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नाबालिग हिंदू लड़की को अगवा कर कई बार किया रेप, इस्लाम भी कबूल करवाया: ढाई महीने से फरार सलमान को बरेली पुलिस ने पकड़ा

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक नाबालिग हिन्दू लड़की के अपहरण और रेप का मामला सामने आया है। लगभग ढाई महीने पहले पीड़िता को अगवा करके हरियाणा और हिमाचल प्रदेश ले जाया गया था। यहाँ उस पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया गया। इस मामले में आरोपित का नाम सलमान बताया जा रहा है जिसे पुलिस ने 5 अगस्त 2024 को गिरफ्तार किया और पीड़िता को भी बरामद किया।

यह मामला बरेली के थानाक्षेत्र सुभाषनगर का है। यहाँ 9 मई 2024 को एक हिन्दू महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। इस शिकायत में पीड़िता ने बताया था कि 9 मई को वो सपरिवार घर में सो रही थीं। जब वो सुबह सोकर उठी तो उनकी 17 वर्षीया बेटी घर में मौजूद नहीं मिली।

लड़की के परिजनों ने जान-पहचान और रिश्तेदारी में काफी खोजबीन की पर कुछ पता नहीं चला। इस तहरीर पर पुलिस ने 11 मई को अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ IPC की धारा 363 के तहत केस दर्ज कर के कार्रवाई शुरू कर दी थी। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

पुलिस ने जाँच-पड़ताल शुरू की तो मामले में 21 वर्षीय सलमान का नाम आया। सलमान के अब्बा का नाम नबी अहमद है। वह बरेली के ही थानाक्षेत्र सीबीगंज का रहने वाला है। पुलिस को पता चला कि सलमान इससे पहले भी पीड़िता को भगा कर ले जा चुका है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सलमान ने पीड़िता को इस्लाम कबूल करवा दिया था। मुस्लिम बनाने के बाद आरोपित लड़की को मरियम नाम से बुलाने लगा था। पुलिस से बचने के लिए सलमान लड़की को लेकर अपनी लोकेशन लगातार बदलता रहा। वह कभी हरियाणा गया तो कभी हिमाचल प्रदेश में कुछ दिनों तक रहा, मगर ढाई महीने तक छिप कर रहने के बाद सलमान पुलिस की तरफ से बेपरवाह हो गया। वह लड़की के साथ बरेली आ गया और यहीं पर रहने लगा।

इस दौरान सलमान हिन्दू संगठन के सदस्यों की नजर में आ गया। हिन्दू संगठनों ने सलमान की बरेली में मौजूदगी की सूचना पुलिस को दी। पुलिस ने दबिश देकर सलमान को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने पीड़िता को बरामद करके अदालत में पेश किया। पुलिस को दिए गए बयान में पीड़िता ने बताया कि बहला-फुसला कर अपने साथ ले जाने के बाद सलमान ने उसे किराए के मकान में रखा और कई बार रेप किया। अपने धर्मान्तरण के आरोपों की भी पीड़िता ने पुष्टि की।

पुलिस ने सलमान के खिलाफ पहले से दर्ज IPC की धारा 363 वाली FIR में 366, 376 (2)n के साथ पॉक्सो एक्ट व उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की बढ़ोत्तरी की है। मामले में जाँच और अन्य जरूरी कार्रवाई की जा रही है। आरोपित को कानूनी कार्रवाई के बाद अदालत में पेश किया गया जहाँ से उसे जेल भेज दिया गया है।

बांग्लादेश में फौज ने सँभाली कमान, बोले जनरल वकार जमान- जल्द बनेगी अंतरिम सरकार: दावा- इस्तीफे के बाद भारत आईं शेख हसीना, लंदन जाएँगी

बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शन के हिंसक होने के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। ये ऐलान बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने मीडिया के आगे किया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि शेख हसीना के बाद अब सेना मुल्क में अंतरिम सरकार बनाएगी।

इस संबंध में आर्मी ने देश की प्रमुख पार्टियों के साथ मिलकर बैठक की है। अब 18 सदस्यीय अंतरिम सरकार प्रस्तावित की गई है। सेना इस सरकार को बनाएगी। सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने कहा कि जो हत्या हुई उस पर न्याय होगा। हमने सभी दलों से बात की। हमारे बीच एक अच्छी बातचीत हुई है।

उन्होंने बताया, “पीएम शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया है। हम अंतरिम सरकार का गठन करके शासन करेंगे। हमारे देश का नुकसान हो रहा है। संपत्ति का नुकसान हो रहा है। मुझे दायित्व दीजिए, मैं सब संभाल लूँगा।” सेना प्रमुख ने जमान ने कहा, “आपकी जो माँग है उसे हम पूरा करेंगे। देश में शांति वापस लाएँगे। तोड़फोड़-आगजनी मारपीट से दूर रहिए। आप लोग हमारे साथ मिलकर चलेंगे तो हालात सुधरेंगे। मारपीट हिंसा से कुछ नहीं मिलेगा। संघर्ष और अराजकता से दूर रहिए।”

बता दें कि मीडिया में सुबह से बांग्लादेश में हो रही हिंसा की खबरों के बीच आज दोपहर बताया गया कि पीएम शेख हसीना ने मिलिट्री हेलीकॉप्टर से उड़ान भर ली है। वह मुल्क छोड़ने से पहले अपना एक भाषण रिकॉर्ड करना चाहती थीं, हालाँकि उनको इसका मौका नहीं मिला। इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ उनकी ओर बढ़ने लगी और उन्हें न चाहते हुए भी मुल्क को छोड़ना पड़ा। अब वह भारत के उत्तरपूर्वी इलाके अगरतला में उतरी हैं। सूत्रों से दी जा रही खबर के अनुसार भारत ने उनकी सेफ पैसेज की व्यवस्था की है। आगे वह लंदन जाएँगी।

शेख हसीना ने छोड़ा बांग्लादेश

आरक्षण के नाम पर मुल्क की सड़कों पर उतरी 4 लाख के करीब भीड़ के हिंसक होने से 100 के करीबन लोगों की मौत हो गई है। वहीं सैंकड़ों लोग घायल हैं। रविवार को इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के कारण एक ही थाने में 13 पुलिसकर्मियों की मॉब लिंचिंग हुई थी। वहीं अब तक 10 बिलियन डॉलर इकोनॉमी का नुकसान हो गया है। शेख हसीना के इस्तीफे तक पूरे बांग्लादेश में कर्फ्यू लगा था। अब सेना की जब अंतरिम सरकार बनने जा रही है तो सेना प्रमुख ने कहा कि कर्फ्यू की कोई जरूरत नहीं, वो खुद सब संभाल लेंगे।

SC/ST आरक्षण तले कितना अँधेरा, जीतन राम माँझी ने चिराग पासवान को बताया: बोले – सारा लाभ पासवानों को ही मिलेगा, डोम-मुसहर-नट-मेहतर-भुइयाँ को भी तो आगे बढ़ाओ

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण में SC/ST के उपवर्गीकरण का आदेश दिया है, ताकि अंतिम पायदान पर खड़े ग़रीबों तक भी सरकारी लाभ पहुँचे। अब इसके समर्थन और विरोध में पक्ष-विपक्ष दोनों बँटा हुआ है। यहाँ तक कि मोदी सरकार के 2 मंत्री HAM(S) के जीतन राम माँझी और LJP(R) के चिराग पासवान आपस में भिड़ गए हैं। जीतन राम माँझी जहाँ केंद्रीय माध्यम, लघु एवं सूक्ष्म उद्योग मंत्री हैं, वहीं चिराग पासवान के पास खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय है। चिराग जहाँ इस फैसले के विरोध में हैं और समीक्षा याचिका तक दायर करने की बात कर रहे, माँझी ने खुल कर इसका समर्थन किया है।

जीतन राम माँझी ने कहा कि समाज नहीं बल्कि स्वार्थ के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले 74 वर्षों से केवल 4 जातियाँ ही आरक्षण का सारा लाभ ले रही हैं। उन्होंने याद दिलाया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2011-12 के दौरान ही ये व्यवस्था कर दी थी कि और महादलित वर्ग तैयार किया था। उन्होंने याद किया कि कैसे तब उस वर्गीकरण को भी न्यायालय में चुनौती दी गई थी लेकिन न्यायपालिका ने इस फैसले को सही माना। उन्होंने कहा कि समाज में और भी जातियाँ हैं, सिर्फ पासवानों को आरक्षण नहीं मिलेगा।

जीतन राम माँझी ने कहा कि सिर्फ एक पीढ़ी को आरक्षण दिए जाने का फैसला सिर्फ एक जज की राय है और 7 जजों की पीठ में सामान्य राय नहीं है। उन्होंने याद किया कि बाबासाहब डॉ भीमराव आंबेडकर ने भी प्रत्येक 10 वर्ष में आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी। बकौल जीतन राम माँझी, सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर अमल किया है। उन्होंने कहा कि जो आगे बढ़ गए हैं उन्हें मत दबाइए, लेकिन जो पीछे रह गए हैं उन्हें आगे बढ़ाना ज़रूरी है। उन्होंने पूछा कि भुइयाँ, मेहतर, डोम और मुसहर समाज के कितने IAS-IPS हैं?

जीतन राम माँझी की मानें तो ये फैसला 10 साल पहले ही आ जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि जिनकी साक्षरता दर काफी कम है उनकी अधिक सुविधाएँ मिलनी चाहिए। बता दें कि चिराग पासवान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में हैं। तेलंगाना और कर्नाटक के अलावा तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की सरकारें भी इस फैसले का समर्थन कर चुकी हैं। हालाँकि, मायावती ने इसका विरोध किया है और आंदोलन की चेतावनी दी है। खासकर वाल्मीकि समाज में इस फैसले को लेकर जश्न का माहौल है।

दिल्ली शराब घोटाले में CM केजरीवाल को हाई कोर्ट ने नहीं दी जमानत, कहा- CBI की गिरफ्तारी अवैध नहीं: ट्रायल कोर्ट जाने को कहा

दिल्ली हाई कोर्ट से मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट ने केन्द्रीय जाँच एजेंसी (CBI) द्वारा केजरीवाल गिरफ्तारी को गलत नहीं माना है। कोर्ट ने केजरीवाल को झटका देते हुए उनकी जमानत याचिका भी ख़ारिज कर दी है।

सोमवार (5 अगस्त, 2024) को दिल्ली हाई कोर्ट की नीना बंसल कृष्णा ने इस मामले में अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा, “यह नहीं कहा जा सकता कि गिरफ्तारी बिना किसी न्यायोचित कारण के की गई।” कोर्ट ने इसी के साथ CBI गिरफ्तारी को रद्द करने की याचिका ठुकरा दी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी के साथ CM केजरीवाल को जमानत देने से इनकार कर दिया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि केजरीवाल जमानत के लिए निचली अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह निर्णय 17 जुलाई, 2024 को रिजर्व कर लिया था।

केजरीवाल ने कोर्ट के सामने याचिका लगाई थी कि CBI द्वारा उनकी गिरफ्तारी को रद्द किया जाए क्योंकि यह उन्हें जेल में रखने की योजना है। केजरीवाल ने कोर्ट में दावा किया कि यदि उन्हें ED मामले में जमानत के बाद वह बाहर ना निकल पाएँ, इसलिए उन्हें CBI ने गिरफ्तार कर लिया। केजरीवाल की इस दलील को कोर्ट ने नहीं माना।

दिल्ली CM केजरीवाल के पास अब सुप्रीम कोर्ट जाने के कयास हैं। केजरीवाल को CBI ने दिल्ली शराब घोटाले का सूत्रधार बताया था। उन्हें CBI ने तिहाड़ जेल से ही गिरफ्तार किया था। वर्तमान में वह तिहाड़ जेल में ही बंद हैं, उन्हें न्यायिक हिरासत में रहे हैं। CM केजरीवाल को इससे पहले 12 जुलाई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने ED की गिरफ्तारी से जमानत दी थी। हालाँकि, CBI मामले के कारण वह जेल से बाहर नहीं आ सके थे।

गौरलतब है कि दिल्ली CM अरविन्द केजरीवाल को फरवरी, 2024 में ED ने शराब घोटाला मामले में गिरफ्तार किया था। ED का है कि आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली में नई शराब नीति के जरिए शराब डीलरों को फायदा पहुँचाया और उनके से पैसे लिए। इसके बाद उस पैसे का इस्तेमाल गोवा चुनाव में हुआ।

हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहे लोगों को परोस दी मांसाहारी बिरयानी, विरोध हुआ तो करने लगा झगड़ा: दुकानदार तनवीर यूपी पुलिस की हिरासत में

उत्तर प्रदेश के शामली जिले में हरिद्वार से लौट रहे एक श्रद्धालु को शाकाहारी बता कर मांसाहारी बिरयानी बेचने का मामला सामने आया है। मामले का खुलासा होने पर दोनों पक्षों में धक्का-मुक्की हुई। विवाद की सूचना पर पुलिस ने मौके पर पहुँच कर बिरयानी की दुकान के मालिक को हिरासत में ले लिया है। रविवार (4 अगस्त, 2024) को घटी इस घटना की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है। हिन्दू संगठनों ने कड़ी कार्रवाई न होने पर बिरयानी मालिक के घर पर धरने का एलान किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना शामली के थाना क्षेत्र कांधला की है। रविवार को हरियाणा के पानीपत जिले के रहने वाले अनुज कुमार सहित 4 युवक कार से शाम लगभग 6 बजे कांधला बस अड्डे पहुँचे। यहाँ उन्होंने खाने-पीने के कुछ सामान खरीदे। इसी दौरान ठेले पर एक व्यक्ति बिरयानी बेच रहा था। उसने अनुज को बताया कि वो बेज बिरयानी बेच रहा है। दुकानदार ने अनुज और उसके साथियों को बिरयानी खाने के लिए परोस दी। इसी दौरान चारों श्रद्धालुओं में से एक ने दुकानदार का भगौना खोल कर चेक किया।

बताया जा रहा है कि अंदर चिकन बिरयानी भरी हुई थी। इस बात से नाराज हो कर चारों युवकों ने दुकानदार से शिकायत की तो वह लड़ने लगा। हंगामा बढ़ता देख कर मौके पर पुलिस बल पहुँच गया। पुलिस ने आरोपित दुकानदार को हिरासत में ले लिया। पूछताछ में उसने अपना नाम तनवीर बताया है। अनुज सहित चारों युवकों ने तनवीर पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। युवकों ने बताया कि वो सावन का व्रत रखते हैं और हरिद्वार गंगाजल लेने गए थे। इन सभी ने तनवीर पर अपनी धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया है।

पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। इस बीच मुज़फ्फरनगर के स्वामी यशवीर भारती का इस घटना पर बयान आया है। उन्होंने आरोप लगाया कि न सिर्फ तनवीर बल्कि कई अन्य मुस्लिम दुकानदार भी मांसाहार, थूक और मूत्र के जरिए हिन्दू श्रद्धालुओं का धर्म भ्र्ष्ट करने की फिराक में हैं। उन्होंने प्रशासन से तनवीर पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। यशवीर भारती का कहना है कि अगर आरोपित पर कठोर कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई तो वो तनवीर के घर के ही आगे धरना-प्रदर्शन करेंगे।

‘इस्लाम कबूल कर वरना तेजाब डाल दूँगा’ : मैनपुरी में वासिफ अंसारी से तंग आकर हिन्दू लड़की ने लगाई फाँसी, परिजन बोले- लंबे समय से चल रही थी छेड़खानी

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में मुस्लिम युवक की छेड़खानी से परेशान एक हिन्दू लड़की ने सोमवार (29 जुलाई 2024) को फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लिया था। मृतका BSC की छात्र थी जिस पर इस्लाम कबूल करके निकाह करने का दबाव बनाया जा रहा था। इंकार करने पर लड़की के आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने, उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंकने की, उसके भाई को मार डालने की धमकी दी जाती थी। आरोपित का नाम वासिफ अंसारी है जिसे रविवार (4 अगस्त) को गिरफ्तार कर लिया गया है। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने आरोपित के घर पहले भी शिकायत की थी लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना मैनपुरी जिले के थानाक्षेत्र कुरावली की है। सोमवार (29 जुलाई) को यहाँ रहने वाली एक लड़की खाना खाने के बाद रात में अपने कमरे में गई। सुबह वह फाँसी के फंदे से झूलती मिली थी। मृतका BSC की छात्रा थी। पीड़िता के परिजनों ने इसकी शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई। शिकायत में उन्होंने बताया कि उनकी बेटी से वासिफ अंसारी नाम का युवक लम्बे समय से छेड़खानी कर रहा था। वह स्कूल और बाजार आते-जाते पीड़िता का पीछा करता था और फब्तियाँ कसता था। वासिफ और पीड़िता एक ही मोहल्ले के निवासी हैं।

पीड़िता की माँ ने बताया कि वासिफ अंसारी उनकी बेटी पर हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाता था। मना करने पर वह लड़की के चेहरे पर तेजाब डालने की धमकी देता था। वह पीड़िता का कोई अश्लील वीडियो होने का दावा करते हुए ब्लैकमेलिंग भी करता था। लड़की को कई बार वासिफ अंसारी ने खुद से निकाह करने का दबाव भी दिया था, जिससे तंग आकर पीड़िता ने इसकी शिकायत अपने घर पर की थी। बाद में लड़की के परिजनों ने वासिफ अंसारी के घर वालों से उलाहना भी दी थी। आरोप है कि तब वासिफ के घर वालों का जवाब था, “जाओ जो करना हो कर लेना।” वासिफ पर भी इन बातों का कोई फर्क नहीं पड़ा था।

अब जब लड़की इस दुनिया में नहीं है मृतिका के पिता का बयान आया है। उन्होंने बताया कि वह दिल्ली में एक स्कूल की गाड़ी चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वासिफ अंसारी ने फोन पर उनकी बेटी को घर से भगाकर ले जाने की धमकी दी थी। इंकार करने पर मृतका के छोटे भाई को मार डालने की धमकी भी दी थी। पुलिस पर भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने मृतका के पिता पर तहरीर बदलवाने का दबाव डाला था। पीड़ितों ने पुलिस की कार्रवाई से खुद को पूरी तरह से असंतुष्ट बताया है।

पीड़ित परिजनों ने अंत में कहा, “अब हमारी बेटी तो चली गई है। पर आरोपितों को कड़ी से कड़ी सजा मिले ताकि अब किसी और की बेटी के साथ ऐसा न हो।” मैनपुरी के पुलिस अधीक्षक ने इस घटना पर बताया कि वासिफ अंसारी के खिलाफ केस दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस इस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कार्रवाई कर रही है।

जिन ‘बंगबंधु’ के कारण बना बांग्लादेश, उनकी ही बुतों को तोड़ रहे इस्लामी कट्टरपंथी: शेख हसीना ने छोड़ा देश, प्रधानमंत्री आवास में घुसे उपद्रवी

भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में तख्तापलट की आशंका जताई जा रही है। बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त माह में हुई देशव्यापी हिंसा के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफ़ा देने की सूचना आ रही है। बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथी प्रधानमंत्री आवास में घुस गए हैं।

प्रधानमंत्री शेख हसीना प्रधानमंत्री आवास ‘गोनोभबन’ छोड़ कर किसी सुरक्षित स्थान पर चली गई हैं। उनके देश छोड़ कर भारत आने की बात मीडिया रिपोर्ट्स में आई है। शेख हसीना के साथ उनकी बहन शेख रिहाना भी बांग्लादेश से बाहर निकल गई हैं। प्रधानमंत्री शेख हसीना के करीबियों ने बताया है कि उनके इस्तीफे का ऐलान उनके देश छोड़ने के कुछ देर बाद किया जाएगा।

शेख हसीना के आवास छोड़ने के साथ ही बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने 4 बजे देश के नाम संबोधन जारी करने की बात कही है। बांग्लादेश में जुलाई माह से ही प्रदर्शन चल रहे थे। सबसे पहले यह प्रदर्शन आरक्षण के नाम पर चालू हुए थे। यह प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण खत्म किए जाने के बाद रुक गए थे।

हालाँकि, अगस्त माह में फिर से यह प्रदर्शन भड़क गए। इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रदर्शन में शेख हसीना के इस्तीफे की मांग भी की गई। कट्टरपंथियों ने कई पुलिसवालों की हत्या कर दी। उन्होंने हिन्दू पत्रकार को भी मार दिया। इसके अलावा कई हिन्दू परिवारों को भी मार दिया गया।

बांग्लादेश में हुई इस हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए हैं। यह भी बताया जा रहा है कि इस हिंसा के कारण बांग्लादेश प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है। सेना के बांग्लादेश की सुरक्षा व्यवस्था सँभालने की बात कही जा रही है। प्रधानमंत्री आवास में घुसने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों ने लूटपाट भी की है।

बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु मुजीबुर रहमान की भी मूर्तियाँ बांग्लादेश में तोड़ी गई हैं। उनके ऊपर यह इस्लामी कट्टरपंथी चढ़े हुए हैं।

जब नाराज़ सरदार पटेल देना चाहते थे इस्तीफा… एक अस्थायी प्रावधान के लिए कॉन्ग्रेस मना रही ‘काला दिन’: पत्थरबाजी कम, पर्यटन गुलजार, धड़ाधड़ हो रही फिल्मों की शूटिंग

5 अगस्त , 2019 – ये वो तारीख़ है जब लोकतांत्रिक भारत के इतिहास के सबसे बड़े कलंक को मिटाया गया। यही वो दिन है जब लगता दूसरी बार सत्ता में वापसी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अनुच्छेद-370 को निरस्त कर के बलिदानी नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने ‘एक देश, एक विधान, एक निशान’ को पूरा किया। इसके साथ ही भारत का मस्तक कहे जाने वाले राज्य में न सिर्फ देश का संविधान लागू हुआ, बल्कि वहाँ भड़कती अलगाववाद की आग पर भी पानी पड़ा।

इस वर्ष अनुच्छेद -370 को निरस्त किए जाने को 5 वर्ष हो गए हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी, जिसने देश को ये दंश दिया था, वो इसे ‘काला दिन’ के रूप में मना रही है। कॉन्ग्रेस पार्टी ने बाकायदा एक पोस्टर जारी कर के 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर के लिए ‘काला दिन’ बताया। पार्टी का कहना है कि इस दिन भाजपा ने जम्मू कश्मीर से राज्य का दर्जा छीन लिया। साथ ही लिखा गया है कि जम्मू कश्मीर की जनता भाजपा को माफ़ नहीं करेगी। असल में राज्य का दर्जा छीने जाने का आरोप लगाना तो बहाना है, असली दिक्कत अनुच्छेद-370 के जाने से है।

केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को संसद में बिल पेश कर के अनुच्छेद-370 को निरस्त कर दिया और लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग करते हुए दोनों को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया। लद्दाख के लोगों ने इसके लिए केंद्र सरकार को धन्यवाद भी किया, वहाँ नए सिरे से विकास कार्य शुरू हुए क्योंकि वहाँ सड़क, रेलवे, टनल, पुल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बने। वहाँ पर्यटन बढ़ा। लद्दाख रणनीतिक लिहाज से भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

असल में अनुच्छेद-370 को अनुच्छेद-306A को संशोधन कर के लाया गया था। ये बात तब की है, जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कश्मीर के नेता शेख अब्दुल्ला क़रीबी मित्र हुआ करते थे। जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू कश्मीर के लिए एक मिनी कैबिनेट बना रखी थी, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, गोपालस्वामी अयंगर और कैलाश नाथ काटजू शामिल थे। ‘कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी’ (CWC) चाहती थी कि सरदार वल्लभभाई पटेल कश्मीर मुद्दे को देखें, लेकिन उन्हें ही किनारे कर दिया गया।

उदाहरण के लिए , नवंबर 1947 में केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति लिए बिना ही गोपालस्वामी अयंगर ने जम्मू कश्मीर के लिए पंजाब से 150 वाहन मँगा लिए। जब सरदार पटेल ने आपत्ति जताई तो नेहरू ने कह दिया कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि गृह मंत्रालय इसमें कहाँ से आ गया। नेहरू का कहना था कि वो उन प्रस्तावों से पीछे हटने का कोई इरादा नहीं रखते, जिसके लिए वो खुद को जिम्मेदार मानते हैं। सरदार पटेल इतने व्यथित हुए कि उन्होंने इस्तीफा भी लिख लिया था, लेकिन उन्होंने इसे भेजा नहीं।

यहाँ तक कि सरदार पटेल जम्मू कश्मीर के लिए नीतियाँ बनाने में शेख अब्दुल्ला की भूमिका होने के पक्ष में भी नहीं थे। उनका कहना था कि किसी राज्य का भारत का हिस्सा बनना और वहाँ हमारे मुख्य प्रावधानों का लागू न होना बहुत बड़ी विसंगति है। उन्होंने कहा था कि जब भी शेख अब्दुल्ला पीछे हटते हैं, वो जम्मू कश्मीर की जनता के प्रति अपने कर्तव्यों का हवाला देते हैं, लेकिन भारत सरकार या प्रधानमंत्री के प्रति वो अपना कोई कर्तव्य नहीं समझते। पटेल ने स्पष्ट कहा था कि इसमें उनकी स्वीकृति का कोई सवाल ही नहीं उठता।

जब पहली बार जम्मू कश्मीर को बाकी राज्यों से अलग प्रकार का दर्जा दिए जाने का ड्राफ्ट लाया गया था, तब जवाहरलाल नेहरू अमेरिका में थे और यहाँ गोपालस्वामी अयंगर जिम्मेदारी सँभाल रहे थे। बताया जाता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में इस ड्राफ्ट का जम कर विरोध हुआ था। साथ ही विरोध प्रदर्शन भी होने लगे थे। तब अयंगर ने पटल को फोन कर के बचाव करने के लिए कहा, पटेल उन्हें शांति से सुनते रहे। चूँकि जवाहरलाल नेहरू विदेश में थे, ऐसे में पटेल को अयंगर का साथ देना पड़ा।

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने के बाद से काफी बदलाव आए हैं। 2019 से पहले प्रदेश अलगाववाद से जूझ रहा है, छात्र-छात्राओं तक को पत्थरबाजी में लगा दिया गया था। आँकड़ों की मानें तो पत्थरबाजी में 99% कमी आई है। साथ ही राज्य में नई फिल्म पॉलिसी भी लागू हुई। इससे क्या सकारात्मक बदलाव आया, इसे आप इसी से समझिए कि साल 2023 में 102 फिल्मों और वेब सीरीज की शूटिंग वहाँ हुई है।

जम्मू कश्मीर हिमालय पर स्थित राज्य है, ऐसे में वहाँ पर्यटन में अपार संभावनाएँ हैं। अब यहाँ का पर्यटन उद्योग रोजगार का सबसे बड़ा माध्यम बन रहा है। 2023 में देश-विदेश से 2.10 करोड़ पर्यटक देश-विदेश से घूमने के लिए आए। 2024 की बात करें तो 6 महीनों में 1 करोड़ से भी अधिक पर्यटक यहाँ पहुँच चुके हैं। इससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से काफी रोजगार पैदा हो रहा है। दुकानदारों की कमाई बढ़ रही है। जो लोग ट्रांसपोर्टेशन वगैरह के कारोबार में हैं, उनकी भी अच्छी कमाई हो रही है।

RSS के सर-सहकार्यवाह अरुण कुमार ने हाल ही में बताया कि अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने जैसा फैसला कैसे संभव हो पाया। कई लोग इसे असंवैधानिक बताते हैं, इसके जवाब देते हुए अरुण कुमार बताते हैं कि आर्टिकल-370 कोई विशेष राज्य का दर्जा नहीं है, स्वायत्ता का दर्जा नहीं था, बल्कि ये सिर्फ एक प्रावधान था, जो जम्मू कश्मीर में केंद्रीय संविधान की अवधि जम्मू कश्मीर में आगे बढ़ाने का माध्यम था। अतः, उन्होंने कहा कि इसका कार्य पूरा हो गया था और अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।

उन्होंने बताया कि भारत का संविधान बनने के बाद एक प्रश्न खड़ा हो गया, जिस पर 17 अक्टूबर, 1949 में चर्चा हुई। इस दिन जम्मू कश्मीर को लेकर चर्चा हुई, लेकिन महाराजा हरि सिंह ने विलय के कागज पर हस्ताक्षर नहीं किया। जम्मू कश्मीर का विलय डोमिनियन में होना था, जिसे बाद में रिपब्लिक बनना था। अरुण कुमार बताते हैं कि हरि सिंह ने कहा कि जम्मू कश्मीर का कुछ हिस्सा शत्रु के पास है और भारत ने UN में कुछ प्रतिद्धताएँ जता दी हैं, एक तरफ जनमत संग्रह की बातें होती हैं और दूसरी तरफ वहाँ पूरी तरह भारत का संविधान लागू कर देना ठीक नहीं होगा।

तब निर्णय हुआ कि रक्षा, विदेश, संचार एवं आनुषंगिक मामलों पर तो सहमति बन गई। इसके अलावा राज्य सरकार की सहमति से चीजें लागू करने की बात की गई, फिर संविधान सभा में इस पर चर्चा होगी। योजना कुछ यूँ थी कि जम्मू कश्मीर में जब सरकार बनेगी तब उनकी अनुशंसा से वहाँ जम्मू कश्मीर में भारत का संविधान लागू कर दिया जाएगा। अरुण कुमार ने बताया कि अनुच्छेद-370 अस्थायी था, भारत सरकार के संविधान की बहुत सारी धाराओं की आयु कम थी, इसे खत्म करने के लिए संसद के समर्थन की भी ज़रूरत नहीं थी।

उन्होंने बताया कि इसमें सिर्फ 425 शब्द थे। अरुण कुमार ने बताया कि असली काम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया, संसद की ज़रूरत ही नहीं थी। उन्होंने बताया कि संविधान के हिसाब से 370(1)(d) के तहत राष्ट्रपति को अधिकार था कि वो निर्णय लें, और राज्यपाल की सहमति से ये आदेश दिया गया क्योंकि सरकार की अनुपस्थिति में राज्यपाल ही वहाँ सरकार थे। इस तरह भारत का सारा संविधान हर एक संशोधन के साथ जम्मू कश्मीर में लागू हो गया।

बड़ी बात ये है कि आज जो लोग संविधान सिर पर लेकर नाचते हैं, उन्होंने ही ये सुनिश्चित किया था कि जम्मू कश्मीर में भारत का यही संविधान लागू नहीं हो। अब कॉन्ग्रेस वहाँ संविधान लागू किए जाने को ‘काला दिन’ बता रही है। जम्मू कश्मीर में चुनाव भी होंगे, उसे राज्य का दर्जा भी मिलेगा – मोदी सरकार पहले ही ये साफ़ कर चुकी है। फिर जम्मू कश्मीर ऐसा ही होगा, जैसे भारत के बाकी राज्य हैं। एक अस्थायी प्रावधान के लिए भारत के संविधान को नीचा दिखाना कहाँ तक उचित है?

PM मोदी ने कहा था- ED द्वारा जब्त पैसा गरीबों को देंगे, रोज वैली घोटाला पीड़ितों से हुई शुरुआत: जानिए सहारा में डूबा कितना पैसा अब तक निवेशकों को मिला

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव 2024 से पहले ऐलान किया था कि सरकार गरीबों से फर्जीवाड़े द्वारा लिया गया पैसा वापस करेगी। यह पैसा घोटालेबाजों की जब्त सम्पति से लौटाया जाएगा। अब इस दिशा में काम चालू हो गया है। मोदी सरकार ने रोज वैली और सहारा घोटाला का पैसा पीड़ितों को लौटाना चालू कर दिया है।

प्रधानमंत्री के वादे के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ED) पश्चिम बंगाल के रोज वैली घोटाले के ₹12 करोड़ को पीड़ितों को लौटाएगा। इस संबंध में कोलकाता के एक कोर्ट ने 24 जुलाई, 2024 को ED को आदेश दिया है। ED ने रोज वैली ग्रुप की ₹12 करोड़ की 14 FD जब्त की थीं।

कोर्ट के आदेशनुसार अब उन्हें एक कमिटी को हस्तांतरित कर दिया जाएगा। यह कमिटी वह पैसा उन लोगों को लौटाएगी जो इस घोटाले का शिकार हुए हैं। इसके लिए उन लोगों से आवेदन लिए जाएँगे जिनका पैसा इसमें डूबा है। ED का यह कदम पीएम मोदी की पहल के बाद हुआ है।

पीएम मोदी ने मई, 2024 में एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि वह उन गरीबों को पैसा लौटाने के लिए कानूनी रास्ता देख रहे हैं। उन्होंने कहा था कि यह पैसा वही होगा जो लूटने वालों ने इकट्ठा किया है और एजेंसियों ने उसे इकट्ठा किया है। ED ने इसके लिए PMLA कानून का ही सहारा लिया है।

गौरतलब है कि रोज वैली कम्पनी पर देश के 10 राज्यों में निवेशकों के साथ ₹10,000 का घोटाला करने का आरोप है। रोज वैली कम्पनी ने भोले भाले निवेशकों को उनके निवेश पर 17% तक के ब्याज का झांसा देकर हजारों करोड़ रूपए जमा करवाए और उन्हें पैसा वापस नहीं किया।

सहारा वालों को भी वापस मिला पैसा

रोज वैली घोटाले के अलावा सहारा में जिन निवेशकों का पैसा डूबा है, उन्हें भी मोदी सरकार ने पैसा लौटाना चालू कर दिया है। केंद्र सरकार ने इस संबंध में जानकारी देश के सामने भी रखी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार (5 अगस्त, 2024) को लोकसभा में इस विषय में बताया।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि सहारा निवेशकों के साथ हुए फर्जीवाड़े में पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रहा है। उन्होंने बताया कि सहारा की तीन कम्पनियाँ SEBI के अंतर्गत आती हैं। इन तीन कम्पनियों ने 17,526 निवेशकों को ₹138 करोड़ लौटाए हैं। यह पैसा सहारा द्वारा जमा करवाए गए पैसे से ही दिया गया है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि निवेशकों को कई बार पैसा लेने के लिए कहा जा चुका है लेकिन जितने आवेदन आए हैं उसी हिसाब से पैसा दिया गया है। उन्होंने बताया कि SEBI से सम्बन्धित मामले में पैसा लेने के लिए निवेशक आगे नहीं आ रहे।

इसके अलावा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ने यह भी बताया कि सहारा की सहकारी कम्पनियों में भी करोड़ों छोटे-बड़े लोगों ने पैसा जमा करवाया था। उन्होंने बताया कि देश में केन्द्रीय सहकारिता मंत्रालय बनने के बाद SEBI के पास पड़ा सहारा का जमा किया ₹5000 करोड़ कोर्ट के आदेश से जमा करने वालों को लौटाने का प्रयास चालू हुआ था।

वित्त मंत्री ने बताया कि इसके लिए केंद्र सरकार ने एक पोर्टल बनाया था। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने सहारा की सहकारी समिति में पैसा जमा करने वाले 4.63 लाख लोगों को ₹374 करोड़ अब तक लौटाए हैं। इसमें और भी कार्रवाई आगे चल रही है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पर्ल समूह में हुई धोखाधड़ी के पैसे को लेकर भी बात की। उन्होंने बताया कि पर्ल समूह में पैसा जमा करवाने वाले 20 लाख से अधिक लोगों को ₹1021 करोड़ लौटाया जा चुका है। वित्त मंत्री ने इस मामले में बताया कि उन लोगों को ही पैसा दिया जा रहा है जिनके दावे सही हैं।

वही इस्लाम, वही कट्टरपंथ: आज जिस आग में जल रहा बांग्लादेश, कभी उसी आग में एक ही रात में कर दिया गया था शेख हसीना के परिवार का सफाया

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की माँग में आज पूरे मुल्क में हिंसा हो रही है। उनके इस्तीफे के नाम पर पुलिस थानों पर हमले किए जा रहे हैं, सुरक्षाकर्मियों का कत्ल हो रहा है, निर्दोष हिंदुओं को बेवजह निशाना बनाया जा रहा है, सरकार को डराया जा रहा है… इन हालातों में वहाँ की सेना कह रही है कि वो स्थिति को नियंत्रित कर लेंगे, हालाँकि उनके द्वारा किए गए प्रयास से ऐसा लग नहीं रहा। उलटा अनुमान तो लगने लगे हैं कि सेना अब प्रधानमंत्री शेख हसीना से मुल्क की कमान ले सकती है। ये अनुमान ही कारण है जिसकी वजह से साल 1975 में बांग्लादेश में जो हुआ उसे याद करना जरूरी है जब सेना के कुछ बागी अधिकारियों के कारण शेख हसीना के घर में 20 लाशें गिरी थीं और बांग्लादेश की राजनीति में उथल-पुथल हुई थी।

बात 15 अगस्त 1975 की है। बांग्लादेश के संस्थापक और मुल्क के पहले राष्ट्रपति ‘बंगबंधु’ शेख मुजीब-उर-रहमान को परिवार समेत मौत के घाट उतारा था। शेख मुजीब-उर-रहमान को यकीन नहीं था कि उनके अपने ही लोग उनके खिलाफ बगावत कर सकते हैं, इसीलिए उन्होंने भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के दिए इनपुट को नकार दिया। उन्होंने रॉ के संस्थापक आरएन काव द्वारा आगाह किए जाने पर जवाब दिया था- ‘ये मेरे बच्चे हैं मुझे नुकसान नहीं पहुँचाएँगे।’

शेख मुजीब-उर-रहमान उस समय अपने और अपने परिवार पर मंडराने वाले खतरे को समझ ही नहीं पाए। हकीकत वही थी जिसके लिए भारतीय खुफिया एजेंसी उन्हें आगाह कर रहे थी। अगस्त 1975 में बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष जनरल शफीउल्ला को सेना की दो बटालियन के बिना किसी आदेश के शेख मुजीब के घर की ओर बढ़ने की सूचना मिली। उन्होंने शेख मुजीब को फोन मिलाया, लेकिन लाइन व्यस्त थी। बहुत कोशिशों के बाद उनका शेख मुजीब से संपर्क हुआ। शेख मुजीब गुस्से में बोले, “शफीउल्ला तोमार फोर्स आमार बाड़ी अटैक करोछे। तुमि जल्दी फोर्स पठाओ (तुम्हारे फोर्स ने मेरे घर पर हमला किया है, जल्दी सेना भेजो)।”

एंथनी मैस्करेनहास अपनी किताब ‘बांग्लादेश ए लेगसी ऑफ ब्लड’ में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं, “शेख मुजीब को देखते ही मोहिउद्दीन नर्वस हो गया। उसके मुँह से केवल इतना ही निकला, सर आपनी आशुन (सर आप आइए)। मुजीब ने चिल्ला कर कहा-क्या चाहते हो? क्या तुम मुझे मारने आए हो? भूल जाओ। पाकिस्तान की सेना ऐसा नहीं कर पाई। तुम किस खेत की मूली हो?” तभी स्टेनगन लिए मेजर नूर ने प्रवेश किया और मोहिउद्दीन को धक्का देते हुए पूरी स्टेनगन खाली कर दी। मुजीब मुँह के बल गिरे और शेख मुजीब उर रहमान के बाद देखते ही देखते उस घर में मौजूद हर शख्स का सफाया हो गया।

बांग्लादेश की राजधानी ढाका के धनमंडी में यह नरसंहार रोड नंबर 32 के हाउस नंबर 677 में 15 अगस्त 1975 को हुआ था। उस तारीख के बाद शेख मुजीबुर रहमान के परिवार से सिर्फ दो लोग जिंदा बचे थे एक मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना और दूसरी शेख रेहाना। इन दोनों बहनों की जान भी इसलिए बच पाई क्योंकि ये जर्मनी में थीं। अगर उस समय ये दोनों बहनें घर में होती तो शायद इन्हें भी बागी अधिकारी मौत के घाट उतार चुके होते।

इस पूरे हत्याकांड को अंजाम देने वाले कर्नल फारूक रहमान, मेजर हुदा सहित पाँच हत्यारों को ढाका की केंद्रीय जेल में 2010 में फाँसी दी गई थी। इसके अलावा हत्या में शामिल अब्दुल मजीद को कोरोना समय के बीत साल 2020 में फाँसी हुई थी। वह मजीद शेख मुजीबुर रहमान के 12 हत्यारों में शामिल था। वो पाकिस्तान और भारत में डेरा जमाने से पहले लीबिया में छिपा हुआ था।जब शेख हसीना की सरकार बांग्लादेश में बनी तो उन्होंने पिता के हत्यारों को सजा देनी शुरू कर दी। इसी क्रम में अब्दुल मजीद का नंबर भी आया और कोरोना पाबंदियों के बीच उसे फाँसी पर लटकाया गया।

मालूम हो कि 1975 में जिस तरह से बंगबंधु के परिवार को घेरकर मारा गया था वैसे स्थिति 1971 में भी आई थी। तब, उन्हें पाकिस्तानी सेना ने घेरा था मगर तब एक भारतीय कर्नल अशोक तारा उन्हें सुरक्षित बचाकर बाहर ले आए थे। मगर अफसोस 1975 में शेख मुजीब उर रहमान को बचाने वाला कोई था। उनके अपनों ने ही उनकी पीठ पर खंजर घोंपा था जिन्हें वो अपना बच्चा कहते थे।