Sunday, January 24, 2021
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‘दि प्रिंट’ के लिए अलीगढ़ कांड का जिम्मेदार वो हिन्दू है जिसकी बच्ची की हत्या जाहिद ने की

ये किस तरह की पत्रकारिता है, जहाँ यह लिखा जा रहा है कि अगर आप कर्ज़ा नहीं चुका सकते तो सामने वाले द्वारा अपनी बेटी की हत्या के जिम्मेदार आप और सरकार हैं जो आपको इस लायक नहीं बना पाई कि आप क़र्ज़ चुका सकें। ये कैसी बेहूदी दलील है?

हाल ही में ‘दि प्रिंट’ वेबसाइट पर जनमोर्चा अखबार के स्थानीय संपादक का लेख छपा। इस लेख में लेखक ने योगी सरकार की आलोचना करने के लिए उन सभी हालिया घटनाओं की एक-एक पैराग्राफ में जानकारी दी गई जिन्हें आधार बनाकर योगी सरकार को निशाना बनाया जा सकता था। सामाजिक कृत्यों को राजनैतिक रूप देकर कैसे परोसा जाता है, ये हमें डिजिटल प्लैटफॉर्म पर मौजूद कई वामी पोर्टल पहले ही बता चुके हैं। लेकिन गुप्ता जी का ‘दि प्रिंट’ उन सबसे 2 पायदान ऊपर चढ़ने के लिए हमेशा ही प्रयासरत रहता है।

‘दि प्रिंट’ में प्रकाशित हुए लेख ‘उत्तर प्रदेश में जंगल राज जारी है और योगी देश और धर्म को सुरक्षित बता रहे हैं में हेडलाइन को विचारधारा के साथ सार्थक बनाने के लिए लेखक ने शुरू से अंत तक भरसक प्रयास किया। यहाँ योगी आदित्यानाथ को ‘अलबेले’ मुख्यमंत्री कहकर शुरूआत हुई और उनपर इस बात पर निशाना साधा गया कि योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार और प्रदेश की बातें कम करते हैं तथा मोदी सरकार और देश की बातें ज्यादा करते हैं। उनके उस वक्तव्य को पूरे लेख का आधार बनाया गया जिसमें सीएम योगी ने कहा था कि अब देश भी सुरक्षित है और धर्म भी।

जाहिर है कि योगी आदित्यनाथ के इस वक्तव्य से कुछ विशेष समुदाय के लोगों को आपत्ति होनी ही थी क्योंकि यहाँ देश और धर्म एक साथ सुरक्षित बताए जा रहे थे, जो कि पत्रकरिता के समुदाय विशेष की विचारधारा के मुताबिक बिलकुल असंभव है। उन्हें चाहिए कि कोई मुख्यमंत्री इस तरह के बयान दे कि जब तक देश में धर्म है तब तक देश असुरक्षित है। यहाँ धर्म और मजहब में फर्क़ की सेकुलरिज्म के नाम पर मोटी रेखा खींच दी जाती है, वो अलग बात है।

लेखक को देश में, और खासकर यूपी में, सुरक्षा को लेकर इसलिए संदेह है क्योंकि अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर करने के कारण एक पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर कार्रवाई हुई। वो कहते हैं कि देश आखिर कैसे सुरक्षित है जब सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर भर कर देने से गिरफ्तारी हो रही है। यूपी में इन घटनाओं को लेकर सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में रखने वाले पत्रकार की यूपी की चिंता से साफ़ पता चलता है वे कि बंगाल और छत्तीसगढ़ में हुई घटनाओं से अभी अपरिचित हैं या वो उनपर बात करना ही नहीं चाहते हैं या शायद उनके लिए योगी सरकार का बयान गलत साबित करना ज्यादा बड़ा विषय है।

दूसरी बात यह है कि देश में अगर अपराध हो रहे हों, और कानून अपना काम कर रहा हो तो उस से देश सुरक्षित रहता है, असुरक्षित नहीं। संपादक महोदय शायद किसी गुफा में रहते हैं जहाँ उन्हें किसी कबूतर के टाँग में फँसी चिट्ठी से पता चलता रहता है कि अपराध तो बस भारत में ही हो रहे हैं, बाकी जगह तो आदर्श स्थिति में है। अगर इस तरह के अपराधों को आधार बना कर जंगल राज बताया जाने लगे तब तो मैं जितनी द्रुत गति से टाइप कर सकूँ उतनी देर में देश का हर जिला और राज्य जंगल राज बना दिखेगा। सेलेक्टिवली अपराधों को निकाल कर, उन्हें उदाहरण बना कर दिखाना बताता है कि पत्रकार अजेंडाबाज़ी करना चाहता है क्योंकि पत्रकारिता तो उस से हो नहीं रही।

खैर, हैरानी की बात यह है कि इस लेख में अलीगढ़ मामले को भी आधार बनाकर योगी सरकार को घेरा गया। एक जघन्य अपराध जिसका पूरा जिम्मा सिर्फ़ कुंठित समाज में मौजूद घटिया मानसिकता को जाना चाहिए उसके लिए प्रशासन पर सवाल उठाए गए। यहाँ बताने की कोशिश हुई कि किस तरह से सरकार और प्रशासन ने मामले को सांप्रदायिक एंगल देने की कोशिश की है। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को उचित साबित करने के लिए लेखक यहाँ तथ्यों के साथ ही खेल गए। संपादक पद पर पहुँचने के बाद भी जहाँ एक व्यक्ति एक अनुभवी पत्रकार और लेखक में बदल चुका होता है, वहीं उसे बहुत अच्छे से मालूम होता है कि उसका पाठक उसकी लेखनी से कहीं न कहीं एक सोच को विकसित करेगा, जिसका फर्क़ समाज पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा।

अपने लेख में योगी आदित्यनाथ पर सवालों के तीर चलाने में लेखक इतने व्यस्त रहे कि उन्होंने शायद मामले का जिक्र करने से पहले उससे जुड़ी जानकारी भी नहीं ली या फिर पाठक को बरगलाना ही उनका मूल मकसद था। संपादक महोदय ने इस लेख में बताया, “गुनहगारों की गिरफ्तारी के बाद जिलाधिकारी ने जब मामले की मजिस्ट्रेट जाँच का ऐलान कर दिया तो भी हिन्दू-मुस्लिम एंगल तलाशने और लाभ उठाने की कोशिशें तब तक हार मानने को तैयार नहीं हुईं, जब तक यह बात सामने नहीं आ गई कि हिन्दुओं के शुभ की भाजपा अथवा योगी राज की तमाम चिंताओं का सच यह है कि एक सामान्य हिन्दू परिवार के लिए उस पर चढ़ा 10 हजार रुपयों का कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो गया है।”

द प्रिंट के लेख में परोसे गए झूठे तथ्य का स्क्रीनशॉट

इस लेख में प्रशासन पर हिंदू-मुस्लिम का एंगल देने का इल्जाम लगाने वाले लेखक देखते ही देखते कैसे यहाँ हिन्दू और समुदाय विशेष का खेल कर गए, शायद किसी नए पाठक को इसका पता भी न चले। क्योंकि जिन्हें अपने लेखक पर यकीन होता है वो उसके लिखे को ही अंतिम सत्य मान लेता है। खबर की हकीकत ये थी कि टप्पल की उस बच्ची की जान उस जाहिद ने ली जिसके ऊपर बच्ची के पिता के 10,000 रुपए उधार बाकी थे। यहाँ उधार देने वाला हिन्दू है, लेने वाला समुदाय विशेष का, न कि उल्टा जो कि पत्रकार ने लिखा और ‘दि प्रिंट’ ने छाप दिया। पैसे न देने के कारण जाहिद की बच्ची के पिता के साथ कहा-सुनी हुई और बेइज्जती का बदला लेने के लिए जाहिद ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस घटना को अंजाम दिया। लेकिन ‘द प्रिंट’ में प्रकाशित लेख में नैरेटिव ये बनाने का प्रयास हुआ कि योगी सरकार के सत्ता में होने के बावजूद एक हिंदू इस काबिल नहीं था कि वो अपना कर्ज चुका सके।

इतना बड़ा मामला और अखबार का संपादक इस मुख्य तथ्य से अनभिज्ञ रह गया? या ये कहें कि इस मामले में संपादक ने खबर की गंभीरता और तथ्यों से ज्यादा अपनी विचारों को परोसना उचित समझा, ताकि अन्य अपराधों की सूची के बीच उनका ये झूठ छिप जाए और पाठक वर्ग की मानसिकता पर ये छाप भी छूटे कि यहाँ भी सरकार और प्रशासन ही दोषी है, उन्हीं के कारण एक मासूम के साथ किसी घृणित मानसिकता के व्यक्ति ने और उसके साथियों ने इतना बड़ा अपराध किया। इसमें किसी समुदाय विशेष से जुड़े व्यक्ति का कोई दोष नहीं है। बल्कि योगी सरकार का है जो एक हिंदू को इस लायक भी नहीं बना पाई कि वो अपना कर्ज चुकाए, जो वास्तविकता में उसने लिया ही नहीं है।

ये किस तरह की पत्रकारिता है, जहाँ अगर तथ्यों को हटा भी दिया जाए तो भी यह लिखा जा रहा है कि अगर आप कर्ज़ा नहीं चुका सकते तो सामने वाले द्वारा अपनी बेटी की हत्या के जिम्मेदार आप और सरकार हैं जो आपको इस लायक नहीं बना पाई कि आप क़र्ज़ चुका सकें। ये कैसी बेहूदी दलील है?

इस लेख में कुछ हालिया अपराधों का भी जिक्र है जिनपर बतौर इंसान हमें विचार-विमर्श और मंथन करने आवश्यकता है कि आखिर हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ हर लड़की और हर महिला हमेशा असुरक्षित है। लेकिन बतौर पाठक हमें इतना जागरूक रहने की भी जरूरत है कि हम ‘संपादक महोदय’ जैसे लोगों के गढ़े गए नैरेटिव में सच को गलत और गलत को सच न समझने लगें।

असली खबर से इतनी बड़ी छेड़-छाड़ के बाद प्रकाशित हुआ ‘दि प्रिंट’ पर ये लेख इस बात का सबूत है कि आज सरकार के प्रति मीडिया गिरोह में इतनी घृणा भर चुकी है कि यदि कोई व्यक्ति सरकार पर झूठा इल्जाम भी लगा दे तो वो उसे पब्लिक डोमेन में पहुँचाने में गुरेज नहीं करेंगे, क्योंकि इस मीडिया गिरोह के लिए अब पत्रकारिता का मतलब सिर्फ़ सरकार की आलोचना है। लेख के आखिर में लेखक का परिचय देना और लेख को संपादक के निजी विचार कहना, इस बात को दर्शाता है कि अब पत्रकारिता में निहित नैतिकता के मूल तत्व से वैचारिक संतुष्टि रिप्लेस हो चुके हैं।

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