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पूजा खेडकर की माँ होटल से हुई गिरफ्तार, नाम बदलकर लिया था कमरा: महिला IAS के पिता नौकरी में रहते 2 बार हुए थे सस्पेंड, अब हैं फरार

महाराष्ट्र की महिला ट्रेनी आईएएस पूजा खेडकर का चिट्ठा खुलने के बाद अब उनके माता-पिता के खिलाफ जाँच जारी है। एक खबर के अनुसार जहाँ पता चला है कि पुलिस ने उनकी माँ मनोरमा खेडकर को महाड के होटल से हिरासत में लिया है। वहीं पिता दिलीप खेडकर को लेकर जानकारी सामने आई है कि उनके खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो अपनी जाँच कर रहा है। उन पर उनकी सर्विस में रहते हुए दो बार घूस लेने के आरोप हैं।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, मनोरमा खेडकर, जिनपर किसानों को धमकाने का आरोप है, उनको लेकर पुणे ग्रामीण के एसपी पंकज देशमुख ने बताया कि उन्होंने महाड से पूजा खेडकर की माँ को हिरासत में ले लिया है। वह होटल में पाई गई हैं। उन्हें पूछताछ के लिए पुलिस लेकर आ रही है। उसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

एक वीडियो भी सामने आई है जिसमें मनोरमा खेडकर को पुलिस ने पकड़ा हुआ है और पत्रकार उनसे सवाल कर रहे हैं कि उन्होंने आखिर क्यों किसानों को धमकी दी थी। वीडियो में मनोरमा को अपना चेहरा ढककर पुलिस के साथ जाते हुए देखा सकता है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक मनोरमा खेडकर महाड के होटल में नाम बदलकर रुकी थीं। उनके साथ एक लड़का भी था। इस लड़के को उन्होंने अपना बेटा बताया था। दोनों ने होटल का कमरा 1 हजार रुपए में लिया था। बाद में दोनों खाना खाने भी नहीं आए। होटल मालिक ने बताया कि उनके पास सिर्फ एक बैग था और कमरे में जाते ही उन्होंने उसे लॉक कर लिया। हालाँकि बाद में रात के करीब 2 बजे पुलिस आई और उन्हें हिरासत में लिया।

वहीं पूजा खेडकर के पिता की बात करें तो यही पता चला है कि वो अभी तक फरार हैं। पुलिस उनकी तलाश में है। इस बीच जानकारी आई है कि दिलीप खेडकर जो वर्तमान में वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता हैं वह प्रशासनिक अधिकारी रहते हुए दो बार भ्रष्टाचार के मामले में सस्पेंड हुए थे। एक बार 2018 में और एक बार 2020 में। इसके अलावा करीबन 300 छोटे व्यापारियों ने उनके खिलाफ 2015 में शिकायत दर्ज कराई थी कि वो उन्हें बेवजह परेशान करते हैं।

2018 में दिलीप खेडकर जब रीजनल ऑफिसर के तौर पर काम कर रहे थे तब स्थानीय आरा मिल और लकड़ी व्यापारी संघ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने उनकी बिजली और पानी बहाल करने के लिए 25000 से 50000 तक की रिश्वत माँगी थी। इसके बाद 2019 में उनके ऊपर एक कंपनी से 20 लाख रुपए माँगने का आरोप लगा था। एंटी करप्शन ब्यूरो उनके खिलाफ लगे आरोपों की जाँच कर रहा है। उनकी गाड़ी, उनकी संपत्ति सब जाँच के घेरे में है। इसके अलावा ये भी पता चला है कि दिलीप खेडकर एक बार 6-7 महीने के लिए बिन बताए गायब हो गए थे।

बिना परोल के 24 साल से जेल में बंद हैं रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह, 60+ हो चुकी है उम्र: रिहाई की संस्तुति के बावजूद फाइल दबाए रही ओडिशा सरकार, अब सुप्रीम कोर्ट से आस

कुल 4 केसों में 1 से लेकर उम्रकैद की सजा काट रहे रवींद्र कुमार पाल उर्फ़ दारा सिंह की रिहाई के लिए उनके भाई ने 9 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। अरविन्द कुमार पाल की तरफ से दायर की इस याचिका में वकील के तौर पर विष्णु शंकर जैन पेश होंगे। ऑपइंडिया की टीम ने रविवार (14 जुलाई 2024) को पिछले 24 साल से ओडिशा की जेल में बंद दारा सिंह के घर जाकर उनके परिवार से मुलाकात की और इस संबंध में जानकारी ली।

दारा सिंह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के रहने वाले हैं। दिल्ली से हम ट्रेन से उनके गृहनगर के नजदीकी स्टेशन फफूँद पहुँचे। यहाँ से हम एक प्राइवेट वाहन से औरैया शहर वाले मार्ग पर पड़ने वाले बाजार ककोड़ गए, जो लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है। रास्ते में हमने एक जगह एक बाइक सवार से रास्ता पूछा तो उसने हताशा भरे स्वर में तुरंत सवाल दाग दिया।

उसने कहा, “अरे वही दारा सिंह क्या जो हिन्दुओं को ईसाई बनाने वाले पादरी को मारे थे? उनके साथ तो बहुत गलत हुआ।” बहरहाल उन्होंने रास्ता बताया और ककोड़ मुख्य कस्बे में सड़क से 200 मीटर अंदर दारा सिंह के घर पर उनके भाई अरविन्द कुमार मौजूद मिले। अरविन्द कुमार ने दारा सिंह के लिए 24 साल तक लड़ी गई कानूनी लड़ाई के अधिकाँश कागजात सहेज कर रखे है।

कई बार रिहाई की संस्तुति, पर ओडिशा सरकार द्वारा नजरअंदाज

आखिरकार हम रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह के घर पहुँचे। वहाँ उनके भाई अरविन्द कुमार पाल से मुलाकात हुई। उन्होंने हमें बताया कि ओडिशा की जेल से औरैया के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को दारा सिंह की रिहाई के संबंध में समय-समय पर पत्र आते रहे हैं। इन पत्रों के जवाब में यहाँ के DM और SP ने उनकी रिहा की संस्तुति की। इसके बावजूद ओडिशा की तत्कालीन सरकार ने इसकी अनदेखा की।

अरविन्द पाल ने हमें सबूत के तौर पर 28 फरवरी 2018 का एक पत्र दिखाया, जिसमें औरैया के जिलाधिकारी की साइन और मोहर लगी थी। यह पत्र क्योंझर जेल ओडिशा से 18 नवम्बर 2017 को माँगी गई एक आख्या पर जवाब के तौर पर भेज गया था। उसमें जिले के पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट का हवाला देते हुए जिलाधिकारी ने पत्र संख्या 821 में लिखा था, “रवींद्र कुमार पाल उर्फ़ दारा सिंह को समय पूर्व रिहाई (प्रीमच्योर रिलीव) पर रिहा करने की संस्तुति की जाती है।”

DM औरैया का पत्र

ऑपइंडिया के पास 18 जनवरी 2018 को पुलिस अधीक्षक औरैया द्वारा जारी आख्या भी मौजूद है। इस आख्या में SP औरैया ने भी दारा सिंह को रिहाई योग्य माना है। इसके बाद 22 सितंबर 2022 को एक बार फिर से SP औरैया ने ओडिशा की क्योंझर जेल द्वारा माँगी गई आख्या पर अपना जवाब दाखिल किया। इसमें भी पुलिस अधीक्षक औरैया ने दारा सिंह की समय पूर्व रिहाई की संस्तुति की थी।

SP औरैया का पत्र

ऑपइंडिया से बात करते हुए अरविन्द कुमार पाल ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश प्रशासन द्वारा बार-बार दारा सिंह को रिहा किए जाने की रिपोर्ट लगाने के बावजूद तत्कालीन ओडिशा सरकार ने उन पत्रों को अनदेखा किया। उन्होंने ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की अगुवाई वाली बीजू जनता दल की सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।

प्रधानमंत्री कार्यालय से माँगे जवाब को भी ओडिशा सरकार ने घुमाया

दारा सिंह के छोटे भाई ने हमें आगे बताया कि उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों की आख्या को ओडिशा सरकार द्वारा लगातार अनदेखा करने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से गुहार लगाई। अरविन्द पाल ने 19 मई 2021 को प्रधानमंत्री कार्यालय दिल्ली को पत्र भेज कर दारा सिंह की रिहाई की माँग की।

अपने पत्र में अरविंद कुमार पाल ने तर्क दिया कि पिछले 21 सालों में उनके बड़े भाई रवींद्र कुमार पाल उर्फ दारा सिंह को कभी परोल नहीं मिला। इसके अलावा, भी उन्होंने कई बिंदुओं पर सरकार का ध्यान खींचा। अरविन्द का आरोप है कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जब इस पत्र पर ओडिशा सरकार से जवाब तलब किया गया तो उधर से बस मामले को टालने जैसे जवाब मिलते रहे।

प्रधानमंत्री से भी गुहार

अरविन्द कुमार पाल ने हमें 14 जुलाई 2021 का एक पत्र दिखाया, जो ओडिशा के DIG जेल द्वारा जारी किया गया था। इस पत्र में उन्होंने ओडिशा के गृह सचिव को बताया है कि 9 जुलाई 2021 को पूरे मामले की रिपोर्ट क्योंझर जेल के सुपरिंटेंडेंट दखिल कर चुके हैं। आगे की गेंद DIG जेल ने राज्य सरकार के पाले में डाल दी थी।

DIG जेल ओडिशा का पत्र

अब 28 साल से ज्यादा समय तक जेल में

ऑपइंडिया ने 9 जुलाई 2021 को क्योंझर जेल ओडिशा के सुपरिंटेंडेंट द्वारा दाखिल उस रिपोर्ट की पड़ताल की। अपनी इस रिपोर्ट में जेल सुपरिंटेंडेंट ने स्वीकार किया है कि जुलाई 2021 तक दारा सिंह ने छूट सहित 25 साल 3 महीने से अधिक समय की सजा काट ली है।

आगे की कार्रवाई के लिए जेल अधीक्षक ने उच्चाधिकारियों को अधिकृत बताया है। हालाँकि अरविन्द कुमार पाल का आरोप है कि इस रिपोर्ट पर अब तक ओडिशा शासन द्वारा कोई निर्णय नहीं लिया गया और फ़ाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

जेल सुपरिंटेंडेंट की आख्या

स्थानीय थाने में कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं

दारा सिंह मूलत: औरेया जिले के दिबियापुर थाना क्षेत्र के रहने वाले हैं। ओडिशा जेल से उनकी रिहाई के लिए जो आख्या माँगी गई थी, उसके बाद जिला प्रशासन ने स्थानीय थाने से दारा सिंह के रिकॉर्ड निकलवाए थे। 15 सितंबर 2022 को थाना दिबियापुर के सब इंस्पेक्टर शेर सिंह ने अपनी जाँच रिपोर्ट पेश की थी।

इस जाँच रिपोर्ट में सब इंस्पेक्टर शेर सिंह ने कहा था कि थाना दिबियापुर में दारा सिंह का कोई भी आपराधिक रिकॉर्ड दर्ज नहीं है। अपनी इस जाँच आख्या में स्थानीय थाने के अधिकारी ने भी दारा सिंह को समय पूर्व रिहा करने की संस्तुति की थी।

स्थानीय थाने पर नहीं है दारा सिंह का कोई आपराधिक रिकॉर्ड

जेल के कैरेक्टर सर्टिफिकेट में भी उत्तम व्यवहार

ओडिशा की क्योंझर जिला जेल के सुपरिटेंडेंट ने 10 जून 2022 को रवींद्र कुमार पाल उर्फ़ दारा सिंह का चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया है। इस प्रमाण पत्र में उन्होंने बताया है कि क्योंझर जेल में दारा सिंह पिछले 15 वर्षों से जेल काट रहे हैं।

इसमें से 3 साल की सजा तो प्रमाण पत्र जारी करने वाले तत्कालीन जेल सुपरिटेंडेंट की मौजूदगी में काटी गई है। जेल सुपरिंटेंडेंट की इस आख्या में दारा सिंह के जेल स्टाफ व अन्य कैदियों के प्रति व्यवहार को अच्छा और संतोषजनक बताया गया है।

जेल द्वारा जारी कैरेक्टर सर्टिफिकेट में दारा सिंह का व्यवहार अच्छा

योगी आदित्यनाथ से भी उम्मीद

अरविन्द कुमार पाल ने 11 मार्च 2023 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी पत्र भेजा। इस पत्र में उन्होंने दारा सिंह को 23 साल तक पेरोल नहीं मिलने की जानकारी देते हुए मदद की गुहार लगाई थी। दारा सिंह के भाई ने उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कई बार दारा सिंह की रिहाई की संस्तुति की भी जानकारी अपने पत्र में दी है।

पत्र में अरविंद कुमार पाल ने कहा है कि दारा सिंह उर्फ़ रवींद्र कुमार पाल की उम्र अब 60 साल से अधिक हो चुकी है। ऐसे में उनके जीवन का बाकी समय उनके पैतृक आवास में अपने परिवार के लोगों के बीच बिताने की अनुमति दी जाए।

CM योगी आदित्यनाथ से भी गुहार

सब कुछ सही होने पर नहीं हुई सुनवाई तो अंतिम सहारा सुप्रीम कोर्ट

अरविन्द कुमार पाल ने हमें बताया कि उत्तर प्रदेश के थानेदार से लेकर SP और DM लगातार उनके भाई को रिहा किए जाने की संस्तुति कर रहे थे। जेल के सर्टिफिकेट में भी उनका व्यवहार अच्छा बताया गया। ओडिशा प्रशासन की आख्या में उनकी सजा 25 साल से अधिक (छूट सहित) गिनी गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय तक के पत्र को ओडिशा की राज्य सरकार घुमाती रही। ऐसे में उनको अंतिम उम्मीद और सुप्रीम कोर्ट से ही दिखी।

अरविन्द कुमार पाल की इस याचिका में ओडिशा राज्य सरकार, वहाँ के जेल DG और जेल सुपरिंटेंडेंट क्योंझर को विपक्षी बनाया गया है। याचिका पर अगली सुनवाई 27 अगस्त 2024 को हो सकती है। दारा सिंह के परिजनों को उम्मीद है कि उन्हें न्याय मिलेगा। अरविन्द कुमार के मुताबिक ओडिशा की राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में यह बताना ही पड़ेगा कि उनके हिसाब से उम्रकैद की सजा कितने साल की है और वो भी तक जब कई नसक्ली और अन्य दुर्दांत अपराधी प्रदेश में 15 साल की सजा के बाद छोड़े जा चुके हैं।

गौरक्षकों को देख नदी में कूद गए चाँद मियाँ, गुड्डू खान और सद्दाम कुरैशी … मचाया ‘मुस्लिमों की मॉब लिंचिंग’ का प्रलाप, SIT ने बताया- न किसी ने पकड़ा, न किसी ने पीटा

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में जून माह में हुई तीन मुस्लिमों की मौत के बारे में बड़ा खुलासा हुआ है। पुलिस जाँच में सामने आया है कि इन तीनों की मौत सूखी नदी में कूद कर चोटिल होने के कारण हुई थी। इस मामले में पहले आरोप लगाया गया था कि इन तीनों की मौत मॉब लिंचिंग के कारण हुई।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले की जाँच कर रही SIT ने कोर्ट में दाखिल चार्जशीट में बताया है कि पाँच गौरक्षक इन मुस्लिमों का एक गाड़ी में पहले से इन्तजार कर रहे थे। गौरक्षकों को यह सूचना था कि यह तीनों एक ट्रक में भर कर गोवंश ले जा रहे हैं।

उन्होंने इन्हें रोक कर ट्रक की जाँच करने का प्रयास भी किया था लेकिन तीनों ने ही ट्रक रोकने की जगह उसे भगा दिया था। इसके बाद गाड़ी सवार पाँच लोगों ने उनका पीछा किया था। ट्रक में सवार लोगों ने इस दौरान 53 किलोमीटर तक भागने का प्रयास किया था।

चार्जशीट में बताया गया कि इसके बाद वह आरंग में स्थित महानदी के पुल पर ट्रक रोक कर कूद गए थे। उन्होंने नदी में यह सोच कर छलाँग लगाई थी कि इसमें पानी बह रहा है। हालाँकि, नदी उस दौरान सूखी थी और यह तीनों ही इसमें गिरने से घायल हो गए थे।

इस दुर्घटना के कारण चाँद मियाँ (23) की मौत तुरंत हो गई थी जबकि गुड्डू खान (35) की मौत अस्पताल ले जाए जाने के दौरान हुई थी। उनके साथी सद्दाम कुरैशी (18) की मौत बाद में इलाज के दौरान हो गई थी। यह तीनों उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और शामली जिलों के रहने वाले थे।

इस मामले में पहले आरोप लगाया गया था कि इन तीनों को रोक कर मारा पीटा गया। कहा गया था कि उनकी मॉब लिंचिंग हुई। अब इस मामले की चार्जशीट और पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि उन पर कभी हमला हुआ ही नहीं। तीनों की मौत इसलिए हुई क्योंकि वह डर गए और नदी में कूद गए।

गौरतलब है कि 7 जून, 2024 को चाँद, गुड्डू खान और सद्दाम छत्तीसगढ़ से एक ट्रक में मवेशी भर कर निकले थे। यह महासमुंद से रायपुर जा रहे थे। आरोप लगाया गया था कि इन्हें गौरक्षक बताने वाले युवकों ने महानदी के पुल पर रोका और पीटा जिसके बाद यह तीनों नदी में कूदे और इनकी मौत हो गई। इस मामले में मॉब लिंचिंग का आरोप लगाया गया था।

मामले की जाँच के लिए SIT का गठन किया गया था। अब उसने अपनी जाँच करके कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की है। इस मामले में तब मॉब लिंचिंग को लेकर खूब हल्ला मचाया गया था, यह आरोप अब गलत साबित हुए हैं।

‘ब्राह्मण है ज्योति मिश्रा, फिर भी SC कोटे से बन गई IFS’: जिस लड़की के UPSC चयन पर थे सवाल वह निकली पूरी फ्रॉड, दिल्ली में रहती है पर माँ-बाप से कह रखा था स्पेन में हूँ पोस्टेड

महाराष्ट्र की महिला ट्रेनी IAS पूजा खेडकर का मामला सामने आने के बाद कई नामों की चर्चा सोशल मीडिया पर शुरू हुई जिन्हें लेकर दावा किया गया कि उन्होंने गलत तरह से UPSC में प्रवेश लिया। इसी लिस्ट में एक नाम ज्योति मिश्रा का भी था। सोशल मीडिया पर ज्योति मिश्रा को लेकर सवाल उठ रहे थे कि उन्होंने जनरल कैटेगरी का होने के बावजूद अनुसूचित कैटेगरी से यूपीएससी में जगह पाई। मामले ने तूल पकड़ा तो कई रिपोर्टर इसकी पड़ताल में जुटे।

इस बीच ज्योति मिश्रा के पिता से टाइम्स ऑफ इंडिया के एक रिपोर्टर अरविंद चौहान ने संपर्क किया। पिता ने बताया उनकी बेटी स्पेन में है और टाइम बताया कि उससे कब बात हो पाएगी।

रिपोर्टर ने वॉट्सएप पर संपर्क किया तो ज्योति मिश्रा ने अपना पक्ष रखा और सारे आरोप खारिज कर दिए। साथ ही कोटे से एडमिशन लेने वाली ज्योति को कोई और कैंडिडेट बताया, वहीं अपने लिए कहा कि उसका नंबर दूसरी लिस्ट में आया था।

बातचीत से साफ था कि ज्योति अपने ऊपर लगे सारे आरोप निराधार बता रही थीं। हालाँकि पत्रकार ने अपनी पड़ताल जारी रखी। उन्होंने स्पेन के भारतीय दूतावास को इस संबंध में मेल किया और जवाब जब आया तो सब हैरान रह गए।

हकीकत में वहाँ कोई ज्योति IFS थी ही नहीं और ये ज्योति मिश्रा सिर्फ अपने परिजनों को गुमराह करने के लिए उनसे झूठ बोल रही थीं। बेटी का झूठ सामने आने के बाद परिजन हैरान हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने अपनी बेटी पर कभी दबाव नहीं बनाया था फिर पता नहीं क्यों उसने इतना बड़ा झूठ बोला।

बता दें कि ये पूरा मामला पूजा खेडकर के फ्रॉड से जुड़ी खबरें आने के बीच उजागर हुआ। जाँच में पता चला कि ज्योति ने परिवार को दो साल से गुमराह किया हुआ था। उन्होंने इस झूठ की नींव डाली थी साल 2022 में। ज्योति ने अपने परिवार को बताया था कि उनका सिलेक्शन यूपीएससी में हो गया है और 432वीं रैंक आई है।

पिता सुरेश नारायण मिश्रा चूँकि यूपी पुलिस में सब इंस्पेक्टर थे इसलिए उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं थे कि उनकी बेटी ने उनका नाम रौशन कर दिया। उन्हें नहीं पता था कि उनकी बेटी ने अपनी असफलता छिपाने के लिए ये सारा खेल खेला है।

पूजा खेडकर विवाद के बाद जब ज्योति मिश्रा के कोटे से एडमिशन लेने पर सवाल खड़े हुए थे तो टाइम्स ऑफ इंडिया का एक पत्रकार उनके पिता से बात करने पहुँचा। पिता ने गर्व से बताया कि बेटी तो स्पेन के मैदरिड में आईएफएस के पद पर है। पिता ने रिपोर्टर से बिन डरे कहा कि वो बेटी से बात कर सकते हैं।

रिपोर्टर ने ज्योति मिश्रा को संपर्क किया तो ज्योति ने जवाब देने की बजाय एक्स पर साझा एक पोस्ट शेयर कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके खिलाफ दुष्प्रचार चल रहा है। इसलिए वो साफ करना चाहती हैं कि जिस ज्योति की बात हो रही है वो एससी है और आईएएस है जबकि वो IFS हैं और उनका सिलेक्शन दूसरी लिस्ट में हुआ। इस दौरान उन्होंने अपना फर्जी पासपोर्ट, यूपीएससी से मिला लेटर, लबसना का आईडी कार्ड सब दिखाया।

ज्योति मिश्रा का वर्जन लेने के बाद ये खबर हर जगह चली कि सोशल मीडिया पर लगे रहे आरोपों पर उनका क्या कहना है। हालाँकि बाद में पत्रकार ने क्रॉस चेक करने के लिए स्पेन में भारतीय दूतावास से भी संपर्क किया। सवाल का जवाब प्रेस सूचना और संस्कृति संभालने वाले दूसरे सचिव अमन चंद्नन ने दिया। चंद्रन ने बताया कि दूतावास में ज्योति नाम का कोई अधिकारी काम ही नहीं कर रहा है। इस मेल से ये तो क्लियर हो गया कि ज्योति मिश्रा ने घर परिवार, प्रेस सबसे झूठ बोला। लेकिन अगला सवाल था कि अगर वो स्पेन में नहीं है तो कहाँ हैं।

गहराई से जाँच हुई तो सामने आया कि वो तो दिल्ली में रह रही हैं। पत्रकार ने फिर उनसे संपर्क किया और इस बार उन्होंने झूठ स्वीकार कर लिया। पता चला कि असली ज्योति जिनका रोल नंबर 843910 था उनकी रैंक यूपीएससी में 432 आई थी जबकि जो डॉक्यूमेंट ज्योति मिश्रा दिखा रही थीं वो नकली थे उसमें रोल नंबर 5904317 लिखा था।

ज्योति के माता-पिता अपनी ही बेटी से धोका पाने के बाद हक्का-बक्का हैं। उनका कहना है कि उनके पास कभी अपनी बेटी पर शक करने की कोई वजह ही नहीं थी, वो हमेशा से अकादमिक रूप से अच्छा प्रदर्शन करती थीं। वहीं ज्योति ने कहा कि वो ये स्वीकार नहीं कर पाई थीं कि उनके कुछ साथियों ने सिविल परीक्षा पास कर ली और वो नहीं कर पाईं। अपने आपको साबित करने के लिए उन्होंने ये रास्ता अपनाया। परिवार कह रहा है कि उन्हें नहीं पता बेटी ने क्यों झूठ बोला और इतने समय वो दुनिया में कहाँ रह रही थीं। अब बस वो चाहते हैं कि ज्योति घर लौट आएँ।

खुद के लिए चाहिए ‘हलाल’ सिस्टम, लेकिन काँवड़िया रूट में ‘पहचान’ सिस्टम से भी परेशानी: लिबरल थेथरई के बीच हलाल के बारे में जानिए सब कुछ

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के जिला प्रशासन में हाल ही में एक आदेश जारी किया है। इस आदेश में कहा गया है कि जिले के भीतर जिन रास्तों से कांवड़िये निकलते हैं, उन पर पड़ने वाली खान-पान की दुकानों पर दुकानदार के नाम का बोर्ड लगे। यह आदेश काँवड़ यात्रा में असुविधा ना हो, इसके लिए किया गया है। इस आदेश पर सोशल मीडिया पर लिबरल-वामपंथी समुदाय काफी उछलकूद मचाए हुए है। हालाँकि, यही गैंग तब कोई प्रश्न नहीं उठाता जब खाने-पीने के सामानों में 18% समुदाय की ‘हलाल’ को जिद बहुसंख्यकों पर थोपी जाती है।

जहाँ एक ओर इस मुद्दे पर बहस चल रही है कि किसी दुकानदार को अपना नाम दिखाना अनिवार्य किया जाए या नहीं, वहीं इस बीच यह जान लेते हैं कि देश की बहुसंख्यक आबादी पर थोपे जाने वाला हलाल प्रमाणन क्या है, यह कैसे काम करता है, इसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है और इससे मुस्लिम संगठनों को कितनी कमाई होती है।

हलाल है क्या?

हलाल और हराम दो शब्द हैं। हलाल का मतलब है जिसकी अनुमति हो और हराम का मतलब है जिसकी अनुमति ना हो। हलाल मुस्लिमों के खाने-पीने के सामान और विशेष कर मांस से सम्बन्धित है। यानी जो हलाल उत्पाद हैं, उन्हें मुस्लिम खा सकते हैं। जो उत्पाद या हराम हैं, उन्हें मुस्लिम नहीं खा सकते।

मांस का हलाल होना इस बात का प्रमाणन है कि वह उसी तरीके से काटा गया है, जैसा इस्लामी किताबों में बताया गया है। यानी मांस काटने की एक निश्चित इस्लामी विधि ही हलाल है। मांस का हलाल होना इस बात से प्रमाणित होता है कि उस पशु को किसने काटा है, कैसे काटा है, किस दिशा में काटा है और उसको काटने वाले का मजहब क्या है।

जानवर को क्यों करते हैं हलाल?

किसी जानवर को जब हलाल तरीके से काटा जाता है, तो उसके शरीर से तेजी से खून निकलता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस्लाम के भीतर किसी भी जानवर के खून के सेवन की इजाजत नहीं है। यह हराम की श्रेणी में है, यह नहीं लिया जा सकता। इसीलिए हलाल प्रक्रिया में काटे जाने वाले जानवर के शरीर से तेज गति से खून निकलना जरूरी है। जानवर के शरीर से खून निकलने के बाद वह खाने योग्य हो जाता है क्योंकि खून बह चुका है।

जानवर को कैसे करते हैं हलाल?

किसी पशु का मांस हलाल होने के लिए इस्लामी कानून (शरिया) के अनुसार, एक तेज चाकू के उपयोग की आवश्यकता होती है, जिसमें किसी तरह की जंग ना हो और उसकी धार मुड़ी ना हो। इस बात पर जोर दिया जाता है कि चाकू का ब्लेड जानवर की गर्दन से 2-4 गुना बड़ा हो।

हलाल केवल एक समझदार, वयस्क मुस्लिम व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए, जो इस्लामी रीति-रिवाजों से परिचित हो। एक गैर-मुस्लिम द्वारा जिबह किए गए जानवर हलाल नहीं कहे जाएँगे।मारे जाने वाले जानवर को काटने से पहले अच्छी तरह से खिलाया जाना चाहिए, पीने के लिए साफ पानी दिया जाना चाहिए और इसे उसके बेजान होने से पहले किया जाना चाहिए।

यूरोपीय संघ में हलाल प्रमाणन विभाग का भी कहना है कि हलाल के समय अल्लाह के नाम का आह्वान (कलमा पढ़ा जाना) किया जाना चाहिए: बिस्मिल्लाह रहमाने… अल्लाह-हू-अकबर।अलग-अलग जानवरों को अलग-अलग तरीकों से हलाल किया जाता है।

उदाहरण के लिए, एक भेड़ को क्षैतिज स्थिति में हलाल किया जाता है, जबकि जुगाली करने वालों को एक सीधी स्थिति में लिटाकर, पिछले पैर से दबाकर हलाल किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश हलाल बूचड़खाने जानवर को लिटाकर ही हलाल करते हैं। हलाल के लिए, चीरा गर्दन पर और आहार नली नीचे लगाया जाना चाहिए। श्वासनली, आहारनाल, गले की नसें और जानवर की कैरोटिड धमनियों को बिना किसी रुकावट या देरी के तेज गति में काटा जाना चाहिए।

कौन देता है हलाल का प्रमाण पत्र?

भारत में खाने पीने के सामान का प्रमाणन करने वाला FSSAI हलाल सर्टिफिकेट नहीं देता है। भारत में, कई धार्मिक निकाय हैं जो उत्पादों को तथाकथित प्रमाण पत्र जारी करते हैं, इस्लामी विश्वास के अनुसार उनकी ‘शुद्धता’ तय करते हैं। भारत में हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमीयत उलमा-ए-महाराष्ट्र (जमीयत उलमा-ए-हिंद की एक राज्य इकाई) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट जैसे कुछ संगठन कोई उत्पाद हलाल है नहीं, इसका प्रमाण पत्र जारी करते हैं।

हलाल की क्या इकॉनमी?

अब तक हमने जान लिया कि हलाल है क्या, इसकी क्या जरूरत और इसका प्रमाण पत्र कौन देता है। लेकिन अब यह प्रमाणन कोई फ्री में तो करेगा नहीं, इसके लिए पैसे लगते होंगे। जब सरकार ही किसी उत्पाद के प्रमाणन के लिए शुल्क लेती है तो ये संगठन क्यों ना ले। जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट की वेबसाइट बताती है कि वह हलाल इकोसिस्टम में आने वाली एक कम्पनी से ₹60,000 रजिस्ट्रेशन और फिर ₹1500 प्रति उत्पाद हलाल प्रमाणन के लिए लेते हैं। इसके ऊपर से GST भी लगता है।

यानी मान लीजिए आप खाने-पीने के 10 उत्पाद बनाते हैं और उसको हलाल प्रमाणन की आवश्यकता है तो आपको ₹75,000 + GST देना होगा। यह धनराशि सिर्फ तीन साल के लिए है, इसके बाद आपको दोबारा फीस देनी होगी। चूंकि, अलग-अलग कम्पनियाँ अलग स्तर पर उत्पाद बनाती हैं, इसलिए यह धनराशि बढ़ती जाती है।

यह धनराशि अंत में हमसे और आपसे वसूली जाती है। हलाल का प्रमाणन भारत के बाजार में भले किसी ने ना माँगा हो, मुस्लिम देशों में उत्पाद के लिए यह जरूरी है। हालाँकि, भारत में भी कम्पनियाँ अपने उत्पाद हलाल प्रमाणन के साथ ही बेचती हैं। यानी 18-20% आबादी की मर्जी बाकी 80% लोगों पर थोपी जाती है।

जब हलाल सही तो नाम दिखाना क्यों नहीं?

अब यह अब बात करने के बाद मूल प्रश्न पर लौटते हैं। प्रश्न है कि आखिर हलाल क्यों? तो इसका उत्तर है कि मुस्लिमों की धार्मिक मान्यता हलाल खाद्य पदार्थ खाने की है, इसलिए हलाल। यानी मुस्लिमों को अपनी पसंद का खाना और वह खाना किस तरीके से बने, यह निर्णय करने का अधिकार है।

अब हलाल मांस में एक शर्त है कि जानवर काटने वाला कसाई मुस्लिम ही हो, किसी दूसरे धर्म के आदमी ने अगर जानवर काटा तो वह हलाल नहीं होगा। यानी सीधे तौर पर बाकी लोगों को इस धंधे से बाहर करना। तो जब मुस्लिम का काटा मांस ही मुस्लिम खाएँगे, उसका प्रमाणन मुस्लिम ही देंगे फिर हिन्दुओं का अपने आराध्य की कांवड़ उठाते समय किस दुकान से सामान ले रहे हैं, यह जान जाना कोई बहस की बात कैसे? वह भी तब जब ना इससे कोई दूसरा व्यक्ति धंधे से बाहर हो रहा है, ना इस प्रकार नाम दिखने का कोई पैसा लिया जा रहा है।

‘तुम जब नॉर्थ की हो तो बेंगलुरु में काम क्यों करती हो’: कर्नाटक में ‘लोकल कोटा’ से जो आग लगाना चाहती है कॉन्ग्रेस, उसमें झुलसी महिला ने शेयर की आपबीती

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने कन्नड़ लोगों को प्राइवेट नौकरियों में 50 से 75% तक का आरक्षण देने वाला बिल भले ही IT कंपनी संगठन NASSCOM के विरोध के बाद रोक दिया हो, लेकिन इस बीच कर्नाटक सरकार के फैसले से एक नई बहस छिड़ गई है। इसका मूल यही है कि आखिर अगर ये बिल लागू हो जाता तो इसके परिणाम क्या होते और कैसे इसका असर गैर कन्नड़ लोगों पर पड़ता। इस बहस में तमाम सोशल मीडिया यूजर्स अपने तर्क दे रहे हैं और इसी बीच एक महिला की आईडी से उसका पोस्ट वायरल हुआ है जिसमें उसने बेंगलुरु में काम करने का अनुभव साझा किया है।

ये पोस्ट बताता है कि कैसे एक हिंदी भाषी राज्य से गैर हिंदी भाषी राज्य में जाने पर लोगों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिस महिला की बात हो रही है उसका यूजर नेम @shaaninani है। पोस्ट के अनुसार महिला बताती हैं कि वो बेंगलुरु में काम करती थीं और उनकी शादी पंजाब में हुई थी। नॉर्थ इंडिया के रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें 1 साल तक चूड़ा पहनना था। उन्होंने ऐसा किया भी। मगर जब वो बेंगलुरु में इसे पहनकर गईं और ऑटो में सफर किया तो वहाँ उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा।

@shaaninani ने अपने पोस्ट में बताया , “मैं बेगलुरु में डेढ़ साल से काम कर रही थी। शादी पंजाब में हुई थी तो मुझे चूड़ा एक साल तक पहनना था क्योंकि वो मेरी संस्कृति का हिस्सा था और इससे ये साफ था कि मैं नॉर्थ इंडिया से हूँ।” आगे उन्होंने बताया कि उन्हें फ्लैट से ऑफिस और ऑफिस से फ्लैट के बीच में बहुत कुछ झेलना पड़ता था। बेंगलुरु में लोकल ऑटो ड्राइवर उनसे पूछते थे, “तुम जब नॉर्थ की हो तो फिर बेंगलुरु में काम क्यों करती हो, क्या कन्नड़ सीख रही हो, क्या मौसम के अलावा कुछ और अच्छा लगता है, पैसे ज्यादा माँगते थे क्योंकि मैं नवविवाहिता थी और ऐसे दर्शाते थे जैसे वो हिंदी-अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं समझ पा रहे।”

शानी ने लिखा कि उनका स्थानीय लोगों के साथ बहुत बुरा अनुभव रहा है। इसके अलावा उन्होंने ये भी बताया कि एक बार उन्होंने पावर कट की शिकायत करने के लिए BESCOM को फोन किया, लेकिन वहाँ कॉल उठाने वाले व्यक्ति ने कॉल ये कहकर काट दिया, “नो हिंदी, नो इंगलिश, सिर्फ कन्नड़।” महिला के अनुसार, वहाँ लोगों को सिर्फ कन्नड़ भाषी लोगों की चिंता है।

इसके बाद महिला ने बताया कि उनके आसपास बहुत नकारात्मकता थी। उन्होंने कहा कि उन्हें वहाँ का मौसम भी नहीं पसंद था। हमेशा बारिश होती थी। बाहर नहीं जा सकते थे। अगर चले जाओ तो कैब नहीं मिलती थी। अगर कैब मिल गई तो कहीं जाने में घंटों लग जाते थे। महिला बताती हैं कि उन्होंने इन्हीं सब वजहों के बाद अपनी जॉब छोड़ दी थी। उन्हें घर की याद आने लगी थी। आगे महिला ने ये भी लिखा कि गुड़गाँव आने के बाद उनके एनर्जी लेवल में बहुत बदलाव आया। अब वो लंबी लंबी वॉक पर जाती हैं, अच्छा खाना खाती है, जहाँ मन हो घूमती हैं। कोई ऑटोड्राइवर उनसे बेतुके सवाल नहीं करता है।

नोट- ये खबर सोशल मीडिया पर वायरल होते @shaaninani के पोस्ट पर आधारित है।

6 साल की बेटी के साथ बस से जा रही थी महिला, मुहम्मद कुन्ही दिखाने लगा गुप्तांग: फोटो वायरल होने के बाद पुलिस ने किया गिरफ्तार, केरल का मामला

केरल के कासरगोड में बस में सवार एक महिला और उसकी बेटी के सामने एक आदमी ने अपना गुप्तांग लहराया। महिला ने अश्लीलता करने वाले इस युवक फोटो खींच लिया और पुलिस को बता दिया। पुलिस ने युवक की तलाश करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार (15 जुलाई, 2024) को एक महिला अपनी 6 वर्षीय बेटी के साथ कासरगोड के कान्हनगाड़ से बेकाल जा रही थी। महिला के साथ बस में अधिक यात्री नहीं थे। इसी दौरान महिला के बराबर वाली सीट पर एक व्यक्ति बैठा हुआ था।

इस व्यक्ति ने कुछ देर के बाद अश्लीलता चालू कर दी। उसने अपना गुप्तांग लहराना चालू कर दिया। उसने महिला और उसकी बेटी को अपना गुप्तांग दिखाया। महिला ने उसकी हरकत को इसके बाद कैमरे में रिकॉर्ड करना चालू कर दिया और फोटो-वीडियो ले ली।

महिला ने इसके बाद यह सूचना बस के कंडक्टर को दी लेकिन तब तक वह बस से उतर गया था। इसके बाद महिला ने बेकाल पुलिस थाने में व्यक्ति के विरुद्ध मामला दर्ज करवाया और उसकी फोटो वीडियो भी दी। इसके बाद पुलिस ने उसकी तलाश चालू कर दी।

पुलिस ने इस व्यक्ति को बुधवार (17 जुलाई, 2024) को गिरफ्तार कर लिया। महिला को गुप्तांग दिखाने वाले मुहम्मद कुन्ही है। उसकी उम्र 51 वर्ष है। पुलिस अब इस मामले में जाँच कर रही है। पुलिस जाँच करने के बाद आगे की कार्रवाई करेगी।

इससे पहले अगस्त 2023 में भी कासरगोड में 51 साल के एक आदमी ने एक लड़की को गुप्तांग दिखाया था। उसने यह हरकत चलती ट्रेन में की थी। उसका नाम जॉर्ज जोसफ था। उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। उसने इससे पहले भागने की गिरफ्तार किया था। यह घटना कोयंबटूर-मंगलुरु इंटरसिटी एक्सप्रेस में उस समय हुई, जब ट्रेन 31 जुलाई, 2024 को कन्नूर जिले से गुजर रही थी। इस मामले में IPC के सेक्शन 119a के तहत मामला दर्ज किया गया था।

मुहर्रम जुलूस में बजेगा ढोल, जो मुस्लिम नहीं देख सकते वे घर बैठें: मद्रास हाई कोर्ट ने ‘तौहीद जमात’ के कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने पर प्रशासन को भी फटकारा

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के इरवाडी शहर में ढोल, संगीत और कुथिराई पंचा (रथ यात्रा) के साथ मुहर्रम समारोह आयोजित करने की इजाजत दी। कोर्ट ने इस दौरान उन मुस्लिमों को घर में रहने की सलाह दी जिन्होंने इस तरह के आयोजन से आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों को कट्टरपंथी ताकतों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि मजहबी जुलूस निकालने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(बी) और (डी) के तहत संरक्षित है और कट्टरपंथी तौहीद जमात को यह बताने की हक नहीं है कि अन्य समुदाय के लोगों को त्योहार कैसे मनाना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी के मौलिक अधिकार खतरे में हों तो प्रशासन का कर्तव्य है कि वो उन अधिकारों को बनाए रखने का प्रयास करें। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा,

“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिला प्रशासन ने कट्टरपंथी तत्वों द्वारा दी गई धमकियों के आगे घुटने टेक दिए। अगर किसी के मौलिक अधिकार खतरे में हैं तो प्रशासन का कर्तव्य है कि वह अधिकारों को बनाए रखे और अधिकारों के प्रयोग में बाधा डालने वालों को दबाए। मौलिक अधिकारों को कट्टरपंथी ताकतों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अगर जिला प्रशासन कानून और व्यवस्था के मुद्दों का हवाला देकर अधिकारों के प्रयोग को प्रतिबंधित करने का आसान और आलसी विकल्प अपनाता है, तो यह उनकी नपुंसकता को दर्शाता है।”

इसके साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि जैसे जगह के साथ भाषा बदलती है वैसे रीति-रिवाज में बदलाव होता है। अगर इरवाडी के लोग संगीत, ढोल की थाप और रथ जुलूस में विश्वास करते हैं तो उनसे सऊदी अरब के व्यवहार के अनुरूप होने की उम्मीद करना तालिबानी दृष्टिकोण से कम नहीं हैं। कोर्ट ने इस दौरान कट्टरपंथी संगठन ‘तौहीद-ए-जमात’ को भी फटकार लगाई। कोर्ट ने उन्हें कहा कि अगर इस समूह का ये मानना है कि ऐसे कार्यक्रम उनकी मान्यता के मुताबिक नहीं है तो वो इसमें शामिल न हों और अपने घर में रहें, लेकिन किसी और को ऐसा करने से न रोकें।

उल्लेखनीय है कि मुहर्रम जुलूस को लेकर कुछ समय पहले मद्रास हाईकोर्ट में ये याचिका गई थी जहाँ तौहीद जमात ने इस बात का विरोध किया था कि मुहर्रम ढोल के साथ नहीं मनाया जाना चाहिए। वहीं थमीम सिंधा मदार नामक व्यक्ति ने बताया था कि एरवाडी शहर में मुस्लिम श्रद्धालुओं का एक वर्ग परंपरागत रूप से वर्षों से ढोल और संगीत के साथ मुहर्रम जुलूस निकालता रहा है, जिसे संथानाकुडु जुलूस और कुथिराई पंच के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस वर्ष उन्हें मुस्लिम श्रद्धालुओं के एक अन्य वर्ग के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इसी याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और कट्टरपंथी समूह को फटकार लगाई।

मुहर्रम जुलूस में हुआ विवाद तो हिंदू नाबालिग को जलती भट्ठी में झोंका, भाई को भी जलाने का प्रयास: छत्तीसगढ़ के कोरबा का मामला, जाँच में जुटी पुलिस

छत्तीसगढ़ के कोरबा में मुहर्रम के मौके पर ताजिया जुलूस के दौरान एक हिन्दू नाबालिग को जलती आग में झोंक दिया गया। नाबालिग के भाई को भी आग में फेंकने का प्रयास किया गया। दोनों लड़कों का दूसरे पक्ष के लड़कों से किसी बात को लेकर विवाद हुआ था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोरबा के करतला थाना क्षेत्र नोनबिर्रा गाँव में यह घटना हुई। बताया गया कि यहाँ मुहर्रम ताजिया जुलूस निकाले जाने के दौरान दो किशोर अपनी दुकान पर बैठे हुए थे। इसी दौरान यहाँ कुछ युवक आए और उनसे विवाद करने लगे।

हमला करने वाले युवकों की तादाद अधिक थी। उन्होंने दोनों किशोर से विवाद करने के बाद उन्होंने पास में जल रही आग में फेंक दिया। सूचना के अनुसार एक किशोर तो आग में झुलसने से बच गया लेकिन दूसरा किशोर गंभीर रूप से घायल हो गया।

आग से झुलसे किशोर को इसके बाद उसके परिजन अस्पताल में इलाज के लिए ले गए। यहाँ उसका इलाज अभी जारी है। मामले में इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। इस घटना को लेकर शिकायत दर्ज करवा दी गई है। आग में झुलसे किशोर और उन पर हमला करने वालों के बीच कोई पुराना विवाद बताया जा रहा है।

मामले में FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने इस मामले में बताया कि आग में झुलसे किशोर के परिजनों द्वारा FIR दर्ज करवाई गई है, अभी इस मामले में जाँच जारी है। पुलिस ने कहा है कि वह घटना में शामिल लोगों से पूछताछ कर रहे हैं। अभी तक घटना में शामिल आठ नाबालिगों को हिरासत में लिया गया है।

गौरतलब है कि मुहर्रम जुलूस के दौरान हिंसा की खबरें देश के अलग-अलग हिस्सों से आई हैं। बिहार के मोतिहारी में इसको लेकर बड़ा बवाल हुआ है तो वहीं कानपुर में भी लाठी डंडे चलने की सूचना है। इसके अलावा प्रयागराज में भी मुहर्रम जुलूस के दौरान मारपीट की खबर है।

ST वर्ग के लिए था जो पैसा, उससे कॉन्ग्रेस के मंत्री ने खरीदी शराब और लक्जरी कारें: वाल्मीकि निगम घोटाले में ED ने पत्नी से भी की पूछताछ

कर्नाटक के वाल्मीकि कॉरपोरेशन घोटाले के पैसों का इस्तेमाल शराब खरीदने और लोकसभा चुनाव के दौरान गाड़ियों की खरीद में किया गया था। ईडी ने बुधवार (17 जुलाई 2024) को इसका खुलासा किया। ईडी ने इस मामले में कॉन्ग्रेस विधायक और राज्य के पूर्व कैबिनेट मंत्री बी नागेंद्र को गिरफ्तार किया है। नागेंद्र 18 जुलाई तक ईडी की हिरासत में हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी ने बताया है कि विधायक बी नागेंद्र से जुड़े लोग “फंड डायवर्जन और कैश मैनेजमेंट” में शामिल हैं। एजेंसी ने दावा किया कि “आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 18 फर्जी खातों में (वाल्मीकि निगम के फंड से) करीब 90 करोड़ रुपए भेजे गए थे। फिर डायवर्ट किए गए फंड को फर्जी और फर्जी खातों के जरिए बाँट दिया गया। इन पैसों का इस्तेमाल लोकसभा चुनाव के दौरान भारी मात्रा में शराब खरीदने और गाड़ियों को खरीदने में किया गया।

इस बीच, ईडी अधिकारी पूर्व मंत्री बी नागेंद्र की पत्नी मंजुला को शहर के डॉलर्स कॉलोनी स्थित आवास से बेंगलुरु के शांतिनगर स्थित ईडी दफ्तर ले गए। वहाँ मंजुला से काफी देर तक पूछताछ की। बता दें कि बी नागेंद्र की हिरासत अवधि गुरुवार (18 जुलाई 2024) को समाप्त हो रही है, जिसके बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा। ईडी बी नागेंद्र की हिरासत बढ़ाने की माँग करेगी।

बता दें कि ईडी ने बीते गुरुवार (12 जुलाई 2024) को कर्नाटक के कॉन्ग्रेस विधायक बी नागेंद्र को गिरफ्तार किया था। उनके घर पर 2 दिनों की छापेमारी के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। नागेंद्र को कर्नाटक के वाल्मीकि निगम में करोड़ों के अवैध ट्रांसफर घोटाला मामले में गिरफ्तार किया गया है।

बी नागेन्द्र ने जून माह में सिद्दारमैया सरकार से मंत्रिपद से इस्तीफ़ा दे दिया था। वह सिद्दारमैया सरकार में अनुसूचित जनजातीय कल्याण मंत्री थे। उन्होंने यह इस्तीफ़ा कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति कल्याण विकास निगम (KMVSTDC) में करोड़ों की गड़बड़ी में नाम सामने आने के बाद दिया था।

बी नागेन्द्र जी जिस महर्षि वाल्मीकि फंड घोटाले में गिरफ्तार किए गए हैं, उसकी जाँच CBI, ED और राज्य सरकार की SIT कर रही है। यह पूरा मामला लगभग ₹95 करोड़ सरकारी धन के दुरुपयोग और उसके अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किए जाने से जुड़ा हुआ है।

क्या है पूरा घोटाला?

कर्नाटक सरकार KMVSTDC प्रदेश की जनजातीय जनता के कल्याण के लिए चलाती है। इसके अंतर्गत जनजातीय जनसंख्या के लिए रोजगार समेत विशेष योजनाएँ लाई जाती हैं। कर्नाटक सरकार इसके लिए अलग से बजट देती है। इसी महर्षि वाल्मीकि फंड में घोटाले की बात सामने आई है।

यह पूरा मामला एक आत्महत्या से चालू हुआ था। मई, 2024 में इसी निगम से जुड़े एक 48 वर्षीय कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी मौत के बाद एक सुसाइड नोट मिला था। इसमें उसने आरोप लगाया था कि उसके उच्चाधिकारियों ने उस पर इस बात के लिए दबाव बनाया था कि वह निगम के खातों से पैसा ट्रांसफर करे।

उसने आरोप लगाया था कि यह काम निगम का पैसा हड़पने के लिए किया गया था। उसका आरोप था कि यह काम एक मंत्री के मौखिक आदेशों के आधार पर किया गया था। उसने अपने विभाग के अलावा यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के कर्मचारियों पर भी आरोप लगाए थे। इसके बाद पूरे प्रदेश में हंगामा मच गया था।

आत्महत्या करने वाले कर्मचारी चंद्रशेखर ने सुसाइड नोट में बताया था कि उसे उच्चाधिकारियों ने इस बात के लिए निर्देशित किया था कि वह निगम के एक खाते से दूसरे खाते में पैसा ट्रांसफर करने के लिए पत्र लिखे। यह पैसा यूनियन बैंक के वसंत नगर ब्रांच से एमजी रोड ब्रांच में डाला जाना था।

इसी के तहत वाल्मीकि निगम के खातों से निकाला गया पैसा इसके बाद अन्य खातों में भेज दिया गया। इस पूरे खेल में ₹187 करोड़ का लेनदेन हुआ। इसमें से लगभग ₹88 करोड़ अवैध खातों में भेजा गया। जब यह मामला खुला तो चंद्रशेखर डर गया और उसने आत्महत्या कर ली।