मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (UCC) को कागजों की जगह अब जमीन पर उतारने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा है कि इससे ही रूढ़िवादी प्रथाओं पर लगाम लग सकती है। कोर्ट ने यह टिप्पणी तीन तलाक के एक मामले को सुनते हुए की है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल वर्मा ने कहा, “समाज में कई निंदनीय, कट्टरपंथी, अंधविश्वासी और अति-रूढ़िवादी प्रथाएँ प्रचलित हैं, जिन्हें आस्था और विश्वास के नाम पर दबाया जाता रहा है। हालाँकि, भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का समर्थन किया गया है, लेकिन इसे केवल कागज़ों पर नहीं बल्कि असलियत में बदलने की जरूरत है। एक सही तरह से ड्राफ्ट की गई संहिता ऐसी अंधविश्वासी और बुरी प्रथाओं पर लगाम लगा सकती है।”
कोर्ट ने कहा कि 2019 में तीन तलाक को अवैध घोषित करते हुए 2019 में भारत की संसद ने कानून पास किया था जो अच्छा कदम था लेकिन फिर भी मारे जनप्रतिनिधियों को इतने वर्ष यह जानने में लग गए कि तीन तलाक असंवैधानिक और समाज के लिए बुरा है।”
कोर्ट ने कहा कि हमें बहुत जल्द ही देश में UCC की आवश्यकता समझने की जरूरत है। कोर्ट ने यह सारी टिप्पणियाँ तीन तलाक के एक मामले को सुनते हुए की। कोर्ट में दो महिलाओं ने राहत की माँग करते हुए अपील लगाई थी। इन महिलाओं पर घर की बहू ने दहेज़ माँगने, मारपीट और प्रताड़ना देने का आरोप लगाया था।
मुस्लिम महिला ने आरोप लगाया था कि उसकी नंनद और सास ने उसे निकाह के बाद प्रताड़ित किया और दहेज़ को लेकर मारपीट की। महिला ने आरोप लगाया था कि उसके शौहर ने भी उसको प्रताड़नाएँ दी। जब महिला ने प्रताडनाओं का विरोध किया था तो उसके शौहर ने उसे तीन बार तलाक बोल कर घर से बाहर भगा दिया।
मुस्लिम महिला ने इस मामले में शौहर के साथ ही उसके घर वालों पर तीन तलाक क़ानून के तहत मामला चलाने की अपील की थी। हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि यह कानून शौहर के तीन तलाक देने पर ही बनता है, कोर्ट ने इस मामले में उसकी सास और ननद को राहत दे दी।
गौरतलब है कि बीते कुछ समय से देश भर में UCC का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। कई भाजपा शासित राज्य इसे लागू करने की तैयारी में हैं। उत्तराखंड में धामी सरकार इसे लागू भी कर चुकी है और इसके क्रियान्वन पर काम चल रहा है। भाजपा ने भी लगातार UCC को व्यापक तरीके से लागू किए जाने की वकालत की है।
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति का अपनी पत्नी के साथ गुदा मैथुन करना अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करके पति को राहत दे दी और कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ भी की।
हाई कोर्ट ने इस मामले को सुनते हुए कहा, “कथित कृत्य भी IPC की धारा 375 के अंतर्गत आता है और इसके अपवाद 2 के अनुसार, पति को गुदा मैथुन के लिए IPC की धारा 375 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इन परिस्थतियों में पति के विरुद्ध धारा 377 के तहत भी मामला नहीं बनता।”
कोर्ट ने कहा कि एक दंपत्ती के बीच निजी तौर पर सहमति से बनाए गए सम्बन्धों पर धारा 377 की कार्रवाई नहीं की जा सकती। कोर्ट एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील की सुनवाई कर रहा था। यह अपील उसने अपनी पत्नी द्वारा दर्ज करवाए गए मुकदमे के विरुद्ध लगाई थी।
महिला ने अपने पति पर आरोप लगाया था कि वह उसके साथ जबरदस्ती अप्राकृतिक यौन संबंध बनाता है। वह इसके लिए दबाव डालता है। महिला ने आरोप लगाया था कि उसका पति लगातार उसके साथ गुदा मैथुन करता है। महिला ने आरोप लगाया कि गुदा मैथुन के कारण उसको गंभीर घाव हुए जिसका उसने अलग-अलग अस्पतालों में इलाज करवाया।
इसी आधार पर महिला ने अपने पति को अप्राकृतिक यौन संबंध का आरोपित बनाने को लेकर मामला दर्ज करवाया था। महिला के पति की तरफ से वकील ने कोर्ट में कहा कि दोनों विवाहित हैं और प्रत्येक मौके पर सेक्स से पहले सहमति की बात यहाँ शून्य हो जाती है।
महिला के पति की तरफ से भी यह भी दलील दी गई कि दंपती के संबंध को बलात्कार नहीं ठहराया जा सकता तो फिर ऐसे में यह मामला नहीं बनता। हालाँकि, महिला के वकील ने इसका विरोध किया और कहा कि कोई भी महिला इस बात की अनुमति नहीं दे सकती है। कोर्ट ने इसी के साथ आरोपित पुरुष को इस मामले में रहत देते हुए धारा 377 के आरोपों के समन खारिज कर दिए। उसके खिलाफ कई और धाराओं में भी मामला दर्ज करवाया गया है, वह चलते रहेंगे।
कोरोना काल में किसान प्रदर्शनकारियों ने लगभग 1 साल तक दिल्ली की सीमाओं को घेरे रखा था। अब कुछ महीनों से पंजाब-हरियाणा की सीमा पर ये किसान बैठे हुए हैं। प्रदर्शनकारियों के आगे झुकते हुए मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस भी ले लिया। हालाँकि, अब किसानों को 3 नए क्रिमिनल लॉ से समस्या हो गई है। बता दें कि भारत सरकार ने IPC (भारतीय दंड संहिता), CrPc (दंड प्रक्रिया संहिता) और IEA (इंडियन एविडेंस एक्ट) को खत्म कर दिया है।
अब इनकी जगह क्रमशः ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS), ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) और BSA (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) लेकर आई है। अब किसानों को इन तीनों से भी दिक्कत है। बता दें कि तीनों कानून अंग्रेजों के ज़माने से ही चले आ रहे थे। ‘किसान मजदूर मोर्चा’ और ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ की तरफ से ये ऐलान किया गया है कि वो इन कानूनों का विरोध करते हैं। दिल्ली में इनकी प्रतियाँ जलाई जाने की योजना है। किसानों से राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर पहुँचने की अपील की गई है।
इन्होंने इस साल आने वाले स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के दिन दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च का भी ऐलान किया है। 1 अगस्त को मोदी सरकार की ‘अर्थी’ जलाई जाएगी। साथ ही देश भर के जिला मुख्यालयों पर MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के लिए प्रदर्शन किया जाएगा। शंभु बॉर्डर पर किसान महीनों का राशन लेकर पहुँचने शुरू हो गए हैं। 31 अगस्त को इस धरने के 200 दिन भी पूरे होने वाले हैं। 15 सितंबर को जींद और 22 सितंबर को पीपली में किसानों की रैली प्रस्तावित है।
किसानों ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष को जमानत दिए जाने की भी निंदा की। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट 1 सप्ताह के भीतर शंभु बॉर्डर खोलने का आदेश दे चुका है। 17 जुलाई को ही ये मोहलत खत्म हो गई है, लेकिन हरियाणा सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची है। 13 फरवरी को ये किसान निकले थे। शंभु बॉर्डर पटियाला और अंबाला के बीच है। बता दें कि 2021 में गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के दिन ट्रेक्टर मार्च के दौरान हिंसा हुई थी, लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहरा दिया गया था।
कर्नाटक, केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल, यह भारत के चार राज्य हैं। चारों में समान बात यह है कि इनमें गैर-भाजपा सरकार है। इन चारों में और बात समान है कि यह चारों केंद्र की मोदी सरकार पर अपना फंड रोकने, पैसा ना देने और आर्थिक मामलों में अड़ंगा डालने का आरोप लगाते हैं। अब संसद में दिए गए एक जवाब में साफ़ हुआ है कि मोदी सरकार बीते चार सालों में इन राज्यों को हजारों करोड़ रूपए विशेष मदद के तहत दे चुकी है।
सोमवार (22 जुलाई, 2024) को लोक सभा कार्रवाई में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में वित्त मंत्रालय ने यह जानकारी दी है। वित्त मंत्रालय ने बताया है कि वह वित्त वर्ष 2020-21 से ही राज्यों की विशेष आर्थिक मदद के लिए योजना चला रहा है। वित्त मंत्रालय ने बताया कि यह सहायता राज्यों को इसलिए दी जा रही है ताकि वह अपने यहाँ इससे कैपिटल एक्सपेंडीचर में लगा सकें। इससे राज्य में नया ढाँचा विकसित हो और वह मजबूत हो सकें।
वित्त मंत्रालय ने बताया है कि 2020-21 के बाद से लगातार इस योजना को चालू रखा गया है। हर वित्त वर्ष में राज्यों को सहायता इसी के तहत दी जा रही है। केंद्र सरकार 2020-21 से लेकर 2023-24 तक राज्यों को ₹1.73 लाख करोड़ की मदद इस योजना के तहत दे चुकी है।
पश्चिम बंगाल को ₹10000 करोड़ से अधिक की मदद
केंद्र सरकार पर फंड रोकने और आर्थिक मोर्चे पर सहायता ना करने का सबसे अधिक आरोप पश्चिम बंगाल की ममता सरकार लगाती है। पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज तृणमूल कॉन्ग्रेस ने बीते अप्रैल, 2024 में इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन भी किया था।
वित्त मंत्रालय ने बताया है कि पश्चिम बंगाल को 2020-21 से 2023-24 के बीच वह ₹10,233 करोड़ की मदद दे चुकी है। केंद्र सरकार ने 2020-21 में ₹630 करोड़, 2021-22 में ₹933 करोड़, 2022-23 में ₹3655 करोड़ और 2023-24 में ₹5015 करोड़ की सहायता पश्चिम बंगाल को दी है।
कर्नाटक को भी मिले ₹6000 करोड़ से ज्यादा
केंद्र सरकार को फंड के मसले पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार भी खूब घेरती रही है। सिद्दारमैया सरकार ने भी फरवरी, 2024 में इसी मुद्दे को लेकर बेंगलुरु में प्रदर्शन किया था। सिद्दारमैया सरकार ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार उसके पैसे नहीं रिलीज कर रही।
वित्त मंत्रालय ने बताया है कि उसने 2020-21 से 2023-24 के बीच ₹6693 करोड़ मदद के तौर पर दे चुकी है। केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2020-21 में ₹305 करोड़, 2021-22 में ₹451 करोड़, 2022-23 में ₹3399 करोड़ और 2023-24 में ₹2538 करोड़ दे चुकी है।
पंजाब को भी मिली मदद, खर्च नहीं किया तो रोकी
पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार वर्तमान में काफी बुरी आर्थिक स्थिति में है। भगवंत मान सरकार बीते दिनों केंद्र से कर्जों की वसूली पर पाँच साल के लिए रोक लगाने को कह चुकी है। पंजाब सरकार ने भी कई विभागों का फंड रोकने का आरोप केंद्र सरकार पर लगाया है।
केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत पंजाब को भी लगातार मदद दी है। केंद्र सरकार ने पंजाब को 2020-21 से 2023-24 के बीच ₹1318 करोड़ की मदद दी है। 2020-21 में पंजाब को केंद्र सरकार ने ₹296 करोड़, 2021-22 में ₹223 करोड़ और 2022-23 में ₹798 करोड़ की मदद दी है। पंजाब की मदद 2023-24 में रोक दी गई थी क्योंकि इन्होने नियमों का पालन नहीं किया था और पहले से दिए गए पैसे खर्च नहीं किए थे।
केरल को ₹2000 करोड़ से ज्यादा मिले
आर्थिक संकट में फंसी केरल की सरकार वित्त के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ हाल ही में सुप्रीम कोर्ट चली गई थी। केरल को भी केंद्र सरकार अच्छी-खासी मदद 4 वर्षों में दे चुकी है। केरल को केंद्र सरकार ₹2221 करोड़ मदद के तौर पर चुकी है। इसके तहत वर्ष 2022-23 में ₹1902 करोड़ दिए गए हैं। केरल की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि वह कई विभागों के कर्मचारियों को तनख्वाह तक नहीं दे पा रहा।
इन राज्यों के अलावा तमिलनाडु को ₹11,322 करोड़, तेलंगाना को ₹5020 करोड़ और हिमाचल प्रदेश को ₹3843 करोड़ की मदद दी जा चुकी है। केंद्र सरकार इसके अलावा अन्य कई योजनाओं के तहत भी राज्यों को पैसा दे रही है। हालाँकि, कई राज्यों में मुफ्त बाँटने की नीतियों के चलते खजाना खाली हो रहा है और खराब आर्थिक हालत का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ दिया जाता है। केंद्र और राज्य में सत्ता में रहने वाली पार्टी के अलग होने के कारण यह और आसान हो जाता है।
बिहार के विपक्षी दल लगातार ये माहौल बना रहे हैं कि बिहार को ‘विशेष राज्य’ का दर्जा न देकर मोदी सरकार ने राज्य के साथ अन्याय किया है। हालाँकि, इस दौरान ये बिहार को मिलने वाले विशेष पैकेज वाली खबर को छिपा लेते हैं। बिहार ही नहीं, बल्कि किसी भी राज्य को ‘विशेष राज्य’ का दर्जा नहीं दिया गया है। 1969 में ‘राष्ट्रीय विकास परिषद’ की बैठक में पहली बार इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। DR गाडगीळ कमिटी तब राज्यों को केंद्रीय सहायता के लिए फॉर्मूला लेकर आई।
बता दें कि संसद में दिए गए ताज़ा जानकारी में मोदी सरकार ने बताया है कि राज्यों को विशेष सहायता देने के लिए 2020-21 में लॉन्च किया गया था, और इसे 2022-23 में भी जारी रखा गया। ये स्किम कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए थी, इसके बाद 2022-23 में कैपिटल इन्वेस्टमेंट के लिए योजना लाई गई, जिसे 2024-25 में भी लागू रखा जा रहा है। बिहार को अब तक इसके तहत 19,359 करोड़ रुपए की सहायता दी जा चुकी है। 2024-25 में बिहार के लिए अभी फंड्स जारी किया जाना बाकी है।
अमित मालवीय ने भी 1969 के फैसले का जिक्र करते हुए बताया है कि उस समय राज्यों को फंड्स देने के लिए कोई विशेष फॉर्मूला नहीं था, स्कीम के हिसाब से फंड दिए जाते थे। NDC ने तब चर्चा के आधार पर असम, जम्मू कश्मीर और नागालैंड को ‘विशेष राज्य’ का दर्जा दिया गया। 1969 में पाँचवे वित्त आयोग ने ‘विशेष राज्य’ वाला फॉर्मूला तय किया। इससे जो राज्य पिछड़े थे, उन्हें सहायता मिली। 2014-15 में ‘विशेष दर्जा’ प्राप्त 11 राज्य थे, जिन्हें विभिन्न योजनाओं के तहत सहायता दी गई।
The Special Category Status issue was first addressed in the National Development Council (NDC) meeting in 1969. During this meeting, the D R Gadgil Committee introduced a formula to allocate Central Assistance for state plans in India. Prior to this, there was no specific… pic.twitter.com/3q4zGbzF1k
जब नीति आयोग का गठन हुआ, उसके बाद से इन राज्यों को मिलने वाली सहायता को 32% से बढ़ा कर 42% कर दिया गया। 2015 से प्रभावी 14वें वित्त आयोग ने साझा करों के क्षैतिज वितरण में सामान्य श्रेणी और विशेष श्रेणी के राज्यों के बीच के अंतर को समाप्त कर दिया। राज्यों के लिए शुद्ध साझा करों का हिस्सा 2015-2020 की अवधि के लिए 32% से बढ़ाकर 42% कर दिया गया। 15वें वित्त आयोग ने 2020-2021 और 2021-2026 की अवधि के लिए इस दर को 41% पर बनाए रखा, जिसमें जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के निर्माण के कारण 1% समायोजन किया गया।
इस समायोजन का उद्देश्य कर हस्तांतरण के माध्यम से प्रत्येक राज्य के संसाधन अंतर को संबोधित करना था, जिसमें कर हस्तांतरण के बाद राजस्व घाटा अनुदान प्रदान किया गया था, जहाँ अकेले कर हस्तांतरण से निर्धारित अंतर को कवर नहीं किया जा सकता था। बिहार ही नहीं, किसी भी राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिया जाने वाला है।
उत्तर प्रदेश के बरेली के गौसगंज में मुहर्रम के दिन उपद्रव करने वाले आरोपितों के खिलाफ योगी सरकार ने बुलडोजर एक्शन लिया है। खबर आ रही है कि आरोपित इरशाद के दो मकानों के अवैध निर्माण को प्रशासन ने बुलडोजर चलवाकर गिरा दिया।
मुहर्रम के दिन उपद्रव करने वालों के खिलाफ सरकार का यह निर्णय राजस्व विभाग की टीम द्वारा जाँच करने के बाद लिया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, 21 और 22 जुलाई को राजस्व विभाग की टीम गौसगंज गाँव में जाँच करने पहुँची थी, जहाँ उन्होंने पाया कि मजहबी स्थल समेत 16 निर्माण अतिक्रमण करके बनाए गए हैं। ये निर्माण ग्राम समाज की जमीन पर हैं।
टीम ने इन इमारतों को चिह्नित किया, उस पर लाल निशान लगाए और अधिकारियों ने बताया कि जाँच रिपोर्ट के आधार पर अतिक्रमण पर बुलडोजर चलेगा। अब इरशाद के घर पर बुलडोजर चलने की बात सामने आई है।
बरेली के थाना शाही के गौसगंज में 17 जुलाई को मुहर्रम के वक्त बवाल हुआ था। जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने मंदिर के आगे हल्ला किया था जिसके बाद दोनों पक्षों में बहस हुई और देखते ही देखते ही ये बहस पत्थरबाजी में बदल गई थी।
घटना में कई लोग चोटिल हो गए थे और इलाके का माहौल भी बिगड़ गया था। इस दौरान इस्लामवादियों ने हिंदू समुदाय के घरों को भी निशाना बनाया था, उनकी महिलाओं से छेड़छाड़ की थी। साथ ही हिंदुओं को गंभीर परिणाम भुगतने की भी धमकी दी थी।
उस दिन तो मामले को किसी तरह फोर्स बुलाकर शांत कराया गया था, लेकिन फिर पुलिस ने एक्शन में आकर आरोपितों को पकड़ना शुरू किया। मामले में 50 नामजद समेत 65 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई और फिर एक हफ्ते के भीतर 35 को गिरफ्तारियाँ हुईं। इनमें उपद्रव के आरोपित आलमगीर और निजाकत अली को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया था।
वहीं इस एसपी दक्षिणी मानुष पारीक ने बताया कि आरोपियों में से कुछ पर रासुका की कार्रवाई हो सकती है। इस मामले में सिपाही नफीस अहमद को निलंबित भी किया गया है। इसके अलावा हेड कांस्टेबल राजवीर सिंह, सिपाही सुहेल अहमद और गुलफाम को लाइन हाजिर किया गया है।
अमेरिका का अगला राष्ट्रपति कौन होगा? इसके लिए चुनाव होने वाला है। कुछ लोग इस चुनावी मैदान में दम ठोक रहे हैं, कुछ पर्दे के पीछे से खेल कर रहे। इन सबके बीच जो वर्तमान में अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, मतलब जो बायडेन… वो एक ट्वीट कर देते हैं। कहते हैं – “हमसे न हो पाएगा।”
इस ट्वीट के बाद जो बायडेन की पार्टी मतलब डेमोक्रेटिक पार्टी में कई लोग खेल खेलने लगे। सब अपनी गोटियाँ सेट करने में लग गए। बराक ओबामा भी! 27 मिनट में ही लेकिन जो बायडेन ने खेल पलट दिया। कमला हैरिस को नॉमिनेट करके।
बराक ओबामा इसके कारण गुस्से में आ गए। पूर्व हाउस स्पीकर और गोरी चमड़ी वाली नैन्सी पेलोसी पहले से ही नेतागिरी झाड़ रही थीं। कमला का नाम सुनते ही उन्होंने भी अपना पासा फेंका। भारत वाली कमला अमेरिका की राष्ट्रपति बने, यह उन्हें पसंद नहीं। औरत ही औरत की दुश्मन बन गई!
डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं को लेकिन एक बात का अंदाजा नहीं था। सब कुछ जानते हुए भी वो कुछ मिस कर रहे थे। हंटर बायडेन को! जिसका बेटा हंटर बायडेन हो, जिसके बेटे के लैपटॉप का पासवर्ड analf*ck69 हो, जिसके लैपटॉप में पोर्न इतने गंदे कि मैकेनिक को धोना पड़े… बावजूद बिना शोर-शराबे के जो बायडेन राष्ट्रपति बने रहते हैं… मतलब राजनीति जिसको जितनी करनी हो, कर ले… कहानी का अंत तो बायडेन ही करेंगे।
हुआ भी वही। और यह अचानक से हुआ, ऐसा नहीं है। इसके लिए छवि गढ़ी गई थी। महीनों-सालों से उस पर काम किया गया था। एक तरह का व्यूह रचा गया था। भूलने की बीमारी का व्यूह। कुछ भी उल्टा-पुल्टा हो जाए, मुँह से कुछ अलबल निकल जाए, किसी से चुम्माचाटी हो जाए… ऐसे मामलों के लिए भूलने की बीमारी जो बायडेन के साथ जोड़ दी गई।
2 मिनट पहले ट्वीट किया जाता है – I’m sick
of Elon Musk and his rich buddies trying to buy this election.
2 मिनट बाद ट्वीट किया जाता है – of Elon Musk and his rich buddies trying to buy this election. And if you agree, pitch in here.
यह सब क्यों? क्योंकि यही राजनीति है। ओबामा जैसों को पटखनी देने में यही बीमारी अंत में काम आई। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी तक सब उनके साथ थे। रात में जैसे ही बायडेन ने ट्वीट कर दिया कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में अपनी उम्मीदवारी छोड़ते हैं, तब सारे डेमोक्रेट नेताओं ने अपना-अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया।
I will do everything in my power to unite the Democratic Party—and unite our nation—to defeat Donald Trump and his extreme Project 2025 agenda. If you’re with me, add a donation right now.https://t.co/xpPDkCRhoZ
जिस कमला हैरिस को अपना उत्तराधिकारी बनाया, उसने भी खुशी के मारे ट्वीट कर आभार जताया। जबकि होना क्या चाहिए था? कमला को भोकार पार-पार के, सर पटक-पटक कर रोना चाहिए था, भले ही नाटक करते हुए। किया उसने? नहीं।
जो बायडेन के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (फॉन्ट देख कर लेकिन एडिटेड लग रहा है, शायद किसी ने व्यंग्य किया हो)
बस बायडेन को इसी से गुस्सा आ गया। एक ट्वीट कर दिया। ऊपर के ट्वीट के बाद कमला हैरिस सदमा में चली गई हैं, 12 घंटे से लापता हैं। अमेरिका के राजनीतिक पत्रकार बता रहे हैं कि जगह-जगह उनको खोज कर लाने वाले पोस्टर भी चिपका दिए गए हैं।
देश की आर्थिक स्थिति का लेखाजोखा बताने वाला आर्थिक सर्वे पेश कर दिया गया है। आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2023-24 में देश की अर्थव्यवस्था ने 8.2% की रफ़्तार पकड़ी है और अब 2024-25 में 6.5%-7% की रफ्तार बनाए रखेगा। आर्थिक सर्वे में देश में पिछले वर्ष के मुकाबले महंगाई भी कम हुई है।
सरकार द्वार दी गई जानकारी के अनुसार, देश में 2022-23 के दौरान महंगाई का स्तर 6.7% रहा था, यह 2023-24 में 5.4% रहा। हालाँकि, कुछ खाने पीने की चीजों के दाम ऊपर रहे हैं लेकिन उनको भी नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है।
सरकार का अनुमान है कि 2024-25 में महंगाई का स्तर 4.5% रहेगा। आर्थिक सर्वे में बताया गया है कि बीते वर्ष के दौरान देश के व्यापार घाटे में भी भारी कमी आई है। वित्त वर्ष 2022-23 में यह 121 बिलियन डॉलर (लगभग ₹10 लाख करोड़) था जोकि 2023-24 में आकर मात्र 78 बिलियन डॉलर (लगभग ₹6 लाख करोड़) रह गया।
इसके अलावा भारत का चालू खाता घाटा भी कम हो गया है। यानी देश से अब बाहर को कम पैसा जा रहा है। वित्त वर्ष 2022-23 में देश का चालू खाता घाटा GDP के 2% से घट कर 0.7% पर आ गया। इसमें विदेशों में रहने वाले भारतीयों का बड़ा योगदान है।
आर्थिक सर्वे के अनुसार, विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने 2023-24 के दौरान 120 बिलियन डॉलर से अधिक की रकम अपने देश भेजी। इस दौरान भारत विश्व का सबसे अधिक रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा भेजे जाना वाला धन) पाने वाला देश बन गया।
आर्थिक सर्वे में आयात निर्यात और और आर्थिक तरक्की के साथ ही रोजगार के मुद्दे पर भी कई महत्वपूर्ण जानकारी दी है। आर्थिक सर्वे में बताया गया है कि वर्तमान में स्नातक करने वाले 49% युवा काम करने के लिए फिट नहीं हैं क्योंकि उनमें कौशल की कमी है। हालाँकि, यह स्थिति लगातार सुधर रही है क्योंकि पहले यह आँकड़ा मात्र 34% था।
आर्थिक सर्वे में बताया गया है कि देश में बीते कुछ वर्षों में बेरोजगारी में कमी आई है लेकिन आगामी समय में रोजगार पैदा करने के लिए और भी प्रयास करने होंगे। आर्थिक सर्वे में देश की माली हालत के बारे में भी बात की गई है।
इसमें बताया गया है कि 2023-24 में देश का बाहरी कर्जा उसकी GDP के 18.7% पर आ गया है जो कि पहले 19% था। इसके अलावा अब सरकार का राजकोषीय घाटा 4.5% के नीचे आने की उम्मीद है। यह 2022-23 में 6% के ऊपर था लेकिन बेहतर प्रबन्धन के कारण 2023-24 में 5.6% पर आ गया।
भारत में थ्रिलर फ़िल्में बहुत कम बनती हैं, अगर बनती हैं तो फिर उनका क्लाइमैक्स गड़बड़ हो जाता है। हमारे पास ऐसे कई उदाहरण हैं। थ्रिलर में अलग-अलग जॉनर हैं, जैसे एक्शन से लेकर सस्पेंस तक। हालाँकि, जहाँ थ्रिल है वहाँ सस्पेंस होगा ही। सस्पेंस के बिना थ्रिल नहीं हो सकता। एक तमिल फिल्म आई है, ‘महाराजा’, जिसमें विजय सेतुपति और अनुराग कश्यप मुख्य किरदारों में हैं। फिल्म थ्रिल, सस्पेंस और एक्शन का एक अच्छा मिश्रण तैयार करती है, वो भी पारिवारिक पृष्ठभूमि के इर्दगिर्द।
फिल्म में पारिवारिक संवेदनाएँ भी हैं, बलात्कार जैसे अपराध की जघन्यता भी है, दक्षिण भारत की अधिकतर फिल्मों की तरह वास्तविक न लगने वाले एक्शन का अत्यधिक डोज भी नहीं है, अच्छा अभिनय भी है, जबरन ठूँसे जाने वाले रोमांटिक गाने और रोमांस के दृश्य भी नहीं हैं। जब ये सब कुछ होता है तो एक भारतीय फिल्म बहुत अच्छी बन पड़ती है। हॉलीवुड में हमने दर्जनों निर्देशकों को सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों को क्लाइमैक्स के साथ बेहतरीन तरीके से सँभालते हुए देखा है, भारतीय फिल्मों में ये दुर्लभ है।
मलयालम फिल्मों में ज़रूर काफी एक्सपेरिमेंट्स होते रहे हैं, हाल में आई ममूटी की फिल्म ‘ब्रह्मयुगम’ इसका उदाहरण है। हटके फिल्मों की बात करें तो हमारे दिमाग में 2018 में रिलीज हुई ‘तुम्बाड़’ का नाम आता है, इसके बाद लोककथाओं पर आधारित कई फ़िल्में सामने आईं जिनमें कन्नड़ फिल्म ‘कांतारा’ का उदाहरण दिया जा सकता है। ‘कल्कि’ भी महाभारत को तकनीक पर चलने वाले भविष्य के युग से जोड़ने का प्रयास किया गया है। लेकिन, इन सबके बीच थ्रिलर जॉनर खासकर बॉलीवुड के लिए आज भी पहेली बना हुआ है।
सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों की बात करें तो मलयालम व हिंदी में हमारे पास ‘दृश्यम’ सीरीज है, हिंदी में ‘अंधाधुन’ है, मलयालम में ‘मुंबई पुलिस’ जैसी फिल्म है, कन्नड़ में ‘लुसिया’ जैसी फिल्म है, तमिल में ‘ध्रुवंगल पाठिनारु’ जैसी फिल्म है। तेलुगु फिल्मों के हाथ इस मामले में ख़ासे तंग हैं। वहाँ की लार्जर दैन लाइफ फिल्मों ने ही पूरे भारत में राज किया है – ‘बाहुबली’ हो या ‘पुष्पा’। ऐसे में ‘महाराजा’ भारतीय फिल्मों के लिए एक तेज़ हवा का झोंका है।
‘महाराजा’ में विजय सेतुपति और अनुराग कश्यप के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण किरदार है निर्देशक। फिल्म को जिस तरीके से पेश किया गया है, वो प्रशंसा के लायक है। निर्देशक नीतिलन स्वामीनाथन सिर्फ 1 फिल्म पुराने हैं, ऐसे में उन्होंने इस फिल्म को दर्शकों के समक्ष पेश करने का जो तरीका आजमाया है उसके बाद आगे भी उनकी फिल्मों पर नज़र रहेगी। भूतकाल और वर्तमान के दृश्यों का इससे बेहतर समुच्चय पेश किए जाने का उदाहरण कम से कम भारतीय फिल्मों में तो नहीं मिलता। इसमें निर्देशन के अलावा एडिटिंग का भी बड़ा रोल है।
‘महाराजा’ के बारे में कोई Spoiler न देते हुए मैं सिर्फ इतना बताना चाहूँगा कि ये 2 पिताओं की कहानी है, जिनकी बेटियाँ हैं। ये उन 2 पिताओं की कहानी है, जो अपने परिवार को खुश देखना चाहते हैं। ये उन 2 पिताओं की कहानी है जिसमें एक ने संघर्ष का रास्ता चुना और एक ने अपराध का। ये उन 2 पिताओं की कहानी है, जो अपनी बेटियों के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार रहते हैं। ये उन 2 पिताओं की कहानी है, जिनकी राहें एक जगह टकरा जाती हैं और पूरी फिल्म की कहानी बनती है।
‘महाराजा’ फिल्म में देश की पुलिस व्यवस्था पर कटाक्ष भी है, ये भी दर्शाया गया है कि बड़ा से बड़ा जघन्य अपराधी भी समाज में एक सामान्य नागरिक के रूप में हमारे बीच रह रहा हो सकता है और हमें इसकी भनक तक न हो। ‘महाराजा’ मानवता की भी कहानी है, ये राक्षसी प्रवृत्ति की भी कहानी है। एक सैलून का नाई और उसका एक ग्राहक, दोनों मिलते हैं। फिर एक दुर्घटना घटित होती है। फिल्म की कहानी की जड़ यही है, आगे आप खुद देख सकते हैं।
दक्षिण भारतीय फिल्मों का पार्श्व संगीत हमेशा से ज़ोरदार रहा है, खासकर तमिल फिल्मों का। थलापति विजय की हाल ही में आई Leo को उसके बैकग्राउंड म्यूजिक ने बचाया था। ‘महाराजा’ में B अजनीश लोकनाथ का संगीत है, जो अनुभवी संगीतकार है। खासकर अनुराग कश्यप की एंट्री वाले दृश्य में और विजय सेतुपति के एक्शन वाले दृश्य में आपको बैकग्राउंड संगीत फिल्म के साथ आपको बाँधने में आपकी मदद करेगा। निर्देशक ने फालतू की चीजें दिखाने में समय व्यर्थ नहीं किया है, वो कहानी पर ही टिका रहा है।
एक सामाजिक समस्या को कमर्शियल तत्वों के साथ मिला कर पेश करना आसान नहीं है, इस चक्कर में कई फिल्मों की भद पिटी है। बलात्कारी को हीरो पुल से लटका देता है, कहीं कोर्ट में भाषण देता है, तो कहीं पीड़िता के साथ दुर्व्यवहार होता है – ऐसे दृश्य हमने कई बार देखे हैं। हाँ, फिल्म का हर दृश्य कुछ न कुछ कहता है, इसीलिए आप अगर कुछ भी स्किप करते हैं तो आगे कहानी समझने में दिक्कत आ सकती है। फिल्म में कुछ कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन फिर भी 2 घंटे 20 मिनट आपको भारी नहीं लगेंगे।
न तो बलात्कार की समस्या को पहली बार उठाया गया है, न पिता-पुत्री के रिश्ते को पहली बार उकेरा गया है, न ही पुलिस के कामकाज के तरीके पर ये पहला कटाक्ष है, न ही नायक और खलनायक की लड़ाई नई बात है, न ही किसी गुंडे का पीछा कर के हीरो द्वारा उसे पीटने का दृश्य नया है और न ही भूत और वर्तमान को मिक्स कर के दिखाना नया है। फिर भी ‘महाराजा’ एक नया कॉन्सेप्ट है। फिर भी ‘महाराजा’ कमाल करती है, खासकर अंतिम एक घंटे में जो खुलासे होते हैं और ट्विस्ट्स आते हैं, ये देखने लायक है।
समस्या ये है कि भारत में ऐसी फ़िल्में क्यों नहीं बनतीं ज़्यादा? एक तो यहाँ के निर्माता-निर्देशक विदेशी फिल्मों की नक़ल में लग कर सेक्स परोसने लग जाते हैं, गालियाँ ठूँस देते हैं और डार्क जॉनर के नाम पर खून-खराबा दिखाते हैं। ये थ्रिलर नहीं होता। थ्रिलर में कहानी को अभिनय और क्लाइमैक्स का साथ मिलना चाहिए। ये एक ऐसा जॉनर है जो कम बजट में भी फिल्म बनवा सकता है, बशर्ते कहानी मजबूत हो, अभिनेता-अभिनेत्रियों का उसे अच्छा साथ मिले और क्लाइमैक्स को निर्देशक सही तरीके से हैंडल कर ले।
और हाँ, ‘महाराजा’ में कचरे का डब्बा भी एक किरदार है। क्षमा कीजिए, कचरे का डब्बा नहीं, ‘लक्ष्मी’। फिल्म में जब सजीव वस्तुओं के अलावा निर्जीव भी किरदार हो जाते हैं, तो उसमें जान आ जाती है। आजकल लोकप्रिय हो रही ‘गुल्लक’ वेब सीरीज को ही देख लीजिए। ‘महाराजा’ के निर्देशक को पता है कि किस दृश्य में क्या छिपाना है और कब क्या खुलासा करते हुए दिखाना है। यही फिल्म की खूबसूरती है जो साधारण कहानी को भी असाधारण बना देती है।
उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के इज्जत नगर में स्थित गोपेश्वर नाथ मंदिर में मूर्तियों को तोड़ने का मामला सामने आया है। आरोपितों की पहचान शाहरुख, अरशद और अकरम के तौर पर हुई है। बरेली पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना रविवार (21 जुलाई 2024) की है। आरोपितों ने मंदिर में घुसकर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी। तोड़फोड़ के बाद दो संदिग्ध भागने में सफल रहे, जबकि अकरम को भीड़ ने पकड़ लिया, उसकी खूब पिटाई की और फिर उसे पुलिस को सौंप दिया गया।
पुलिस ने अकरम को जिला अस्पताल में भर्ती करवाया और बाद में उसे अरेस्ट कर लिया। मामले के संबंध में एसपी ने बताया कि उन्होंने शाहरुख और अरशद को भी बाद में गिरफ्तार कर लिया तथा आईपीसी की धारा के तहत एफआईआर दर्ज की। आगे की पूछताछ जारी है।
गौरतलब है कि इससे पहल पंजाब के लुधियाना में एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की घटना हुई थी। महादेव के मंदिर पर तेज धार वाली हथियार से वार करके 14 मूर्तियाँ को खंडित कर दिया गया है। इसके साथ ही शिवलिंग को भी उखाड़ दिया गया है।
इसके अलावा मध्य प्रदेश के गुना जिले में स्थित पीपलेश्वर महादेव मंदिर में तोड़फोड़ की वारदात हुई थी। इस घटना में अज्ञात लोगों ने मंदिर के दरवाजे को तोड़ दिया था और फिर अंदर घुसकर शिवलिंग को उखाड़कर सड़क पर फेंक दिया था।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश के वाराणसी के मंदिर में भी तोड़फोड़ की घटना सामने आई थी। चौबेपुर के डुबकियाँ गाँव स्थित हनुमान मंदिर में प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। उनका त्रिशूल उखाड़कर फेंक दिया गया था।