फॉंसी से कुछ घंटे पहले वो वर्जिश कर रहे थे। जेल के एक अधिकारी ने पूछा- अब इसकी क्या जरूरत? जवाब मिला- हिन्दू हूॅं। पुनर्जन्म में विश्वास रखता हूॅं। अगले जन्म में भारत मॉं की सेवा के लिए और तंदरुस्त होकर लौटना चाहता हूॅं।
कॉन्ग्रेस के लोग जिस तरह से व्हाट्सप्प ग्रुप बना कर कॉलेज कैम्पस में उपद्रव की साज़िश रच रहे हैं, उसका पर्दाफाश होना ज़रूरी है। इन ग्रुप्स में कॉन्ग्रेस से जुड़ाव छिपा कर उपद्रव को न्यूट्रल प्रोटेस्ट साबित करने की कोशिश की जाती है। जानिए उस ग्रुप के एडमिन्स और मैसेजों के बारे में।
मीडिया के कुछ बड़े नाम हैं, जो लदीदा और आयशा को वर्षों से तैयार कर रहे थे। एक 317 लोगों के कातिल याकूब की समर्थक है, दूसरी काफ़िरों के ख़िलाफ़ जिहाद की बात करती है। सूडानी आंदोलन की तर्ज पर इन्हें नायिकाओं की तरह पेश किया गया। जामिया के इस कमाल के स्क्रिप्ट का सूत्रधार कौन?
CAA का किसी भी सूरत में भारत के नागरिकों से सरोकार नहीं है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। बावजूद इसके हिंसा। लगता है नागरिकता संशोधन कानून तो महज बहाना है। साजिशें गहरी हैं। इन साजिशों का पता लगाया जाना वक्ती जरूरत है।
"अगर उनमें से 70% लोग अमित शाह का समर्थन करते हैं, तो बीजेपी यहाँ सत्ता में आ जाएगी। तब आप अपना सिर नहीं उठा सकेंगे, जैसा वे (बीजेपी) उत्तर प्रदेश में करते हैं। तब कोई भी सड़कों पर नहीं आएगा।"
अफवाहों को चारों तरफ़ से नकारे जाने के बाद भी सोशल मीडिया पर पुलिस की गोली से जामिया के छात्रों के मारे जाने की ख़बरें लगातार सर्कुलेट होती रहीं। न सिर्फ़ प्रोपेगेंडा पोर्टलों ने बल्कि कुछ पत्रकारों ने भी छात्रों को भड़काने के लिए झूठी ख़बरें शेयर की।
"छात्र होने का मतलब यह नहीं है कि वे कानून-व्यवस्था अपने हाथ में ले सकते हैं। हम शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अधिकारों के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुॅंचाया जा सकता। ऐसे हालात में पुलिस को कदम उठाना ही होगा।"
बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने एनआरसी का भारत के साथ संबंधों पर विपरीत असर पड़ने की खबरों को किया खारिज। कहा, भारत के साथ संबंध काफी अच्छे हैं और एनआरसी से इस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
नूपुर ने सोशल मीडिया में एक कमेंट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि दुआ करनी चाहिए कि मोदी जिस नाव पर बैठें, वो नाव ही डूब जाए। इसके बाद उन्होंने दुआ करते हुए लिखा कि काश नदी में सुनामी आ जाए और मोदी की नाव डूब जाए।
जातिगत भेदभाव के आरोपों में घिरे प्रोफेसर दिलीप मंडल और मुकेश कुमार जॉंच पूरी होने तक माखनलाल यूनिवर्सिटी के कैंपस में प्रवेश नहीं कर पाएँगे। लेकिन, उससे पहले छात्रों के साथ जो कुछ हुआ वह हतप्रभ करने वाला था। पीड़ित छात्रों की जुबानी सुनिए उस रात की प्रताड़ना।