कर्नाटक हाई कोर्ट ने आतंकी मोटू डॉक्टर उर्फ़ सबील अहमद की याचिका पर राहत देने से इनकार कर दिया है। मोटू डॉक्टर पर कर्नाटक और महाराष्ट्र में हिन्दू नेताओं की हत्या की साजिश में शामिल होने का मामला चल रहा है। मोटू डॉक्टर चाहता है कि उसे कोर्ट इस आरोप से बरी कर दे।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने सबील अहमद की याचिका पर बुधवार (24 जुलाई, 2024) को सुनवाई की। कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि उसे NIA द्वारा दर्ज इस मामले में कोई राहत नहीं दी जा सकती। सबील अहमद ने दावा किया कि ऐसे ही एक मामले में उसे दिल्ली की एक अदालत से राहत मिल चुकी है जिसे इस मामले में भी लागू हो किया जाए।
सबील अहमद के इस दलील को कोर्ट ने नहीं माना और कहा कि दोनों मामले एक जैसे दिख सकते हैं और दोनों में कुछ गवाह भी समान हो सकते हैं, लेकिन मामला अलग है और यह चलता रहेगा। कोर्ट ने इस मामले में सबील अहमद की याचिका खारिज कर दी।
गौरतलब है कि सबील अहमद उर्फ़ मोटू डॉक्टर पर आरोप है कि उसने 2012 में एक साजिश में हिस्सा लिया था। इसके अंतर्गत लश्कर ए तैयबा में जुड़ कर हिन्दू नेताओं, पत्रकारों और पुलिस अधिकारियों को मारने की योजना रची जा रही थी। सबील अहमद इस योजना के अंतर्गत हथियार और पैसा जुटा रहा था।
सबील अहमद इस मामले का भंडाफोड़ होने के बाद 2010 में सऊदी अरब चला गया था। उसे 2020 में वापस भारत प्रत्यर्पित किया गया था। इसके बाद उसे NIA ने गिरफ्तार कर लिया था। सबील अहमद की गिरफ्तारी के बाद से उसके खिलाफ मुकदमा चल रहा है।
सबील अहमद के खिलाफ NIA ने कोर्ट में दलील दी कि दिल्ली में उसके विरुद्ध दर्ज किया गया मामला साजिश रचने का है जबकि बेंगलुरु में चल रहा मामला साजिश का हिस्सा लेने है। ऐसे में दोनों मामले अलग हैं और दिल्ली के मामले के आधार पर उसे कोई राहत ना दी जाए। NIA ने आरोप लगाया कि वह लगातार उन बैठकों का हिस्सा था जहाँ यह साजिश रची जाती थी।
बेंगलुरु का रहने वाला सबील अहमद आतंकी कफील अहमद का भाई है। एयरोनॉटिकल इंजीनियर कफील अहमद ने 2007 में ब्रिटेन के ग्लासगो शहर के एयरपोर्ट पर खुद को उड़ा लिया था। इस आत्मघाती हमले में और कोई नहीं मरा था जबकि कफील के चीथड़े उड़ गए थे।
इस्लाम मजहब के सबसे पाक जगहों मक्का और मदीना सऊदी अरब का हिस्सा है। सऊदी अरब में हर साल लाखों लोग हज यात्रा के लिए पहुँचते हैं। आम तौर पर इस्लाम में मूर्ति पूजा की मनाही है, लेकिन जितनी कट्टरता से वहाबी और सऊद घराना मूर्तिपूजा से नफरत करता है, उतना शायद ही कोई करता हो। सऊदी अरब में कई ऐसे इस्लामिक केंद्र रहे थे, जो मूर्ति पूजा को बढ़ावा दे सकते थे, सऊदी अरब की सरकार और वहाबियों ने उन्हें जब से ही तबाह कर दिया या फिर उनके इस्तेमाल के तरीके को ही बदल दिया।
इससे पहले कि हम इस बात पर को बताएँ कि ‘मूर्ति पूजा’ का दमन करने के लिए किस तरह से ऐतिहासिक ढाँचों को बर्बाद किया जा रहा है, उससे पहले ये जानना जरूरी है कि वहाबी कौन हैं और सऊद घराने का अस्तित्व किस बात से जुड़ा है।
वहाबी सुन्नी इस्लाम का सबसे रूढ़िवादी शाखा है। इस्लाम की इस कट्टरपंथी शाखा को वहाबिज्म कहा जाता है, जिसकी स्थापना 18वीं शताब्दी में मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने की थी। वहाबी पैगंबर मुहम्मद द्वारा प्रचलित और प्रचारित इस्लाम के “शुद्ध” रूप की ओर ‘वापस लौटने’ का प्रयास करते हैं। वहाबीवाद सख्त एकेश्वरवाद पर जोर देता है और मूर्ति पूजा जैसी प्रथाओं का कड़ा विरोध करता है क्योंकि यह उसे शिर्क ‘पाप’ बताता है। यही नहीं, वहाबी तो संतों/सूफियों और इस्लाम से जुड़े प्रतीकों को भी मानने से इन्कार करता है। यानी वहाबियों के हिसाब से दरगाहों पर जाकर अपने पुरखों को भी याद करना ‘शिर्क’ है।
इस्लाम की कट्टर वहाबी शाखा की शुरुआत करने वाले मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने दिरियाह में पनाह ली थी, जो आज के दिनों में रियाद शहर के बाहरी इलाके में स्थित छोटा सा शहर नखलिस्तान कहा जाता है। दिरियाह पर अल सऊद के सरदार मुहम्मद इब्न सऊद का शासन था। सऊद ने न सिर्फ वहाब को हिजाज़ (इसी में मक्का-मदीना आते थे) से बाहर निकाले जाने के बाद उसे रहने की जगह दी, बल्कि उसके साथ साल 1744 में एक समझौता भी किया। इस “वहाबी-सऊदी समझौते” के तहत पहले सऊदी राज्य की स्थापना हुई, जिसमें मुहम्मद इब्न सऊद को अमीर की पदवी मिली, जबकि वहाब को “इमाम” की उपाधि दी गई।
ये समझौता मजबूत रहे, इसके लिए इब्न सऊद के सबसे बड़े बेटे ने अल-वहाब की बेटी से निकाह किया और इसके बाद अल सईद ने सार्वजनिक रूप से वहाबिज्म को स्वीकार कर लिया। वहाब के इस कट्टरपंथी इस्लाम ने मजहबी सुधारों का तीखा विरोध किया और सूफी कार्यक्रमों, संतों की इबारत पर रोक लगा दी। यही नहीं, नजद के बाहर जब सऊद ने जीत दर्ज की, तो उसके नेतृत्व में शिया मस्जिदों को ध्वस्त कर दिया गया। यही नहीं, शियाओं को अलग दिखाने के लिए उन्हें ‘रफीदा’ (अस्वीकार करने वालों) का अपमानजनक टैग दिया, जो आज भी जारी है। पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी देश में शियाओं को काफिर मान कर उनका दमन किया जाता है।
वहाबी विचारधारा के कट्टरपंथी विचारों की नवजह से सऊदी अरब के कई ऐतिहासिक स्मारकों को व्यवस्थित तरीके से बर्बाद कर दिया गया। वहाबियों का मानना था कि ऐसी ऐतिहासिक जगहों को बचाने से मूर्ति पूजा को बढ़ावा मिलेगा और लोग प्रतीकों को मानने लगेंगे, जोकि इस्लाम के खिलाफ है। ऐसे में उन्होंने कई ऐतिहासिक और धार्मिक ढाँचों को नष्ट कर दिया। इसके साथ ही किसी भी तरह की इबादत और मजहबी यात्रा पर बैन लगा दिया गया, जिसमें अल्लाह के अलावा किसी को भी मानने की बात हो।
कर्बला में हुसैन इब्न अली की कब्र को किया तबाह
साल 1802 में सऊद बिन अब्दुल-अजीज की अगुवाई में वहाबियों की सेना ने कर्बला शहर पर हमला किया। कर्बला उस समय तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य में आता था। कर्बला आज भी शिया मुस्लिमों के लिए पाक शहर है, लेकिन दिरिया पर हमले के दौरान अब्दुल अजीज की अगुवाई वाली सेना ने हुसैन इब्न अली की कब्र को नष्ट कर दिया, हजारों शिया मुस्लिमों को मार डाला और शहर को लूट लिया। वहाबियों ने मुहर्रम के महीने से ठीक पहले दो से पाँच हजार से अधिक शियाओं का नरसंहार किया।
हालाँकि मौजूदा समय में कर्बला इराक में है, लेकिन शियाओं के इस पवित्र स्थल पर वहाबी-सऊदी हमले से वहाबियों की कट्टरपंथी मानसिकता को एक्सपोज कर दिया। वहाबी लोग शफ़ाअत (शफ़ाअत) जैसे कर्मकांडों को शिर्क (बहुदेववाद/मूर्तिपूजा) के संकेत मानते हैं। शफ़ाअत का मतलब है, मुस्लिम संत (सूफियों) के ज़रिए अल्लाह से प्रार्थना करना, कब्रों पर इमारतें (दरगाह) बनाना, तीर्थयात्रा (ज़ियाराह) और तवस्सुल (अल्लाह के नजदीक जाने के लिए की जाने वाली इबारत), जिसका वहाबी कड़ा विरोध करते हैं।
कर्बला को तबाह करने के महज 4 साल के भीतर ही साल 1806 तक वहाबियों ने मदीना शहर पर कब्ज़ा कर लिया और उन इमारतों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया, जिनसे उन्हें डर था कि वे मूर्तिपूजा को बढ़ावा देंगी। वहाबी ताकतों ने जन्नत-अल-बाकी कब्रिस्तान के अंदर और बाहर सभी गुंबदों और ढाँचों को नष्ट कर दिया। यह कोई साधारण कब्रिस्तान नहीं था, बल्कि मदीना के हिजाज़ में पहला इस्लामी कब्रिस्तान था। उन्होंने इस्लामी महत्व की अन्य इमारतों के अलावा फातिमा अल-ज़हरा की मस्जिद, अल-मनरतैन की मस्जिद और क़ुब्बत अल-थानाया को भी नष्ट कर दिया।
अल बाक़ी कब्रिस्तान की एक ताज़ा तस्वीर (स्रोत: अल अरबिया)
साल 1816 में दिरिया के अमीर अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन सऊद के खिलाफ़ ओटोमन सेना का नेतृत्व करने वाले मिस्र के वली मुहम्मद अली पाशा के बेटे तुसुन पाशा की मौत हो जाने के बाद साल 1818 में सुल्तान महमूद द्वितीय के नेतृत्व में ओटोमन खिलाफत ने वहाबियों को कुचलने का फैसला किया। इसी क्रम में तुसुन पाशा के बेटे इब्राहिम पाशा ने दिरिया में सेना का नेतृत्व किया और वहाबियों को बुरी तरह से हराकर मक्का-मदीना पर फिर से कब्जा कर लिया। इसके साथ ही सऊद की पहली सल्तनत यानी राज खत्म हो गया। सऊद कबीले की हार और वहाबियों की हार के बाद ओटोमन साम्राज्य ने फिर से मस्जिदों को बनवाया। ओटोमन साम्राज्य ने पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा अल-ज़हरा, ज़ैनुल ‘अबिदीन (‘अली बिन अल-हुसैन), मुहम्मद इब्न ‘अली अल-बाकिर और जाफ़र अल-सादिक की कब्रों पर गुंबद का निर्माण भी कराया।
ओटोमन साम्राज्य द्वारा इन मस्जिदों, दरगाहों के फिर से निर्माण का सिलसिला लंबे समय तक नहीं चल पाया, क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध में हार के बाद सऊद कबीला फिर से उभरा और उसने साल 1924 में फिर से मक्का और मदीना पर कब्ज़ा कर लिया। वहाबी-सऊद ने जन्नत उल बक़ी कब्रिस्तान पर फिर से हमला बोलकर कब्रों, मस्जिदों, गुंबदों और अन्य ढाँचों को तबाह कर दिया। 25 अप्रैल 1925 को राजा इब्न सऊद की अनुमति से वहाबी ताकतों ने मकबरों, गुंबदों और कब्रों को नष्ट कर दिया। यहाँ नष्ट की गई कब्रों में पैगंबर मुहम्मद की अम्मी अमीना, अब्बू अब्दुल्ला इब्न अब्दुल-मुत्तलिब और प्रमुख इमामों के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों की कब्रें भी शामिल थीं।
जन्नत-उल-बकी कब्रिस्तान की एक पुरानी तस्वीर स्रोत: Cities from Salt
आज भी वहाबी मौलवी ऐसे कई ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी जगहों को बर्बाद करने को उचित ठहराते हैं कि जो लोग मर गए, उनकी इबादत से अल्लाह की इबादत में खलल पड़ती है।
मक्का-मदीना के विकास और विस्तार की आड़ में कई प्राचीन संरचनाओं को किया गया तबाह
उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने ग्रैंड मस्जिद में ज्यादा लोगों के आने के लिए 4 प्रमुख विस्तार परियोजनाएँ शुरू की। किंग अब्दुल अजीज ने साल 1955 में ऐसा पहला प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें नए फ्लोर्स का निर्माण, नया बड़ा आँगन, बिजली की रोशनी और पंखे लगाए जाने थे। ऐसा दूसरा प्रोजेक्ट साल 1988 में किंग फहद ने शुरू किया, जिसमें ग्रैंड मस्जिद के पूर्वी और पश्चिम किनारों पर नए पंखे लगाने, मीनारों के निर्माण, एक्सेलेटर और एसी सिस्टम लगाने जैसी सुविधाएँ बनाई गई।
साल 2008 में किंग अब्दुल्ला इब्न अब्दुलअजीज के नेतृत्व वाली सऊदी सरकार ने ग्रैंड मस्जिद के विस्तार को मंजूरी दी, जिसमें इसके उत्तर और उत्तर-पश्चिम में 3,200,000 वर्ग फीट भूमि का अधिग्रहण शामिल था। 2011 में किंग अब्दुल्ला की सरकार ने घोषणा की कि 21 बिलियन डॉलर की लागत वाली “किंग अब्दुल्ला विस्तार परियोजना” के तहत मीनारों सहित कई नई संरचनाएँ खड़ी की जाएंगी और 2.5 मिलियन हज तीर्थयात्रियों की जगह के लिए परिक्रमा (मताफ़) क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा। इसके बाद से मक्का-मदीना के कई ऐतिहासिक स्थलों को बर्बाद कर दिया गया।
मक्का-मदीना में जो चीजें नष्ट की गई, उसमें ऑटोमन साम्राज्य द्वारा बनवाया गया महत्वपूर्ण वास्तुशिल्प पोर्टिको भी शामिल है। इसे 17वीं शताब्दी में बनाया गया था, जो अपने शानदार मेहराबों और खंबों के लिए मशहूर थी। ऑटोमन पोर्टिको को तोड़े जाने की वजह से साल 2013 में तुर्की में काफी विरोध हुआ। यही नहीं, अब्बासियों को बनाए गए ग्रैंड मस्जिद के कुछ अहम हिस्सों को भी इस दौरान नष्ट कर दिया गया।
ऑटोमन पोर्टिको (स्रोत: सीएनएन)
रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1985 से अब तक 98% ऐतिहासिक और इस्लामी विरासत स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया है। आलोचकों का आरोप है कि सऊदी सरकार इतिहास को “मिटाना” चाहती है। ऐसी ही एक खास विरासत, जो पैगंबर मुहम्मद के चाचू हमजा का घर था, उसे होटल बनाने के लिए तोड़ दिया गया।
यही नहीं, वहाबियों और सऊद की जोड़ी ने पैगम्बर मुहम्मद की बीवी खदीजा का घर भी तोड़ दिया गया। खदीजा के घर की जगह पर एक दशक पहले 1400 सार्वजनिक शौचालय बना दिए गए। ब्रिटिश इतिहासकार जियाउद्दीन सरदार ने अपनी किताब मक्का: द सेक्रेड सिटी में भी इसकी पुष्टि की है।
सरदार ने लिखा, “यह परिसर अल-अयाद किले के ऊपर बना था, जिसे 1781 में बनाया गया था और अब यह मक्का को हमलावरों से बचाने का अपना काम नहीं कर सकता। ग्रैंड मस्जिद कॉम्प्लेक्स के दूसरे छोर पर, जैसा कि इसे अब कहा जाता है, पैगम्बर मुहम्मद की पहली पत्नी खदीजा का घर शौचालयों के एक ब्लॉक में बदल दिया गया है। रॉयल मक्का क्लॉक टॉवर पवित्र मस्जिद के ऊपर मँडराती एकमात्र इमारत नहीं है। यहाँ रैफल्स मक्का पैलेस है, जो एक लग्जरी होटल है, जहाँ चौबीसों घंटे बटलर सेवा उपलब्ध है। इसके अलावा मक्का हिल्टन भी है, जो पैगम्बर के सबसे करीबी साथी और पहले खलीफा अबू बकर के घर के ऊपर बना है। यहाँ इंटरकॉन्टिनेंटल मक्का जैसे कई ढाँचे हैं। इस ब्लॉक में कई अन्य पाँच सितारा होटल और ऊँचे-ऊँचे अपार्टमेंट ब्लॉक हैं।”
उन्होंने आगे लिखा है, “अगले दशक के दौरान पवित्र मस्जिद के नीचे की ओर 130 स्काईस्क्रैपर (बहुमंजिली इमारतें) बनाए जाएँगे, ताकी इसमें 5 मिलियन लोग यानी 50 लाख हज यात्री एक साथ आ सकें। इतिहास को तबाह करने के लिए सऊदी अरब ऑटोमन-जमाने के निर्माण को ध्वस्त कर रहा है, खासकर वो हिस्सा, जो सबसे पुराना है। 1553 से 1629 तक ओटोमन सुल्तानों – सुल्तान सुलेमान, सुल्तान सलीम I, सुल्तान मुराद III और सुल्तान मुराद IV और उनके उत्तराधिकारियों ने जो शानदार मस्जिद बनवाए, उन सबको तोड़ दिया जाएगा और एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग का निर्माण किया जाएगा।”
सरदार ने आगे लिखा है, “पैगंबर के साथियों के नाम जिन खंबों पर लगे हैं, उन्हें भी ध्वस्त कर दिया जाएगा। वास्तव में पुरानी मस्जिद को पूरी तरह से बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया जाएगा। इतिहास इस्लाम के दूसरे खलीफा उमर इब्न जुबैर से शुरू होता है, जिन्होंने काबा के पुनर्निर्माण के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था, और अब्बासी खलीफाओं तक, जिन्होंने मौजूदा मस्जिद बनाई थी। वो सबकुछ तोड़ दिया जाएगा। उसकी जगह पर 12 फ्लोर की नई बिल्डिंग बनाई जाएगी, ताकी हज पर आने वाले लोग ‘शैतानों को पत्थर मार’ सकें। ऐसा लगता है कि कुछ ही समय में पैगंबर मोहम्मद के घर को भी ढहा दिया जाएगा, जो भव्य रॉयल पैलेस के सामने है। उसे जमींदोज कर कार पार्किंग की जगह पर बदल दिया जाएगा।”
जियाउद्दीन सरदार की पुस्तक मक्का: द सेक्रेड सिटी का पेज
इसी कड़ी में 13 अगस्त 2002 को मदीना में मस्जिद-ए-नबवी से चार किलोमीटर दूर स्थित पैगंबर मुहम्मद के वारिसों में नौंवें नंबर पर आने वाले सैयद इमाम अल-उरैदी इब्न जाफर अल-सादिक की 1,200 साल पुरानी मस्जिद और मकबरे को धमाके से उड़ा दिया गया और पूरी तरह से तबाह कर दिया गया।
यही नहीं, साल 2003 में एक ऐतिहासिक ओटोमन अज्याद किला जो कभी मक्का को हमलों से बचाता था और 200 साल से भी ज़्यादा पुराना था, उसे ध्वस्त कर दिया गया। इसकी जगह पर 601 मीटर ऊँचा मक्का रॉयल होटल क्लॉक टॉवर बना दिया गया। यह क्लॉक टॉवर ‘बिन लादेन ग्रुप’ ने बनाया है, जिसमें पाँच मंज़िला शॉपिंग मॉल, लग्जरी होटल, पार्किंग आदि शामिल हैं।
अज्याद किला (स्रोत: विकिपीडिया)
तुर्की ने अज्याद के किले को बचाने के लिए यूनेस्को से हस्तक्षेप की माँग की थी, लेकिन यूनेस्को ने इस मामले में कुछ भी नहीं किया। यही नहीं, मक्का-मदीना में सड़कों को बनाने के लिए कई पहाड़ों को भी काट दिया गया। साल 2013 में मदीना के उत्तर में उहुद पहाड़ी में दरार को कंक्रीट से भर दिया गया था। रिपोर्ट्स कहती हैं कि 625 ई. में कुरैश के खिलाफ उहुद की लड़ाई में घायल होने के बाद पैगंबर मुहम्मद को वहाँ ले जाया गया था। इतना ही नहीं, आज हिल्टन होटल जिस जगह पर है, उस जगह पर इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर का घर हुआ करता था, उस जगह को भी समतल किया जा चुका है।
मदीना में हिल्टन होटल (स्रोत: हिल्टन की वेबसाइट)
इस्लामिक हेरिटेज रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक, इतिहासकार और पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉ. इरफान अल-अलावी ने एक अनुमान के तौर पर बताया है कि विकास कार्यों की आड़ में सऊदी सरकार ने पिछले कुछ सालों में 300 से ज्यादा इस्लामिक ऐतिहासिक विरासत के ढाँचों को नष्ट कर दिया है।
टाइम मैगज़ीन की 2014 की रिपोर्ट में बताया गया, “मदीना में छह छोटी मस्जिदें, जहाँ माना जाता है कि मुहम्मद ने नमाज़ पढ़ी थी, बंद कर दी गई हैं। इस्लाम के पहले खलीफ़ा अबू बकर की सातवीं मस्जिद को एटीएम बनाने के लिए ढहा दिया गया है।” यही नहीं, पैगंबर मुहम्मद की बेटी और उनके चार “सबसे खास साथियों” बनाए गए मशहूर “सात मस्जिदों” में से पाँच को ध्वस्त कर दिया गया है। इसमें मस्जिद अबू बक्र, मस्जिद सलमान अल-फारसी, मस्जिद उमर इब्न अल-खत्ताब, मस्जिद सय्यदा फातिमा बिन्त रसूलिल्लाह, और मस्जिद अली इब्न अबी तालिब शामिल हैं, जो अब मौजूद नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि 75 साल से भी ज़्यादा पहले काबा के पास पैगंबर मुहम्मद की जन्मस्थली को ‘जानवरों के बाजार’ में बदल दिया गया। मौजूदा समय में सुक अल-लैल स्ट्रीट पर स्थित उनके जन्मस्थान को सऊदी सरकार ‘मक्का अल मुकर्रमाह लाइब्रेरी’ नाम की लाइब्रेरी में बदल चुकी है।
सऊदी सरकार द्वारा विरासत स्थलों को ध्वस्त किये जाने पर यूनेस्को की चुप्पी
सऊदी अरब में छह यूनेस्को विरासत स्थल हैं: मक्का और मदीना का एंट्री गेट, दिरियाह में अत-तुरैफ़ जिला, हेल क्षेत्र की रॉक आर्ट, अल-हिज्र पुरातत्व स्थल (मदैन सालेह), अल अहसा ओएसिस और हिमा सांस्कृतिक क्षेत्र। बता दें कि संयुक्त राष्ट्र यूनेस्को के माध्यम से दुनिया भर के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण की वकालत करता रहा है, लेकिन सऊदी अरब में वो पूरी तरह से विफल रहा है।
अफ़गानिस्तान में बामियान बुद्ध प्रतिमाओं का विनाश तथा तालिबान और वहाबी मानसिकता में समानताएं
बता दें कि मार्च 2001 में अफ़गानिस्तान की तालिबान सरकार ने बामियान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया, जो छठी शताब्दी में बामियान घाटी में बनाई गई थी। तालिबान नेता मुल्ला मोहम्मद उमर ने बामियान बुद्ध को ईशनिंदा और इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ घोषित करते हुए उन्हें उड़ाने का हुक्म दिया था। इसकी वजह ये है कि सुन्नी मुस्लिम देवबंदी (हन्फी) समुदाय और तालिबान मूर्तियों को हराम मानता है। इन्हें पूरी दुनिया के विरोध के बावजूद बम लगाकर उड़ा दिया गया।
तालिबान का ऐसा (बामियान को नष्ट करना) करना वहाबी (सलाफी) चरमपंथी विचारधारा से जोड़ता है, जो इस्लाम की शुद्धतावादी स्वरूप को मानता है।
ठीक इसी तरह से, सऊदी अरब भी ऐतिहासिक रूप से इस्लामी विरासत स्थलों को संरक्षित करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखता है। उसका मानना है कि ऐसी जगहें मूर्ति पूजा या शिर्क को बढ़ावा दे सकते हैं। हालाँकि भारतीय सूफियों ने इस साल मई में सऊदी अरब सरकार से मदीना में नष्ट हो चुके जन्नत अल-बकी कब्रिस्तान को फिर से बनाने की अपील की थी, जिसके लिए अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में एक बैठक का भी आयोजन किया गया था। इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं कि सऊदी अरब को इनकी अपील से कोई फर्क नहीं पड़ा, जोकि पड़ना भी नहीं था।
यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में श्रद्धा पाण्डेय द्वारा लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिएयहाँ क्लिक करें।
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने संसद में खालिस्तानी अमृतपाल के लिए धुआँधार बल्लेबाजी की है। बता दें कि जहाँ चरणजीत सिंह चन्नी जालंधर से जीत कर सांसद बने हैं, वहीं अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब लोकसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की है। अमृतपाल सिंह ने वहाँ से कॉन्ग्रेस, भाजपा, AAP और अकाली दल जैसी 4 बड़ी पार्टियों को हराया। बता दें कि वो फ़िलहाल असम के डिब्रूगढ़ जेल में बंद है। फ़िलहाल संसद का बजट सत्र चल रहा है।
चरणजीत सिंह चन्नी लोकसभा में खड़े तो हुए बजट पर अपनी बात रखने, लेकिन अपनी और पार्टी की खालिस्तान को लेकर सोच सबके सामने रख दी। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार पर किसानों के साथ धोखेबाजी का भी आरोप लगाया। इस पर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने उन पर गलत बातें बोल कर भ्रमित करने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूंजीपतियों के कर्ज माफ़ किए जा रहे हैं, जबकि किसानों के नहीं।उन्होंने आरोप लगाया कि धरने पर बैठने के कारण 4 किसानों पर NSA लगाया गया।
चरणजीत सिंह चन्नी ने इस दौरान अमृतपाल सिंह को लेकर कहा कि 20 लाख लोगों द्वारा उसे सांसद चुना गया है। बता दें कि खडूर साहिब लोकसभा क्षेत्र में उसे 4.04 लाख वोट पड़े हैं और कुल पोलिंग ही 10.47 लाख की हुई है। चरणजीत सिंह चन्नी ने कहा कि NSA लगा कर अमृतपाल सिंह को अंदर रखा गया है, वो अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों की बात यहाँ नहीं रख पा रहे। बकौल चन्नी, ये ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के खिलाफ है।
संसद में कांग्रेस सांसद खालिस्तानी अलगाववादी अमृतपाल की रिहाई की मांग कर रहे हैं।
राहुल गांधी और कांग्रेस का भारत जोड़ो का नारा सिर्फ एक ढकोसला था। असलियत में कांग्रेस अलगाववादियों के साथ खड़ी है। pic.twitter.com/JnQ0kEVFuG
बता दें कि राहुल गाँधी ने भी 1 दिन पहले बुधवार (24 जुलाई, 2024) को सिख किसान नेताओं से मुलाकात की थी। पहले उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकार किसानों को संसद में उनसे मिलने के लिए नहीं आने दे रही है। और अब चन्नी ने अमृतपाल का समर्थन किया है। वो अमृतपाल सिंह की गिरफ़्तारी को आपातकाल बता रहे हैं। हाल ही में अमृतपाल का भाई हरप्रीत और उसका दोस्त लवप्रीत ड्रग्स के साथ धराया था। अमृतपाल सिंह ने भारत देश के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था, वो पंजाब को खंडित करने की बातें करता था।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अवमानना के आरोपित एक शख्स पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही उक्त शख्स की बिना शर्त माफ़ी भी उच्च न्यायालय ने स्वीकार कर ली। इसके बाद हाईकोर्ट ने उसे आरोपों से बरी भी कर दिया। उदयपाल सिंह ने आरोप लगाया था कि जज अवैध कृत्यों में लिप्त हैं। जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस मनोज जैन ने फैसला सुनाया। अब उदयपाल सिंह पर अवमानना का मामला नहीं चलेगा, उनकी सशर्त माफ़ी स्वीकार करते हुए जुर्माना लगाते हुए छोड़ दिया गया है।
उन्होंने खुद कहा कि वो 1 लाख रुपए जमा कराना चाहता है, जिसका इस्तेमाल जनहित के कार्यों में किया जा सके। उसका कहना था कि इस सुनवाई के दौरान जो समय और धन नष्ट हुआ है, उसके एवज में वो ये रुपए देना चाहता है। हाईकोर्ट ने उसे आदेश दिया कि वो 2 सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री के समक्ष 1 लाख रुपया जमा कराए। इसमें से 25,000 रुपए दिल्ली हाईकोर्ट की लीगल सर्विसेज कमिटी को दिया जाएगा। साथ ही दिल्ली इंडीजेन्ट एन्ड डिसेबल्ड लॉयर्स लंड को भी इतनी ही रकम मिलेगी।
बाकी के 50,000 रुपए में से आधा-आधा महिलाओं-बच्चों की मदद करने वाली संस्था ‘निर्मल छाया’ और भारतीय सेना के परिजनों की देखभाल करने वाले ‘भारत के वीर’ फंड को जाएगा। हाईकोर्ट ने चेताया कि आरोपित ने अगर भविष्य में दोबारा इस तरह की हरकत की तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उक्त शख्स ने कहा कि जब उसने सोशल मीडिया पर वीडियो डाला तब उसका उद्देश्य न्यायपालिका को नीचा दिखाना नहीं था।
उसने बताया कि एक केस को लेकर उसने सिर्फ अपने विचार रखने के उद्देश्य से ऐसा किया था। बता दें कि न्यू अशोक नगर में स्थित एक संपत्ति विवाद को लेकर ये मामला चल रहा था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उदयपाल सिंह ने ऐसा कर के न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप किया है। वीडियो में उसने अदालत की ‘सच्चाई’ को ‘जनता की अदालत’ में लाने का दावा किया था। एडवोकेट गगन गाँधी ने उदयपाल सिंह का प्रतिनिधित्व किया, जबकि विपक्षी वकील योगेश वर्मा थे।
बरेली में एक गाँव गौसगंज में तेजराम नाम के एक युवक की मुस्लिम भीड़ ने मॉब लिंचिंग कर दी। इलाज के दौरान तेजराम की मौत हो गई। पूरा विवाद घर की महिलाओं के साथ अभद्रता से जुड़ा था, जिसका तेजराम ने विरोध किया था। तेजराम की लिंचिंग की खबर मीडिया से लगभग गायब है।
लिंचिंग के बाद आरोपितों के अवैध निर्माण पर चले बुलडोजर को जरूर दिखाया जा रहा है, जिससे उनके लिए सहानुभूति बने। तेजराम की मौत की खबर गूगल में सर्च करने पर नहीं मिल रही जबकि कुछ साल पहले अखलाक के मारे जाने पर आसमान सर पर उठाया गया था।
तेजराम: मुहर्रम के बाद हुई हिंसा का शिकार
बरेली का एक थाना है, शाही। इसका एक गाँव है गौसगंज। गौसगंज गाँव में 19 जुलाई, 2024 की बड़ा बवाल हुआ। इस बवाल की शुरुआत 16 जुलाई, 2024 से हो चुकी थी। 16 जुलाई को मुहर्रम जुलूस के दौरान गाँव में मुस्लिमों और हिन्दुओं के बीच विवाद हुआ था। बताया गया विवाद का कारण एक ऐसी जगह ताजिया रखा जाना था जो नई थी। यहाँ पहले कभी ताजिया नहीं रखा गया था। हालाँकि, इस विवाद के बाद शान्ति हो गई थी।
19 जुलाई, 2024 को विवाद की शुरुआत अब्दुल के गाँव के पूर्व प्रधान हीरालाल के पक्ष की एक महिला पर लेजर लाईट मारने से हुई। हीरालाल ने इसका विरोध किया और लाईट ना जलाने को कहा। इसके बाद अब्दुल ने आसपास से अपने साथियों को बुला लिया और इलाके में तोड़फोड़ और पथराव चालू कर दिया। लगभग 60-70 की संख्या में लोग हीरालाल और आसपास के लोगों को घरों में घुसने लगे और लोगों को मारने पीटने लगे। महिलाओं पर भी हमला किया गया।
इस हमले में कई लोग घायल हो गए। इसके बाद हीरालाल का बेटा तेजराम मुस्लिम पक्ष के लोगों को झगड़ा ना करने के लिए समझाने गया। झगड़ा शांत करने के बजाय मुस्लिम भीड़ तेजराम पर हमलावर हो गई। तेजराम को भीड़ में शामिल युवक गाँव की मस्जिद में उठा ले गए और लाठी-डंडों और लोहे की रॉड से पीटा। तेजराम को मस्जिद में ले जाने की पुष्टि परिजनों और स्थानीय लोगों ने की है। यह खुलासा आप इस वीडियो में 5:00 से 10:00 के बीच सुन सकते हैं।
घटना में तेजराम गंभीर रूप से घायल हो गया। उसको ऐसे फेंक दिया गया। तेजराम को इसके बाद परिजन बरेली के एक अस्पताल में ले गए। यहाँ उसका इलाज करवाया गया लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। तेजराम की 22 जुलाई, 2023 की रात मौत हो गई। इसके बाद उसके शव का पोस्टमार्टम कर परिजनों को सौंप दिया गया। घटना में घायल हुए बाक़ी लोगों का इलाज चल रहा है। तेजराम की मौत के परिजन और ग्रामीण आक्रोशित हो गए।
आरोपितों पर बुलडोजर की कार्रवाई
घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस गौसगंज गाँव में पहुँची। यहाँ उसने दोनों पक्षों के बीच मामला शांत करवाया। पुलिस ने इस संबंध में दो FIR दर्ज की हैं। पुलिस ने मामले में 70 से अधिक लोगों को आरोपित बनाया है। पुलिस ने 35 उपद्रवियों को गाँव में छापा मार कर पकड़ा है। 2 आरोपितों को पुलिस ने एनकाउंटर के बाद पकड़ा। कई लोगों को तलाश जारी है। पुलिस ने राजस्व विभाग से गाँव में आरोपितों के निर्माण की नापजोख भी करवाई, इसमें 10 से अधिक निर्माण अवैध मिले।
थाना शाही क्षेत्रान्तर्गत ग्राम गौसगंज में दिनांक 19.07.2024 को घटित घटना के सम्बन्ध में पंजीकृत अभियोगो में 35 अभियुक्तों की गिरफ्तार आदि की कार्यवाही होने के सम्बन्ध में पुलिस अधीक्षक दक्षिणी बरेली की बाइट।#UPPolicepic.twitter.com/BeJjVLJAvg
प्रशासन ने बख्तावर, इशारत, मुकीम, यासीन, युसूफ, इश्तियाक और अशफाक समेत कई अवैध निर्माण सोमवार को बुलडोजर की मदद से ढहा दिए। कार्रवाई के डर से हिंसा के कई आरोपित अभी फरार हैं। कई अपना घर छोड़ चुके हैं और बाहर के इलाकों में छुपे हुए हैं। अशरफ और आसिफ नाम के दो आरोपितों पर पुलिस ने ₹25,000 का इनाम भी रखा हुआ है।
सवाल: अखलाक की मौत पर हल्ला, तेजराम की मौत पर चुप्पी
तेजराम की मॉब लिंचिंग के कारण मौत हो गई। उसकी मौत की खबर को मीडिया में कोई ख़ास जगह नहीं मिली। मीडिया ने भी एक हिन्दू व्यक्ति के मरने को तरजीह नहीं दी। हालाँकि, तेजराम की मौत के बाद आरोपितों के अवैध निर्माण गिराए जाने को खूब मीडिया कवरेज मिली। कब्जा करने वालों के घरों की महिलाओं के रोते हुए विजुअल चलाए गए। भारत में यदि किसी की मॉब लिंचिंग हो जाए, तो मौत पर कितना विरोध हो और कितनी आवाज उठाई जाए, यह धर्म देखकर तय होता है।
नैरेटिव की लड़ाई हार रहा है हिन्दू! बरेली में तेजराम को Jहादियों की भीड़ घर से खींच कर ले गई और मस्जिद के अंदर उसे लिंच करके मार दिया। लेकिन ये खबर मोहर्रम के बवाल के रूप में दिखेगी, बुलडोजर चला के रूप में दिखेगी। लेकिन एक दलित हिन्दु तेजराम की मस्जिद में लिंचिंग की खबर कहीं नहीं… pic.twitter.com/sgP7RqNI9F
इसका सबसे बड़ा उदाहरण तेजराम है। तेजराम को मात्र अपने पक्ष के लोगों की आवाज उठाने के लिए मार दिया गया है। एक और घटना याद कीजिए, एक तबरेज नाम का व्यक्ति था, जिसकी मौत हो गई थी। आरोप था कि उसकी हत्या की गई। झारखंड में 2019 में हुई इस मौत पर खूब बवाल हुआ था जबकि तबरेज पर चोरी का आरोप था। बाद में सामने आया था कि तबरेज की मौत का कारण हृदयाघात था। ऐसी ही 2015 की एक और घटना में उत्तर प्रदेश के ही चरखी दादरी में अखलाक नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।
तब मीडिया ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अखलाक की मौत का मुद्दा उठा था। मीडिया ने महीने भर तक गाँव में डेरा डाल दिया। गाँव वालों ने त्रस्त हो कर मीडिया को भगाना चालू कर दिया था। अखलाक की मौत का कारण पिटाई बताया गया था जो कि गौमांस पकाने के आरोप में हुई थी। अखलाक के मामले में करोड़ों का मुआवजा दिया गया। मीडिया कवरेज इसके सालों बाद तक जारी है। भारत पर प्रोपेगेंडा चलाने वाले चैनलों ने इसके ऊपर पूरी सीरिज चलाई। लेकिन तेजराम की मौत पर सन्नाटा है।
बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर शाखा ने एक डॉक्टर और सेना के एक जवान के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। इन दोनों पर आरोप था कि इन्होंने ‘वन्दे मातरम बोलो या फिर पाकिस्तान जाओ’ वाला बयान देकर मुस्लिमों की भावनाओं को आहत किया है। जस्टिस विभा कंकणवाडी और वृषाली जोशी ने बुधवार (24 जुलाई, 2024) को इस पर दुःख जताया कि आजकल हर कोई अपने मजहब और अपने खुदा को बाकी सबसे ऊपर दिखाना चाहता है।
दोनों जजों ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और सभी को एक-दूसरे के मजहब का सम्मान करना चाहिए। जजों के अनुसार, वो ये कहने को बाध्य हैं कि आजकल लोग अपने मजहबों को लेकर कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं, पहले से भी बहुत अधिक। उन्होंने कहा कि हम एक लोकतांत्रिक सेक्युलर देश में रहते हैं जहाँ सबको एक दूसरे के मजहब-जाति-नस्ल का सम्मान करना चाहिए। हालाँकि, हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि अगर कोई कहता है कि उसका मजहब और खुदा सर्वोच्च है तो फिर कोई इस पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे सकता, इसके लिए और भी तरीके और साधन हैं।
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ 41 वर्षीय सेना के जवाब प्रमोद शेंद्रे और 47 साल के डॉक्टर सुभाष वाघे की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामला 2017 के एक Whatsapp ग्रुप चैट का है, जिसमें 150-200 सदस्य मौजूद थे। शिकायतकर्ता शबाज़ सिद्दीकी का कहना है कि दोनों ने पहले मुस्लिम समाज को लेकर कुछ सवाल पूछे, जो आपत्तिजनक थे। जब ग्रुप में कुछ मुस्लिमों ने ‘वन्दे मातरम’ कहने से इनकार कर दिया तो शेंद्रे और वाघे ने उन्हें पाकिस्तान चले जाने को कह दिया था।
Bombay High Court cancels FIR against 2 over 'go to Pakistan' remark
A soldier and a medical practitioner in Maharashtra were accused of allegedly urging others to go to Pakistan if they did not say 'Vande Mataram'.
शाहबाज़ सिद्दीकी ने कहा कि ‘वन्दे मातरम’ का अर्थ होता है माँ की पूजा करना, इसीलिए उन्होंने इसे कहने से इनकार कर दिया था। उनका कहना है कि ऐसे करने पर इस्लाम से निकाल दिया जाता। बकौल शाहबाज़ सिद्दीकी, मुस्लिम सिर्फ ‘हिंदुस्तान ज़िंदाबाद’ कह सकते हैं। नागपुर में सिद्दीकी द्वारा FIR भी दर्ज करवाई गई थी। आरोपितों के वकील समीर सोनवणे का कहना था कि सिद्दीकी को जानबूझकर ग्रुप का सदस्य बनाया गया था ताकि ऐसी स्थिति आ जाए।
उन्होंने कहा कि प्रमोद और सुभाष को ये चिंतनीय लगा था कि भारत के ही कुछ लोग ‘वन्दे मातरम’ का विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों आरोपित सम्मानित व्यक्ति हैं और अपने देश से प्यार करते हैं, ऐसे में उन्हें कोर्ट में घसीटना अन्याय होगा। जबकि मुस्लिम पक्ष के वकील का कहना था कि वो दोनों हिंदू धर्म को श्रेष्ठ दिखाना चाहते थे और उनके मन में मुस्लिमों के प्रति दुर्भावना थी। हाईकोर्ट ने जाँच को त्रुटिपूर्ण बताते हुए FIR रद्द करने का आदेश दिया। चैट वाले दिन सिद्दीकी डॉ सुभाष के क्लिनिक भी पहुँच गया था और वहाँ लड़ाई की थी।
जजों ने नोट किया कि ग्रुप में 150-200 सदस्य होने के बावजूद पुलिस ने सिर्फ 4 मुस्लिमों के ही बयान दर्ज किए। उन्होंने खुद बताया कि वो ग्रुप में ज़्यादा सक्रिय भी नहीं थे। उच्च न्यायालय ने कहा कई ये एक राजनीतिक बहस थी और ऐसी बहस को गर्मागर्मी हो जाती है। पुलिस ने ये तक पता नहीं किया कि उक्त ग्रुप का एडमिन कौन था। ग्रुप में कितने मुस्लिम थे, ये भी पुलिस नहीं बता पाई। साथ ही ये IPC के 295A का भी मामला नहीं था, क्योंकि व्हाट्सएप्प में मैसेज एन्ड टू एन्ड एन्क्रिप्टेड होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू नेता कमलेश तिवारी की हत्या के एक साजिशकर्ता को जमानत दे दी है। अप्रैल 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सैयद आसिम अली को बेल देने से इनकार कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने के आदेश के बाद अब वो न्यायिक हिरासत से बाहर आ जाएगा। कमलेश तिवारी ‘हिन्दू समाज पार्टी’ संगठन के नेता थे। जस्टिस अभय S ओका और जस्टिस अगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने ये फैसला सुनाया। इन दोनों ने कहा कि आरोपित पहले से ही साढ़े 4 वर्ष से जेल में है।
इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता/आरोपित के खिलाफ लगाए गए आरोपों का भी जिक्र किया। बता दें कि सैयद आसिम अली पर हत्यारों के संपर्क में रहने और उन्हें कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का आरोप है। सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उसे उत्तर प्रदेश के 1986 के गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला नहीं चलाया गया था। बता दें कि 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को लखनऊ से प्रयागराज ट्रांसफर कर दिया था।
अक्टूबर 2019 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने कमलेश तिवारी के दफ्तर में घुस कर उन्हें मार डाला था। उन पर गोली चलाई गई थी, साथ ही चाकू से भी वार किया गया था। मोहम्मद मुफ़्ती नईम काज़मी और इमाम मौलाना अनवारुल हक़ ने 2016 में ही उनकी हत्या का फरमान जारी करते हुए इनाम देने की घोषणा की थी। मुस्लिम कट्टरपंथियों का मानना था कि कमलेश तिवारी ने पैगंबर मुहम्मद का अपमान किया है। इसके पीछे गहरी साजिश का पता चला, 13 आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
हाईकोर्ट ने इसे क्रूरता से दिनदहाड़े हुई हत्या बताते हुए कहा था कि ये कट्टर सांप्रदायिक घृणा का प्रदर्शन था। हाईकोर्ट ने माना था कि सैयद आसिम अली का भी इस हत्याकांड में किरदार है। हत्यारों से उसने घटना से तुरंत पहले कई बार बात की थी। इसके इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी हैं। कमलेश तिवारी की हत्या अशफाक और मोईनुद्दीन ने की थी। हाईकोर्ट ने माना था कि सैयद आसिम अली पूरी साजिश में शामिल था। कमलेश तिवारी की हत्या के बाद भारत में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव पर बड़ी बहस छिड़ गई थी।
गाजियाबाद में मोहम्मद आलम ने अपनी लिव इन पार्टनर पूजा की हत्या कर शव नहर में फेंक दिया। मोहम्मद आलम का पहले ही निकाह हो चुका था, वह पूजा को अपने साथ नहीं रखना चाहता था। पुलिस ने मामला दर्ज कर मोहम्मद आलम को गिरफ्तार कर लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मोहम्मद आलम पूजा के साथ 4 साल से लिव इन में रहता था। पूजा का अपने पहले पति से विवाद चल रहा था। पूजा बीते कुछ समय से उसके साथ रहने की जिद कर रही थी। इसी से क्रुद्ध हो कर उसने पूजा की चुन्नी से गला घोंट कर हत्या कर दी और शव नहर में फेंक दिया। इसके बाद उसने पुलिस के पास गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखा दी।
यह पूरा मामला पूजा की बहन के पूनम के पुलिस के पास पहुँचने के बाद खुला। पूनम ने पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसकी बहन कुछ दिनों से गायब हो गई है। पूनम ने अपनी बहन के साथ रहने वाले आलम पर शक जताया था। इसके बाद पुलिस ने इस मामले की जाँच चालू की।
पुलिस ने आलम को हिरासत में लिया और उससे पूछताछ की। इसके बाद आलम ने पूरी वारदात का खुलासा किया। आलम ने बताया कि उसकी पूजा से मुलाक़ात 5 साल पहले हुई थी। उसकी मुलाक़ात पूजा से गाजियाबाद के विजयनगर में हुई थी। यहाँ वह कार मैकेनिक की दुकान करता था।
इसके बाद उसकी पूजा से नजदीकी बढ़ गई। पूजा अपने पूर्व पति से अलग रहती थी, उसका तलाक को चुका था। पूजा के भी तीन बच्चे हैं। पूजा से नजदीकियाँ बढ़ने के बाद आलम ने उसके साथ लिव इन में रहना चालू कर दिया। आलम भी इससे पहले से निकाह कर चुका था। उसके 4 बच्चे हैं और उसकी पत्नी शना गाँव में रहती है।
पूजा से मुलाक़ात के कुछ समय बाद उसने नोएडा में कार मैकेनिक दुकान खोल ली थी। यह भी बताया गया कि आलम ने 6 माह पूर्व पूजा से भी निकाह कर लिया था। आलम ने बताया कि यह निकाह घर पर ही हुआ था। इसके कुछ दिनों के बाद से पूजा दबाव बनाती थी कि आलम उसके साथ ही रहे।
पूजा लगातार आलम पर दबाव बढ़ाती जा रही थी जबकि आलम इसके लिए तैयार नहीं था। आलम ने पूजा को इसके बाद रास्ते से हटाने का सोच लिया था। आलम ने उसकी हत्या का प्लान तैयार किया था। इसके बाद 19 जुलाई को पूजा ने उससे फिर यही मांग की और मिलने का दबाव बनाने लगी।
इस दौरान आलम का बेटा गाजियाबाद के एक अस्पताल में भर्ती था। पूजा उससे अस्पताल मिलने आने का दबाव बनाने लगी। इसके बाद दोनों बाहर एक जगह मिले और आलम पूजा को गाड़ी में बिठा ले गया। इसी दौरान दोनों में विवाद हुआ। इसके बाद आलम ने चुन्नी से गला घोंट कर पूजा की हत्या कर दी।
थाना विजयनगर पुलिस टीम द्वारा महिला की गुमशुदगी/अपहरण की घटना का अनावरण, एक अभियुक्त गिरफ्तार व घटना में प्रयुक्त कार बरामद।@Uppolicepic.twitter.com/Tm9d3ErM25
— POLICE COMMISSIONERATE GHAZIABAD (@ghaziabadpolice) July 24, 2024
आलम ने पूजा के शव को गाजियाबाद की एक नहर में फेंक दिया। इसके बाद वह खुद पुलिस के पास पहुँचा और गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करवा दी। हालाँकि, बाद में पूरा मामला खुल गया। पुलिस ने मोहम्मद आलम को गाजियाबाद से गिरफ्तार कर उसके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।
मद्रास हाई कोर्ट में एक वकील ने अपने वेश्यालय के विरुद्ध कार्रवाई के खिलाफ याचिका दायर कर दी। वकील ने दावा किया कि वह लोगों को स्वेच्छा से सेक्स के लिए मिलाने का काम करता है। हाई कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई करते हुए वकील की डिग्री जाँचने के आदेश दे दिए।
मद्रास हाई कोर्ट इस मामले की सुनवाई करते समय बिफर गया। हाई कोर्ट ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि कोई वकील वेश्यालय जैसी चीज को बचाने के लिए याचिका लेकर आया है। हाई कोर्ट ने इसे बड़े दुख की बात बताया और कहा कि यह वकील भी कन्याकुमारी से है जो 100% साक्षर है।
कोर्ट इस याचिका से उखड़ गया और वेश्यालय चलाने वाले वकील से उसकी डिग्री और उसका बार काउंसिल सर्टिफिकेट दिखाने का आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने बार काउंसिल से कहा कि अच्छे कॉलेज से पढ़े वकीलों को ही पंजीकृत करे और इधर उधर से डिग्री लेने वालों को मान्यता ना दे। कोर्ट ने बार काउंसिल को उसके कागज जाँचने के आदेश भी दे दिए हैं।
कोर्ट ने कहा कि वकालत एक इज्जतदार पेशा है और वकील सामाजिक बदलाव के इंजीनियर हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने एक गरीब लड़की की गरीबी का फायदा उठा कर उसको वेश्यावृत्ति में झोंका है। कोर्ट ने वकील की याचिका को खारिज कर दिया और उस पर ₹10,000 का जुर्माना भी लगाया।
गौरलतब है कि मद्रास हाई कोर्ट की मदुरई बेंच में एक वकील मुरुगन ने एक याचिका दायर की थी। याचिका में माँग की गई थी कि उसके ऊपर नागरकोइल शहर में वेश्यालय चलाने के कारण दर्ज की गई FIR को रद्द कर दिया जाए और उन पुलिस वालों पर कार्रवाई की जाए जो इस धंधे में खलल डाल रहे थे।
मुरुगन ने हाई कोर्ट में याचिका लगाकर कहा था कि देश में सहमति से किया गया सेक्स मान्य है और वह ऐसे ही लोगों को मिलवाता है। मुरुगन ने अपन वेश्यालय पर कार्रवाई के पीछे रिश्तेदारों की साजिश की भी बात कही थी। उसने हाई कोर्ट से उसके खिलाफ सभी मामले रद्द करने की माँग की थी।
इस मामले में फरवरी, 2024 में नागरकोइल के इस वेश्यालय पर मारे गए छापे में एक 17 वर्ष की लड़की को भी बचाया गया था। लड़की ने पुलिस को बताया था कि उसका यहाँ शोषण हो रहा था। इस कार्रवाई के बाद मुरुगन के विरुद्ध POCSO समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
ब्रिटेन के लेस्टर में 2022 में हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा भड़काने वाले मुस्लिम कट्टरपंथी माजिद फ्रीमैन पर सुरक्षा एजेंसियों ने आतंक को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। उसके इस्लामी आत्न्क्की संगठन हमास और फ़्रांस में हुए चार्ली अब्दो पर हमले को बढ़ावा देने के सबूत मिले हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 36 वर्षीय माजिद नोवसरका को बुधवार (24 जुलाई, 2024) को कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट में उसके ऊपर दिसम्बर, 2023 और जून, 2024 के बीच माजिद ने लगातार इस्लामी आतंकी संगठन हमास के समर्थन में खूब प्रचार किया।
हमास ब्रिटेन के भीतर एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन है। इसके अलावा माजिद ने 2015 में फ्रांस की पत्रिका चाली अब्दो पर हुए इस्लामी आतंकियों के हमले को भी सही ठहराया था और लोगों को ऐसा ही हमला करने के लिए भड़काया था। चार्ली अब्दो पर यह हमला ISIS ने किया था क्योंकि उसने पैगम्बर मुहम्मद का एक कार्टून छाप दिया था।
माजिद फ्रीमैन को 9 जुलाई, 2024 को गिरफ्तार किया गया था। उसे कोर्ट में पेश होने किए जाने के बाद शर्तों के साथ जमानत भी दे दी गई है। माजिद पर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने और अपना घर छोड़ने को लेकर रोक लगाई गई है। अब आगे उस पर यह मुकदमा चलता रहेगा।
लेस्टर में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने में सबसे आगे था माजिद फ्रीमैन
माजिद फ्रीमैन लेस्टर का एक स्थानीय मुस्लिम “कार्यकर्ता” है, जो समस्या पैदा करने वाला और चरमपंथी इस्लामी विचारों को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। लेस्टर हिंसा के दौरान, माजिद हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने वाली फर्जी खबरें फैलाने में सबसे आगे था।
भारत और पाकिस्तान के बीच 28 अगस्त 2022 को टी-20 मैच में हुई हार के बाद भारतीय ध्वज का अपमान होने के बाद झड़प हो गई थी। झड़प के बाद हिंदुओं ने माहौल को शांत किया और उस व्यक्ति की मदद की जिसने भारतीय ध्वज छीनकर उसका अपमान किया था। हालाँकि, माजिद फ्रीमैन की कहानी कुछ और ही थी।
लेस्टर पुलिस ने 30 अगस्त को जब मुस्लिम संगठनों से प्रभावित होकर झूठ बोला कि हिंदू ‘मुस्लिमों को मारो’ के नारे लगा रहे हैं (बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी जाँच में ऐसा कोई नारा नहीं सुना गया था), तो माजिद ने हिंदुओं के खिलाफ दंगा भड़काने के लिए ट्विटर का सहारा लिया।
शौकत एडम का समर्थक है माजिद फ्रीमैन
माजिद फ्रीमैन एक इस्लामिक कट्टरपंथी है। वो 2022 के लेस्टर प्रकरण के दौरान हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने में सबसे आगे था, तो फिलिस्तीन समर्थक शौकत एडम का भी समर्थक है।
माजिद ने अपने ट्वीट्स में शौकत का खूब समर्थन किया। उसने एक ट्वीट में लिखा “पिछले हफ़्ते की यह बात याद है? @JonAshworth को अभी इसका पछतावा हो रहा होगा। सबसे बढ़िया आदमी @ShockatAdam ने जीत हासिल की और अब लेस्टर साउथ में उनकी जगह ले ली है।”
शौकत एडम की तरह ही माजिद फ्रीमैन भी उन्मादी मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई हिंसा को सही ठहराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता। ऐसे में उसी की तर्ज पर फ्रीमैन ने लगातार फर्जी खबरें फैलाकर और अपने सह-धर्मियों को ‘हिंदुओं को सबक सिखाने’ के लिए उकसाकर इसे एक स्तर आगे बढ़ाया।
सितंबर 2022 में इस इस्लामिक कट्टरपंथी ने आरोप लगाया कि 3 लोगों ने एक किशोर मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की थी। उसने ट्वीट किया, “कंफर्म: आज सुबह लेस्टर के एक कॉलेज से कुछ ही दूरी पर एक घटना घटी।”
उसने दावा किया, “एक मुस्लिम किशोरी से तीन लोगों ने संपर्क किया था, लेकिन वह स्कूल में भाग गई। कॉलेज और पुलिस को इसकी जानकारी है और लेस्टर पुलिस ने परिवार को घटना का नंबर दे दिया है।” उसने यहाँ तक दावा कर दिया कि वो लड़की के परिजनों से मिला, और लड़की अभी सदमे में है।
माजिद के अन्य इस्लामिक कट्टरपंथी साथियों ने उसके इस झूठ को खूब फैलाया। इस मामले में RSS का नाम भी घसीटा गया कि वो कथित अपहरण के मामले में अहम भूमिका निभा रहा था। यही नहीं, इन इस्लामिक कट्टरपंथियों ने मुस्लिम लड़की के अपहरण के झूठे मामले में हिंदू व्यक्ति की जानकारी ऑनलाइन कर दी और उसका पता भी सोशल मीडिया पर लीक कर दिया। इसके साथ ही उस व्यक्ति को फेसबुक पर धमकियाँ दी गई।
इस मामले में लेस्टर पुलिस ने प्रेस रिलीज जारी कर सफाई दी थी और कहा था कि किसी मुस्लिम लड़की के अपहरण की कोई घटना नहीं हुई, लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथियों ने लगातार हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को भड़काने की कोशिश की।