Tuesday, July 27, 2021
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मजबूरी का नया नाम – प्रियंका गाँधी

वहीं प्रियंका गाँधी के राजनीति में आने से भाजपा के राष्ट्रीय प्रचारक रह चुके राहुल गाँधी के लिए नया संकट यह पैदा हो गया है कि कहीं उन्होंने बहन को वोट देने की माँग की और वोटर दे आएँ अपना वोट बहन मायावती को।

विपक्ष में आजकल त्योहारों का मौसम देखने को मिल रहा है। इसी मौसम के बीच पहली ख़ुशख़बरी ये रही कि भगवंत मान ने देशहित के लिए दारु छोड़ने की भीष्म प्रतिज्ञा कर डाली। जबकि जानकारों का कहना है कि भगवंत मान यह घोषणा करने से पहले ही 2 पैग लगा चुके थे। देशहित में अगला ऐतिहासिक त्याग इसके बाद अगर वो कुछ कर सकें तो कृपया कर उन्हें राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए।

इसके बाद त्यौहार मनाया लोकतंत्र के लेटेस्ट प्रवक्ता, नक़ाबपोश और ‘टेक एक्सपर्ट’ सैयद शूजा ने। सैयद शूजा की मानें तो वो भारतीय मूल के अमरीकी एक्सपर्ट हैं, जिन्होंने EVM को हैक कर के दिखाने का दावा कर डाला था।

लोकतंत्र ख़तरे के निशान से ऊपर रहे या नीचे जाए, लेकिन इस वाकए ने देश के नौजवानों को एक नई दिशा दे डाली है। मने, इंजीनियरिंग कर के घर में पूरा दिन PUBG खेल रहे युवा, जो घर पर अपने टैलेंट की कद्र ना होने से परेशान भी है और पंखा-टीवी ठीक करने के काम आता रहा है, उसने भी मन बना लिया है कि ‘One fine day’ वो भी अब अमेरिका जाकर, नक़ाब पहन कर लाइव विडियो प्रसारण के ज़रिए देश-विदेशों में ये कह कर लहरिया लूटेगा कि वो भी टेक एक्सपर्ट है, क्योंकि विदेश में बैठा एक नौजवान ऐसा कर के बहुत जलवा काट चुका है। उसके प्रवचन कोई सुने न सुने, कपिल सिब्बल और नेशनल हेराल्ड के पत्रकार गिरोह तो जा कर सुन ही लेंगे।

हमारे देश में अपनी विश्वसनीयता क़ायम करने का ये सबसे आसान तरीका बन चुका है कि ख़ुद को किसी तरह से विदेश से सम्बंधित बताकर जो मन करे वो ज्ञान उड़ेल दिया जाए। कोई जवान लड़का जब लड़की देखने जाए तो जब तक लड़की की मम्मी इंस्टाग्राम पर उसकी होनोलूलू में खिंचाई गई तस्वीर नहीं देख लेती, तब तक उसे यकीन नहीं हो पाता है कि लड़का वाकई में क़ाबिल है।

सैयद शूजा की रामलीला ख़त्म हुई ही थी कि कॉन्ग्रेस ने भी लगे हाथ देश की राजनीति में एक और ऐतिहासिक निर्णय झोंक दिया। वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता की मानें तो प्रियंका गाँधी ने पूर्वांचल में पार्टी कमान संभालकर वर्षों से चली आ रही परिवारवाद कि राजनीति में नई मिसाल क़ायम कर डाली है।

अंधभक्त और भाजपा चाहे कितना भी विरोध करें, लेकिन प्रियंका गाँधी हर मायने में ज़मीन से जुड़ी हुई नेता हैं और उनमें प्रतिभा भी कूट-कूट कर भरी हुई है। सबसे बड़ी प्रतिभा उनकी जिसे ख़ोज निकालने में गोदी मीडिया कल से नाकाम रहा है, वो ये है कि दुनिया में वो ऐसी इकलौती महिला हैं जो जीन्स पहनते ही वाड्रा, और साड़ी पहनते ही गाँधी बन जाने की विलक्षण क्षमता रखती हैं, विशेषज्ञों का कहना है कि बस इस मामले में वो इंदिरा गाँधी से एकदम अलग हैं। प्रियंका गाँधी की सबसे बड़ी खूबी है कि वो ‘ऑड डेज़’ पर गाँधी और ‘इवन डेज़’ पर वाड्रा बनकर रह सकती हैं। यानी इस तरह से ऑड-इवन का फ़ॉर्मूला अब सिर्फ सर केजरीवाल ही नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस ने भी इजाद कर डाला है।

ये वही मीडिया गिरोहों का समूह है, जो प्रियंका गाँधी के आज तक के उनके समाज के लिए किए योगदान, उनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से किए गए राजनीतिक कार्य को गिनाने के बजाए उनके ‘लुक’ की तुलना इंदिरा गाँधी से करने में लगा है। बेहद सफाई से यह गिरोह कल से यह बताकर पाठकों का मनोरंजन कर रहा है कि प्रियंका गाँधी अपने नाश्ते और डिनर में टिंडे नहीं बल्कि दाल-मखनी और मलाई कोफ़्ता खा रही हैं।

एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस बिना किसी पूर्व अनुभव के प्रियंका गाँधी को राजनीति में झोंककर ये साबित कर चुकी है कि राहुल गाँधी से ना हो पाएगा, वहीं पत्रकारों का गिरोह इस मशक्कत में जुटा है कि प्रियंका गाँधी चलती भी अपनी दादी की ही तरह हैं और बोलती भी अपनी दादी की तरह हैं। स्पष्टरूप से यह गिरोह जानता है कि कॉन्ग्रेस की इस नई सनसनी के पास ऐसा कुछ है ही नहीं, जिस पर वाकई में वह चर्चा और ‘विशेष चर्चा’ बिठा सकें।

इस देश का वोटर कितना खुश होता अगर कॉन्ग्रेस अपने वंशवाद की तलब को किनारे कर, एक ऐसे चेहरे को लेकर आती जिसमें जनता को एक भविष्य का नेता नज़र आता, जो उनकी अधिकारों को लेकर लड़ चुका हो, जो समाजवाद और लोकतंत्र के ढाँचे के लिए प्रतिबद्द रहा हो।

विपक्ष की सबसे बड़ी हार यही है कि वो इस देश में नेता नहीं बल्कि अपने वंश को झोंकना चाहता है, इसी जल्दबाज़ी में वो प्रधानमंत्री का चेहरा लेकर नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी को हटाने की तीव्र कुंठा लेकर जनता के सामने आता है।

वहीं प्रियंका गाँधी के राजनीति में आने से भाजपा के राष्ट्रीय प्रचारक रह चुके राहुल गाँधी के लिए नया संकट यह पैदा हो गया है कि कहीं उन्होंने बहन को वोट देने की माँग की और वोटर दे आएँ अपना वोट बहन मायावती को। कितना बड़ा संकट उनके सामने पैदा हो गया है, कभी ‘बटन’ दबा देने मात्र से वोट भाजपा को चले जाया करते थे, अब यह नई चुनौती है कि ‘बहन’ के लिए वोट माँगकर उन्हें वोट को बहन मायावती को जाने से भी रोकना होगा।

प्रियंका गाँधी का नाम चर्चा में आने के बाद कुछ महिलाओं में भी विशेष उत्साह देखा गया है, उनका मानना है कि प्रियंका गाँधी इस देश में पितृसत्ता की काट बनकर आई हैं। लोग शायद यह भूल गए हैं कि उन्हीं की माता सोनिया गाँधी पिछली 2 पंचवर्षीय के दौरान ख़ुद प्रधानमन्त्री न होकर भी देश चला चुकी हैं। जो महिला 15 पन्नों के CV वाले एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को झोलाछाप डॉक्टर साबित कर चुकी हैं, क्या वह इस देश में महिला सशक्तिकरण में नहीं आता है?

क्या ये महज़ एक इत्तेफ़ाक है कि वही राजमाता जो कॉन्ग्रेस की प्राचीन दंतकथाओं में कहा करती थी कि बेटा सत्ता ज़हर है, आज उसी के दोनों बच्चे परिवार के पैत्रिक व्यवसाय यानि राजनीति में ‘वेल सेटल्ड’ हो चुके हैं। लोकतन्त्र की भाषा में तो मालूम नहीं, लेकिन गढ़वाली बोली में इसे ‘फट्याटोप’ कहते हैं।

‘बेटा बचाओ’ की नाकाम कोशिशों के बाद बालिका दिवस पर कॉन्ग्रेस ने ‘बेटी बचाओ’ अभियान पर जो पहल की है, उसकी हर तरह से तारीफ़ ही की जानी चाहिए।

देश का वोटर सिर्फ यही उम्मीद पाल सकता है कि जितना योगदान राहुल गाँधी के गालों के डिम्पल भारतीय राजनीति में कर रहे हैं प्रियंका गाँधी के डिम्पल उससे कुछ ज्यादा का ही योगदान करेंगी, आख़िरकार वो गाँधी होने के साथ ही वाड्रा भी तो हैं।

उम्मीद पर दुनिया क़ायम है, दोनों बच्चों के ‘सेटलमेंट’ के बाद अब कॉन्ग्रेस पार्टी भी किसी दिन ‘सेटल’ हो जाए, इसी उम्मीद के साथ प्रियंका को बधाई और शुभकामनाएँ।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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