Tuesday, September 29, 2020
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देश के दूसरे NSA जे एन दीक्षित की हत्यारी कॉन्ग्रेस आज NSC को कानूनी दर्ज़ा देने की बात कर रही है

सोनिया गाँधी ने दीक्षित की मृत्यु के बाद एक ऐसे व्यक्ति को NSA बनाया था जिसने NSA रहते अपना दायित्व नहीं निभाया। कॉन्ग्रेस की सरकार ने मुंबई हमले के बाद 2014 में सरकार जाने तक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को वैधानिक दर्ज़ा देने के बारे में नहीं सोचा न ऐसा कोई कानून लाने की बात की गई।

कॉन्ग्रेस ने अपने मैनिफेस्टो में लिखा है कि सत्ता में आने पर वे राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) के पद को वैधानिक दर्ज़ा (statutory status) प्रदान करेंगे। यही नहीं कॉन्ग्रेस का यह भी कहना है कि इन संस्थानों को वे संसद के प्रति जवाबदेह भी बनाएंगे। कॉन्ग्रेस के यह वायदे लगते तो बहुत अच्छे हैं लेकिन इनके पीछे जो नीयत है वह सही नहीं लगती। इसके बहुत सारे कारण हैं। पहले हम NSA और NSC के कामकाज पर संक्षेप में चर्चा करेंगे।

हम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का इतिहास देखें तो पाएंगे कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी संस्था बनाने के लिए एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया था जिसके सदस्य थे कृष्ण चंद्र पंत, जसवंत सिंह और एयर कमोडोर जसजीत सिंह (सेवानिवृत्त)। दिसंबर 1998 में इस टास्क फ़ोर्स के सुझावों पर अमल करते हुए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद’ (National Security Council) का गठन किया गया था।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद तीन अंगों वाली परिषद है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (National Security Adviser), NSC का पूरा कामकाज देखते हैं। NSC का मुख्य कार्य देश की सारी इंटेलिजेंस एजेंसियों से प्राप्त गुप्त सूचनाओं में से महत्वपूर्ण जानकारी पर प्रभावी रूप से एक्शन लेना है।

अटल जी ने यह संस्था अमेरिकी मॉडल पर बनाई तो थी लेकिन इसे संसद द्वारा पारित किसी कानून के अंतर्गत नहीं बनाया गया था। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश द्वारा बनाई गई परिषद है जिसका कार्य प्रधानमंत्री को देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा की स्थिति पर नीतिगत निर्णय लेने में सहायता करना है। अटल जी ने अपने विश्वस्त सहयोगी ब्रजेश मिश्रा को NSA नियुक्त किया था जो प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव भी थे। उस जमाने में ब्रजेश मिश्रा इतने ताकतवर थे कि गोपाल कृष्ण गाँधी ने उनको ही ‘भारत सरकार’ कहा था

बहरहाल, सत्ता का सुख अधिक दिनों तक अटल जी के भाग्य में नहीं था। सन 2004 में भाजपा ने सत्ता में वापसी नहीं की और जब कॉन्ग्रेस से मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने विदेश सेवा के अधिकारी श्री ज्योतिंद्रनाथ दीक्षित को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया। जब से जे एन दीक्षित NSA बने तभी से कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से उनपर पद छोड़ने का भारी दबाव बन रहा था। दीक्षित एक विद्वान और सक्षम अधिकारी थे इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विश्वस्त थे लेकिन वे कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी की आँखों में खटकते थे। दीक्षित, सोनिया का भरोसा नहीं जीत सके थे; पद संभालने के सात महीने बाद ही उन्हें आभास हो गया था कि वे ज्यादा दिनों तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर नहीं रह पाएंगे।

प्रधानमंत्री कार्यालय के अन्य अधिकारियों की तरह दीक्षित की पहुँच सोनिया गाँधी तक नहीं थी। वे जब भी मिलने की इच्छा जताते तो सोनिया गाँधी की तरफ से नकारात्मक उत्तर ही मिलता। वास्तव में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनते ही NSA पद के लिए झगड़ा प्रारंभ हो चुका था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद के लिए अधिकारी के नाम की घोषणा होने से चार दिन पहले पूर्व आईबी निदेशक एम के नारायणन दीक्षित से ‘पूछताछ’ करने चेन्नई से दिल्ली आए थे। जब दीक्षित ने उनसे पूछा कि इतनी दूर आने कि क्या आवश्यकता थी तो नारायणन ने कहा कि उन्हें सोनिया गाँधी ने भेजा था।

इसके बाद दीक्षित को NSA बना दिया गया और नारायणन को प्रधानमंत्री कार्यालय में आंतरिक सुरक्षा के लिए विशेष सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था। ये दोनों ही पद ऐसे थे कि दीक्षित और नारायणन में टकराव की स्थिति उत्पन्न होनी निश्चित थी। मामला तब और बिगड़ गया था जब एक भारतीय इंटेलिजेंस अधिकारी रविंद्र सिंह देश से गद्दारी कर अमेरिका की सीआईए के लिए काम करने लगा था। नारायणन इस बहुचर्चित मामले का ज़िम्मेदार रॉ (RAW) को मानते थे क्योंकि रविंद्र रॉ अधिकारी था।

नारायणन ने रॉ के सभी उच्च अधिकारियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया जिसमें अमर भूषण, एन के शर्मा और रॉ चीफ सी डी सहाय शामिल थे। लेकिन चूँकि आधिकारिक रूप से NSA जे एन दीक्षित आईबी और रॉ समेत सारी इंटेलिजेंस एजेंसियों के चीफ थे इसलिए नारायणन की बात मानने को बाध्य नहीं थे। फिर भी नारायणन अपने राजनैतिक रसूख के चलते रॉ चीफ को दंडित करना चाहते थे। दीक्षित इसके तैयार नहीं थे क्योंकि एक भारतीय एजेंट के गद्दार होने से ज्यादा बड़ी इंटेलिजेंस असफलताएँ देश कारगिल युद्ध में झेल चुका था। ऐसे में एक केस के लिए रॉ चीफ को पद से हटा देने को वे ठीक नहीं समझते थे।

नारायणन ने इसे अपनी नाक की लड़ाई बना ली थी। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यालय में निरंतर दीक्षित पर पद छोड़ने का दबाव बनता जा रहा था। उन्हें सोनिया गाँधी से मिलकर अपनी बात कहने का मौका भी नहीं दिया गया था। इस मानसिक अवसाद को वे झेल नहीं सके और एक दिन चल बसे। उनके निधन पर एक उच्च सरकारी अधिकारी ने कहा था, “They Killed Him“. देहांत से पहले उनके पास भारत पाकिस्तान को लेकर एक डिप्लोमैटिक रोडमैप था। वे कहते थे कि मैं ऐसा कुछ करना चाहता हूँ जिससे देश को मुझपर गर्व हो। लेकिन न तो मनमोहन सिंह और न ही सोनिया गाँधी को ज्योतिंद्रनाथ दीक्षित की कोई चिंता थी। दीक्षित के दुनिया छोड़ने के बाद नारायणन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बना दिया गया।

पूर्व आईबी चीफ रहे एम के नारायणन ने NSA का पद तो संभाल लिया लेकिन उनकी अक्षमता 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले में सामने आई। उस समय के अख़बारों और मीडिया में लगातार खबरें छपती थीं कि पाकिस्तानी आतंकी समुद्र के रास्ते हमला करने के ट्रेनिंग ले रहे हैं लेकिन इन सभी सूचनाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के स्तर पर महत्व नहीं दिया जाता था। यह बात पूर्व इंटेलिजेंस अधिकारियों विक्रम सूद और वप्पाला बालाचंद्रन ने अपनी पुस्तकों में भी लिखी हैं। इंटेलिजेंस एजेंसियों का काम होता है सूचनाएँ जुटाना। उन सूचनाओं पर समय रहते कार्यवाही करने का काम NSA और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का होता है।

सोनिया गाँधी ने दीक्षित की मृत्यु के बाद एक ऐसे व्यक्ति को NSA बनाया था जिसने NSA रहते अपना दायित्व नहीं निभाया। यही नहीं कॉन्ग्रेस ने 2008 के मुंबई हमले के बाद 2014 में सरकार जाने तक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को वैधानिक दर्ज़ा देने के बारे में नहीं सोचा न ऐसा कोई कानून लाने की बात की गई। अब क्योंकि पिछले 5 साल में किसी आतंकी बम हमले में नागरिकों की जान नहीं गई है और वह भी इसलिए क्योंकि देश में एक सक्षम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार है अतः कॉन्ग्रेस भविष्य में इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति के हाथ पाँव काटना चाहती है।  

कॉन्ग्रेस यह चाहती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और परिषद को संसद के प्रति उत्तरदायी बनाकर इस संस्थान के सभी अधिकार सार्वजनिक कर दिए जाएँ। लेकिन भारत की सुरक्षा प्रणाली अभी इतनी परिपक्व और सुदृढ़ नहीं है कि NSC को कानून और संसद के दायरे में लाने भर से सारी समस्याओं का हल निकाला जा सके। जितनी भी गोपनीय सूचनाएँ NSC को प्राप्त होती हैं उनपर यदि संसद में चर्चा और मीडिया में बहस होने लगेगी तो देश की सुरक्षा का क्या हाल होगा इसकी कल्पना मात्र में सिहरन होती है।

तर्क दिया जा सकता है कि अमेरिका में NSC, 1947 में कानून लाकर बनाई गई थी। लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में हमें हमें यह समझना चाहिए कि अमेरिका के हित भारत से भिन्न और बड़े हैं। अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी कॉउंसिल के इतिहास और कार्यशैली पर डेविड रॉथकोप्फ ने एक पुस्तक लिखी है: Running the World: The Inside Story of the National Security Council and the Architects of American Power.

इस पुस्तक में रॉथकोप्फ लिखते हैं कि यद्यपि नेशनल सिक्योरिटी कॉउंसिल कानूनी तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति और उनके अधिकारियों को असीम शक्ति प्रदान करती है लेकिन कानून और इतिहास उतने महत्वूर्ण नहीं हैं जितना राष्ट्रपति और उनके विश्वस्त अधिकारियों के बीच संबंध। इससे हमें पता चलता है कि भले ही कोई एजेंसी क़ानूनी तौर पर बनी हो लेकिन उसका सुचारू रूप से कार्य करना अधिकारियों की दक्षता पर निर्भर करता है। ऐसे में कॉन्ग्रेस की सरकारों के पूर्व में किए कारनामों के कारण उन पर भरोसा करना संभव नहीं।

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