बग्गा ने रिया को व्हाट्सएप मैसेज किया और कहा कि वो उनसे एक प्रमोशनल ट्वीट करवाना चाहते हैं। रिया ने इसके लिए हामी भर दी और इसकी कीमत पूछी। बग्गा ने रिया को प्रत्येक ट्वीट के लिए 500 रुपए देने की बात कही। रिया इसके लिए भी तैयार हो गई और एक फेक ट्वीट को...
गृह मंत्री रहते चिदंबरम ने हिंदी के पूरे देश की भाषा बनने की उम्मीद जताई थी। सरकारी दफ्तरों में संवाद के लिए हिंदी के इस्तेमाल पर जोर दिया था। लेकिन, अब जिस तरह उनकी पार्टी और गठबंधन के साथी अमित शाह के बयान पर जहर उगल रहे हैं उससे जाहिर है यह अंध विरोध के अलावा कुछ भी नहीं।
फारूक अब्दुल्ला को जिस पीएसए एक्ट तहत हिरासत में लिया गया है उसमें किसी व्यक्ति को बिना मुक़दमा चलाए 2 वर्षों तक हिरासत में रखा जा सकता है। अप्रैल 8, 1978 को जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल से इसे मंजूरी मिली थी। यह क़ानून लकड़ी की तस्करी रोकने के लिए लाया गया था।
चिदंबरम ने ट्वीट में बिगड़ी अर्थव्यवस्था का जिक्र किया। उन्होंने देश से घटते निर्यात को लेकर चिंता जताई। मौजूदा हालात का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान इस देश को बचाए।
एन राम चिदंबरम को जेल भेजने के लिए देश की अदालतों की आलोचना करने से भी नहीं चूके। उन्होंने कहा कि इस गिरफ्तारी की साजिश करने वालों का मकसद सिर्फ और सिर्फ चिदंबरम की आजादी पर बंदिश लगाना था और दुर्भाग्यवश देश की सबसे बड़ी अदालतें भी इसकी चपेट में आ गईं।
मदरसों में गुलामों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं बच्चे। मौलवी उनसे भीख मॅंगवा सालाना लाखों कमाते हैं। पैसा लेकर नहीं आने पर पीटते हैं। शिकायत करने पर धमकाते हैं। दीनी तालीम के नाम पर हो रहा है अमानवीय बर्ताव।
मलाला के साथ पाकिस्तान में जो कुछ हुआ वह दुखद है। लेकिन, श्रीश्री ने तीन साल पहले ही कह दिया था कि वह नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं हैं। उनकी बातें कश्मीर पर पाकिस्तानी प्रोपगेंडा की बानगी भर है। उन्हें सिंध में जबरन इस्लामिक धर्मान्तरण नहीं दिखता। असल में बर्मिंघम में रहकर आतंक का अब्बा पाकिस्तान जन्नत ही दिखता है।
हिन्दीभाषियों के घमंड के दूसरे एक्सट्रीम पर वो लोग हैं जो हिन्दीभाषियों को घृणा से देखते हैं। एक बंगाली व्यक्ति ने लिखा कि हिन्दी वाले गुटखा खाने वाले हैं, गाली देने वाले हैं, भ्रूणहत्या करने वाले हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हैं, ढोकला चुराने वाले हैं, भुजिया खाने वाले रक्तचूसक कीड़े हैं।
ताज़ा खुलासे से पता चलता है कि प्रशांत किशोर की कम्पनी ममता बनर्जी की तृणमूल के लिए सोशल मीडिया में एक बड़ा इकोसिस्टम खड़ा कर रही है, जिसमें कई डिजिटल पोर्टल्स और 'इन्फ्लुएंसर्स' शामिल हैं। यह सब रुपयों के दम पर किया जा रहा है।
मजहब को टोपी-चादर के नाम पर लुभाने की राजनीति अब देश की सरकार को झूठा बता पाकिस्तानी प्रोपगेंडा को हवा देने तक पहुॅंच गई है। ऐसे लोगों को न तो पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद दिखाई दे रहा और न ही बलूचिस्तान का नरसंहार। पूरा का पूरा लिबरल गिरोह और मानवाधिकार के कथित पैरोकार मौन हैं।