कश्मीरी पंडितों से नेहरू ने कहा - "या तो शेख अब्दुल्लाह के साथ रहो, या जहन्नुम में जाओ।" राजीव गाँधी बोले - "फारूक मेरे दोस्त हैं, क्या करें।" पीड़ितों से सुनिए अनसुनी दर्द की दास्ताँ।
बबेले जो काम कभी पत्रकारिता का चोला ओढ़ कर करते थे, वह अब खुलकर करने लगे हैं। कश्मीरी हिंदुओं को लेकर ट्विटर पर उन्होंने जो दस्त की है, वह इसका ही एक नमूना है।
काशी में रंगभरी एकादशी 358 वर्षों से अपने भव्यतम स्वरूप में निरंतर निभाई जा रही है। इसके पहले कहा जाता है कि मुग़लों के शासन में लम्बे समय तक यह परंपरा बाधित रही।