Wednesday, October 28, 2020
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व्यंग्य: रवीश जी दुबरा गए हैं, एतना चिंता हो रहा है देस का कि का कहें महाराज!

आप यह सोचिए कि ये सरकार दलालों को खत्म करना चाहती है! दलालों से समस्या क्या है? कॉन्ग्रेसी सत्ता की दलाली तो लम्बे समय तक मेरा चैनल, मेरे सहकर्मी आदि करते रहे हैं। इसी से पेट चलता है। बिना पेमेंट के कर रहा हूँ, कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी तक में भविष्य ढूँढ रहा हूँ, इससे बड़ी दलाली और क्या होगी? लेकिन मोदी सरकार दलालों के पीछे ही पड़ गई है।

नमस्कार, मैं बकैत कुमार!

अभी जीडीपी के सदमे से उबरे नहीं थे कि किसानों पर हमला बोल दिया गया। भारत का युवा तो आईपिल, सॉरी IPL, फ्री में कैसे देखें उस पर सर्च कर रहा है। उसी गूगल में, उसी उँगली से लिखे कि ‘जीडीपी पर बकैत कुमार की राय’ तो मेरा लेख मिल जाएगा। मटीरियल तो मैं रोज बनाता हूँ, नोट्स की तरह उपलब्ध कराता हूँ। प्वाइंट-वाइज चाहिए तो वो भी दे दूँगा, लेकिन युवा वर्ग सो रहा है। उसको पढ़ना है मेरा फेसबुक पोस्ट, लेकिन पढ़ कर खाली गरियाता है, और भाग जाता है। ऐसे जागेगा भारत?

फिर कहते हैं ‘बकैत जी, आप ही की बकैती से उम्मीद है। उम्मीद से तो हम भी बैठे थे मई 2019 में, कि युवाओं के लिए इतने पोस्ट लिखे, स्टूडियो से कैम्पेनिंग की, रिसर्च एंड डेवलपमेंट टीवी, R&DTV को हिन्दी में भी टॉप टेन से बाहर करा दिया… किस लिए? भक्तों की इतनी गालियाँ सुनी, किस लिए? इसीलिए न कि वापस भाजपा छोड़ कर कोई भी आ जाए तो हम लोगों का भी चैनल जो है ‘एक्सक्लूसिव’ जानकारी निकाल कर टीआरपी पा जाएगा। हमको भी तो मन है कि कोई कैबिनेट मिनिस्टर बरखा टाइप बदलवा कर देखें! लेकिन जा रे जमाना, ये होने नहीं दिया। मजनूँ! साला जलता है हमसे!

खैर, युवा सोता रहा और मोदी ने एक और रिफॉर्म, मेरा मतलब है कि हमला, कर दिया। नोटबंदी से राहुल गाँधी अभी भी त्रस्त है, आज भी राहुल गाँधी जो भी वीडियो बनाता है, एक बार नोटबंदी पर जरूर बोलता है। आप ऐसे क्रिएटिव आदमी को वोट नहीं देते जो चार साल बाद भी डीमोनेटाइजेशन रट रहा है, लेकिन मोदी को देना है। काहे? काहे कि शौचालय बनवा दिया, गैस दिलवा दिया, बत्ती लगवा दिया, जीवन सुधार दिया… ठीक है कि जीवन सुधार दिया लेकिन एक आम आदमी के जीवन में संघर्ष ही तो है। वही तो उसके अस्तित्व की परिभाषा का आधारबिन्दु है और आपने वह भी खींच लिया। ये किस तरह की सरकार है?

जीएसटी से क्या हुआ? वन नेशन वन टैक्स का मतलब तो यही होता है न कि जितना टैक्स आटा पर उतनी ही ‘चेभरोलीट’ की गाड़ी पर। जब वो नहीं कर सके तो काहे का जीएसटी, ‘एक देश, एक टैक्स’। लेकिन युवा वर्ग जो है वो सो रहा है, वो IPL का शेड्यूल ढूँढ रहा है कि शाम में किस का मैच है। एक तो वैसहिए हमारा R&DTV चैनल नहीं देखता था कोई, अब ये कोरोना के टाइम में क्रिकेट हो रहा है। नहीं, ठीके है। जब ऊपर से ही कुआँ में ही भाँग मिला दिया है तब और कर भी क्या सकते हैं।

अब देखिए किसान वाला बिल आया है। ऊपर से सब ठीक लगता है कि किसान को विकल्प हो गया, वो अपनी उपज किसको बेचे, कहाँ बेचे। लेकिन गहराई में जाने से पता चलता है कि एक गरीब किसान को सरकार कन्फ्यूज करना चाहती है कि वो कहाँ बेचे। पहले सिस्टम ठीक था कि एक जगह जाना है, गेहूँ-मकई सब बेच देना है। पैसा भी तय होता थ, दलाली भी तय थी। अब, ये नई खुराफात सूझी मोदी को कि कृषि को भी उदारवादी बनाना है। योगी तो इनसे उदारवादी बने नहीं आज तक, कृषि को बनाने जा रहे हैं।

आप यह सोचिए कि ये सरकार दलालों को खत्म करना चाहती है! दलालों से समस्या क्या है? कॉन्ग्रेसी सत्ता की दलाली तो लम्बे समय तक मेरा चैनल, मेरे सहकर्मी आदि करते रहे हैं। इसी से पेट चलता है। बिना पेमेंट के कर रहा हूँ, कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी तक में भविष्य ढूँढ रहा हूँ, इससे बड़ी दलाली और क्या होगी? लेकिन मोदी सरकार दलालों के पीछे ही पड़ गई है।

आप सोचिए कि दलाली जैसा इनोवेटिव कोई चीज है? दिल्ली में देखिए कि मोमो की दुकान से ज्यादा प्रॉपर्टी डीलर हैं। सोफा पर बैठे रहते हैं, मकान किसी का, चाहिए किसी को, और आधे महीने का रेंट ले लेते हैं। कल को इस पर बिल ले आना और हन्नी-लक्की सब घर बैठेंगे फिर। क्या मेहनत नहीं करते दलाल? राडिया टेप में सुनिए हमारी मेहनत। धूप में खड़े रहते हैं, छाती जलती रहती है, आत्मा धिक्कारती है कि रे बकैतबा, राहुल गाँधी को कैसे कर लेता है डिफेंड… लेकिन मजाल है कि चेहरे पर मुस्कुराहट के अलाव एक शिकन तक आ जाए जब डिम्पलधारी राहुल जी सामने हों।

किसान लोग सीधे लोग होते हैं। अब कहा जा रहा है कि वो कॉन्ट्रैक्ट साइन करें और खेती करें। बताइए आप! किसान खेती करेगा कि कॉन्ट्रैक्ट साइन करेगा? फिर मोदी कह देगा कि किसान को एमबीए कर लेना चाहिए ताकि वो समझ सके कि कॉन्ट्रैक्ट में क्या लिखा हुआ है। किसान तो गरीब होते हैं, उनको क्या मतलब कि वो चार पैसे ज्यादा कमा लें। ज्यादा पैसे कमाएगा, तो वो फ्रिज खरीद लेगा, एसी लगा लेगा, डबल बेड पर गद्दा बिछा लेगा और स्मार्टवाच से स्लीप ट्रैकिंग करेगा कि हे एप्पल वाच जी महाराज, हमको गहरी नींद आई कि नहीं, ये बता दो।

फिर आप सोचिए कि ‘चिड़ियों के जगने से पहले खाट छोड़ उठ चला किसान’ वाली कविता का क्या होगा? क्या आपको नहीं लगता कि मोदी के ये किसान वाले बिल साहित्य विरोधी हैं? सोचिए कि किसान शब्द सुनते ही कैसी छवि मन में उभरती है: एक नरकंकाल, जिस पर थोड़ी चमड़ी हो, दिखने में कोयला जैसा काला हो, मैली धोती को घुटने से ऊपर चढ़ाए हो, और भवों के ऊपर एक हाथ रख कर बादल की राह देख रहा हो।

मोदी ने क्या किया? मोदी ने इस ऐतिहासिक और सर्वकालिक लोकप्रिय छवि को बदलने की कोशिश की है। अब किसान जो है वो ऐसा गरीब टाइप नहीं दिखेगा। वो समान कहीं और बेच लिया करेगा। वो मंडी के आढ़तियों से ब्याज पर पैसे ले कर उसी आढ़त में, कम तौल पर वाले तराजू की वैज्ञानिकता पर अपनी उपज को नहीं बेच पाएगा। ये एक युग की समाप्ति जैसा है।

आप ही सोचिए कि कल्कि अवतार हुआ भी नहीं और मोदी युग की समाप्ति करवा रहा है। स्वयं को हिन्दू हृदय सम्राट कहलवाने वाला आदमी विष्णु भगवान को ही चुनौती दे रहा है। कह रहा है कि कलियुग में तुम्हें आने ही नहीं देंगे, युग ही बदल देंगे। क्या यह हिन्दू-विरोधी विधेयक नहीं है?

एक समाज के तौर पर हम कहाँ जा रहे हैं? धरती घूम रही है और हम भी घूम रहे हैं। इसी धरती पर मोदी हमें घुमा रहा है। जबकि लेहरू जी द्वारा भारत को दिए गए विज्ञान की सौगात यही कहती है किसान को किसान ही रहने दो, उसको व्यापारी मत बनाओ वरना कॉन्ग्रेस के द्वारा प्रतिपादित ऊष्मप्रवैगिकी के प्रथम नियम के अनुसार, भारत में किसान और गरीब न तो बढ़ते हैं, न कम होते हैं, वो बस कॉन्ग्रेस के नेताओं द्वारा अपनी अवस्था त्यागने का प्रलोभन पा सकते हैं।

मोदी ने इस वैज्ञानिक बात को बदलने की कोशिश की है। किसान अब व्यापारी हो जाएगा। आप ही सोचिए फिर व्यापारी क्या करेगा? व्यापारी तो एक खेल भी हुआ करता था जिसमें लोग कलकत्ता जाने पर किराया लेते थे, और दो बार जाने पर ज्यादा किराया लेते थे। अब मैं कलकत्ता नहीं जा पाता, न ही वहाँ की खबरें दिखा पाता हूँ क्योंकि दीदी किराया तो लेती ही है, टीएमसी के लोग साथ में खर्चा-पानी भी दे देते हैं।

लेकिन बात समझ में आती है जब आप इस पर मनन-चिंतन करते हैं। बनिया आदमी बनियावृत्ति में ही यकीन रखता है। वो तो कहेगा ही कि गेहूँ ज्यादा उपजा लिए तो बेच लो। यहाँ मत बेचो, वहाँ बेचो जहाँ पैसा ज्यादा मिलता है। इस आदमी के लिए सब चीज बस पैसा ही है। पैसा, जबकि शास्त्रों के अनुसार, हाथ का मैल है। आखिर किसानों को हाथ का मैल क्यों दिलवाना चाहता है मोदी? कोरोना के समय में जब बीस सेकेंड तक हाथ धोना चाहिए, तब मोदी जी कह रहे हैं कि हाथ का मैल घर में रखो।

ओहो! अब समझ में आया! रिलायंस वाले हैंडवाश और सेनिटायजर भी तो बेचते हैं।

नमस्कार!

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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