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किर्गिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश… डोनाल्ड की ‘लू’ में एक-एक कर जल रहे देश, बीच चुनाव में पहुँचा था चेन्नई: जानिए ‘सत्ता-परिवर्तन का मास्टर’ और USAID से कनेक्शन को

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हो गया है। प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना को पद से इस्तीफा देकर मुल्क छोड़ना पड़ा, उन्होंने फ़िलहाल भारत में शरण ली हुई हैं। भारत के कई वामपंथी/इस्लामी पत्रकारों ने इसे ‘लोकतंत्र एवं युवा शक्ति की विजय’ बता कर प्रचारित किया, जबकि वहाँ कई मंदिरों पर हमले हो चुके हैं, हिन्दू नेताओं और पत्रकारों की हत्याएँ हुई हैं। भीड़ को PM आवास ‘गण भवन’ में पूर्व महिला प्रधानमंत्री की ब्रा और ब्लाउज लहराते हुए देखा गया। पूरा आंदोलन बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों ‘मुक्ति योद्धाओं’ के परिवारों का आरक्षण खत्म कराने को लेकर पैदा हुआ था।

ये थी बांग्लादेश की परिस्थिति, जिसके बारे में बहुत अधिक विवरण देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अब तक सोशल मीडिया से लेकर TV तक की खबरों से आप तस्वीरें-वीडियो देख रहे होंगे। यहाँ सवाल इसके विश्लेषण का है कि क्या बांग्लादेश में वही हो रहा है जो दिख रहा है? अंतरराष्ट्रीय मामलों में अक्सर पर्दे के पीछे बहुत कुछ चलता रहता है, कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो दिखाई नहीं देते। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन में जिस किरदार का नाम आ रहा है, वो है – डोनाल्ड लू। आइए, बताते हैं कि ये शख्स है कौन।

कौन हैं डोनाल्ड लू, बीच चुनाव में किया था भारत का दौरा

डोनाल्ड लू अमेरिका के एक राजनयिक हैं, जो फ़िलहाल दक्षिण एवं मध्य एशिया मामलों में एसिस्टेंट सेक्रेटरी हैं। इससे पहले वो अल्बानिया और किर्गिस्तान में अमेरिका के राजदूत रहे हैं। पुणे स्थित ‘ग्लोबल स्ट्रैटेजी फाउंडेशन’ के संस्थापक डॉ अनंत भागवत ने मई 2024 में कहा था कि भारत में डोनाल्ड लू घृणा की विषयवस्तु बनते हैं, क्योंकि वो भारतीय लोकतंत्र में हस्तक्षेप करने का प्रयास करते हैं। जनवरी 2023 में खबर आई थी कि भारत के विपक्षी नेता राहुल गाँधी ने अमेरिका स्थित ‘व्हाइट हाउस’ में एक गुप्त बैठक की थी। बताया जाता है कि डोनाल्ड लू भी वहाँ मौजूद थे। हालाँकि, भारत के विदेश मंत्रालय के पास इससे संबंधित कोई जानकारी नहीं थी।

अमेरिका पूरी दुनिया के मानवाधिकार का ठेका लेकर भी बैठा रहता है। डोनाल्ड लू ने भी भारत में मोदी सरकार के कार्यकाल में मानवाधिकार को लेकर चिंता जताई थी। भारत में कई लोगों के कान तब खड़े हो गए थे, तब लोकसभा चुनाव 2024 के बीच में डोनाल्ड लू यहाँ के दौरे पर पहुँचे। उस दौरान वो बांग्लादेश और श्रीलंका भी गए थे। डॉ अनंत भागवत ने तब कहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन का प्रशासन भारत के एक स्थिर सरकार नहीं चाहता है, क्योंकि मोदी सरकार के एक दशक में भारत की विदेश नीति मजबूत रही है, अपनी शर्तों पर चलती रही है, स्थिर रही है।

और हाँ, डोनाल्ड लू चुनाव के बीच राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली नहीं बल्कि तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई पहुँचते हैं जहाँ द्रविड़ राजनीति का बोलबाला है और भाजपा लड़ाई में नहीं रहती। तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK नेताओं की तरफ से ही देश को खंडित कर के एक अलग देश ‘द्रविड़नाडु’ की माँग होती रही है। अमेरिका की तरफ से एक बयान में कहा गया कि ‘दक्षिण भारत से द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने’ के लिए वो चेन्नई गए थे। वो बांग्लादेश भी गए थे, जहाँ शेख हसीना चौथी बार जीत कर लौटी थीं। बांग्लादेश में अमेरिकी राजदूत पीटर हास पर वहाँ की विपक्षी पार्टी BNP के समर्थन के आरोप लग चुके हैं, जिसने चुनाव का बहिष्कार किया था।

शेख हसीना के करीबियों का तब मानना था कि अमेरिका लगातार ढाका को चीन के खिलाफ लॉबिंग में शामिल करना चाहता है। इंडो-पैसिफिक में अमेरिका लगातार बांग्लादेश को पूरी तरह अपनी तरफ करने में लगा हुआ था। बांग्लादेश में भी मानवाधिकार को लेकर अमेरिका ने चिंताएँ जताई थीं, चुनाव से पहले। मार्च 2023 में जब अमेरिका की ‘सीनेट फॉरेन अफेयर्स कमिटी’ के समक्ष डोनाल्ड लू पेश हुए थे, तब भी उन्होंने भारत में मानवाधिकार को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव का न हों और ‘जारी मानवाधिकार हनन’ पर चिंता जाहिर की थी।

जम्मू कश्मीर को लेकर भी डोनाल्ड लू ‘चिंतित’

जबकि जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 व 35A को निरस्त कर उसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। इसके बाद वहाँ पत्थरबाजी की घटनाएँ कम हुई हैं, एक साल में 2 करोड़ से अधिक लोग पर्यटन के लिए पहुँचे हैं। लेकिन, अमेरिका को वहाँ चुनाव की चिंता है। डोनाल्ड लू ने कहा था, “हम पूरे देश में मुस्लिमों व अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भेदभाव की के साथ-साथ NGOs को प्रतिबंधित किए जाने की खबरों पर बारीकी से नज़र बनाए हुए हैं। ये महत्वपूर्ण है कि एक साझेदार के रूप में हम भारत में परेशान करने वाली घटनाओं को लेकर आवाज़ उठाएँ।” साथ ही ताइवान-भारत के संबंधों को लेकर भी डोनाल्ड लू ने बयान दिया था।

उन्होंने कहा था कि ताइवान के नियंत्रण वाले समुद्री क्षेत्र में भारत के जहाज देखे गए हैं और ये ताइवान की सुरक्षा को लेकर उसे आश्वासन देने के बीच प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। साफ़ है, अमेरिका एक तरह से भारत को चीन के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है। उन्होंने जम्मू कश्मीर में ‘बड़े पत्रकारों’ को गिरफ्तार किए जाने का दावा किया था। साथ ही कहा था कि अमेरिका इस मामले में भारत पर दबाव बनाएगा कि वो कश्मीरियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करे।

बता दें कि कश्मीर में अब तक 70 सरकारी कर्मचारी आतंकियों की मदद करने को लेकर बरख़ास्त किए जा चुके हैं। कार्रवाई उन्हीं पर की जाती है, जो देश के खिलाफ काम में लिप्त रहते हैं। जैसे, ‘कश्मीर वाला’ नामक मीडिया संस्थान के संपादक को जेल हुई क्योंकि फहद शाह ने आतंकवाद का महिमामंडन किया था। बताइए, क्या किसी अन्य देश को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार है? पाकिस्तान में भी अप्रैल 2022 में चुने हुए प्रधानमंत्री इमरान खान को अपदस्थ कर के अस्थायी सरकार बनाई गई जिसमें कई दलों का गठबंधन शामिल था।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका…

खुद इमरान खान आरोप लगा चुके हैं कि विदेशी हस्तक्षेप से उन्हें हटाया गया और इसमें डोनाल्ड लू का हाथ था। बताया जाता है कि यूक्रेन से युद्ध के बीच अमेरिका द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद इमरान खान उससे संबंध बढ़ा रहे थे, इसीलिए USA नाराज़ था। डोनाल्ड लू ने इस पर सवाल किए जाने पर इसे पूरी तरह झूठ और ‘कंस्पिरेसी थ्योरी’ बताया था। उन्होंने इस आरोप को एकदम नकार दिया था। इन सबसे पता चलता है कि दक्षिण एशिया में अमेरिका का ‘डीप स्टेट’ अपना हस्तक्षेप बढ़ाना चाहता है।

डोनाल्ड लू ने बांग्लादेश में ‘राजनीतिक सुधारों’ की भी बात की थी, साथ ही खालिदा जिया को अमेरिकी समर्थन पर वहाँ शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ ने आवाज़ उठाई थी। आज वहाँ ‘आवामी लीग’ के नेताओं को मारा जा रहा है। अब आता है श्रीलंका। श्रीलंका भी अमेरिका-चीन के खेल में फँस गया। हमने जुलाई 2022 में श्रीलंका में वही तस्वीरें देखी थीं जो आज बांग्लादेश में देख रहे हैं। तब श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन में घुस कर प्रदर्शनकारी स्विमिंग पुल में नहा रहे थे। श्रीलंका पर चीन का कर्ज बढ़ता चला जा रहा है, हुए वहाँ चीनी प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका बेचैन था।

इस साल डोनाल्ड लू ने दावा किया है कि श्रीलंका अब वापसी कर रहा है। श्रीलंका में भी विरोध प्रदर्शनों के परिणाम वही हुए थे, गोटाभया राजपक्षे को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना पड़ा था और देश छोड़ना पड़ा था। जबकि उनके भाई महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। आज कोलम्बो वेस्ट टर्मिनल पोर्ट के लिए अमेरिका फंडिंग कर रहा है। ‘नए’ श्रीलंका की तारीफ़ करते हुए डोनाल्ड लू ने भारत-बांग्लादेश को रोहिंग्या को लेकर चेताया था। बता दें कि रोहिंग्या घुसपैठिए एक बड़ी समस्या हैं भारत के लिए, वो यहाँ आकर अपराध करते हैं और कइयों ने भी फर्जी दस्तावेज तक बना लिए हैं।

USAID के माध्यम से श्रीलंका को वित्तीय सहायता दी गई। USAID ‘अंतरराष्ट्रीय विकास’ की संस्था है, हालाँकि, इस पर सत्ता परिवर्तन के लिए फंडिंग के आरोप भी लगते रहे हैं। अब सवाल उठता है कि क्या डोनाल्ड लू भारत में भी ऐसा ही कुछ करना चाहते हैं जो पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका में हुआ? भारत में ये बहुत मुश्किल है क्योंकि ये एक विशाल देश है जहाँ सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों की अपनी-अपनी अर्थव्यवस्था है। यहाँ हर क्षेत्र में लोगों की आय के स्रोत और प्राथमिकताएँ बदलती रहती हैं, कृषि ही एक ऐसा पेशा है जो पूरे देश को एक करता है।

भारत में मोदी सरकार से दिक्कत

फिर भी, अमेरिका का डीप स्टेट भारत में एक मजबूत मोदी सरकार की जगह गठबंधन वाली भाजपा विरोधी सरकार को प्राथमिकता देगा। इसके लिए माहौल बनाया जाना शुरू हो गया है। ‘अग्निवीर’ को लेकर भ्रम फैलाया गया, संसद में खुलेआम झूठ बोला गया। जाति जनगणना को लेकर हिन्दुओं को बाँटने का प्रयास किया गया। संसद में राहुल गाँधी ने कहा कि वो जाति जनगणना करा के रहेंगे। ‘किसान आंदोलन’ के दौरान हमने लाल किले पर खालिस्तानी झंडा देखा था, 1 साल तक दिल्ली की सीमाओं को घेर कर रखा गया था। आज भी कई किसान पंजाब-हरियाणा के शम्भू बॉर्डर पर बैठे हुए हैं।

ये सभी ऐसे मुद्दे हैं, जिनका इस्तेमाल कर के देश की जनता के एक बड़े वर्ग को भड़काया जा सकता है। पत्रकार हर विरोध प्रदर्शन पर सवाल पूछने पहुँच जाते हैं अमेरिकी राजनयिकों से, यहाँ तक कि कंगाल पाकिस्तान के पत्रकार भी UN में भारत के मुद्दों को लेकर बड़े चिंतित रहते हैं। खासकर जब अमेरिका ने डोनाल्ड लू जैसे अधिकारी को लगा रखा हो, तो शक की गुंजाइश तो रहती ही है। अब अल्बानिया में उनके कार्यकाल को ही ले लीजिए। उस दौरान भी उन्होंने वहाँ की सरकार को उखाड़ फेंकने की बात की थी। उन्होंने जनता को नेताओं से सवाल पूछने और सरकार बदल डालने के लिए कहा था।

अल्बानिया-किर्गिस्तान में भी राजदूत रहते दिखाया ‘कमाल’

संसदीय से लेकर न्यायिक सुधारों की बात करते हुए उन्होंने अल्बानिया के युवाओं को कहा था कि वो अपने अभिभावकों से अच्छा जीवन जीने के लिए अपनी सरकार पर दबाव बनाएँ। इतना ही नहीं, अमेरिकी राजदूत ने तब छोटे से देश अल्बानिया के कई शहरों में घूम-घूम कर युवाओं से बातचीत की थी। इसी तरह जब डोनाल्ड लू किर्गिस्तान में अमेरिकी राजदूत थे, तब वहाँ भी राजनीतिक तनाव का दौर चल रहा था। 2018 से 2021 तक वो वहाँ रहे, और किर्गिस्तान में उस दौरान एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ। जून 2019 में सांसदों ने तत्कालीन राष्ट्रपति सूरोनबे शिरिपोविच जीनबेकोव पर आपराधिक मामला चलाने के लिए वोट किया।

2020 में उन्हें आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा था, क्योंकि उनके खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन हुए थे। वहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। अक्टूबर 2020 में हुए चुनावों में धाँधली के आरोप लगे थे। बताया जाता है कि राष्ट्रपति सूरोनबे शिरिपोविच जीनबेकोव पर इस्तीफे को लेकर दबाव बनाने में अमेरिका का भी हाथ था। अल्बानिया में तो अभी भी वहाँ के प्रधानमंत्री एडी रामा को हटाने के लिए विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। कई शहरों में प्रदर्शनों को रोकने के लिए बल-प्रयोग करना पड़ा। इस तरह डोनाल्ड लू का कनेक्शन किर्गिस्तान-अल्बानिया में तनाव से भी है।

बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिन्दुओं को लेकर भारत चिंतित, मंदिरों-घरों-दुकानों पर हुआ है हमला, शेख हसीना दिल्ली में: विदेश मंत्री जयशंकर

बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत का स्टैंड साफ़ कर दिया है। विदेश मंत्री जयशंकर ने मंगलवार (6 अगस्त, 2024) को राज्यसभा में इस संबंध में बयान दिया। उन्होंने बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति और प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत आने को लेकर जानकारी दी।

विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, “भारत और बांग्लादेश के दशकों से करीबी रिश्ते हैं। सभी राजनीतिक दल बांग्लादेश में हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता को लेकर चिंतित हैं। जनवरी, 2024 के बांग्लादेश चुनाव के बाद लगातार मतभेद, ध्रुवीकरण और तनाव बढ़ रहा था। इसके बाद यहाँ जून, 2024 एक छात्र आन्दोलन चालू हो गया।”

उन्होंने आगे बताया, “इस प्रदर्शन के दौरान बांग्लादेश में काफी हिंसा हुई और यह जुलाई महीने में जारी रही। हम इस दौरान शांत रहे और बातचीत से मुद्दा सुलझाने की सलाह देते रहे। 21 जुलाई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी बांग्लादेश में स्थिति नहीं बदली। इसके बाद लिए गए निर्णय से प्रदर्शनकारी और भड़क गए।”

विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, “इसके बाद प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री हसीना के इस्तीफे पर अड़ गए। 4 अगस्त, 2024 को स्थितियाँ बिगड़ गईं। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर हमले किए और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। इससे हिंसा बढ़ी। सरकार में शामिल लोगों को निशाना बनाया गया।”

विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया, “चिंता कि बात यह है कि इस दौरान अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ी दुकानें, मकान और घर भी कई शहरों में निशाने पर आए। अभी हिंसा कितनी है, इसकी जानकारी नहीं है। 5 अगस्त, 2024 को कर्फ्यू के बावजूद प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए।”

विदेश मंत्री जयशंकर ने शेख हसीना के भारत आने और इस्तीफ़ा देने के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, “हमारी समझ से सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों के साथ बैठक के बाद प्रधानमंत्री हसीना ने इस्तीफ़ा देने का मन बनाया। उन्होंने भारत से जल्द ही कुछ समय के लिए भारत आने की अनुमति माँगी। इसी दौरान एक फ्लाइट की अनुमति भी बांग्लादेश द्वारा माँगी गई।”

राज्यसभा में विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया कि शेख हसीना सोमवार (5 अगस्त, 2024) को भारत आ गईं। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में परिस्थितियाँ बदल रही हैं। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में लगभग 19,000 भारतीय हैं, इनमें से 9000 छात्र हैं। उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में छात्र पहले ही भारत लौट आए थे।

विदेश मंत्री ने बताया कि भारत सरकार बांग्लादेश में हिन्दुओं की स्थिति को लेकर चिंतित है। उन्होंने कहा, “हम अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर भी नजर रख रहे हैं। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई संगठन सामने आए हैं, ऐसी खबरें हैं। हम इसका स्वागत करते हैं, लेकिन हम तब तक चिंतित रहेंगे जब तक कानून-व्यवस्था सही नहीं हो जाती। इस स्थिति को देखते हुए हमारे सीमा सुरक्षा बलों को भी विशेष रूप से सतर्क रहने का निर्देश दिया गया है।”

10000+ हिंदुओं को काट डाला था सिर्फ 2 दिनों में… इस्लामी छात्रों ने ही तब भी मचाया था आतंक: बांग्लादेश का छात्र आंदोलन कट्टर इस्लाम से अलग नहीं

बांग्लादेश में आज जो हिंसा हो रही है उसे छात्र प्रदर्शन, छात्र विद्रोह, छात्रों का रोष जैसे शब्द कहकर जायज दिखाने का काम वामपंथी और कट्टर इस्लामी करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो ‘छात्र’ शब्द जोड़ देने से जो हिंसा पूरे बांग्लादेश में हुई है उससे दुनिया आँख मूंद लेगी और सवाल नहीं उठेंगे।

किसी भी देश में छात्रों की बड़ी संख्या होना उनके लिए गौरव की बात होती है लेकिन यही छात्र यदि उपद्रवी हो जाएँ और उसी देश की संपत्ति को तोड़ने फोड़ने लगें, अपनी बात मनवाने के लिए लोगों के कत्लेआम पर उतर आएँ तब इन्हें छात्र कैसे माना जाएगा?

बांग्लादेश में छात्रों के नाम पर भड़के प्रदर्शन ने इतना भयंकर रूप लिया कि लोकतांत्रित ढंग से निर्वाचित हुई शेख हसीना को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी और वामपंथी ये कहते दिखे कि छात्रों ने लोकतंत्र को बचा लिया… विरोध था तो कुछ समय पहले जब बांग्लादेश में चुनाव हुए तब नाराजगी दिखाते हुए हसीना सरकार को सत्ता से निकाला जा सकता था। आज इस तरह प्रधानमंत्री आवास में भीड़ का घुसना कितना उचित है इसे सोचकर देखिए।

आप हिंसक भीड़ के जिस कृत्य को छात्रों का प्रदर्शन कहकर ढाँकने का प्रयास कर रहे हैं वो यदि लोकतंत्र है तो इसका मतलब किसी भी व्यक्ति का किसी के घर में घुसकर उसे खदेड़ना लोकतंत्र कहलाया जाने लगेगा… प्रधानमंत्री पद की गरिमा यदि कोई न समझे, इंसानी जान की कीमत कोई न समझे, देश की संपत्ति का मूल्य कोई न समझे, हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाए तो आप उसे छात्र कहेंगे?

छात्रों के नाम पर खेले जाने वाला खूनी खेल कोई नया नहीं है। इतिहास में कई बार इस शब्द का प्रयोग करके जमीनें लाल हुई हैं। आज जो शेख हसीना तथाकथित छात्र प्रदर्शन के कारण बांग्लादेश छोड़ भागी हैं कभी खुद उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान भी अपने छात्र दिनों में ऐसे प्रदर्शनों में खूब शामिल हुए थे।

आपको जानकर हैरानी होगी कि जिन हिंदुओं के कारण 1971 में शेख मुजीब उर रहमान की जान बची थी उन्हीं शेख मुजीबुर को अपने छात्र जीवन में मंजूर नहीं था कि सत्ता हिंदुओं के साथ साझा हो। उनका हमेशा मानना था कि वर्चस्व मुस्लिमों का रहना चाहिए। उनकी इसी सोच की वजह से उन्होंने छात्र जीवन से ही मुस्लिम लीग में बढ़-चढ़कर भाग लेना शुरू कर दिया था। उनके साथ और छात्र लोग भी मुस्लिम लीग में जुड़े। यही वजह बाद में यही मुस्लिम लीग जब टू नेशन थ्योरी पर अड़ी और डायरेक्ट एक्शन डे पर मुस्लिमों ने सड़कों पर उतरकर हिंदुओं को मारना शुरू किया तो उसमें शेख मुजीबुर रहमान का नाम भी आया।

दरअसल, छात्र जीवन में शेख जिसे अपना राजनीतिक गुरु मानते थे वो बंगाल में डिप्टी मेयर हुसैन शहीद सुहारवर्दी थे। सुहारवर्दी ने डायरेक्ट एक्शन डे (16 अगस्त 1946) पर हथियार लेकर मुस्लिमों के सड़कों पर उतरने का जब समर्थन किया तब भी शेख मुजीब उन्हीं के साथ जुड़े थे।

बंगाल में एक तरफ से हिंदुओं का नरंसहार 16 अगस्त से 18 अगस्त 1946 तक चलता रहा। मुस्लिम भीड़ सड़कों पर उतरी। चुन चुनकर हिंदुओं को मारा काटा गया। कोई मरने वाले हिंदुओं की संख्या 5 हजार के आसपास बताता है तो कोई 10 हजार। लेकिन उस समय न सुहारवर्दी ने विरोध किया और न ही शेख मुजीब ने।

अंत में 18 अगस्त को जब गोपाल मुखर्जी ने हिंदुओं को मुस्लिमों से भिड़ने के लिए हथियार दिए और प्रतिरोध शुरू हुआ तब सुहारवर्दी ने शेख मुजीब को भेज अनुरोध करवाया कि ये हिंसा रोक दी जाए क्योंकि बात उनके पद पर बन आई थी।

ये कोई अकेली घटना नहीं है जब शेख मुजीब का नाम हिंसा में सीधे तौर पर जुड़ता बताया जाता हो। रिपोर्टेस बताती हैं छात्र दिनों में कट्टरपंथी विचारों के लिए पहचाने जाने वाले शेख मुजीब पर हत्या, लूटपाट, सांप्रदायिक हिंसा सबके आरोप लगे थे, लेकिन हर आरोप से वो बचे क्योंकि सुहारवर्दी ने उनपर अपना हाथ रखा हुआ था।

कुल मिलाकर आज के समय में जो हालात बांग्लादेश में भड़के हैं और जिस तरह से उपद्रवियों को छात्र कहकर समर्थन किया जा रहा है वो कोई नया तरीका नहीं है हिंसा को जायज ठहराने का। भारत में भी हमने पिछले कुछ सालों में देखा है कि कैसे प्रदर्शन के नाम एक वर्ग को भड़काकर राजनैतिक हित साधे जाते हैं और बांग्लादेश में भी यही हुआ है।

16 अगस्त 1946 को क्या हुआ था

आज छात्र प्रदर्शन के नाम पर खुलकर हिंदुओं के मंदिरों को नोआखली (पहले भारत का हिस्सा) में निशाना बनाया जा रहा है। ये वही नोआखली है जहाँ 1946 में डायरेक्ट एक्शन डे के बाद 5000 हिन्दुओं (कहीं 10 हजार) के मारे जाने की बात कही जाती है, लेकिन आँकड़ा इससे कहीं बहुत ज्यादा है। मौजूदा रिपोर्ट बताती हैं कि बंगाल में उस दिन मुस्लिम भीड़ द्वारा 48 घंटों तक बेरोकटोक हत्याएँ और बलात्कार किए जा रहे थे।

ऐसा कहा जाता है कि सेना को तभी बुलाया गया जब लगा कि यूरोपीय लोगों पर हमला हो सकता है। लेखक निषाद हजारी के अनुसार, “कोई नहीं जानता कि कलकत्ता में हुई इस घटना में कितने लोग मारे गए। कई शव हुगली नदी में बह गए या आग में जल गए। आम तौर पर स्वीकृत अनुमान है कि पाँच हज़ार कलकत्तावासी मारे गए, जबकि अन्य 10 से 15 हज़ार लोगों की हड्डियाँ टूट गईं, अंग कट गए या शव जल गए।”

गोपाल मुखर्जी का विरोध और तब रुके इस्लामी कट्टरपंथी

हजारों हत्याएँ देखने के बाद 18 अगस्त 1946 को स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार से आने वाले गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय ने हिंदुओं पर इस राज्य प्रायोजित मुस्लिमों की हिंसा के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया। उनके साथ जुगल चंद्र घोष, बसंत (पहलवान) और विजय सिंह नाहर शामिल हुए। सबने मिलकर भारत जातीय वाहिनी का गठन किया, एक ऐसा संगठन जिसने हिंदुओं को पिस्तौल (अमेरिकी सैनिकों से प्राप्त), लाठियाँ, भाले, चाकू, तलवारें और एसिड बम जैसे हथियारों से लैस किया। कलकत्ता और उसके आसपास के इलाकों की विभिन्न व्यायाम समितियों के सैकड़ों हिंदू (बंगाली, सिख, ओड़िया, बिहारी और यूपीवासी) आर्य समाजियों और हिंदू महासभा के सदस्यों के साथ प्रतिरोध में हिस्सा लेने के लिए आगे आए। 

कोलकाता में जैसे-जैसे हिंदू प्रतिरोध मजबूत होता गया, मुस्लिम हताहतों की संख्या बढ़ती गई और जल्द ही इस्लामी कट्टरपंथी घबरा गए और शहर छोड़कर भागने लगे। मगर झड़पें करीब एक हफ़्ते तक जारी रहीं। 18 से 20 अगस्त तक गोपाल पाठा और दूसरे हिंदू नेताओं ने खास तौर पर उन इस्लामी कट्टरपंथियों को तलाशा जिन्होंने हिंदुओं के बलात्कार और हत्याओं में हिस्सा लिया था। जिसके बाद मुस्लिम लीग से जुड़े एक कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम नेशनल गार्ड के सदस्य बड़ी संख्या में मारे गए, हालाँकि प्रतिरोध के दौरान हिंदुओं ने किसी भी मुस्लिम महिला या बच्चे को नहीं छुआ। 20 अगस्त तक सुहरावर्दी को एहसास हो गया था कि वह कलकत्ता से हिंदुओं को नहीं हटा सकता और कलकत्ता के साथ-साथ पूरे बंगाल को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का उसका सपना पूरा नहीं होगा। अंत में उसने हार मान ली।

खुद को और अपनी सरकार को बचाने के लिए, सुहरावर्दी ने जीजी अजमेरी और शेख मुजीबुर रहमान (बांग्लादेश के संस्थापक और मुस्लिम लीग के सदस्य) के साथ मिलकर गोपाल मुखर्जी से हत्याओं को रोकने की अपील की। ​​गोपाल मुखर्जी इस शर्त पर सहमत हुए कि मुस्लिम लीग पहले अपने सदस्यों से हथियार डालने और हिंदुओं की सभी हत्याओं को रोकने का वादा करवाएगी। अंततः 21 अगस्त को बंगाल सीधे वायसराय के शासन में आ गया और शहर में सेना तैनात कर दी गई। अपनी कुर्सी बचाने के लिए सुहरावर्दी ने गोपाल मुखर्जी की सभी शर्तें मान ली थीं। हालाँकि 21 अगस्त 1946 को सेना तैनात होने के बाद, ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड आर्चीबाल्ड वेवेल ने सुहरावर्दी और उनकी मुस्लिम लीग सरकार को बर्खास्त कर दिया।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की 54+ घटनाएँ: घर जलाए, दुकानें लूटीं, मंदिरों में की तोड़फोड़, हिन्दुओं पर बरपाया कहर

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने के साथ ही लगातार हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले जारी हैं। सोमवार (5 अगस्त, 2024) को बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने इस दौरान देश में हिंदू मंदिरों, घरों और दुकानों पर हुए हमलों की एक लिस्ट जारी की है।

एक्स (पहले ट्विटर) हैंडल वॉयस ऑफ बांग्लादेशी हिंदू के अनुसार, यह सभी हमले मात्र पाँच घंटे के भीतर हो गए। हालाँकि, हमलों की असल संख्या इस लिस्ट से कहीं अधिक हो सकती है। इस संस्था द्वारा जारी लिस्ट में 54 हमलों के बारे में बताया गया है।

इस लिस्ट के अनुसार, शेरपुर में श्रीबर्डी उपजिला युवा एकता परिषद के अध्यक्ष के घर पर हमला किया गया, तोड़फोड़ हुई और लूटपाट भी की गई। इसके अलावा खुलना के रूपसा थाना क्षेत्र के हाईगेट गाँव में श्यामल कुमार दास और स्वजन कुमार दास के घर पर हमला हुआ।

खुलना शहर के ही टूटपारा में खुलना जिला एकता परिषद के अध्यक्ष बिमन बिहारी अमित और युवा एकता परिषद के अध्यक्ष अनिमेष सरकार रिंकू के घर पर हमला हुआ। डाकोप के आमतली बनिसंता में जयंत गेन के घर और कोयरा के दारपारा में भी अल्पसंख्यकों पर हमला हुआ। उनके घरों में तोड़फोड़ की गई और लूटपाट की गई।

लक्ष्मीपुर में पूजा परिषद के नेता और व्यवसायी दीपक साहा के घर और कार्यालय पर हमला कर तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। कोषोरगंज के कुलियारचर के अगरुपुर गाँव में नकुल कुमार और सुहसंत के घरों को जलाया गया। चटगाँव के रौज़ान में उज्जल चक्रवर्ती के घर पर हमला और लूटपाट की गई।

जसूर के अभयनगर के धोपडी पालपारा गाँव में तीन घरों को जला दिया गया। बघारपारा के नारिकेल बरिया में बाबुल साहा के गोदाम समेत 22 दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की गई, केशवपुर, बेचपारा और बरमनपारा में अल्पसंख्यकों के घरों पर हमला किया गया।

सतखैरा में भी अल्पसंख्यकों की दुकानों को लूटा गया, कोलारोआ में जिला एकता परिषद के अध्यक्ष विश्वजीत साधु के घर पर हमला कर लूटपाट की गई। एकता परिषद के केंद्रीय सहायक संगठन सचिव डॉ. सुब्रत घोष के घर पर हमला कर इस्लामी कट्टरपंथियों ने उसे जला दिया।

शैस्तागंज बाजार, हबीगंज में उपजिला एकता परिषद के अध्यक्ष असित बरन दास की दुकान पर हिंसक हमला, तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। नरैल के लोहागरा में अल्पसंख्यकों के घरों पर हमला किया गया, तोड़फोड़ और लूटपाट भी हुई। अब यहाँ के हिन्दू बेघर हैं।

बोगरा में हिंसा की कई घटनाएँ हुई हैं। बरगोला के तिलपट्टी में अल्पसंख्यकों की 5-7 दुकानों पर हमला, तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। इसी तरह, दुपचांचिया उपजिला के सहपुकुर गाँव में डॉ गौतम कुमार मंडल के घर पर हमला किया गया और लूटपाट की गई।

पटुआखाली में कुआकाटा के राधा गोविंद मंदिर पर हमला हुआ और तोड़फोड़ की गई। अनंत मुखर्जी के घर पर हमला किया गया, तोड़फोड़ की गई और लूटपाट भी हुई। सदर, पंचगढ़ के वार्ड 2 और 3 में अल्पसंख्यकों के घरों को निशाना बनाया गया, तोड़फोड़ की गई और लूटपाट की गई।

नोआखली के हटिया के सोनादिया में सहदेव रॉय के घर पर हमला और लूटपाट हुई। ठाकुरगाँव के सदर में अल्पसंख्यकों के घरों पर हमला किया गया, तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। इसके अलावा, पीरगंज के वार्ड 2 में श्मशान मंदिर पर हमला किया गया और उसे इस्लामी कट्टरपन्थियों ने जला दिया।

झेनैदाह में भारी हिंसा हुई। यहाँ चकलापारा नगरपालिका में 10 अल्पसंख्यक परिवारों के घरों पर लगातार हमले, तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। कोटचंदपुर में भी अल्पसंख्यकों की दुकानों पर हमला किया गया और लूटपाट की गई। हथुरिया, बेरा थाना और पबना में अल्पसंख्यकों के घरों पर हमला हुआ और यहाँ भी तोड़फोड़ और लूटपाट की गई।

नेत्रकोना में रामकृष्ण मिशन और सदर में इस्कॉन मंदिर पर हमला किया गया और तोड़फोड़ की गई। भीड़ ने अल्पसंख्यकों के घरों पर भी हमला किया, तोड़फोड़ की और लूटपाट की। सदर, मुंशीगंज में अल्पसंख्यकों के घरों पर हमला किया गया, तोड़फोड़ की गई और लूटपाट की गई।

चांदपुर के फरीदगंज उपजिला में हरिपद दास के घर पर हमला किया गया, तोड़फोड़ की गई और लूटपाट की गई। नारायणगंज के अराईहाजर में राम डॉक्टर के घर पर हमला करने और तोड़फोड़ करने की कोशिश की गई।

नेत्रकोना में रामकृष्ण मिशन और सदर में इस्कॉन मंदिर पर हमला हुआ। इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने अल्पसंख्यकों के घरों पर भी हमला किया, तोड़फोड़ की और लूटपाट की। चांदपुर के फरीदगंज उपजिला में हरिपद दास के घर पर हमला किया गया, तोड़फोड़ की गई और लूटपाट की गई।

हिन्दुओं पर हमले के वीडियो भी वायरल

इस लिस्ट के अलावा सोशल मीडिया पर कई वीडियो और तस्वीरें वायरल हुई हैं। इनमें बांग्लादेश में हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों पर सरकार के खिलाफ हिंसा की आड़ में हमले किए गए हैं। ऑपइंडिया सभी वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं कर सका।

एक्स हैंडल राजू दास (RajuDas777) ने ऐसे कई वीडियो पोस्ट किए हैं। एक वीडियो में बांग्लादेश के बोगरा जिले के गबताली उपजिला में बामुनिया पालपारा हिंदुओं के घरों पर भीड़ को हमला करते देखा गया।

एक अन्य पोस्ट में राजू दास ने बांग्लादेश के पिरोजपुर जिले के मथबरिया पुलिस स्टेशन क्षेत्र में संकट में फंसी एक हिंदू लड़की का वीडियो शेयर किया। वीडियो में लड़की बांग्ला भाषा में मदद की गुहार लगाती दिख रही है।

एक और वीडियो में, चटगाँव के नवग्रह बाड़ी स्थित शनि मंदिर को दंगाइयों ने जला दिया।

इस्कॉन इंडिया के प्रवक्ता युधिष्ठिर गोविंद दास ने एक पोस्ट में कहा, “मुझे मिली जानकारी के अनुसार, मेहरपुर (खुलना डिवीजन) में हमारे एक इस्कॉन केंद्र को भगवान जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा देवी की मूर्तियों के साथ जला दिया गया। केंद्र में रहने वाले 3 भक्त किसी तरह भागने में सफल रहे और बच गए।”

विसेग्राद 24 द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में, इस्लामी कट्टरपंथियों को हिंदुओं के घरों को घेरते और अंदर मौजूद लोगों को धमकाते हुए देखा गया।

बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार के अनुसार, देश के भीतर 27 जगहों पर हिंदू समुदाय के घर हमले की चपेट में आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लालमोनीहाट सदर उपजिला के तेलीपारा गांव और थाना रोड में प्रदीप चंद्र रॉय और मुहिन रॉय के घर में गोदाम और आबादियां की गईं। कालीगंज उपजिला, चंद्रपुर गांव में चार हिंदू परिवारों के घरों पर हमला किया गया।

हाथीबंधा उपजिला के पुरबो सरदुबी गांव में 12 हिंदू घरों को जला दिया गया, जबकि बांधवगढ़ के सदर उपजिला में कई हिंदू घरों को जला दिया गया। दिनाजपुर में दस हिंदू घरों पर हमला और रेल बाजार में एक मंदिर पर हमला किया गया। खानसामा उपजिला में तीन हिंदू घरों पर हुआ हमला।

खुलना में, ओइक्या काउंसिल के नेताओं और अन्य लोगों के घरों में सामान रखा गया। बरिशाल के गौरानादी में भीड़ ने आदिवासी अधिकारी के घर पर हमला कर दिया। इसी समय, बोगुरा, पटुआखली, शेरपुर, नरसिंगडी, किशोरगंज, चटगाँव, जोशोर, सतखिरा, हबीगंज और नरैल में भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आई हैं।

महिला पूर्व प्रधानमंत्री की ब्रा और ब्लाउज लहरा रही बांग्लादेश की ‘युवा शक्ति’: फ्रिज में रखी मछली से लेकर डस्टबिन तक लूट ले गए, एक साड़ी पहन कर भी निकला

बांग्लादेश के जिन प्रदर्शनकारियों को भारत के वामपंथी/इस्लामी पत्रकार ‘युवा शक्ति’ बताते नहीं थक रहे, उन्हीं प्रदर्शनकारियों को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के घर में घुस कर लूटपाट करते हुए देखा गया। इतना ही नहीं, प्रदर्शनकारियों ने इस दौरान पूर्व महिला प्रधानमंत्री के ब्रा और ब्लाउज भी लहराए। कैमरे के सामने महिलाओं का अंतवस्त्र लहराने वाले आखिर कैसे ‘युवा शक्ति’ कहे जा सकते हैं? इन्हें ‘लोकतंत्र’ के लिए लड़ने वाला बताया जा रहा है। कट्टर इस्लामी भीड़ के मन में महिलाओं के प्रति कोई सम्मान नहीं है, शायद तभी उन्होंने महिलाओं के अंतःवस्त्र कैमरे के सामने लहराए।

शेख हसीना फ़िलहाल भारत के गाजियाबाद में रुकी हुई हैं, जहाँ हिंडन एयरपोर्ट पर उनका विमान सोमवार (5 अगस्त, 2024) को लैंड हुआ। उन्होंने प्रधानमंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया है। पिछले 15 वर्षों से वो बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज थीं। एक व्यक्ति को उनके ढाका स्थित आवास से उनकी साड़ी पहन कर निकलते हुए देखा गया। उसने बाल्टी में महिलाओं के कपड़े रखे हुए थे। महिलाओं के अंतःवस्त्र तो छोड़ दीजिए, मछली और डस्टबिन तक प्रधानमंत्री आवास से लूट लिया गया। ये लोग रेफ़्रिजेरेटर से एक बड़ी भी मछली को चुरा कर ले गए।

साथ ही ‘गण भवन’ में रखे कुछ फर्नीचरों में आग लगा दी गई तो कुछ ये प्रदर्शनकारी अपने साथ उठा कर ले गए। पीएम आवास से पालतू जानवरों, टेलीविजन सेट, कंबल, जिम के उपकरण और महँगे सूटकेस तक लूट लिए गए। स्थानीय पत्रकारों की मानें तो लगभग डेढ़ हजार लोग ‘गण भवन’ में घुसे हुए थे। 76 वर्षीय शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद अब फ़ौज वहाँ नियंत्रण में है, फ़ौज ही तय करेगी कि नई अंतरिम सरकार का स्वरूप क्या होगा। आरक्षण के विरोध में शुरू हुए आंदोलन ने आखिरकार उनके कार्यकाल का अंत कर दिया।

खबर ये भी आ रही है कि काम के लिए पश्चिम बंगाल आए कई बांग्लादेशी नागरिक ‘अच्छे दिनों’ की आशा में वापस लौट रहे हैं। भारत में पूरी स्थिति की समीक्षा के लिए ‘कैबिनेट कमिटी ऑफ सिक्योरिटी’ की बैठक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई। साथ ही सर्वदलीय बैठक भी बुलाई गई। राहुल गाँधी ने भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को लेकर चिंता जताई। बांग्लादेश की स्थिति पर संसद में केंद्रीय विदेश मंत्री S जयशंकर भी अपनी बात रखेंगे।

सिर्फ अल्लाह का नाम नहीं रहेगा, न ही ताज/तख्त उछाल पाओगे: वाजिद हो या खान… सिर्फ भारत के नागरिक बन कर रहो, किताब नहीं संविधान से चलो

बांग्लादेश। पड़ोसी मुल्क। बड़ी मुश्किल में। कारण है इस्लामी मानसिकता। प्रधानमंत्री को भागना पड़ गया। उनका ब्रा-साड़ी सब लूट लिया। नहीं भागतीं तो न जाने क्या होता। सब अल्लाह-हू-अकबर वाली भीड़ ने किया। वही भीड़, जिसकी आग में इंग्लैंड-यूरोप जल रहा।

(a) तानाशाही की हार (b) लोकतंत्र जीत गया (c) जनता की लड़ाई – इस तरह के शब्द या वाक्य बांग्लादेश की तबाही के बाद सुन-पढ़-देख रहे हैं तो समझिए वो किसी कट्टर इस्लामी (देश-दुनिया में चाहे जहाँ भी हैं) और वामपंथी भेड़िए के हैं। शांति/विकास/उन्नति/तरक्की आदि इनकी समझ से बाहर है। तबाही, बर्बादी, जुल्म, कत्ले-आम से इस कौम (इस्लामी-वामी) को मोहब्बत है।

भूमिका खत्म। बात मुद्दे की। वाजिद खान नाम का एक इस्लामी आदमी है, खुद को पत्रकार भी लिखता है। इस्लामी मतलब कट्टर। उसके लिए अल्लाह ही आखिरी है। अल्लाह उसके लिए आखिरी हो, इसमें कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत तब है, जब वो कहता है कि अल्लाह के नाम के अलावे और कुछ बचेगा ही नहीं। इतनी बड़ी हिम्मत? औकात से बढ़कर बातें क्यों? और क्यों नहीं बचेगा अल्लाह के नाम के अलावे कुछ भी? चीन में तो नामोनिशान मिटा दिया जा रहा है!

ट्विटर पर खुद को अमेरिका में रहने वाला बताता है वाजिद खान। बांग्लादेश पर इस्लामी कब्जे की खुशी में ट्विटर पर ही फैज की नज्म लिख डालता है। फैज को ढंग से जान लेता वाजिद तो बेऔकात बातें नहीं लिखता। इस्लामी मुल्कों की हकीकत पढ़ लेता वाजिद तो ‘अल्लाह के नाम के अलावे और कुछ बचेगा ही नहीं’ के रोमांस भरे गाने नहीं गुनगुनाता। इस्लामी मानसिकता के कारण इस्लामी मुल्क से ही भागे मुस्लिमों को शरण देने वाले देशों में इनके प्रति कितना गुस्सा भरा पड़ा है, यह समझ लेता वाजिद तो घर-वापसी कर चुका होता।

तो आखिर था क्या फैज? फैज एक फट्टू कवि था। कट्टर इस्लामी भी। वामपंथ की चादर ओढ़े हुए। इस्लामी सरकार के टुकड़ों पर पलने वाला, दुम हिलाने वाला कवि था फैज। कैसे?

  • जब भारत का बँटवारा हुआ, फैज अहमद फैज ने मजहब के आधार पर बने देश को चुना। असली वामपंथी होता तो इस्लामी मुल्क क्यों जाता?
  • जब पाकिस्तान चला ही गया तो वहाँ के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर चुप्पी क्यों साधे रखा? वामपंथी तो अपने आप को ‘सेकुलर’ कहते हैं, कहाँ घुसा ली थी अपने अंदर की क्रांति वाली आवाज?
  • ‘सब दरगाह उछाले जाएँगे, सब मस्जिद गिराए जाएँगे… बस नाम रहेगा भगवान राम का’ – ऐसी पंक्तियों की रचना क्यों नहीं कर पाया फैज? वामपंथी होकर भी ‘अल्लाह’ के नाम को लेकर झूलता क्यों रह गया?
  • जिस पाकिस्तानी सरकार ने अहमदियों को मुस्लिम मानने तक से इनकार कर दिया, उसी इस्लामी सरकार में मंत्री बन कर मलाई क्यों चापते रहा फैज? अहमदियों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ नज्म लिखने में क्या अल्लाह ने उसके हाथ बाँध रखे थे?

फैज एक फट्टू कवि था। जगह-जगह फैज की नज्म चेपने और खुद को क्रांति का सिपाही कहने वाले लोग भी फट्टू हैं। इसलिए वाजिद खान जैसे फट्टुओं को औकात में रह कर बात करनी चाहिए। औकात यह है कि चाहे कयामत की रात आए या बरसात की… वो रात कभी नहीं आने वाली, जब सिर्फ और सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का।

खुद अमेरिका में रह कर (शायद 100% झूठ ही हो यह) जो बांग्लादेश में शरिया के सपने देख रहा है, उससे बड़ा फट्टू और कौन होगा? सीरिया में रहो, इस्लाम को बुलंद करो। फिलिस्तीन जाके अपने मरते भाईजानों को पानी पिलाओ, ब्रदरहुड के दूध का कर्ज और कैसे उतारोगे बे? अमेरिका में रह कर ट्वीट करते हुए! लानत है तेरे जैसे इस्लाम के सिपाही पर! फट्टू! अल्लाह के अलावे बहुत सारे सुंदर नाम हैं। अपने और भाईजानों की तरह घरवापसी कर लो। दुनिया सुंदर दिखेगी। छाती में बम बाँध के फटने से 72 हूर नहीं मिलते मूर्ख।

घटना बांग्लादेश में होती है। इस्लामी पत्रकार रहता अमेरिका में है। काम अलजजीरा (मतलब अंग्रेजी खबरें) के लिए करता है… लेकिन ट्वीट हिंदी में। न उर्दू-फारसी-अरबी-बांग्ला, न ही अंग्रेजी में। इसका मतलब क्या हुआ? भारत में रह रहे लोगों को भड़काना। कैसे लोगों को? भारत में रह रहे ऐसे लोग, जो इस देश को अपना देश नहीं मानते। मजहब उनके लिए सर्वोपरि है। संविधान से ऊपर वो एक किताब को रखते हैं। यहीं पर चूक जाता है वाजिद खान जैसा लोग। ऐसे लोगों के लिए एक ही सलाह – वाजिद हो या खान… सिर्फ भारत के नागरिक बन कर रहो, कायदे में रहोगे। संविधान को ही आखिरी किताब मानो, फायदे में रहोगे।

और हाँ! एक बात और बेऔकात इस्लामी वाजिद खान। “एक दिन फ़िलिस्तीन भी आज़ाद होगा” तेरा ख्वाब है। ख्वाब देखने पर पाबंदी भी नहीं। लेकिन इजरायल जब मार-मार के फलावर बना देता है, तब अपने फिलिस्तीनी इस्लामी आतंकियों की लाशों के साथ रोया मत करो। सोशल मीडिया पर सूअरों की लाश का तमाशा अच्छा नहीं लगता। सनातन में घरवापसी करने में कोई समस्या (हमारी ओर से कोई पाबंदी नहीं) है तो इजरायल भी जा सकते हो या चीन भी। बस मजहब छोड़ना होगा, वरना वो लोग तो ऐसे भी छुड़वा देंगे।

बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्या, मंदिर जला रहे इस्लामी, जान बचा भाग रहीं औरतें-बच्चियाँ: बांग्लादेशी अखबार में खबर, कट्टरपंथियों को बचाने मोहम्मद जुबैर बता रहा झूठ

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे और देश छोड़ने के बीच इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा जारी है। पूरे बांग्लादेश में अलग-अलग शहरों में हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है। इस्लामी कट्टरपंथी हिन्दुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों को नष्ट कर रहे हैं। कई जगह से हिन्दू घरों में लूटपाट और हिंसा की खबरें हैं। इस बीच भारत में बैठा इस्लामी गैंग मुस्लिम कट्टरपंथियों के इन कारनामों को मिटाने में जुट गया है।

जहाँ बांग्लादेश से लगातार हिन्दुओं पर हमले की खबरें आईं है वहीं मोहम्मद जुबैर इस्लामी कट्टरपन्थियों की हिंसा को झुठलाने में जुट गया है। जुबैर ट्विटर पर फोटो डाल कर बता रहा है कि बांग्लादेश में मुस्लिम हिन्दू मंदिरों को बचाने में लगे हैं। उसका दावा है कि यह सब बाहर बैठ कर मंदिरों पर होने वाले हमलों को रोक रहे हैं।

जुबैर के इन दावों की हवा बांग्लादेशी मीडिया ने ही निकाल दी है। जुबैर से पूछा जा रहा है कि मुस्लिम आखिर किनसे इन हिन्दू मंदिरों को बचा रहे हैं और हमला करने वाले कौन हैं। लोगों ने प्रश्न उठाए कि यदि इस्लामी कट्टरपंथी ही हमला कर रहे हैं तो उन्हें मुस्लिम कैसे बचा रहे हैं।

बांग्लादेशी मीडिया हिन्दुओं पर हमले की खबरें बता रहा है। बांग्लादेश की प्रमुख समाचार वेबसाइट द डेली स्टार के अनुसार, देश में 5 अगस्त, 2024 को कम से कम 27 जगहों पर हिन्दुओं को निशाना बनाया गया। उनके दुकान, मंदिर और घर तोड़े गए। एक हिन्दू पार्षद की हत्या कर दी गई। एक हिन्दू पत्रकार भी मार दिया गया।

बांग्लादेश के कालीगंज में 4 हिन्दुओं के घर लूटे गए। उनके घर में तोड़फोड़ हुई। लालमोनिरहाट में भी कई हिन्दुओं की दुकानों और मकानों पर हमला हुआ। हतिबंधा में हिन्दुओं के 12 घरों को आग के हवाले कर दिया गया। दिनाजपुर में भी हिन्दुओं के कई मकान तोड़े गए हैं। कई मंदिरों पर ही हमला हुआ और इनमें मूर्तियाँ तोड़ी गईं। बांग्लादेश के बड़े तटीय शहर खुलना में भी हिन्दुओं के घरों में लूटपाट और तोड़फोड़ हुई।

बांग्लादेश के खुलना में भी इस्कॉन मंदिर को भी जला दिया गया, यहाँ रखी मूर्तियाँ भी तोड़ दी गईं। इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस मंदिर में हिन्दू समुदाय के छुपने के बाद हमला किया। शरण लेने वाले यहाँ से भाग गए लेकिन मूर्तियों को काफी नुकसान पहुँचाया गया। इसके अलावा मौलवी बाजार में भी काली मंदिर पर हमला किया गया। इस मंदिर को आग लगा दी गई है। ट्विटर पर डाली गई एक वीडियो में दावा किया गया कि एक हिन्दू व्यक्ति को इस्लामी कट्टरपंथियों ने जीवित जला दिया। ठाकुरगांव में भी हिन्दू महिलाओं को निशाना बनाया और मंदिर तोड़े गए।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में जुलाई महीने से ही आरक्षण खत्म करने की माँग को लेकर प्रदर्शन चल रहे थे। इस प्रदर्शन को इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाइजैक कर लिया और इसके बाद भारी हिंसा हुई। यह हिंसा अगस्त में और बढ़ गई और प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। शेख हसीना सोमवार (5 अगस्त, 2024) को ढाका छोड़ कर भारत आ गईं। वर्तमान में वह भारत में हैं। उनके कुछ दिन भारत में रह कर आगे ब्रिटेन जाएँगी।

मंदिर की जमीन पर अतिक्रमणकारियों को बनाओ किराएदार: मद्रास हाई कोर्ट का निर्देश, सुनामी के बाद विस्थापित लोगों ने किया था कब्जा

मद्रास हाईकोर्ट की प्रथम पीठ ने सोमवार को (5 अगस्त 2024 ) हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग को निर्देश देते हुए कहा कि मंदिर की जमीन पर कब्जा करके बैठे अतिक्रमणकारियों को मंदिर की जमीन लीज पर देने के लिए सोचा जा सकता है।

हाई कोर्ट ने कहा कि साल 2004 में आई सुनामी के कारण जो लोग विस्थापित होने के बाद ईस्ट कोड रोड पर स्थित मंदिर की भूमि पर कब्जा करके रहने लगे थे उन्हें अब किराएदार बनाने पर विचार किया जाए।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश डी कृष्णकुमार और न्यायमूर्ति पीबी बालाजी की पहली पीठ ने कहा, “या तो निवासियों को स्थानांतरित करने के लिए पास के इलाके में एक भूमि की पहचान करें या मंदिर की जमीन को अतिक्रमणकारियों को पट्टे पर देने पर विचार करें।”

बता दें कि साल 2004 में जब सुनामी आई थी तब लोगों ने अलवंतर ट्रस्ट की भूमि (ये ट्रस्ट तीन गाँव में फैले एक मंदिर को दी गई भूमि का प्रबंधन करता है) पर अतिक्रमण कर लिया था। वह वहाँ से विस्थापित होकर ईस्ट कोड रोड पर स्थित मंदिर की भूमि पर रहने लगे थे।

साल 2022 में हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग ने इस जमीन को खाली कराने के लिए निर्देश जारी किए। हालाँकि जमीन पर कब्जा करके रह रहे लोगों ने जगह से न हटने के लिए एचआर एंड सीई आयुक्त से गुहार लगाई। जब उन्होंने इस पर सुनवाई नहीं की तो याचिका मद्रास हाईकोर्ट पहुँची।

कोर्ट ने संदीरन और 36 अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुएकहा कि अगर याचिकाकर्ता मंदिर की जमीन खाली करने के लिए तैयार हैं तो वह समय दे देगी या फिर एचआर एंड सीई इस पर विचार कर सकती है कि क्या वे उन्हें किरायेदार के रूप में परिवर्तित करने के लिए आवेदन जमा करा लें, बशर्ते वे जमीन पर रहने के लिए किराया चुकाएं।

प्रधानमंत्री आवास में हुई लूट, लूट नहीं… जनता का अधिकार और शक्ति: बांग्लादेश की लूटेरी इस्लामी भीड़ के साथ रवीश कुमार – ये है निष्पक्ष पत्रकारिता?

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मचाए गए उत्पात की जो तस्वीरें सामने आई हैं उससे भारत के कुछ लोग बहुत खुश लग रहे हैं। इनमें एक नाम पत्रकार रवीश कुमार का भी है। रवीश कुमार ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट की है। इस वीडियो में वो बताते दिख रहे हैं कि किस तरह से बांग्लादेश के प्रधानमंत्री आवास में प्रदर्शनकारी घुसे और उनके घर के सामान अपने साथ ले गए।

चैनल पर अपलोड 22 मिनट 6 सेकेंड की वीडियो में रवीश ने बांग्लादेश में मचाए उत्पात को ‘छात्रों का प्रदर्शन’ बताया। साथ ही प्रधानमंत्री भवन में घुसने वाली दंगाई भीड़ को देश की जनता कहकर वीडियो में संबोधित किया और दिखाया कि बांग्लादेश के लोग पीएम आवास से सोफे, कुर्सियाँ, अटैची, बैग, साड़ी, मछली, बकरी, खरगोश वगैरह लेकर जा रहे हैं। उन्होंने वीडियो में पहले सवाल किया कि क्या इन हरकतों को लूट कहा जा सकता है। आगे खुद जवाब देते हुए बोले- ये लूट नहीं है बल्कि जनता को ये एहसास हुआ है कि उनके पास अधिकार और शक्तियाँ हैं।

रवीश कुमार जिस भीड़ के कृत्य को शब्दों के हेर-फेर से जस्टिफाई करते दिख रहे हैं और उनकी हरकतों को लोकतंत्र की लड़ाई जैसा दिखा रहे हैं उन्हें पता होना चाहिए कि उसी भीड़ ने छात्र प्रदर्शन के नाम कितने लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इस भीड़ ने थाने के थाने जला डाले। उसमें काम करने वाले पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया। यही भीड़ जो आरक्षण के नाम पर सड़कों पर उतरी है और जिसकी ताकत देख रवीश कुमार हैरानी जता रहे हैं वो खुलेआम हिंदुओं को निशाना बना रही है, मंदिरों पर हमले कर रही है… लेकिन रवीश कुमार जैसे लोग इसे छात्रों का सफल विद्रोह बताकर संबोधित कर रहे हैं और शेख हसीना जिन्हें खुद चुनावों के जरिए सत्ता मिलती रही उन्हें तानाशाह के तौर पर दिखा रहे हैं।

उनका कहना है कि मुल्क में जो आगजनी हुई है, संपत्तियों को तोड़फोड़ा गया है वो सिर्फ जनता का गुस्सा है और सोशल मीडिया फेसबुक, यूट्यूब के समय में इस गुस्से शांत नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि छात्रों का प्रदर्शन पहले शांत ही था लेकिन 12 जुलाई को शेख हसीना ने इन्हें रजाकार कह दिया था इसके बाद लोगों का गुस्सा उनपर भड़क गया। रवीश कुमार ने अपनी 22 मिनट की वीडियो में सिर्फ ये दिखाना चाहा कि किस तरह से बांग्लादेश में जो कुछ हुआ वो सही था और शेख हसीना द्वारा सरकारी नौकरी में बढ़ाया जा रहा आरक्षण गलत।

दिलचस्प बात ये है कि ये रवीश कुमार जैसे लोग आरक्षण का समर्थन और विरोध मुल्क और भीड़ को देखकर करते हैं। भारत में आरक्षण कम करने की बात होना इन्हें गलत लगता है और बांग्लादेश में आरक्षण का बढ़ना इनके लिए समस्या की बात है। रवीश कुमार इस लिस्ट में अकेले नहीं हैं जो बांग्लादेश में हुए तख्तापलट और लूट को जायज बता रहे हैं। आरफा खानुम शेरवानी समेत कई नाम हैं जिन्हें ये पूरा तख्तापलट लोकतंत्र को बचाने का एकमात्र तरीका जैसा दिख रहा है, लेकिन सवाल ये है कि क्या हिंसक आंदोलन में शामिल भीड़ सिर्फ छात्रों की थी। इसमें बांग्लादेश के विपक्ष का कोई रोल नहीं था? क्या इसमें इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों का हाथ नहीं था?

बांग्लादेश अब बनेगा पाकिस्तान, शेख हसीना राजनीति में नहीं लौटेंगी: तख्तापलट के बाद बोले शेख हसीना के बेटे – ‘अब देश हमारी समस्या नहीं’

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट किए जाने के बाद भी हिंसा नहीं रुकी है। बांग्लादेश में आवामी लीग के नेता और हिन्दू निशाने पर लिए जा रहे हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना देश छोड़ कर भारत आ गई हैं। इस बीच उनके पुत्र सजीब वाजेद ने कहा है कि उनकी माँ इन सब से दुखी हैं। वाजेद ने कहा है कि बांग्लादेश के लोगों ने जो किया है, वह भुगतना अब उनकी जिम्मेदारी है।

Wion को दिए इंटरव्यू में वाजेद ने कहा, “बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह डरावना है। बांग्लादेश में अराजकता है, कानून का कोई राज नहीं है। भीड़ सड़कों पर घूम रही है, घरों, कारखानों में तोड़फोड़ कर रही है और मैंने जो सुना है उसके अनुसार वे अल्पसंख्यकों पर हमला कर रहे हैं। हमलावर अल्पसंख्यकों और हिंदू मंदिरों पर हमला कर रहे हैं। इसलिए बांग्लादेश सही में अराजकता की स्थिति में है।”

वाजेद ने बताया कि शेख हसीना सही हालत में हैं लेकिन काफी दुखी हैं। उन्होंने बताया कि शेख हसीना ने बांग्लादेश में काफी विकास किया जिसके उत्तर में उन्हें यह भुगतना पड़ा है। वाजेद ने चिंता जताई है कि बांग्लादेश अब दूसरा पाकिस्तान बन जाएगा। उन्होंने शेख हसीना की राजनीति में वापसी को भी नकार दिया है। उन्होंने बताया कि शेख हसीना अब 77 वर्ष की हैं और उनका वापस देश की राजनीति में लौटने का कोई विचार नहीं है।

वाजेद ने कहा बांग्लादेश के लोगों ने अपने नेता चुन लिए हैं और वहीं उन्हें मिलेंगे। वाजेद ने खुद के भी राजनीति में आने के कयासों पर रोक लगा दी। उन्होंने बताया कि उनकी भविष्य में ऐसी कोई योजना नहीं है। वाजेद ने कहा कि उनका परिवार तीन बार सैन्य तख्तापलट झेल चुका है। उन्होंने कहा कि उनका परिवार बांग्लादेश को बचाते बचाते थक चुका है और अब बांग्लादेश के लोग खुद ही यह काम करें। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश अब उनकी समस्या नहीं है।

वाजेद ने कहा कि बांग्लादेश के लोग कृतघ्न हैं। उन्होंने बांग्लादेश में शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियाँ तोड़े जाने पर रोष जताया। उन्होंने कहा कि शेख हसीना ने बांग्लादेश को एक विफल देश से एशिया में बढ़ता हुआ देश बनाया और उनका कार्यकाल बांग्लादेश के लिए स्वर्णिम काल माना जाएगा।

वाजेद ने इन सब के बीच अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना भी की है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने हर मुद्दे पर बांग्लादेश की आलोचना की है और अब वह बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को मारे जाते हुए देखेंगे। उन्होंने कहा कि यही यह लोग चाहते थे। उन्होंने शेख हसीना के भविष्य को लेकर भी बात की।

उन्होंने बताया कि अब शेख हसीना अपने पोते-पोतियों के साथ वक्त बिताएँगी। वह अब कुछ दिन अपने बेटे-बेटी और बहन पास रहेंगी। वाजेद ने बांग्लादेश अंतरिम सरकार को लेकर चिंता जताई और कहा कि यह सरकार कहीं दिख नहीं रही और कुछ कर भी नहीं पा रही है।

वाजेद ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो भी जारी किया। उन्होंने कहा कि जितना ही सरकार इस्लामी प्रदर्शनकारियों के सामने झुकती गई, उतना ही वह आगे बढ़ते गए। उन्होंने बांग्लादेश में चुनावों के गड़बड़ होने के आरोप खारिज कर दिए। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में अब जो कुछ होगा वहां के लोगों की जिम्मेदारी है।

गौरतलब है कि बांग्लादेश में जुलाई महीने से ही आरक्षण खत्म करने की माँग को लेकर प्रदर्शन चल रहे थे। इस प्रदर्शन को इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाइजैक कर लिया और इसके बाद भारी हिंसा हुई। यह हिंसा अगस्त में और बढ़ गई और प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। शेख हसीना सोमवार (5 अगस्त, 2024) को ढाका छोड़ कर भारत आ गईं। वर्तमान में वह भारत में हैं। उनके कुछ दिन भारत में रह कर आगे ब्रिटेन जाएँगी।