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‘पूजा से पहले नदी में नहाने आए तो मार देंगे गोली’ : LOC में हिन्दू श्रद्धालुओं को पाकिस्तानी फौजी दे रहे धमकी, कश्मीरी पंडित बोले- डरेंगे नहीं

पाकिस्तान और उसकी फौज का हिन्दुओं से घृणा का रवैया का किसी से छिपा नहीं है। अब पाकिस्तानी फौज चाहती है कि कश्मीर में 75 वर्षों के संघर्ष के बाद चालू किए गए मंदिर में हिन्दू पूजा के दौरान किशनगंगा नदी में ना नहाएँ। पाक फौज ऐसा करने पर गोली मारने की चेतावनी देती है।

पाकिस्तानी फौज यह हरकत उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के टीटवाल में स्थित हिन्दुओं के लिए पवित्र शारदा मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के साथ कर रही है। यह मंदिर लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर स्थित है। यहाँ पूजा से पहले किशनगंगा (नीलम) नदी में नहाने वाले श्रद्धालुओं को पाकिस्तान के फौजी गोली मारने की धमकी दे रहे हैं।

यह शारदा मंदिर किशनगंगा नदी के तट पर है और नदी के दूसरी तरफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर है। यहाँ पाक फौज के रेंजर्स तैनात हैं। यह लगातार लाउडस्पीकर से श्रद्धालुओं को धमका रहे हैं। उन्हें नहाने से रोक रहे हैं। उनको गोली मारने की धमकी देकर नदी में ना उतरने की चेतावनी दे रहे हैं।

इस मंदिर के निर्माण एवं देखरेख के लिए जिम्मेदार सेव शारदा कमेटी के मुखिया रवींदर पंडिता ने ऑपइंडिया से बताया, “यह मंदिर 5 जून, 2023 को खोला गया था। यहाँ 1947 से पहले यहाँ शारदा पीठ जाने के लिए बेसकैम्प बना हुआ था। हिन्दुओ और सिखों के लिए यहाँ धर्मशाला थी। यहीं से अब POK में स्थित शारदा पीठ के लिए यात्री जाते थे। 1947 के बाद जब मंदिर जाना बंद हो गया तो यहाँ भी स्थित सभी ढाँचे जीर्ण शीर्ण हालत में आ गए।”

उन्होंने बताया, “हमने इस मंदिर का निर्माण 2021 में चालू करने का निर्णय लिया ताकि शारदा पीठ के लिए हमारा संघर्ष बरकरार रहे। हमने यहाँ मंदिर बनवाया है। इसे जून, 2023 में श्रद्धालुओं के लिए खोला गया था। तब से यहाँ लगातार हिन्दू श्रद्धालु आ रहे हैं। यहाँ श्रद्धालु मंदिर जाने से पहले किशनगंगा नदी में नहाते हैं, उसके उस पर पाकिस्तानी फौज तैनात है। वह इन श्रद्धालुओं को गोली मारने की धमकी लाउडस्पीकर से देते हैं। हमने यह मामला सेना और प्रशासन को बताया है।”

उन्होंने बताया है कि पाकिस्तानी रेंजर्स की धमकी से वह डरने वाले नहीं हैं और अपने आराध्य की पूजा करते रहेंगे। उन्होंने बताया कि है कि अभी यहाँ फायरिंग नहीं हुई है लेकिन धमकी लगातार मिल रही है। उन्होंने बताया कि सेना ने अब मामले को अपने हाथों में ले लिया है।

गौरतलब है कि पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित शारदा पीठ, आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से एक है। भारत के विभाजन के बाद से काफी बुरी हालत है। इसको लेकर लगातार माँग हो रही है। टीटवाल में स्थित मंदिर जम्मू कश्मीर की हिन्दू संस्कृति को बचाने का एक प्रयास है।

‘हिंदू आतंकी, मोदी कनाडा विरोधी’: मंदिर की दीवार पर लिखे गए भारत विरोधी नारे, खालिस्तानी आतंकियों की कारस्तानी पर कनाडा के सांसद ने जताई चिंता

कनाडा में फिर एक हिंदू मंदिर पर हमला किया गया है। मंदिर में तोड़फोड़ के साथ ही उसकी दीवारों पर हिंदूफोबिक बातें लिखी हैं। मंदिर की दीवार पर ‘मोदी और सांसद (कनाडा के) आर्य’ को कनाडा विरोधी और हिंदू आतंकी’ लिखा गया है। माना जाता है कि ये कारस्तानी खालिस्तान समर्थकों के हैं। कनाडा के हिंदू समुदाय ने सरकार से इसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की माँग की है।

नेपियन के संसद सदस्य चंद्र आर्य ने हिंदू-कनाडाई समुदाय के खिलाफ नफरत एवं हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने मंगलवार (23 जुलाई 2024) को सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक ट्वीट किया और कहा कि कनाडा के एडमॉन्टन स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण हिंदू मंदिर में फिर से तोड़फोड़ की गई है, जो चिंतित करने वाला है।

उन्होंने अपने पोस्ट में कहा, “कुछ वर्षों के दौरान ग्रेटर टोरंटो एरिया, ब्रिटिश कोलंबिया सहित कनाडा में हिंदू मंदिरों पर घृणित नारे लिखे जा रहे हैं। ‘सिख फॉर जस्टिस’ के गुरपतवंत सिंह पन्नू ने पिछले साल हिंदुओं को भारत वापस जाने के लिए कहा था। खालिस्तान समर्थकों ने ब्रैम्पटन और वैंकूवर में पीएम इंदिरा गाँधी की हत्या का खुलेआम जश्न मनाया और घातक हथियारों की तस्वीरें लहराई थीं।”

चंद्र आर्य ने आगे कहा, “मैं हमेशा से कहता रहा हूँ कि खालिस्तानी चरमपंथी अपनी बयानबाजी से नफरत और हिंसा को उकसाते हैं और बच निकलते हैं। मैं फिर से कह रहा हूँ कि हिंदू-कनाडाई इससे चिंतित हैं। इससे पहले कि ये बयानबाजी हिंदू-कनाडाई लोगों के खिलाफ शारीरिक हिंसा में बदल जाए, मैं कनाडाई एजेंसियों से इसे गंभीरता से लेने का फिर से आह्वान कर रहा हूँ।”

कनाडा में मंदिर पर पहले भी हो चुके हैं हमले

इससे पहले खालिस्तानी आतंकियों ने 7 सितंबर 2023 को मंदिर को निशाना बनाया था। स्थानीय निवासी जब मंदिर पहुँचे तो उन्होंने पुलिस को सूचना दी। माता भामेश्वरी दुर्गा मंदिर की दीवारों पर भारत विरोधी नारे लिखने के फोटो, वीडियो सामने आए हैं। दीवारों पर ‘मोदी इज टेररिस्ट’ यानी ‘मोदी आतंकी है’ और ‘पंजाब इज नॉट इंडिया’ यानी ‘पंजाब भारत का हिस्सा नहीं है’ लिखा देखा जा सकता है।

वहीं, 8 सितंबर 2023 को खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने वैंकूवर शहर में स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास को बंद करने की धमकी दी थी। इस धमकी के बाद भारतीय उच्चायोग ने कनाडाई विदेश मंत्रालय को खालिस्तानी आतंकियों के चलते उत्पन्न खतरे के बारे में सूचित किया था। हालाँकि, कनाडा की एजेंसियों ने इसको लेकर कोई खास कदम नहीं उठाए।

इससे पहले कनाडा के सरे शहर में ही 12 अगस्त 2023 को खालिस्तानियों ने लक्ष्मीनारायण मंदिर में तोड़फोड़ की थी। मंदिर के गेट पर खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर के पोस्टर चिपका दिए थे। इसका सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया था। इस मुद्दे को लेकर भी हिंदू समुदाय ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

इतना ही नहीं, 31 जनवरी 2023 को कनाडा के ब्रैम्पटन में एक प्रमुख हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई थी। इसके ऊपर भारत-विरोधी भड़काऊ बातें लिखी गई थीं। इसके बाद अप्रैल में भी कनाडा के ओंटारियो में एक और हिंदू मंदिर को खालिस्तानियों ने निशाना बनाया था। भारत-विरोधी नारे लिखे गए थे।

20000 महिलाओं को रेप-मौत से बचाने के लिए जब कॉन्ग्रेसी मंत्री ने RSS से माँगी थी मदद: एक पत्र में दर्ज इतिहास, जिसे छिपा लिया गया

कॉन्ग्रेस ने समय-समय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर जो हमले किए वो किसी से छिपे नहीं है, लेकिन ये बात भी हकीकत है कि मुश्किल के समय में आरएसएस ही वो संगठन था जो नेहरू सरकार के सबसे ज्यादा काम आया था। बात 1947 की है। विभाजन की आग में लोग जल रहे थे। हिंदू और सिख महिलाओं का अपहरण हो रहा था। तब, तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह ने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने आरएसएस से मदद लेने की बात सुझाई थी। इस पत्र की एक कॉपी उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी भेजी थी।

पत्र की खास बात यह थी कि नेहरू सरकार में मंत्री होते सरदार बलदेव सिंह ने आरएसएस की मदद माँगी थी। पत्र के मुताबिक जिस समय ये मुद्दा उठाया गया था उस समय तक पश्चिम पंजाब से 20 हजार महिलाओं और लड़कियों का अपहरण हो चुका था। बताया जाता है कि आरएसएस ने उस समय पाकिस्तान में घुसकर लोगों की मदद की थी और कइयों को बचाया भी था। पत्र की कॉपी को आज सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है। इसका कारण यही है कि हाल में मोदी सरकार ने आरएसएस पर लगे उस बैन को हटाया है जो कॉन्ग्रेस ने 58 साल पहले लगाया था।

इस पत्र में सरदार बलदेव सिंह ने पश्चिम पंजाब में गैर मुस्लिमों की चिंता जाहिर करते हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल से साफ-साफ कहा था कि पश्चिम पंजाब के शहर और गाँव की एक भी जगह ऐसी नहीं है जहाँ पर महिलाएँ पीड़ित न हों, लड़कियों का अपहरण न हो रहा हो। उन्होंने इस पत्र में वो बिंदु सुझाए थे जिनके जरिए लड़कियों को बचाने का काम हो सकता है। इसमें सबसे पहले कहा गया था कि रेस्क्यू अधिकारी नियुक्त किए जाएँ, इन्हें अधिकार दिया जाए, इन्हें काम पूरा करने के लिए अगर पुलिस और मिलिट्री की जरूरत हो तो वो दी जाए।

आगे उन्होंने सीक्रेट सर्विस का जिक्र करते हुए ये भी बताया था कि इलाके में कुछ उत्साही युवा मुखबिर के रूप में कार्य करने के लिए इस्लाम अपनाने के लिए भी तैयार हैं. क्योंकि यही तरीका है जिससे कि सही जानकारी पाई जा सकती है। बलदेव सिंह ने इस पत्र में कहा था कि उन्हें लगता है कि उन्हें ऐसे युवाओं से मदद लेने से नहीं झिझकना चाहिए क्योंकि यही लोग उन्हें वास्तविक स्थिति बता सकते हैं। इसी पत्र में अगर आगे देखेंगे तो कहा गया है कि आरएसएस ‘फील्ड वर्क’ के लिए लोगों को अत्यधिक प्रशिक्षित करेगा और संघ प्रमुख श्री गोलवर्कर से परामर्श लिया जा सकता है।

तत्कालीन रक्षा मंत्री द्वारा लिखा गया पत्र

पत्र में आरएसएस का नाम साफ-साफ है। इसके साथ ही नीचे तत्कालीन रक्षा मंत्री बलदेव सिंह के हस्ताक्षर भी हैं। इस पत्र को गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिखा था जबकि इसकी कॉपी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भेजे गई थी। इसके बाद जो हुआ वो इतिहास में दर्ज है।

बता दें कि सरदार बलदेव सिंह के इस पत्र से पहले ऐसा नहीं था कि आरएसएस स्वयंसेवक शांति से बैठे थे, वो उससे पहले भी पाकिस्तान में फँसे लोगों की मदद करने में लगे थे। शायद यही वजह थी कि उन्हें मुश्किल के समय में रक्षा मंत्री द्वारा याद किया गया। लाहौर में अंग्रेजी के प्रोफेसर एएन बाली ने 1949 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘नाउ इट कैन बी टोल्ड’ में बताया है कि कैसे संघ के स्वयंसेवकों ने सूबे के हर मोहल्ले में हिंदू-सिख महिलाओं और बच्चों को खतरनाक इलाकों से निकालकर सुरक्षित केंद्रों तक पहुँचाने का काम किया। हिंदुओं और सिखों को भारत ले जाने वाली ट्रेनों तक पहुँचाने के लिए लॉरी और बसों की व्यवस्था की गई और उसकी सुरक्षा के उपाय किए गए। हिंदू और सिख इलाकों में चौकसी रखी जाती थी और हमला होने पर बचाव के उपाय सिखाए जाते थे। यहाँ तक ​​कि पंजाब के कई जिलों में कॉन्ग्रेस के नेताओं ने भी अपने परिवारों और रिश्तेदारों को बचाने के लिए आरएसएस की मदद माँगी थी। बाद में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 11 अगस्त 1948 को संघ के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवरकर ‘गुरुजी’ को लिखे पत्र में कहा था कि आरएसएस ने संकट के समय में हिंदू समाज की सेवा की है। संघ के युवाओं ने महिलाओं और बच्चों की रक्षा की और उनके लिए बहुत कुछ किया।

कागज तो दिखाना ही पड़ेगा: अमर, अकबर या एंथनी… भोले के भक्तों को बेचना है खाना, तो जरूरी है कागज दिखाना – FSSAI अब चलाए डंडा

सुप्रीम कोर्ट में सावन महीने के पहले दिन यानी सोमवार (22 जुलाई, 2024) को एक गंभीर मामला गया। मामला सावन में बम भोले का नारा लगा गंगाजल उठाने वाले कांवड़ियों से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट में कॉन्ग्रेसी वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिका लगाई थी कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रूट पर दुकानदारों को नाम दिखाने का आदेश ठीक नहीं है।

जैसा कि अक्सर ऐसे हाई प्रोफाइल वकीलों के मामले में होता है, यह मामला भी तुरंत सुना गया। सुप्रीम कोर्ट में न्याय की राह तक रहे बाक़ी 65,000 मामले अपनी प्रतीक्षा जारी रख सकते हैं। मामला चूंकि हाई प्रोफाइल वकील ने दाखिल किया था और इसलिए दाखिल किया था कि कहीं सेक्युलरिज्म ना खतरे में पड़ जाए, इसलिए एक अंतरिम आदेश भी जारी हो गया।

आदेश सुनाने से पहले जज साहब ने एक कहानी सुनाई, कहानी में बताया कि केरल का एक मुस्लिम मालिक वाला रेस्टोरेंट, हिन्दू मालिक वाले रेस्टोरेंट से बढ़िया खाना खिलाता था। यह भी बताया कि यूपी और उत्तराखंड के कांवड़ रूट पर अगर कांवडियो को यह पता चल गया कि दुकान अब्दुल की है या फिर अभिमन्यु की, तो सेक्युलरिज्म और संविधान के आर्टिकल 14,15 और 17 का उल्लंघन हो जाएगा।

इसके बाद कोर्ट ने कलम उठाई और कहा कि यूपी और उत्तराखंड के इस आदेश को रोक दिया जाए, भले ही अंतरिम तौर पर रोका जाए। कोर्ट ने कहा कि यूपी और उत्तराखंड में कांवड़ियों वाले रास्ते पर कोई भी दुकान लगाए, उसका नाम नहीं पता चलना चाहिए। कोर्ट ने अपनी कलम से यह भी लिखा कि पुलिस ऐसा करने के लिए किसी को मजबूर ना करे।

कोर्ट ने यह किस्से-कहानी और आदेश सुनाने के दौरान प्रबुद्ध कॉन्ग्रेसी वकील के अलावा दूसरी तरफ नहीं देखा। दरअसल, दूसरी तरफ देखने के लिए कोई था ही नहीं। ना उत्तर प्रदेश के वकील और ना ही उत्तराखंड सरकार का पक्ष रखने के लिए कोई यहाँ था। था इसलिए नहीं क्योंकि जिस याचिका पर सुनवाई हुई वह एक दिन पहले ही दाखिल हुई थी।

याचिका दाखिल हुई और सुनवाई हो गई, लखनऊ और देहरादून से वकील दिल्ली नहीं आ सके। खैर इन सब बातों के बीच कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नाम दिखने पर रोक लगाई जा रही है, लेकिन कागज दिखाने पर कोई रोक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सरकारें सभी दुकानदारों को कागज दिखाने का आदेश दे सकती हैं।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस वाले डंडे के जोर से दुकानदारों को नाम छाती पर लटकाने को ना कहे लेकिन यूपी सरकार कानून के रास्ते पर चले। उसने तरीका भी बताया। कोर्ट ने बताया कि जिस कॉन्ग्रेस के वकील सिंघवी यह याचिका लाए हैं, उसी की सरकार 2006 और 2014 में पहले ही इस बात का इलाज कर चुकी है।

कोर्ट ने बताया कि 2006 में भारत खाद्य सुरक्षा के लिए एक कानून लाया गया था। इसका नाम फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट था। इस कानून में कहा गया कि कोई ढाबा, रेस्टोरेंट या होटल जो खाने के नाम पर कुछ भी बेचता हो, उसे FSSAI से सर्टिफिकेट लेना पड़ेगा। लेने के बाद इसे दुकान पर साफ़ अक्षरों में दिखाना भी पड़ेगा। इस सर्टिफिकेट में दुकानदार का नाम चाहे अब्दुल हो अभिषेक, लिखा होना चाहिए और साथ ही उसका पता और क्या बेचता है, यह सब बताना पड़ेगा।

कोर्ट ने एक और कानून बताया। इसको स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट कहा जाता है। यह कानून 2014 में सरकार लाई थी। इसके तहत रेहड़ी पटरी वालों को एक सर्टिफिकेट दिया जाना था। चाहे कोई फल का ठेला हो या घर घर जाकर सब्जी बेचने वाले, इन सबको नाम और क्या बेचते हैं ये बताते हुए सर्टिफिकेट में जानकारी देनी होगी। इसको माँगे जाने पर दिखाना भी होगा।

अब अगर कोई भले ही नाम ना बताए, कागज तो दिखाना ही पड़ेगा और जरूर दिखाना पड़ेगा। कांवड़ रूट के होटल-ढाबे पर अगर अब भोले के भक्त किसी से सर्टिफिकेट माँग बैठें तो फिर सिंघवी किस अदालत का रुख करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का कर नहीं सकते क्योंकि उसी ने कहा है कि कागज़ तो दिखाना पड़ेगा।

ऐसे में यूपी सरकार अब नासिर फल वाले को अपने नाम की तख्ती हटा कर अपना सर्टिफिकेट चिपकाने को बोल सकती है। इससे नाम क्या गाँव-पता भी मालूम हो जाएगा और सेक्युलरिज्म भी सुरक्षा के घेरे में रहेगा। कोर्ट को यूपी सरकार को यह राह दिखाने के लिए धन्यवाद तो देना ही चाहिए।

अब जब कागज दिखाने की बारी आएगी तो फिर से शायद फैज की नज्में गई जाएँ। कोई क्रांतिकारी यह भी लिख सकता है कि कांवड़ से अपना धंधा चलाएँगे पर कागज नहीं दिखाएँगे। अब नाम दिखाने से चालू हुई यह बहस कागज़ के रास्ते होते हुए कहाँ तक पहुँचती है, ये तो समय ही बताएगा।

हिंदू लड़कियों की दोस्ती (जबरन) मुस्लिम लड़कों से, धर्मांतरण-निकाह के लिए उकसाना: UP में लैक्मे एकेडमी का हाल, हिंदू से मुसलमान बनी डायरेक्टर पर आरोप

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद स्थित लैक्मे एकेडमी नाम के फैशन इंस्टीट्यूट चलाने वाली रक्शंदा खान पर छात्राओं ने धर्मांतरण के लिए माइंडवॉशस करने का आरोप लगाया। इंस्टीट्यूट की दो हिंदू छात्राओं और एक छात्र ने इस संबंध में जिले के कलेक्टर अनुज सिंह से मिलकर इसकी शिकायत की। छात्राओं का कहना है कि एकेडमी की डायरेक्टर उन पर मुस्लिम लड़कों से दोस्ती करने का दबाव डालती हैं।

छात्राओं ने कहा कि कांठ रोड पर हरथला पुलिस चौकी के सामने स्थित एकेडमी की डायरेक्टर रक्शंदा खान कहती है, “मुस्लिम लड़कों से शादी करने में कोई दिक्कत नहीं। मैं भी पहले हिंदू थी। मैंने एक मुस्लिम से शादी की। अब मैं हिंदू धर्म छोड़कर मुसलमान बन चुकी हूँ और मुस्लिम परिवार में बहुत खुश हूँ।” छात्राओं ने एकेडमी का रजिस्ट्रेशन रद्द करने और रक्शंदा खान पर कार्रवाई की माँग की है।

दरअसल, सोमवार (22 जुलाई 2024) को एकेडमी में पढ़ने वाली तान्या चौधरी और स्वाति पाल एक छात्र के साथ जिलाधिकारी कार्यालय पहुँची। उन्होंने आरोप लगाया कि सपना उर्फ रक्शंदा खान हिंदू लड़कियों को मुस्लिम लड़कों से दोस्ती करने और धर्मांतरण कर शादी करने के लिए उकसाती है। वह हिंदू लड़कियों को जानबूझकर मुस्लिम लड़कों के साथ ग्रुप में रखती हैं। वह मुस्लिमों को प्रमोट करती है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, जिलाधिकारी को दी गई शिकायत में छात्राओं ने आगे कहा, “कांठ रोड पर स्थित लैक्मे एकेडमी मेकअप, हेयर और स्किन ट्रीटमेंट सिखाता है। इसके लिए कई अलग-अलग कोर्स चला रखे हैं। एकेडमी में लगभग सभी लड़के मुस्लिम और ज्यादातर लड़कियाँ हिंदू हैं। इन मुस्लिम लड़कों से दोस्ती करने के लिए वह उकसाती है। रक्शंदा खान इसके लिए मुहिम चला रखी है।”

इसकी मालकिन और डायरेक्टर सपना है। वह धर्म परिवर्तन करके रक्शंदा खान बन चुकी है और मुस्लिम युवक से निकाह कर लिया है। रक्शंदा हिंदू छात्राओं से कहती है, “मैं भी पहले हिंदू थी, लेकिन अब मुस्लिम हूँ। एक मुस्लिम के घर में रह रही हूँ। मुस्लिम लड़कों से शादी करने में कोई दिक्कत नहीं होती।” छात्राओं का कहना है कि जबरन उनका नाम मुस्लिम लड़कों के साथ जोड़ा जाता है।

तान्या चौधरी नाम की छात्रा ने कहा, “एडमिशन के टाइम बताया गया था कि एकेडमी में मांस-मछली पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन मुस्लिम लड़के यहाँ रोज मीट-मछली लेकर आते हैं और सबके सामने खाते हैं।” एक अन्य छात्रा स्वाति पाल ने कहा, रक्शंदा हिंदू धर्म को गंदी-गंदी गालियाँ देती है।” छात्राओं का कहना है उसकी बात नहीं मानने वाली हिंदू लड़कियों को तरह-तरह से परेशान किया जाता है।

वहीं, एक अन्य छात्रा स्वाति पाल का कहना है, “रक्शंदा खान ने हिंदू छात्राओं को माथे पर बिंदी, टीका, सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहनने पर प्रतिबंध लगा रखा है। अगर शादीशुदा कोई लड़की मंगलसूत्र और सिंदूर लगाकर आ जाती है तो उसे इंस्टीट्यूट में वह घुसने नहीं देती है। दूसरी ओर मुस्लिम छात्रों और मुस्लिम ट्रेनर्स को एकेडमी में ही नमाज पढ़ने की आजादी है।”

इस घटना को लेकर मुरादाबाद पुलिस ने सोशल मीडिया साइट एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट किया है। इस घटना को लेकर पोस्ट करने वाले एक यूजर के पोस्ट पर जवाब देते हुए मुरादाबाद पुलिस ने लिखा, “थाना प्रभारी प्रभारी सिविल लाईन्स को जाँच / आवश्यक कार्यवाही हेतु निर्देशित किया गया है।”

बता दें कि एक साल पहले राज राणा नाम के एक लड़के ने भी रक्शंदा खान पर धर्मांतरण का दबाव डालने का आरोप लगाया है। छात्र का कहना था कि रक्शंदा पढ़ाने के बजाय इस्लाम का प्रचार करती है। छात्र का आरोप था, “रक्शंदा कहती है कि अगर इस्लाम अच्छा नहीं है तो इतनी तादाद में हिंदू मजारों पर क्यों जाते हैं? जब मुस्लिम लड़की कन्वर्ट होकर हिंदू बनती है तो इतना बवाल क्यों नहीं होता?”

रक्शंदा खान मूल रूप से कानपुर के साकेत नगर की रहने वाली है। उसका जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था और उसका मूल नाम सपना था। वो 5 बहनें और 1 भाई है। वह बहनों में सबसे छोटी है। करीब 17 साल पहले उसने शहनवाज खान नाम के एक मुस्लिम लड़के से प्यार के बाद निकाह कर लिया था। इसके लिए उसने हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम कबूल कर लिया था।

‘कोई भी कार्रवाई हो तो हमारे पास आइए’: हाईकोर्ट ने 6 संपत्तियों को लेकर वक्फ बोर्ड को दी राहत, सेन्ट्रल विस्टा के तहत इन्हें नहीं छुआ जाएगा

दिल्ली उच्च न्यायालय ने वक्फ बोर्ड को बड़ी राहत दी है और उसे कार्रवाई से बचाया है। सोमवार (22 जुलाई, 2024) को उच्च न्यायालय ने कहा कि अगर केंद्र सरकार सेन्ट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत उसकी संपत्तियों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करती है तो वो अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने ये आदेश दिया। साथ ही कहा कि सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिली हुई है।

बता दें कि इस परियोजना के तहत ही नया संसद भवन बन कर तैयार हुआ है, साथ ही इंडिया गेट के आसपास के इलाकों का सौंदर्यीकरण हुआ है, निर्माण कार्य अभी चल ही रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने वक्फ बोर्ड से कहा कि वो 2021 में दायर अपनी याचिका वापस ले। दिल्ली वक्फ बोर्ड ने अपनी याचिका में 6 संपत्तियों की सुरक्षा की माँग की है। साथ ही निर्देश माँगा कि इनका संरक्षण भी किया जाए। वक्फ बोर्ड का कहना है कि वो ये माँग नहीं कर रहा कि सेन्ट्रल विस्टा परियोजना पर रोक लगे, बल्कि सिर्फ उसे उसकी संपत्तियाँ से बेदखल न किया जाए।

हालाँकि, जज ने बोर्ड को याचिका वापस लेने के लिए कहा। साथ ही कहा कि हम इसे और जटिल नहीं बनाना चाहते हैं। अदालत ने कहा कि जब भी वो कोई कार्रवाई करें, आप आ सकते हैं। साथ ही ये भी सलाह दी कि वक्फ बोर्ड नई याचिका भी दायर कर सकता है। बता दें कि इन संपत्तियों में मानसिंह रोड पर मस्जिद ज़ब्तागंज, रेडक्रॉस रोड पर जामा मस्जिद, उद्योग भवन के पास सुनहरी मस्जिद, मोतीलाल नेहरू मार्ग के पीछे स्थित मजार, कृषि भवन परिसर के भीतर स्थित मस्जिद और उप-राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास के भीतर स्थित मस्जिद शामिल है

दिसंबर 2021 में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया था कि वक्फ बोर्ड की संपत्तियों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाएगा। साथ ही कहा था कि पुनर्विकास का कार्य अभी इन संपत्तियों तक पहुँचा भी नहीं है और ये एक लंबी योजना है। हाईकोर्ट ने कहा था कि उसे इस पर पूरा भरोसा है। सुनहरी बाग़ मस्जिद के पास एक मज़ार को ध्वस्त किया गया था, लेकिन केंद्र सरकार ने बताया था कि ये कार्रवाई दिल्ली नगरपालिका (NDMC) का है।

‘कागज़ पर नहीं, UCC को जमीन पर उतारिए’: हाईकोर्ट ने ‘तीन तलाक’ को बताया अंधविश्वास, कहा – ऐसी रूढ़िवादी प्रथाओं पर लगे लगाम

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (UCC) को कागजों की जगह अब जमीन पर उतारने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा है कि इससे ही रूढ़िवादी प्रथाओं पर लगाम लग सकती है। कोर्ट ने यह टिप्पणी तीन तलाक के एक मामले को सुनते हुए की है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस अनिल वर्मा ने कहा, “समाज में कई निंदनीय, कट्टरपंथी, अंधविश्वासी और अति-रूढ़िवादी प्रथाएँ प्रचलित हैं, जिन्हें आस्था और विश्वास के नाम पर दबाया जाता रहा है। हालाँकि, भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का समर्थन किया गया है, लेकिन इसे केवल कागज़ों पर नहीं बल्कि असलियत में बदलने की जरूरत है। एक सही तरह से ड्राफ्ट की गई संहिता ऐसी अंधविश्वासी और बुरी प्रथाओं पर लगाम लगा सकती है।”

कोर्ट ने कहा कि 2019 में तीन तलाक को अवैध घोषित करते हुए 2019 में भारत की संसद ने कानून पास किया था जो अच्छा कदम था लेकिन फिर भी मारे जनप्रतिनिधियों को इतने वर्ष यह जानने में लग गए कि तीन तलाक असंवैधानिक और समाज के लिए बुरा है।”

कोर्ट ने कहा कि हमें बहुत जल्द ही देश में UCC की आवश्यकता समझने की जरूरत है। कोर्ट ने यह सारी टिप्पणियाँ तीन तलाक के एक मामले को सुनते हुए की। कोर्ट में दो महिलाओं ने राहत की माँग करते हुए अपील लगाई थी। इन महिलाओं पर घर की बहू ने दहेज़ माँगने, मारपीट और प्रताड़ना देने का आरोप लगाया था।

मुस्लिम महिला ने आरोप लगाया था कि उसकी नंनद और सास ने उसे निकाह के बाद प्रताड़ित किया और दहेज़ को लेकर मारपीट की। महिला ने आरोप लगाया था कि उसके शौहर ने भी उसको प्रताड़नाएँ दी। जब महिला ने प्रताडनाओं का विरोध किया था तो उसके शौहर ने उसे तीन बार तलाक बोल कर घर से बाहर भगा दिया।

मुस्लिम महिला ने इस मामले में शौहर के साथ ही उसके घर वालों पर तीन तलाक क़ानून के तहत मामला चलाने की अपील की थी। हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि यह कानून शौहर के तीन तलाक देने पर ही बनता है, कोर्ट ने इस मामले में उसकी सास और ननद को राहत दे दी।

गौरतलब है कि बीते कुछ समय से देश भर में UCC का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। कई भाजपा शासित राज्य इसे लागू करने की तैयारी में हैं। उत्तराखंड में धामी सरकार इसे लागू भी कर चुकी है और इसके क्रियान्वन पर काम चल रहा है। भाजपा ने भी लगातार UCC को व्यापक तरीके से लागू किए जाने की वकालत की है।

बीवी के साथ गुदा मैथुन अपराध नहीं, नहीं ठहराया जा सकता पति को दोषी: हाई कोर्ट

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति का अपनी पत्नी के साथ गुदा मैथुन करना अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करके पति को राहत दे दी और कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ भी की।

हाई कोर्ट ने इस मामले को सुनते हुए कहा, “कथित कृत्य भी IPC की धारा 375 के अंतर्गत आता है और इसके अपवाद 2 के अनुसार, पति को गुदा मैथुन के लिए IPC की धारा 375 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इन परिस्थतियों में पति के विरुद्ध धारा 377 के तहत भी मामला नहीं बनता।”

कोर्ट ने कहा कि एक दंपत्ती के बीच निजी तौर पर सहमति से बनाए गए सम्बन्धों पर धारा 377 की कार्रवाई नहीं की जा सकती। कोर्ट एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील की सुनवाई कर रहा था। यह अपील उसने अपनी पत्नी द्वारा दर्ज करवाए गए मुकदमे के विरुद्ध लगाई थी।

महिला ने अपने पति पर आरोप लगाया था कि वह उसके साथ जबरदस्ती अप्राकृतिक यौन संबंध बनाता है। वह इसके लिए दबाव डालता है। महिला ने आरोप लगाया था कि उसका पति लगातार उसके साथ गुदा मैथुन करता है। महिला ने आरोप लगाया कि गुदा मैथुन के कारण उसको गंभीर घाव हुए जिसका उसने अलग-अलग अस्पतालों में इलाज करवाया।

इसी आधार पर महिला ने अपने पति को अप्राकृतिक यौन संबंध का आरोपित बनाने को लेकर मामला दर्ज करवाया था। महिला के पति की तरफ से वकील ने कोर्ट में कहा कि दोनों विवाहित हैं और प्रत्येक मौके पर सेक्स से पहले सहमति की बात यहाँ शून्य हो जाती है।

महिला के पति की तरफ से भी यह भी दलील दी गई कि दंपती के संबंध को बलात्कार नहीं ठहराया जा सकता तो फिर ऐसे में यह मामला नहीं बनता। हालाँकि, महिला के वकील ने इसका विरोध किया और कहा कि कोई भी महिला इस बात की अनुमति नहीं दे सकती है। कोर्ट ने इसी के साथ आरोपित पुरुष को इस मामले में रहत देते हुए धारा 377 के आरोपों के समन खारिज कर दिए। उसके खिलाफ कई और धाराओं में भी मामला दर्ज करवाया गया है, वह चलते रहेंगे।

15 अगस्त को दिल्ली कूच का ऐलान, राशन लेकर पहुँचने लगे किसान: 3 कृषि कानूनों के बाद अब 3 आपराधिक कानूनों से दिक्कत, स्वतंत्रता दिवस के दिन ट्रैक्टर मार्च

कोरोना काल में किसान प्रदर्शनकारियों ने लगभग 1 साल तक दिल्ली की सीमाओं को घेरे रखा था। अब कुछ महीनों से पंजाब-हरियाणा की सीमा पर ये किसान बैठे हुए हैं। प्रदर्शनकारियों के आगे झुकते हुए मोदी सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस भी ले लिया। हालाँकि, अब किसानों को 3 नए क्रिमिनल लॉ से समस्या हो गई है। बता दें कि भारत सरकार ने IPC (भारतीय दंड संहिता), CrPc (दंड प्रक्रिया संहिता) और IEA (इंडियन एविडेंस एक्ट) को खत्म कर दिया है।

अब इनकी जगह क्रमशः ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS), ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) और BSA (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) लेकर आई है। अब किसानों को इन तीनों से भी दिक्कत है। बता दें कि तीनों कानून अंग्रेजों के ज़माने से ही चले आ रहे थे। ‘किसान मजदूर मोर्चा’ और ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ की तरफ से ये ऐलान किया गया है कि वो इन कानूनों का विरोध करते हैं। दिल्ली में इनकी प्रतियाँ जलाई जाने की योजना है। किसानों से राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर पहुँचने की अपील की गई है।

इन्होंने इस साल आने वाले स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के दिन दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च का भी ऐलान किया है। 1 अगस्त को मोदी सरकार की ‘अर्थी’ जलाई जाएगी। साथ ही देश भर के जिला मुख्यालयों पर MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के लिए प्रदर्शन किया जाएगा। शंभु बॉर्डर पर किसान महीनों का राशन लेकर पहुँचने शुरू हो गए हैं। 31 अगस्त को इस धरने के 200 दिन भी पूरे होने वाले हैं। 15 सितंबर को जींद और 22 सितंबर को पीपली में किसानों की रैली प्रस्तावित है।

किसानों ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष को जमानत दिए जाने की भी निंदा की। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट 1 सप्ताह के भीतर शंभु बॉर्डर खोलने का आदेश दे चुका है। 17 जुलाई को ही ये मोहलत खत्म हो गई है, लेकिन हरियाणा सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची है। 13 फरवरी को ये किसान निकले थे। शंभु बॉर्डर पटियाला और अंबाला के बीच है। बता दें कि 2021 में गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के दिन ट्रेक्टर मार्च के दौरान हिंसा हुई थी, लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहरा दिया गया था।

केंद्र सरकार ने 4 साल में राज्यों को की ₹1.73 लाख करोड़ की मदद, फंड ना मिलने पर धरना देने वाली ममता सरकार को मिले ₹10 हजार करोड़

कर्नाटक, केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल, यह भारत के चार राज्य हैं। चारों में समान बात यह है कि इनमें गैर-भाजपा सरकार है। इन चारों में और बात समान है कि यह चारों केंद्र की मोदी सरकार पर अपना फंड रोकने, पैसा ना देने और आर्थिक मामलों में अड़ंगा डालने का आरोप लगाते हैं। अब संसद में दिए गए एक जवाब में साफ़ हुआ है कि मोदी सरकार बीते चार सालों में इन राज्यों को हजारों करोड़ रूपए विशेष मदद के तहत दे चुकी है।

सोमवार (22 जुलाई, 2024) को लोक सभा कार्रवाई में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में वित्त मंत्रालय ने यह जानकारी दी है। वित्त मंत्रालय ने बताया है कि वह वित्त वर्ष 2020-21 से ही राज्यों की विशेष आर्थिक मदद के लिए योजना चला रहा है। वित्त मंत्रालय ने बताया कि यह सहायता राज्यों को इसलिए दी जा रही है ताकि वह अपने यहाँ इससे कैपिटल एक्सपेंडीचर में लगा सकें। इससे राज्य में नया ढाँचा विकसित हो और वह मजबूत हो सकें।

वित्त मंत्रालय ने बताया है कि 2020-21 के बाद से लगातार इस योजना को चालू रखा गया है। हर वित्त वर्ष में राज्यों को सहायता इसी के तहत दी जा रही है। केंद्र सरकार 2020-21 से लेकर 2023-24 तक राज्यों को ₹1.73 लाख करोड़ की मदद इस योजना के तहत दे चुकी है।

पश्चिम बंगाल को ₹10000 करोड़ से अधिक की मदद

केंद्र सरकार पर फंड रोकने और आर्थिक मोर्चे पर सहायता ना करने का सबसे अधिक आरोप पश्चिम बंगाल की ममता सरकार लगाती है। पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज तृणमूल कॉन्ग्रेस ने बीते अप्रैल, 2024 में इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन भी किया था।

वित्त मंत्रालय ने बताया है कि पश्चिम बंगाल को 2020-21 से 2023-24 के बीच वह ₹10,233 करोड़ की मदद दे चुकी है। केंद्र सरकार ने 2020-21 में ₹630 करोड़, 2021-22 में ₹933 करोड़, 2022-23 में ₹3655 करोड़ और 2023-24 में ₹5015 करोड़ की सहायता पश्चिम बंगाल को दी है।

कर्नाटक को भी मिले ₹6000 करोड़ से ज्यादा

केंद्र सरकार को फंड के मसले पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार भी खूब घेरती रही है। सिद्दारमैया सरकार ने भी फरवरी, 2024 में इसी मुद्दे को लेकर बेंगलुरु में प्रदर्शन किया था। सिद्दारमैया सरकार ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार उसके पैसे नहीं रिलीज कर रही।

वित्त मंत्रालय ने बताया है कि उसने 2020-21 से 2023-24 के बीच ₹6693 करोड़ मदद के तौर पर दे चुकी है। केंद्र सरकार वित्त वर्ष 2020-21 में ₹305 करोड़, 2021-22 में ₹451 करोड़, 2022-23 में ₹3399 करोड़ और 2023-24 में ₹2538 करोड़ दे चुकी है।

पंजाब को भी मिली मदद, खर्च नहीं किया तो रोकी

पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार वर्तमान में काफी बुरी आर्थिक स्थिति में है। भगवंत मान सरकार बीते दिनों केंद्र से कर्जों की वसूली पर पाँच साल के लिए रोक लगाने को कह चुकी है। पंजाब सरकार ने भी कई विभागों का फंड रोकने का आरोप केंद्र सरकार पर लगाया है।

केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत पंजाब को भी लगातार मदद दी है। केंद्र सरकार ने पंजाब को 2020-21 से 2023-24 के बीच ₹1318 करोड़ की मदद दी है। 2020-21 में पंजाब को केंद्र सरकार ने ₹296 करोड़, 2021-22 में ₹223 करोड़ और 2022-23 में ₹798 करोड़ की मदद दी है। पंजाब की मदद 2023-24 में रोक दी गई थी क्योंकि इन्होने नियमों का पालन नहीं किया था और पहले से दिए गए पैसे खर्च नहीं किए थे।

केरल को ₹2000 करोड़ से ज्यादा मिले

आर्थिक संकट में फंसी केरल की सरकार वित्त के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ हाल ही में सुप्रीम कोर्ट चली गई थी। केरल को भी केंद्र सरकार अच्छी-खासी मदद 4 वर्षों में दे चुकी है। केरल को केंद्र सरकार ₹2221 करोड़ मदद के तौर पर चुकी है। इसके तहत वर्ष 2022-23 में ₹1902 करोड़ दिए गए हैं। केरल की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि वह कई विभागों के कर्मचारियों को तनख्वाह तक नहीं दे पा रहा।

इन राज्यों के अलावा तमिलनाडु को ₹11,322 करोड़, तेलंगाना को ₹5020 करोड़ और हिमाचल प्रदेश को ₹3843 करोड़ की मदद दी जा चुकी है। केंद्र सरकार इसके अलावा अन्य कई योजनाओं के तहत भी राज्यों को पैसा दे रही है। हालाँकि, कई राज्यों में मुफ्त बाँटने की नीतियों के चलते खजाना खाली हो रहा है और खराब आर्थिक हालत का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ दिया जाता है। केंद्र और राज्य में सत्ता में रहने वाली पार्टी के अलग होने के कारण यह और आसान हो जाता है।