मौलानाओं की भड़काऊ पोस्ट अक्सर शेयर करता है और बाकी लोगों को भड़काया करता है।