ICC टी-20 वर्ल्ड कप में भारत ने एक बार फिर बड़े मुकाबले में अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए पाकिस्तान को 61 रन से करारी शिकस्त दी और सुपर 8 में अपनी जगह पक्की कर ली। कोलंबो में खेले गए इस हाई-वोल्टेज मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 7 विकेट के नुकसान पर 175 रन बनाए। जवाब में पाकिस्तान की पूरी टीम 18 ओवर में 114 रन पर सिमट गई।
मैन ऑफ द मैच ईशान किशन ने 40 गेंदों पर 77 रन की विस्फोटक पारी खेली। उनकी पारी में 10 चौके और 3 छक्के शामिल रहे। उन्होंने स्पिनरों के खिलाफ आक्रामक बल्लेबाज़ी की और रन गति को लगातार बढ़ाया। बाद में पाकिस्तान टीम जब पिच पर बैटिंग करने उतरी तो कुछ ही ओवरों में पता चल गया कि मैच के परिणाम क्या होने वाले हैं।
पूर्व क्रिकेटरों ने दी बधाई, इरफान पठान ने डांस कर पूछा- पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?
भारत की जीत के बाद देशभर में जश्न का माहौल रहा। सोशल मीडिया पर भी इस जीत को लेकर उत्साह देखने को मिला। भारतीय क्रिकेट जगत के पुराने खिलाड़ियों ने भी जीत के लिए टीम के खिलाड़ियों के बेहद अलग अंदाज में बधाई दी।
पूर्व भारतीय क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने टीम इंडिया को जीत की बधाई देते हुए X पर लिखा, “ईशान किशन असली धुरंधर की तरह खेले। सभी छोटी टीमों में से पाकिस्तान को हराना भारत के लिए सबसे आसान लग रहा था क्योंकि T-20 क्रिकेट में उनका 17वीं सदी का अप्रोच था और उन्हें हमेशा की तरह अच्छी हार मिली। पूरी कंबल कुट्टई।”
Ishan Kishan played like a real Dhurandhar. Among all minnows Pakistan looked like the easiest to beat for Bharat because of their 17th century approach to T-20 cricket, and they have taken a proper beating as usual. Full kambal kuttai. #t20worldcup2026
इसी तरह मास्टर-ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने लिखा, “पावरप्ले में भारत ने मैच अपने हाथ से छीन लिया। पहली इनिंग में ईशान किशन की बॉलिंग और दूसरी इनिंग में हमने जो जबरदस्त बॉलिंग देखी, उससे सारा फर्क पड़ा। हम हमेशा ड्राइवर सीट पर थे। आज रात भारत ने धमाल मचा दिया।”
The powerplay was where India took the game away from them.
Ishan Kishan in the first innings, and the clinical bowling we saw in the second innings, made all the difference.
We were always in the driver’s seat. India rocked it tonight!🇮🇳
पूर्व भारतीय ऑलराउंडर इरफान पठान का एक खास वीडियो तो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की हार पर चुटकी ली है। मैच खत्म होते ही इरफान पठान ने इंस्टाग्राम पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें वह मशहूर गाने ‘अफगान जलेबी’ पर थिरकते नजर आ रहे हैं। वीडियो के कैप्शन में लिखा, “पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?”
क्रिकेटर युवराज सिंह ने X पर लिखा, “बड़े गेम में बड़े कैरेक्टर की जरूरत होती है और लड़कों ने आज रात वही दिखाया! शांत दिमाग और मजबूती से खत्म करने की भूख एक यूनिट के तौर पर हमने जिस तरह से परफॉर्म किया, उस पर गर्व है! आगे बढ़ते रहो और ऊपर उठते रहो।”
Big games demand big character and the boys showed exactly that tonight! Calm heads and the hunger to finish strong 👏🏻 Proud of the way we delivered as a unit! Onward and upward. 🇮🇳🏏@BCCI#ICCMensT20WorldCup2026#IndVSPak
दूसरी ओर पाकिस्तान में निराशा स्पष्ट थी। पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन मोहसिन की आलोचना करते हुए प्रशासनिक ढाँचे पर सवाल उठाए। उनका मानना था कि क्रिकेट की समझ रखने वाले लोगों को शीर्ष पदों पर होना चाहिए, तभी टीम का प्रदर्शन सुधर सकता है।
गुस्से में शोएब अख्तर ने नकवी को जाहिल और पद के लिए अयोग्य तक बताया। उन्होंने भारतीय न्यूज चैनलों से बात करते हुए अपना रोष प्रकट किया। उन्होंने कप्तान बाबर आजम के प्रदर्शन पर भी टिप्पणी की और टीम चयन व नेतृत्व को लेकर नाराजगी जाहिर की।
एबीपी न्यूज पर बात करते हुए अख्तर ने माना है कि क्रिकेट नहीं जानते, PCB के चेयरमैन बन गए हैं, इस कारण पाकिस्तान टीम का यह हाल हो रहा है। शोएब अख्तर ने कहा, “एक आदमी जिसे कुछ नहीं पता, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का चेयरमैन (मोहसिन नकवी) बन गया है, आप क्या कर सकते हैं? टीम कैसे चलेगी? आपने एक ऐसे खिलाड़ी (बाबर आजम) को सुपरस्टार बना दिया है जो आपको एक भी मैच नहीं जिता सकता। दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है नाकाबिल और जाहील आदमी को बड़ा काम देना।”
شعیب اختر نے انڈین چینل پر بیٹھ خوف کے بت توڑ دیے۔
کہا کہ محسن نقوی جیسے incompetent اور جاہل لوگوں نے پاکستان کے سب اداروں کی تباہی پھیر دی ہے۔ pic.twitter.com/Lij3DXugGk
पाकिस्तानी फैन्स की उम्मीदें टूटीं, विराट कोहली जैसे कप्तान की रखी माँग
पाकिस्तानी समर्थकों में भी गहरी निराशा दिखी। कई प्रशंसकों ने टीम की रणनीति, तैयारी और मानसिक मजबूती पर सवाल उठाए। कुछ ने भारतीय टीम की तारीफ करते हुए स्वीकार किया कि मौजूदा समय में भारत हर विभाग में बेहतर दिख रहा है।
फैन्स का मानना है कि टीम को राजनीति और आंतरिक विवादों से दूर रहकर पेशेवर तैयारी पर ध्यान देना होगा। तेज गेंदबाजी और ऑलराउंड प्रदर्शन के सामने पाकिस्तान के बल्लेबाजों की कमजोरी उजागर हुई।
एक ने कहा, “एकतरफा मैच था, अगर पाकिस्तान की अवाम बाबर आजम को किंग समझती है, तो उन्हें किंग की तरह बनना चाहिए, उन्हें विराट कोहली जैसा बनना चाहिए। विराट कोहली अगर आजम की जगह होते तो यह मैच इंडिया को आसानी से जिता देते। बाबर आजम किंग नहीं हैं और टीम में जगह पाने के लायक नहीं हैं। यह कोई टीम नहीं है, बस इधर-उधर से आए कुछ खिलाड़ियों का जमावड़ा है।”
#WATCH | Colombo, Sri Lanka: Maqbool, a fan of the Pakistan cricket team, says, "I think it has become a routine matter now. I was a little hopeful that we would win the match and at least give a fight. But it is like a routine matter. We do not have answers to Bumrah. We cannot… https://t.co/PueQP4FwKepic.twitter.com/9ozcy1bd4R
एक मकबूल नाम के फैन ने कहा, “मुझे थोड़ी उम्मीद थी कि हम मैच जीतेंगे और कम से कम कड़ी टक्कर देंगे। लेकिन यह तो एक आम बात हो गई है। हमारे पास बुमराह का कोई जवाब नहीं है। हम हार्दिक का सामना नहीं कर सकते। यही हाल है। हमेशा की तरह, टीम इंडिया ने शानदार प्रदर्शन किया। अगर इसी तरह का प्रदर्शन जारी रहा, तो हम भारत को नहीं हरा सकते। भारतीय टीम बहुत अच्छी है। और हम इस बात को स्वीकार करते हैं।”
बुरी तरह हारने का पाकिस्तान का रहा है इतिहास
गौरतलब है कि T20 वर्ल्ड Cup के इतिहास में भारत और पाकिस्तान के मैच हमेशा खास रहे हैं, हर बार पाकिस्तान का दावा रहता है कि वो पूरी तैयारी के साथ हैं, लेकिन हर बार उन्हें फजीहत झेलनी पड़ती है। अब तक दोनों टीमों के बीच कुल 9 मुकाबले खेले गए हैं, जिनमें से भारत ने 8 में जीत दर्ज की है।
इनमें एक मुकाबला ऐसा भी रहा, जिसमें परिणाम सुपर ओवर से तय हुआ और वहाँ भी भारत ने दबाव में बेहतर प्रदर्शन करते हुए बाज़ी अपने नाम की। यह दर्शाता है कि करीबी परिस्थितियों में भी भारतीय टीम मानसिक मजबूती और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में सफल रही है। दूसरी ओर, पाकिस्तान को इस टूर्नामेंट में भारत के खिलाफ केवल एक जीत हासिल हुई है-वह भी 2021 में।
सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में तेजी से फैल रहे ‘म्यूल अकाउंट्स’ के तेजी से बढ़ते नेटवर्क का पता लगाया है। जाँच एजेंसियों का मानना है कि हो सकता है इंटरनेशनल स्कैम सिंडिकेट के जरिए देश विरोधी गतिविधियों में लगे अलगाववादियों और आतंकियों तक ये पैसा पहुँच रहा हो।
न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, पिछले 3 सालों में पूरे क्षेत्र में 8000 से ज्यादा खातों की ऐसे खातों की पहचान कर उन्हें फ्रीज किया गया। अधिकारी अब ये जानने में लगे हैं कि इन अकाउंट्स से आने वाला पैसा आखिरकार किस-किस को मिला।
क्या है ‘म्यूल अकांउट’
म्यूल अकाउंटस साइबर क्राइम की सबसे कमजोर, लेकिन बेहद जरूरी हिस्सा होते हैं। इनके बिना अपराधियों को चोरी के फंड को क्रिप्टोकरेंसी जैसे अनट्रेसेबल डिजिटल एसेट्स में बदलना मुश्किल होता है। सेंट्रल सिक्योरिटी एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर पुलिस और दूसरी एजेंसियों को इन अकाउंट्स को बैंकों के साथ मिलकर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
एजेंसी उन बिचौलियों को भी ट्रैक करने में लगी है, जिन्हें ‘म्यूलर’ कहा जाता है। ये पूरी धोखाधड़ी में अहम रोल निभाते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, 2017 में एनआईए ने जम्मू कश्मीर में गैर-कानूनी फाइनेंशियल फ्लो को रोकने के लिए सख्ती दिखाई, तो इनलोगों ने अपना तरीका बदल लिया और कथित तौर पर ‘डिजिटल हवाला’ का रास्ता अपनाया
एजेंसियाँ लगातार म्यूलर की तलाश कर रही हैं। पारंपरिक तरीकों से अलग ‘डिजिटल हवाला’ देश विरोधी नेटवर्क का नया तरीका है। म्यूलर सीधे ठगी करने के लिए लोगों से संपर्क नहीं करता और न ही किसी तरह का लिंक भेजता है। लेकिन वह ऐसे खातों की व्यवस्था करता है, जिसमें ठगी किए गए रकम सीधे जाएँ या ट्रांसफर किए जाएँ।
सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि भले ही म्यूल अकाउंट धारक सीधे ठगी नहीं करते, लेकिन वे मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल माने जाएँगे। ज्यादातर ऐसे खाते आम लोगों के नाम पर होते हैं। इन्हें पैसों का लालच दिया जाता है और इनके खातों का इस्तेमाल किया जाता है। उनलोगों से ऑनलाइन बैंकिंग समेत खाते की जानकारी लेकर कहा जाता है कि ये खाते अस्थाई रूप से ‘पार्किंग अकाउंट’ की तरह इस्तेमाल होगा। लेकिन ये खाते साइबर ठगी का पैसा इधर से उधर करने में इस्तेमाल किया जाता है।
दरअसल आसान कमाई का लालच देकर आम लोगों को झाँसे में लिया जाता है और ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाता है, जिससे ट्रांसनेशनल क्राइम नेटवर्क फलते-फूलते हैं।
एजेंसी ने एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक, स्कैम का पूरा इकोसिस्टम इन अकाउंट्स पर निर्भर करता है। पैसे के लिए कोई अकाउंट न होने पर, स्कैम पहले ही स्टेप में फेल हो जाता है। इसलिए जो लोग अपने अकाउंट किराए पर देते हैं, वे सिर्फ हालात के शिकार नहीं होते, बल्कि वे क्राइम के इंजन की तरह हैं।
जाँच में यह भी सामने आया है कि एक ठग एक वक्त पर 10 से 30 म्यूल खातों का इस्तेमाल कर सकता है। कई बार शेल कंपनियों के नाम का भी खाता खोलने में इस्तेमाल किया जाता है। एक दिन ये 40 लाख रुपए तक की लेने देन करने में इन शेल कंपनियों के खातों का इस्तेमाल किया जाता है। पैसे को कई खातों में तेजी से भेजा जाता है और छोटी-छोटी किश्तों में भेजा जाता है, ताकि एजेंसियों की नजर से बचा जा सके।
प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट बनाने के लिए कहा जाता है
सेंट्रल एजेंसियों की एक पूरी स्टडी से यह भी पता चला है कि चीन, मलेशिया, म्यांमार और कंबोडिया जैसे देशों में लोग कथित तौर पर केंद्र शासित प्रदेश में नए लोगों को प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट बनाने के लिए कह रहे हैं।
ये वॉलेट अक्सर डिजिटल फुटप्रिंट को छिपाने के लिए वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं और आमतौर पर इसके लिए केवाईसी वेरिफिकेशन की जरूरत नहीं होती है।
जम्मू कश्मीर पुलिस ने पूरे कश्मीर घाटी में वीपीएन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, क्योंकि इसका इस्तेमाल आतंकवादी अपनी पहचान छुपाने के लिए करते हैं।
महाशिवरात्रि का पावन पर्व भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह उस शिव चेतना का उत्सव है, जो सृष्टि के प्रत्येक कण में व्याप्त है। शिव, भारत की संस्कृति में देवता होने के साथ-साथ उस दार्शनिक सत्य की बात करते हैं, जो भारतीय मनीषा की आधारशिला रहा है। शिव भारत की संस्कृति के आवश्यक तत्व इसलिए हैं, क्योंकि वह भारत के जीवन दर्शन के प्रतीक हैं। आज जब दुनिया भौतिकता की अंधी दौड़ में भाग रही है, तब शिव का चिंतन आधुनिक पीढ़ी को वह दिशा दे सकता है, जिसकी उसे सर्वाधिक आवश्यकता है।
शिव की उपस्थिति भारतीय उपमहाद्वीप में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सभ्यता तक देखी जा सकती है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति’ मुद्रा, जिसमें एक आकृति योग मुद्रा में तीन मुख वाले और पशुओं से घिरी हुई है, शिव के आदिस्वरूप की ओर संकेत करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि शिव की उपासना 5000 वर्षों से भी अधिक समय से भारत में प्रचलित है। शिव के प्रत्येक रूप नटराज, दक्षिणामूर्ति, भैरव, रुद्र, शंकर, महाकाल, और अर्धनारीश्वर का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व है।
नटराज के रूप में शिव तांडव नृत्य करते हैं, जो सृष्टि के सृजन और संहार का प्रतीक है। दक्षिणामूर्ति के रूप में शिव मौन गुरु हैं, जो ज्ञान का संचार करते हैं। अर्धनारीश्वर के रूप में शिव पुरुष और स्त्री के पूरक स्वरूप को दर्शाते हैं। भैरव के रूप में शिव काल के भी काल हैं। ये सभी रूप हमें जीवन की नश्वरता और समय की महत्ता का बोध कराते हैं।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शिव की पूजा की अलग-अलग परंपराएँ हैं। किन्तु आज के दौर में शिव की आराधना करने के साथ-साथ, हमें शिव तत्व से बहुत कुछ सीखने की भी आवश्यकता है।
आज की पीढ़ी त्वरित संतुष्टि की आदी हो गई है। सोशल मीडिया, OTT प्लेटफॉर्म, फास्ट फूड, रील कल्चर ने इस पीढ़ी को घेर रखा है। इस भागदौड़ में शिव का जीवन हमें संयम और आत्म-नियंत्रण का पाठ सिखाता है। वे हजारों वर्षों तक ध्यान में लीन रहे। उन्होंने विष को कंठ में रोक लिया। उन्होंने भस्म को अंगारे में बदल दिया। यह सब आत्म-नियंत्रण के अद्भुत उदाहरण हैं।
आज की पीढ़ी को यह सीखना चाहिए कि जीवन में सफलता के लिए धैर्य और संयम आवश्यक हैं। त्वरित संतुष्टि क्षणिक सुख देती है, लेकिन स्थायी संतोष नहीं। शिव की तरह हमें भी अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सीखना चाहिए।
शिव विरोधाभासों से भरे हैं – वे योगी भी हैं और भोगी भी; गृहस्थ भी हैं और संन्यासी भी; विनाशक भी हैं और पुनर्निर्माता भी। आधुनिक जीवन भी विरोधाभासों से भरा है। करियर और परिवार के बीच संतुलन, निजी और सार्वजनिक जीवन में सामंजस्य, पारंपरिक मूल्यों और आधुनिकता के बीच तालमेल – ये सभी चुनौतियाँ हैं।
शिव हमें सिखाते हैं कि विरोधाभासों को दूर करने की आवश्यकता नहीं, उन्हें स्वीकार करना और उनमें संतुलन बनाना सीखना चाहिए। जीवन के विभिन्न पहलुओं को एक-दूसरे का विरोधी न मानकर पूरक मानना चाहिए।
आज की पीढ़ी भौतिक सुख-सुविधाओं को ही जीवन का लक्ष्य मान बैठी है। बड़ा घर, महंगी कार, ब्रांडेड कपड़े, नवीनतम गैजेट्स – यही सफलता के पैमाने बन गए हैं। शिव का साधारण जीवन, उनकी भस्म रमाने की आदत, उनका कैलाश पर निवास – ये सब हमें बताते हैं कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं बल्कि आंतरिक संतोष में है।
शिव को ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है। वे सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं। रावण जैसे राक्षस ने भी जब उनकी आराधना की, तो उन्हें वरदान दिया। समुद्र मंथन में निकले विष को पीकर उन्होंने समस्त सृष्टि की रक्षा की। यह उनकी असीम करुणा का प्रतीक है।
आज की पीढ़ी में करुणा और क्षमा का भाव कम होता जा रहा है। प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में हम एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि सच्ची महानता करुणा और क्षमा में है। दूसरों की गलतियों को क्षमा करना, उनके प्रति सहानुभूति रखना, ये मानवीय गुण ही हमें सच्चा सुख दे सकते हैं।
शिव ध्यान में लीन रहते हैं। वे अपनी आंतरिक यात्रा में व्यस्त रहते हैं। आज का युवा बाहरी दुनिया में इतना खो गया है कि अपने भीतर झांकने का समय ही नहीं है। हम रोज़ सैंकड़ों लोगों से मिलते हैं, लेकिन कभी स्वयं से नहीं मिल पाते। सोशल मीडिया पर लाइक और कमेंट्स की संख्या उसकी पहचान बन गई है। शिव हमें सिखाते हैं कि सच्ची शांति और संतोष बाहर नहीं, भीतर है।
आज की पीढ़ी को ध्यान और आत्म-चिंतन का महत्व समझना चाहिए। प्रतिदिन कुछ समय मौन में बैठना, अपने विचारों को देखना, अपने जीवन के लक्ष्यों पर विचार करना – यह आदत ही उन्हें सच्ची सफलता दिला सकती है।
शिव का निवास हिमालय है, जो प्रकृति का सबसे सुंदर और शक्तिशाली रूप है। उनके गले में सर्प है, शरीर पर भस्म, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा। ये सभी प्रकृति के तत्व हैं। शिव और प्रकृति का अटूट संबंध है।
आज पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता का ह्रास – ये सब मानव की प्रकृति के प्रति लापरवाही के परिणाम हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करना, उसके साथ सामंजस्य बनाकर रहना ही जीवन का सच्चा मार्ग है। शिव की पूजा में बेलपत्र, धतूरा, आक, गंगाजल का उपयोग – ये सब प्रकृति से हमारे जुड़ाव को दर्शाते हैं।
शिव सबको अपनाते हैं – देवता भी, असुर भी; साधु भी, व्याध भी; विद्वान भी, अज्ञानी भी। उनके गणों में भूत-प्रेत, पिशाच, नाग-यक्ष सभी शामिल हैं। यह शिव की समावेशिता को दर्शाता है।
आज के समाज में विभाजन की भावना बढ़ रही है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के नाम पर लोग बँट रहे हैं। शिव का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि विविधता में एकता ही सृष्टि का मूल सिद्धांत है। सभी को समान रूप से अपनाना, किसी से भेदभाव न करना – यही शिव का संदेश है।
शिव के जीवन में अनेक असफलताएँ आईं – उनकी पत्नी सती ने स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया, उनके पुत्र गणेश ने उन्हें ही अपने घर में प्रवेश नहीं दिया, उन्होंने कामदेव को भस्म किया जिससे प्रेम का लोप हो गया। लेकिन हर असफलता से उन्होंने कुछ सीखा और आगे बढ़े।
आज की पीढ़ी असफलता से घबराती है। थोड़ी सी असफलता उन्हें तोड़ देती है। शिव हमें सिखाते हैं कि असफलता अंत नहीं, एक नई शुरुआत है। हर असफलता से कुछ सीखना और आगे बढ़ना ही जीवन है।
महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर हम शिव के उस स्वरूप का स्मरण करते हैं जो भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। शिव हमें सिखाते हैं कि जीवन में संयम और आनंद दोनों के लिए स्थान है, कि विरोधाभासों को स्वीकार करना ही जीवन की सच्ची कला है, कि भौतिकता से परे भी कुछ है, जिसके लिए जीना चाहिए।
आज की पीढ़ी को शिव से यह सीखना चाहिए कि सच्ची सफलता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, आंतरिक शांति में है। सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं, आत्म-संतोष में है। सच्ची शक्ति दूसरों को दबाने में नहीं, उन्हें अपनाने में है।
शिव का संदेश सार्वभौमिक है, जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है। चाहे वह प्राचीन भारत का ऋषि हो या आधुनिक युग का युवा, शिव का चिंतन सबके लिए प्रासंगिक है। महाशिवरात्रि का यह पर्व हमें उसी चिंतन का अवसर प्रदान करता है – अपने भीतर झाँकने, अपने जीवन का मूल्यांकन करने, और शिव के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का।
उत्तरप्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन गया है। यहाँ उत्सव होते हैं और कानून व्यवस्था तुरुस्त होने से गुंडा टैक्स, अवैध वसूली खत्म हो गई है। ये कहना है यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का। आँकड़े भी उनकी बातों को सही ठहराते हैं।
सीएम योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान कहा कि यूपी अब आस्था और विकास के संतुलन का मॉडल बन गया है। राज्य अब दंगों की जगह मंदिर प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर आगे बढ़ रह है।
मेलों में जुटे अपार श्रद्धालु
प्रयागराज का माघ मेला 2026 का सफल आयोजन हुआ जिसमें अब तक के कई बड़े आयोजनों को पीछे छोड़ दिया। 2013 के कुंभ मेले में 12 करोड़ श्रद्धालु शामिल हुए थे, लेकिन अब माघ मेले में 21 करोड़ श्रद्धालु आए। प्रयागराज के कुंभ मेला 2025 ने तो सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। इस मेले में करीब 66 करोड़ श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा में डुबकी लगाई। इस महाआयोजन की सफलता ने योगी सरकार के प्रति जनता में विश्वास भरा और माघ मेले में रिकॉर्ड तोड़ श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाने पहुँचे।
आँकड़ों की बात करें तो 2020 के माघ मेले में 4 करोड़, 2022 के माघ मेले में 4.30 करोड़, 2023 के माघ मेले में 9 करोड़ श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई। लेकिन माघ मेला 2026 में कई गुणा ज्यादा लोग पहुँचे। सिर्फ मौनी अमावस्या पर रिकॉर्ड 20 लाख श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। बसंत पंचमी के दिन 3.56 लाख लोग संगम में स्नान के लिए पहुँचे, माघी पुर्णिमा के दिन श्रद्धालुओं का आँकड़ा 21 करोड़ पार कर गया।
महाशिवरात्रि पर अंतिम स्नान के दिन करीब 1.5 करोड़ लोगों के संगम नगरी में आने और स्नान करने का अंदाज प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने लगाया है। इसके लिए घाटों की लंबाई बढ़ाई गई, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए।
मंदिरों की बात की जाए तो योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में अयोध्या का भव्य राममंदिर का निर्माण, अयोध्या में दूसरे मंदिरों और घाटों का विकास किया गया। इसके दर्शन करने करोड़ों लोग अब तक आ चुके हैं। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण हुआ जिससे श्रद्धालुओं की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई। संभल में 54 से ज्यादा मंदिरों की पहचान की गई है, जिसे विकसित किए जाएगा।
मऊ में 61 फीट ऊँची महादेव की मूर्ति और कॉरिडोर बनाया गया है। जिस जगह पर कॉरिडोर बनाया गया है, वहाँ कभी कचरे का ढेर हुआ करता था। लेकिन अब खूबसूरत गुलाबी पत्थरों से घाटों का सौंदर्यीकरण किया गया है। भगवान भोले की 61 फीट ऊँची प्रतिमा हर किसी का ध्यान खींचती है। दरअसल योगी राज में राज्य में करीब 300 पुराने मंदिरों का पुनर्निर्माण किया गया है। यही वजह है कि सीएम योगी ने विधानसभा में कहा कि यूपी अब उत्सव राज्य बन गया है। राज्य में पर्यटन को विकसित करने के लिए योगी सरकार ने 150 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।
2017 से कोई सांप्रदायिक दंगा राज्य में नहीं हुआ
उत्तर प्रदेश में दंगों का इतिहास रहा है। 1978 का संभल का दंगा, 1980 का मुरादाबाद का दंगा, 2006 का अलीगढ़ दंगा, 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा, 2016 का बिजनौर हिंसा अहम हैं। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में इनमें से ज्यादातर दंगे हुए। लेकिन 2017 में योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार बनने के बाद राज्य में एक भी दंगा नहीं हुआ।
सीएम योगी ने इसकी चर्चा करते हुए विधानसभा में कहा कि यूपी में अब ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति है। गुंडाराज खत्म हो गया है। समाजवादी पार्टी के शासन काल में यूपी को लोग संदेह की दृष्टि से लोग देखते थे, प्रदेश की छवि काफी खराब थी, लेकिन अब राज्य का तेजी से विकास हुआ है और ‘बीमारू’ राज्य से ऊपर उठकर अब यूपी तेज विकास करने वाला राज्य बन गया है। अब यूपी गुंडा टैक्स, वसूली से मुक्त है। अब यूपी में ना कर्फ्यू है ना दंगा है, सब चंगा है।
महिलाएँ और व्यापारी भयमुक्त हुए- सीएम योगी
सीएम योगी ने विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान कहा कि एक वक्त था जब घर की बिटिया बाहर जाने के नाम से घबराती थी, व्यापारी अपना कारोबार समेट कर राज्य से बाहर जा रहे थे। 2017 से पहले राज्य में अपराधी अपनी समानांतर सरकार चला रहे थे, माफिया खुला घूमते थे। लेकिन, अब राज्य में कानून व्यवस्था ऐसी हो गई है कि महिलाएँ खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं, व्यापारी अपना कारोबार शुरू करने में हिचक नहीं रहे हैं। दरअसल गुंडा टैक्स जैसी सभी तरह की रंगदारी सरकार ने रोक दी है।
विगत 8 वर्षों में उत्तर प्रदेश पुलिस बल में 2,19,000 पुलिस कार्मिकों की भर्ती संपन्न की गई है, जिसमें 20 प्रतिशत महिला आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।
आज उत्तर प्रदेश पुलिस बल में 44,000 से अधिक महिला पुलिस कार्मिक अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं।
सीएम योगी के शासन के दौरान 219000 से अधिक पुलिसकर्मियों की भर्ती की गई है। इनमें से 20 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए अनिवार्य किए गए। 2017 से पहले जब उत्तर प्रदेश पुलिस बल में 10,000 महिला पुलिसकर्मी थीं लेकिन पिछले 9 वर्षों में उनकी संख्या बढ़ कर 44,000 हो गई है।
सीएम योगी ने कहा है कि राज्य ट्रिपल टी यानी टेक्नोलॉजी, ट्रस्ट और ट्रांसफोर्मेशन का प्रतीक है और सामूहिक प्रयास से सुशासन राज्य में स्थापित हुआ है।
गुजरात के कई शहरों में कुछ मुस्लिम परिवार हिंदू बहुल इलाकों में ऊँची कीमत पर घर खरीदकर बस जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे और लोग भी उसी इलाके में बसने लगते हैं। सालों में ये घटनाएँ कभी-कभी हिंसक रूप भी ले लेती हैं और वहाँ की मूल हिंदू आबादी प्रभावित होने लगती है। उत्पीड़न, असुविधाजनक परिस्थितियों या अन्य कारणों से मूल हिंदू धीरे-धीरे अपने इलाके छोड़ने लगते हैं, जिससे जनसांख्यिकीय बदलाव का खतरा पैदा होता है।
इस समस्या से निपटने के लिए गुजरात में एक विशेष कानून है, जिसे ‘अशांतधारा’ कहा जाता है। यह कानून राज्य के कई शहरों में पहले ही लागू हो चुका है। भावनगर शहर के कई इलाकों में भी इसे लागू किया गया है, लेकिन जिले के अन्य गाँवों और तालुकों में यह समस्या अभी भी बनी हुई है। भावनगर का महुवा इलाका सबसे संवेदनशील माना जाता है।
महुवा शहर में भी अब अशांतधारा लागू करने की माँग उठ रही है। हिंदू संगठनों का आरोप है कि हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम समुदाय के लोगों को घर दिए जा रहे हैं, जिसके कारण इलाके की जनसंख्या में तेजी से बदलाव आ रहा है।
पहले महुवा के सुखड़िया शेरी, खत्री शेरी, चाकुभाई नो खानचो, नगरवाड़ा, सेठ शेरी, नवा झम्पा और गोल बाजार जैसे इलाके पूरी तरह से हिंदू समुदाय से आबाद थे। वहाँ नवरात्रि, होली, दिवाली जैसे त्योहार धूमधाम से मनाए जाते थे। लेकिन अब इन इलाकों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के कारण हिंदू धीरे-धीरे इन क्षेत्रों से पलायन कर रहे हैं। इसी वजह से हिंदू संगठनों ने महुवा शहर में अशांतधारा कानून लागू करने की माँग की है।
अशांता कौन है?
गुजरात में 1980 के दशक में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के कारण अशांतधारा अधिनियम की जरूरत महसूस हुई। इस दशक के मध्य में अहमदाबाद, वडोदरा, खेड़ा, भरूच और सूरत जैसे शहरों में सांप्रदायिक दंगे भड़के और सबसे ज्यादा नुकसान हिंदू समुदाय को हुआ। कई हिंदू अपने घर छोड़कर पलायन करने को मजबूर हुए।
खाली पड़े इलाकों में मुस्लिम समुदाय की आबादी तेजी से बढ़ने लगी। इस दौरान कुछ मुस्लिम असामाजिक तत्व डरे हुए हिंदू नागरिकों से उनकी संपत्ति कम कीमत पर बेचने के लिए दबाव डाल रहे थे और उन संपत्तियों को खरीदकर तनाव और बढ़ा रहे थे।
इसी स्थिति को रोकने के लिए गुजरात सरकार ने 1986 में पहला ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ पेश किया, जो अध्यादेश के रूप में तुरंत लागू हो गया। इस कानून का मकसद अशांत क्षेत्रों में संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगाना था, ताकि हिंदू नागरिक इस समस्या से सुरक्षित रहें और जनसंख्या में अचानक बदलाव के खतरे को रोका जा सके।
लेकिन इस प्रारंभिक कानून में कई कमियाँ थीं, जैसे इसको सीमित समय में अमल में लाना और कई अन्य कानूनी खामियाँ। इन कारणों से कई अनियमित संपत्ति लेन-देन होने लगे।
इसी वजह से 1991 में इस कानून को निरस्त कर इसे और मजबूत बनाया गया और नया कानून ‘गुजरात अशांत क्षेत्र अधिनियम, 1991’ लागू किया गया। यह कानून स्थायी था और राज्य सरकार को बिना किसी अतिरिक्त आवश्यकता के किसी भी क्षेत्र को अशांत क्षेत्र घोषित करने का अधिकार देता था। इसका मुख्य कारण 1990 के दशक की शुरुआत में हुए दंगे थे, जिनमें संपत्तियों की अनियमित बिक्री से जनसंख्यात्मक बदलाव हुआ और हिंदू समुदाय पलायन करने लगा।
आगे चलकर 2019 में गुजरात विधानसभा ने इस कानून में महत्वपूर्ण संशोधन किए, जिन्हें 2020 में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने मंजूरी दी। इन संशोधनों के तहत कलेक्टर को विशेष शक्तियाँ दी गईं, जैसे कि इलाके में ध्रुवीकरण, अनुचित समूहीकरण और जनसंख्या परिवर्तन की जाँच करना। इनका उद्देश्य पुराने कानून की खामियों को दूर करना था, क्योंकि पहले लोग पावर ऑफ अटॉर्नी या अन्य तरीकों से संपत्ति हस्तांतरित कर कानूनी लूपहोल का फायदा उठा लेते थे।
हालाँकि, जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे इस्लामी संगठनों ने इन संशोधनों के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इसके बाद जनवरी 2021 में हाई कोर्ट ने इन संशोधनों पर रोक लगा दी। 2023 में राज्य सरकार ने इन संशोधनों को वापस लेने का फैसला किया और नए संशोधनों की तैयारी शुरू की। वर्तमान में केवल मूल 1991 का कानून और कुछ पुराने संशोधन ही लागू हैं।
कानून के बुनियादी तत्व और प्रावधान
गुजरात के अशांत क्षेत्र अधिनियम के कुछ विशेष प्रावधान इसे अन्य कानूनों से अलग और प्रभावी बनाते हैं। धारा 3 के अनुसार, राज्य सरकार किसी शहर या गाँव के क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकती है, कलेक्टर की सूचना और जाँच के आधार पर। इस अधिसूचना के जारी होने के बाद, उस क्षेत्र में संपत्ति का कोई भी हस्तांतरण जैसे बिक्री, उपहार, विनिमय, पट्टा या आधिपत्य पत्र कलेक्टर की पूर्व स्वीकृति के बिना अवैध माना जाएगा।
हस्तांतरण के आवेदन में विक्रेता और खरीदार दोनों को हलफनामे के जरिए यह बताना होता है कि बिक्री स्वेच्छा से बिना किसी दबाव, धमकी या जबरदस्ती के की जा रही है और संपत्ति का उचित मूल्य बाजार के अनुसार निर्धारित किया गया है। कलेक्टर बॉम्बे भूमि राजस्व संहिता के अनुसार इस आवेदन की औपचारिक जाँच करते हैं, जिसमें पुलिस, राजस्व विभाग और अन्य एजेंसियों की रिपोर्ट भी शामिल होती है।
यदि कलेक्टर को लगता है कि 1991 अधिनियम की सीमाओं के भीतर यह स्थानांतरण सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है या यह स्वतंत्र सहमति और उचित मूल्य के मानदंडों को पूरा नहीं करता, तो वह आवेदन अस्वीकार कर सकता है। (नोट: 2020 के संशोधन में जोड़े गए ‘जनसांख्यिकीय असंतुलन’ और ‘समूहीकरण’ के आधार पर अस्वीकृति के प्रावधानों पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है, इसलिए ये वर्तमान में लागू नहीं हैं।)
2020 के संशोधन ने ‘हस्तांतरण’ की परिभाषा को व्यापक किया, जिसमें बिक्री समझौता, GPA, नोटरीकृत दस्तावेज और धारा 53ए के तहत कब्जा शामिल है। इसके साथ ही पंजीकरण अधिनियम, 1908 में संशोधन किया गया, जिसके तहत अशांत क्षेत्र में किसी भी संपत्ति दस्तावेज के पंजीकरण के लिए कलेक्टर की स्वीकृति जरूरी है।
दंडात्मक प्रावधान भी कड़े हैं। कानून का उल्लंघन करने वालों को कम से कम 3 से 5 वर्ष की कैद और 1 लाख रुपये या संपत्ति के बाजार मूल्य का 10 प्रतिशत (जो अधिक हो) का जुर्माना हो सकता है। धारा 8 के अनुसार, कलेक्टर या राज्य सरकार का निर्णय अंतिम होगा और इसे किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
अधिनियम में विशेष जाँच दल (SIT) का भी प्रावधान है, जिसे राज्य सरकार बनाती है। इसमें कलेक्टर, पुलिस आयुक्त/SP और नगर आयुक्त जैसे अधिकारी शामिल होते हैं। यह SIT इलाके की स्थिति, जनसंख्या संतुलन, शहरी क्षेत्रों के समूह और संभावित खतरों की जाँच करके कलेक्टर की मदद करती है।
कुल मिलाकर, अधिनियम की संपूर्ण संरचना कलेक्टर के माध्यम से लागू होती है, जबकि उनके निर्णय के खिलाफ अपील राज्य सरकार (राजस्व विभाग) के समक्ष की जाती है। यह लंबी और जटिल प्रक्रिया इसे व्यवहार में अत्यंत कठोर और प्रभावी बनाती है।
अशांत नियम किन परिस्थितियों में लागू होता है?
अशांतधारा अधिनियम को लागू करने की पूरी प्रक्रिया तनावपूर्ण स्थिति, दंगे, हिंसा या लंबे समय से चल रहे सांप्रदायिक असंतुलन जैसे कारकों पर निर्भर करती है। अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, कलेक्टर और पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार किसी क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करती है। आम बोलचाल में लोग कहते हैं कि कलेक्टर ने क्षेत्र को अशांत घोषित किया है, लेकिन आधिकारिक अधिसूचना राज्य सरकार द्वारा ही जारी की जाती है।
यदि किसी क्षेत्र में पहले से सांप्रदायिक तनाव रहा हो या भविष्य में अशांति की संभावना हो, तो उस क्षेत्र पर अशांतधारा नियम लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, 2002 के दंगों के बाद अहमदाबाद के जुहापुरा, सरखेज और गोमतीपुर जैसे कई क्षेत्र अशांत घोषित किए गए, ताकि भय या दबाव में संपत्ति की खरीद-बिक्री को रोका जा सके।
अधिसूचना राज्य सरकार के राजपत्र में प्रकाशित की जाती है और इसकी अवधि आमतौर पर 5 साल निर्धारित होती है, जिसे स्थिति के अनुसार बढ़ाया जा सकता है। हाल ही में आनंद जिले के कुछ क्षेत्रों में इस अधिनियम की अवधि 5 साल के लिए बढ़ाई गई और यह राजपत्र में प्रकाशित भी की गई।
अशांत क्षेत्र घोषित होने के बाद, कलेक्टर की अनुमति के बिना उस क्षेत्र में किसी भी संपत्ति का हस्तांतरण कानूनी रूप से अमान्य होता है। कलेक्टर विक्रेता और खरीदार के आवेदन, उनके हलफनामे, पुलिस रिपोर्ट, पड़ोसियों के बयान और राजस्व दस्तावेजों की जाँच करता है। 1991 के अधिनियम के अनुसार, कलेक्टर की मुख्य जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि खरीदार की सहमति स्वतंत्र हो और संपत्ति का उचित बाजार मूल्य तय किया गया हो।
हालाँकि, 2020 के संशोधन में जोड़े गए जनसांख्यिकीय संतुलन में गिरावट और अनुचित समूहीकरण जैसे आधार हाई कोर्ट के स्थगन आदेश के कारण वर्तमान में लागू नहीं हैं। इसलिए आज कलेक्टर केवल 1991 के पारंपरिक मानदंडों के आधार पर ही हस्तांतरणों का निर्णय ले सकते हैं।
राज्य सरकार की पुनर्वास योजनाओं को इस कानून से छूट दी गई है, ताकि हिंसा से विस्थापित लोगों के लिए नई बस्तियों में संपत्ति को देना आसान रहे।
हाल के मामलों में भी इस कानून का असर देखा गया है। उदाहरण के लिए, सूरत में एक मुस्लिम महिला ने बिना अनुमति के संपत्ति खरीदी थी, जिसे कलेक्टर ने जब्त कर लिया क्योंकि यह हस्तांतरण अधिनियम के खिलाफ था। ऐसी स्थिति में संपत्ति या तो विक्रेता को वापस कर दी जाती है या कलेक्टर की हिरासत में रखी जाती है।
यह कानून वर्तमान में किन क्षेत्रों में लागू है?
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, गुजरात के कई जिलों में अशांतधारा कानून लागू है और राज्य सरकार समय-समय पर इसकी सूची अपडेट करती रहती है। अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, भरूच, पंचमहल, आनंद, नर्मदा, गोधरा, भावनगर, अमरेली और अन्य शहरों के कई क्षेत्रों को इस कानून के तहत घोषित किया गया है।
अहमदाबाद शहर के अधिकांश क्षेत्र इस अधिनियम के अंतर्गत आते हैं। सूची समय-समय पर बदलती रहती है, लेकिन जुहापुरा, मेघानीनगर, ओधव, गोमतीपुर, दानिलिम्दा, सरखेज-जमालपुर-कंकरिया जैसे क्षेत्र कई वर्षों से अशांतधारा के अंतर्गत हैं। हाल ही में अहमदाबाद के पश्चिमी हिस्से के वस्त्रपुर, थलतेज और बोडकदेव जैसे नए क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया और इसके लिए सार्वजनिक अधिसूचना जारी की गई।
यह अधिनियम सूरत, वडोदरा और आनंद जैसे जिलों के कई क्षेत्रों में भी लागू है। हाल ही में, आनंद शहर और जिले के कुछ क्षेत्रों का कार्यकाल 5 साल के लिए बढ़ा दिया गया क्योंकि जिला प्रशासन ने स्थिति को स्थिर नहीं माना।
अशांत क्षेत्र घोषित करने और संपत्ति हस्तांतरण की अनुमति देने की पूरी प्रक्रिया जिला कलेक्टर, पुलिस कमिश्नर/SP और राजस्व विभाग की संयुक्त जाँच के तहत होती है। राज्य सरकार अशांत क्षेत्र को बढ़ाने या घटाने के लिए राजपत्र अधिसूचना जारी करती है।
वर्तमान में, विभिन्न अधिसूचनाओं के अनुसार राज्य में 1000 से अधिक क्षेत्र इस कानून के अंतर्गत आते हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव शहरों के पुराने और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में देखा जाता है।
इन क्षेत्रों में सभी संपत्ति लेन-देन कलेक्टर की स्वीकृति के अधीन होते हैं। चूँकि यह प्रक्रिया लंबी और सख्त है, कई लेन-देन अटक जाते हैं या स्वीकृति मिलने में महीनों लग जाते हैं। इसी कारण, अशांतधारा अधिनियम को गुजरात का सबसे सख्त और सीमित रूप से संपत्ति कानून माना जाता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर चल रही सभी अटकलों पर पूर्ण विराम लगा दिया है। मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया कि भारत ने रूस से तेल खरीद पूरी तरह बंद करने का कोई वादा नहीं किया। भारत ने केवल अतिरिक्त रूसी तेल नहीं खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है। यह बयान उन सभी दावों की हवा निकाल देता है जिन्हें भारत का विपक्ष खासकर कॉन्ग्रेस पार्टी महीनों से प्रचारित कर रही थी।
विपक्ष ने दावा किया था कि मोदी सरकार ने अमेरिकी दबाव में घुटने टेक दिए हैं और रूस से तेल आयात रोकने पर सहमति दे दी है। लेकिन रुबियो का बयान इस झूठ की पोल खोलता है और साबित करता है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए अपनी शर्तों पर ही आगे बढ़ रहा है।
यह पूरा प्रकरण ट्रंप प्रशासन की दबाव वाली टैक्टिक्स का एक क्लासिक उदाहरण है। डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में सत्ता संभालते ही भारत पर रूसी तेल आयात रोकने के लिए टैरिफ का हथियार इस्तेमाल किया था। अगस्त 2025 में भारत से आयात पर 50% तक ड्यूटी बढ़ा दी गई थी, जिसका उद्देश्य स्पष्ट था- भारत को रूस से दूरी बनाने पर मजबूर करना।
डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कई बार दावा किया कि भारत ने रूसी तेल रोकने का वादा किया है। लेकिन अब रुबियो का बयान साफ करता है कि भारत ने कोई पूर्ण प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया, बल्कि मौजूदा स्तर पर आयात जारी रखते हुए केवल अतिरिक्त वृद्धि रोकने की बात कही है। यह भारत की कूटनीतिक जीत है, जहाँ दबाव के बावजूद राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया गया।
विपक्ष ने कैसे बनाया झूठा नैरेटिव
जब से भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क की बातें चल रही थीं, कॉन्ग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दल मोदी सरकार पर हमलावर दिख रहे थे। राहुल गाँधी ने कई मंचों से दावा किया कि “अब अमेरिका तय करेगा कि भारत कहाँ से तेल खरीदेगा” और “मोदी जी ने अमेरिकी दबाव में रूसी तेल खरीद बंद करने पर सहमति दे दी है।”
एक रैली में राहुल गाँधी ने कहा था कि ट्रंप के साथ ‘रातों-रात’ डील हुई और मोदी सरकार ने देश की स्वायत्तता बेच दी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह डील किसानों के खिलाफ है, क्योंकि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर ड्यूटी कम होने से भारतीय किसान बर्बाद हो जाएँगे।
कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश तो इस मुद्दे पर सबसे मुखर रहे। उन्होंने कई बार सोशल मीडिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि “ट्रंप ने खुलेआम घोषणा की है कि भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने का वादा किया है, लेकिन मोदी सरकार चुप है”।
रमेश ने इसे ‘सरेंडर’ करार दिया और पूछा कि क्या मोदी जी ने संसद को इसकी जानकारी दी? उन्होंने दावा किया कि व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में स्पष्ट लिखा है कि भारत रूसी तेल आयात रोकने पर सहमत हुआ है।
कॉन्ग्रेस ने इसे ‘राष्ट्रीय आत्मसम्मान पर चोट’ बताया और कहा कि मोदी सरकार अमेरिकी दबाव में झुक गई है। अन्य विपक्षी दलों ने भी यही नैरेटिव दोहराया कि मोदी की ‘हग डिप्लोमेसी’ फेल हो गई और ट्रंप ने भारत को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
ये बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुए, कई मीडिया हाउस ने इन्हें हेडलाइंस बनाया और एक झूठा नैरेटिव तैयार हो गया कि भारत ने रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद कर दिया है। विपक्ष ने इसे मोदी सरकार की ‘कमजोरी’ का प्रतीक बनाया, जबकि असलियत कुछ और थी।
असलियत क्या है: मार्को रुबियो और एस जयशंकर के बयान ने खोली पोल
म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में मार्को रुबियो ने स्पष्ट कहा, “हमारी भारत के साथ बातचीत में हमें उनकी प्रतिबद्धता मिली है कि वे अतिरिक्त रूसी तेल नहीं खरीदेंगे।” रुबियो ने यह भी जोड़ा कि अमेरिका रूस पर नए प्रतिबंध लगा रहा है और यूक्रेन को सहायता दे रहा है, लेकिन भारत के साथ बातचीत और दबाव दोनों जारी रहेंगे।
VIDEO | Germany: “US does not know if Russia is 'serious' about Ukraine peace; has got commitment from India to stop buying additional Russian oil”, says US Secretary of State Marco Rubio (@SecRubio) in Munich.
यहाँ ‘अतिरिक्त’ शब्द सबसे महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि भारत मौजूदा स्तर (लगभग 1.5-2 मिलियन बैरल प्रति दिन) पर रूसी तेल आयात जारी रखेगा, लेकिन उसमें वृद्धि नहीं करेगा। यह कोई पूर्ण बैन नहीं है, बल्कि एक संतुलित समझौता है।
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कॉन्फ्रेंस में दो टूक कहा कि भारत की ऊर्जा नीति राजनीतिक दबाव पर नहीं, बल्कि लागत, उपलब्धता और रणनीतिक हितों पर आधारित है। जयशंकर ने ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ पर जोर देते हुए कहा कि भारत किसी के दबाव में अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। यह बयान विपक्ष के सभी दावों पर पानी फेरता है। भारत ने कभी रूसी तेल पूरी तरह बंद करने का वादा नहीं किया बल्कि यह विपक्ष का फैलाया हुआ झूठ था।
भारत की ऊर्जा जरूरतें: क्यों रूस से सस्ता तेल अपरिहार्य है
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। हमारी दैनिक खपत करीब 5 मिलियन बैरल है, जिसमें से 80-85% आयात पर निर्भर है। रूस से मिलने वाला तेल डिस्काउंटेड रेट पर आता है- कभी-कभी ब्रेंट क्रूड से 20-30 डॉलर प्रति बैरल सस्ता।
यह भारत के लिए महँगाई नियंत्रित करने, ईंधन कीमतें स्थिर रखने और विदेशी मुद्रा बचाने का बड़ा साधन है। अगर भारत रूसी तेल पूरी तरह बंद करता, तो तेल कीमतें आसमान छू लेतीं, जिसका असर आम आदमी की जेब पर पड़ता।
साल 2025 में रूसी तेल आयात पीक पर पहुँचा था (जून में 2.09 मिलियन बैरल/दिन), लेकिन बाद में यह घटकर दिसंबर में सबसे निचले स्तर पर आ गया।
आँकड़ों के अनुसार, 2025-26 में रूस भारत का सबसे बड़ा सप्लायर रहा, लेकिन आयात में कमी बाजार की स्थितियों (कीमतें बढ़ना, अन्य स्रोतों से आपूर्ति) और विविधीकरण की वजह से आई, न कि अमेरिकी दबाव से। भारत ने मिडिल ईस्ट, अमेरिका और वेनेजुएला से भी आयात बढ़ाया है। यह भारत की स्मार्ट नीति है-किसी एक स्रोत पर निर्भर न रहना।
ट्रंप की दबाव टैक्टिक्स और भारत का मजबूत स्टैंड
ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ को हथियार बनाया हुआ है। 2025 में भारत पर 50% ड्यूटी लगाकर दबाव डाला गया कि रूसी तेल रोकें, वरना ट्रेड डील नहीं। ट्रंप ने खुद कई बार दावा किया कि भारत सहमत हो गया है। लेकिन भारत ने अपनी शर्तों पर डील की, जिसमें टैरिफ 18% तक कम हो गया।
यही नहीं, अमेरिका ने 25% की अतिरिक्त पेनल्टी भी हटा ली। इसके बावजूद भारत ने रूसी तेल पर पूरा बैन नहीं लगाया। सहमति सिर्फ इतने पर दी कि वो रूस से और ज्यादा तेल नहीं खरीदेगा, बल्कि जितना तेल आ रहा है, उतनी मात्रा में तेल अपनी जरूरत के हिसाब से जरूर लेता रहेगा। यह मोदी सरकार की कूटनीति की जीत है। भारत ने दिखाया कि वह दबाव में नहीं झुकता, बल्कि राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।
हालाँकि विपक्ष ने ट्रंप के बयानों को आधार बनाकर मोदी सरकार को कमजोर दिखाने की कोशिश की, लेकिन रुबियो का ताजा बयान साबित करता है कि भारत अपनी स्वायत्तता पर कायम है। रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने भी कहा कि ट्रंप के अलावा किसी ने भारत के पूर्ण रोकने का दावा नहीं किया।
भारत अपनी शर्तों पर चलता है, विपक्ष का प्रोपगैंडा फेल
मार्को रुबियो का बयान इस पूरे प्रकरण की सच्चाई उजागर करता है। विपक्ष ने राजनीतिक लाभ के लिए झूठ फैलाया, मोदी सरकार को अमेरिका के सामने झुकने वाला दिखाया, लेकिन असलियत में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को बरकरार रखा। यह मोदी सरकार की मजबूत विदेश नीति का प्रमाण है, जहाँ दबाव के बावजूद राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहे।
विपक्ष को अब आईना देखना चाहिए कि वो देशहित के मुद्दों पर झूठ फैलाना बंद करें। भारत आज वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर चलता है और यही उसकी ताकत है।
पिछले कुछ सालों में यह देखा गया है कि पश्चिमी देशों में कुछ असफल या हाशिये पर जा चुके नेता अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने के लिए भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने लगे हैं। ऐसा लगता है कि वे किसी खा वोट बैंक को खुश करने, अपनी कमजोर होती राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने या उन विचारधारा वाले समूहों का साथ देने के लिए ऐसा करते हैं, जो लंबे समय से भारत-विरोधी नैरेटिव पर टिके हुए हैं।
संतुलित वैश्विक चर्चा में भाग लेने के बजाए, ये नेता भारत से जुड़ी घटनाओं को उठाकर एकतरफा या बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। कई बार उनके बयानों में जमीनी हकीकत की पूरी समझ दिखाई नहीं देती, लेकिन फिर भी वे गंभीर आरोप लगाने से पीछे नहीं हटते।
इस क्रम में ताजा उदाहरण ब्रिटेन के लेस्टर से पूर्व सांसद क्लॉडिया वेब्बे का है। उन्होंने हाल ही में सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर 12 फरवरी 2026 को भारत में कथित ‘ 30 करोड़’ कर्मचारियों की हड़ताल को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। एक पोस्ट में उन्होंने मोदी सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर पश्चिमी मीडिया की चुप्पी दरअसल एक तरह की मिलीभगत है।
12 फरवरी को क्या हुआ था?
दरअसल, गुरुवार (12 फरवरी 2026) को देशभर में ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल यानी भारत बंद का आह्वान किया। इस बंद में कोयला खदानों, रिफाइनरी, फैक्टरियों, बैंकों और परिवहन क्षेत्र के कर्मचारियों ने हिस्सा लिया। यह हड़ताल केंद्रीय ट्रेड यूनियनों जैसे CITU , AITUC, AICCTU, और HMS के आह्वान पर की गई थी।
किसान संगठनों जैसे संयुक्त किसान सभा (SKM) और ऑल इंडिया एग्रीकल्चरल वर्कर्स यूनियन (AIAWA) ने भी इस हड़ताल का समर्थन किया और इसमें भाग लिया। देश के कई राज्यों में प्रदर्सन हुए, जहाँ प्रदर्शनकारी जिला मुख्यालयों और गाँवों में इकट्ठा हुए। उन्होंने अंतरिम भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते और नए श्रम कानूनों के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की।
कलॉडिया वेब्बे ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर पीपल्स डिस्पैच से लिया गया एक प्रदर्शन का वीडियो साझा किया। इसके साथ उन्होंने लिखा, “30 करोड़ मजदूरों ने अभी भारत को बंद कर दिया है। यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल है, लेकिन पश्चिमी मीडिया ने इस पर मुश्किल से कोई बात की है। यह चुप्पी दरअसल मजदूरों के अधिकारों के खिलाफ मोदी की लड़ाई में साथ देने जैसा है।” वेब्बे ने यह भी लिखा कि भारत की यह आम हड़ताल वही भविष्य है, जिससे अरबपति और सत्ताधारी वर्ग सबसे ज्यादा डरते हैं।”
300 million workers just shut down India.
The largest strike in human history, and most of the Western media barely whispered it. That silence is complicity in Modi’s war on workers’ rights.
India’s general strike is the future that the billionaires and ruling class fears most pic.twitter.com/5vh5eRrVfR
सीधे शब्दों में कहें तो वेब्बे यह कहना चाह रही थीं कि भारत में इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल हुई है। उनका इशारा था कि पश्चिमी मीडिया ने जानबूझकर इस खबर को नजरअंदाज किया, ताकि मोदी सरकार को बचाया जा सके। उन्होंने यह भी जताया कि यह विरोध प्रदर्शन आम लोगों का आंदोलन है, जो कॉरपोरेट हितों और तानाशाही शासन के खिलाफ खड़ा हुआ है।
’30 करोड़’ वाले दावे की सच्चाई क्या है?
हालाँकि, ’30 करोड़’ लोगों के शामिल होने का दावा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया लगता है। इस तरह के बड़े आँकड़े अकसर अराजकतावादी सोच वाले समूह, विचारधारा प्रकाशन और कुछ राजनीतिक लोग दोहराते हैं, ताकि हालात को ज्यादा गंभीर दिखाया जा सके। भारत की आबादी 140 करोड़ से ज्यादा है।
इतने बड़े देश में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा देश ठप हो गया हो। हर विरोध प्रदर्शन को ‘अभूतपूर्व’ बताना या उसे व्यवस्था के पूरी तरह टूटने का सबूत कहना सही तस्वीर पेश नहीं करता। ऐसे दावे लोगों को गुमराह कर सकते हैं।
Apparently, 300 million (30 crore) workers in India went on strike and the country didn't come to a stand-still but a Brit sitting 1000's of kms away is telling the world she knows India more than the Indians. https://t.co/NDAaz5ERCz
— Stop Hindu Hate Advocacy Network (SHHAN) (@HinduHate) February 14, 2026
विरोध प्रदर्शन, चाहे वे बड़े ही क्यों न हों, लोकतंत्र की असफलता का संकेत नहीं होते। बल्कि वे लोकतंत्र का ही एक हिस्सा है। भारत में समय-समय पर ट्रेड यूनियन, किसान, छात्र और विभिन्न राजनीतिक दल अपने मुद्दों को लेकर प्रदर्शन करते रहते हैं। इसके बावजूद अधिकतर जगहों पर सरकारी दफ्तर चलते रहते हैं, बाजार खुले रहते हैं और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य रूप से चलती रहती है। किसी हड़ताल या प्रदर्शन को तानाशाही व्यवस्था के टूटने का सबूत बताना लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक कार्यप्रणाली को नजरअंदाज करना है।
पश्चिमी मीडिया की ‘चुप्पी’ का दावा
वेब्बे का यह आरोप भी सवालों के घेरे में है कि पश्चिमी मीडिया की चुप्पी का मतलब मोदी सरकार का साथ देना है। जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं, तब से कई पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने उनकी सरकार पर कड़े और आलोचनात्मक लेख प्रकाशित किए हैं। नागरिकता कानून, आर्थिक सुधारों और यहाँ तक कि कोविड-19 से निपटने को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने नई दिल्ली से सवाल पूछने और आलोचना करने में हिचक नहीं दिखाई।
अकसर यह भी देखा गया है कि पश्चिमी मीडिया भारत की खबरों को खासतौर पर नकारात्मक तरीके से पेश करता है, भले ही भारत ने वही नीतियाँ अपनाई हों जो दूसरे देशों ने भी अपनाई थीं। यह बात खासतौर पर भारत के कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान साफ नजर आई। ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन ने 04 अप्रैल 2020 को एक खबर में शीर्षक दिया था, ‘मैं बस घर जाना चाहता हूँ: मोदी के कड़े लॉकडाउन से प्रभावित लाखों लोगों की बेबसी।’ इस शीर्षक में इस्तेमाल किया गया ‘कड़ा’ शब्द खासतौर पर ध्यान खींचने वाला था।
वहीं दूसरी ओर, जब अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में लगाए गए लॉकडाउन की बात की गई, तो भाषा और लहजा साफतौर पर अलग नजर आया। एक लेख में उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से महामारी से लड़ने के लिए पूरा देश बंद करने की अपील की गई थी। ऑस्ट्रेलिया के मामले में अखबार ने लॉकडाउन को एक जरूरी कदम बताते हुए सीधे और सामान्य ढंग से खबर प्रकाशित की। वहीं अपने ही देश ब्रिटेन में लगाए गए लॉकडाउन को ‘जरूरी संकट’ बताया गया।
यहाँ अंतर साफ दिखाई देता था। ब्रिटेन में आए संकट को जहाँ ‘जरूरी’ बताया गया, वहीं भारत में वैसी ही मुश्किलों को ‘क्रूर’ कहा गया। इस तरह चुने हुए शब्दों के इस्तेमाल से एक खास सोच या झुकाव नजर आता है। जब पूरी दुनिया एक ही महामारी से जूझ रही थी, तब भी भारत को ज्यादा नकारात्मक तरीके से पेश किया गया।
ऐसे में यह कहना कि पश्चिमी मीडिया को मोदी सरकार की आलोचना करने का मौका नहीं मिला या उसने जानबूझकर चुप्पी साध ली, तर्कसंगत नहीं लगता। अगर सच में पूरे देश में ठप जैसी स्थिति होती, तो इसकी खबरें दुनिया भर में बड़े स्तर पर दिखाई जातीं।
क्या इस हड़ताल ने भारत ठप पड़ा?
देश के अलग-अलग राज्यों से आई कई खबरों में बताया गया कि सामान्य जीवन पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। झारखंड में बाजार खुले रहे और गाड़ियाँ सामान्य रूप से चलती रहीं। छत्तीसगढ़ में बैंकों और कुछ खनन कार्यों पर असर जरूर पड़ा, लेकिन परिवहन और दुकानें सामान्य ढंग से चलती रहीं। तमिलनाडु में विरोध प्रदर्शन के बावजूद रेल और सड़क सेवाएँ जारी रहीं। यहाँ तक कि केरल में भी कुछ लोगों ने बंद को सीमित असर वाला बताया।
ओडिशा, केरल, गोवा, मध्य प्रदेश और पंजाब में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। यूनियन से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किए, लेकिन पूरे देश में ठप जैसी स्थिति नहीं बनी। ज्यादातर शहरों और कस्बों में आम जिंदगी बिना किसी बड़े व्यवधान के चलती रही।
अगर हड़ताल ने सच में पूरे भारत को उसी तरह बंद कर दिया होता, जैसा दावा किया गया तो यह खबर दुनिया भर की बड़ी सु्र्खियाँ बनती। लेकिन ऐसा व्यापक और नाटकीय कवरेज देखने को नहीं मिली। इससे यह संकेत मिलता है कि सोशल मीडिया पर इस घटना के पैमाने को शायद वास्तविकता से ज्यादा बढ़ाकर पेश किया गया।
अरबपति वाली बयानबाजी
वेब्बे की आखिरी पंक्ति, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘अरबपति और सत्ताधारी वर्ग’ इस हड़ताल से डरते हैं, एक जानी-पहचानी वैचारिक सोच को दिखाती है। अमीर उद्योगपतियों और कारोबारियों को खलनायक की तरह पेश करना वामपंथी राजनीति की पुरानी शैली रही है। आर्थिक असमानता पर बहस करना पूरी तरह जायज है, लेकिन हर आर्थिक सुधार को ‘पीड़ित जनता बनाम बुरे अरबपति’ की लड़ाई के रूप में दिखाना जटिल नीतिगत मुद्दों को सिर्फ भावनात्मक नारों में बदल देना है।
पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक वृद्धि, बुनियादी ढाँचे का विस्तार और डिजिटल बदलाव सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी से ही आगे बढ़े हैं। इसे किसी गुप्त या खतरनाक गठजोड़ की तरह दिखाना उन लाखों की अनदेखी करना है, जो गरीबी से बाहर आए हैं और जिन तक सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ पहुँचा है।
सेलिब्रिटी का दखल और प्रोपेगेंडा
यह पहली बार नहीं है जब अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने भारत के अंदरूनी मुद्दों पर टिप्पणी की हो। साल 2021 में कृषि कानूनों के खिलाफ हुए किसान आंदोलनों के दौरान भी कई विदेशी हस्तियों ने अपनी राय दी थी। पॉप स्टार रिहाना और पूर्व एडल्ट फिल्म अभिनेत्री मिया खलीफा ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में ट्वीट किए थे।
अचानक से उनकी जटिल कृषि सुधारों जैसे विषय पर दिलचस्पी ने कई लोगों को हैरान कर दिया था। आलोचना का कहना था कि यह दखल वास्तव में भारतीय किसानों की सच्ची चिंता से ज्यादा, एक खास नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाने की कोशिश लग रही थी।
आखिरकार कृषि कानूनों को वापस ले लिया गया, लेकिन कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि लंबे समय में कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण के लिए सुधार जरूरी थे। इस पूरे घटनाक्रम ने यह दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय आवाजें कभी-कभी ऐसे मुद्दों को भी बढ़ा देती हैं, जिन्हें पूरी तरह समझा नहीं गया होता।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का एंगल
ध्यान देने वाली बात यह भी बहै कि 12 फरवरी 2026 का यह तथाकथित विरोध प्रदर्शन काफी हद तक भारत-अमेरिका के अंतरिम व्यापार ढाँचे को लेकर उठी चिंताओं से जुड़ा था। कुछ समूहों ने दावा किया कि यह समझौता भारतीय किसानों के लिए नुकसानदेह होगा, क्योंकि इससे अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खुल जाएगा।
हालाँकि, यह कहना सही नहीं है कि भारत ने पहले ही ऐसा कोई समझौता कर लिया है, जिसमें कृषि उत्पादों पर शुल्क शून्य कर दिया गया हो। यह दावा गलत है। वास्तव में अभी सिर्फ एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में बातचीत का ढाँचा तैयार किया गया है। कोई अंतिम समझौता अभी तक साइन नहीं हुआ है।
संयुक्त बयान में कुछ चुने हुए औद्योगिक सामानों और कुछ कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने या खत्म करने की बात कही गई है। इन कृषि उत्पादों में ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स, लाल ज्वार, पेड़ से मिलने वाले मेवे, प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल, वाइन और अन्य पेय पदार्थ शामिल हैं। ये ज्यादातर ऐसे उत्पाद हैं, जिन्हें भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पहले से ही आयात करता है। चावल और गेहूँ जैसे मुख्य खाद्यान्न इस समझौते का हिस्सा नहीं है।
भारत पहले से ही घरेलू कमी को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का आयात करता है, खासकर खाद्य तेल और दालें। दरअसल, भारत दालों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और आयातक दोनों है। हर साल अरबों डॉलर के आयात से देश की खाद्य सुरक्षा बनाए रखने में मदद मिलती है।
निष्कर्ष
पूरी तस्वीर यह दिखाती है कि राजनीतिक मकसद से किस तरह कहानियाँ और नैरेटिव गढ़े जा सकते हैं। विदेशों में हाशिये पर चले गुए कुछ नेता और देश के भीतर कुछ वैचिारक समूह कई बार बढ़ा-चढ़ाकर दावे करते हैं, ताकि भारत को नकारात्मक रूप में पेश किया जा सके। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा होते हैं, किसी व्यवस्था के टूटने का सबूत नहीं। इसी तरह व्यापार समझौते जटिल बातचीत का परिणाम होते हैं, न कि कोई गुप्त साजिश।
आर्थिक सुधारों का विरोध करने वाले कम्युनिस्ट दलों और उनसे जुड़े संगठनों का रुख भी अकसर एक जैसा रहा है। जैसे उन्होंने कृषि कानूनों का विरोध किया था, वैसे ही अब वे व्यापार समझौतों और श्रम सुधारों का भी विरोध कर रहे हैं। विकास, सुधार और वैश्विक साझेदारी की प्रक्रिया में वैचारिक विरोध होना स्वाभाविक है। लेकिन हर कदम को तानाशाही हमला बताना शायद भारत की हकीकत से ज्यादा राजनीतिक सोच को दर्शाता है।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
बांग्लादेश का चुनाव अब खत्म हो गया है। उम्मीद है कि अब वाशिंगटन, लंदन, बीजिंग और इस्लामाबाद में बैठे साजिशकर्ता अपनी गलती समझ गए होंगे। बांग्लादेश की जनता ने बड़ी संख्या में जमात-ए-इस्लामी को खारिज कर दिया है। यह संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखा है और अमेरिका, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों का निष्ठावान समर्थन मिलता है।
2024 में बड़े पैमाने पर तैयार की गई शासन परिवर्तन योजना के तहत, वाशिंगटन, बीजिंग और इस्लामाबाद ने अपने शिपायों के जरिए बांग्लादेश को अपने अधीन करने में सफलता पाई। इसके लिए उन्होंने गैरकानूनी अंतरिम सरकार का नेतृत्व मुहम्मद यूनुस को सौंपा।
तब से, इन देशों के खुलेआम और इन्डरेक्ट मिलने वाले समर्थन के चलते, बांग्लादेश में मजहबी उग्रवाद, आतंकवाद, जिहाद और हिंसा तेजी से बढ़ रही है। इसने देश की अर्थव्यवस्था और शिक्षा प्रणाली को तहस-नहस कर दिया और युवा पीढ़ी को सोच-विचार के बिना विनाशकारी कामों में लिप्त कर दिया।
इतनी अराजकता और अव्यवस्था के कारण, बांग्लादेश की वैश्विक छवि बहुत बिगड़ गई। अधिकतर देश अब बांग्लादेश को संदेह की नजर से देखने लगे हैं। देश का नाम पाकिस्तान जैसा खराब हो गया, जिससे वहाँ के नागरिकों, खासकर छात्रों और युवा वर्ग के वीजा आवेदन ठुकराए जाने लगे।
महिलाओं को मजहबी उग्रवादियों और जिहादियों से लगातार धमकियों और खतरे का सामना करना पड़ रहा है। उनके बीच डर बढ़ गया है कि वे सम्मानहीन और अलग-थलग पड़ जाएँगी, जैसा कि पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों में होता है।
मुहम्मद यूनुस हमेशा के लिए सत्ता पर नहीं रह सके
लोग पूछ सकते हैं, अमेरिका और ब्रिटेन के लगभग एकमत समर्थन और संरक्षण के साथ और चीन व पाकिस्तान के लगातार समर्थन के बावजूद, मुहम्मद यूनुस ने 12 फरवरी 2026 को ही चुनाव कराने का फैसला क्यों किया? जब उनके पास पर्याप्त सत्ता थी, तो उन्होंने खुद को सर्वोच्च नेता घोषित कर देश को खलीफा बनाने और लंबे समय तक सत्ता में रहने का विकल्प क्यों नहीं चुना?
इस सवाल का जवाब आसान है। मुहम्मद यूनुस के लिए यह मिशन इम्पॉसिबल बन गया था कि वह सत्ता में बने रहें, जब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP), जिसके समर्थक भारी संख्या में है और 35-40 फीसदी मजबूत वोट बैंक है, लगातार यूनुस सरकार पर चुनाव कराने के दबाव डालने लगी। यूनुस और उनके इस्लामी-जिहादी गठबंधन ने साफ समझ लिया कि वे चुनावों को अधिक समय तक टाल नहीं सकते।
यह स्पष्ट था कि यदि BNP सड़कों पर उतरती और जनता को संगठित करती, तो उन्हें अवामी लीग और अन्य वामपंथी-धर्मनिरपेक्ष ताकतों, सहित हिंदू समुदाय का खुला या गुप्त समर्थन मिल सकता था।
ऐसी स्थिति में, यूनुस की स्थिति बेहद कमजोर हो जाती और उन्हें गंभीर अपराधों के लिए मुकदमा झेलना पड़ सकता था, जिसमें उन्हें और उनके खतरनाक समूह के सदस्यों को फांसीजैसी सजा का सामना करना पड़ता।
अमेरिकी डीप स्टेट की विफलता
वहीं, यूनुस को यह भी एहसास हुआ कि खासकर अमेरिका ने बांग्लादेश की ताकत को गंभीरता से नहीं समझा और बड़ी गलती की। अमेरिका के पास सैन्य शक्ति, आर्थिक दबाव, खुफिया नेटवर्क और विचारधारात्मक संदेश देने की क्षमता होने के बावजूद उसकी नीति बार‑बार नाकाम और उलटी राह पर जा चुकी है, जैसा पहले वियतनाम, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, वेनेज़ुएला, मिस्र जैसे मामलों में देखा गया है। अब बांग्लादेश में भी इसकी गुत्थी सुलझने के बजाय उलझती नजर आती है।
विशेष रूप से अमेरिका के डीप स्टेट और पाकिस्तान की इंटर‑सर्विस इंटेलिजेंस (ISI) ने बांग्लादेश को आइडियोलॉजिकल नजरिये से समझने की गलती की, ना कि असल भौगोलिक और जनलोकप्रिय वास्तविकताओं के हिसाब से।
उन्होंने बांग्लादेशी जनता की शक्ति को कम करके आंका और जमात‑ए‑इस्लामी बांग्लादेश (JIB) जैसे संगठन को जिसके विचार पिछले कुछ दशकों से विवादित रहे हैं, रणनीतिक सहयोगी मान लिया, जो राजनीतिक तौर पर एक बड़ी भूल साबित हुई।
फिर पाकिस्तानी ISI और उसके पश्चिमी मास्टर की डरावनी बांग्लादेश योजना को भारी सफलता नहीं मिली। गुरुवार (12 फरवरी 2026) को बांग्लादेश ने सिर्फ मतदान नहीं किया बल्कि देश ने विरोध जताया।
महीनों से बांग्लादेश के अंदर एक असमंजसपूर्ण राजनीतिक माहौल बन रहा था। 2024 की उथल‑पुथल के बाद राजनीतिक अस्थिरता ने विचारधारात्मक अराजकता के लिए जगह बना दी थी। अंतरराष्ट्रीय ताकतें बारीकी से देख रही थीं, इस्लामी समूहों का संगठन फिर से हो रहा था और ऐसे तकनीकी नेताओं को अस्थायी अधिकार के रूप में आगे रखा जा रहा था, जिनका जमीनी समर्थन कम था।
1971 का भूत आज भी बांग्लादेश को आकार देता है
बांग्लादेश में कई लोग डर रहे थे कि देश चुपचाप एक प्रयोग की तरफ ले जाया जा रहा है, एक ऐसा मिश्रित सिस्टम जिसमें वैश्विक तकनीकी सत्ता और राजनीतिक इस्लाम साथ-साथ चलते और जमात‑ए‑इस्लामी को मुख्य ताकत बना दिया जाता।
लेकिन जनता ने उस प्रयोग को जड़ से उखाड़ फेंका। जमात‑ए‑इस्लामी का निर्णायक खारिज होना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को भारी समर्थन मिलना कोई संयोग नहीं था। यह उन लोगों का साफ संदेश था, जो अपनी इतिहास की समझ रखते हैं और विचारधारात्मक खतरे को पहचानते हैं।
2026 में हुए इस चुनाव के नतीजे को समझने के लिए हमें 1971 की कहानी जाननी होगी। बांग्लादेश का जन्म उस समय हुआ जब पाकिस्तान की सोच और राजनीति का दबदबा और रावलपिंडी की बंगाली संस्कृति और सेक्युलरिज़्म को मिटाने की लगातार कोशिशों के खिलाफ लोगों ने विरोध किया। आजादी की लड़ाई सिर्फ जमीनी लड़ाई नहीं थी, यह पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा थोपे गए मजहबी और सख्त तानाशाही के खिलाफ एक बड़े बगावती कदम थे।
जमात‑ए‑इस्लामी पर उस इतिहास का भारी असर है। इसका राजनीतिक इतिहास और युद्ध के समय की भूमिका विवादित रही है। कई बांग्लादेशियों के लिए जमात सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि उस सोच की निशानी है जिसने कभी देश की आजादी का विरोध किया और यह याद हमेशा मायने रखती है।
हालाँकि बांग्लादेश मुस्लिम-बहुल देश है, लेकिन इसकी असली पहचान भाषा, संस्कृति और लोगों की परंपराओं से जुड़ी है। बंगाली इस्लाम सूफी परंपराओं, मेल-जोल और मजबूत साहित्यिक विरासत का हिस्सा है। इसका मकसद कभी भी पाकिस्तान जैसी कठोर सोच को अपनाना नहीं था। गुरुवार (12 फरवरी 2026) के चुनाव ने कई मायनों में बांग्लादेशी पहचान और संस्कृति को फिर से मजबूत करने का काम किया।
इस्लामवादी गति का भ्रम
पिछले डेढ़ साल में बांग्लादेश में कई जगह हिंसक भीड़ की घटनाएँ, सड़क पर आक्रामक प्रदर्शन, हिंदुओं पर हमले और कट्टरपंथी मजहबी नेटवर्क का दबाव देखा गया। सोशल मीडिया ने धार्मिक गुस्से की ताकत बढ़ाई। महिलाओं ने शिक्षण संस्थानों में बढ़ते डर और धमकियों की शिकायत की। अल्पसंख्यक समुदाय भी धीरे-धीरे अपनी जगह सिकुड़ती देख चिंता जताने लगे।
इन घटनाओं से यह धारणा बन गई कि इस्लामी ताकतें लगातार बढ़ रही हैं और यह धारणा देश के अंदर और बाहर दोनों जगह फैल गई। लेकिन धारणा का मतलब संख्या नहीं होती। चुनावी तौर पर, जमात‑ए‑इस्लामी का समर्थन शायद ही कभी एक अंकों से ज्यादा होता है। यह आवाज़दार, संगठित और विचारधारात्मक रूप से प्रतिबद्ध है, लेकिन यह बांग्लादेश की मुख्यधारा की सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करता। 12 फरवरी 2026 के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि सड़क की शोर-शराबा और वोटों की ताकत में बड़ा अंतर है।
मुहम्मद यूनुस को माइक्रोफाइनेंस के क्षेत्र में वैश्विक सम्मान मिला है। उनका नोबेल पुरस्कार उन्हें विश्व स्तर पर विकास अर्थशास्त्र का प्रतीक बनाता है। लेकिन बांग्लादेश में राजनीतिक वैधता सिर्फ पश्चिमी सराहना से नहीं बनती। इसके पीछे उनका असली चेहरा छिपा हुआ था। एक कट्टरपंथी, भारत विरोधी और कई बार निर्दयी सोच वाला व्यक्ति। इसके साथ ही, उनकी यह छवि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में करोड़ों डॉलर के प्रचार के जरिए संतुलित और प्रेरक दिखायी गई।
तकनीकी विशेषज्ञता जमीनी समर्थन की जगह नहीं ले सकती। बांग्लादेश की जनता हमेशा ऐसे नेताओं का साथ देती है जिनके पास मजबूत संगठन, स्थानीय नेटवर्क और भावनात्मक जुड़ाव होता है, जैसे शेख हसीना या तारीक रहमान। यहाँ राजनीतिक सफलता के लिए ढाँचा और संगठन जरूरी है, केवल प्रतीक नहीं। यह सोच कि एक ग्लोबल एडमिरेड टेक्नोक्रैट पीछे से सत्ता संभालते हुए राजनीतिक और विचारधारात्मक ताकतों को संतुलित कर सकता है जो हमेशा ही अस्थिर रही। 12 फरवरी के नतीजों ने इस अस्थिरता को पूरी तरह उजागर कर दिया।
द जियोपॉलिटिकल अंतर्धारा
बांग्लादेश कोई अलग-थलग राजनीतिक प्रयोगशाला नहीं है। यह दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के रणनीतिक चौराहे पर स्थित है। लगभग पूरी तरह से भारत से घिरा हुआ, पूर्व में म्यांमार और बंगाल की खाड़ी से महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की ओर खुला, यह एक बेहद अहम स्थान रखता है।
भारत के लिए बांग्लादेश सिर्फ एक दूर का पड़ोसी नहीं है, यह एक जरूरी पड़ोसी और मोर्चा राज्य है। सीमा सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ तालमेल, पूर्वोत्तर की आवाजाही और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सीधे ढाका की आंतरिक स्थिरता से जुड़ी है। बांग्लादेश में कोई भी विचारधारात्मक उग्रवाद तुरंत सीमा पार फैल सकता है।
कई दशकों से, इस्लामाबाद की रणनीति ने बांग्लादेश में अस्थिरता के जरिए पूर्वी भारत में दबाव बनाने की कोशिश की है। पाकिस्तान की इंटर‑सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की छाया अब भी क्षेत्रीय सुरक्षा की योजना पर मंडरा रही है।
अगर ढाका में इस्लामी ताकतों को निर्णायक राजनीतिक सत्ता मिल जाती, तो यह क्षेत्र में फिर से प्रॉक्सी युद्ध और अस्थिरता के लिए उपजाऊ जमीन बनाती। 12 फरवरी के चुनाव ने इस खतरे को कम से कम अस्थायी रूप से कम कर दिया।
पॉलिटिकल इस्लाम क्यों कामयाब नहीं हो पाया
जमात को नकारना सिर्फ एक पार्टी का बदलाव नहीं है। यह स्ट्रक्चरल सच्चाई को दिखाता है:
1. कल्चरल नेशनलिज्म मजबूत बना हुआ है: बांग्लादेश की पहचान बंगाली भाषा और विरासत में गहराई से जुड़ी हुई है। कल्चरल फेस्टिवल, लिटरेचर और म्यूजिक बाहरी नहीं हैं वे नेशनल सोच के सेंटर में हैं।
2. आर्थिक उम्मीदें आइडियोलॉजी पर भारी पड़ती हैं: देश की युवा आबादी रोज़गार, शिक्षा और ग्लोबल मोबिलिटी को प्राथमिकता देती है। कट्टर मजहबी शासन मॉडल इकोनॉमिक इंटीग्रेशन और विदेशी इन्वेस्टमेंट के लिए खतरा हैं।
3. महिलाओं की भागीदारी एक सोशल पिलर है: बांग्लादेश की गारमेंट इंडस्ट्री, एजुकेशन का विस्तार और माइक्रोफाइनेंस नेटवर्क महिलाओं की भागीदारी पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। रोक लगाने वाले सोशल कोड की ओर कोई भी वापसी मुख्य इकोनॉमिक सेक्टर को अस्थिर कर देगी।
4. पाकिस्तान से जुड़ी आइडियोलॉजी पर ऐतिहासिक शक: पॉलिटिकल नैरेटिव जो इस्लामाबाद के पिछले दबदबे को दिखाते हैं, वे स्वाभाविक विरोध को बढ़ावा देते हैं।
ये सभी फैक्टर मिलकर बताते हैं कि मुखर एक्टिविज़्म के बावजूद, इस्लामिस्ट मोमेंटम चुनावी दबदबे में क्यों नहीं बदल पाया।
BNP सरकार के ‘जमातीकरण’ का खतरा
हालाँकि, कहानी सिर्फ चुनाव तक ही नहीं खत्म होती। अफवाहें चल रही हैं कि पाकिस्तानी ISI जमात‑संबद्ध लोगों को कोलिशन के जरिए सरकारी ढाँचे में जगह देने की कोशिश कर रही है।
यदि संवेदनशील मंत्रालयों में भी उनकी सीमित उपस्थिति बन जाती है, तो यह धीरे-धीरे राज्य मशीनरी में कट्टरपंथी विचारों को सामान्य करने जैसा काम कर सकती है। यह रणनीतिक रूप से बेहद खतरनाक होगा।
एक ऐसी सरकार जिसे मजहबी प्रभाव बढ़ता दिखाई दे, उसे तुरंत विश्वास और मान्यता में चुनौती का सामना करना पड़ेगा देश के अंदर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर। निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है। अल्पसंख्यक समुदाय चिंतित हो जाएगा।
भारत की सुरक्षा एजेंसियाँ भी अपनी जोखिम आकलन रणनीति बदलेंगी। 12 फरवरी के चुनाव ने जनता का संदेश साफ और स्पष्ट दिया, कोई भी विचारधारात्मक हद से आगे बढ़ने वाला कदम नहीं चलेगा। इस संदेश की अनदेखी करना राजनीतिक रूप से बेहद जोखिम भरा होगा।
बाहरी पावर ब्रोकर्स के लिए सबक
अक्सर बड़ी ताकतें मानती हैं कि वे छोटे देशों में राजनीतिक नतीजों को कूटनीतिक संकेत, आर्थिक दबाव और संस्थागत समर्थन के जरिए नियंत्रित कर सकती हैं। लेकिन बांग्लादेश इस सोच को चुनौती देता है।
इसका राजनीतिक माहौल अस्थिर, भावनात्मक और कट्टर राष्ट्रीयवादी है। जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करके नतीजे तय करने की कोशिश अक्सर विपरीत परिणाम देती है। 12 फरवरी का जनादेश यही चेतावनी देता है, ढाका में संप्रभुता कोई सौदेबाजी की वस्तु नहीं है।
भारत के लिए 12 फरवरी के चुनाव का परिणाम एक अवसर भी है। अगर बांग्लादेश एक स्थिर सरकार द्वारा चलाया जाता हो, जिसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हो, तो यह पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत करता है। कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स, कट्टरपंथ विरोधी उपाय और आर्थिक एकीकरण अब अधिक भरोसे के साथ आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन फिर भी सतर्कता जरूरी है।
पाकिस्तानी ISI और इस्लामी नेटवर्क कभी पूरी तरह गायब नहीं होते, वे हमेशा अपनी रणनीति बदलते रहते हैं। दशकों में बनाए गए विचारधारात्मक ढाँचे को रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए सिविल सोसाइटी संस्थाओं, सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक नेतृत्व को धीरे-धीरे घुसपैठ की कोशिशों के प्रति हमेशा सतर्क रहना होगा।
मुहम्मद यूनुस का भविष्य
अब, 12 फरवरी 2026 के चुनावों के बाद, मुहम्मद यूनुस खुद एक संकट के मोड़ पर खड़े हैं जिसे वह नजरअंदाज नहीं कर सकते। बढ़ती राजनीतिक विरोधी परिस्थितियों में सत्ता पकड़ने की उनकी महत्वाकांक्षा अब लगभग समाप्त हो चुकी है और वे उन ही ताकतों के सामने कमजोर हो गए हैं जिन्हें वे नियंत्रित करना चाहते थे।
उनकी सरकार के चुनाव में साफ और निर्णायक खारिज होने का मतलब है कि जनता ने उनकी नेतृत्व क्षमता को अस्वीकार कर दिया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) संभवतः उन्हें सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता देगी, ताकि आगे की अस्थिरता न बढ़े। यह भी संभव है कि यूनुस, घटते समर्थन और अपनी असफल योजनाओं के परिणामों से बचने के लिए, पश्चिमी देश में शरण लेने की कोशिश करें, जहाँ वे अपने द्वारा किए गए काम के प्रभाव से बचने और अपनी विरासत बचाने की उम्मीद करेंगे अगर इसे अभी भी बचाया जा सकता है तो। उम्र बढ़ने के साथ, उनके राजनीतिक पुनरुद्धार की खिड़की लगभग बंद हो चुकी है।
इसी बीच, वे इस्लामी ताकतें जो कभी उनके चारों ओर इकट्ठा होती थीं, अपने नेता को छोड़ कर अब अगले नए और करिश्माई नेता को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। यह बदलाव उनके रणनीतिक समीकरणों में फिर से सुधार का संकेत है, क्योंकि वे बांग्लादेश के जटिल राजनीतिक परिदृश्य में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह सिर्फ यूनुस की घटती प्रासंगिकता को ही नहीं दिखाता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि देश की संप्रभुता और पहचान पर अब भी खतरा मंडरा रहा है।
फिर भी, यदि यूनुस की यह संगठित वापसी विफल रहती है, तो यह न केवल उनके राजनीतिक सपनों का अंत होगा बल्कि उन सभी के लिए भी सख्त चेतावनी है जो बांग्लादेश की जनता की दृढ़ता और संकल्प को हल्के में लेते हैं।
12 फरवरी का चुनाव सिर्फ सामान्य चुनाव नहीं था। यह बांग्लादेश के विचारधारात्मक दिशा-निर्देशन की परीक्षा था। राजनीतिक इस्लाम, तकनीकी वैश्विकवाद और भू-राजनीतिक चालों के बीच, मतदाताओं ने परंपरा और स्थिरता को प्रयोग पर प्राथमिकता दी। उन्होंने संप्रभुता को निर्भरता पर, सांस्कृतिक पहचान को आयातित विचारधाराओं पर तरजीह दी। उन लोगों के लिए जो सोचते थे कि बांग्लादेश को धीरे-धीरे धर्मनिष्ठ भविष्य की ओर मोड़ा जा सकता है, यह परिणाम एक गंभीर चेतावनी था।
बांग्लादेश भले ही भौगोलिक रूप से छोटा है, लेकिन राजनीतिक स्मृति में बड़ा है। लोग 1971 को याद रखते हैं। वे विचारधारात्मक दबदबे को याद रखते हैं और जब उन्हें लगता है कि इतिहास दोहराने की कोशिश कर रहा है वे प्रतिक्रिया देते हैं। जो 12 फरवरी को उन्होंने दिया और उनका संदेश पुरी दुनिया ने सूना।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
गुजरात के जूनागढ़ में स्थित गिरनार पर्वत को अगर सिर्फ एक पहाड़ मान लिया जाए, तो बात अधूरी रह जाएगी। यह सिर्फ ऊँची-नीची चोटियों का समूह नहीं, बल्कि सदियों से साधना, ध्यान और आध्यात्मिक रहस्यों का केंद्र रहा है।
इसकी तलहटी में मौजूद भावनाथ महादेव मंदिर को गिरनार का प्रवेश द्वार माना जाता है, जहाँ से इस रहस्यमय आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है। महाशिवरात्रि की रात हो या कोई साधारण दिन, यहाँ का वातावरण अलग ही शांति और गंभीरता का एहसास कराता है। यही वजह है कि गिरनार को लोग आज भी ‘सन्यासियों की अदृश्य भूमि’ के नाम से जानते हैं।
गिरनार: रेवताचल से सिद्धक्षेत्र तक
प्राचीन ग्रंथों में गिरनार का उल्लेख ‘रेवतक पर्वत’ के नाम से मिलता है। स्कंद पुराण के प्रभास खंड में इस क्षेत्र को भगवान शिव की पवित्र भूमि बताया गया है। भारतीय परंपरा में पर्वतों को सिर्फ पत्थर और चट्टानों का ढेर नहीं माना गया, बल्कि उन्हें चेतना, ऊर्जा और दिव्य उपस्थिति का केंद्र समझा गया है। जैसे हिमालय, कैलाश और अरुणाचल प्रदेश अपनी आध्यात्मिक पहचान के लिए जाने जाते हैं, वैसे ही गिरनार भी इसी आध्यात्मिक परंपरा का अहम हिस्सा है।
भारतीय दर्शन में ‘सिद्ध क्षेत्र’ उस स्थान को कहा जाता है, जहाँ सदियों से साधना की परंपरा बिना रुके चली आ रही हो और जहाँ अनेक साधकों ने तप करके सिद्धि प्राप्त की हो। इसी कारण गिरनार को भी एक सिद्ध क्षेत्र माना जाता है।
भावनाथ: रहस्यों की भूमि का प्रवेश द्वार
गिरनार की तलहटी में स्थित भावनाथ महादेव मंदिर सिर्फ एक साधारण मंदिर नहीं है, बल्कि पूरे आध्यात्मिक मार्ग की शुरुआत माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि की रात भगवान शिव स्वयं इस क्षेत्र में भ्रमण करते हैं। यहाँ स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है और क्षेत्र के इतिहास में इसकी प्राचीनता का उल्लेख बार-बार मिलता है।
जो साधक गिरनार की चढ़ाई और साधना के लिए आते हैं, उनके लिए भावनाथ महादेव ही पहला पड़ाव होता है। मानो यहीं से गिरनार की ऊँचाइयों और आध्यात्मिक यात्रा की औपचारिक शुरुआत होती है।
सिद्ध परंपरा: साधना की अदृश्य धारा
‘सिद्ध’ शब्द का मतलब होता है, वह साधक जिसने तप और साधना के बल पर सिद्धि हासिल कर ली हो। भारतीय योग और तंत्र परंपराओं में ऐसे सिद्ध पुरुषों का कई जगह उल्लेख मिलता है। नाथ परंपरा, हठयोग और तांत्रिक साधना से जुड़े ग्रंथों में पहाड़ों और गुफाओं को साधना के लिए सबसे उपयुक्त स्थान बताया गया है, क्योंकि वहाँ शांति, एकांत और एकाग्रता मिलती है।
गिरनार की गुफाएँ, जहाँ आज भी कुछ साधक ध्यान करते दिखाई दे जाते हैं, इसी परंपरा की निरंतरता को दर्शाती हैं। प्रचलित मान्यता है कि कुछ सिद्ध पुरुष भीड़-भाड़ और सार्वजनिक जीवन से दूर रहकर एकांत में साधना करते हैं। हालाँकि इन बातों के ठोस ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम हैं, लेकिन यह सच है कि गिरनार सदियों से योगियों और तपस्वियों की साधना भूमि के रूप में प्रसिद्ध रहा है।
तंत्र और पर्वत: शैव धर्म का गुप्त आयाम
शैव परंपरा में तंत्र का खास महत्व है। तंत्र को केवल पूजा-पाठ या किसी खास अनुष्ठान तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे ऊर्जा और चेतना को समझने का एक गहरा मार्ग माना गया है। पहाड़ अपने एकांत, शांति और प्राकृतिक वातावरण के कारण तांत्रिक साधना के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।
शिव और अघोर परंपरा में राख का विशेष महत्व है, जो जीवन की अनित्यता और वैराग्य का प्रतीक है। यह प्रतीकवाद गिरनार की भूमि पर जैसे सजीव हो उठता है, जहाँ जीवन, मृत्यु और मोक्ष जैसे विचार एक साथ महसूस होते हैं।
अद्वैत परंपरा और ‘अवधूत गीता’ में शिव का अनुभव बाहरी रूप में नहीं, बल्कि भीतर की चेतना में बताया गया है। गिरनार का रहस्य भी इसी आंतरिक साधना और आत्मिक यात्रा से जुड़ा माना जाता है।
लोककथाएँ और रहस्य: अनुभव की एक परंपरा
गिरनार से जुड़ी कई लोककथाएँ आज भी सुनने को मिलती हैं। कहा जाता है कि कभी-कभी रात में अलौकिक प्रकाश दिखाई देता है, कुछ गुफाओं में अदृश्य साधकों का वास है या ध्यान के दौरान साधकों को दिव्य अनुभव होते हैं।
इन बातों को ठोस ऐतिहासिक तथ्य तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इन्हें केवल अंधविश्वास कहकर खारिज कर देना भी भारतीय सांस्कृतिक सोच को समझने में गलती होगी। लोककथाएँ भले इतिहास से अलग हों, लेकिन वे समाज की सामूहिक आस्था और अनुभवों का प्रतिबिंब होती हैं। यही मान्यताएँ गिरनार को एक रहस्यमय पहचान देती हैं।
गिरनार के संदर्भ में रहस्यवाद का मतलब किसी चमत्कार से ज्यादा उस अनुभव को स्वीकार करना है, जिसे शब्दों में पूरी तरह समझाना मुश्किल होता है। यह केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि साधना और व्यक्तिगत अनुभव से जुड़ा भाव है।
भारतीय दर्शन में वास्तविकता को प्रत्यक्ष (जो दिखता है), अनुमानित (जो समझा जाता है) और निहित या गूढ़ (जो भीतर अनुभव किया जाता है) इन तीन स्तरों पर देखा जाता है। गिरनार का रहस्य भी मुख्य रूप से इसी अनुभवजन्य परंपरा से जुड़ा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
इसे ‘साधकों की अदृश्य भूमि’ क्यों कहा जाता है?
यहाँ ‘अदृश्य’ शब्द का मतलब किसी चमत्कार या अलौकिक शक्ति से नहीं है, बल्कि उस शांत और मौन साधना से है जो बिना प्रचार के चलती रहती है। गिरनार में ध्यान करने वाले कई संतों और साधकों का नाम इतिहास की किताबों में भले न मिले, लेकिन उनकी साधना की छाप इस क्षेत्र की आध्यात्मिक निरंतरता में महसूस की जा सकती है।
यह पर्वत बताता है कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा सिर्फ मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ों, गुफाओं और जंगलों में भी जीवित है। भावनाथ महादेव उसी अदृश्य साधना परंपरा का प्रत्यक्ष द्वार माने जाते हैं।
गिरनार का रहस्य चमत्कारों की कहानी नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की यात्रा है। यहाँ सिद्धि का अर्थ किसी अलौकिक शक्ति से नहीं, बल्कि अपने भीतर की पहचान से है। शिवत्व का मतलब बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता और शांति है।
गिरनार को साधकों की ‘अदृश्य भूमि’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यहाँ साधना का इतिहास दिखाई देने से ज्यादा अनुभव में बसता है। जब कोई साधक भावनाथ महादेव के प्रांगण में खड़ा होकर गिरनार की ओर देखता है, तो उसे केवल एक पहाड़ नहीं दिखता, बल्कि एक ऐसी यात्रा का एहसास होता है जो बाहर से भीतर की ओर ले जाती है। यही गिरनार का असली रहस्य है, यही इसकी पहचान है और यही इसका शिवत्व है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में शुक्रवार (13 फरवरी 2026) को प्रो-यूजीसी प्रदर्शन के दौरान स्थिति उस समय बिगड़ गई, जब एक महिला पत्रकार पर भीड़ ने हमला कर दिया। ‘ब्रेकिंग ओपिनियन’ नाम के यूट्यूब चैनल से जुड़ी पत्रकार रुचि तिवारी आर्ट्स फैकल्टी परिसर में प्रदर्शन कवर करने पहुँची थीं। आरोप है कि SC-ST-OBC एक्टिविस्ट्स और वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने उन्हें घेर लिया और मारपीट की।
13 फरवरी को यह प्रदर्शन SFI (भारतीय छात्र संघ), AISA (अखिल भारतीय छात्र संघ) और ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी जैसे वामपंथी छात्र संगठनों की ओर से आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की 2026 की उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा संबंधी नियमावली को लागू करने की माँग कर रहे थे, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्थगित कर रखा है। इस नियमावली को लेकर विवाद इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि इसमें जातिगत हिंसा के पीड़ितों की श्रेणी को केवल SC, STऔर OBC तक सीमित रखने की बात कही गई है, जिससे सामान्य वर्ग को बाहर रखा गया है।
इसी बीच जब रुचि तिवारी वहाँ रिपोर्टिंग कर रही थीं, तो करीब 50-100 लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। आरोप है कि उनका उपनाम ‘तिवारी’ सुनते ही कुछ लोगों ने चिल्लाकर कहा, “ये ब्राह्मण है, इसको पकड़ो।” एक वीडियो में कुछ लोग- मारो इसको, पता चलेगा और कोई बोल न देना यहाँ, काट के फेंक देंगे जैसी धमकी भरी बातें करते सुनाई दे रहे हैं। यह भी कहा गया कि उनके आने से पहले तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण था।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई वीडियो में देखा जा सकता है कि भीड़ ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया, धक्का-मुक्की की, मारपीट की और उनके कपड़े तक खींचने की कोशिश की। इस घटना ने कैंपस की सुरक्षा व्यवस्था और छात्र राजनीति में बढ़ते तनाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रुचि तिवारी ने बताया कि कैसे UGC समर्थकों की भीड़ ने ब्राह्मण होने की वजह से उन्हें निशाना बनाया
एक वीडियो में रुचि तिवारी ने खुद पूरी घटना बयान की। उन्होंने बताया कि जब वह प्रदर्शन स्थल पर एक अन्य रिपोर्टर से बात कर रही थीं, तभी अचानक बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएँ उनके पास आकर उन्हें घेरने लगीं।
रुचि के अनुसार, वहाँ मौजूद जाति आधारित एक्टिविस्ट्स ने आरोप लगाया कि वह वही महिला हैं जो एक दिन पहले जंतर-मंतर पर भी मौजूद थीं। इसके बाद भीड़ ने बिना कुछ सुने उन पर हमला कर दिया और धक्का-मुक्की व मारपीट शुरू कर दी।
#WATCH | Delhi: Ruchi Tiwari, the woman journalist who was seen being attacked during a pro-UGC protest at Delhi University yesterday, says, "…Video is everywhere, people can judge by themselves as to who provoked whom…I am a journalist, who was there to cover the protest.… pic.twitter.com/t5pT3PtNP2
रुचि तिवारी ने अपने बयान में बताया, “उन्होंने मेरे हाथ पकड़े, गर्दन दबोची, बाल खींचे और गला घोंटने की कोशिश की।” उनका कहना है कि जब उनके साथ आए सहयोगियों ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो भीड़ में शामिल पुरुषों और महिलाओं ने उनके साथ भी मारपीट की। इतना ही नहीं, उन पर झूठा आरोप लगाया गया कि वे महिला प्रदर्शनकारियों को गलत तरीके से छू रहे थे।
रुचि के मुताबिक, किसी तरह हमलावरों से निकलकर जब वह सड़क की तरफ अपने साथियों को ढूँढने गईं, तो वहाँ भी उन्हें दोबारा घेर लिया गया। उन्होंने बताया कि करीब 100-150 लोगों की भीड़ थी, जिनमें कई महिलाएँ भी शामिल थीं। आरोप है कि भीड़ ने उनके साथ मारपीट की, उनके कपड़े फाड़ने की कोशिश की, जबकि कुछ लोग पूरी घटना के वीडियो बना रहे थे।
रुचि तिवारी का कहना है, “उन्होंने मुझे सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ।” उनके अनुसार, भीड़ में से आवाजें आ रही थीं, “ये ब्राह्मण है, पकड़ो इसे, इसके कपड़े फाड़ो, इसके कपड़े उतारो।”
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यही नारीवाद है, जब एक महिला पर हमला हो रहा था और उसे बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया। उनका आरोप है कि जब उनके कपड़े फाड़ने और उनके कपड़े उतारने की कोशिश की जा रही थी, तब भीड़ में मौजूद कई पुरुष वीडियो बना रहे थे।
रुचि तिवारी के समर्थन में उतरी ABVP
‘ब्राह्मण’ जाति को लेकर एक महिला पत्रकार को भीड़ द्वारा घेरकर प्रताड़ित किए जाने की घटना पर बढ़ते आक्रोश के बीच अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने रुचि तिवारी के समर्थन में खुलकर बयान दिया है। ABVP के दिल्ली प्रदेश सचिव सार्थक शर्मा ने वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा किए गए हमले की कड़ी निंदा की।
सार्थक शर्मा ने समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कहा, “मैं कुछ बातें साफ करना चाहता हूँ। वामपंथी संगठन प्रदर्शन कर रहे थे और वहाँ एक महिला पत्रकार, जो यूट्यूब चैनल चलाती हैं, मौजूद थीं। वह प्रदर्शन को कवर कर रही थीं और उन्होंने कुछ सवाल पूछे। शायद उन्हें वे सवाल पसंद नहीं आए या फिर उन्हें वह महिला पत्रकार ही पसंद नहीं आई, इसलिए उन्होंने इस तरह का व्यवहार किया, वीडियो में साफ दिख रहा है कि उनके पुरुष कार्यकर्ता भी उन्हें थप्पड़ मार रहे थे, भीड़ उन्हें घेर रही थी और घसीटकर ले जाया जा रहा था। इससे साफ हो गया है कि ये लोग महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि अभी तक उनकी पत्रकार से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन जानकारी मिली है कि उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। शर्मा ने आरोप लगाया कि SFI, AISA और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों की प्रासंगिकता खत्म हो चुकी है, इसलिए वे झूठे आरोप लगाकर और ऐसे विवाद खड़े कर सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र समझदार हैं और सच-झूठ में फर्क करना जानते हैं।
#WATCH | A woman journalist was seen being attacked during a pro-UGC protest in Delhi University yesterday.
ABVP Delhi State Secretary Sarthak Sharma says, "I would like to make a few things clear. The Left was protesting and a woman journalist, with a YouTube channel, was… pic.twitter.com/BqmKo88sGz
वामपंथी-दक्षिणपंथी ग्रुप्स में झड़प, दोनों ने पुलिस में शिकायत कराई दर्ज
13 फरवरी को कैंपस का माहौल उस समय और तनावपूर्ण हो गया, जब कई यूट्यूबर्स जिनमें रुचि तिवारी भी शामिल थीं, उनके साथ कथित मारपीट की खबर के बाद वामपंथी और दक्षिणपंथी छात्र संगठनों के बीच टकराव शुरू हो गया। दोपहर करीब 1 बजे स्थिति और बिगड़ गई, जब प्रो-यूजीसी प्रदर्शन कर रहे वामपंथी छात्र और घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुँचे दक्षिणपंथी छात्र आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते नारेबाजी और धक्का-मुक्की का माहौल बन गया।
दक्षिणपंथी छात्र संगठनों का आरोप है कि वामपंथी छात्र समूह के सदस्यों ने पत्रकार रुचि तिवारी के साथ मारपीट की, छेड़छाड़ की और उनकी जाति को लेकर अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। वहीं वामपंथी संगठनों ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि किसी भी तरह का जाति संबंधी सवाल या टिप्पणी नहीं की गई और उन पर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं।
इसी बीच वामपंथी छात्र संगठन AISA ने पलटवार करते हुए दावा किया है कि उसके DU सचिव और छात्रा अंजलि पर यूट्यूबर रुचि शांडिल्य और कुछ ABVP कार्यकर्ताओं ने हमला किया।
AISA का कहना है कि आर्ट्स फैकल्टी, DU में जब छात्र UCC नियमों को लागू करने और कैंपस से जातिगत भेदभाव खत्म करने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, उसी दौरान यह घटना हुई। संगठन के मुताबिक, उनके कार्यकर्ता हमलावरों के खिलाफ FIR दर्ज कराने गए थे। आरोप है कि जैसे ही वे शिकायत दर्ज कराने पहुँचे, 50 से ज्यादा ABVP सदस्य थाने के बाहर जमा हो गए, खिड़कियाँ तोड़ीं और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ नारेबाजी की।
वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रों ने भी AISA के आरोपों को खारिज किया है। मामला अब पुलिस तक पहुँच चुका है। दोनों पक्षों ने मौरिस नगर पुलिस स्टेशन में एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने पुष्टि की है कि दोनों गुटों से शिकायतें मिली हैं और लगाए गए आरोपों की जाँच की जा रही है।
ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी: UGC के समर्थन में विरोध प्रदर्शन के पीछे का संगठन
प्रो-यूजीसी नियमों के समर्थन में हुआ यह प्रदर्शन “ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी” नामक मंच द्वारा आयोजित किया गया था। यह संगठन 8 फरवरी 2026 को गठित किया गया था, जिसे वे “यूजीसी रेगुलेशन्स समता आंदोलन” के तौर पर पेश कर रहे हैं।
इस फोरम की औपचारिक शुरुआत दिल्ली स्थित HKS सुरजीत भवन में की गई थी। कार्यक्रम में कई वामपंथी छात्र संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद थे, जिनमें SFI के सदस्य भी शामिल थे। बताया जा रहा है कि इस मंच का उद्देश्य UGC की 2026 की समानता संबंधी नियमावली को लागू कराने के लिए देशभर में अभियान चलाना है।
UGC रेगुलेशन समता आंदोलन : कैंपस में जातीय भेदभाव के खिलाफ और मज़बूत UGC रेगुलेशन के लिए –
अधिकार रैली 13 फरवरी, 1:30 बजे DU आर्ट्स फैकल्टी
वक्ता: राजेंद्र पाल गौतम, पूर्व मंत्री, दिल्ली सरकार डॉ जितेंद्र मीणा, प्रोफेसर डीयू डॉ आभा देव हबीब, प्रोफेसर डीयू डॉ उमा गुप्ता,… pic.twitter.com/X7BS1RMSjQ
ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी से जुड़े मुख्य सदस्यों का बैकग्राउंड विवादित है। इस मंच के सदस्यों मेंडॉ जितेंद्र मीणा, डॉ लक्ष्मण यादव, महेश चौधरी और भंवर मेघवंशी जैसे अर्बन नक्सल विचारधारा वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा इस फोरम से वामपंथी छात्र और कथित सामाजिक संगठन भी जुड़े हैं। इनमें प्रमुख नाम- जेएनयू छात्रसंघ (JNUSU), आइसा (AISA), एसएफआई (SFI), एनएसयूआई (NSUI), एआईएसएफ (AISF), एमएसएफ (MSF), आरवाईए (RYA), डीएसएफ (DSF), एएसए (ASA), एआईओबीसीएसए (AIOBCSA), सीआरजेडी (CRJD), कलेक्टिव इंडिया, बीएपीएसए (BAPSA), सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार, रिहाई मंच, सोशल जस्टिस आर्मी, ओबीसी आरक्षण संघर्ष समिति, जेएवाईएस (JAYS), बीपीवीएम, गोंडवाना स्टूडेंट यूनियन आदि शामिल हैं।
वीडियो में दिख रही रुचि तिवारी को पकड़ने वाली महिला ने नवंबर 2025 में नक्सल समर्थक प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था
विडंबना यह रही कि जिसे प्रदर्शन को ‘समानता’ और ‘न्याय’ के नाम पर आयोजित किया गया था, वही प्रदर्शन ब्राह्मण विरोधी हिंसा के आरोपों में घिर गया। आलोचकों का कहना है कि जिन लोगों पर नक्सली विचारधारा को महिमामंडित करने के आरोप लगते रहे हैं, उनकी मौजूदगी के बीच इस तरह की आक्रामक घटना चौंकाने वाली नहीं है।
शुक्रवार की घटना के वायरल वीडियो में जिन छात्राओं को रुचि तिवारी को घेरते और पकड़ते हुए देखा गया, उनमें गुरकीरत कौर का नाम भी सामने आया है। वह भगत सिंह छात्र एकता मंच की अध्यक्ष बताई जा रही हैं।
गुरकीरत कौर पर पहले भी प्रतिबंधित छात्र संगठन कट्टरपंथी छात्र संघ (RSU) की खुलकर सराहना करने के आरोप लगे थे। RSU पर आरोप रहा है कि इसके जरिए माओवादी संगठनों ने युवाओं की भर्ती की और उन्हें भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसक गतिविधियों में शामिल किया।
उल्लेखनीय है कि प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (Maoist) के शीर्ष नेता और महासचिव बसवराजु को भी कभी RSU से जुड़ा बताया जाता रहा है। इन आरोपों को लेकर छात्र राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।
"RSU has given so many revolutionaries to the movement, the State still shakes with fear. Even with the name of RSU. Even with the thought of students again coming together and bringing that revolutionary politics."
गुरकीरत कौर का एक पुराना बयान भी सोशल मीडिया पर सामने आ रहा है, जिसमें वह कहती सुनाई दे रही हैं, “RSU ने आंदोलन को इतने क्रांतिकारी दिए हैं कि आज भी राज्य उसके नाम से कांपता है। सिर्फ RSU का नाम भर लेने से या छात्रों के फिर से एकजुट होकर वही क्रांतिकारी राजनीति शुरू करने की सोच से ही सत्ता डर जाती है।”
यह बयान उस समय का बताया जा रहा है जब वह प्रतिबंधित छात्र संगठन RSU के समर्थन में बोल रही थीं। इसी बयान को लेकर अब उनके खिलाफ राजनीतिक और वैचारिक विवाद फिर से तेज हो गया है।
This is Gurkirat, the president of the left-wing organization bsCEM (Bhagat Singh Chhatra Ekta Manch).
Last year, members of this group raised the slogan on the streets of Delhi, ‘kitne Hidma maroge, har ghar se Hidma niklega.' Gurkirat was also arrested in connection with the… https://t.co/5E8e9b3p9lpic.twitter.com/bf8acwypRw
वायरल वीडियो के अलावा कई चश्मदीद गवाहों ने भी दावा किया है कि प्रदर्शन के दौरान भीड़ के बीच गुरकीरत कौर सक्रिय रूप से मौजूद थीं। गवाहों के मुताबिक, वह अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ सबसे आगे दिखाई दे रही है।
इन गवाहियों में यह भी कहा गया है कि उनके साथ नेहा नाम की छात्रा भी मौजूद थीं, जो AISA में ‘प्रेसिडेंट’ पद पर बताई जा रही हैं। इन दावों को लेकर छात्र संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और मामले की जाँच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।
एक और नाम AISA की अंजलि का था, जो हाल ही में प्रेसिडेंट का चुनाव हार गई थीं।
वीडियो में एक लड़की रुचि तिवारी के बाल खींचती हुई दिखी। बताया जा रहा है कि उसकी पहचान तन्वी के तौर पर हुई है, जो DU से मास्टर्स की स्टूडेंट है।
गौरतलब है कि जिन छात्राओं के नाम इस ताज़ा विवाद में सामने आ रहे हैं, वे नवंबर 2025 में हुए ‘एंटी-पॉल्यूशन’ आंदोलन में भी शामिल रही थीं। उस प्रदर्शन में भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) और खुद को पर्यावरणीय समूह बताने वाले ‘हिमखंड’ से जुड़े छात्र सक्रिय थे। आरोप है कि उस दौरान प्रदर्शनकारियों ने मारे गए माओवादी कमांडर मडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगाए और पुलिस पर मिर्ची व पेपर स्प्रे का इस्तेमाल किया, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान कॉमरेड हिडमा अमर रहे और हर घर से हिडमा निकलेगा जैसे नारे लगाए गए। जब पुलिस ने हस्तक्षेप किया, तो प्रदर्शनकारियों ने न सिर्फ धक्का-मुक्की की, बल्कि पेपर स्प्रे का इस्तेमाल कर पुलिसकर्मियों की आँखों और चेहरे को नुकसान पहुँचाया।
इस मामले में 22 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दो FIR दर्ज की गईं, जिनमें से 16 को गिरफ्तार किया गया। 15 को सोमवार को पटियाला हाउस कोर्ट ने न्यायिक हिरासत में भेजा, जबकि एक आरोपित को खुद को नाबालिग बताने पर किशोर गृह भेजा गया। FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 197 भी जोड़ी गई, जो भारत की संप्रभुता, एकता और सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कृत्यों या बयानों से संबंधित है।
दिसंबर 2025 में दिल्ली की एक कोर्ट ने गुरकीरत कौर, रवजोत कौर, क्रांति उर्फ प्रियंशु, आयशाह वफिया, अभिनाश सतपथी और इलाकलिया को जमानत दे दी थी। जमानत मिलने के बाद bsCEM की गुरकीरत कौर अब प्रॉ-यूजीसी प्रदर्शन में भी सक्रिय दिखीं और आरोप है कि वह उसी समूह का हिस्सा थीं जिसने रुचि तिवारी को घेरा और प्रताड़ित किया।
यह भी उल्लेखनीय है कि 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले bsCEM ने दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों पर नारे लिखकर मतदान का बहिष्कार करने की अपील की थी। संगठन के सदस्यों ने एक ही रास्ता नक्सलबाड़ी जैसे नारे लगाए थे नक्सलबाड़ी वही स्थान है जहाँ से भारत में नक्सल आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है। इसके अलावा इस कट्टर वामपंथी संगठन पर ब्राह्मण विरोधी बयानबाजी को बढ़ावा देने के आरोप भी लगते रहे हैं।
‘ऊँची जातियों के साथ नहीं हो सकता भेदभाव’ – ये कहने वाली वकील दिशा वाडेकर हुईं गलत साबित
इसी महीने की शुरुआत में UGC नियमों से जुड़े मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील दिशा वाडेकर ने कई इंटरव्यू में कहा था कि अगर जाति-आधारित भेदभाव संबंधी प्रावधान को कास्ट-न्यूट्रल बना दिया जाए, तो फिर उस प्रावधान का उद्देश्य ही क्या रह जाएगा।
उन्होंने द टेलीग्राफ इंडिया से बातचीत में कहा था कि सेक्शन 3(सी) में जाति-आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC के खिलाफ होने वाले भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। उनके मुताबिक, अगर इस परिभाषा में अन्य श्रेणियों को भी शामिल कर इसे पूरी तरह कास्ट-न्यूट्रल बना दिया जाए, तो फिर भेदभाव की अवधारणा ही खत्म हो जाएगी।
एक अन्य साक्षात्कार में वाडेकर ने यह भी कहा कि वह यह नहीं कह रहीं कि सवर्ण या ऊपरी जाति के छात्र कभी उत्पीड़न का सामना नहीं करते, लेकिन उनके अनुसार ऐसे मामले व्यक्तिगत प्रकृति के होते हैं, न कि किसी जातिगत पहचान पर आधारित सामूहिक भेदभाव का परिणाम।
हालाँकि, पिछले कुछ समय में कैंपस में ब्राह्मण और बनिया समुदाय के खिलाफ नारेबाजी, दीवारों पर उकसाऊ और हिंसक संदेश लिखे जाने, ब्राह्मण कैंपस छोड़ो जैसे नारे, यहाँ तक कि कुछ मामलों में ब्राह्मण छात्रों का जनेऊ जबरन काटने जैसे आरोप भी सामने आए हैं।
आलोचकों का कहना है कि ऐसे घटनाक्रम वाडेकर के उस तर्क को चुनौती देते हैं, जिसमें सवर्ण समुदायों के खिलाफ समूह-आधारित जातिगत शत्रुता की संभावना को कमतर आंका गया। रुचि तिवारी के साथ उनकी ब्राह्मण पहचान को लेकर की गई बदसलूकी और हमला भी इसी बहस के केंद्र में आ गया है।
दिलचस्प बात यह है कि दिशा वाडेकर ने अधिवक्ताओं प्रसन्ना एस और इंदिरा जयसिंह के साथ मिलकर UCC बिल में शामिल किए जाने वाले 10 सुझावों का मसौदा तैयार किया था, जिनमें जाति-आधारित भेदभाव से जुड़ा बिंदु भी शामिल था।
वाडेकर का तर्क यह माना जाता है कि ब्राह्मण, ठाकुर या अन्य सामान्य वर्ग के लोग जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते। लेकिन रुचि तिवारी प्रकरण जहाँ आरोप है कि उन्हें उनकी ‘ब्राह्मण’ पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया इस दावे पर नए सिरे से सवाल खड़े कर रहा है।
फिलहाल यह मामला जाँच के अधीन है, लेकिन इस घटना ने एक व्यापक बहस छेड़ दी है, क्या जातिगत शत्रुता और हिंसा का शिकार केवल कुछ निर्धारित श्रेणियाँ ही हो सकती हैं या फिर सामाजिक तनाव की परिस्थितियों में कोई भी समुदाय लक्षित हो सकता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)