मतदान बाद EVM को लाल चुनरी से सील कर उसे पवित्र धागे से बाँधा जाए: विपक्ष का छोटा पंडित

क्या अगर कोई व्यक्ति अपने ब्लूटूथ डिवाइस का नाम 'डोनाल्ड ट्रम्प' रख लेना तो यह माना जाए कि वह यहाँ दिल्ली के साकेत में अपने चार बाई चार के कमरे में बैठे-बैठे अमेरिका के राष्ट्रपति को अपनी उँगलियों पर नचा रहा है?

ईवीएम की महिमा अपरम्पार है। ईवीएम महान है। ईवीएम आज किसी भी समयकाल में सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि इसे लेकर तरह-तरह के दावे हो रहे हैं। इन दावों को सुन कर लगता है कि जैसे ये मशीन न होकर कोई किसी रोबोट रूपी देवता का अवतार हो। जैसे भवान विष्णु ने राम के रूप में धरती पर क़दम रखा था और उनके विश्वस्त शेषनाग ने लक्षमण के नाम से अवतरित होकर उनके छोटे भाई का किरदार अदा किया था, ठीक वैसे ही मोदी और ईवीएम का भी कोई रिश्ता है। हो सकता है मोदी भी किसी ऐसे देवता के अवतार हों, जिनके विश्वस्त और वफ़ादार ने ईवीएम का रूप लेकर धरा पर क़दम रखा हो। मोदी और ईवीएम के रिश्ते समझने के लिए विपक्षी नेताओं के दावों, बयानों और डर को समझना पड़ेगा। मोदी न तो वैज्ञानिक हैं और न ही कोई तकनीकी विशेषज्ञ, फिर भी ईवीएम उनके इशारों पर नाचता है।

एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार अभी देश के सबसे वरिष्ठ, अनुभवी और माहिर नेताओं में से एक रहे हैं। अगर वो कुछ कहते हैं तो ध्यान से सुना जाना चाहिए। पिछले पॉंच दशकों से भी अधिक समय से देश की चुनावी राजनीति में सक्रिय पवार ने बारामती में वोट गिराने के बाद एक चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने कहा कि एक्सपेरिमेंट के तौर पर हैदराबाद में ‘कुछ लोगों’ ने उनके सामने एक ईवीएम रखा और वोट डालने को कहा। जब उन्होंने अपनी पार्टी का बटन दबाया तो वोट भाजपा को चला गया। अब ‘कुछ लोगों’ ने पवार के सामने ‘क्या’ पेश किया था, ये तो वो ही लोग जानें, लेकिन एक बात तो साफ़ है कि पवार को दक्षिण मुंबई संसदीय क्षेत्र में ऐसी कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा होगा।

पवार ने साउथ मुंबई लोकसभा क्षेत्र में मतदान किया। यहाँ न तो एनसीपी के प्रत्याशी खड़े हैं और न ही भाजपा के। इस सीट पर लड़ाई शिवसेना के अरविन्द गणपत सावंत और कॉन्ग्रेस के मिलिंद देवड़ा में है। पवार को निश्चिन्त रहना चाहिए क्योंकि साउथ मुंबई में उनका वोट भाजपा को जा ही नहीं सकता है। आगे बढ़ते हैं। कभी वाईफाई से ईवीएम हैक करने की बात कही गई, तो कभी ब्लूटूथ से ईवीएम को नियंत्रित करने की अफवाह उड़ी। क्या अगर कोई व्यक्ति अपने ब्लूटूथ डिवाइस का नाम ‘डोनाल्ड ट्रम्प’ रख लेना तो यह माना जाए कि वह यहाँ दिल्ली के साकेत में अपने चार बाई चार के कमरे में बैठे-बैठे अमेरिका के राष्ट्रपति को अपनी उँगलियों पर नचा रहा है?

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अगर नियंत्रण करने की ही बात है तो उसके लिए वाईफाई और ब्लूटूथ की ज़रूरत नहीं होती। सोनिया और मनमोहन को ही उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। ऐसी हैकिंग आज तक नहीं देखी गई। कुछ दिनों बाद हो सकता है कि विपक्ष को ये भी लगने लगे कि मोदी तंत्र साधना कर के ईवीएम को हैक कर रहे हैं। इधर मोदी ने केदारनाथ की गुफा से ध्यान लगाया और उधर ईवीएम के सारे वोट भाजपा को ट्रांसफर। खटैक! तो फिर ऐसे हालात में विपक्ष को क्या करना चाहिए? उपाय क्या है? जब आरोप फ़िल्मी लग रहे हैं तो उपाय भी फ़िल्मी ही होना चाहिए। कहते हैं मंत्र-तंत्र में हर समस्या का समाधान है। क्या पता मोदी ने ईवीएम के भीतर कोई पिशाच छोड़ दिया हो?

भूल-भुलैया फ़िल्म में ‘छोटा पंडित’ ने महल में भूत को कंट्रोल करने के लिए एक कमरे को विशेष मन्त्रों द्वारा सील करने की कोशिश की थी। विपक्षी नेताओं को भी कोई ऐसा ही तांत्रिक हायर करना चाहिए, छोटा पंडित की तरह। चुनाव आयोग से माँग की जानी चाहिए कि ईवीएम को मतदान के तुरंत बाद लाल चुनरी में लपेट कर उसे विशेष लॉकेट और पवित्र धागों का प्रयोग कर के सील करना चाहिए, ताकि मोदी द्वारा हायर किए गए भूत-पिशाच वोटों की हेराफेरी न कर सकें। या फिर विज्ञान में विश्वास रखने वाले विपक्ष के नेता भूल-भुलैया के अक्षय कुमार की तरह विदेश से किसी मनोचिकित्सक को बुलाना चाहिए, जो ईवीएम में से इन गड़बड़ियों को दूर कर सके।

चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट पर अगर आपको विश्वास नहीं है तो कुछ लीक से हटकर उपाय करने पड़ेंगे। अगर ईवीएम सेक्युलर है और वामपंथियों को मंत्र-तंत्रों में विश्वास नहीं है तो अजमेर शरीफ दरगाह से ताबीज़ लाकर उसे बाँधा जा सकता है। चुनाव आयोग को एक ज्ञापन दिया जाना चाहिए कि प्रत्येक ईवीएम को प्रयोग किए जाने से पहले जामा मस्जिद के इमाम और देवबंद के मुफ़्ती से सभी मशीनों का प्रमाणीकरण कराना चाहिए, इससे मतगणना के समय किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को तुरंत पकड़ कर सम्बंधित फतवा जारी किया जा सकता है। अधिक सेक्युलर वामपंथी यह माँग कर सकते हैं कि चुनाव से पहले मतदानकर्मियों द्वारा ईवीएम लेकर चर्च में ‘वैसा वाला’ पागलपन किया जाए, जिसके वीडिओज़ अक्सर वायरल होते रहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन्हें बार-बार निराश किया जा रहा है। ‘सबसे बड़े दलित नेता’ उदित राज ने तो सुप्रीम कोर्ट को ही खरी-खोटी सुनाई है। चुनाव आयोग तो भला कई दिनों से इनकी गालियाँ खा रहा है। जिस चुनाव आयोग की विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा होती है, उसी चुनाव आयोग की अपने ही देश में हर मिनट आलोचना हो रही है, आरोप लगाए जा रहे हैं और अफवाहें उड़ाई जा रही हैं। चुनाव आयोग द्वारा लाख समझाने के बावजूद विधानसभा में खिलौनों को हैक कर ईवीएम को हैक करने का दावा करने वाले नेता अड़े हुए हैं। फिर उपाय ही क्या बचता है? नकाबपोश सूजा ईवीएम को लेकर अजीबोगरीब दावे कर ईवीएम एक्सपर्ट बन बैठा है।

अगर इतनी गंभीर और तथ्यपरक बातें उन्हें समझ नहीं आ रही हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि विपक्षी नेताओं को लगता है कि कुछ अजीब हुआ है। हो सकता है उन्होंने ‘तिरंगा’ फ़िल्म देख रखी हो। गैंडास्वामी की मिसाइलों का फ्यूज निकाल कर राजकुमार ने दुश्मन के इरादों को तबाह कर दिया था। कहीं मोदी भी कुछ ऐसा ही तो नहीं कर रहे? कहीं वो मतदान के बाद डायरेक्ट ईवीएम के सारे फ्यूज ही तो नहीं निकाल लेते हैं, तिरंगा वाले राजकुमार की तरह। या फिर ऐसे विपक्षी नेता, जिन्हें वीवीपैट पर भी विश्वास नहीं है और वो अलग ही लेवल पर पहुँच चुके हैं, उनके लिए आयोग को विशेष व्यवस्था करनी चाहिए।

ऐसे नेताओं को ईवीएम का नट-बोल्ट खोलने के लिए पेचकस और पिलास दे देना चाहिए ताकि वे वोट देने के बाद ईवीएम को खोलें और अंदर झाँक कर देख सकें कि आख़िर उनका वोट गया कहाँ, किस पार्टी को गया। ये नेता वोट देने के बाद ईवीएम को खोलेंगे, झाँक कर देख लेंगे कि उनका वोट इच्छित पार्टी को गया है या नहीं और फिर उसे वापस पेचकस से कस सकते हैं। नेताओं को लगता है कि ईवीएम के भीतर तार हैं और वो तार सीधे मोदी से जुड़े हुए हैं। कहावत सच्चाई का रूप ले रही है। छोटा पंडित वाला उपाय किया जाए, मजार से ताबीजें लाई जाए या फिर ये तिरंगा वाला मामला है, ये तो समय विपक्षी नेताओं को ही तय करना चाहिए।

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