जब ट्वॉयलेट पेपर खत्म हो जाता है तो आप ढूँढते हैं कि वो कहाँ रखा हुआ है। इसी क्रम में जब स्क्रॉल वेबसाइट पर यह देखने पहुँचा कि क्या इन्होंने ममता बनर्जी के बंगाल में हो रहे चुनावी हिंसा पर कुछ लिखा है? तो, कुछ नहीं मिला।
ममता सरकार की इस बड़ी कार्रवाई में बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया का अनुसरण किए और बिना किसी चार्ज के कई भाजपा नेताओं को उठा लिया गया। बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रैली के लिए देश के कई क्षेत्रों से भाजपा नेता कोलकाता में जाकर ठहरे हुए थे।
गैर-मुस्लिम मर्द के साथ प्रेम करना सलमा को बहुत भारी पड़ा। अपने ही दो भाइयों के जान से मारने की कोशिश (गला घोंटने और एसिड डालने) के बाद वो अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल तो रही है लेकिन बार-बार अपनी अम्मी (माँ) को खोज रही है। वो उस माँ को खोज रही है, जो अस्पताल में अपनी तड़पती बेटी को छोड़कर अचानक से भाग गई।
मीडिया गिरोह या अधिकांश विरोधियों की टिप्पणी ऐसे छद्म विशेषज्ञों की बेवकूफी का प्रमाण है। बादल विभिन्न तरीकों से रडार प्रणाली के कई पहलुओं को प्रभावित करते हैं और एक कुत्ते के साथ एक तस्वीर को ट्वीट करने से तथ्य बदलने वाला नहीं है।
ये लड़ाई हवसी मानसिकता को सुधारने की है, लड़कियों को समाज में भोग की वस्तु के बजाय सशक्त बनाने की है... शरिया के लागू होने का सुझाव सिर्फ़ आक्रोश में उचित लग सकता है, लेकिन एक सभ्य समाज में हर अपराध पर ऐसे कानून की बात करना अनुचित है।
बिहार में जाति के आधार पर कैसे खेल खेला जाता है, इसे उम्मीदवारों के दाँव-पेंच के साथ इस उदाहरण द्वारा समझिए, ये आपको कहीं भी नहीं पता चलेगा, इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए आपको बिहार की राजनीति, समाज और सोच में घुली-मिली पूरी व्यवस्था को समझना पड़ेगा।
आज हम समय के उसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ इस्लामी आक्रांताओं ने एक बार फिर रूप बदल लिया है, और गायों का झुंड हमारी तरफ छोड़ दिया है क्योंकि वो जानते हैं कि वाजपेयी जी की भाजपा इन गायों को प्रणाम कर के, उनके सींगों में झुनझुने बाँधने में व्यस्त हो जाती।
इन एग्जिट पोल्स के आते ही गिरोह विशेष के लोग इसे प्रसारित करने में क्यों व्यक्त हो जाते हैं? क्या दल विशेष को फ़ायदा पहुँचाने के लिए ऐसा हो रहा है? यौन शोषण आरोपित विनोद दुआ, समाचार एजेंसी आईएएनएस, प्रोपेगंडा वेबसाइट न्यूज़क्लिक और ब्रिटिश पत्रकार द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल्स को लेकर चुनाव आयोग उन सब पर कोई कार्रवाई करेगा?
90 के दशक में बिहार में किसी भी कार्य को करने के लिए, चाहे वो भवन निर्माण हो या दुकानदारी, सब के लिए एक अत्यंत ही 'सरल रंगदारी टैक्स' चुकाना पड़ता था। यह एक 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस' जैसी व्यवस्था हुआ करती थी। जहाँ रंगदारी के एकमुश्त भुगतान के तुरंत बाद ही आप अपना काम करने के लिए स्वतंत्र हो जाते थे।