Home Blog Page 855

नहीं रहे रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा कराने वाले पंडित लक्ष्मीकांत दीक्षित: सांगवेद महाविद्यालय में थे वरिष्ठ आचार्य, कई रियासतों का करा चुके थे राज्याभिषेक

अयोध्या स्थित राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कराने वाले वाराणसी के पुजारी लक्ष्मीकांत दीक्षित का निधन हो गया है। वो राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के मुख्य पुजारी थे और उन्होंने 121 वैदिक ब्राह्मणों का नेतृत्व किया था। उनके बेटे और परिवार के अन्य सदस्य भी इस पूजन का हिस्सा थे। दिसंबर 2021 में जब काशी में बाबा विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन हुआ, उसमें भी वो शामिल हुए थे। शनिवार (22 जून, 2024) की सुबह उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और उनका निधन हो गया।

भारतीय सनातन परंपरा के प्रचार-प्रसार में ही वो आजीवन लगे रहे। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ग्वालियर और राजस्थान समेत कई राजघरानों में राज्याभिषेक की प्रक्रिया को उनके द्वारा पूरा कराया जा चुका है। छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक में उनके पूर्वजों का योगदान था। उन्होंने अयोध्या प्राण प्रतिष्ठा के दौरान ये कामना की थी कि राष्ट्र हमेशा उन्नति करता रहे, उस पर प्रभु श्रीराम का आशीर्वाद बना रहे। लोकसभा चुनाव 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावक और राम मंदिर उद्घाटन का समय तय करने वाले गणेश्वर शास्त्री द्रविड़ ने इसे सनातन के लिए अपूरणीय क्षति करार दिया है।

लक्ष्मीकांत दीक्षित ने मंगलागौरी स्थित अपने आवास पर सुबह के 7 बजे अंतिम साँस ली। बीते कुछ दिनों से वो अस्वस्थ चल रहे थे। 1942 में मुरादाबाद में जन्मे पंडित लक्ष्मीकांत दीक्षित बाल्यावस्था में ही शुक्लयजुर्वेद शाखा और घनान्त अध्ययन के लिए काशी आए थे। 82 वर्ष की उम्र में उनके निधन के बाद मणिकर्णिका घाट पर उनके पुत्र जयराम दीक्षित ने उन्हें मुखाग्नि दी। उन्होंने बाल्यकाल में ही आजीवन काशी में रहने का निश्चय ले लिया था।

लक्ष्मीकांत दीक्षित का परिवार मूल रूप से महाराष्ट्र के शोलापुर के जेऊर का है। वो वाराणसी के मीरघाट स्थित सांगवेद महाविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य भी थे। काशी नरेश के सहयोग से इसकी स्थापना हुई थी। उनके पूर्वज गागा भट्ट ने छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक कराया था। चाचा गणेश दीक्षित ने उन्होंने पूजा पद्धति की शिक्षा ली थी। वो यजुर्वेद के बड़े विद्वान थे। नागपुर सहित कई रियासतों में भी उनके पूर्वजों ने कई अनुष्ठान संपन्न कराए थे।

‘कट्टरपंथी रच रहे हत्या की साजिश, बताते हैं काफिर’: ज्ञानवापी में सर्वे का आदेश देने वाले जज के लिए NIA ने माँगी सुरक्षा, घर के पास से धराया था PFI एजेंट

वाराणसी स्थित ज्ञानवापी ढाँचे के सर्वे का आदेश देने वाले जज को धमकी मिल रही है, जिसके बाद NIA ने उसके लिए सुरक्षा की माँग की है। न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने 2022 में ज्ञानवापी के ढाँचे की मूल प्रकृति का पता लगाने के ASI द्वारा इसके वैज्ञानिक सर्वे की अनुमति दी थी। मुस्लिम इसे मस्जिद बताते हैं, जबकि मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने यहाँ मंदिर ध्वस्त कर उसके ऊपर मस्जिद खड़ी कर दी थी। इसके भीतर कलश और त्रिशूल से लेकर कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी मिली हैं।

NIA कोर्ट के स्पेशल जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि जज रवि कुमार दिवाकर की सुरक्षा अपर्याप्त है और इसे बढ़ाने की ज़रूरत है। 3 सप्ताह पहले भी अदनान खान नामक शख्स ने उन्हें धमकी दी है, जिसे लेकर FIR भी दर्ज की जा चुकी है। NIA ने कहा है कि इस्लामी कट्टरपंथी उनकी हत्या की साजिश रच रहे हैं। इसे एक बेहद संवेदनशील मामला बताते हुए कहा गया है कि अगर अदनान की गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई गई तो कोई बड़ी घटना हो सकती है।

रवि कुमार दिवाकर बरेली में एडिशनल सेशन जज हैं। वो उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भी जून 2022 में पत्र लिख कर निवेदन किया था कि उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए। 13 मई, 2022 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें सुरक्षा देने को कहा था, लेकिन इसे अब अपर्याप्त बताया जा रहा है। दिवाकर ने कहा था कि इस्लामी कट्टरपंथी अल्पसंख्यक समाज का ब्रेनवॉश कराने में लगे हैं और उन्हें ‘काफिर’ बताते हैं। वर्तमान में उन्हें 2 पुलिसकर्मी मिले हुए हैं, लेकिन आतंकी हमलों से निपटने के लिए उनके पास उचित हथियार तक नहीं हैं।

उत्तर प्रदेश ATS ने 3 जून, 2024 को अदनान खान के खिलाफ FIR भी दर्ज की थी। वो जस्टिस रवि कुमार दिवाकर को धमकाने के लिए इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करता है। जून 2022 में उन्हें ‘इस्लामिक आगाज़ मूवमेंट’ की तरफ से धमकी भरा पत्र भेजा गया था। इसके उनके परिवार की हत्या की धमकी के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी निशाना बनाया गया था। अप्रैल 2024 में दिवाकर ने बरेली के SSP को भी पत्र लिख कर कहा था कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय नंबरों से फोन कॉल आ रहे हैं। लखनऊ स्थित उनके आवास से PFI के एक एजेंट की गिरफ़्तारी भी हुई थी।

डॉक्टर फारुकी ने लिंग काट मुजाहिद को बना दिया लड़की, कई महीनों से ‘गलत काम’ का आरोप ओमप्रकाश पर: एक्शन में UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जहाँ एक शख्स सोया तो वो लड़की था लेकिन नींद खुली तक तक वो लड़की बन चुका था। उस व्यक्ति का आरोप है कि उसे बहला-फुसला कर जबरन उसका गुप्तांग कटवा दिया गया। डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर के उसका लिंग-परिवर्तन कर दिया है। पीड़ित का नाम मुजाहिद है, जिसके समर्थन में ‘भारतीय किसान यूनियन’ के कार्यकर्ताओं ने बुधवार (19 जून, 2024) को धरना प्रदर्शन किया और कार्रवाई की माँग की।

वहीं आरोपित का नाम ओमप्रकाश है। मुजाहिद का कहना है कि कई महीनों से वो उसके साथ गलत काम कर रहा था। प्रदर्शनकारियों की माँग है कि लिंग-परिवर्तन की सर्जरी करने वाले डॉक्टर और ओमप्रकाश के खिलाफ कार्रवाई की जाए। वहीं मुजाहिद का एक नया वीडियो भी इस प्रकरण में सामने आया है, जिसमें वो लिंग-परिवर्तन कराने के लिए खुद को ही जिम्मेदार बता रहा है। मामला बेगराजपुर मेडिकल कॉलेज का है। मुजाहिद का कहना है कि ओमप्रकाश ने उसे बहला-फुसला कर अस्पताल में भर्ती करवाया, फिर डॉक्टरों से मिलीभगत कर उसका सेक्स चेंज करवा दिया।

मुजाहिद के इन आरोपों के बाद मेडिकल कॉलेज ने भी वीडियो जारी कर के सफाई दिया। इस वीडियो में मुजाहिद कहता दिख रहा है कि वो अपने जेंडर चेंज करवाना चाहता है और इसके लिए जो भी कॉम्प्लीकेशंस हैं उनके बारे में उसे बता दिया गया है। इसमें वो ये भी कह रहा है कि उसे पता है कि इस ऑपरेशन के बाद वो पहले जैसा नहीं रह जाएगा। वो बता रहा कि न वो मानसिक रूप से बीमार है न उसे कोई तनाव है। उसने ये भी कहा कि वो बिना किसी दबाव के ये ऑपरेशन करवा रहा है।

ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर का नाम रज़ा फारुकी है। वीडियो में मुजाहिद ये भी कहता दिख रहा है कि वो बिना किसी दबाव के अपना ऑपरेशन करा रहा है, इस दौरान कोई भी घटना होती है तो अस्पताल, डॉक्टर, नर्स, या कोई भी जिम्मेदार नहीं होगा। वह कह रहा है कि इसके लिए वो खुद जिम्मेदार होगा। मेडिकल कॉलेज की CMS कीर्ति गोस्वामी ने कहा कि एक-दो महीने से मुजाहिद प्लास्टिक सर्जरी के डॉक्टर को दिखाने आ रहा था। उसने सभी तरह की जाँच कराई, फिर खुद की ही जिम्मेदारी से लिंग-परिवर्तन कराया।

नालंदा विश्वविद्यालय को ब्राह्मणों ने ही जलाया था, 11वीं सदी का शिलालेख है साक्ष्य!!

ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां, वीर्य लाभो भवत्यपि, सुरत्वं मानवो याति, चान्ते याति परां गतिम्।

यानी ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य का लाभ होता है, ब्रह्मचर्य की रक्षा करने वाले को दिव्यता प्राप्त होती है। साधना पूरी होने पर परमगति मिलती है…

पर ​कई उदाहरण हैं कि ब्राह्मण वीर्यवान, ब्रह्मचारी, चरित्रवान ही हो इसकी गारंटी नहीं है! बख्तियारपुर की खुदाई में मिले 11वीं सदी के एक शिलालेख से भी यह प्रमाणित होता है। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि नालंदा विश्वविद्यालय को ब्राह्मणों ने ही जलाया था।

इससे यह भी पता चलता है कि ब्राह्मण जो अपना वीर्य इधर-उधर छींटते रहते हैं, उससे जो वर्ण संकर यानी दोगले पैदा होते हैं, उन्होंने सनातन को भीषण क्षति पहुँचाई है।

शिलालेख में जो कुछ उद्धृत है उससे पहले यह जान लीजिए कि वीर्य होता क्या है?

वीर्य यानी सीमेन एक तरल पदार्थ है। यह शरीर की दो मुख्य ग्रंथियों के स्त्राव से बनता है। अंडकोषों में शुक्राणु बनते हैं। ये पुरुष ग्रंथियों के स्त्राव से मिलकर वीर्य की रचना करते हैं। सुश्रुत में लिखा है कि जो भोजन हम करते हैं, उससे रस तैयार होता है। इस रस से खून, खून से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से वीर्य का निर्माण होता है। इसमें स्पर्म (शुक्राणु), फ्रुक्टोज और अन्य एंजाइम होते हैं, जो शुक्राणु को सफल निषेचन हेतु जीवित रहने में मदद करते हैं। सीमेन में स्पर्म तैरते हैं। एक बार स्त्री योनि में डिस्चार्ज होने के बाद स्पर्म निषेचन के लिए एग से मिलने को दौड़ लगा देते हैं। स्पर्म के एग से मिलने के बाद भ्रूण का निर्माण होता है और महिला गर्भवती होती है।

फिर सामान्यत: नौ महीने बाद जायज और बहुत सारे केसों में नाजायज पैदा होते हैं।

अब शिलालेख पर लौटते हैं। इसके अनुसार मधुबनी जिले के एक गाँव में राघव चेतन नाम का ब्राह्मण रहता था। उसको बौद्धों ने देश निकाला दे दिया। वह भटकते-भटकते अफगानिस्तान के गार्मसीर चला गया। वहाँ की पहाड़ियों में वह प्यास से बेसुध होकर गिर पड़ा। तभी भेड़-बकरी चराती एक बुर्के वाली उधर से गुजरी। उसने राघव चेतन को पानी पिलाया। फिर पहाड़ियों के बीच ही वीर्य ने जोर मारा, फलस्वरुप वह गर्भवती हो गई। नौ महीने बाद बख्तियार खिलजी नाम का एक वर्ण संकर पैदा हुआ। वर्ण संकर मतलब दोगला। दोगला बहुत खतरनाक प्रजाति होती है।

जब यह दोगला बड़ा हुआ तो अपने ‘बाप’ के अपमान का बदला लेने के लिए नालंदा की तरफ आया और उसके बाद जो कुछ हुआ वह तो कई इतिहासकार आपको बता ही चुके हैं। अपने ‘बाप’ के वीर्य के सम्मान में खिलजी ने बख्तियारपुर नाम के एक नगर की भी स्थापना की।

इस शिलालेख से स्पष्ट है कि यदि एक ब्राह्मण ने अपना वीर्य गर्मासीर की पहाड़ियों में नहीं छींटा होता तो नालंदा नहीं जलता। इसलिए नालंदा विश्वविद्यालय के जलने का कोई दोषी है तो वह ब्राह्मण ही है।

अपना वीर्य इधर-उधर छींटने वाला राघव चेतन इकलौता ब्राह्मण नहीं था। ऐसे ब्राह्मण दुनियाभर में गए। कोई उज्बेकिस्तान गया तो कोई इंग्लैंड। फिर जितने भी दोगले पैदा हुए वो अपने बाप के अपमान का बदला लेने भारत आए। असल में भारत को जो गुलामी का समय देखना पड़ा उसके दोषी भी ब्राह्मण ही हैं।

पर ब्राह्मणों को देखिए। देश ने इतना भोगा। उसके टुकड़े हुई। वह फिर भी नहीं सुधरे। इधर-उधर वीर्य छींटते रहे। अब उनकी वही दोगली औलादें उनको क्रेडिट दिलाने के लिए लड़ रही हैं। वे नहीं चाहतीं कि उनके बाप का क्रेडिट कोई बख्तियार खिलजी ले जाए। इनलोगों के सम्मान में आप भी कहिए कि नालंदा विश्वविद्यालय को ब्राह्मणों ने ही जलाया था।

जिन ब्राह्मणों को इस ट्रेंड से दुख हो रहा है उनके लिए सीख है कि भले ही हस्तमैथुन कर लो पर अपना वीर्य इधर-उधर छींटना बंद करो। वीर्य भी तुम इतना छींट लेते हो कि यह हिसाब नहीं रहता कि किस-किस घर में दोगले पैदा करके रखे हो।

वैसे भी ‘मरणं बिन्दुपातेण जीवन बिंदु धारयेत’, वीर्य का पतन मृत्यु की ओर ले जाता है। तुम्हारी दोगली पैदाइश तुमको रोज मृत्यु की ओर ही तो धकेल रहीं हैं। इसलिए अब भी चेत जाओ।

नोट: यह मधुबनी जिले के नबटोली ग्राम के एक मैथिल ब्राह्मण का पहला रिसर्च पेपर है। इसे उन्होंने अपने वातानुकूलित कमरे में बैठकर लिखा है। शिलालेख का अध्ययन से लेकर गर्मासीर की पहाड़ियों तक में हुए संभोग को उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा है। यह भी सनद रहे कि इतिहासकार अजीत झा का इतिहास के अध्ययन-अध्यापन से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। इस लब्धप्रतिष्ठित इतिहासकार के शोध पर प्रश्न उठाने वाले दोगले माने जाएँगे। माना जाएगा कि किसी ब्राह्मण ने अपना वीर्य इधर-उधर छींटा था।

10 साल जेल, ₹1 करोड़ जुर्माना, संपत्ति भी जब्त… पेपर लीक के खिलाफ आ गया मोदी सरकार का सख्त कानून, NEET-NET परीक्षाओं में गड़बड़ी से उठ रहे थे सवाल

हाल ही में NEET और NET की परीक्षाओं में पेपर लीक का मामला सामने आया। जहाँ मेडिकल वाला मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, वहीं फजीहत के बाद NET की परीक्षा ही रद्द करनी पड़ी। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानून लेकर आई है। शुक्रवार (21 जून, 2024) को मोदी सरकार ने ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) कानून, 2024 को अधिसूचित कर दिया। पूरे देश में होने वाले प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी पर इससे नकेल कसी जाएगी।

NEET और UGC NET की परीक्षाओं में गड़बड़ी के बीच ‘Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act, 2024’ के अस्तित्व में आने से उन छात्रों को राहत मिलेगी, जो पेपर लीक की समस्या से जूझ रहे थे। फरवरी 2024 में ही इसे संसद में पारित करा लिया गया था। इसमें चीटिंग में संलिप्त आरोपितों के लिए 3 से से 5 साल तक की कारावास की सजा का प्रावधान किया है। वहीं संगठित रूप से चीटिंग गिरोह चलाने वालों को 10 साल तक की सज़ा दी जा सकती है।

वहीं उनके लिए साथ-साथ 1 करोड़ रुपए तक के जुर्माने की सज़ा भी मुक़र्रर की गई है। परीक्षा संपन्न कराने के लिए जिम्मेदार अधिकारी, कोई गिरोह या फिर कोई भी समूह या संस्था इस अपराध में शामिल होता है तो उन्हें कम से कम 5 साल की सज़ा भुगतनी होगी, जो 10 साल तक बढ़ाई जा सकती है। अगर कोई संस्था इसमें शामिल होती है तो उसकी संपत्ति भी जब्त की जाएगी। परीक्षा आयोजित करने में जो खर्च आता है, उसकी वसूली भी पेपर लीक गिरोह से ही की जाएगी। केंद्र सरकार किसी केंद्रीय जाँच एजेंसी को भी ऐसी स्थिति में जाँच सौंप सकती है।

हालाँकि, परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों को कड़ी सज़ा से छूट दी गई है और उन्हें मौजूदा कानूनों के तहत ही परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के नियमों के हिसाब से सज़ा मिलेगी। ‘Unfair Means’ में पेपर लीक के अलावा परीक्षा के दौरान सवालों के जवाब को लेकर अभ्यर्थियों की मदद करना, कम्प्यूटर नेटवर्क के साथ गड़बड़ी करना, किसी अभ्यर्थी के बदले परीक्षा में पहुँचना, फर्जी दस्तावेज बनाना, फर्जी परीक्षा आयोजित करना और मेरिट लिस्ट के साथ छेड़छाड़ को भी रखा गया है। ये गैर-जमानती होगा। DSP या ACP रैंक के अधिकारी इसकी जाँच करेंगे।

‘वो सदमे में है, उसे थोड़ा समय दीजिए’: जिसने पोर्शे कार से रौंद कर युवक-युवती को मार डाला, उसे लेकर बोला बॉम्बे हाईकोर्ट; परिवार का आरोप – लोगों के दबाव में रखा हिरासत में

महाराष्ट्र के पुणे में एक किशोर ने शराब पीने के बाद पोर्शे कार चलाते हुए 2 इंजीनियरों को कुचल दिया था। इस घटना में एक युवक और एक युवती की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद कुछ ही घंटों के भीतर उसे लेख लिखने की शर्त पर जमानत मिल गई थी, जिसका खासा विरोध हुआ था। उसके मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट तक बदल दी गई थी, जिसमें डॉक्टरों को निलंबित भी किया गया। उसके पिता को गिरफ्तार किया गया, आपराधिक इतिहास वाले दादा से पूछताछ हुई।

अब बॉम्बे हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है। अब बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा है कि 2 लोगों ने अपनी ज़िंदगी खोई है, ये दुःख की बात है लेकिन आरोपित किशोर भी सदमे में है। हाईकोर्ट ने कहा कि उक्त किशोर को भी समय देने की आवश्यकता है। जस्टिस भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये कहा। इस याचिका में उक्त किशोर को अवैध रूप से हिरासत में रखे जाने और लोगों के दबाव में ऐसे किए जाने का आरोप लगाया गया था।

बता दें कि इस घटना में मध्य प्रदेश के अनीश अवधिया और अश्विनी कोस्टा की मौत हो गई थी। लड़के की चाची ने अब हाईकोर्ट में हेबस कॉर्पस केस दायर किया है। उन्होंने लड़के को हिरासत में न रखे जाने की माँग की थी, हालाँकि हाईकोर्ट ने इस पर त्वरित राहत देने से इनकार कर दिया था। अधिवक्ता आबाद पोंडा ने परिवार की तरफ से पैरवी करते हुए कहा कि सार्वजनिक दबाव में की जा रही कार्रवाई सवालों के घेरे में है। साथ ही जमानत पर बाहर एक लड़के को ऑब्जर्वेशन होम में रखे जाने पर भी उन्होंने आपत्ति जताई।

उन्होंने इसे जुवेनाइल एक्ट का उल्लंघन बताया। कोर्ट ने भी पुलिस से पूछा था कि बेल के बावजूद किशोर को ऑब्जर्वेशन होम में क्यों रखा गया है। बता दें कि 19 मई को JJB (जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट) ने ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर 300 शब्दों का लेख लिखने की शर्त पर किशोर को जमानत दे दी थी। पोंडा ने कहा कि एक नागरिक की स्वतंत्रता का हनन किया गया है। बता दें कि आरोपित किशोर एक अमीर बिल्डर का बेटा है, परिवार रसूखदार है।

रोहित बनकर शाहरुख ने हिंदू लड़की से दोस्ती की, धमकी देकर मुस्लिम बनने का डालने लगा दबाव: मध्य प्रदेश पुलिस ने साथी जुनैद सहित आरोपित को दबोचा

मध्य प्रदेश के धार जिले से लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। जिले के सादलपुर में एक मुस्लिम युवक ने अपनी पहचान छुपाकर हिंदू युवती से दोस्‍ती की। बात आगे बढ़ी तो उसने युवती पर निकाह के लिए धर्मांतरण करके इस्‍लाम अपनाने का दबाव बनाया। बाद में युवती ने थाने में शिकायत दर्ज कराई और उसके आधार पर FIR दर्ज करके पुलिस आरोपित और उसके दोस्त को गिरफ्तार कर लिया है।

सादलपुर की रहने वाली एक हिंदू युवती से चौकी सवेरा निवासी शाहरुख ने रोहित बनकर दोस्ती की। शाहरुख ने युवती को अपने झाँसे में ले लिया। युवती को जब पता चला कि रोहित का असली नाम शाहरुख है और वह मुस्लिम है तो उसने आरोपित से दूरी बनानी शुरू कर दी। इसके बाद शाहरुख उसे धमकाने लगा।

शाहरुख ने युवती की कई तस्वीरें खींच रखी थी। उसने उन तस्वीरों को एडिट करके उसे सोशल मीडिया पर डालने की धमकी दी। वह युवती पर उससे बात करने और मिलने का लगातार दबाव बनाता रहा। इतना ही नहीं, वह युवती से जबरन निकाह करने के लिए भी उसे धमकाने लगा। वह युवती से कहता था कि मुस्लिम बनकर उससे निकाह कर ले।

युवती गुरुवार (20 जून 2024) की देर शाम मेडिकल स्टोर पर दवाई लेने के लिए गई। यह मेडिकल स्टोर जुनैद नाम के एक शख्स का है। यह शाहरुख का दोस्त बताया जा रहा है। जब युवती मेडिकल स्टोर पर पहुँची तो वहाँ शाहरुख भी पहुँच गया। वहाँ पहुँचकर वह युवती से जबरदस्ती करने लगा। शाहरुख के दुस्साहस को देखकर युवती ने शोर मचाया तो आसपास के लोग इकट्ठा होने लगे।

मौका देखकर शाहरुख वहाँ से फरार हो गया। मामले की जानकारी लगते ही हिंदू संगठन के लोग पहुँच गए। हिंदू संगठनों के सहयोग से युवती ने थाने में शिकायत दर्ज करा दी। इस मामले में पुलिस ने शाहरुख के साथ-साथ केसूर के रहने वाले उसके साथी जुनैद को भी आरोपित बनाया है। जुनैद भी युवती पर इस्लाम अपनाने का दबाव बना हा था। ऐसा नहीं करने पर जान से मारने की धमकी देता था।

सादलपुर थाना की प्रभारी सविता चौधरी ने बताया कि युवती सब्जी का ठेला लगाती है। वहाँ सब्जी खरीदने के बहाने शाहरुख आया करता था। इसी दौरान उसने रोहित बनकर उससे दोस्ती कर ली। धीरे-धीरे वह उससे इस्लाम आदि की बातें करने लगा। शाहरुख कहता था कि इस्लाम धर्म बहुत अच्छा है और उससे धर्मांतरण के लिए प्रेरित करता था।

इस मामले में पुलिस ने शाहरुख और जुनैद पर छेड़छाड़ के अलावा मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 की विभिन्न धाराओं में मुकदमा कर लिया है। इसके बाद पुलिस ने दबिश देकर दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। हिंदू संगठनों ने इस मामले में कठोर कार्रवाई की माँग की है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएँ ना हों। 

‘जनसेना के मुखिया पवन कल्याण जीते तो बदल लूँगा अपना नाम’: जगन की पार्टी के नेता ने चुनावों के दौरान किया था ऐलान, अब बन गए पद्मनाभ रेड्डी

आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जनसेना पार्टी के मुखिया कोनिडेला पवन कल्याण के जीतने के कारण एक नेता को अपना नाम बदलना पड़ गया। YSRCP के नेता ने चुनौती दी थी थी कि यदि पवन कल्याण जीत जाते हैं तो वह नाम बदल लेगा, अब आधिकारिक तौर पर उसने ऐसा कर भी लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की पार्टी YSRCP के कापू समुदाय से आने वाले नेता मुद्रागडा पद्मनाभम ने अपना नाम बदला है। मुद्रागडा पद्मनाभम ने अपना नाम अब बदल कर पद्मनाभ रेड्डी कर लिया है। उन्होंने इसके लिए बाकायदा अंदर प्रदेश सरकार के सरकारी गजट में अपना नाम बदलवाया है।

मुद्रागडा पद्मनाभ ने आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले ही जगन रेड्डी की पार्टी YSRCP की सदस्यता ली थी। उन्होंने इस चुनाव प्रचार के दौरान ऐलान किया किया था कि जनसेना के मुखिया पवन कल्याण पिठापुरम विधानसभा क्षेत्र से हार जाएँगे। उन्होंने कहा था कि यदि ऐसा नहीं होता, तो वह अपना नाम बदल लेंगे।

पद्मनाभ के ऐलान के उलट पवन कल्याण पिठापुरम से भारी मतों से जीते। उन्होंने YSRCP की उम्मीदवार गीता विश्वनाथ को 70,000 वोटों के अंतर से हराया। पवन कल्याण को यहाँ 34 लाख वोट मिले जबकि गीता को मात्र 64,000 वोट ही मिले। पवन कल्यान की जनसेना से भी राज्य में भारी जीत हासिल की।

पवन कल्याण की इस जीत के बाद कापू समुदाय के नेता पद्मनाभ ने अपना नाम बदल लिया। उन्होंने इसके सरकार को आवेदन दिया था जिसके बाद उनके नाम बदलने को मंजूरी मिल गई। उन्होंने नाम बदलने के फैसले पर अमल करने का ऐलान चुनाव परिणाम आने के अगले ही दिन कर दिया था।

गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश में NDA गठबंधन ने YSRCP को बुरी तरह हराया है। राज्य में हुए चुनाव में TDP को 135, जनसेना को 21 जबकि भाजपा को 8 सीटें हासिल हुई हैं। वहीं सत्ताधारी YSRCP 11 सीटों पर सिमट गई और उसका राज्य से सफाया हो गया है।

झारखंड के जिस गाँव में बकरीद पर गोवंश की हत्या का आरोप, वहाँ पहुँचे भाजपा नेता: कहा- बांग्लादेशियों को बसाने के लिए स्थानीय लोगों पर हो रहे हमले, पीड़ितों का जाना हाल

झारखंड के पाकुड़ जिले के गोपीनाथपुर गाँव में गोवंश का मांस काटने को लेकर 17 जून 2024 को दो समुदायों में झड़प हो गई थी। झड़प के बाद भाजपा नेताओं ने गाँव का दौरा किया और पीड़ित परिवार से मुलाकात की। भाजपा ने आरोप लगाया कि झारखंड और पश्चिम बंगाल सीमा से सटे इलाकों में बांग्लादेशी अवैध आ रहे हैं। इसके कारण इलाके में गौ तस्करी हो रही है और राज्य सरकार मौन है।

विधानसभा में विपक्ष के नेता अमर बाउरी ने कहा कि गोवंश का कटान झारखंड में प्रतिबंधित है, लेकिन इसकी खरीद बिक्री जारी है। उन्होंने कहा कि झारखंड के चंपई सोरेन की सरकार को यह बताना चाहिए कि वह इसे प्रतिबंधित मानती है या नहीं। बाउरी ने कहा कि हिंदू समुदाय गाय को माँ मानता है, जबकि उन्हें सड़क के किनारे काटा जा रहा है।

बाउरी ने यह भी कहा खुले में गोवंश की हत्या हिंदू समुदाय के लोगों को ललकारने वाला है और यह तालिबानी मानसिकता को प्रदर्शित करता है। उन्होंने कहा कि जब इसका स्थानीय लोगों द्वारा विरोध किया जाता है तो बगल की नदी के उस पार रहने वाले मुस्लिम समुदाय के हजारों लोग हमला कर देते हैं। वे लोगों के घरों को लूटकर जला देते हैं। प्रशासन पर भी हमला करते हैं।

उन्होंने कहा कि लव जिहाद और लैंड जेहाद के तहत डेमोग्राफी चेंज किया जा रहा है। उन्होंने गाँव के लोगों को भरोसा दिया कि जब तक मामला पूरी तरह से शांत नहीं हो जाता, तब तक गाँव में एक अस्थाई थाना का निर्माण करवाया जाएगा। उन्होंने कहा कि माहौल को देखते हुए इलाके में केंद्रीय पुलिस बल की भी एक टुकड़ी को तैनात करने की माँग की जाएगी।

वहीं, सारठ विधायक रणधीर सिंह ने कहा कि पश्चिम बंगाल के मुस्लिम समुदाय के लोग झारखंड में बांग्लादेशियों को बसा रहे हैं। मुस्लिम समुदाय के लोग गोपीनाथपुर गाँव के लोगों को डरा-धमका कर उनके घरों को छोड़ कर भागने को मजबूर कर रहे हैं, ताकि बांग्लादेशियों को वहाँ बसाया जा सके। इस घटना के बाद से से ग्रामीण इतने डरे हुए हैं कि वह अपने घरों में भी नहीं रह रहे।

बता दें कि 17 जून 2024 को पाकुड़ जिला के गोपीनाथपुर गाँव में गोवंश की हत्या करने को लेकर दो समुदायों में झड़प हो गयी थी। इसके बाद बगल के पश्चिम बंगाल के अंतर्गत आने वाले गाँवों के सैकड़ों मुस्लिमों ने गोपीनाथपुर गाँव पर हमला कर दिया। इस हमले में दर्जनों ग्रामीण घायल हो गए। ग्रामीणों का आरोप है कि पश्चिम बंगाल से पत्थरबाजी हुई।

मुफस्सिल थाना के पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया को इस विषय में बताया है कि मामला दो गाँवों के बीच लड़ाई का है। एक गाँव झारखंड में जबकि दूसरा पश्चिम बंगाल में है, इसके बीच में नहर है। उनका कहना था कि दूसरे व्यक्ति की जमीन पर हत्या से पूरा विवाद चालू हुआ। उन्होंने बताया दोनों गाँवों के बीच विवाद की सूचना के 20-25 मिनट के भीतर पुलिस मौके पर पहुँच गई थी।

उन्होंने बताया कि गाँव वालों ने यहाँ गौवंश काटने का आरोप मुस्लिम व्यक्तियों पर लगाया है, लेकिन पुलिस को मौके पर मांस बरामद नहीं हुआ है। दूसरी तरफ झारखंड भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य की कानून व्यवस्था धराशायी होने की बात कही है। उन्होंने राज्य की झामुमो कॉन्ग्रेस सरकार पर घुसपैठियों पर एक्शन ना लेने का आरोप लगाया है।

आज भी ‘रलिव, गलिव, चलिव’ ही कश्मीर का सत्य, आखिर कब थमेगा हिन्दुओं को निशाना बनाने का सिलसिला: जानिए हाल के वर्षों में कब कब आतंकियों ने किए हमले

देश का अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर लगातार तीन दशकों से अधिक समय से जिहादी आतंकवाद का सामना कर रहा है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के मुद्दे को ‘जिहाद’ की जगह एक राजनीतिक मुदा बताया जाता रहा है। चाहे वह 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार हो, जिसके कारण बड़े पैमाने पर बलात्कार, हत्याएँ और घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ, या फिर तब चारों तरफ से गूँजते ‘रलिव, गलिव, चलिव’ के नारे, और अब रियासी में हिन्दू तीर्थयात्रियों पर आतंकी हमला, जिसमें दस हिंदुओं की जान चली गई, इस राज्य में पसरी इस्लामी आतंकवाद की जड़ों को साफ़ दर्शाते हैं। “रलिव गलिव चलिव” के नारे का मतलब होता है या तो इस्लाम अपना के हमारे साथ मिल जाओ, या मरो या फिर भाग जाओ।

इन आतंकी ने अपनी रणनीति और कामकाज का तरीका भले ही बदल लिया हो, लेकिन उनकी विचारधारा काफिर या कुफर (काफिर) को खत्म करने और हिंदुओं की लाशों पर कश्मीर में ‘निजाम-ए-मुस्तफा’ (पैगंबर मुहम्मद की व्यवस्था) लागू करने के उनके विश्वास पर आधारित है। बीते दिनों में जम्मू क्षेत्र में आतंकी घटनाओं की बढ़ोतरी ने साफ़ कर दिया कर है कि यह आतंकी विशेष रूप से शांतिपूर्ण हिंदू आबादी में डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। असल में यह हमले भारत सरकार से लड़ाई लड़ने के लिए नहीं बल्कि हिन्दुओं के प्रति घृणा के कारण हो रहे हैं।

इस लेख में बीते कुछ वर्षों में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं नरसंहार की ऐसी ही भयावह घटनाओं का विवरण है। ऑपइंडिया आपके लिए इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथों हिंदुओं के निर्दयतापूर्वक नरसंहार की ऐसी ही 27 से अधिक भयावह घटनाओं को एक साथ बता रहा है।

कश्मीर में हिन्दुओं के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध

जम्मू कश्मीर में गैर मुस्लिमों की हत्या का सिलसिला 2024 में लगातार जारी है। फरवरी 2024 में ही आतंकियों ने श्रीनगर शहर के शल्ला कदल मोहल्ले में पंजाब के अमृतसर से अपने परिवार के कमाने आए दो बढ़ई 31 वर्षीय अमृतपाल सिंह और 27 वर्षीय रोहित मसीह पर गोलियाँ चलाई। अमृतपाल सिंह की इस आतंकी हमले में तुरंत मौत हो गई, जबकि रोहित मसीह को पेट में गोली लगी और उन्हें महाराजा श्री हरि सिंह अस्पताल ले जाया गया और फिर उसे शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भेजा गया यहाँ उसकी मौत हो गई।

अमृतपाल का शव ले जाते उनके परिजन (चित्र साभार: PTI)

पुलिस के अनुसार, आतंकियों ने इन दोनों को बहुत करीब से गोली मारी और गंभीर रूप से घायल कर दिया। इस मामले में जम्मू कश्मीर के IGP विजय कुमार ने कहा, “शहर के हब्बा कदल इलाके में 7 फरवरी को पंजाब के दो मजदूरों पर गोलियाँ चलाने वाले आतंकवादी आदिल मंजूर लंगू को गिरफ्तार कर लिया गया है।”

इसके बाद अप्रैल, 2024 में बिहार के मूल निवासी शंकर शाह के बेटे राजू शाह की जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। हालाँकि, वह बाल-बाल बच गए। रेहड़ी-पटरी लगा कर जीवनयापन करने वाले वाले राजू शाह पर हमला दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग शहर के बिजबेहरा इलाका में हुआ। जबलीपोरा में वह अपने परिवार के साथ रहते थे। आतंकियों के हमले के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनकी मौत हो गई। स्थानीय लोगों ने बताया कि उन्हें दो गोलियाँ लगी थीं, एक गर्दन में और दूसरी पेट में।

इन हमलों के करीब दो महीने बाद ही, 9 जून को शाम करीब 6.15 बजे, आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के रियासी में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए तीर्थयात्रियों को ले जा रही एक बस पर घात लगाकर हमला किया, इस हमले में महिलाओं और एक छोटे बच्चे 10 लोगों की मौत हो गई और 33 अन्य घायल हो गए। इस बस में करीब 50 लोग सवार थे। यह घटना पोनी इलाके के तेरयाथ गाँव में हुई, जहाँ हमलावरों ने कटरा की ओर जा रही श्रद्धालुओं से भरी 53 सीटों वाली बस पर गोलियाँ चलाईं। वाहन सड़क से उतरकर गहरी खाई में गिर गया। आतंकियों ने इस बस पर कम से कम 50 राउंड फायरिंग की। बताया गया कि इस हमले में 2 आतंकी शामिल थे।

बस, जिस पर हमला हुआ (चित्र सभार: PTI)

इस्लामी आतंकियों के हमले से बचने वाले एक हिन्दू तीर्थयात्री ने बताया, “जब हम शिव खोड़ी मंदिर से दर्शन करके लौट रहे थे, उसके करीब आधे घंटे बाद, बस पर गोलीबारी हुई और सभी खिड़कियाँ टूट गईं। बस में सवार सभी लोग उतरने की बात कहने लगे, इसलिए हम नहीं जान पाए कि क्या हुआ। कुछ सेकंड बाद ही हमारी बस खाई में गिर गई। इसके बाद भी आतंकवादी कुछ देर तक गोलीबारी करते रहे।” दूसरे पीड़ित ने बताया, “हम शिव खोड़ी मंदिर से दर्शन करके लौट रहे थे, तभी एक आतंकवादी सड़क के बीच में आया और बस पर गोलीबारी शुरू कर दी। उसने पहले ड्राइवर पर गोलियाँ चलाईं और जब बस खाई में गिर गई, उसके बाद भी आतंकवादी कुछ देर तक लगातार हमला करते रहे।”

2023 में हिन्दुओं पर हुए आतंकी हमले

साल 2023 का पहला दिन ही खून-खराबे से भरा रहा। 1 जनवरी को ही जम्मू के राजौरी के पास डांगरी गाँव में दो हथियारों से लैस आतंकियों ने घरों में घुसकर हिंदू परिवारों पर गोलीबारी की, इस हमले में दीपक कुमार (23), सतीश कुमार (45), प्रीतम लाल (56) और शिव पाल (32) मारे गए और कुछ अन्य घायल हो गए। इस हमले के बारह घंटे के भीतर आतंकियों द्वारा लगाया गया IED फटा, जिसके कारण 4 वर्षीय विहान शर्मा और 16 वर्षीय समीक्षा शर्मा की मौत हो गई, जबकि 20 साल के प्रिंस शर्मा की इलाज के बाद मौत हुई।

बताया गया कि दो आतंकवादी शाम करीब सात बजे हिन्दू घरों में घुसे और आधार कार्ड से उनके हिन्दू होने को पक्का किया। इसके बाद उन पर गोलियाँ बरसा दी। आतंकी नकाब पहने हुए थे और पहले उन्होंने अपर डांगरी के एक घर में कई लोगों को गोली मारी। इसके बाद उन्होंने कुछ दूरी पर स्थित दो अन्य घरों पर हमला किया और वहाँ से भागने से पहले कई लोगों को घायल कर दिया।

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में 25 फरवरी 2023 को आतंकियों ने एक 40 वर्षीय कश्मीरी पंडित की हत्या कर दी, जब वह बाजार में जा रहा था। पुलिस ने बताया कि सुबह करीब 11 बजे दक्षिण कश्मीर के अचन इलाके में अपने घर से करीब 100 मीटर की दूरी पर ATM गार्ड संजय शर्मा को सीने में गोली मार दी गई। राहगीरों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया, लेकिन उनकी मौत हो गई। उनके सहकर्मियों के अनुसार, हिन्दुओं पर लगातार होते हमले के कारण उन्होंने ड्यूटी पर आना बंद कर दिया था।

28 फरवरी को कश्मीर पुलिस ने बताया कि पुलवामा के आकिब मुश्ताक भट, जो हत्या के लिए जिम्मेदार था, को अवंतीपोरा में मार गिराया गया। कश्मीर के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) के अनुसार, वह पहले पाकिस्तान स्थित हिजबुल मुजाहिदीन का आतंकी था और फिर उसने द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) के लिए काम करना शुरू कर दिया, जो एक दूसरी भारत विरोधी पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की शाखा है।

उधमपुर के रहने वाले 27 वर्षीय दीपू कुमार की 29 मई की शाम को जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने उन्हें उस समय गोली मारी जब वे दूध खरीदने के लिए बाजार गए थे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहाँ उनकी मौत हो गई। वे अनंतनाग में जंगलात मंडी के पास एक मनोरंजन पार्क में एक निजी सर्कस में काम कर रहे थे।

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने दीपू कुमार के परिवार के सदस्यों को ₹5 लाख रुपए का मुआवजा दिया। दीपू उधमपुर जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर मजालता के थियाल गाँव से थे। दीपू कुमार के परिवार में उनकी पत्नी, अंधे पिता और उनके भाई हैं, जिन्हें पिछले चार सालों से आँख सम्बन्धी समस्या है। वे अपने पति और दो बच्चों के साथ गाँव में एक मिट्टी के घर में रह रहे थे। उनके भाई ने इस हत्या के बाद सवाल किया, “वह परिवार का एकमात्र कमाने वाला था। पिछले चार सालों से मेरी आँखे खराब हैं। मेरे पिता की आँखे खराब हैं, वे काम नहीं कर सकते। हम पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं। हमें न्याय चाहिए। हमारा क्या कसूर था?”

30 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादी हमले में उत्तर प्रदेश के एक प्रवासी मज़दूर की गोली लगने से मौत हो गई। 38 वर्षीय मुकेश सिंह नाम के इस व्यक्ति को राजपोरा इलाके में दोपहर करीब 12:45 बजे गोली मारी गई। वह एक ईंट भट्टे पर काम करता था और ज़रूरत का सामान खरीदने के लिए पड़ोस की एक दुकान पर गया था, तभी आतंकियों ने उस पर गोली चला दी। उसके सिर और धड़ को निशाना बनाकर तीन गोलियाँ चलाई गईं।

तुमची गांव में कई ईंट भट्टे हैं, जो बड़गाम और पुलवामा जिलों की सीमा से सटे हैं और यहाँ प्रवासी मजदूरों को काम पर रखा जाता है। मुकेश सिंह उन्नाव जिले के भटपुरा गाँव से थे जो लखनऊ से 40 किलोमीटर दूर है।

हिन्दुओं पर 2022 में हुए हमले

12 मई को मध्य कश्मीर के बडगाम जिले में आतंकियों ने एक कश्मीरी पंडित राहुल भट की उनके दफ्तर के भीतर हत्या कर दी। 35 वर्षीय राहुल भट को चडूरा कस्बे में तहसील कार्यालय के अंदर गोली मार दी गई। उन्हें 2010-11 में प्रवासियों के लिए विशेष रोजगार पैकेज के तहत राजस्व विभाग में क्लर्क की नौकरी मिली थी। वह परिवार में पत्नी मीनाक्षी भट और 7 वर्षीय बेटी कृतिका को छोड़ गए हैं। वह बडगाम के शेखपोरा माइग्रेंट कॉलोनी में उनके साथ रह रहे थे। उनके पार्थिव शरीर को जम्मू के दुर्गा नगर इलाके में उनके घर लाया गया।

इस घटना के बाद कश्मीरी हिंदू समुदाय ने विरोध प्रदर्शन किया। राहुल भट की पत्नी ने कहा, “वह कहते थे कि हर कोई उसके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और कोई भी उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकता। फिर भी उनको किसी ने नहीं बचाया। उन्होंने किसी से उनकी पहचान के बारे में पूछा होगा, अन्यथा आतंकियों को कैसे पता चलता।” उन्होंने कहा कि हमलावरों ने उनके दफ्तर से उसके ठिकाने के बारे में जानकारी जुटाई होगी।

उन्होंने बताया कि उनके पति चडूरा में काम करते हुए ‘असुरक्षित’ महसूस करते थे और उन्होंने स्थानीय प्रशासन से उन्हें जिला मुख्यालय में ट्रांसफर किए जाने का अनुरोध किया था। उनकी पत्नी ने कहा, “लेकिन बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, उनका तबादला नहीं किया गया।” उनके पिता ने बताया कि “पहले, उन्होंने पूछा कि राहुल भट कौन है और फिर उन्होंने उन्हें गोली मार दी। हम जाँच चाहते हैं। वहाँ से 100 फीट की दूरी पर एक पुलिस स्टेशन था। कार्यालय में पुलिस वाले रहे होंगे, लेकिन कोई भी वहाँ नहीं था। उन्हें सीसीटीवी फुटेज की जांच करनी चाहिए।”

इस हत्या के बीस घंटे के बाद, सुरक्षाबलों ने तीन आतंकियों को मार गिराया। इनमें से दो की पहचान गुलज़ार अहमद और लतीफ़ राठेर उर्फ ​​अब्दुल्लाहिन बांदीपोरा के रूप में हुई। राठेर टीवी कलाकार अमरीन भट की हत्या में भी शामिल था। तीनों द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) से जुड़े थे, जिसके बारे में सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान है कि उसे पाकिस्तान की ISI ने बनाया है। इससे कश्मीर में आतंक को एक स्थानीय चेहरा दिया जा सके, जिससे पाकिस्तान कश्मीर में आतंक बढ़ाने के आरोप से बच सके।

13 अप्रैल को एक और हमले में कुलगाम निवासी सतीश कुमार सिंह राजपूत की गोली मारकर हत्या कर दी। उन्हें काकरान गाँव में उनके घर पर गोलियों से छलनी कर दिया गया। यह घटना कुलगाम जिले के पोम्बे कांप्रिम इलाके में शाम करीब साढ़े सात बजे हुई। सतीश कुमार सिंह एक ड्राइवर थे। वे मूल रूप से जम्मू के रहने वाले थे और राजपूत समुदाय से थे, जो करीब 70 साल पहले यहाँ आकर बस गए थे।

सतीश कुमार सिंह परिवार के अकेले कमाने वाले थे। उनके परिवार में उनकी बुजुर्ग माँ, पत्नी और तीन बेटियाँ, साक्षी, सेनोनी और मीनाक्षी शामिल थीं, जिनकी उम्र 7 से 12 वर्ष के बीच है। साक्षी दिव्यांग है। कुलगाम और शोपियां में कुछ और राजपूत परिवार रहते हैं जो मुख्य रूप से सेब के व्यवसाय में शामिल हैं।

इससे पहले लश्कर-ए-इस्लाम ने हिंदुओं को चेतावनी भी जारी की थी जिसमें कहा गया था कि वह कश्मीर छोड़कर भाग जाएँ वरना उन्हें मार दिया जाएगा। सतीश सिंह की हत्या उन एक दर्जन से भी कम राजपूत परिवारों के लिए एक झटका थी, जिन्होंने सबसे बुरे समय में भी दक्षिण कश्मीर के काकरान गाँव में रहना चुना। इससे नौ दिन पहले, शोपियां में आतंकियों ने एक कश्मीरी पंडित पर गोली चलाई, जिससे वह घायल हो गया। उससे पहले पुलवामा में प्रवासी मज़दूरों को निशाना बनाकर किए गए पाँच हमलों में सात लोग घायल हुए, इनमें से तीन पंजाब, तीन बिहार और एक उत्तर प्रदेश से थे।

13 मई को जम्मू-कश्मीर के रियासी में वैष्णो देवी मंदिर जा रही तीर्थयात्रियों की एक बस में कटरा के पास आग लग गई, इसके कारण चार लोगों की मौत हो गई और 24 से अधिक लोग घायल हो गए। कटरा से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर खरमल के पास इस बस में आग लगी। आग लगाने की जिम्मेदारी आतंकवादी समूह “जेएंडके फ्रीडम फाइटर्स” ने ली।

बताया गया कि यह हमला स्टिकी बम से किया गया था। NIA समेत सुरक्षा एजेंसियों की टीमों ने इस घटना स्थल का दौरा किया और बस की जाँच की। प्रारंभिक जाँच से पता चला कि आग इंजन वाले हिस्से में लगी थी और जल्दी ही पूरी बस में फैल गई। घायलों को इलाज के लिए कटरा ले जाया गया लेकिन दो लोगों की तुरंत मौत हो गई।

15 मई 2022 को एक अज्ञात आतंकवादी ने ग्राहक बन कर बारामूला के दीवान बाग शराब की दुकान में ग्रेनेड फेंका, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और तीन घायल हो गए। मृतक की पहचान राजौरी निवासी 35 वर्षीय रंजीत सिंह के रूप में हुई, जो राजौरी के बखर गाँव निवासी किशन लाल का पुत्र था और गैरीसन टाउन की शराब की दुकान पर काम करता था। घायल कर्मचारियों में गोवर्धन सिंह पुत्र बिजेंद्र सिंह, रवि कुमार पुत्र करतार चंद दोनों निवासी बिलावर, कठुआ और गोविंद सिंह पुत्र गुरदेव सिंह थे जो राजौरी के ही रहने वाले थे।

पुलिस ने इस मामले में बताया, “आतंकियों ने बारामूला में एक नई खुली शराब की दुकान के अंदर ग्रेनेड फेंके। 4 कर्मचारी छर्रे लगने से घायल हो गए। सभी घायलों को तुरंत नजदीकी अस्पतालों में ले जाया गया। उनमें से एक ने दम तोड़ दिया। रात करीब 8.10 बजे बाइक पर सवार द2 (आतंकवादी) दीवान बाग बारामूला में नई खुली शराब की दुकान के पास रुके। बुर्का पहने पीछे बैठा एक व्यक्ति शराब की दुकान की खिड़की के पास गया, खिड़की से दुकान के अंदर एक ग्रेनेड फेंका और उसके बाद मौके से बाइक पर भाग गया।” TRF ने विस्फोट की जिम्मेदारी ली है।

31 मई को कश्मीर के कुलगाम जिले में आतंकियों ने जम्मू के सांबा की मूल निवासी 36 वर्षीय हिंदू स्कूल शिक्षिका रजनी बाला को गोली मार दी। पुलिस के अनुसार, वह कुलगाम के गोपालपोरा इलाके में आतंकियों की गोलियों से घायल हो गई, जहाँ वह शिक्षिका के रूप में काम करती थी। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

गोपालपोरा स्कूल की एक शिक्षिका ने इस घटना के बारे में बताया, “वह अपने स्कूल की ओर जा रहीं थी। जैसे ही वह दरवाजे पर पहुँची, एक बन्दूकधारी ने एक सँकरी गली से गोली चला दी। उनके सिर पर गोली लगी और वह गेट पर गिर गई। हम उन्हें तुरंत अस्पताल ले गए लेकिन उसे वहाँ मृत घोषित कर दिया गया।” चावलगाम गाँव में उनके परिवार का किराए का घर गोपालपोरा के सरकारी हाई स्कूल से करीब 7 किलोमीटर दूर है, जहाँ वह पढ़ाती थीं।

उनके पति राज कुमार भी स्कूल शिक्षक हैं और मिरहामा के सरकारी मिडिल स्कूल में तैनात हैं। यह स्कूल रजनी बाला के स्कूल से 4 किलोमीटर से भी कम दूरी पर है। उनकी 13 वर्षीय बेटी सना भी उनके साथ रहती हैं। उन दोनों को 2009 में अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी के तहत सरकारी शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था और कुलगाम में तैनात किया गया था। इस घटना के बाद सुरक्षाबलों ने 14 जून को कुलगाम में दो आतंकियों को मार दिया था। ये आतंकवादी शिक्षिका रजनी बाला की हत्या में शामिल थे। आतंकवादी घने बागों में छिपे हुए थे। सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ के शुरुआती घंटों में उनमें से एक को घेर लिया था।

2 जून को आतंकियों ने कश्मीर घाटी में अलग-अलग हमलों में दो हिंदुओं को मार दिया। एक व्यक्ति की पहचान राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के नोहर तहसील के भगवान गाँव के बैंक मैनेजर 27 वर्षीय विजय कुमार के रूप में हुई। वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के ग्रामीण बैंक में तैनात थे। उनकी सुबह दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में हत्या मारकर हत्या कर दी गई, जबकि बिहार के 18 वर्षीय मजदूर दिलखुश कुमार की शाम को बडगाम जिले में गोली मारकर हत्या कर दी गई। पंजाब के गुरदासपुर के गोरिया के रहने वाला एक अन्य मजदूर गोलीबारी में घायल हो गया।

पीड़ित विजय कुमार की इस बैंक में पाँच दिन पहले ही पोस्टिंग हुई थी। इसे पहले उन्हें अनंतनाग के कोकरनाग इलाके में मैनेजर के पद पर तैनात किया गया था। उनकी शादी तीन महीने पहले ही हुई थी और वह अपनी पत्नी के साथ काजीगुंड में रह रहे थे। आतंकियों ने उस पर नजदीक से गोलियाँ चलाईं। यह पूरी घटना CCTV कैमरे में रिकॉर्ड हो गई। बाद में सुरक्षा बलों ने हत्या में शामिल शोपियां के जान मोहम्मद लोन समेत लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों को मार गिराया था।

इसके बाद बडगाम के मगरेपोरा इलाके में दो हिंदू मजदूरों पर आतंकी हमला हुआ। कश्मीर जोन पुलिस ने इस मामले में बताया, “बडगाम के चडूरा इलाके में ईंट भट्टे पर काम कर रहे दो प्रवासी मजदूरों पर आतंकियों ने फायरिंग की। दोनों को तुरंत इलाज के लिए नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, हालाँकि, उनमें से एक की मौत हो गई।” इनमें से एक के हाथ में गोली लगी थी जबकि दूसरे के गले में गोली लगी थी। दिलखुश कुमार अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था और मार्च में ही कमाने के लिए कश्मीर गया था।

16 अगस्त को शोपियां जिले के छोटेपोरा इलाके में सेब के बगीचे में आतंकी हमले में सुनील कुमार नामक कश्मीरी पंडित की मौत हो गई, जबकि उनके भाई पिंटू कुमार घायल हो गए। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस मामले पर कहा, “शोपियां में नागरिकों पर हुए आतंकी हमले को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। मेरी संवेदनाएँ सुनील कुमार के परिवार के साथ हैं। मैं घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करता हूँ। इस हमले की सभी को कड़ी निंदा करनी चाहिए। इस बर्बर कृत्य के लिए जिम्मेदार आतंकियों को बख्शा नहीं जाएगा।”

जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले में 15 अक्टूबर को कश्मीरी पंडित पूरण कृष्ण भट की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। दक्षिण कश्मीर जिले के चौधरी गुंड इलाके में उनके घर के पास उन पर हमला किया गया। उन्हें शोपियां अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस उप महानिरीक्षक सुजीत कुमार ने इस मामले में बताया कि KFFF ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। शुरुआती जाँच में पता चला है कि एक आतंकी ने उन पर गोली चलाई।”

उनके साले ने कहा, “वह अपने पीछे दो छोटे बच्चे छोड़ गए हैं। वह घर के इकलौते कमाने वाले थे। उनकी हत्या निशाना बना कर की गई है। वे अपने सामने आने वाले किसी भी व्यक्ति को नहीं मारते, बल्कि उन लोगों को मारते हैं जिन्हें वे पसंद नहीं करते। वे कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को यहाँ नहीं चाहते।” बताया गया कि 2020 में कोविड-19 के बाद, उन्होंने अपनी पत्नी और अपने दो बच्चों को जम्मू भेज दिया था। वे सभी पहले शोपियां में रहते थे।

इस घटना के बाद 19 दिसंबर को सुरक्षा बलों ने शोपियां जिले में लश्कर-ए-तैयबा संगठन से जुड़े तीन आतंकियों को मार गिराया। उनमें से दो की पहचान लतीफ लोन और उमर नजीर के रूप में हुई और पता चला कि वह पूरण कृष्ण भट और एक नेपाली हिंदू मजदूर तिल बहादुर थापा की हत्या में शामिल थे। पुलिस, सेना और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस ऑपरेशन में घटनास्थल से एक राइफल और दो पिस्तौल बरामद की गई।

16 अक्टूबर को शोपियां जिले के हरमैन गांव में आराम कर रहे उत्तर प्रदेश के कन्नौज के दो मजदूर राम सागर (50) और मनीष कुमार (40) की आतंकियों ने ग्रेनेड फेंक कर हत्या कर दी। एक रिश्तेदार ने बताया कि यह लोग सितंबर में सेब के बागों में कटाई के समय काम करने के लिए शोपियां गए थे। कश्मीर के ADGP विजय कुमार ने कहा, “उत्तर प्रदेश के मजदूर यहाँ किराए पर रहकर काम कर रहे थे। उनकी झोपड़ी के तिरपाल को हटाकर ग्रेनेड अंदर फेंका गया। ग्रेनेड फेंकने वाला व्यक्ति एक हाइब्रिड आतंकवादी है और हमने उसे रात में ही गिरफ्तार कर लिया। उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। उसके सहयोगी को भी गिरफ्तार कर लिया गया है।

लश्कर-ए-तैयबा के ‘हाइब्रिड आतंकवादी’ इमरान बशीर गनई को घटना के कुछ घंटों बाद ही गिरफ्तार कर लिया गया था। ‘हाइब्रिड आतंकवादी’ शब्द का इस्तेमाल पुलिस द्वारा ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जो आतंकी के रूप में नहीं जाना गया है, लेकिन आतंकवादी हमले करता है और बिना किसी निशान के समाज में वापस चला जाता है।

कश्मीर जोन पुलिस ने इस मामले में बताया, ”गिरफ्तार हाइब्रिड आतंकवादी के खुलासे और पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा लगातार की गई छापेमारी के आधार पर, शोपियां के नौगाम में आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच एक और मुठभेड़ हुई है, इसमें हाइब्रिड आतंकवादी इमरान बशीर गनई दूसरे आतंकवादी की गोलीबारी में मारा गया।”

2021 में हिन्दुओं पर हुए हमले

5 अक्टूबर को 2 अलग-अलग आतंकी हमलों में दो हिंदुओं की जान चली गई। एक समाजसेवी और श्रीनगर की लोकप्रिय ‘बिंदरू मेडिकेट’ फार्मेसी के मालिक 68 वर्षीय कश्मीरी पंडित माखन लाल बिंदरू की इकबाल पार्क के पास आतंकियों ने गोली मार कर हत्या कर दी। माखन लाल बिंदरू को हमलावरों ने उनकी फार्मेसी में ही करीब से गोली मार दी। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

इसके अलावा बिहार के भागलपुर जिले के रहने वाले वीरेंद्र पासवान की भी हत्या कर दी गई। आतंकियों ने माखन लाल बिंदरू की हत्या के भीतर यह हमला किया। वीरेंद्र पासवान एक रेहड़ी-पटरी वाले थे और भेलपुरी बेचने का काम करते थे। उन्हें भी करीब से गोली मारी गई और उनकी मौके पर ही मौत हो गई। माखन लाल बिंदरू उन चंद लोगों में से एक थे जो 1990 में आतकवाद के बाद भी पलायन कर बाहर नहीं गए थे।

माखन लाल बिंदरू की हत्या श्रीनगर के इकबाल पार्क के पास की गई। (स्रोत: प्रेशियस कश्मीर)

वे अपनी पत्नी के साथ कश्मीर में रहे और अपना मेडिकल चलाते रहे, यह शहर में अच्छी दवाओं के लिए एक भरोसेमंद नाम बन गया। पुलिस ने बताया कि वह आतंकी हमलों के दिनों में भी अपनी दुकान खुली रखते थे, जब पूरा बाजार बंद रहता था। इसके अलावा, उन्होंने अपना मेडिकल कभी बंद नहीं किया, तब भी जब अलगाववादियों ने हड़ताल बुलाई।

जम्मू-कश्मीर के DGP ने दिलबाग सिंह ने माखन लाल बिंदरू के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य होने की झूठी अफवाहों का जिक्र करते हुए साफ़ किया, “TRF कराची से चलाया जाता है। हम जल्द ही सीमा पार से इस सांठगांठ का पर्दाफाश करेंगे। पीड़ित किसी भी समूह से जुड़े नहीं थे। यह TRF द्वारा किया गया दुर्भावनापूर्ण प्रचार है कि बिंदरू RSS से जुड़े थे।”

उनकी बेटी डॉ श्रद्धा बिंदरू ने इसके बाद आतंकियों को चुनौती दी, ”मैं एक एसोसिएट प्रोफेसर हूँ, मेरा भाई एक प्रसिद्ध डॉक्टर है और मेरी माँ हमारी दुकान चलाती है। हमारे पिता ने शून्य से शुरुआत की थी, लेकिन उन्होंने हमें यह बनाया। आतंकी केवल शरीर को मार सकते हैं, आत्मा को नहीं। पत्थरबाजी और गोलियां चलाना ही उन्हें आता है। तुम लोगों ने एक शरीर को मार दिया है, लेकिन तुम मेरे पिता की विरासत और उनकी आत्मा को नहीं मार सकते। अगर तुम्हें लगता है कि तुममें हिम्मत है, तो आओ और हमारे सामने बैठो और बहस करो। मैं यहीं हूँ, मेरे कश्मीरी पंडित हिंदू पिता की कश्मीरी पंडित हिंदू बेटी। आओ और मेरा सामना करो।”

7 अक्टूबर को सुबह 11.15 बजे आतंकियों ने गवर्नमेंट बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल की प्रिंसिपल सतिंदर कौर और स्कूल के शिक्षक दीपक चंद की हत्या कर दी। श्रीनगर के संगम इलाके में स्थित इस स्कूल में आतंकियों ने धावा बोला और दोनों को गोली मार दी। उस समय वहाँ कोई छात्र नहीं था क्योंकि कक्षाएँ अभी भी ऑनलाइन चल रही थीं। प्रिंसिपल के कार्यालय में लगभग चार-पाँच शिक्षक बैठे थे, तभी दो आतंकी यहाँ घुसेसभी को लाइन में खड़ा कर दिया। फिर उन्हें अपने पहचान पत्र और मोबाइल फोन दिखाने के लिए कहा गया और मार दिया।

हत्या में मारे गए सतिंदर कौर और दीपक चंद (चित्र साभार: Hindu Post)

मुस्लिम शिक्षकों को इस दौरान जाने दिया गया जबकि दो गैर-मुस्लिमों को घसीटकर बाहर लाया गया जिसके बाद हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं और मौके से भाग गए। दोनों को सौरा के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ले जाया गया लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। दीपक चंद (38) कश्मीरी पंडित समुदाय के सदस्य थे जो जम्मू से वापस घाटी में चले गए थे जबकि सतिंदर कौर (46) श्रीनगर के अलोची बाग बंड की सिख महिला थीं।

जम्मू-कश्मीर के DGP दिलबाग सिंह ने इस मामले में बताया कि नागरिकों को निशाना बनाने की ये हालिया घटनाएँ यहाँ भय और सांप्रदायिक तनाव का माहौल बनाने के लिए की गईं। उन्होंने इसे स्थानीय मुस्लिमों को बदनाम करने की साजिश बताया। उन्होंने कहा कि यह पाकिस्तान की एजेंसियों के निर्देश पर किया जा रहा है। इस हमले की जिम्मेदारी रेजिस्टेंस फ्रंट ने ली।

बिहार के बाँका इलाके के निवासी अरबिंद कुमार साह (30) की 16 अक्टूबर की शाम को श्रीनगर के ईदगाह स्थित एक पार्क के बाहर आतंकियों ने हत्या कर दी। वह अपने परिवार के अकेले कमाने वाले थे। वह एक रेहड़ी-पटरी वाले थेऔर बिहार में अपने परिवार को चलाने के लिए यहाँ रेहड़ी लगाते थे। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि साह की रेहड़ी के पास एक आतंकी पिस्तौल लेकर खड़ा था और उसने साह को बिल्कुल नजदीक से सिर में गोली मार दी, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

साह खून से लथपथ हालत में पड़े मिले। उन्हें महाराजा श्री हरी सिंह अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उनकी पहचान उनके आधार कार्ड से हुई। उनके पिता ने बताया कि 3 महीने पहले वह रोजगार की तलाश में जम्मू-कश्मीर चले गए थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अरविंद कुमार साह के परिजनों को मुख्यमंत्री राहत कोष से ₹2 लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान किया था।

2019 में हिन्दुओं पर हुए हमले

14 अक्टूबर को दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले में आतंकियों ने छत्तीसगढ़ के एक प्रवासी मजदूर की हत्या कर दी। छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के बंसुला गांव के निवासी सेठी कुमार सागर पुलवामा के ओखू गाँव में ईंट भट्टे पर काम करते थे। काकपोरा रेलवे स्टेशन के पास निहामा इलाके में आतंकियों ने उन पर गोली चलाई। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आतंकियों की संख्या 2 थी। उन्हें स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

सेठी कुमार की पत्नी (चित्र साभार: The Indian Express)

दो दिन बाद, 16 अक्टूबर को शाम करीब 7:30 बजे, शोपियां इलाके में तीन से चार आतंकियों ने हमला किया। इस हमले में पंजाब के व्यापारी चरणजीत सिंह पोपली और उनके सहयोगी संजीव चराया को निशाना बनाया गया। दोनों को पुलवामा के जिला अस्पताल ले जाया गया, इलाज के दौरान चरणजीत की मौत हो गई।

संजीव चराया को गंभीर हालत में श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल श्रीनगर में स्थानांतरित कर दिया गया। शोपियां के डिप्टी कमिश्नर यासीन चौधरी ने इस घटना पर बताया, “चरणजीत एक बड़े सेब व्यापारी थे और काम के सिलसिले में कश्मीर में थे। उन पर और उनके व्यापारिक सहयोगी पर ट्रेंज गांव में हमला किया गया, जहाँ वे एक स्थानीय फल उत्पादक के साथ रह रहे थे।”

चरणजीत सिंह पोपली के परिवार में पत्नी और 8 साल का बेटा है। वह संजय चराया की मदद करने के लिए शोपियां गए थे। उनके बड़े भाई रमेश कुमार जो एक दर्जी हैं, ने बताया, “चरणजीत हर साल सेब सीजन के दौरान व्यापारियों के साथ हेल्पर के तौर पर करीब 40 दिनों के लिए कश्मीर जाते थे। वह सेब के बागों से सेब तोड़कर पैक करवाते थे और फिर उसे अबोहर भेज देते थे। सेब सीजन के बाद वह अबोहर के खेतों में फिर से सेब तोड़ने, पैक करने और लोड करने का काम करते थे।”

रियासी जिले के पेंथल ब्लॉक के ककरियाल के पास सेरा कोटला गाँव के निवासी ट्रक चालक नारायण दत्त की 28 अक्टूबर को अनंतनाग में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। 45 वर्षीय दत्त शाम को दक्षिण कश्मीर जिले के बिजबेहरा के कनिलवान इलाके में आतंकियों ने गोलियों से भून दिया था। वह कश्मीर में राशन सप्लाई करने गए थे। उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। हालाँकि, पुलिस के पहुँचने के कारण दो अन्य ट्रक ड्राइवरों की जान बच गई।

उनकी 15 वर्षीय बेटी तान्या शर्मा ने रोते हुए बताया, “श्रीनगर जाने से पहले मेरे पिता ने हमसे कहा था कि वह दिवाली पर घर लौटेंगे लेकिन आज सुबह हमें उनकी लाश मिली क्योंकि आतंकियों ने बिना किसी गलती के उन्हें मार डाला।” कुछ साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया था, और इसके बाद वह अपने 4 बच्चों का एकमात्र सहारा थे। उनका सबसे बड़ा बेटा अतुल शर्मा 17 साल का था, उनका सबसे छोटा बेटा बंश शर्मा 7 साल का था जबकि उनकी दूसरी बेटी सान्या शर्मा सिर्फ़ 13 साल की थी।

नारायण दत्त का परिवार (चित्र सभार: Indian Express)

नारायण दत्त पर हमला करने वाले आतंकियों को पुलिस के साथ मुठभेड़ के बाद मार गिराया गया। पुलिस की एक टीम ने आतंकियों का पीछा किया और उनमें से 1 को बाद में हुई झड़प में मार दिया। मारा गया आतंकी उन आतंकियों के साथ था जिसने अनंतनाग के बिजबिहारा इलाके में दो वाहनों को रोका था, जिनमें से एक हरियाणा और दूसरा जम्मू का था।

4 नवंबर की दोपहर श्रीनगर शहर के लालचौक इलाके में ग्रेनेड हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई और 42 से ज़्यादा लोग घायल हो गए, इसमें नौ महिलाएँ भी थी। मृतक की पहचान उत्तर प्रदेश के सहारनपुर निवासी रिंकू सिंह (40) के रूप में हुई। जम्मू-कश्मीर पुलिस के उप महानिरीक्षक (मध्य कश्मीर रेंज) वी के बिरदी ने बताया, “वह यहाँ में गुब्बारे और खिलौने बेच रहा था।” ग्रेनेड को चहल-पहल वाले गोनीखान बाज़ार में फेंका गया, जो शहर के बीचों-बीच है और यहाँ अक्सर सड़क किनारे सामान बेचने वाले और ग्राहक आते-जाते रहते हैं।

इस हमले में तीन सुरक्षाकर्मी भी घायल हुए हैं। उन्हें श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल भेजा गया। विस्फोट के कारण मची भगदड़ के कारण ग्रेनेड फेंकने वाले आतंकी भागने में सफल रहे। श्रीनगर सेक्टर के CRPF के IG रविदीप सिंह साही के अनुसार ग्रेनेड ‘स्ट्रीट वेंडर्स एरिया’ में फेंका गया था और उस समय वहाँ बहुत सारे लोग मौजूद थे।

ग्रेनेड हमले के बाद की स्थिति (चित्र साभार: Kashmir Observer)

घटना के दौरान मौजूद एक दुकानदार ने बताया, “एक जोरदार धमाका हुआ और लोग यहाँ से भागने लगे। घायलों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया।” प्रशासन ने बताया, “पुलिस ने दो दिन पहले सोपोर में एक आतंकी को गिरफ्तार किया था, उसे भी बाजारों और पेट्रोल पंपों पर ग्रेनेड फेंकने का काम दिया गया था।”

इसके 2003 का नंदीमर्ग नरसंहार

लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने 23 मार्च, 2003 को रात 10.30 बजे जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले के नंदीमर्ग गाँव में 11 पुरुषों, 11 महिलाओं और 2 बच्चों सहित 24 कश्मीरी पंडितों को पहचान कर उन्हें लाइन में खड़ा किया और उनकी हत्या कर दी।

1990 के कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और उनके पलायन के दौरान अन्य हिंदुओं के घाटी छोड़ने के बाद, नंदीमार्ग गाँव में केवल 52 कश्मीरी पंडित रहते थे, यह सभी 4 परिवारों का हिस्सा थे। हमलावर, जिनमें पास के एक गाँव के कुछ युवा लोग और आतंकवादी शामिल थे, ने नरसंहार से एक दिन पहले 21 और 22 मार्च को नंदीमर्ग की रेकी की थी कि ताकि कश्मीरी पंडितों को मारने का स्थान निर्धारित किया जा सके।

कश्मीरी पंडितों को एक खुले मैदान में लाया गया। उन्हें घुटनों के बल बैठने के लिए मजबूर किया गया और फिर उनके सिर में गोली मार दी गई। हमलावरों ने इस दौरान छोटे बच्चों को भी नहीं बख्शा। आतंकियों का सरगना उनका ‘कमांडर’ जिया मुस्तफा ने किया था। उसे 2003 में गिरफ्तार किया गया था और जेल में रखा गया था। अक्टूबर 2021 में पुंछ के जंगल में आतंकी ठिकानों की पहचान करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा जिया को जेल से बाहर निकाला गया और उसके बाद आतंकियों के साथ मुठभेड़ के दौरान गोलीबारी में वह मारा गया।

इस हत्याकांड में शामिल माने लश्कर-ए-तैयबा के तीन अन्य आतंकियों को मुंबई पुलिस ने 29 मार्च 2003 को मार गिराया था और इस हत्याकांड में शामिल लश्कर-ए-तैयबा के एक अन्य आतंकी को अप्रैल 2003 में गिरफ़्तार किया गया था। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने भी इस मामले में पाँच पुलिसकर्मियों समेत सात लोगों को आरोपी बनाया था। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने 2022 में नंदीमर्ग हत्याकांड की फ़ाइल फिर खोलने का आदेश दिया।

हिन्दुओं पर 1998 में हुए हमले

20 जून 1998 को, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के डोडा इलाके में शादियों में शामिल होने आए 25 लोगों की हत्या कर दी थी। यह घटना तब हुई जब 2 शादी समारोह के मेहमान घर जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहे थे। तभी पाँच शूटर एक चोरी की गाड़ी में आए और बंदूक की नोक पर पीड़ितों से पैसे और गहने माँगे। इसके बाद उन्होंने पुरुषों को अलग कर दिया और उन पर गोलियाँ बरसानी चालू कर दी। मारे गए लोगों में दोनो दूल्हे भी शामिल थे।

दूर-दराज के ग्रामीण इलाके में हुई यह त्रासदी छह महीने में तीसरी घटना थी जब आतंकियों ने हिंदुओं को निशाना बनाकर उनकी हत्या की। इस हत्याकांड का सरगना लश्कर-ए-तैयबा का आबिद हुसैन सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था और जैश-ए-मोहम्मद का अतुल्लाह जो एक अन्य आतंकी था, उसे 2004 में सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार कर लिया था।

जनवरी में श्रीनगर के उत्तर में एक गांव में 23 हिंदू नागरिकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना कश्मीर घाटी के उस क्षेत्र में हुई जहाँ पाकिस्तान द्वारा पीला पोसे आतंकवाद के चालू होने से पहले 100,000 से अधिक हिंदू बसते थे। इनमें से कई लोग जम्मू जैसे इलाकों में चले गए थे।

ऐसी ही एक दूसरी घटना अप्रैल में उधमपुर जिले के एक सुनसान पहाड़ी इलाके में हुई, जहाँ 13 महिलाओं और बच्चों सहित 29 हिंदू मार दिए गए।। इस घटना में बचने वालों ने खुलासा किया कि आतंकियों ने हिन्दुओं पर इसलिए हमला किया क्योंकि उन्होंने इस्लाम अपनाने और गोमांस खाने से मना कर दिया था।

अमरनाथ यात्रा पर भी होते रहे हैं हमला

10 जुलाई, 2017 को आतंकियों ने अमरनाथ से लौट रहे तीर्थयात्रियों की एक बस पर हमला कर दिया। इसमें 7 लोग मारे गए और 15 अन्य घायल हो गए। यह घटना कश्मीर के अनंतनाग जिले में हुई। 21 जुलाई, 2006 को आतंकियों ने कश्मीर के गांदरबल जिले के बीहामा इलाके में तीर्थयात्रियों को ले जा रही एक बस पर हमला किया, इसमें अमरनाथ यात्रा के बेस कैम्प से वापस आ रहे 5 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई। आतंकियों ने 6 अगस्त, 2002 को पहलगाम में अमरनाथ यात्रा के नुनवान बेस कैम्प शिविर पर गोलीबारी की थी। इस हमले में 6 हिन्दू तीर्थयात्रियों और तीन अन्य लोगों सहित नौ लोग मारे गए थे।

इससे पहले 20 जुलाई, 2001 को आतंकियों ने अमरनाथ गुफा के पास एक कैम्प पर ग्रेनेड फेंके, जिसमें 13 तीर्थयात्री मारे गए और 15 अन्य घायल हो गए। हमले में 2 पुलिस अधिकारी भी मारे गए। 2 अगस्त , 2000 को आतंकियों ने पहलगाम बेस कैंप पर हमला किया, जिसमें 21 तीर्थयात्रियों सहित 32 लोग मारे गए और 60 अन्य घायल हो गए।

28 जुलाई, 1998 को आतंकियों ने शेषनाग कैंपग्राउंड में अमरनाथ गुफा की ओर जा रहे तीर्थयात्रियों पर हमला किया, जिसमें 20 लोग मारे गए। 15 अगस्त, 1993 को अमरनाथ गुफा की ओर जाते समय 8 तीर्थयात्री आतंकी हमले में मारे गए।

निष्कर्ष

जम्मू-कश्मीर में आतंकी दशकों से लोगों की जिंदगियाँ तबाह कर रहे हैं। 1 और 2 अगस्त, 2000 को आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में कुछ ही घंटों में कम से कम 105 लोगों की हत्या कर दी। थी। इस दौरान उन्होंने खास तौर पर हिंदू पुरुषों को निशाना बनाया और उनकी जान ले ली। प्रवासी मजदूरों से लेकर गाँव की रक्षा समिति के सदस्यों तक किसी को भी नहीं बख्शा गया। आतंकियों ने मृतकों और घायलों के हथियार भी छीन लिए।

यह बात सही है कि आतंकियों ने मुसलमानों और हिंदुओं दोनों को निशाना बनाया है, हालाँकि, अंतर यह है कि मुसलमानों को केवल तभी निशाना बनाया जाता है जब उन्हें सरकार का समर्थक माना जाता है और वह इस्लामी मुल्क की राह में रोड़ा बनते हैं। हिंदुओं को यह छूट नहीं है और जिहादियों के हाथों मौत से बचने का उनके लिए एकमात्र तरीका या तो इस्लाम धर्म अपनाना या घाटी छोड़ना है।

अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद से स्थिति में बदलाव आया है लेकिन यह आतंकी अब भी लगातार हिन्दुओं को निशाना बना रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ISIS (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही कश्मीर में इस्लामिक राज्य स्थापित करने की कोशिश करने वाले आतंकियों को मुख्यधारा के मीडिया द्वारा ‘मिलिटेंट’ कहा जाता है। इसी तरह, हिंदुओं या कश्मीरी पंडितों को पीड़ित दिखाते समय उन्हें ‘अल्पसंख्यक’ कहा जाता है और उनकी असल पहचान छुपाई जाती है।

कश्मीर पंडितों का नरसंहार हमें अपनी नींद से जगाने को प्रेरित करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था। हमें इस मामले को लेकर निष्पक्ष ना दिखते हुए असल समस्या का सामना करना चाहिए था। यदि हमने पहले ऐसा किया होता तो शायद जिहाद के राक्षस को पूरी तरह से नष्ट किया जा सकता था।