Friday, July 10, 2020
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टैगोर ने महात्मा गाँधी की देशभक्ति और चरखा को विचारधारा का व्यापार बताया था

'जिन्ना-जीवियों' की परिभाषाओं पर विश्वास किया जाए तो क्या महात्मा गाँधी भी एक तानाशाह थे? क्योंकि महात्मा गाँधी ने देशभक्ति को निहायती जरुरी चीज बताते हुए 'चरखा' और 'असहयोग' को देशभक्ति का पहला हथियार बताया था।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

भारतीय राजनीति में कुछ समय से देशभक्ति, राष्ट्रवाद और हायपर नेशनलिज़्म जैसे शब्द प्रमुख चर्चा का विषय बन चुके हैं। विचारधारा के इस टकराव में हर दिन राजनेताओं से लेकर मीडिया तक में सुबह से शाम तक एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है। इसका उदाहरण यह है कि सुबह उठकर नहा-धोकर जो व्यक्ति गाँधीवादी नजर आता है, शाम होते ही वो जिन्ना-वादी बना घूमता है। इन सबके बीच यदि एक बात कॉमन है तो वो है नरेंन्द्र मोदी। जब सामने वाले व्यक्ति के मत और सिद्धांत सिर्फ इस वजह से बदल जाएँ कि उसे एक व्यक्ति का विरोध ही करना है, तब रवीन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गाँधी स्वतः ही प्रासंगिक हो जाते हैं।

देशभर में चल रहे आम चुनावों में मोदी सरकार की सबसे बड़ी ताकत, राष्ट्रवाद और देशभक्ति को मीडिया से लेकर तमाम बुद्दिजीवियों ने खूब निशाना बनाया है। विगत कुछ वर्षों में मीडिया में बैठे कुछ जिन्ना-जीवियों के अनुसार बताया गया कि क्या कोई ऐसा तानाशाह गुजरा है, जो देशभक्त नहीं था? परिभाषाएँ पढ़ने को मिलीं कि तानाशाह सबसे पहले खुद को देशभक्त नंबर वन घोषित करते हैं, ताकि विरोधी अपने-आप देशद्रोही मान लिए जाएँ। इसलिए देशभक्ति के मुद्दे पर महात्मा गाँधी की राय जान लेनी आवश्यक हो जाती है।

यदि इस प्रकार की परिभाषाओं पर विश्वास किया जाए तो क्या इन विचारकों के अनुसार महात्मा गाँधी भी एक तानाशाह थे? क्योंकि महात्मा गाँधी ने देशभक्ति को निहायती जरुरी चीज बताते हुए ‘चरखा’ और ‘असहयोग’ को देशभक्ति का पहला हथियार बताया था। क्या आप जानते हैं कि देश के पहले नोबल पुरस्कार विजेता, यानी रवीन्द्रनाथ टैगोर महात्मा गाँधी की इस देशभक्ति को विचारधारा का व्यापर मानते थे?

सबसे पहले टैगोर ने ही बुलाया था गाँधी जी को ‘महात्मा’

आज रवीन्द्रनाथ टैगोर का 158वाँ जन्मदिन है, इसलिए यह बेहतर समय है ये जानने का कि उनके विचार ‘देशभक्ति’ पर आखिर क्या थे? गीतांजलि की रचना के बाद वर्ष 1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर-यूरोपियन थे। टैगोर के मन में महात्मा गाँधी के लिए बहुत आदर था। यहाँ तक कि गाँधी जी को पहली बार ‘महात्मा’ नाम से सम्बोधित करने वाले टैगोर ही थे। हालाँकि, वह गाँधी जी से कई बातों पर उतनी ही असहमति भी दिखाते थे। राष्ट्रीयता, देशभक्ति, सांस्कृतिक विचारों की अदला बदली, तर्कशक्ति ऐसे ही कुछ मसले थे। हर विषय में टैगोर का दृष्टिकोण परंपरावादी कम और तर्कसंगत ज्यादा हुआ करता था, जिसका संबंध विश्व कल्याण से होता था।

टैगोर करते थे महात्मा गाँधी की देशभक्ति की आलोचना

गाँधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को वापस लेने के बाद उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया था। लेकिन फरवरी, 1924 को उनके खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया। जेल से बाहर आकर महात्मा गाँधी ने तमाम राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच ‘चरखा आंदोलन’ शुरू कर के देशवासियों को फिर से एक साथ जोड़ने का फैसला किया।

यही वो समय था जब कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने गाँधी जी के न सिर्फ चरखा आंदोलन और असहयोग आंदोलन पर, बल्कि उनकी देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर भी लेख लिखकर आलोचना की। टैगोर लगातार अपने लेखन में महात्मा गाँधी की देशभक्ति की आलोचना करते नजर आते थे। उन्होंने लिखा कि किस तरह से कुछ लोगों के लिए उनकी आजीविका है, उसी तरह से कुछ लोगों के लिए राजनीति है, जहाँ वो अपने देशभक्ति की विचारधारा का व्यापार करते हैं।

इस पर महात्मा गाँधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “मैं समझता हूँ कि कवि ने अनावश्यक रूप से असहयोग आंदोलन के नकारात्मक पक्ष को उभारा है। हमने ‘ना’ कहने की शक्ति खो दी है। सहयोग न करना ऐसा ही है, जैसे खेत में बीज बोने से पहले किसान खरपतवार को साफ करता है। खरपतवार को साफ करना काफी जरूरी है। यहाँ तक कि जब फसल बढ़ रही हो, तो भी ये जरूरी होता है। असहयोग का अर्थ है कि लोग सरकार से संतुष्ट नहीं हैं।” (यह संवाद 1 जून 1921 को ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित किए गए आर्टिकिल ‘द पोएट ऐंक्ज़ाइटी / The Poet’s Anxiety’ से लिया गया है)

हालाँकि, महात्मा गाँधी चरखा, असहयोग और स्वराज संबंधी टैगोर के प्रश्नों पर हमेशा की तरह खड़े रहे, अपना पक्ष रखा। उन्होंने इन्हें व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ने का साधन बताया था, ताकि लोगों को देशभक्ति के सूत्र में पिरोकर उन्हें औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ जगाया जा सके।

भूख की वजह से चल रहा है ‘चरखा’

देशभक्ति या राष्ट्रवाद के बारे में टैगोर का कहना था कि हमारी भाषा में ‘नेशन’ के लिए कोई शब्द नहीं है, जब हम दूसरों ये शब्द उधार लेते हैं, तो यह हमारे लिए सटीक नहीं बैठता। इस पर महात्मा गाँधी का जवाब था, “भारत में ‘चरखा’ भूख की वजह से चल रहा है। चरखा का प्रयोग करने के लिए कहना सभी कामों में पवित्र है। क्योंकि यह प्रेम है और प्रेम ही स्वराज है। हमारा असहयोग अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था से है, जो कि भौतिकतावादी संस्कृति और कमजोरों के शोषण पर आधारित है। हम अंग्रेजों से कहते हैं कि आओ और हमारी शर्तों पर हमें सहयोग करो। यह हम दोनों के लिए और पूरी दुनिया के लिए बेहतर होगा।” (1921 में यंग इंडिया में प्रकाशित लेख)

क्या देश के प्रगतिशील लोग महात्मा गाँधी की देशभक्ति से असहमत हैं?

यह भारतीय संस्कृति की खासियत है, जिसने एक ही समय में दो इतने विपरीत विचारधारा वाले और महान लोगों को जन्म दिया। जाने-माने फ्रेंच लेखक रोमेन रोलैंड ने इसे ‘द नोबल डिबेट’ कहा था। वर्तमान में देखा जाए तो गोदी मीडिया महात्मा गाँधी के नारे से असहमत नजर आती है। समाज का दूर से ही प्रगतिशील नजर आने की हर संभव कोशिश करता व्यक्ति; फिर चाहे वो विपक्ष हो, उनके सस्ते कॉमेडियंस हों, या उनकी गोदी मीडिया हो, आज देशभक्ति को हायपर नेशनलिज़्म साबित करने पर तुला हुआ नजर आता है।

यदि गौर किया जाए तो देशभक्ति को विशेष बनाने का काम आज इन्हीं लोगों ने किया है, जिन्होंने अपने दुराग्रहों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कद को इतना ऊँचा उठा दिया। पुलवामा आतंकी घटना से लेकर एक सेना से बर्खास्त जवान तक में मोदी विरोध का मौका तलाश लेने वाले लोगों को समझना चाहिए कि देश और देशभक्ति का मतलब अगर आज ‘मोदी’ बन चुका है, तो इसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं के अतार्किक विरोध का रहा है।

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आशीष नौटियाल
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